सत्यं वद

सत्यं वद

(कहानी संग्रह)
सरला शर्मा

वैभव प्रकाशन
रायपुर (छत्तीसगढ़)
सत्यं वद
सर्वाधिकार : निधि शर्मा
आवरण :  मुकेश सावरकर
प्रथम संस्करण:  2008
मूल्य : 100 रू.


प्रकाशक 
वैभव प्रकाशन 
सागर प्रिंटर्स के पास, अमीनपारा चौक, 
 पुरानी बस्ती, रायपुर (छत्तीसगढ़)
दूरभाश: (0771) 2262338 मो. 09453-58748



नेपथ्य से

इस जनसंकुल जग में चहुं ओर अंसख्य घटनायें घटती रहती हैं, प्रिय-अप्रिय, सुखद-दुखद, वांछित-अवांछित, कल्पनीय-अकल्पनीय घटनायें, जो कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से हमें प्रभावित करती हैं। यह प्रभाव ही चिन्तन-मनन का आधार बनता है दूसरी ओर यही आधार लेखन का उत्स भी होता है।
क्रिया की प्रतिक्रिया ही इन कहनियों के रूप में सुधि पाठकों तक पहुँच रही है।
कहानी सिर्फ मेरी, तेरी, उसकी नहीं होती वह तो जनसामान्य की होती है, मेरी कहानियाँ भी जनसामान्य के जीवन में घटित घटनाओं से प्रेरित हैं अतः ‘सत्यंवद’ जनसामान्य को ही समर्पित है।
      ‘सत्यं वद’ के पात्र काल्पनिक हैं पर घटनायें तो अहर्निश घटती रहती हैं, घटती रही थीं, घटती रहेंगी, यह सत्य यदि सुधि पाठक को क्षण भर के लिए भी सोचने विचारने पर विवश कर दे तो मेरा प्रयास सार्थक हो जायेगा।

              इत्यलम्

सरला शर्मा
विजया दशमी
विक्रम संवत्2065 
09.10.2008, भिलाई

जिजीविषा का दस्तावेज

साहित्य का अपना एक सच होता है जो तथाकथित व्यावहारिकता के उन सारे मानदण्डों को दरकिनार रक देता है जो किसी सम्प्रदाय, जाति, वर्ग अथवा समाज विशेश से संबंधित होता है। साहित्य की प्राचीन विधा है कहानी जो पूर्णतः मानवीय संवेदनाओं का प्रतिनिधित्व करती है साथ ही समाज में घटित घटनाओं के प्रति पाठक वर्ग में जिज्ञासा जगाती है, समस्याओं के दर्शन कराती है तो समाधान भी प्रस्तुत करती है।
चंूकि सच की बुनियाद भावुकता की हद तक संवेदनशील मानवीय मूल्यों पर आधारित होती है फलतः कहानीकार सामान्य तन के हितों में टकराव और उससे उत्पन्न विक्षोभ का अस्मितापरक समाधान प्रस्तुत करने के लिए दायबद्ध होता है।
प्रस्तुत कहानी संग्रह में लेखिका सरला शर्मा ने इस दायित्च का निर्वहन भली-भंाति किया है। आज आम आदमी का जीवन ज्यादा जटिल ज्यादा संघर्शपूर्ण हो गया है दूसरी ओर समाज में घटनेवाली वांछित-अवांछित घटनाओं से भी आम आदमी को रूबरू होना पड़ता है। इनसे जूझना उसकी नियति बन गई है लेखिका इसी जुझारूपन को भाशा देती है पूरी शिद्दत के साथ रूपायित करती है।
‘कुंवरिया’ कहानी में नारी के प्रति अवमानना से खिन्न होकर लेखिका प्रश्न करती है - ‘‘शक्ति का आराधक पुरूश वर्ग कब नारी शक्ति को आदर देना सीखेगा? भारत के कोने-कोने में देवी मंदिर हैं पूजा अर्चना में कोटि त्रुटि नहीं होती पर उसी देवी का अंश है स्त्री इसे कोई भी स्वीकार क्यों नहीं करता ?’’
मानवीय मूल्यों का विस्तार ‘एक और दिवाकर’ में बड़ी गरिमा के साथ उभरा है जब हम पढ़ते हैं ‘‘परोपकार करके आदमी कितना खुश होता है.... आत्मप्रसाद भी जीने की रसद जुगाड़ देता है इसका अनुभव आज मुझे पहली बार हुआ.....अब कोई और दिवाकर....इस तरह...इस बेंच पर कभी नहीं बैठेगा....।
अनाचार, बलात्कार जैसी विभीशिकाओं के प्रति विराध या आक्रोश व्यक्त करने की बजाय-मनुश्य अपने को बचाना चाहता है शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह गड़ा लेता है तो कुछ व्यक्ति यह कहते भी पाए जाते हैं कि समयाज विरोधियों से दुश्मिनी लेना कोई नहीं चाहता.... बाल-बच्चेदार सामान्य गृहस्थ अपना सुख चैन नश्ट करना नहीं चाहते....फिर....एक हाथ से ताली नहीं बजती...कौन जाने...चोरी की या सीनाजोरी । कहानी-शेश आस्था
उच्चाकांक्षी पिता....पुत्र की भावनाओं की परवाह किए बिना दहेज के लोभ में जिस पुत्रवधू का चयन करता है वह ‘गहनों की चलती फिरती दुकान...बड़े बाप की दुलारी बेटी...प्रचुर धन संपत्ति लेकर आई...तभी तो अस्थिरोग विशेशज्ञ को पा सकी...।’ शहर के प्रतिश्ठित व्यवसायी की एकमात्र पुत्री गीता। (दायित्व निर्वहन...से)
इस तरह सरला शर्मा समाज की कुरीतियों को उजागर करने में सफल हुई हैं तो इसी कहानी का पात्र अतुल...दिवंगत पिता के अंतिम आदेश का पालन करने के लिए अपनी चिरसंचित अभिलाशा...(साहित्यकार बनने की) को तिलांजलि दे देता है...।
‘सत्यंवद’ कहानी...मर्मस्पर्शी है युग-युग से सत्य का मूल्य चुकाता आया है मनुश्य...इस कहानी में बालिका अपनी वाणी खोकर सच का मोल चुकाती है। उसकी जिजीविशा को सलाम करने को जी चाहता है कि बोल नहीं सकती...। इसलिए नया मंत्र जपने लगी ‘सत्यं लिख...।’ प्रेरणाप्रद कहानी है जो संघर्श गाथा में मील का पत्थर है।
बाल मजदूरों की विवशता को रेखांकित करती कहानी ‘विचार’ सचमुच विचारणीय है... जहाँ पंगु पिता अपनी दुलारी बिटिया के विवाह के लिए कुछ रकम जुगाड़ने, बड़े घर में रहकर बेटी पेट भर खा पहन सकेगी सोचकर बड़े धनी घर में बिटिया को मजदूरी करने भेजता है तो धनी मानी पिता की दुलारी दुहिता गरीब की बिटिया के हाथ से गिलासों भरी टेª छूट जाने पर जानलेवा प्रहार करती है....।
घर लौटी आहत किशोरी को देख पंगु, असहाय पिता चीखता चिल्लाता है पर किशोरी जानती है यह निश्फल गर्जन है नपुंसक क्रोध है, जो ऊँचे घरों तक कभी पहुंच नहीं पायेगा...।
सूचना क्रंाति के युग मंे सारा विश्व सिमट गया है, उच्चाकांक्षी माता-पिता पुत्र की उच्च शिक्षा में सर्वस्व अर्पण कर देते हैं तब उच्चपदस्थ पुत्र अपना घर, गांव, देश छोड़ और अधिक कमाने, उच्चस्तरीय जीवन जीने के लालच में माता-पिता को वृद्धाश्रम में रहने की शिक्षा देते दिखाई देते हैं। बूढ़े माता-पिता को जब पुत्र के सहारे की जरूरत होती है पुत्र विदेश से कुछ रकम, चंद डालर या पाउण्ड भेजकर दायित्व मुक्त होना चाहता है ऐसे में सरला शर्मा की कहानी प्रतीक्षा के पात्र रमानाथ शुक्ल कहते हैं - ‘तुम लोगों को हमारी fचंता करने की जरूरत नहीं है.... यह घर ही हमारा सांध्य-नीड़ है, भगवान ने जब तक चाहा साथ रहेंगे....नहीं तो....जो छूट गया वह अकेले ही रहेगा...।’
ढलती उम्र के इस ओजस्वी पौरूश को प्रणाम...अभिनंदन...लाखों...करोंड़ो....।
सुखद बात यह है कि भूमंडलीयकरण, उपभोक्तावाद, सूचना-क्रांति के विस्फोट आदि से भी लेखिका की सर्जनात्मक चेतना कुंठित नहीं हुई है वरन् इस माहौल को बदलने के लिए वह विचारों के औजार मांजती दिखाई देती है।
समाज की विडम्बनाओं, विकृतियों का चित्रण यदि लेखिका की कहानियों का आधार है तो उनके शब्द चित्र मनोरम है, भाशा सशक्त है रूप विधान के अनुरूप भी है। भाशा और भाव दोनों ही समान गति से प्रवहमान है जो विचारों को आत्मसात् करने में सहायक है।
प्रत्येक कहानी में जिजीविशा का जो गहरा संस्पर्श है वह समाज को नई दिशा तो प्रदान करता है साथ ही पाठक वर्ग को आदि से अंत तक बांधे रखता है। ये कहानियाँ उपदेशात्मकता के बोझ से दब नहीं गई हैं बल्कि लेखिका के स्मृतिमंथन से उपजे नवनीत की संज्ञा प्राप्त करने में समर्थ सिद्ध होती हैं।
पूरे संग्रह को आद्योपांत पढ़ लेने पर भी मन में एक चाह बनी रहती है कि काश कुछ और कहानियां संग्रहित होतीं....और यही चाहत किसी साहित्यकार की सफलता का मापदंड है, कहानीकार की कसौटी है जिस पर लेखिका सरला शर्मा खरी उतरती हैं।
मैं शुभाकांक्षा व्यक्त करती हूँ कि सरला शर्मा की लेखनी अविराम सक्रिय रहे ताकि साहित्य का सुहद पाठक लाभान्वित होता रहे।


दिनांक                श्रीमती उर्मिला सिंगरौल
14.11.2008               मोहन नगर, दुर्ग

अनुक्रमणिका


क्र. कहानी

1. कुंवरिया
2. अपना-अपना सुख
3. शेश आस्था
4. दायित्व निर्वहन
5. सत्यं वद
6. प्रतीक्षा
7. अनावृत मातृ हृदय
8. विदाई
9. रेगिस्तानी आंखें
10. विचार
11. अपराजिता
12. फिनिfशंग पाइंट
13. देवधर की शांति
14. एक और दिवाकर
15. सौतेली माँ


