प्रश्नोत्तर का रुका चक्र

इस उत्तर के आगे
होगा प्रश्न मौन
आज तक तो मौन है
उत्तर
इस प्रश्न का
कि कौन है जो
सूरज को चारा बनाकर
फाँसता है सृष्टि को
हमारी भाषा में
दिन-दहाड़े

बड़े सबेरे शिकार पर
निकलता है कौन
जानवर का विलोम
प्रातः तो होती है
वरदान / जीवन की
अभय, उमंग और
जगाने / अपने-अपने स्पंदन
जीवन की सुबह होती है
वस्तुतः सुबह

सुबह बुनती है
कई जाल / इन्द्रधनुषों के
सारी गतियों को
दिशाओं सहित
कौन कर लेता है कैद
सूरज को चारा बनाकर
मौन है उत्तर

विवश नहीं है
उत्तर देने को उत्तर
इस महाभारत में
उस धर्मराज सा
दशों-दिशाओं
चौदह भुवनों को
ताकने का दावा करते
धृतराष्ट्रों का युग है यह
सर्वज्ञाता / सर्वदृष्टा
अंधों का युग है यह
दाद पर दाद दे रहे हैं
बहरे / गूँगी आलापों पर

सब कुछ चलता है
सब कुछ ढकता है
जिन्दगी और मौत
रोजमर्रा के खेल-तमाशे
किसके लिये रचाये जाते हैं
तमाशाओं / उत्सवो के खेल
भीड़ तो बढ़ी है
दरबारियों की
संख्या राजाओं की अलबत्ता
लगभग स्थिर है

मौसम के तगादे
हराम कर दें जीना
चक्कर पर चक्कर
सूरज / चाँद
दिन / रात
हवा / पानी
सागर की लहरों सा
उतार - चढ़ाव
इतने चक्कर
कौन खिलाता है
इस जनम के चक्कर में
जन्म-जन्मांतर की कथा
कौन सुनाता है


कौन चाहत के चक्के पर
नचाता है सब को / लट्टू सा
अलग-अलग आकार लेती
पास होती / दूर होती
मिट्टियाँ / लचीलापन खोते-खोते
किसी ब्लैक-होल द्वारा
लील ली जायेंगी
ये ब्लैक-होल
बनाता है कौन
उत्तर फिर
मौन का मौन

कभी-कभी कहता है
उत्तर भी
उस वक्त सुनता है कौन
और कौन का कौन
उत्तर रह जाता
मौन का मौन

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