गत गढ़ता है आगत


इतिहास से सबक
लेने की कला
नहीं सीख पाये आज तक
इसीलिये न / कहते हैं
दोहरा जाता है / स्वयं को
इतिहास

मैंने तो नहीं मांगी कभी
शान्ति
कैसा लगेगा शान्त समंदर
झींगुर बिन रात / और जंगल
शान्त

कौन मानेगा
किलकारियों ्र खिलखिलाहटों
से होता है प्रदूषण
गूंगी कर दोगे क्या
चिड़िया

अतीत की आवाजें
रखनी होंगी बचाकर
प्रगति के चमचमाते पथों की
पूर्वज हैं
पगडंडियाँ

जाने कब मिलेगी मंजिल
कदम की पहली धमक
रखे साथ में
मानो / और जानो
मंत्र

इतिहास के झरोखे से
सीखे झांकना
जमे रहें पाँव
पृथ्वी पर / आज की
ज्यादा दिखेगा साफ
कल आने वाला
चाँद

गत गढ़ता है आगत को
जीवन जलता है
स्वागत को
बात रहे / और साथ रहे
रात बहे / और तैरे दिन
देह में जैसे
आँख


अशोक सिंघई 
समुद्र चॉंद और मैं कविता संग्रह से ...


Post a Comment

0 Comments