कुंवरिया


‘भालोवासा लेन-देने, धार हय एक बार,
  पथ जदि भूले जाओ, तबू एसो बार बार।
  जापनेर भूल सब, मूछे जाय स्मृति ते....।’’
पूजा विशेशांक मंे पढ़ी ये पंक्तियाँ... आज सार्थक लग रही हैं....कितना बड़ा सच है कि प्रेम के लेन-देन मंे उधार एक बार ही मिलता है... फिर भी आदमी बार-बार रास्ता भूलकर वहीं पहुँच जाता है... स्मृति की गलियों का फेरा लगाना....हर आदमी को प्रिय होता है...।
गाड़ी की गति धीमी हो गई है संभवतः कोई स्टेशन आने वाला है...डिब्बे में हलचल शुरू हो गई है....उतरने वाले यात्री सामान संभालने में लगे हैं...कहीं कुछ छूट न जाये....। पत्रिका बंद कर खिड़की से बाहर देखी...ऊहूं अभी दो स्टेशन बाकी है....मेरा गन्तव्य स्थल है कुलीपोटा....चांपा स्टेशन से उतरकर.... साइकिल रिक्शा से जाना होगा...सड़क से लगभग एक किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी....।
लगभग अठारह सालों बाद जा रही हूँ....जाने कितना कुछ बदल गया होगा? कोई पहचानेगा भी या नहीं ? बड़े बूढ़े हैं भी या अनंतपथ की यात्रा पर निकल पड़े हैं, इन बीते सालों में....न तो किसी से कोई संपर्क रहा....न ही किसी से भेंट मुलाकात हो ही सकी....।
‘जागृति महिला संघ’ की ओर से आमंत्रण मिला वैसे मैं इन आयोजनों में शामिल होने से भरसक बचने का प्रयास करती हूँ।
बहाना यह कि दुनियादारी निभात-निभाते अपने लिए समय निकाल पाना मुश्किल ही है पर मैं जानती हूँ यह सोलहों आने सच नहीं है...। इन आयोजनों में मिलने वाली प्रशंसा... पचा नहीं पाती...जो निहायत सामयिक और अतिरंजित होती है। वक्ता और श्रोता दोनों इस शब्द जाल को, आयोजन समापन के साथ-साथ भूल जाते हैं। ‘कुलीपोटा’ नाम ने निमंत्रण स्वीकार करने को विवश कर दिया...।
निकल तो पड़ी हूँ पर अब जबकि गन्तव्य समीप है...वापस लौट जाने का मन कर रहा है...क्रूा होगा वहाँ जाकर? जिस बालसखी से मिलने जा रही हूँ वह मिलेगी भी या नहीं.... यह भी तो नहीं जानती....। मन ने समझाया ‘मैडम आ ही गई है तो चली चलिए... न हो... अगली बार इस तरह की भूल करने से तो बच जाओगी...। आकाश-पाताल की सोच रही थी कि चांपा स्टेशन आ गया...गाड़ी रूकी...भीड़ से कथा संभव बचते बचाते प्लेटफार्म पर उतर पड़ी...बैग को कंधे पर लटका ली।’
स्टेशन से बाहर निकल...कोई रिक्शा तलाश रही थी कि सुनी ‘‘मैडम कलकत्ता वाली गाड़ी आ गई क्या?’’
मुड़कर देखी....फटी साड़ी में लिपटी देह कभी स्वस्थ सुंदर रही होगी.... समय के निर्मम हाथों ने गोल गोरे मुंह पर अमिट रेखायें खींच दी हैं। बड़ी-बड़ी काली आंखें कभी बंकिम कटाथ करने में निपुण रही होंगी... धनुशाकार भवें.... पपड़ी पड़े संवलायें संवलायें अधरों से झांकती दंतावली....। जाते जाते यौवन ठिठक गया है, सुन्दरता का ध्वसावशेश लग रही नारी देह...
fनः संकोच मेरे कंधे को हिलाकर फिर पूछी- ‘‘कलकत्ता वाली गाड़ी आ गई क्या मेडम जी...।’’
सूने हाथ... उंगलियां लंबी नुकीली... कलाकारों की सी...झुंझला गई...यह कैसी असभ्यता है... जान न पहचान... रास्ता रोक कर खड़ी हो गई... बोली- ‘‘स्टेशन में खड़ी हो... समझ में नहीं आ रहा कि यह गाड़ी कलकत्ता जाने वाली गाड़ी है... आने वाली नहीं....रास्ता छोड़ो... जाने दो...।’’
मेरी झिड़की का कोई प्रभाव नहीं पड़ा...उल्टे...बड़ी ढिठाई से कुछ और पास आकर एकटक मुझे देखनी लगी.... अस्वस्ति हो रही थी... जाने की जल्दी भी थी... सबसे बड़ी बात इस पागल सी औरत से उलझकर खुद तमाशा बनना मुझे स्वीकार नहीं था... विवश थी... आजू-बाजू से लोग आ रहे थे... सामने वह... मूर्तिमति बाधा खड़ी थी...।
इस मुसीबत से कैसे जान छुड़ाऊँ सोच ही रही थी कि इस बार तो हद ही हो गई मेरा हाथ पकड़कर मुझे कोने की बेंच की तरफ खींचने लगी... पल भर के लिए तो डर गई.... पागल तो नहीं है भद्र महिला....। सामने देखी.... नहीं... पागलों की आंखों में निश्प्रभता रहती है, उन्माद का कोई लक्षण दिखाई नहीं दे रहा है.... कुतूहल जागा... चलो सुन ही लेती हूँ....आखिर वो क्या चाहती है मुझसे...।
आयोजन तो तीन बजे से है अभी पूरे तीन घंटे हैं... रिक्शे से आयोजन स्थल तक पहुंचने में चालीस मिनट से अधिक समय तो लगेगा नहीं...। कौन जाने... लिखने के लिए कुछ नया...कुछ अनोखा... अभूतपूर्व कथानक ही मिल जाये...।
प्रतीक्षारत् यात्रियों के लिए बनाई गई पत्थर की बेंच पर मुझे बिठा कर सामने खड़ी हो गई... पेड़ की घनी छाया थी फिर भी धूप का एक टुकड़ा सीधे उसके चेहरे पर पड़ रहा था... भवों को सिकोड़कर.... स्पश्ट स्वर में बोली- ‘‘तुम सरू हो न... ? नेमा सर के पीरियड में मुझे अंगे्रजी अनुवाद बता दिया करती थी...।’’
स्वर...सुना हुआ लग रहा था... पर वह तो...ससुराल चली गई थी...अब तो बाल बच्चों की अम्मा होगी...सुखी गृहिणी...नहीं, मेरे कानों का भ्रम है...इस खनकते स्वर का मालकिन इस हद- दरिद्र अवस्था में कैसे हो सकती है ? लाख कोशिशों के बावजूद अपने मन को कोई सही उत्तर नहीं दे पा रही थी कि उसी ने फिर मुझे संबोधित किया- ‘‘सरू याद करो... पहचानो मैं हूँ तुम्हारी कुंवरिया...कुलीपोटा से स्कूल आती थी...।’’
मेघ बिना वज्रपात इसी को कहते हैं....चीख पड़ी ‘‘कुंवरिया....तुम यहाँ- इस हाल में... सुदर्शन कहाँ है ?’’
आवेश से भरकर उसके दोनों हाथों को पकड़ कर झकझोर ही दिया मैंने...।
धीरे से हाथ छुड़ाकर सूखी हंसी हंसकर बोली कुंवरिया- ‘‘बड़ी दुखभरी लंबी कहानी है, क्या करोगी सुनकर ? तुम बताओ... कहां रहती हो.... इधर कैसे आना हुआ ? सालों बाद मिली हो अपनी सुनाओ...।’’
उसकी उत्सुकता के निवारण के लिए बताई आजकल भिलाई में रहती हूँ.... यहां कुलीपोटा में ‘जागृति’ महिला संघ के आमंत्रण पर आई हूँ। असल उद्देश्य था अति संक्षिप्त विवरण देकर... उसे शांत करना....। मुझे तो बहुत कुछ जानना था... समझना था कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि कुंवरिया इस दीनहीन अवस्था में स्टेशन पर खड़ी है....।
पल भर का विलंब भी मुझसे सहन नहीं हो रहा था पूछी-  ‘‘कुंवरिया.... अब तुम अपनी सुनाओ... यह क्या हालत बना रखी है तुमने...मुझे बहुत तकलीफ हो रही है... सपने में भी नहीं सोची थी कि कभी तुम्हें इस हाल में देखंूगी...।’’
सहानुभूति का धीमा सा स्पर्श पाकर वेदनाक्रांत हृदय बिलख उठता है... आंखें अहोधार बरसने लगती हैं यह प्रकृति का नियम है...। कुंवरिया भी हिचक-हिचक कर रोने लगी....। समझ गई...अतीत और वर्तमान के आघातों का दर्द शतगुना होकर उभरा है... थोड़ी देर रोने पर... पीड़ा... कुछ कम होगी तब बातें करना उचित होगा....।
रूदन का आवेग कम हुआ तो फटे आंचल से आंखें पोंछते हुए बोली- ‘‘यहाँ सब मुझे पगली, भिखारिन समझते हैं... मेरे साथ तुम्हें देखकर लोग क्या कहेंगे ?... तुमसे मिल ली... बहुत है.... अब तुम जाओ....। रही मेरी बात...मेरा दुख...तो जिस पीड़ा से तुम आज तक अनजान थी जानकर क्या करोगी ? मेरे भाग्य में जो बदा था भुगत रही हूँ....।’’
मैं स्न्नेहपूर्वक बोली- ‘‘कुंवरिया... कभी हम दोनों सहेलियाँ थीं... अपना दुख मुझ से भी छिपाओगी.... कुछ न भी सकी... तुम्हारा मन तो हल्का हो सकेगा... रही बात लोगों के कहने की... तुम से ज्यादा इस बात को कौन जानेगा कि मैंने कभी लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया.... आज भी नहीं देती... अब मैं कहीं नहीं जाऊंगी... वापसी की गाड़ी आते तक यहीं बैठकर तुम्हारी कहानी सुनूंगी....।’’
अनुनय भरे स्वर में बोली- ‘‘सरू तुम बदली नहीं... आज भी पराये में दुखी होती हो... पर मेरी एक बात मानो... पहले कार्यक्रम निपटा कर आ जाओ... मैं यही मिलूंगी... वचन देती हूँ... कहीं जाऊंगी नहीं.... फिर आप बीती सुनाऊंगी...।’’
जानती थी कुंवरिया के निश्चय को बदल पाना आज भी मेरे लिए सहज नहीं है- बेमन से रिक्शा बुलाकर कुलीपोटा गई... कार्यक्रम में भाग ली... क्या बोली- क्या सुनी... भगवान् जाने... मन तो कुंवरिया की सोच रहा था... नमो नमो करके आयोजन का समापन हुआ... कुछ और भी जरूरी काम निपटाने हैं...अगली बार आने पर... रूकूंगी आदि इत्यादि कहकर पीछा छुड़ाई... रिक्शा खड़ा था... वापस चल पड़ी स्टेशन की ओर...। हे भगवान्... यह कैसा न्याय है तुम्हारा... कुंवरिया तो भली लड़की है... उसके साथ ऐसा क्या हुआ होगा कि आज ये हाल है...। स्टेशन पहुंचकर देखी... कुंवरिया कहीं नहीं थी... पूरे प्लेटफार्म के दो चक्कर लगा ली... अधीरता बढ़ती जा रही थी खुद पर गुस्सा आ रहा था, उम्र हो गई अक्ल नहीं आई... क्या जरूरत है दूसरों के फटे में टांग अड़ाने की... अब भुगतो...। मन नही माना तो एक रेल्वे कर्मचारी से पूछ बैठी- ‘‘भाई साहब अभी यहाँ कुंवरिया थी... आपने देखा उसे...।’’
कर्मचारी ने घूर कर मुझे देखा उसकी आंखों में साफ झलक रहा था... कि वो मुझे निहायत बेवकूफ समझ रहा है तनिक उपेक्षा से ही बोला, ‘‘मैडम...वो पगली भिखारिन को पूछ रही हैं न... अरे ! उसका कोई ठिकाना है.... न घर न घाट... सालों से यहीं पड़ी रहती है वैसे तो शांत रहती है किसी ने कुछ दे दिया तो ले लेती है, मांगती कभी नहीं... हां कलकत्ता से आने वाली गाड़ी के बारे में पूछ-पूछकर यात्रियों को परेशान कर देती है... आम पागलों की तरह न तो गाली- गलौज करती है न किसी का कोई नुकसान करती है....।’’
शायद कोई गाड़ी आने वाली थी... कर्मचारी महोदय चले गए... हताश ही हो गई थी... कि देखी... साफ सुथरी साड़ी में तनिक भद्रवेश में कुंवरिया मेरी तरफ आ रही है...।
पास आने पर देखी... कंुवरिया आज भी सुंदर है पूछी- ‘‘कहां चली गई थी कुंवरिया ? मैं परेशान हो गई थी...।’’
उसने उत्तर दिया- ‘‘वो कुछ नहीं... तुम से मिलना था न....सो नहा धोकर तैयार होने गई थी... नहीं तो उस वेशभूशा में मुझसे बात करते देख... लोग तुम्हें क्या कहते... अच्छा चलो... प्लेटफार्म के दूसरे छोर पर मालगोदाम के बरामदे में आराम से बैठकर बातंे करेंगे... वहाँ कोई हमें परेशान भी नहीं करेगा...।’’
घड़ी देखी मेरी गाड़ी रात के 10.30 बजे थी अभी मेरे पास 5 घंटे थे... पास की दुकान से खाने-पीने का कुछ समान खरीदी... हम दोनों ने चाय पी... और चल पड़े सुनने... सुनाने....।
पास-पास बैठकर थोड़ी देेर चुप ही रहे... मैं उसकी मनः स्थिति को समझने का प्रयत्न कर रही थी... और वो शायद यही सोच रही थी कि कहाँ से शुरू करे...। अंततः वही बोली ‘‘सरू आखिरी बार हम मिले थे स्कूल में ही....तब हम आठवीं कक्षा में पढ़ते थे... मेरा पोस्टकार्ड जो तुमने लाल डिब्बे में डाला था उसी को पाकर सुदर्शन मुझे लेने आ पहुंचा था.... क्या होगा?’’ का डर... सबसे बिछुड़ने का दुःख, ब्याहता पत्नी का स्थान पाने का गौरवा और भी जाने कितनी भावनायें मन को मथे डाल रही थीं....। सुदर्शन जल्दी मचा रहा था... तुम से विदा लेकर उसके साथ चली गई....।
ससुराल में भव्य स्वागत तो हुआ नहीं... ससुर जी को चार लोगों ने समझाया कि आज नहीं तो कल बहू को लाना ही था... जो हो... घर की लक्ष्मी आ गई है उसका स्वागत करो.... बेमन से सास ने गृह प्रवेश कराया बुदबुदाने लगी ‘‘बाप भाई तो दुश्मनी भंजाने पर तुले हुए हुए हैं... कोर्ट कचहरी का रास्ता दिखा रहे हैं... बेटी चली आई हमारा उद्धार करने... अरे जो अपने सगों की सगी न हो सकी तो हमारा घर क्या संभालेगी.... आदि।’’
मैंने पूछा - ‘‘कुंवरिया आखिर तुम्हारी सास को किस बात की शिकायत थी....?’’
उदास होकर कुंवरिया ने बताया- ‘‘हमारी शादी गुंरावट में हुई थी...मेरी बड़ी ननद ही मेरी भाभी बनी थी... मेरे भइया... ने अपने साथ पढ़ने वाली लड़की से शादी करके निरक्षर भाभी को छोड़ दिया...वो मायके में रहने आ गई... बदले में मेरी ससुराल वाले भइया की बहन अर्थात् मुझे छोड़ देना चाहते थे... पर सुदर्शन... मुझे चाहता था... और मैं अवांछित बहू उनके घर आ गई थी... मेरी सास का दोश नहीं था, आखिर वो भी तो मां अपनी बेटी का दुख उन्हें चैन लेने नहीं देता था...।’’
यहाँ आकर जान पाई कि सुदर्शन... आठवीं में दो बार फेल होकर पढ़ाई छोड़ चुका था... पुश्तैनी धंधा... खेती किसानी उससे होती नहीं थी... चपरासी-चौकीदारी की नौकरी उसे भाती नहीं था... नाक कटने की नौबत आ जाती... रोजगार करने को पूंजी नहीं थी... ऐसे में वो जा भिड़ा था स्थानीय निठल्लों की जमात से... जिसका काम था... ताश खेलना हाहू करना... मटरगश्ती में दिन हाड़ तोड़ मेहनत करके भी सास ननद को खुश नहीं कर पाती थी... धीरे-धीरे सुदर्शन के प्यार का नशा... उतरता गया... जब भी उसे किसी काम धंधे से लगने की बात कहती वो बिगड़ जाता... शौकिया खेले जाने वाले ताश ने जुये का रूप धर  लिया... तो पान बीड़ी ने गांजा-शराब का...। अपना दुःख किससे कहती... चुप होकर... रो लेती... मायके वालों के लिए तो मैं... मर ही चुकी थी...।
कुछ क्षणों के मौन के बाद कुंवरिया ने आगे बताया- ‘‘मेरा दुर्भाग्य... कि कलकत्ता से एक भद्र व्यक्ति शायद एजेंट...गांव में आया उसने गांव के लोगों को सपने दिखाना शुरू किया... हमारे साथ चलो... वहां जी भर कमाओ खाओ... आने-जाने का किराया हम देंगे...चार पैसा जोड़कर घर भी भेज सकोगे... यहाँ क्या रखा है... fजंदगी का मजा तो शहरों में है... प्रलोभन के सारे दरवाजे खोल दिए...।’’
मेरी सास भी झांसे में आ गई सुदर्शन को उकसाने लगी... अच्छा मौका है.... चार पैसा कमाने का...। आखिर वो जाने को राजी हो गया...।
मैंने पूछा- ‘‘कुंवरिया तुम उसके साथ नहीं गई थी क्या ?’’ लंबी सांस खींचकर कुंवरिया बोली- ‘‘साथ जाना ही तो काल हो गया सरू... उस दिन मेरा भाग्यविधाता ऊपर बैठा हंस रहा था शायद...। वो तो मुझे छोड़कर ही जाना चाहता था... उसकी स्वतंत्रता में सबसे बड़ी बाधा तो मैं ही थी न...। पर मैं भी क्या करती... ससुराल में किसके भरोसे रहती... सास ननद के नित्यप्रति के अत्याचारों से तंग आ गई थी मायके का दरवाजा तो हमेशा के लिए बंद हो ही चुका था... फिर यह भी सोची कि संग साथ छूटने पर नई जगह में काम धंधे में लगर शायद सुदर्शन सुधर जायेगा... जिम्मेदार पति बन सकेगा...। तुम से झूठ नहीं बोलूंगी बहन... पति के साथ घर बसाने की साध तो हर स्त्री की होती ही है...। मैं भी चल पड़ी उसके साथ... नई गृहस्थी का सपना संजोये....।’’
शायद थक गई थी कुंवरिया... वैसे हर आदमी दुखद स्मृतियों को पुनर्जीवन देते समय एक बार फिर लहूलुहान हो जाता है, जो हो... बैग से पानी की बोतल निकाल कर उसे दी... कुछ खा लेने का भी अनुरोध की... जानती थी उसके मन की जो हालत है उसमें दो घूंट पानी गले के नीचे उतार लेना ही कठिन है...।
थोड़ा स्वस्थ होकर कुंवरिया बोली- ‘‘कलकत्ता से गाड़ी बदलकर मेदिनीपुर जिले के किसी गांव में पहुंचे... रिहाइशी मकानों का दूर-दूर तक नामो निशान नहीं था... सूना सपाट मैदान... तालाब के पास अस्थाई खोलियाँ बनी थीं हर परिवार को एक-एक खोली मिल गई... पता चला इंट भट्ठे का काम है...।’’

