बेटी की बेटी के लिये

बेटी की बेटी के
जन्म दिन पर
सोचा बाटूँ अपना सुख
अपनी कलम से

कलम साथी है
वैसे ही जैसे रहता है साथ
सुख का, दुःख का
आती-जाती श्वाँस का
जुड़ती-बिखरती साँस का

बेटी होती है किरन, भोर की
ज़िन्दगी के छाज़न से
उतरती है सुख सी
गोद में समेटने पर
लगता मानो भर लिया है
माँ को अंक में

छोटी सी दमकती
दीप-शिखा होती है बेटी की बेटी
आँगन में तुलसी के चौरे पर
पूजा घर को बिखेरते उसके नन्हे हाथ
सुगढ़ता से गढ़ने लगते
फिर-फिर मेरा छोटा सा संसार

घोसले के मुँह पर ही मिलती
हमेशा हाथ में लिये पानी का गिलास
छीनने सा पकड़ती है बस्ता-थैला
जानती है, पर मानती नहीं
उसे देखकर ही बुझ जाती है
उसके नाना की प्यास

किरन वही भोर की
बदलती जाती चपला में
हिमालय से भी
लगने लगती ऊँची / वही बेटी
जब होने लगती है ऊँची

नहीं जानते कैसा होगा
उसका घर-संसार
कैसा होगा उसका जीवन
कैसी देख-रेख

कैसी करूँ प्रार्थना अगम से
इतनी कोमल, इतनी लाड़ली है
मेरी बेटी की बेटी
नहीं डालना चाहता / मन से
उस पर आर्शीवाद तक का भार

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