हमारे छेदीलाल बैरिस्टर : रत्नावली सिंह


पूर्व पीठिका

आकाश की असीमता का आभास, वातायन के सीमित दायरे से होना संभव नहीं है, खुले गगन के तले उसकी विशालता का बोध होता है। इसी तरह महापुरुषों की महानता का परिचय, उनके कार्य से ही मिल सकता है। जैसे एक छोटे से बीज में विशाल वट वृक्ष की संभावनाएं छिपी रहती है, वैसे ही असीम संभावनाओं को समेटे, उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में, छोटे से गांव अकलतरा में एक शिशु का जन्म हुआ। कालांतर में ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर के नाम से जाने गए व्यक्ति के विशाल व्यक्तित्व के अंशमात्र को, जैसा मैंने जाना है, उसे वैसा ही प्रस्तुत करने का मेरा विनम्र प्रयास है, जो 'निज-बल अनुरूप से माछी उडई अकाश' के समान है। बैरिस्टर साहब को गुजरे करीब आधी शताब्दी बीत चुकी है, फिर भी जन-मानस उन्हें स्नेह और श्रद्धा से आज भी याद करता है, यह अपने आप में एक उपलब्धि है, उनकी लोकप्रियता की साक्षी है। 
समय-समय में उनके सम्पर्क में आए लोगों द्वारा उनके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला जाता रहा है। उनके जीवन पर एक स्मारिका 1992 में निकाली गई। 2001 में दस्तावेज बैरिस्टर साहब का भी प्रकाशन हुआ। कु. जया मिश्रा द्वारा उनकी रामलीला पर एक शोध-निबंध लिखा गया। श्री शांतिकुमार द्वारा पीएचडी हेतु उन पर शोध-प्रबंध लिखा गया है। किन्तु उनके समग्र जीवन का परिचय उपलब्ध नहीं है। इस अभाव को दूर करने की दिशा में यह एक कदम है। 
निधन के बाद प्रख्यात व्यक्तियों से जुडी अनेक किंवदंतियां बहुधा प्रचलित होकर भ्रांतियां उत्पन्न करती हैं। बैरिस्टर साहब को लेकर भी अनेक कपोल-कल्पित बातें कही जाने लगी हैं। इस पुस्तक के माध्यम से उनके जीवन का सत्य स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। संभवतः इससे उनके विषय मे प्रचलित भ्रांत कथाओं पर विराम लग सकेगा।
स्वतंत्र राज्य के रूप में छत्तीसगढ का अस्तित्व में आने के बाद छत्तीसगढि़यों के मन की हीन भावना दूर करने तथा उनकी अस्मिता को जगाने की महती आवश्यकता है। इस हेतु अंचल के महापुरुषों के जीवन का ज्ञान बहुत उपयोगी है, जिससे जन-मानस में आत्मविश्वास एवं आत्म-सम्मान की भावना जाग सकेगी। इसे रचना में समाहित बैरिस्टर साहब की अद्भुत प्रतिभा, उनकी महान उपलब्धियां, उनकी निस्पृहता, त्याग एवं बलिदान की गाथा छत्तीसगढि़यों के हृदय में गौरव की भावना उत्पन्न करेगी। व्यक्ति के चरित्र-निर्माण में सम-सामयिक सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों की अहम् भूमिका होती है, अस्तु इस रचना में भी सम-सामयिक परिस्थितियों का भी वर्णन है। इस बात को दावे से कह सकती हूं कि उनके चरित्र एवं घटनाओं के वर्णन में सत्यता का पूर्ण निर्वाह हुआ है। आत्मजा होने पर भी वस्तुनिष्ठता का पूरा ध्यान रखा गया है। हां, इस छोटे से कलेवर में उनके चरित्र-चित्रण में न्याय नहीं हो सका है। उनके कितने ही प्रियजनों का नाम छूटा है, कुछ घटनाएं भी छूटी हैं। निश्चित रूप से यह रचना के कलेवर तथा कुछ अपनी अल्पज्ञता के कारण हुआ है, जिसके लिए मैं क्षमाप्रार्थिनी हूं।
बैरिस्टर साहब की जीवनी प्रस्तुत कर मैं पितृ-ऋण से मुक्त हुई हूं या नहीं, पर छत्तीसगढ के कर्मठ पुत्र की जीवनी सामने लाने से मुझ पर छत्तीसगढ महतारी का ऋणभार अवश्य कम हुआ है। क्योंकि- 
राम तुम्हारा चरित, स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।। 
रचना-प्रकिया में स्वजनों से, बैरिस्टर साहब के निकट सम्पर्क में आए लोगों से, पग-पग पर मुझे सहयोग मिला, हृदय से मैं उन सबकी कृतज्ञ हूं। बिना सबके सहयोग के लिख पाना मेरे लिए संभव नहीं होता। इनकी सूची इतनी बडी है कि सबका नामोल्लेख यहां करना संभव नहीं है, अत उनसे क्षमा मांगते हुए हृदय से आभार व्यक्त करती हूं। पुस्तक के प्रकाशन के लिए छत्तीसगढ शासन और संस्कृति विभाग के प्रति आभारी व्यक्‍त करती हूं एवं संस्कृति विभाग के अपने स्वजन श्री राहुल सिंह के परिश्रम और सहयोग का उल्लेख यहां अपरिहार्य है। 
-रत्नावली सिंह


ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर के जीवन की प्रमुख तिथियां
1891 - जन्‍म
1908 - हीरादेवी के साथ पाणिग्रहण
1914 - एमए (आक्सफोर्ड) बार-एट-ला (इंग्लैंड)
1915 - गुरूकुल कांगडी में अध्यापन
1916 - बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर
1919-1933 तक रामलीला का संयोजन, निर्देशन,
'सेवा' (इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका) का संपादन,
"हालैंड की स्वाधीनता का इतिहास' का लेखन
1920 - गुरू श्री अंजोरदास एवं अगमदास सहित दलितों को खिसोरा' ग्राम में जनेऊ वितरण, पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा गठित सेवा समिति (इलाहाबाद) के उपसभापति, रगाढवाल (उप्र) के दुष्काल में सेवाकार्य
1926 - गांधीजी के बिलासपुर आगमन पर स्वागताध्यक्ष
1927- सुशीला देवी के साथ द्वितीय विवाह
1930 - स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण वकालत की प्रैक्टिस पर पाबंदी और सनद का छीना जाना
1931-1951 तक महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष
1933 - डिस्टिक्ट कौंसिल के चेयरमेन, मप्र कांग्रेस अधिवेशन नागपुर के अध्यक्ष, रू 3000/- का अर्थदंड
1933-34 बंगाल नागपुर रेलवे लेबर यूनियन के जनरल सेकेटरी, जिसके प्रेसीडेंट वीवी गिरी थे
1936 - प्रथम कन्या रत्नावली का जन्म
1937 - गांधीजी द्वारा सेवाग्राम (वर्धा) बुलाकर मध्यप्रांत एवं बरार के प्रथम मुख्यमंत्री बनने हेतु आग्रह, पुत्र विजय का जन्म
1937 - 1942 तक विधान परिषद के सदस्य
1939 - त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के जनरल कमांडिंग आफिसर, अंग्रेज हुकूमत द्वारा डेढ वर्ष की कडी सजा
1942 - भारत छोडो आंदोलन में बंबई से गिरफ्तारी एवं अनिश्चितकालीन कारावास
1946-1952 संविधान सभा के पूर्णकालिक सदस्य
1891956 - महाप्रयाण


style="display:block"
data-ad-client="ca-pub-3208634751415787"
data-ad-slot="4115359353"
data-ad-format="link">