दिन भर ईंट बनाना होगा...शाम को मजूदी मिलेगी... राशन पानी वहीं मिलता था...। हम दोनों कुछ पढ़े लिखे थे इसलिए हमें मजदूरों के कामों की देखरेख का काम मिला... हाजिर रजिस्टर में सुबह शाम मजदूरों की हाजिरी नोट करना भी जरूरी था...।
देखते-देखते एक महीना गुजर गया... सब कुछ ठीक-ठीक ही चल रहा था कि एक शाम सुदर्शन फिर नशे में धुत खोली में लौटा.... अनर्गल प्रलाप कर रहा था... सन्न रह गई मैं, जिस नशे से बचाने उसे इतनी दूर आई थी वह फिर सिर पर चढ़ बैठी थी...। धीरे-धीरे समझ गई सुदर्शन को सुधार पाना मेरे वश में नहीं है.... थकहार कर उसे उसके हाल पर छोड़ दी...।
‘‘फिर क्या कुंवरिया.... तुम यहाँ कब और क्यों वापस आई... ‘‘ पूछा मैंने...।
सिसक-सिसक कर रोने लगी कुंवरिया.... थोड़ी शांत होने पर खुद ही बोली- ‘‘ठेकेदार की नजर अच्छी नहीं थी.... मौका पाते ही हंसी-दिल्लगी करने की कोशिश करता.... बहाने तलाशता कि मुझसे बात करे... हाथ पकड़ने की कोशिश भी कर चुका था... विवश थी... सुदर्शन तो मेरी सुनता नहीं था... पूरी तरह ठेकेदार का गुलाम बन गया था... दारू भाई थे दोनों... सुदर्शन को ठेकेदार ही दारू पिलाता था...।’’
एक रात खोली में सोई थी... थके हारे लोग अपनी-अपनी खोलियों में गहरी नींद में बेसुध सो रहे थे कि मुझे लगा... कोई मेरे बिस्तर में घुस आया है परिचित स्पर्श नहीं था... सांसें तो और भी अनजानी थी... चौंक उठी चिल्लाना चाहती थी कि भारी पंजहे से मुंह दबाकर आगंतुक ने कहा- ‘‘ज्यादा नखरे मत दिखा... यहाँ कोई सुनने वाला नहीं है... तेरा आदमी... नशे में धुत पड़ा है, जाग भी गया तो कुछ नहीं बोेलेगा... आखिर पांच सौ के करकरे नोट उसके मुंह में ठूंस कर ही तो आया हूँ.... भद्दी हंसी... दारू का भभका... मेरी चेतना ही लुप्त होने लगी....।’’
बहन ! औरत अपनी इज्जत पर आंच आते देख शेरनी बन जाती है... जाने कहां से ताकत आ गई, दोनों हाथों से उसके सिर को झकझोरने लगी... पूरे बल से उसे अपने ऊपर से गिरा दिया... कुछ सोचने समझने को न समय था न बुद्धि...।
भागती हुई बाहर निकली... पांव स्वचालित गति से भागते रहे... होश आया तो खुद को स्टेशन पर पाई...। घृणा, भय, अपमान से सारा देह-मन जल रहा था....। सबसे ज्यादा क्षोभ इस बात पर था कि किसी और ने नहीं मेरे पति ने ही मेरे साथ छल किया था... जिस पति पर भरोसा करके घर, समाज की उपेक्षा की जो मेरा भर्ता था रक्षक था वही... आगे कुछ सोच नहीं पा रही थी... स्टेशन के नल से पानी के छींटे मुंह पर भारी... डर लगा कहीं वे लोग पीछा करते यहाँ तक न पहुंच जायें... किसी तरह से स्वयं को बचाना ही जरूरी समझी...सौभाग्य से प्लेटफार्म पर जो गाड़ी लगी वह इधर आने वाली गाड़ी ही थी....बिना कुछ सोचे....उसी में बैठ गई....किसी तरह... यहाँ पहुंची... पर वाह री किस्मत.... सास-ससुर ने बेटे को छोड़कर भाग आई बहू को आसरा तो नहीं ही दिया उल्टे कुलटा होने का लांछन लगा दरवाजे से ही खदेड़ दिया...।
पति ही साथ न दे स्त्री को कौन सहारा देगा... लोगों ने कहा- ‘‘भागने की तो इसकी आदत है... कुछ ऐसा वैसा की होगी तभी तो पति ने भी भगा दिया...।’’
सरू ! स्त्री का इतना अपमान विधाता सहता कैसे है? आज तक समझ नहीं पाई....। घर के सामने वाले चबूतरे पर बैठी ही थी कि सिर घूमने लगा... आंखें खुली तो खुद को इस प्लेटफाॅर्म पर पाया.... तब से यही हूँ....।
कुंवरिया की कहानी सुन रोना चाहतीर थी आंसुओं ने साथ नहीं दिया....।
शक्ति का आराधक पुरूश वर्ग कब स्त्री शक्ति का आदर करना सीखेगा? भारत के कोने-काने में देवी मंदिर हैं पूजा अर्चना में कोई कमी नहीं होती - पर उसी देवी का अंश है स्त्री इसे कोई भी स्वीकार क्यों नहीं करता?
जाने कब तक चुप बैठे थे कि प्लेटफार्म पर कोई गाड़ी रूकी... शोर शराबे ने हमें प्रकृतिस्थ किया... घड़ी देखी दस बजने को है... अब मुझे उठना होगा... कुंवरिया से बोली- ‘‘अब क्या सोची हो... सारा जीवन....इसी तरह बिताओगी....? मेरे साथ चलो कुंवरिया ! दो मूठा भात और पहनने को कपड़े तो मैं दे ही सकूंगी.... मुझे तुम्हारी जरूरत है...।’’
कृतज्ञ नेत्रों से मेरी ओर देखकर हंस पड़ी कुंवरिया मेरे दोनों हाथों का पकड़कर माथे से छुआई बोली- ‘‘नहीं सरू... अपने हिस्से का द ःख आदमी खुद ही भोगता है... और फिर.... कौन जाने.... सुदर्शन लौट आये.... भगवान् कभी तो उसे सद्बुद्धि देंगे... मैं उसी दिन की प्रतीक्षा कर रही हूं मरते तक करूंगी... यह जन्म उसी के नाम पर निछावर किए बैठी हूँ....।’’
अब कहने को कुछ बचा ही नहीं था मेरे पास.... चुपचाप कुछ नोट निकाली, जबरदस्ती उसको पकड़ा दी.... अपना कार्ड उसे देकर भरे गले से इतना ही कह सकी- ‘‘कभी मेरी जरूरत पड़े तो आ जाना... नहीं आ सको तो एक कार्ड ही लिख देना मैं खुद आ जाऊँगी....।’’ रोकर कुंवरिया का दुख और बढ़ाना नहीं चाहती थी... धीरे से बैग उठाकर कंधे पर डाली... गाड़ी आने वाली थी सिग्रल हो चुका था... पीछे पलटकर न तो देखने का साहस था न ही कुंवरिया मुझे छोड़ने आई... मैं गाड़ी बैठ गई... खिड़की से देखी... अभी भी कुंवरिया उसी जगह बैठी है....।

अपना-अपना सुख 

मौसम विभाग के सूचनानुसार बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब बना हुआ है अतः आंधी तूफान के साथ तुमुल वर्शा की संभावना है। उसी संभावना का प्रत्यक्ष प्रमाण पिछले चार दिनों से दिखाई दे रहा है। आह ! दिन, रात अनवरत् वर्शा.... कभी प्रबल वेग से धारासार तो कभी बूंदा बांदी....। रास्ते का कीचड़, किनारे के पानी भरे छोटे-मोटे गड्ढे सब मिलाकर यातायात की भीशण असुविधा....। भागी हवाओं ने घर में रखे सामानों को भी सीलन युक्त... कर दिया है। घर के अंदर रस्सी टांगकर, पंखा चलाकर कपड़े सुखाते हुए भारती सोच रही है... बाहर निकलूँ या नहीं.... भीगने पर अवश्य ही गला खराब हो जावेगा....।
दस बजते न बजते सुनहरी धूप के दर्शन हुये... खिड़की से आकाश की ओर देखी.... चलो-काले बादलों की सघनता कम हुई है.... आसमान का नीला रंग कहीं-कहीं से दिखाई दे रहा है... खुश हुई भारती... कुछ जरूरी काम निबटाने बाहर निकला जा सकेगा... रसोई में झांककर कमली दीदी को चाय देने को बोली.... हां अदरक वाली चाय...।
भारती को विशेश प्रसाधन की आवश्यकता कभी हुई ही नहीं.... लंबे घने बालों का जूड़ा, माथे पर थाड़ो बिन्दी.... बहुत हुआ तो जरा पाउडर लगा लिया... न हो... न सही....। साधारण सी साड़ी.... हाँ  इतना अवश्य है कि भारती... पति शान्तनु की ईच्छानुसार सदैव उज्जवल रंगों की साड़ियाँ ही पहनती है.... अनुरक्त पति का कहना है ऐसी साड़ियाँ ही उसके गोरे रंग पर, भरे बदन पर खिलती है... मुस्कारा दी भाारती...।
दुकान में विशेश भीड़ नहीं थी मृगनयनी के कर्मचार महिलाओं को साड़ियाँ दिखा रहे हैं... परिचित मुस्कान से स्वागत हुआ भारती का... इधर-उधर देख ही रही थी कि लखनवी चिकन की साड़िया पसंद करती महिला पर नजरें अटक गई.... सुपरिचित भाव भंगी... तन्वंगी... साज सज्जा पर विशेश ध्यान देने वाली कोई और नहीं मंजरी ही थी....। हाँ.... उसका तो तलाक हो गया था न? आज कल फैशन की मार ने विधवा, सधवा, कुमारी, तलाकशुदा का बाह्य अंतर मिटा ही दिया है....। शैम्पू किये बालों के बीच सिंदूर fबंदु खोज पाना कठिन ही नहीं असाध्य भी है, अभद्रता भी है। सालों बाद सहपाठिनी को देखकर खुशीकर ही हुई... लपक कर उसी काउन्टर पर पहुंच गई.... कंधे पर हाथ रखते ही मंजरी घूम कर भारती को देखने लगी.... लिपिस्टिक रंगे होठों पर नपी तुली मुस्कान.... थी.... आंखों में विस्मय भर कर बोल उठी- ‘‘भारती... कितने दिनों बाद मिली हो... ये क्या हो गया तुम्हें.... कैसा चेहरा हो गया है.... पहचानना कठिन हो गया है।’’
एकरस दाम्पत्य जीवन जीते-जीते महिलायें स्वयं को आकर्शणीय नहीं रख पातीं या कहंे कि साज-सिंगार के प्रति उदासीन हो जाती हैं.... कभी-कभी स्वयं के प्रति की गई यह उपेक्षा...fस्त्रयों को लावण्यहीन बना देती है। यही देखें न भारती सुश्री सौम्यवदना महिला है, घर संसार में व्यस्त रहती है, विद्वान् प्रोफेसर पति, दो बेटे, दोनों महाविद्यालयीन छात्र हैं हर साल जिनके परीक्षा परिणाम से भारती गौरवान्वित होती है.... स्वयं भी सुशिक्षित, सुरूचि सम्पन्न महिला है.... शास्त्रीय संगीत सीखती है.... छोटे-मोटे आयोजनों में गाती-बजाती भी है...। खाली समय में प्राध्यापक पति के घरेलू पुस्तकालय से
ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ती है। आदर्श पति हैं शान्तनु वर्मा.... न तो ट्यूशन करते हैं न ही भारती को नौकरी करने की अनुमति देते हैं। शादी के शुरूआती दिनों में ही उन्होंने अपने विचार व्यक्त कर दिए थे- ‘‘देखो भारती मैं बाहर काम देखूँगा.... रोजगार करूँगा.... जो कमाऊँगा उसी में तुम्हें घर चलाना होगा.... पति पत्नी को अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी..... मैं कभी तुम्हारे घरू निर्णयों में बाधक नहीं बनूंगा....।’’

दो नौकरानी हैं घर पर.... एक घर का सारा काम काज करने वाली महरी है सुबह शाम आती है तो दूसरी कमली दी.... नाश्ता दोनों समय का भोजन बनाती है.... ऐसा लगता है ये दोनों भी घर के ही सदस्य हैं....। रतन सप्ताह में एक दिन आकर बगीचे का काम कर जाता है....।
शान्तनु मात्र पति नहीं है, जीवन सहचर हैं.... जब भी भारती घर पर गाने- बजाने का आयोजन करती है शान्तनु अतिथि निर्वाचन, निमंत्रण पत्र वितरण, आगन्तुकों के स्वागत सत्कार की व्यवस्था करते हैं स्वयं भी संगीतानुरागी हैं भारती को उत्साहित करते हैं.... बाहर जाना हो तो उसका साथ देते हैं.... हाँ.... यह सही है कि भारती व्यावसायिक गायिका नहीं है पर इसका उसे कोई क्षोभ या दुख भी नहीं है।
भारती को अन्यमनस्क देखकरी मंजरी ने टोंका- ‘‘कहां खो गई भाई.... करीब पंद्रह सोलह सालों बाद मिली हो.... कुछ अपनी सुनाओं कुछ हमारी सुनो....।’’
‘‘हाँ...हाँ तो आजकल कहां हो मंजरी.....?’’ कोई और प्रश्न सूझा ही नहीं भारती को....।
‘‘मैं तो यहीं अरिहन्त कालोनी के बंगला नं. 32 में रहती हूँ.... तुम यहाँकब से हो...? घर का पता बताते समय मंजरी की आंखों में अभिजात्य कालोनी में निवास करने का प्रच्छन्न गर्व झलक गया.... भारती को संकोच हुआ यह बताते हुए कि वह प्रोफेसर्स कालोनी में विश्वविद्यालय द्वारा दिए क्वाZटर में रहती है। फिर भी भारती ने पूछा’’ ‘‘और सुनाओ घर-संसार कैसा चल रहा है....?’’
मंजरी ने मौका देने वाला उत्तर दिया.... ‘‘फिर से शादी कर ली हूँ.... तुम सोच रही होगी मणिशंकर महाशय कहाँ गये.... तो उन महाशय से अमेरिका का मोह नहीं छूटा.... न ही गोरी बहू का तो मैं भी चली आई...। चार साल तक यहीं स्कूल में पढ़ाती रही... फिर उमेश से परिचय हुआ.... वे भी अकेले थे.... पत्नी ने सीधे ऊपर का टिकिट कटा लिया था.... एक मात्र बिटिया अपने धनी नाना नानी की नयनमणि होकर उन्हीं के पास रहती है।’’
भारती सोच रही थी.... जरा भी नहीं बदली है मंजरी.... वही देहयश्टि... वही उन्मुक्त हंसी.... बातचीत में आत्मीयता की मिठास ज्यों की त्यों बनी हुुुई है.....। कैसे खुद को इतना संभाल कर रख पाई होगी....अँह.... एक मैं हूँ.... वजन बढ़ता जा रहा है.... फटी एड़ियाँ.... रूखी त्वचा.... दादी.... नानी का सा बड़ा सा जूड़ा.... पुरखिन लगने लगी हूँ.... कौन कहेगा हम दोनों समयवयसी हैं कभी एक ही कक्षा में पढ़ते थे.... पति महोदय भी भोलाराम ही हैं.... कभी भी.... साज-पोशाक के लिए.... कोई टीका टिप्पणी नहीं करते.....।
ठण्डी हवा के झोंके के साथ ही बूंदा-बांदी शुरू हो गई... मंजरी आश्वस्त थी.... भारती की परेशानी भांप गई बोली- ‘‘पास ही तो हमारा बंगला है..... चलो.... चलते हैं दोपहर का लंच साथ करेंगे.. जी भर बातें हांेगी.... डरो मत गाड़ी है भीगेंगे नहीं....।’’ संकुचित होकर भारती.... नहीं.... नहीं कर रही थी पर कौन सुने.... मंजरी भारती का हाथ पकड़ लगभग खींचते हुए गाड़ी तक पहुंच गई ‘‘राम भरोसे.... सीधे घर चलो का.... दर्पपूर्ण आदेश दे.... मंजरी को साथ लिए गाड़ी में बैठ गई।’’
बंगले के सामने गाड़ी रूकते ही.... दरबान ने आकर गेट खोल दिया.... मखमली हरी घास वाला लान... छोटे-छोटे गमलों में मुस्कराते फूल.... गेट के पास खड़े अभिवादन करते पाम.... सुंदर साफ क्यारियों में मौसमी फूल, मुग्ध हो गई भारती....। बैग से चाबी निकाल कर दरवाजा खोला मंजरी ने.... भीतर जाकर बटन दबा कर कमरे को भी आलोकित कर दिया.... वाह.... बड़ा सा हाल... नीला कार्पेट बिछा हुआ... आधुनिक सोफा सेट..... कांच की अल्मारी में सजे कीमती शो पीस....देश.... विदेश से संग्रहित....। घर में सन्नाटा पसरा था.... जाने किस दरवाजे से छोटा सा कुत्ता भोंकते हुए चला आया.... सफेद ऊन के गोले सा लग रहा था....। मंजरी ने पुचकारा ‘‘नो लकी.... नो... आंटी है....।’’ हे भगवान ! भारती का प्रमोशन सुनकर शान्तनु खूब दिल्लगी करेंगे... वाह ! कुत्ते की आंटी....।
भारती ने पूछा- ‘‘मंजरी तुम्हारे घर कोई नौकर या बाई नहीं है क्या....?’’
‘‘ना भाई... आजकल नौकर रखना सिरदर्द मोल लेना है.... फिर प्राइवेसी नाम की कोई चीज रह नहीं जाती....। सब कामों के लिए मशीनें हैं न । सबसे बड़ी बात कि आजकल घर के नौकर चोरी डकैती के साथ हत्या तक करने लगे हैं। आये दिन अखबारों में इस तरह की घटनायें छपती तो रहतीं हैं....।’’ मंजरी....फ्रीज खोलकर ठंडा पानी निकाल लाई.... भारती क्या करे? इतना ठंडा पानी- गला खराब हो जावेगा.... फिर अगले हफ्ते.... पास के ही महिला मंडल में गाना है। झिझकते हुये बोली- ‘‘ना भाई.... मुझे तो घोड़ का पानी ही दो.... गला खराब हो जावेगा....।’’
इधर उधर देखकर भारती नू पूछा- ‘‘तुम्हारे कोई बाल बच्चा नहीं है क्या ?’’
हंसते-हंसते मंजरी लोटपोट होने लगी- ‘‘किस मांधाता युग में जी रही हो भारती, आजकल बच्चे-बच्चे की झंझट कौन अपने सिर लेता है.... स्वच्छंद जियो... जितना चाहो आनंद करो.... बच्चे पैदा करके.... अपना शरीर बेडौल करो.... उसे पालो पोसो.... पढ़ाओ लिखाओ.... ऊँह ! इतना झमेला कौन करे और यही सब करते रहे तो fजंदगी सारे मजे तो धरे के धरे रह जायेंगे.... बूढ़ी हो जाऊँगी.... न भाई... माफ करो.... हम तो fबंदास fजंदगी जीते हैं....।’’ मंजरी का प्रत्येक वाक्य भारती को आश्चर्य के समुद्र में गोते लगवा रहा था....। इस मंजरी को तो वह नहीं पहचानती....। भारतीय परिवार की बेटी-बहू होकर- पाश्चत्य सभ्यता की ऐसर नकल.... कि नारी जीवन.... का सबसे बड़ा वरदान मातृत्व ही अभिशाप लगने लगे....। ऊँहू... बड़ी देर हो गई... घर में बताकर नहीं आई थी.... अब चलना चाहिए... यहाँ दम घुटने लगा है..... घर तो भारत के ही एक शहर में है पर यहाँ पर हवा पश्चिम से आ रही है..... इस भारी हवा में सांस लेना भारती को दूभर लगने लगा...।
मंजरी....उठी.....पूछी..... भारती लंच में वेजिटेबल बिरियानी चल जायेगी न..... ?
भूख तो भाग गई थी फिर खाना पूर्ति तो करनी थी सो सिर हिलाकर हामी भर दी भारती....।
मंजरी.... रसोई घर में चली गई थी.... वक्त काटने के लिए.... कोई पत्रिका..... कोई समाचार-पत्र ढूंढ़ने लगी भारती.... कहीं कुछ नहीं था.... पढ़ने योग्य कोई पुस्तक तो दूर की बात.... वहाँ तो कागज का एक टुकड़ा भी नहीं था.... भारती ने सोचा.... शायद यह भी आधुनिक फैशन ही होगा....।
मोबाइल बजने लगा था.... जलरंग की मृदु मधुर ध्वनि.... मंजरी ने तेज कदमों से आकर उठाया.... ‘‘एक्सक्यूज मी’’ कहकर फोन उठा बगल के कमरे में चली... वाह ! पूरे दस मिनट तक बातें करती रही... हंसते हुए बाहर आई....। मंजरी का सांवला चेहरा खुशी की गुलाबी आभा से आकर्शक लग रहा था... हंसकर बोली- ‘‘भारती बूझो तो किसका फोन था.... ?’’ भारती प्रश्न सूचक दृश्टि से उसकी ओर देखने लगी, बड़ी अदा से बोली मंजरी- ‘‘अरे भाई हमारे पतिदेव का फोन था... वहाँ सुबह के आठ बज रहे हैं.... मीfटंग में जाने से पहले.... यहाँ के लंच टाइम को याद करके पूछ रहे हैं’’ मैंने लंच लिया... या नहीं.... लकी का लंच ठीक वक्त पर हुआ या नहीं.... पता है भारती मुझे आज तक समझ में नही आया कि उमेश मेरी ज्यादा fचंता करता है या लकी की....।
भारती फिर भौंचक्क... अरे पत्नी और कुत्ता... कैसे तुलना हो सकती है दोनों के प्यार की....। मंजरी के जितने रूप कर सामने आ रहे हैं.... भारती के लिए सब से सब जादुई हैं....।
बिरियानी बन गई थी.... टेबल पर दोनों आमने सामने बैठीं.... गरम बिरियानी की सुगंध... ने भूख को जगा दिया.... पर ये क्या.... सिर्फ बिरियानी.... और कुछ नहीं है.... हमारे घर तो कमली दीदी.... पूरी थाली सजा देती है.... दो सब्जी, रायता, पापड़... मीठी... चटनी, घी से छौंकी दाल.... सुगंधित चावल का भात.... पतली पतली घी लगी रोटियाँ.....। अपना घर याद आने भारती को.... सोचने लगी... कब भागूं.....। मंजरी ने पूछा- ‘‘भारती चिली साॅस, टोमेटो साॅस क्या लोगी? हे भगवान् ।
दही तक नहीं है.... बेमन से भारती ने चिली सास ले लिया.... सूखी बिरियानी-गले के नीचे उतारना कठिन था.... कौर गले में फंसे इससे पहले.... पानी का गिलास मुंह से लगा लिया भारती ने..... जैसे-तैसे.... खाना खत्म कर फिर सोफे में आ बैठी.... जाने की बात बोलने ही वाली थी कि मंजरी ‘‘आइसक्रीम लिये हाजिर हो गई....।’’ भारती ने सोचा ये नई मुसीबत है..... वही..... गला खराब होने का डर.... इस बार दृढ़ता से ‘‘नहीं भाई। अब मुझे जाने दो.... फिर कभी आकर यह सब खाऊँगी.... कहते कहते उठ खड़ी हुई....।’’
हाथ पकड़कर मंजरी ने भारती को बिठा लिया- ‘‘तुमने अपने बारे में कुछ बताया ही नहीं.... बोलो पतिदेव कैसे हैं....।’’
भारती बोली- ‘‘शान्तनु वर्मा नाम है, विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक हैं, आलोक और आकाश दो बेटे हैं, खड़कपुर आई.आई.टी. में सिक्सथ और थर्ड सेमेस्टर के छात्र हैं.... छुट्टियों में आते हैं- अन्यथा हम दो बूढ़े- बूढ़ी.... ही यहाँ रहते हैं....।’’
भारती... मंजरी के चेहरे के उठते गिरते भावों को देख रही थी..... बच्चों के जिक्र ने पल भर को उसके चेहरे को सफेद कर दिया था....।
वाक्पटु मंजरी चहक कर बोली- ‘‘अरे बूढ़े-बूढ़ी क्यों कहती हो.... अभी तुम लोगों की उम्र ही क्या है.... मुझे देखो न.... कोई कहेगा.... तीस से ऊपर हूँ.... हां एक बात और बताऊँ भारती उमेश.... एम.बी.ए. कर रहा था न्यूजर्सी में... वहीं उससे परिचय हुआ... उम्र में वो मुझसे चार साल छोटा है....। भारती के मुंह से निकल गया- ‘‘ओह...छोटा... वह भी चार साल.... ये कैसे संभव है.... हमारे यहाँ तो.... वाक्य पूरा नहीं हुआ था कि मंजरी असहिश्णु सी बोल पड़ी’’ अमेरिका जाकर ही मैंने fजंदगी जीना सीखा- वहाँ पति उम्र में छोटा हो या बड़ा कोई फर्क नहीं पड़ता...। जानती हो उमेश का बाल-विवाह हुआ था... बिचारा हुआ था.... बिचारा इसीलिए तो मुझसे मिला... तो लट्टू की तरह आगे पीछे घूमने लगा.... और देखो.... आज भी कितना प्यार है कि इतनी बड़ी कंपनी का डायरेक्टर चाहे जिसे देश में हो.... मीfटंग में जाने से पहले.... रात सोने से पहले नियम से फोन करता है।.... राज की बात बताऊँ भारती.... उमेश का छोटा होना डराता है.... इसीलिए खुद को फिटफाट रखती हूँ.... वैसे भी औरतें जल्दी बूढ़ी हो जाती हैं न... और मैं बूढ़ी होकर उमेश को हाथ से निकल जाने देना नहीं चाहती....।’’
भारती को उबकाई आ गई.... ऐसा लगा सारी बिरियानी अभी बाहर आ जायेगा...। विरक्ति से मन भर उठा.... ये कैसा दाम्पत्य है? जहाँ शरीर के लेन देन के सिवा.... संतान, स्न्नेह, ममता, साहचर्य किसी भी भावना के लिए कोई स्थान नहीं है...।
पशु और मनुश्य में ‘‘आहार निद्रा मैथुनश्च’’ की समानता होती है.... मनुश्य पशु से श्रेश्ठ तो भाव से, fचंतन से, भाशा से होता है न....?
मंजरी और उमेश पाशविक जीवन दर्शन को मानने वाले हैं.... यहाँ तो आदर्श दम्पत्ति के चिरपरिचित माधुर्य के लिए कोई स्थ्ज्ञाना ही नहीं है। मशीनों को, कुत्ते को मनुश्य से अधिक विश्वसनीय माना जाता है..... यह जीवन दर्शन भारत की समझ से परे है....।
भारती ने हाथ जोड़ कर कहा- ‘‘चलें भाई.... बड़ी देर गई शान्तनु आते होंगे.....।’’
मंजरी दरवाजे तक छोड़ने आई.... चाहकर भी भारती मंजरी को अपने घर आने का निमंत्रण न दे.... सकी.... सोच ली इस संबंध की इतिश्री यहीं कर देना उचित होगा.... वैचारिक समानता के अभाव में कोई संबंध अधिक समय तक निभ नहीं सकता....। आराम दिखाने ही भारती को ले गई थी.... तभी तो शान्तनु प्राध्यापक हैं जानकर ही ड्राइवर को जाते समय इतना भी नहीं बोली कि भारती को छोड़ आये....।
भारती ने खुद पूछा सुख किसे कहते हैं? नहीं.... सुख को परिभाशित नहीं किया जा सकता.... हर आदमी का अपना-अपना सुख होता है....।