हुआ समय का फेर, हाय पलटी परिपाटी।
जो थे कभी सुमेरू, आज हैं केवल माटी ।।

इसी से लगा हुआ नियति का शिकार एक और घर है जिसके टूटते अहाते पर बार-बार अकुशल हाथों द्वारा किये गये मरम्मत के कितने चिन्ह दिखाई देते हैं। जंगली झाडियों से भरे अहाते में मौलश्री, सेमल, गुलमोहर, आकाशचंपा तथा नीलगिरि के वृक्ष, खपरैल के पुराने घर की रक्षा के लिये प्रहरी के समान तत्पर हैं। जहां-तहां अपने समय की उत्कृष्ट फुलवारी के अवशेष भी दिख जाते हैं। आसपास की उच्च अट्टालिकाओं के बीच इस पुराने मकान एवं जंगल बनते उद्यान को आज भी अपने स्वामी पर गर्व है। गंगा, यमुना और सरस्वती के पावन संगम पर जैसे बसा है प्रयाग, कुछ वैसे ही तीन दिशाओं से आने वाली सड़कों के मिलन स्थल पर स्थित यह उदास घर एक वीतराग पुरूष की पावन स्मृतियों को संजोये, बदलते समय के परिवर्तित जीवन मूल्यों का मूक दर्शक है। सामने गांधीजी की प्रतिमा है, बस एवं ट्रकों से उडी धूल में ढ़की, हाथ में लाठी लिये तेज चाल में चलने की मुद्रा में। लगता है किसी पीडा़ से बचने के लिए जल्दी से जल्दी बहुत दूर चले जाना चाहते हों, किंतु विवश है, हट भी नहीं पाते। अक्सर रात्रि की निस्तब्धता में, सामने गंदी नालियों एवं मुहल्ले भर के कचरे के अंबार से घिरे, अपने निष्ठावान अनुयायी के घर को व्यथित दृष्टि से देखते हुए, गांधीजी की प्रतिमा मानों कह उठती है- 'आज समय बदल गया है, जीवन मूल्य बदल गये हैं। त्याग-तपस्या का स्थान अब लोभ एवं भोग ने ले लिया है। ऐसे वातावरण में लोग मुझे ही भूल गये हैं। साल में गिने-गिनाये दिनों में मेरी याद की जाती है। हां, तरह-तरह की रैलियों की शुरूआत यहां से की जाती है। तब दिखावा करने के लिए मुझे झाड़-पोंछ कर, साफ किया जाता है। आज के नेता माला भी पहनाते हैं, पर सब दिखावे के लिए ही।' स्वार्थ के इस भरे बाजार में, तुम से निस्पृह व्यक्ति को क्यों याद किया जाएगा? पर जब वे दिन नहीं रहे तो क्या ये दिन ही रह पायेंगे? स्वार्थ के कीचड़ में दबा बलिदान का पौधा कभी न कभी तो बाहर आयेगा ही। उस दिन लोग तुम्हें याद करेंगे, तुम्हारे त्याग, तुम्हारी तपस्या का मूल्यांकन होगा, और लोग तुमसे प्रेरणा लेंगे, वह दिन आयेगा अवश्य। एक कमजोर सा विश्वास और उदासी भरा एक निश्वास।


बचपन में कभी पढी़ कविता की इन पंक्तियों को अपने सामने अक्षरश: साकार होते देखने की पीडा़ भी सहनी होगी, यह कब सोच पाई थी मैं? पर बहुधा अनसोची बातें ही घट जाती है और सोची-विचारी धरी रह जाती है। जीवन में अक्सर ऐसा ही हो जाता है।


बिलासपुर का मुख्य मार्ग, स्टेशन से शुरू होकर क्रमश: कचहरी की ओर बढता जाता है, थोडी़-थोडी़ दूरी पर अनेक मुहल्लों से गुजरता, निस्पृह सा। इसी मार्ग पर दयालबंद और जूना बिलासपुर के संधिस्थल पर संभाग का सबसे पुरातन, शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला भवन, अपनी जर्जर अवस्था में भी ब्रिटिश एवं भारतीय वास्तु शैली के समन्वय का सुन्दर प्रतीक, गर्व से मस्तक उठाए खडा़ है। किंतु आज के अर्थप्रधान युग में सरस्वती के इस मंदिर को व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की ऊंची इमारतों ने ओट में छिपा लिया है। यहां से शिक्षा ग्रहण कर कितने ही प्रतिभाशाली छात्र कानून, विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य, खेल तथा प्रशासन से लेकर व्यवसाय के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का आलोक फैलाते आ रहे हैं। सफलता की सीढियां चढ़ते चरणों को शाला की याद भले ही न हो, पर शाला अपने बच्चों को कैसे भूल सकती है?