शेष्‍ा आस्था

यह कहानी है छोटे से गाँव में रहकर बेटी के लिए बड़ा-सा सपना देखने वाली मां की....।
.... माँ चाहे जहां की भी हो, चाहे जिस परिस्थिति में उसे जीना पड़े, बेटी के उज्जवल भवश्यि के लिए असंभव को संभव करने का प्रयास प्राणपण से करती है....।
सरोज भी इसी तरह की मां थी... छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के सीमा प्रांत पर बसे गांव राम्हेपुर में रहती थी....।
खाते पीते घर की सुरूचि संपन्न, पढ़ी लिखी लड़की थी... पिता के असमय निधन ने, चार-चार बेटियों को ब्याहने की fचंता ने, मां को जर्जर कर दिया था.... बीतार रहने लगी थी.... डर गई थी कि मेरे बाद इनका क्या होगा, इसी डर में जितनी जल्दी संभव हुआ सभी लड़कियों को स्वस्थ कमाऊ लड़के देखकर विदा करती गई.... मां की आशंका पांच ही सालों के भीतर फलीभूत हो गई.... तब सरोज का ब्याह हुआ ही था... गोद में कोई संतान तब तक नहीं आयी थी... कि मां के मरने की खबर आ गई....।
पति रामेश्वर ने समझाया- ‘‘होनी को कोई टाल नहीं सकता.... धीरज... फिर मेरी मां तो है न....।’’ मां के जाने के साल भर के भीतर ही बिटिया का जन्म हुआ.... सास ने कहा- ‘‘पहली सन्तान कन्या हो तो पिता की उम्र बढ़ती है, घर में लक्ष्मी आती है....।’’
सरोज को लगा मां ही बिटिया के रूप में वापस आई है.... वही बिटिया अब तीन साल की होने जा रही है तो fचंता हो रही है, इस छोटे से गांव में बिटिया की पढ़ाई लिखाई कैसे हो सकेगी? लेकर एक प्रायमरी स्कूल है वह भी टूटी-फूटी इमारत.... बरसात के दिनों में छत टपकती.... बच्चे भींग जाते... सरदी खांसी हो जाती.... तो गरमी जितनी भी कम होे धूप तो टूटे खपरेलों के बीच से कमरों में चली आती.... बच्चे गरमी से बेहाल हो जाते.....। शहर से आये मास्टर जी.... जितनी जल्दी हो सके ट्रंासफर करवा शहर लौट जाते....।
सरोज को चिन्तित देखकर सास ने पूछा- ‘‘बहू तुम्हारा शरीर तो ठीक है न? दिनों दिन मुरझाती जा रही हो.... रामेश्वर ने कुछ कहा तो नहीं....।’’
सरोज हंस पड़ी- ‘‘नहीं मां जी मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा है.... लाली बड़ी हो रही है उसकी पढ़ाई लिखाई.... कैसे होगी- यहाँ का हाल तो आप देख ही रही हैं....।’’
रामेश्वर की मां अनपढ़ थी.... पर पढ़ाई लिखाई का महत्व समझाती थी बहू की fचंता उसे वाजिब लगी... पर समाधान तो उसके वश में था नहीं...।
सरोज ने रामेश्वर से कहा- ‘‘मैं लाली को लेकर मायके चली जाऊँगी.... वहाँ उसकी पढ़ाई लिखाई का उचित प्रबंध कर सकूंगी, आप यहीं रहिये...।’’
सरल हृदय रामेश्वर ने प्रतिवाद किया- ‘‘बूढ़ी मां घर का काम तो कर नहीं सकती.... मैं घर बाहर अकेले कैसे संभालूंगा दूसरी बात यह कि तुम्हारे मायके के घर में और कोई तो है नहीं.... आपद विपद में तुम मां बेटी की देखभाल कौन करेगा ?’’ fचंता अकारण क्रोध का कारण बनती है इसलिए सरोज झुंझला कर बोल उठी- ‘‘मैं वहीं जन्मी पली बढ़ी हूँ.... गांव-घर-समाज मेरा परिचित है.... रही देखभाल की तो बीच-बीच में आप आयेंगे ही.... फिर मैं तो हूँ न आपकी बेटी की देखभाल के लिए....।’’
हिचकते हिचकते रामेश्वर ने कहा- ‘‘वो घर तुम चारों बहनों का है.... भले कुछ न करें.... बहनोई लोग तो आपत्ति कर सकते हैं क्योंकि लाली की पढ़ाई पूरी होने में तो सालों लग जायेंगे.... संपत्ति, वह भी साझी... अक्सर रिश्तों ते दूरी ला देती है....।’’
इस बार सरोज ने ब्रह्यास्त्र का प्रयोग किया ‘‘यहाँ की जमीन जायदाद बेचकर आप भी चलिये.... तब कोई समस्या नहीं होगी.... सब साथ-साथ रह सकेंगे.... वहाँ कोई नौकरी कर लीजिएगा...।’’
दुखी होकर रामेश्वर सोचने लगा बाप दादों की जमीन.... कई पीढ़ियों का गांव... कैसे छोड़ें... अपनी खेती.... है... ढोर डंगर हैं.... मित्र परिचित.... रिश्तेदार सबको छोड़कर... चल देना वह भी हमेशा के लिए....।
रामेश्वर ने कुछ सोचकर कहा- ‘‘मैं तो सामान्य पढ़ा लिखा हूँ... नौकरी करने लायक कोई डिग्री तो मेरे पास है नहीं.....।’’
लगता है सरोज ने कमर ली थी तुंरत बोल पड़ी- ‘‘जमीन जायदाद की बिक्री से जो पैसा हाथ में आयेगा उससे कोई छोटा-मोटा रोजगार शुरू कर छोटा-मोटा रोजगार शुरू कर देना.... भगवान् ने चाहा तो.... उसी से हम चार लोगों का पेट चल चायेगा....।’’
इस बार रामेश्वर निरूपाय हो गया..... मां से पूछा तो उसने भी बहू के विचारों का स्वागत ही किया। अगले छः महीनों में सब कुछ बेंच बांच कर रामेश्वर सपरिवार राम्हेपुर आ गया.... योजनानुसार रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने वाली दुकान खोल लिया...। यद्यपि बस्ती से दुकान कुछ दूरी पर ही थी...किन्तु रामेश्वर का परिश्रम, उसका सदव्यवहार, उचित दाम पर चीजें बेचना, सबसे बड़ा सहारा सिद्ध हुआ। धीरे-धीरे दुकान दुकान जम गई....।
इस बीच लाली.... लालिमा नाम से स्कूल जाने लगी.... भगवान् ने मां को जल्दी अपने पास बुला लिया.... सरोज कुशल गृहणी थी.... लाली की पढ़ाई पर पूरा ध्यान देती हुई.... हिसाब देखने में रामेश्वर की सहायता करती....।
सरोज की व्यावसायिक बुद्धि ने रामेश्वर को समझाया कि छोटे-मोटे टेण्डर भरकर ठेकेदारी का काम शुरू करें.... दिनों दिन शहर बढ़ता जा रहा है.... मकान बनाने का काम ठेकेदारी में करने से लाभ की संभावना अधिक है....। लाली की शादी ब्याह में भी तो खर्च होगा....।
अब तक राम्हे पुर में रामेश्वर के प्रति किसी के मन में कोई दुर्भावना नहीं थी....। अधिकांश लोग उसके कठोर परिश्रम की प्रशंसा करते.... उदाहरण देते... विनयी रामेश्वर हंसकर रह जाता...। इधर सरोज ने घर की ओर भी ध्यान दिया, दो अतिरिक्त कमरे बन गये.... अतिथि अभ्यागतों के लिए अलग से स्नान घर की व्यवस्था हो गई....। दिया का अखिलित नियम है कि कोई आदमी यदि परिश्रम पूर्वक गरीबी से उबर जाता है.... आर्थिक उन्नति करता है तो कहीं-कहीं कुछ लोगों के मन में ईश्याZ जागती है वही ‘‘देखि न जाइ पराई विभूति....।’’
दुश्परिणाम यह हुआ कि निठल्ला संघ के सदस्य अकारण चंदा मांगने पहुंचने लगे.... रसीद काटते, अपनी मर्जी से....। ऐसा लगता चंदे की रसीद नहीं किसी बैंक का चेक है जमा करते ही अंकित राशि का भुगतान हो जायेगा....। पास पड़ोस के अतिरिक्त दूर दराज में लोगों का जोर भी दिखने लगा....।
लाली.... पढ़ने में होशियार थी तो दिखने में भी सुश्री थी.... रूपवती तो नहीं कह सकते.... आकर्शक थी...। कविता, नाटक, बैडfमंटन आदि आयोजनों में भाग लेती.... पुरस्कृत भी होती.... अच्छे नंबरों से ही पास होती.... बी.एस.सी. फाइनल में कब पहुंच गई.... पतर ही नहीं चला....। रामेश्वर लाली को देख गर्व से भर उठता तो सरोज के निर्णय की सराहना करता....।
सरोज ने रामेश्वर से अनुरोध किया कि चार पैसा हाथ में है तो घर को दो मंजिला कर देते हैं.....। रामेश्वर की असहमति.... त्रियाहठ के सामने हार गई.... अपनी ही जमीन में ईंट, पत्थर, रेत, सींमेट जमा करके रखने लगा रामेश्वर ताकि जितनी जल्दी हो सके.... काम पूरा हो जाये...। यह इलाका पंचायत का था इसीलिए रामेश्वर को अनुमति लेनी पड़ी.... पर यह अनुमति सहज नहीं मिली....।
यहाँ तक तो सब ठीक ठाक था.... नई मुसीबत आई स्थानीय निठल्ला संघ के बेरोजगार छोकरों का दल.... रामेश्वर को धमकाने लगा- ‘‘मकान के लिए जो सामान चाहिए.... हमसे ही खरीदना होगा.... नहीं तो दुमंजिला घर सपना-सपना ही रह जायेगा....। प्रच्छन्न धमकी इसी को कहते हैं। यही नहीं.... रामेश्वर को अग्रिम राशि देनी होगी.... सामान की कीमत चाहे जो हो, चाहे सामान कम ही क्यों न हो बाजार से तुलना नहीं कर सकते.... विरोध करना खरीददार के पक्ष में ठीक नहीं होगा....। रामेश्वर ने सोचा यह तो दादागिरी है.... हर तरफ से नुकसानदायक ही है....।
बार-बार दी जाने वाली धमकी से त्रस्त होकर रामेश्वर ने थाने में रपट लिखाने का दुस्साहस किया फल यह हुआ कि पुलिस ने समझौता कर लेने की सलाह दी... सक्रिय सहयोग कुछ नहीं मिला....। सुनने को मिला- ‘‘अरे महाशय!’’ वे लोग बेरोजगार हैं सरकार उन्हें रोजगार दे नहीं पा रहा उन्हें भी तो जीना खाना है.... कुछ लोग समयज विरोधी हुए जा रहा हैं उनकी भी सोचें.... कुछ ज्यादा तो मांग नहीं रहे हैं.... उचित यही होगा आप उनके हित के बारे में भी कुछ सोचें...।’’
थाने से बाहर आते ही रामेश्वर को निठल्ला संघ के नवोदित व्यवसायी गणों ने घेर लिया.... लंबे से युवक ने कहा- ‘‘क्यों रामेश्वर जी.... क्या कहा पुलिस ने.... अरे क्यों झंझट कर रहे हैं, आप भी तो दो नंबरी पैसा कमा रहे है हम तो आपको बाधा नहीं देते आप हमारे साथ समझौता कर लें.... इसी मे आपकी भलाई है.... नहीं तो कुछ ऊँच-नीच हो गया तो.... वाक्य पूरा न करके तिरछी मुस्कान ओठों पर लाकर आंखें नचाने लगा....।’’
जल भुन गया रामेश्वर.... अपने पैसों से अपना घर बनवा रहा है उसमें भी बाधा...। पुलिस पर से जनता का विश्वास उठता जा रहा है....। लाली की परीक्षा समाप्त हो गई देर रात तक तीनों गप-शप करते रहे, गरमी ज्यादा थी इसलिये कमरे खुला रखे, डरने की कोई बात नहीं गेट पर तो ताला लगा ही दिया था। सरोज और रामेश्वर भी बगल वाले कमरे में सो गये....।
सुबह लाली की मृत देह मिली.... सरोज और रामेश्वर शोक के प्रथम आघात से पथरा गये.... ये क्या हुआ....? पिछवाड़े की झाड़ी में, लाली के कपड़े मिले.... तार-तार हो गये कपड़े....। पड़ोसी शिवरतन जी थाने दौड़े.... अन्य पड़ोसियों ने सरोज और रामेश्वर को संभाला....।
कुमारी बेटी की यह दुर्दशा देखकर रामेश्वर आर्तनाद कर उठा.... सरोज की आंखों से चिनगारी निकलने लगी.... लाली की ऊंगलियों मंे किसी के शरीर के त्वचा की खुरचन थी तो बायें हाथ में घुघराले बालों का एक गुच्छा....। बिना धैर्य खोये.... सरोज उठी.... बालों का गुच्छा और त्वचा का अंश लिफाफों में डालकर सावधानी से आल्मारी में रख दी....।
पुलिस आई.... जांच अधिकारी ने कहा- ‘‘ऐसा लगता है.... चोर की ही करतूत है.... देखो हम जांच पड़ताल में कोई कसर नहीं उठा रखेंगे।’’
शेरनी की तरह गरज उठी सरोज- ‘‘साहब ! कोई चोर, गैस कटर लेकर दरवाजे का ताला नहीं काटता....। लड़की की हालत देखिये.... क्षत-विक्षत शरीर.... कपड़ों का शरीर पर न होना.... उसके हाथ में फंसा बालों का गुच्छा.... स्पश्ट संकेत है... लड़की के साथ जोर जबरदस्ती की गई है....। अब आप नये सिरे से विचार- विवेचना कीजिए.... इस बर आंखों से आंसुओं की धार बह निकली सरोज के....।’’
आसपास भीड़ जमने लगी थी.... सभी जोर दे रहे थे पिछवाड़े पड़े लाली के कपड़ों की भी जांच की जावे.... मारमुखी जनता.... का आक्रोश बढ़ता जा रहा था.... विवश होकर पुलिस अधिकारी..... नये सिरे से जांच पड़ताल में जुट गया....। जीप स्टार्ट करके जाने वाले पुलिस अधिकारी के पास आकर सरोज ने कहा- ‘‘घटना स्थल पर आपको क्या-क्या मिला- इसकी एक लिस्ट मुझे भी दे जाइए.... ताकि सबूत सुरक्षित रहे....।
यहाँ उपस्थित लोगों में से किसी दो व्यक्ति के हस्ताक्षर की बात सुनते ही भीड़ छंटने लगी... कौन साक्षी- गवाही दे... पुलिस के झमेले में पड़कर.... अपनी नींद खराब कौन करे फिर समाज विरोधियों की लिस्ट में अपना नाम लिखवाकर अपनी मौत खुद क्यों बुलाये कोई....। सरोज असहाय सी चारों ओर देखने लगी.... पुलिस अधिकारी ने धमकी भरे स्वर में कहा- ‘‘हमारे कामों में हस्तक्षेप मत करें.... अपना काम कैसे करना है हम अच्दी तरह जानते हैं.... दूसरी बात आपकी बात की साक्षी देने... कौन आगे आयेगा...?’’
आश्चर्य की बात कि पड़ोसी रामलाल और दूसरी तरफ के मकान में रहने वाली बूढ़ी मुस्लिम महिला आगे आये.... घटना स्थल पर प्राप्त सबूतों वाली लिस्ट में हस्ताक्षर किए.... यही नहीं.... बूढ़ी खाला ने सरोज को संभाला- ‘‘खुदा पर भरोसा रख बेटी ! संभाल खुद को.... रामेश्वर की तरफ भी देख.... कैसा बावला हो रहा है.... तुझे और तेरी बेटी को इन्सान मिलेगा.... खुदा के दरबार में देर है अंधेर नहीं....।’’
पुलिस आॅफिसर चले गये....। लाली की देह पोस्टमार्टम के लिए ले जाई गई.... वहां भी.... झमेला.... देखते-देखते शाम होेने आई.... डाॅक्टर का पता नहीं.... सरोज बिफर उठी.... उसी पुलिस आॅफिसर के पास गई.... शर्ट पर लिखे नामपट्टी से जान गई थी सुशील बंजारे....।
‘‘बंजारे साहब ! पोस्टमार्टम कब होगा.... लाश हमें कब मिलेगी..... अंतिम संस्कार भी तो करना है..... आप भी तो बाल बच्चों वाले हैं.... जवान बेटी की मौत का सदमा कहीं उसके बाप को पागल न कर दे.... दया करके.... जल्दी करवा दीजिए....।’’ पुलिस वाले भी होते तो मनुश्य ही हैं कड़क वरदी के नीचे..... धड़कता मुलायम, नरम दिल तो होता ही है।
उद्भ्रान्त रामेश्वर की ओर बंजारे साहब ने देखा.... फटी फटी आंखोें से शून्य में ताकता बैठा है रामेश्वर.... न कुछ बोलता है.... न रोता, चीखता है....। अधिक देर तक यह हालत रही तो सदमे से पागल हो जायेगा.... जाने वाली तो गई इस आदमी को बचाना चाहिए.... दया- परवश हो बंजारे साहब ने सरोज से कहा- ‘‘आप इन्हें लेकर घर जाइए.... अधिक देर तक यहां रहना इनके लिए ठीक नहीं है, कल सुबह दस बजे तक आपको पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद लाश सौंप दी जायेगी.... मैं खबर भेजूंगा...।
सरोज ने अनुरोध किया- ‘‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट की एक प्रति यदि दें....।’’
बंजारे साहब ने बताया यह नियम विरूद्ध है हां आप आवेदन पत्र लिख दीजिए कोर्ट से आपको प्रति मिल जावे यह व्यवस्था मैं कर दूंगा....।
दूसरे दिन से बंजारे साहब के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देने लगा पर प्रत्यक्षदर्शी कोई नहीं था.... साक्षी के अभाव में मामला आगे बढ़ नहीं पा रहा था....। समाज विरोधियों से दुश्मनी लेना कोई नहीं चाहता.... बाल बच्चेदार सामान्य गृहस्थ अपना सुख-चैन नश्ट करना नहीं चाहते.... फिर यह कहने वाले भी कम नहीं थे.... अरे ! एक हाथ से ताली नहीं बजती.... कौन जाने.... चोरी थी या सीना जोरी.... फिर चली गई वह तो वापस आने से रही....। जितने मंुह उतनी बातें....।
सरोज ने बंजारे साहब से पूछा- ‘‘मैं कुछ लोगों के नाम बताती हूँ आप उनकी त्वचा और बालों का नमूना लेकर लाली के हाथों में पाई गई त्वचा और बालों के गुच्छे से मिलवाइए.... डाॅक्टरी परीक्षण से पता चल ही जायेगी.... फोंरेसिक रिपोर्ट आपको जांच कार्य में और अपराधी की शिनाख्त करने में मदद देगी....।’’
बंजारे आश्चर्यचकित रह गये दक्ष पुलिस आॅफिसर के रूप में जाने माने जाते थे वे.... भद्र महिला की विवेचना शक्ति, स्थिर बुद्धि, धैर्य और सहयोगिता से प्रभावित हुए....। पूछ ही लिया- ‘‘आपको जांच प्रक्रिया की इतनी जानकारी कैसे है....।’’
म्लान हंसी हंसकर सरोज बोली- ‘‘बंजारे साहब मेरे मामा fछंदवाड़ा के पुलिस कमिशनर हैं मैं उन्हीं के पास रहकर पढ़ती थी दूसरे.... मैं एल.एल.बी. की हुई हूँ...।’’
बाप रे....! सामान्य गृहिणी का असामान्य परिचय....। जो बाहर दिखता है उतना ही सच नहीं होता.... सच को पहचानने के लिए आदमी के अंदर झांकना पड़ता है।
सप्ताह भर बाद रामेश्वर के घर के सामने पुलिस की जीप रूकी.... आस पास के लोग भी तमाशा देखने आ जुटे.... तीन युवकों को साथ लाये थे बंजारे साहब....। पहचान के लिए चश्मा ठीक करते हुए.... सरोज ने प्रौढ़ पति की ओर गहरे अनुराग से देखा- ‘‘ईश्वर पर आस्था-विश्वास होना चाहिए पर उससे भी पहले है स्वयं पर आस्था रखना.... अपने कार्यों पर विश्वास रखना....।’’
बंजारे साहब की तत्परता और अदालत के निर्णय ने तीनों युवकों को दण्डित किया ।
स्थानीय महाविद्यालय में ‘लालिमा स्मृति पुरस्कार’ की घोशणा सरोज और रामेश्वर द्वारा की गई....।



दायित्व निर्वहन

‘‘अतुल बाबू आपको बाबूजी बुला रहे हैं.... मंझली भाभी गीता ने कमरे में झांक कर कहा.... उनकी आंखांे ने कहा अब कैसे जान बचाओगे बच्चू...।’’
अतुल ने देखा गहनों की चलती फिरती दुकान ही सामने खड़ी है.... बड़े बाप की दुलारी बेटी... प्रचुर धन संपत्ति दहेज मंे लेकर आई है तभी तो प्रमोद भइया जैसे होनहार अस्थिरोग विशेशज्ञ को पा सकी... बिचारे प्रमोद भइया सहपाठिनी विभा भंडारकर के साथ डिस्पेंसरी चलाने, घर बसाने का सपना देख रहे थे.... बाबूजी की धमकी से सहमे से खड़े रह गए.... दोर्दण्डप्रताप बाबू जी.... घर के तानाशाह ही थे.... उनके आदेश की अवहेलना करना तो दूर उनके सामने आंख उठाकर बात करने की हिम्मत भी किसी में नहीं थी....। दुनियादारी में प्रवीण बाबूजी.... शहर के प्रतिश्ठित व्यवसायी की एक मात्र पुत्री गीता को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार कर चुके थे.... सगाई के दिन ही प्रमोद भइया की आधुनिक साज-सज्जा से सुशोभित डिस्पंेसरी का उद्घाटन हुआ था।
तानाशाही हुक्म फिर सुनाई दिया इस बार किसन आया था- ‘‘छोटे बाबू जल्दी चलिये बड़े साहब बुला रहे हैं।’’
नीचे आकर देखा गुरू गंभीर मुद्रा में बाबूजी बैठे हैं अतुल समझ गया तूफान आने से पहले की शांति है....।
‘‘तो क्या करने की सोच रहे हो.... अपने भाइयों से कुछ सीखो.... इस तरह मुंह लटकाये खड़े मत रहो.... जवाब दो....।’’ बाबू जी का प्रवचन शुरू हो गया....। अतुल ने मन ही मन कहा- ‘‘आप बोलने का मौका तो दें....।’’ प्रगट बोला- ‘‘हिन्दी साहित्य में एम.ए. करना चाहता हूँ.... साथ में लिखना भी चलता रहेगा....’’ वाक्य पूरा नहीं हुआ था कि बाबूजी गरज उठे- ‘‘क्या होगा साहित्य पढ़कर.... टुटपुंजिहा लेखकों की कमी नहीं है.... सुनो.... प्रोडक्शन, प्रोडक्टिव्हिटी लेकर पढ़ाई करो.... चाहो तो इंडस्ट्रीयल करो.... चाहो तो इंडस्ट्रीयल मैनेजमेंट का कोर्स कर सकते हो..... एम.बी.ए. चाहो तो वह भी करो.....। दिन प्रतिदिन जनसंख्या बढ़ रही है, उद्योग धंधों का विकास हो रहा है, कृशि योग्य भूमि में कारखाने स्थापित हो रहे हैं, देख नहीं रहे, हांककांग, सिंगापुर, कोरिया, जापान समान भाव से यूरोप, अमेरिका के साथ प्रतिद्वंविता कर रहे हैं। भारत बहुराश्ट्रीय कंपनियों का देश बन गया है.... इसी दिशा में भविश्य उज्जवल है....।’’
अतुल के सपने.... बिखर रहे थे.... टूटते-बिखरते सपनों को संभालने की अंतिम कोशिश की उसने- ‘‘बाबूजी.... दो साल की तो बात है....।’’
‘‘दो साल में दुनिया कहां पहुंच जायेगी.... कुछ खबर है? वाणिज्ये वसतु लक्ष्मी....। रमा.... समझाओ अपने लाडले को सपनों की दुनिया से बाहर आये.... जिस चांद को देखकर कविता लिखना चाहता है उस चांद पर पहुंचने की सोचे....।
भला हो फोन का जो बज उठा था और किसी जरूरी मीfटंग के लिए बाबूजी चले गये थे....। जान बची और लाखों पाये के अंदाज में दो-दो सीढ़ियाँ एक साथ फलांगते अतुल फिर अपने कमरे में आ गया था.....।
क्या करे अतुल..... अपने भाइयों के समान विलक्षण बुद्धिमान विद्यार्थी वह कभी नहीं रहा, कविता, कहानी, इतिहास यही विशय मन को आकर्शित करते....। जाने कब छोटी-छोटी कवितायें, लघु कहानियाँ लिखने.... लगा।
मित्र मण्डली से सराहना मिलती.... विद्यालयीन पत्रिका में रचनायें छपतीं.... कितना गर्व होता.... कितनी खुशी.... पर इस खुशी में घर का कोई सदस्य कभी शामिल नहीं हुआ। जब तक दादी थीं.... छोटे पोते को दुलारती थीं, उसकी कविता सुनती थीं....।
प्रतिदिन की तरह दोनों अम्बेडकर चौक पहुंच कर रूक गये.... यहाँ से महात्मागांधी रोड से नमिता अपने घर चल देगी.... थोड़ी देर रूककर.... अतुल स्कूटर स्टार्ट करके राजेन्द्र पार्क वाली सड़क से घूमकर लक्ष्मी निवास पहुंचेगा.... हंस पड़ा अतुल कितना सार्थक नाम है लक्ष्मी निवास.... गलती से सरस्वती ने प्रवेश किया भी तो बाबूजी की तर्जनी उठ गई, निरूपाय सरस्वती ने लक्ष्मी का आधिपत्य स्वीकार कर लिया।
‘‘क्या सोचने लगे अतुल.... आज चाय नहीं पिलवाओगे.... तुम्हारे शब्दों में विदाई का प्याला....।’’ नमिता के कंठ स्वर ने अतुल को वर्तमान में ला पटका.... दोनों चाय की दुकान पर पहुंच गये.... अभी बैठ भी नहीं पाये थे कि.... लोगों का हो हल्ला सुनाई दिया.... दुकानदार गरज रहा था, ‘‘मुक्त का माल है? सिर उठाये चली आती है.... अरे ! भगाओ बुढ़िया को.... चाय का पैसा तो दे नहीं सकती.... फरमाइश है बिस्कुट की....।’’
अतुल ने देखो.... झुकी कमर, सन से सफेद बाल.... एक हाथ में पोटली दबाये हुए जराजीर्ण वृद्धा थी.... दाहिने हाथ को चाय वाले के नौकर ने पकड़ रखा था.... चेहरा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था हांफती कांपती वृद्धा वहीं बैठ गई तमाशाईयों की ओर देख.... आसमान की ओर दाहिना हाथ उठाकर बोली-
‘‘सुख दिया या दुख दिया
देने वाले तेरा शुक्रिया....।’’
चौंक उठा अतुल.... स्पश्ट उच्चारण, रिजाय़ किया गया गला.... स्वर में जड़ता नहीं, विनय नहीं वरन् दर्प भरा ओज ही ध्वनित हो रहा था....। संवेदनशील अतुल.... भीड़ को ठेलकर आगे आया वृद्धा के सामने बैठकर पूछा- ‘‘चाय पियेंगी आप....?’’
वृद्धा ने सिर हिलाकर हाँ कहा.... थोड़ी देर चुप रहकर बोली- ‘‘कल से कुछ नहीं खाई.... बिस्कुट खाऊँगी.... चाय के साथ....।’’
तब तक नमिता पास आ गई थी.... उसकेे हाथ में चाय थी... अतुल बिस्किट लेकर आया.... चाय बिस्किट का दाम चुकाकर दुकानदार से पूछा- ‘‘ये यहीं रहतीं हैं क्या ?’’ दुकानदार ने मुंह बिचकाकर कहा- भिखारिन है बाबू.... सालों से पड़ी रहती है.... कहां से आई है.... कोई नहीं जानता.... ऐसे लोगों का कोई घर- द्वार तो होता नहीं.... आप पैसे न दें.... हम भी आदमी हैं.... दया-माया हममें भी है.... पर ग्राहकों के सामने... धंधे पानी के वक्त परेशान करती है... तो... गुस्सा आ ही जाता है....।’’
नमिता घर जाने की जल्दी में थी.... अतुल भी घर आ गया.... रात भर सो नहीं पाया....। वृद्धा का असंख्य झुर्रियों भरा चेहरा आंखों के सामने बार-बार आ जाता....। निश्चय ही कभी अच्छे घर की रहीं होंगी.... लगता है पढ़ी लिखी है....।
ज्ञानरंजन वाजपेई याद आये.... उपन्यास का कथानक.... तलाशो... हे भगवान् बुढ़िया का रूप धरकर कथानक ही सामने खड़ा है.....। निश्चय किया..... कि सुबह ही भिखारिन से मिलने जावेगा....। उपन्यास लिखना ही है.... अविस्मरणीय कृति.... जिससे अतुल की गिनती भी प्रतिश्ठित साहित्यकारों में होने लगे.....।
दूसरे दिन सुबह दस बजते न बजते अतुल.... पहुंच गया चाय की दुकान पर... पूछने पर पता चला... रेल्वे प्लेटफार्म में मिलेगी बुढ़िया....। प्लेटफार्म के अंतिम छोर पर घने नीम के नीचे पोटली का सिरहाना बनाये सो रही थी वृद्ध महिला.... अतुल झिझकने लगा.... जगाये कैसे? कहीं नाराज हो गई ?
उपन्यास का भूत फिर सिर पर नाचने लगा....। तो साहस करके पास जाकर पुकारा- ‘‘सुनिये... मैं आपसे कुछ बातें करना चाहता हूँ....।’’
मिचमिची आंखों से वृद्धा ने अतुल को देखा.... परिचय भरी मुस्कान ओठों पर उभर आई.... निश्चय ही गालों में कभी गड्डे पड़ते रहे होंगे अब तो पूरा चेहरा ही झुर्रियों और गड्ढ़ों से भर गया है.... धीरे-धीरे उठकर बैठी.... ‘‘चाय पिऊँगी.... तब कुछ बोलने लायक हो सकूँगी.... बोलकर सतृश्ण नेत्रों से अतुल की ओर देखने लगी....।’’
चाय के साथ पावरोटी देखकर कृतज्ञ हुई.... हाथ उठाकर माथे से छुआया... अदा से बोली ‘शुक्रिया’ ....। अतुल ने अनुमान किया..... जरूर इनका जीवन अदब कायदे में बीता होगा.... एक विशेश बात ने अतुल को चौंका दिया ‘‘बूढ़ी भिखारिन के लिए अतुल ‘‘आप’ संबोधन देता आ रहा है.... सम्मान बोध स्वयमेव जाग उठा है। पूछा उसने ‘‘आप कहां की हैं, कौन हैं.... अपने बारे में कुछ बताइये..... मैं आपकी कहानी लिखना चाहता हूँ.....’’
हंसने लगी इतना हंसी कि खांसी आ गई आंखों में पानी भर आया.... पास की बोतल से दो घूंट पानी पीकर बोली- ‘‘दुनिया में अपनी मर्जी से न आये थे न जायेंगे, जिन्दगी मुझे ले आई थी, और मौत ले जायेगी....।’’ क्या बताऊँ ? अब तो ऐसा लगता है.... सब पिछले जन्म की बातें हैं.... कभी मेरा घर था... जवानी थी, हुस्न था, कद्रदान थे....। कभी हम भी महफिलों की रोशनी हुआ करते थे....।
अतुल ने फिर पूछा- ‘‘आप कहां की रहने वाली हैं, आपका नाम क्या है?’’ पेड़ के तने से टिककर बैठ गई वृद्धा.... धीरे-धीरे बोली- ‘‘छोटी थी तो अम्मी मुनिया कहती थीं.... बाद में लोग हिना कहने लगे... हिना जानते हो.... मेंहदी.... जो खुद पिसकर लोगों की हथेली में लाल रंग भरती है....।’’
विजयपुर व रामनगर.... नहीं याद नहीं आ रहा.... जब मैं बहुत छोटी थी अम्मी के साथ हैदराबाद आ गई थी.... वहां उस्ताद जी से मौसीकी की तालिम ली थी.... उस्ताद जी घर पर आते थे....। कभी-कभी मैं भी उनके घर जाती थी.... रियाज में गफलत करने से अम्मी मारती थी.... उस्ताद जी डांटते थे....। सुबह रियाज करना.... दोपहार को खाना बनाने में मदद करना शाम को मुन्नी बाई की महफिल में सहबत....। अम्मी कड़ी नजर रखती.... थकान के मारे आंखें मुंदने लगती.... तो अम्मी चोटी पकड़कर fझंझोड़ देती....।
अतुल सोचने लगा..... वृद्धा महिला तब थी हिना.... निश्चय ही सुन्दरी रही होगी.... मुजरा करती थी.... पैसे भी कमाये होंगे तो आज इस हाल में क्यों हैं ? पूछ ही लिया.... ‘‘आपके परिवार वाले कहां हैं और यहां कैसे और कब आई....?’’
नखरीली हिना.... जग उठी थी तभी तो बोल सकी- ‘‘तुम भले आदमी हो.... पहले क्यों नहीं मिले.... अब तो बहुत कुछ भूलने लगी हूँ.... खैर जितना याद आयेगा बताऊँगी....।’’
जब जवानी थी.... हुस्न था... अदाकारी थी.... मौसीकी की तालीम ने सुरीले गले को..... और सुरीला बना दिया था..... पहला मुजरा कब हुआ था याद नहीं....। मौसी की यानि संगीत.... समझ गये न.....?
अतुल पूछ बैठा- ‘‘आप मुजरा करती थीं क्या ?’’
आहत हुई हिना बेगम.... कुछ रूखे स्वर में बोली- ‘‘बाबू साहब.... हमारे जमाने में मुज़रा करना भी हुनर की इबादत करने के समान था.... बड़े-बड़े इज्जतदार घराने के लोग.... आते.... महफिल सजती.... ठुमरी, गजल की मांग होती.... तो पक्के रागों के कद्रदान भी आते.... एक-एक मुरकी.... सुनने वालों को सिर हिलाकर दाद देने को विवश कर देती.... आलाप ऐसा कि.... जान निछावर करने को लोग तैयार रहते....।
महफिल की शमा सूरज की पहली किरण के साथ गुल होती... तो उस्ताद जी से इशारा मिलते ही मालकौंस पेश करती.... कभी किसी पूरे चांद की रात मंे रातरानी की भीनी खुश्बू के साथ विभावरी गाती..... म़जाल है महफिल में कोई बेअदबी कर दे.... कालू पहलवान अपने शागिर्द के साथ दरवाजे पर तैनात रहता था....। बाबू... मुजरा..... सिर्फ मुज़रा था देह व्यापार समझने की भूल मत करना......।’’
आवेश में बोलकर.... चुप हो गई....। अतुल ने फिर अपना प्रश्न दुहराया.... ‘‘यहाँ कैसे आई.... ?’’
गुमसुम हो गई थी हिना बेगम.... किसी तरह बोली- ‘‘चौघड़िया के जमींदार साहब मेरे हुस्न के दीवाने हो गये थे.... शादी तो कर नहीं सकते थे....। रखैल बनना मुझे पसंद नहीं था.... गले का पेशा करके इज्जत की रोटी खाती थी.... देह का पेशा करके.... खीर पुलाव खाना.... मंजूर नहीं था..... लंबी सांस खींचकर चुप हो रही.....।’’
आज बोलत-बोलते उनकी सांस फूल रही थी.... अस्सी वर्शीया वृद्धा.... ने आगे बताया- ‘‘जमींदार साहब खुद को नवाब कहलाना पंसद करते थे.... उनकी बीवी.... मंुहफट बेशकर खातून थी.... उनका हमारे पास रात रात भर मुजरा सुनना खातून को पसंद नहीं थी.... तैश में आकर बोल बैठी’’ नवाब साहब ! अब हमसे रिश्ता न रखें.... हम शरीफ घर की बेटी हैं जूठी पतल तो चाटेंगे.... नहीं....। जो बाजारू औरत की कदम बोसी करे उस शौहर को हम अपना जिस्म तो क्या अपना साया भी छूने नहीं दे सकते....।’’
नवाब साहब भी भड़क उठे बात बढ़ती गई.... बस... तैश में आकर दोनाली उठा ली.... कोई कुछ समझे पहले कबूतरी की तरह फड़फड़ाती बेगम साहिबा जमीन पर लोटने लगी.... फर्श लाल हो गया... वहीं दम तोड़ दिया उन्होंने....।।
थाना पुलिस... गिरफ्तारी मुकदमा.... नवाब साहब का महफिल में आना दुश्वार हो गया....। हमारी बदनामी भी कम नहीं हुई.... मुजरा लगभग बंद हो गया.... इसी बीच अम्मी चल बसीं हम तो बेसहारा हो ही गये....7
नवाब साहब के बेटे..... अपनी अम्मी की जान का बदला हमारी जान से लेना चाहते थे.... नवाब साहब को भनक लगी तो.... गुमाश्ते के हाथ चंद रूपये और एक रूक्का भेजा.... मुआफी मांगी थी उनने.... अपने सर की कसम देकर कहा था.... हैदराबाद छोड़कर.... चली जाओ.... यही गुमाश्ता हमें.... विजय नगर.... या जहंा हम चाहे.... पहुंचा आवेगा..... जिन्दगी रही तो फिर मुलाकात होगी.... खुदा हाफिज....। रूक्का पढ़ हम रोने लगे तो गुमाश्ते ने कहा- ‘‘जल्दी चलो गाड़ी का वक्त हो गया है....।’’
अतुल ने टोंक दिया.... ‘‘फिर यहाँ तक कैसे पहुँचीं ?’’ क्या लेखक यथाशीघ्र कथानक की परिणति जानना चाहता था....?
वृद्धा.... हंसने लगी.... हंसी और खांसी की युगलबंदी कुछ देर चलती रही.... हारकर अतुल उठा.... चाय ले आया.... दो गुलाब जामुन और समोसे भी लाया.... खुशी से भर उठी भद्र महिला, बुढ़ापे में रसना.... फिसलती जल्दी है.... बोलने में भी....। इस बार अपने आप आगे की कथा सुनाने लगी....। गाड़ी स्टेशन पर लगी लगाई मिल गई.... हम दोनों बैठ गये.... गुमाश्ते ने ही पूड़ी मिठाई का इंतजाम किया था.... जितना बना खा लिए.... पानी पीकर.... लेट गये.... नींद खुली तो सूरज सिर चढ़ आया था... गुमाश्ते का अता-पता नहीं था.... हमारी fजंदगी का सबसे मनहूस दिन था वो.... बड़ी देर तक इंतजार करते रहे....। शायद गुमाश्ता रात में ही किसी स्टेशन पर उतर गया था....साथ ले गया साथ ले गया था हमारे गहनों की संदूकची.... नवाब साहब के भेजे रूपयों की थैली.... यानि हमारे पास.... कुछ भी नहीं बचा था.... लुट गए थे हम.... टिकट तक हमारे पास नहीं था... बड़ी देर तक रोते रहे.... अल्लाह ताला को खूब कोसे....।
इसी समय टिकट चेकर आये....। बिना टिकट सफर करने के जुर्म में.... पकड़े गये थे.... औरत जात होने का इतना फायदा हुआ कि जेल जाना नहीं पड़ा.... पर अगले स्टेशन में हमें उतार दिया गया...।
अतुल ने पूछा- ‘‘इसी स्टेशन पर उतरी थीं क्या.... ?’’
जवाब मिला हां बाबू ! बस तब से यहीं हूँ.... लौटकर जाती भी कहां....? कोई सगा संबंधी भी तो नहीं था.... एक अम्मी थीं वो तो पहले ही छोड़ गई थीं....। अब तो.... जब बुलावा आयेगा... चले जायेंगे.....।
अब थक गई हूँ..... आराम करूंगी.... तुम कल फिर आना.... कहकर पोटली पर सिर रखकर लेट गई....। अतुल भी घर आ गया।
घर आकर रात को लिखने बैठा..... हिना की जबानी हिना की कहानी....। जाने कब तक लिखता रहा.... चिड़ियों की चहचहाट से.... होश आया... तो कलम रखकर आंखें बंद कर ली....।
रोने..... चीखने की आवाज से नींद टूटी.... पहले तो लगा कि आवाजें पड़ोस से आ रही है.... ध्यान देकर सुनने पर लगा.... नीचे आंगन से रोने पीटने का हृदय द्रावक स्वर यहाँ तक पहुंच रहा है....। किसन आकर दरवाजा पीटने लगा- ‘‘छोटे बाबू उठिये.... गजब हो गया..... झुझलाने लगा था अतुल.... दरवाजा खोला.... उसे देखते ही किसन बुक्का फाड़कर रोने लगा.... अतुल ने कड़े स्वर में कहा- ‘‘रोना बंद करके बता कि हुआ क्या है?’’ ‘‘बड़े साहब.... हमें छोड़कर चल दिये छोटे बाबू.... मालकिन रो रो कर बेहाल हुई जा रही हैं....।’’ अतुल का सिर घूमने लगा किसन की बात सुनकर.... दौड़ते हुए नीचे उतरा.... अंागन में लोगों की भीड़ जमा थी....। औरतों की भीड़ जमा थी....। औरतों की भीड़ के बीच बैठी मां..... छाती पीटकर रोये जा रही थीं....। बड़े भइया ने.... इशारे से अतुल को बुलाया.... उनकी आंखें लाल थीं.... गला भर्राया हुआ किसी तरह स्वयं को संभाल कर बोले- ‘‘बाबूजी भोपाल से वापस आ रहे थे रास्ते में कार एक्सरडेंट हो गया.... ड्राइवर सहित बाबू जी.... चल बसे....।’’ प्रमोद गया है... थोड़ी देर में बाबू जी को यहाँ ले आवेगा.... तब क्रिया कर्म की व्यवस्था की जावेगी....।
हतस्तंभ खड़ा अतुल... मुंह से बोल ही नहीं फूटे....। आंखों के सामने बाबूजी का रोबीला चेहरा बार-बार आने लगा....। कानों में गूंजने लगा ‘‘वाणिज्ये वसतु लक्ष्मी’’ ... अपना भविश्य देखो.... अपने भाइयों की ओर देखो.....।
बिलख उठा अतुल ‘‘बाबूजी.... आपकी ही बात मानूंगा..... लौट आइये.... इस तरह हमसे नाराज होकर.... क्यों चले गये ?’’
पड़ोसी कमल काकू ने आकर कंधे पर हाथ ‘‘संभालो खुद को अतुल.... बाबूजी.... का क्रिया कर्म करना है, उनके अधूरे कामों को तुम्हीं लोग तो पूरा करोगे.... इस तरह अधीर होने से कैसे चलेगा....।’’ अतुल कैसे समझाये.... किसे समझाये कि बाबूजी उससे नाराज होकर चले गये.... अपनी बात कहने का मौका भी नहीं दिये....।
शोर उठा.... गाड़ी आ गई.... रास्ता दो.... हटो.... तुलसी मंच के पास बाबूजी को लिटाया गया.... सर्वांग सफेद चादर से ढंका हुआ था.... प्रबल प्रतापशाली बाबूजी.... आज जमीन पर लेटे हुये थे.... खामोश.... हो गये हैं.... अब उनकी आवाज कभी सुनाई नहीं देगी....। अतुल सोच रहा था मृत्यु निर्मम सत्य है.... प्रिय से प्रिय व्यक्ति की मृतदेह को भी लोग यथाशीघ्र... विदा कर देते हैं....।
यथा समय.... श्मशान यात्रा प्रारंभ हुई.... बाबूजी को कंध देते समय.... अतुल ने मन ही मन कहा- ‘‘बाबूजी.... मेरी fचंता मत कीजिएगा.... जानता हूँ मेरे बड़े भाइयों को प्रतिश्ठित कर गये हैं आप... छोटे बेटे की ही आपको fचंता थी..... आपकी परलोक यात्रा निश्चिन्त निर्विघ्न हो.... वचन देता हूँ कि आपके आदेश का पालन करूंगा.... एम.बी.ए. अथवा इंडस्ट्रीयल मैनेजमेंट का कोर्स करूंगा.... यही मेरी श्रद्धांजलि होगी....।’’
अंत्येश्टि सम्पन्न हो गई.... दशगात्र आदि भी निपट गया.... रिश्तेदार भी अपने घरों को लौट गये....। संसार अपनी गति से चलता है.... कोई जाये .... किसी के न रहने से जीवन तो रूकता नहीं....।  सब अपने अपने कामों में लग गये....। अतुल ने अधलिखे उपन्यास को देखा.... याद आई वृद्ध महिला की.... अतः स्टेशन की ओर चल पड़ा.... वहां पहुंचकर दो तीन चक्कर प्लेटफार्म के लगाये पर हिना बेगम उर्फ वृद्ध महिला कहीं नहीं दिखी....। हारकर चाय की दुकान पर गया पूछने पर पता चला बुढिया मर गई हफ्ते भर ऊपर हो गया....।
चाय वाले से पूछा- ‘‘कैसे मर गई ?’’ जवाब मिला- ‘‘बूढ़ी हो गई थी.... रात में ही मर गई थी.... सुबह लोगों ने देखा.... सत्कार समिति वालों ने दाह कर्म सम्पन्न कर दिया....।’’
अतुल बोलना चाहता था वो तो मुस्लिम महिला थी उन्हें तो दफनाना चाहिए था.... पर अब कहने से कहने से कोई लाभ तो था नहीं.... फिर मृत-शरीर तो मिट्टी है.... उसे दफनायें या....जलायें... लाश का तो कोई धर्म होता नहीं.... अतुल को लगा कान के पास कोई फुसफुसा रहा है ‘‘चाय पिऊंगी....।’’ प्लेटफार्म के नीम पेड़ के पास आया अतुल.... वहां कोई अन्य भिखारिन बैठ थी....। ऐसा लगा कि हिना बेगम कह रही है ‘‘ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता, गर और जीते रहते, यही इंतजार होता...।’’
अतुल के जीवन में मृत्यु से परिचय पाने का यह पहला अवसर था... बाबूजी और हिना बेगम.... इनकी मृत्यु ने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी.... इसे कोई कभी समझ नहीं सकेगा....।
एक और मृत्यु हुई है जिसकी जानकारी सिर्फ अतुल को है.... वह है अतुल के साहित्यकार बनने के सपने की मृत्यु....। चलो आज उसका भी अंतिम संस्कार हो ही जाये....। म्लान हंसी-हंसकर.... अतुल ने... अध लिखे उपन्यास के पन्ने इकट्ठे किये.... बैग कंधे पर रख.... स्कूटर लेकर.... चल पड़ा.... पहले तो सोचा.... नदी में विसर्जित कर दे.... हिना बेगम की कहानी.... को प्रकाशित करना ही होगा.... वही मेरी श्रद्धांजलि होगी....।
स्कूटर मुड़ गई ज्ञानरंजन वाजपेई के घर की तरफ....। स्कूटर खड़ी कर नौकर से मालूम किया वाजपेई जी घर पर हैं.... अतुल की आवाज पहचानकर वाजपेई जी ने पुकारा- ‘‘अरे कहां थें भाई.... और हां उपन्यास का काम कहां तक कमरे में आकर एक सोफे में धंस गया अतुल..... थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला- ‘‘वाजपेई जी मुझसे नहीं हुआ.... हिना बेगम से संबंधित बातें इन कागजों को आपकी भाशा मिलेगी तभी सार्थक श्रेश्ठ उपन्यास लिखा जा सकेगा....।’’
अतुल ने ज्ञानरंजन जी की ओर देखा उनकी आंखों में अयाचित दान प्राप्त होने की प्रसन्नता झलक रही था.... कहीं छिपी हुई लोलुपता भी थी- या आतुल का दृश्टिदोश था.... जो हो.... हाथ बढ़ाकर कागज लिये वाजपेई जी ने...., सरसरी नजर देखकर ही समझ गये.... समर्थ कथानक है.... बोले ‘‘उपन्यास लेखन का अनुभव न होने पर लिखा नहीं जा सकता.... वो कोई बात नहीं.... मैं लिख दूंगा.... पर एक शर्त है....।’’ शर्त बताये बिना मौन हो गये, उनकी दृश्टि अतुल को तौल रही थी जैसे....।
‘‘कैसी शर्त वाजपेई जी.... अतुल ने पूछा ।’’ उपन्यास मेरे नाम से छपेगा.... छपने के बाद यदि तुम मुंह खोले.... तो मेरा मान-सम्मान नश्ट हो जायेगा....। गंभीर स्वर में ज्ञानरंजन जी ने कहा। ‘‘निfश्चंत रहिये.... किसी तीसरे को इस बात की भनक भी नहीं लगेगी....।’’ प्रतिश्रुति देकर.... स्वयं को दायित्व मुक्त समझा अतुल ने....।
हिना बेगम के प्रति दायित्व पूरा कर बाबूजी के प्रति दायित्व निभाने चल पड़ा अतुल....।
याद आ रही थी हिना बेगम की....
‘‘अपनी मर्जी से कहां अपने सफर पर हम हैं,
रूख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं....।’’