मन की गति भी अद्भुत है। देश एवं काल की सीमाएं कब इसकी गति को बांध पाई हैं? कोई नियम इस पर लागू नहीं होता। कभी तो बूढे जर्जर तन में भी यह उमंग से भरा रहता है- पर कहीं यौवन की भरी दुपहरी में भी शिथिल, थकित रह जाता है। पलक झपकते, वर्षों की दूरी पार करने वाला मन सन 1956 के सितंबर महीने की 18 तारीख को पहुंच जाता है। दिन था मंगलवार और तिथि थी गणेश-चतुर्दशी। वैसे तो अपने भोले-भाले लोगों के कारण छत्तीसगढ़ बहुत शांत है। इसमें बिलासपुर तो और भी अधिक शांत है। 'धान के कटोरा' में उत्पात नहीं है, लूटमार नहीं है, अशांति नहीं है। सीधे सरल लोग कठिन परिश्रम से जो उपलब्ध होता है, उसमें ही संतुष्ट रहते है। उनकी यही प्रवृत्ति धूर्तों को शोषण के लिए प्रोत्साहित करती रही है। यहां के एकरस जीवन में पर्व-त्यौहार आनंद की तरंग उत्पन्न करते रहे है। दशहरा, दीवाली, होली, मुहर्रम, ईद, बडा़ दिन जैसे त्यौहार सब मिल जुलकर बडे़ उत्साह से मनाते आये हैं। यह 0000सन्न है कि विगत पांच दशकों में त्यौहारों के मनाये जाने के ढंग में बहुत बदलाव आ गया है। आज दुर्गापूजन बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। गली-मुहल्लों में थोड़ी थोड़ी दूरी में कितनी ही प्रतिमाएं स्थापित की जाती है, एक से एक सजावट होती है, कितने पुरस्कार दिये जाते हैं। चार दिनों में लाखों रूपये खर्च किये जाते है, जो शायद इस शहर के रूप को सुश्वार 0000सकते। पर तब ऐसा नहीं होता था। शहर में गिने चुने स्थानों में देवी प्रतिमाएं स्थापित की जाती थीं। लोग अगाध श्रद्धा एवं भक्ति, आदर एवं कुछ भय की भावना से जगत जननी की आराधना करते थे। तब डिस्को संस्कृति नहीं आई थी। प्रदर्शन एवं प्रतिद्वंद्विता की भावना के स्थान पर प्रेम-भकिति भावना की प्रधानता रहती थी। तब गणेशोत्सव बहुत धूम-धाम एवं उत्साह से मनाया जाता था। विद्या-बुद्धि के दाता गणेश की स्थापना कर, तरह-तरह की सजावट होती थी। जूना बिलासपुर में देवांगन मुहल्ले में कागज की कलात्मक जालियों की बेहद सुन्दर सजावट की जाती थी। वैसे तो आज भी गणेश जी की तरह तरह की प्रतिमाएं बनती है, बिजली से खूब सजावट होती है, पर वैसी बात नहीं रहती। तब भजन कीर्तन, प्रवचन, व्याख्यान, कवि सम्मेलन, गम्मत आदि का आयोजन होता। वातावरण भक्ति, आनंद एवं उमंग की लहरों से आलोडि़त रहता। फिर अनंत चतुर्दशी के दिन बाजे गाजे के साथ, भरे मन से गणेश जी की विदाई होती। गणेश विसर्ज के बाद शहर पुन: कुछ दिनों के लिए शांत हो जाता।


पुराना घर करीब तीन फुट ऊंचे अहाते से घिरा है, जिसे आसपास के उद्दंड बच्चे सरलता से फांद कर फल-फूल चुरा ले जाते हैं। फूल चुराने की नीयत से बच्चे तो क्‍या पढे़-लिखे समझदार नागरिक भी बेखटके प्रवेश करते हैं। पकडे़ जाने पर बडे़ अधिकार से कहते हैं कि पूजा के लिए चार फूल तोड लिये- मानों पूजा के नाम से फूल की चोरी, चोरी नहीं होती। क्या जाने ऐसे चुराये फूल भगवान द्वारा स्वीकृत होते हैं या नहीं? पर सब दिन तो एसा नहीं था। शहर के गणमान्य नागरिक हों, या बडे़ से बडे़ प्रशासनिक अधिकारी, बिना अनुमति यहां प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाते थे। राज्य की राजनीति के संचालन में कभी इस घर की अहम भूमिका होती थी, पर आज तो सब कपोल-कल्पित सा लगता है। अपनी ही आंखों से यदि नहीं देखा होता तो क्या मैं ही विश्वास कर पाती? कभी-कभी लगता है, वह पुराना घर सवाल कर रहा है- 'क्या सचमुच ही भुलाया जा सकता है, माटी का वह सपूत, ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, जिसके त्याग-बलिदान और स्वदेश प्रेम की पूंजी अभी भी देश के खाते में जमा है, जो आज तक भुनाया नहीं गया है, जिसकी बहुआयामी प्रतिभा, बिलासपुर-छत्तीसगढ-मध्यप्रदेश तो क्या देश के प्रबुद्ध लोगों को भी अभिभूत करती रही है? आज उसके नगर में ही उसकी पावन स्मृतियों से, आने वाली पीढी को प्रेरणा देने वाला, उनका मार्गदर्शन करने वाला, कोई स्मारक तक नहीं है! सवाल इस बूढे घर का है बिलासपुर से ही नहीं, पूरे छत्तीसगढ से और मध्यप्रदेश से भी।



style="display:block"
data-ad-client="ca-pub-3208634751415787"
data-ad-slot="6787779569"
data-ad-format="auto">