सत्यं वद 


अनेक कहानियाँ सुनी-पढ़ी होंगी आप लोगांे ने.... राजा रानी की, सौतेली मां की, लोभी ब्राह्यण की, चांद तारों की.... प्रेम प्रीति की.... सभी कहानियाँ किसी आदमी द्वारा ही लिखी जाती है, किसी और आदमी के बारे में, अपने बारे में अपने बारे में सोलहों आने सच लिखना बड़ा कठिन है कारण आदमी दूसरों से ही नहीं डरता..... अपनी कमजोरियाँ उजागर न हो जाये इसलिए खुद से भी डरता है बल्कि यह कहूँ.... खुद से ही ज्यादा डरता है तो.... गलत नहीं होगा.... उहूँ और भूमिका नहीं शुरू ही कर देती हूँ... तो.... सुनिये.... पढ़िये....।
मैं हूँ काली.... डरिये मत काली कलूटी नहीं हूँ.... यथेश्ट गोरा रंग है.... गोल मुँह.... आँखें शहद के रंग की.... फबने लायक नाक.... fकंचित संकरा माथा... बाल गाढ़े भूरे पर घने लंबे हैं.... सामान्य तौर पर सुंदरी ही कह सकते हैं। सरकारी स्कूल में पांचवी कक्षा तक पढ़ी हूँ.... तब मेरा नाम पुकरा जाता था कल्याणी.....। लोगों की बुरी नजर से बचाने के लिए दादी ने काली कहना शुरू किया.... और आज तो ये हाल है कि मैं कल्याणी नाम को भूलने लगी हूँ।
स्कूल की बात चली तो याद आई दुबे बहिन जी..... करूणा....दुबे.... संस्कृत पढ़ाती थीं....। उन्हीं ने पढ़ाया था- ‘‘सत्यं वद प्रियं वद’’ सच बोलो.... प्रिय बोलो... याद कर लिये.... परीक्षा में लिखकर पास भी हो गये.... अर्थ तो समझे ही नहीं....।
हाँ तो कहानी शुरू होती है दस साल पहले से.... तारीख तो याद नहीं, हमारी वार्शिक परीक्षा खत्म हो चुकी थी.... रंगों का त्यौहार होली आने वाली थी... पास पड़ोस के बच्चे अतिरिक्त उत्साहित थे.... इस साल की होली निश्चन्त होकर मनायेंगे वरना परीक्षा के बीच में होली आती है तो.... रंग.... मिठाई कम बड़ों की डांट फटकार ही ज्यादा मिलती है....।
होलिका दहन के लिए सूखी लकड़ियां बटोरी जा रही थीं... तो आपस में चंदा इकट्ठा करके रंग, गुलाल और प्रसाद के लिए बूंदी का भी इंतजाम किया जाना था....। कुछ पैसे कम पड़ रहे थे तो हम सहेलियों ने तय किया कि दुबे बहिन जी से मांग लेते हैं.... वो ना नहीं करेगी यह विश्वास हमें था.... चल पड़े दुबे बहिन जी के घर.... दरवाजा खुला हुआ था....बेहिचक अंदर चले गये.... बैठक कमरे में कोई नहीं था.... इधर झांकने लगे.... कि बहिन जी की आवाज सुनाई- ‘‘निकल जाओ मेरे घर से.... तुम्हारी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि घर तक चले आये....।’’
‘‘हिम्मत की न पूछो मैडम जी.... सारा गांव हमारे नाम से थर्राता है... रही घर आने की बात....  तो आये हैं.... तो कब की लगन निकलवायें....?’’ लड़खड़ाती सी आवाज थी, पहचान में नहीं आ रही थी..... हम तीनों सहेलियाँ.... चुप खड़ी थीं.... क्या करें.... वापस चल दें..... या दूसरे कमरे में जायें....? हममें सोनी सयानी थी हम दोनों का हाथ पकड़ कर बाहर चलने का इशारा की... मुड़ने ही वाले थे कि किसी भारी चीज के गिरने की आवाज आई साथ ही साथ.... चीख भी सुनाई दी.... ‘‘मर गया रे....।’’ अब तो रहा नहीं गया सो तीनों दौड़कर बरामदा पार किये.... दरवाजे पर एक आदमी पड़ा था.... बहिन जी आंखे फाड़े-पागलों की तरह उस आदमी को देखे जा रही थीं....। डूबते को तिनके का सहारा शायद इसी इसी को कहते हैं.... हमें देखकर झपटती हुई बहिन जी बाहर आई..... ‘‘सोनी, काली.... इसे उठाने में मेरी मदद करो’’ बोली....। किसी तरह उसे उठाये..... सिर चौखट से लगा था, चोट गहरी थी शायद... तभी पूरा चेहरा खून से तरबतर हो रहा था.... अब की बार हमने पहचाना.... ये तो बल्लू भइया हैं...। मंदिर के पास इनका घर है....। मारे डर के हाथ पांव फूल गये... बहिन जी पानी ले आई... चेहरे को गीले कपड़े से पोंछ कर.... गिलास उसके मुंह से लगा दिया...। शायद होश आ गया था... विचित्र नजरों से हम सबको देखे.... और उठकर खड़े हो गये....।