उन्हें आक्सीजन दिया जा रहा था। ड्रिप भी लगी थी। आज छाती में दर्द की शिकायत नहीं थी। वैसे तो डाक्टरों के मना करने पर भी वे आगंतुकों से खूब बातें करते थे, किंतु आज शांत थे। आंखें मुंदी थी पर हिलते ओठों से लगता था कि कुछ जप रहे है, संभवत गीता या फिर रामायण? खिडकियों से लोग दर्शन कर यहां-वहां बैठ जाते। उनकी पत्नी, रतन की दाई, असीम धीरज से गृहणी के कर्तव्य का निर्वाह कर रही थीं। 60-70 लोगों के नाश्ता एवं भोजन की व्यवस्था में जुटी थीं। बीच-बीच में चुपचाप पति को निहार लेतीं, व्याकुल हो जातीं, पर फिर उन्हें किसी काम में लगना पड़ता। उस देवी के लिए तो पति का आदेश ही सर्वोपरि था। पति ने उन्हें सभी के भोजन एवं शयन की समुचित व्यवस्था करने का आदेश दे रखा था। उनका पुराना नौकर अर्जुन, जो उनका समवयस्क सखा था, उनके पैर छोड़ हिलना भी नहीं चाहता था, मौन खड़ा था। पुत्र के समान स्नेह पाने वाला समारू, आने वालों को चाय और पान दे रहा था। उनकी लाडली बेटी रत्नावली, जिसे वे प्यार से रत्तू कहते थे, दौड़-दौड़ कर सब व्यवस्था देख रही थी। पिता की बीमारी की गंभीरता का उसे लेशमात्र भी आभास नहीं था।


पर सन् 1956 की अनंत चतुर्दशी बहुत अलग थी। शहर आशंका और गहरे अवसाद में डूबा था। यह उदासी गणेश विसर्जन की ही नहीं थी। छत्तीसगढ महतारी का दुलारा बेटा- ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर विगत 10 दिनों से अस्वस्थ थे। गणेश चतुर्थी के दिन ही प्रातकाल उन्हें हृदय रोग का दौरा पड़ा था। शहर तथा अनेक गांवों में उनके रामायण एवं गीता प्रवचन तथा व्याख्यान के कार्यकमों का आयोजन था, जिन्हें उनकी अस्वस्थता के कारण निरस्त करने की सूचना दी गई। इस प्रकार उनकी बीमारी का समाचार अंचल में शीघ्र ही फैल गया। जन मानस उनके स्वास्थ्य के लिए चिंतित था तथा उनके निरोग होने की कामना कर रहा था। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से इस आशय के कितने ही तार-टेलीफोन उनके घर प्रतिदिन आ रहे थे। बहुत बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने आ रहे थे। उनसे स्नेह एवं आत्मीयता रखने वाले हर तबके के लोग थे मजदूर-किसान, कुली-तांगेवाले से लेकर राजा, मंत्री, मुख्यमंत्री, नेता, अधिकारी तक। परिचर्या सुविधा की दृष्टि से उन्हें घर के सबसे बड़े कमरे में रखा गया था। यह कमरा मेहमानों का भोजनकक्ष था, जिसकी दो दीवारों पर बड़ी-बड़ी कई खिडकियां थी। यह कमरा नया बना था। उनका घर, उनको देखने आये परिजनों एवं सुहृद जनों से भरा था। वे निशब्द खिड़कियों से उन्हें देख लेते थे। उनके भाई डाक्टर चंद्रभान सिंह, देश के शीर्ष शल्य चिकित्सकों में जिनकी गणना होती थी, तब कानपुर के मेडिकल कालेज के प्राचार्य थे, भाई की बीमारी का समाचार पाकर सप्ताह भर से आये हुए थे। पंडित रविशंकर शुक्ल उनके घनिष्ट मित्र थे। वे मध्यप्रान्त के मुख्यमंत्री थे।


मित्र की बीमारी से चिंतित थे। नागपुर मेडिकल कालेज से उनकी जांच के लिए ईसीजी मशीन भेजा था। फोन से प्रतिदिन उनका हाल पूछते। उनके मित्र शक्‍ती नरेश राजा लीलाधर सिंह ने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. नियोगी को इलाज के लिए बुलवाया। उनके तीसरे भाई शत्रुध्न सिंह, जो जांजगीर में वकालत करते थे, घर में मेहमानों की व्यवस्था में जुटे थे। भुवन भाष्कर सिंह राजनैतिक सहयोगियों के आदर सत्कार में लगे थे। भुवन भूषण सिंह (नक्की बाबू) भी दौड़धूप कर रहे थे। उनके सभी चचेरे भाई, बहन उन्हें देखने आये थे। उत्सव जैसी गहमागहमी थी पर सभी अजब उदासी एवं आशंका से ग्रस्त थे। पल-पल ठहाकों से गूंज उठने वाले घर में आज इतने लोगों की उपस्थिति के बाद भी सन्नाटा था।



style="display:block"
data-ad-client="ca-pub-3208634751415787"
data-ad-slot="4115359353"
data-ad-format="link">



भारी कदमों से मां-बेटी घर आई, कितने काम उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। किसी के मुंह में अन्न नहीं गया, पर मेहमानों की, 000वाय की तैयारी की में जाने लगी। घर के पूजा स्थल में कुछ देर प्रार्थना कर मन कुछ शांत हुआ, तब रतन सामने बरामदे में पहुंची। बड़े यत्न से लगाये डहेलिया के फूल विविध रंगों में खिलकर डालों मे झूम रहे थे। पल भर के लिए उसका मन भी खिल गया। फूलों के निकट जाकर निहारते हुए सोचने लगी कि भैयाजी है देख कर कितने प्रसन्न होंगे। अचानक उसकी नजर आकाश की ओर उठी। कि कैसी लालिमा छाई थी, ऐसा तो कभी नहीं देखा था। पता नहीं क्यों गगन की लालिमा उसे आतंकित करने लगी। अनमनी सी वह फिर बरामदे में आई। फोन की घंटी बज रही थी। उसने फोन उठाया। नागपुर से था, ई सीजी की रिपोर्ट थी। झट डाक्टर चाचा को बुलाया। चाचा ने कहा वह फोन पर रिपोर्ट सुन उन्हें बताये, वे लिखेगें। फोन हाथ में लेते ही सुना फुल हार्ट ब्लाक। उसके हाथ से फोन छूटा, डाक्‍टर साहब के हाथ से कलम गिरी। नासमझ होने पर भी इस विनाश की पगध्वनि समझने की क्षमता जाने कैसे आ गई थी। उसका मस्तिष्क सुन्न हो गया। ऐ उसके कानों में बुआ की चीख सुनाई दी 'आओ भउजी, आवा न, भइया तो जावत हें', पिघले शीशे से शब्द कानों में पड़ते ही आंगन से रतन की दाई गिरते पड़ते उनके कमरे में पहुंची। ठाकुर साहब को जमीन पर लिटा दिया गया था। अंतिम विदा के समय जन्म भर के लाज के बंधन तोड़, कटे वृक्ष की तरह ठाकुर साहब के पैरों पर गिर पड़ी। 'साहेब मोला छोड़ के झन जावा साहेब' व्याकुल कंठ से आर्त-स्वर फूट पड़ा। रतन का सिर भैयाजी की छाती पर टिक गया, जहां की पीड़ा काल बन गई थी। किसी तरह दोनों के हाथ से गंगाजल और तुलसीदल ठाकुर साहब के मुंह में डलवाया गया। ओंठ कुछ खुले, पलकों में कुछ हरकत हुई, शायद इसी तरह प्रियजनों से विदा ली हो। फिर सब शांत हो गया। सूर्यास्त के संग छत्तीसगढ के दैदीप्यमान नक्षत्र का अवसान हो गया।

नीम की छाया में बने कमरों में 11 पंडित महामृत्युंजय का जप कर रहे थे। जप की धीमी आवाज सुनाई दे रही थी। होम धूप की सुरभि वातावरण में व्याप्त थी। आज जप पूरा होने वाला है, कल हवन होगा। बैरिस्टर साहब के स्वास्थ्य के लिए जो भी पूजा बताते, उनकी पत्नी पूर्ण कराने का संकल्प करतीं। लोगों द्वारा बताये कितने टोटके किये गये, कितनी मन्नतें की गई।

दिन में 11-12 बजे के बीच किसी समय ठाकुर साहब की आंख खुली। उन्होंने आस-पास नजरें घुमाई, फिर डाक्टर भाई से कहा- 'चंद्रभान भाई, मोर हाथ ले सुई ल निकाल लेवा, मोला तकलीफ होवत हे। मैं ए भगवान ल साखी दे के कहत हौ, सांझ के भले लगा लेहा।' डाकटर साहब स्तब्ध थे। किस भगवान को साक्षी बना रहे है भैया? डाक्टरों से कुछ सलाह मशविरा कर ड्रिप और आक्सीजन निकाल दिया। ठाकुर साहब के चेहरे में राहत और शांति के भाव उभरे, फिर उन्होंने आंखें मूंद ली। कोने में खड़ी रतन को लगा अब भैयाजी अच्छे हो रहे हैं, तभी न सब नलियां निकाली गई हैं।


सभी लोगों ने भोजन कर लिया था। रतन घर में नहीं दिख रही थी। उसे यह तो पता नहीं था, कि उसके भैयाजी इतने बीमार हैं, पर जाने क्यों उसका मन व्याकुल था। अशुभ मानकर रोती तो नही थी, पर मन उसका हाहाकार कर रहा था। बड़े प्यार से बनाये पिता के उद्यान में पहुंचते ही उसके आंसू रूक न सके। सुना था पीपल का वृक्ष वासुदेव का वास स्थान है, पत्ते-पत्ते में हरि बसते हैं। पीपल के तले वह अपने भैयाजी (पिताजी को वह भैयाजी कहती थी), के जीवन के लिए गुहार करने लगी। उसका रोम रोम पुकार रहा था- 'हे भगवान, मेरे भैयाजी का जीवन बचा लो। तुम चाहे तो मेरी उमर उन्हें दे दो। तुम्हें तो तृणवज्री कहते हैं, भैयाजी की जीवन डोर को वज्र बना दो।' नौकरों से उसके बिलखने की खबर सुन उसकी -दाई दौड़ी आई। बेटी को बाहों में भर, वह भी रोने लगी। दोनों के आंसू बह रहे थे, पर मां ने मन को मजबूत कर बेटी को समझाया- 'भगवान की शक्ति असीम है, कृपा अपार है, वे अवश्य भैयाजी को ठीक करेगें, उन पर विश्वास रखो।


ठाकुर साहब के निधन का समाचार फूस में लगी आग की तरह फैल गया। गणेश विसर्जन स्थगित हो गया। दिवंगत नेता के अंतिम दर्शन के लिये जनसमूह का तांता लग गया। परिवार के लोगों का निर्णय था कि उनका अंतिम संस्कार उनके गृहनगर अकलतरा में हो, पर बिलासपुर की जनता उनके दर्शन के लिये उमड़ रही थी, उसे वंचित भी नहीं किया जा सकता था। तब अरपा नदी में पुल नहीं बना था। गर्मी में बना रपटा बरसात में बह जाता था। सड़क मार्ग से अकलतरा जाना कठिन था, एकमात्र साधन नहर का मार्ग था। रेलवे यूनियन में उन्होंने बहुत कार्य किया था। पहली हड़ताल उनके ही नेतृत्व में सफल हुई थी। कृतज्ञ यूनियन ने प्रस्ताव रखा कि प्रातकाल ठाकुर साहब का पार्थिव शरीर विशेष ट्रेन द्वारा अकलतरा पहुंचाया जायेगा।


तब संचार साधन इतने उन्नत नहीं थे, फिर भी ठाकुर साहब के निधन का समाचार गांव गांव में फैल गया था। अकलतरा मार्ग के गांव के लोग उनके अंतिम दर्शन की लालसा लिये सड़कों में जुड रहे थे। जनभावना को ध्यान में रख सड़क मार्ग से ही अकलतरा जाना तै किया गया। तब तक प्राइवेट कंपनियों की दो बसें, नहर मार्ग की परमिट के साथ गेट पर खड़ी कर दी गई। रात भर बिलासपुर में ही रख, ब्रह्म मुहूर्त में अकलतरा जाने का निर्णय किया गया।


अकलतरा का घर लंबे समय से बंद था। काम कराने वाले सब भाई तो ठाकुर साहब के साथ थे। वे चिंतित थे कि इतना बड़ा काम कैसे होगा, किन्तु जैसे ही बस सिंध दरवाजे पर रूकी, लोग घर देखकर चकित हो गये। रात भर में कैसा चमत्कार हो गया? ऐसा तो किस्सों में ही सुना था। सारा धुला पुंछा, साफ-सुथरा, द्वार और आंगन गोबर से लिपे पुते थे। घर से तालाब तक का मार्ग 'बहार कर छरा-छिटका' किया गया था। गोपिया पार चिता स्थान पर भी छरा दिया गया था। सफाई का सारा काम रात भर में दलितों एवं राउत पारा के बुजुर्गो द्वारा किया गया था। जिस बालिस्टर ने 1919 में उन्हें जनेऊ देकर सम्मानित किया था, भाईचारा और प्यार दिया था, उसकी आज बिदाई है। प्यार का कर्ज चुकाना कितना कठिन है। टोकरियों मे, कांवर में, हाथ में चांवल दाल, साग, लकङी, लाते लोगों को देख दंग रह जाना पडा जिससे जो जुड रहा था लेकर आ रहा था, अद्भुत दृश्य था।



style="display:block"
data-ad-client="ca-pub-3208634751415787"
data-ad-slot="6787779569"
data-ad-format="auto">



गली आंगन में पैर रखने की भी जगह नहीं थी। इतने भी लोग होगें और इतनी श्रद्धा होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। ठाकुर साहब के चार सगे भाई, चार चचेरे भाई एवं 6 बहिनों का पूरा परिवार उपस्थित था। दूर के नाते रिश्ते के लोग आ गये थे और अब भी आ रहे थे, किन्तु उनका बहुत अपना ही नहीं आ पाया था, उसकी ही प्रतीक्षा की जा रही थी, उनका इकलौता बेटा विजय अभी तक नहीं पहुंच पाया था। इसी वर्ष जबलपुर के इंजीनियरिंग कालेज में उसे प्रवेश मिला था।


ठाकुर साहब का पार्थिव शरीर, सामने बरामदे के उसी तखत पर रख दिया गया, जहां प्रतिदिन सांझ के समय अपने मित्रों एवं परिचितों से मिलकर बातचीत करते थे। 000गत 10 दिनों से यहां नहीं आ पाये थे। आज उनका मृत शरीर अंतिम विदा लेने वहां रखा गया है। बच्चे, महिलाएं एवं पुरूषों की भीड़ उमड़ रही है। श्रद्धांजलि के फूलों से तिरंगा में लिपटा पार्थिव शरीर ढक गया है। ठाकुर साहब का प्यारा कुत्ता माइकल पंजों में सिर गड़ाए तखत के पास पड़ा है। बिजली की रोशनी में उसकी आंखों के पास आंसुओं के चिन्ह हैं। सारे परिचित भी माइकल से खौफ खाते थे, पर आज इतने अपरिचितों को देख कर भी वह निरीह आंसू बहा रहा है।


रात के दस बज गये हैं, किंतु दर्शनार्थियों की भीड़ कम नहीं हुई है। बेहाल पत्नी को विश्वास नहीं होता कि इतने स्वस्थ उनके साहब उन्हें छोड़ गये हैं। बार बार उनका शरीर टटोल मानों जीवन के लक्षण तलाशती हैं। आकस्मिक सदमे को रतन सह नहीं पा रही है। उसे नींद की सुई लगाई गई है किंतु आंखो में नींद का नामोनिशान नहीं है। बार बार उसे लग रहा है कि पिता की मृत्यु के ये दृश्य स्वप्न हैं, जागने पर उसके भैय्याजी ठीक मिलेंगे। बार बार अपने ही शरीर को चिकोटी काटती है जिससे कि यह वाली नींद टूट जाय। अचानक एक करूण आर्तनाद सन्नाटे को चीरता गूंज उठता है। 'साहेब तेल लगाये के बेरा होगे, कहां चल देया?' ठाकुर साहब के पैरों पर हाथ रख अर्जुन बिलख उठा। जन जन की आंखें बरसने लगीं, उधर भादों के बादल बरस पड़े। आंसू और निश्वास समेटती मौत की काली रात बीतने लगी।


ठाकुर साहब ब्रह्म मुहुर्त से पूर्व ही जाग जाते थे, किन्तु इस चिरनिद्रा से भला कौन जागा है? अब उनका मृत शरीर बस में लिटा दिया गया। एक तरफ रतन और दूसरी तरफ उसकी दाई को भी बिठा दिया गया। माइकल और गाय-भैंस की व्यवस्था कर समारू सबेरे की गाड़ी से आने वाला था। जैसे तन से प्राण निकला हो, वैसे ही बंगले से ठाकुर साहब बिदा हुए। सदा सदा के लिए। इस अवसर पर उनके लगाये पेड़-पौधे भी कुम्हला गए।

Kramshah

Post a Comment

0 Comments