जाने के लिए मुड़ते हुए बोले.... ‘‘तुमने अच्छा नहीं किया मैडम... बल्लू से दुश्मनी.... बहुत मंहगी पड़ेगी तुम्हें.... बल्लू जो चाहता है.... न पाने पर.... छीन लेता है.... नहीं मिली... तो बल्लू इतना तो कर ही देता है कि बह चीज किसी और के लायक नहीं रह जाती।’’ खंूखार निगाहों से हम सबको देखते हुए... बल्लू भइया चले गये....।
हम लोगों को ज्यादा कुछ समझ में नहीं आया... हाँ इतना अवश्य लगा कि बहिन जी और बल्लू भइया में किसी बात पर लड़ाई हो गई है.... । इसके पहले भी कई बार बल्लू भइया को स्कूल आकर बहिन जी से बातें करते देखे थे.... पर तब लड़ाई झगड़ा नहीं होता था.... हाँ बहिन जी परेशान सी दिखती थी.....। चंदे की बात तो हम भूल ही चुके थे.... बहिन जी ने हम लोगों की ओर देखकर कहा- ‘‘अभी तुम लोग जाओ..... जो पूछना है.... कल स्कूल में आ जाना.....।’’
हम भी.... वापस आकर.... अपनी तैयारियों में जुट... बचपन होता ही ऐसा है.... जब हंसी-खेल के अलावा कुछ सूझता ही नहीं.... दूसरी बात विद्यार्थियों के लिए उनका शिक्षक सर्वगुण संपन्न, बलशाली व्यक्ति होता है.... इसीलिए हमने सोचा ही नहीं कि बहिन जी पर कोई जी पर कोई विपत्ति भी आ सकती है.... हिम्मती हैं तभी तो इस तरह बल्लू भइया को गिरा दी थीं....।
होली.... हो.... ली । खूब हुड़दंग मचाये.... रंग खेले.... फिर सब शांत....।
तकरीबन दस बारह दिनों बाद.... सुबह.... मां की डांट शुरू ही हुई थी कि..... उठो.... दिन चढ़ आया..... आदि-आदि कि मां की सहेली पड़ोसन रानी काकी..... आई.... मां का हाथ पकड़कर बरामदे के कोने में ले गई.... बड़ी देर तक दोनों खुसफुल करती रहीं..... चाहकर भी मैं कुछ सुन नहीं पाई.....। बड़ों को भी हम बच्चों की तरह गुपचुप बातें करने की जरूरत पड़ती है.... देखकर हंस पड़ी..।
‘‘खी-खी-क्या कर रही है....मुंह धो.... चाय पीकर.... घर का काम देख.... खबरदार जो घर से बाहर निकली.... मैं अभी आती हूँ...’’ कहकर मां तो चल दी...। मुझे बड़ा गुस्सा आया जब देखो मुझे डांटती रहती हैं, दोनों भाई मुझसे बड़े हैं उनको कभी कुछ नहीं कहतीं.... बड़ी आई.... बाबूजी के सामने तो चलती नहीं.... वो तो मुझे ही प्यार करते हैं.... हाट-बाजार से आते समय सिर्फ मेरे लिए.... चीजें लाते हैं.... रानी बिटिया कहकर दुलारते हैं....। हुंह.... मुझसे कहती हैं घर से बाहर कदम न रखूं और खुद बाहर चली गई.... उसका क्या....?
घर का काम निबटाते-निबटाते सोच रही थी.... ऐसा कौन सा जरूरी काम था कि  सुबह-सुबह रानी काकी मां को बुलाने आई था।.... कहीं उनकी धौंरी गाय ने बछड़ा तो नहीं जनमा.... या फिर रमजू काका.... रात में आये होंगे....कारखाने में नौकरी करते हैं न... छुट्टी मिलने पर ही आते हैं... हां यही बात होगी.... जरूर काका-काकी के लिए.... नई साड़ी लाये होंगे जिसे दिखाने मां को बुला ले गई.... पर यह तो कान में फुसफुसाकर कहने वाली बात नहीं है....परेशान हो गई.... तो आंगन में झाडू लगाने लगी .... अभी आधा आंगन ही झाड़ पाई थी कि हांफते दौड़ते सोनी और माला आई.... उन्हें कुछ कहती इसके पहले ही माला ने मेरे हाथ झाडू छीनकर फेंक दिया.... सोनी.... रो रही थी.... क्या हुआ पूछने पर बताई ‘‘दुबे बहिन जी को किसी ने मार डाला.... उनके घर पुलिस आई है.....।’’
बाप रे....। दुबे बहिन जी तो इतनी अच्छी थीं.... सबसे हंसकर बात करती थीं.... कभी गुस्सा भी हुई तो कक्षा के बाहर कान पकड़कर खड़े रहने को बोलती थीं... किसी को मारती नहीं थीं।
उन्हंे किसने मारा.... और क्यों....?
अचानक याद आया रानी काकी मां से बातें करते हुए.... हाथ उठाकर बहिन जी के घर की ओर ही इशारा कर रही थीं.... तभी दोनों.... वहां चली गई....पर इस बात को हम लोगों से छुपाने की क्या जरूरत थी? वाह रे.... दुबे बहिन जी तो हमारी बहिन जी थीं.... हमें जाना चाहिए.... सो नहीं.... खुद ही चले गये.... ये बड़े लोगों की बातें समझ पाना हम बच्चों के लिए कठिन है....।
सोनी और माला मेरा हाथ पकड़ खींचने लगीं.... घर का दरवाजा बंद कर सांकल चढ़ा दी... ये न करती तो.... वापसी में मां की मार खाती....।
बहिन जी के घर के सामने सारा गांव इकट्ठा था.... शोर इतना कि कुछ सुनाई नहीं दे रहा था... भीड़ में घुसकर बहिन जी तक पहुंचना कठिन था....। आखिर तीनों एक दूसरे का हाथ पकड़ा... लोगों को हाथों से ठेलते... किसी तरह.... आंगन तक पहुंच ही गये.... आंगन के बीचों बीच.... सफेद कपड़े से ढंकी जमीन पर बहिन जी लेटी थीं....। मुंह भी ढांक दिये थे...।
कहां चोट लगी है.... यह जानना कठिन था... कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था...।
पुलिस वाले.... लोगों से पूछताछ कर रहे थे.... कोई कुछ बता नहीं पा रहा था । बहिन जी तो अकेली रहती थी न.... उनके वाले तो दो स्टेशन बाद के शहर धामनपुर में रहते थे....।
आखिर सरपंच दादाजी ने पुलिस आॅफिसर से कहा- ‘‘जिन बच्चों को वे पढ़ाती थीं उनसे भी पूछ लिया जाये.. शायद उनमें से कोई बता सके कि करूणा दुबे का किसी से कोई लड़ाई-झगड़ा था या नहीं..?’’
समस्या यह थी कि स्कूल तो अभी बंद था... माने- परीक्षा हो चुकी थी रिजल्ट आने के बाद ही तो बच्चे स्कूल आयेंगे....।
स्कूल में घंटी बजाने वाली बाई फूलमती ने चिल्लाकर कहा- ‘‘ये तीनों भी तो बहिन जी की कक्षा में पढ़ती थीं.... इन्हीं से पूछ लीजिए....।’’ हम तीनों एक दूसरे का मुंह देखने लगीं.... पुलिस वाला हमारी ओर ही आ रहा था.... कुछ समझते इसके पहले सोनी और माला के पिता जी भीड़ को चीरते हुये आगे बढ़े- पलक झपकते अपनी-अपनी बेटी का हाथ पकड़ कर... चल दिये... मुझे समझ में ही नहीं आया... अचानक... दोनों को क्यों ले गये...।
मैं अपनी जगह पर खड़ी थी.... कि पुलिस आॅफिसर ने खुद ही पास आकर मेरे सिर को सहलाया फिर पूछा- ‘‘बोलो बेटी ! तुम्हारा नाम क्या है.... किस कक्षा में पढ़ती हो....।’’ अरे ! पुलिस डरावने नहीं होते.... देखो कितने प्यार से बात कर रहे हैं.... चटपट बोली- ‘‘मेरा नाम काली है.... नहीं कल्याणी है मैं कक्षा पांचवीं की परीक्षा दी हूँ....।’’
बड़े अच्छे थे पुलिस आॅफिसर.... फिर पूछे- ‘‘हां ! तो बताओ.... तुम्हें कौन पढ़ाती थी....?’’ मैं बड़े गर्व से बोली- ‘‘करूणा दुबे बहिन जी ही तो हमें पढ़ाती थीं... बहुत अच्छी थीं.... कभी किसी को नहीं मारती थीं.... हां.... अब आई रूलाई....। मेरे आंसुओं को पोंछकर फिर पूछा उन्होंने ‘‘ हाँ.... अच्छी बहिन जी के साथ कभी किसी की लड़ाई हुई थी क्या.... याद करके बताओ तो बेटा.... तुम तो होशियार बच्ची हो.... अच्छी तरह याद करो....।’’’’
होली वाली, चंदा मांगने जाने वाली- सब बातें याद आई.... बल्लू भइया का खून से सना चेहरा.... चीख चीखकर..... बहिन जी का धमकाना.... सब याद आ गया....। डर भी लगा.... सब बातें बता दूँगी तो बल्लू भइया.... मुझे मारेंगे.... छोड़ेंगे नहीं.... उनके साथ तो.... और भी कई लोग रहते हैं.... गंदे काम करते हैं वे लोग..... बीड़ी पीते हैं, लड़ाई झगड़ा करते हैं.... इतने बड़े हो गये हैं सब के सब.... फिर भी स्कूल नहीं जाते....। मां कहती है ये आवारा छोकरे हैं.... निठल्ले.... भाइयों से कहती हैं इन लोगों से कभी बातचीत न करें....।
सरपंच दादा जी ने कहा- ‘‘बोला बेटी डरो मत- तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा....।’’
अचानक भीड़ के बीच खड़ी मां दिखी.... वो मरी ओर ही देख रही थी उनकी आंखों में भी आंसू थे.... सिर हिलाकर... मुझे मना कर रही थी..... ऊंगली को ओठों पर रखकर चुप रहने का इशारा कर रही थीं....।
पर.... बहिन जी ने तो कहा था- ‘‘संत्य वद....।’’ साहस करके उस दिन की घटना बताई.... बल्लू भइया का नाराज होना....  बहिन जी का घर से निकल जाने का कहना.... सब....।

चुप होने पर देखी.... मां अपनी जगह पर खड़ी दोनों हाथों से सिर पीट रही है...। इस बार मुझे घर जाने को कहा गया.... घर की ओर थोड़ी दूर ही बड़ पाई थी कि माँ आ गई.... लगभग खींचते हुए... घर ले आई.... तब तक बाबू जी भी पहुंच चुके थे.... पहली बार.... बाबू जी ने मेरे गाल में चांटा मारा मेरे कंधों को पकड़ झकझोरने लगे.... अरे ओ सत्यवादिनी ! ये क्या किया तुमने ? खुद ही अपने सर्वनाश को न्यौता दे आई....। मां बाबूजी एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगे.... मुझे समझ में नहीं आ रहा था.... सच बोलना तो अच्छी बात है तभी तो स्कूल में सिखाया जाता है अरे ! सत्यवादी राजा हरिश्ंचद्र, धर्मराज युधिश्ठिर, महात्मा गांधी इनकी कहानियाँ.... बाल भारती में छपी तो हैं....। हम लोग पढ़ते भी तो हैं।
दूसरे दिन बाबूजी एक रिक्शा बुला लाये- रिक्शे का पर्दा खींच दिया और मुझे लेकर बैठ गये.... कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.... बाबूजी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी.... कहीं फिर मार खानी पड़ जावे....। रिक्शा रूका तो बाबू जी ने रोते हुए कहा- ‘‘काली ! आज की बार.... थाने में कहना.... घर में अंधेरा था... जिस आदमी के सिर से खून बह रहा था उसका चेहरा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था.... मुझे वो बल्लू भइया जैसे लगे.... सचमुच में वो बल्लू भइया थे या कोई और मैं नहीं जानती....। कहोगी न बेटी.... ?’’
चुप ही रही मैं.... थाने में एक कुरसी पर मुझे बिठाया गया.... बाबूजी को भी बैठने कहा.... पर वे हाथ जोड़े खड़े रहे.... सुबह वाला पुलिस आॅफिसर कमरे में आया, बाबू जी ने उनके पैरों पर सिर रख दिया.... बड़ी मुश्किल से सिर उठाकर रोते हुए बोले- ‘‘साहब ! काली छोटी सी लड़की है.... कुछ जानती समझती तो है नहीं.... बल्लू इसे नहीं छोड़ेगा.... लड़की की जात.... कुछ ऊंच नीच हो गया तो.... सारी fजंदगी नरक भोगेगी....।’’ साहब बोले- ‘‘लड़की ने सच ही तो कहा है.... डरने की क्या बात है.... फिर हम लोग तो हैं....।’’
तड़प उठे बाबूजी- ‘‘साहब ! आप लोग कहां तक, कब तक बचायेंगे..... आपकी भी बेटी होगी... उसका वास्ता देता हूँ.... नाबालिग लड़की है.... शाम का धुंधलका था... कमरे में भी अंधेरा ही था.... चेहरा खून से तरबतर.... लड़की ठीक-ठीक पहचान नहीं सकी.... डर भी गई थी... बल्लू को पहले बहिन जी से बात करते देखी थी इसलिए.... उसी का नाम ले दी.... । लड़की को बचाइये साहब... वे लोग बहुत खतरनाक किस्म के समाज विरोधी लोग हैं।’’
कृतज्ञता से भरकर बाबूजी बार-बार साहब के पैर छूने लगे.... मुझे भी पैर छूने का इशारा किये.. । साहब ने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फिराया ‘‘जाओ बेटी ! डरने की जरूरत नहीं है.... घर जाओ... ‘‘ बोले....।
मोड़ पर रिक्शा पहुंचा ही था कि काले कपड़े से मुंह ढांके तीन चार लोगों ने रिक्शे को घेर लिया.... बाबू जी चिल्लाते रहे वे लोग मुझे.... मोटर साइकिल में बिठाकर ले चले.....।
कहानी खत्म हो गई.... थोड़ा और धीरज धरिये.... मैं तो आप लोगों को कहानी सुनाना चाहती थी.... पर नहीं सुना सकती.... इसीलिए लिख रही हूँ आप लोग पढ़ लीजिएगा । आप पूछेंगे सुना क्यों नहीं सकती ?.... क्योंकि मैं बोल नहीं सकती....। हाँ.... आज से दस साल पहले उस काली रात को मुझे जीवनदान तो मिला बदले  में वाणी छीन ली गई....। गूंगी हो गई....।
काले नकाबपोशों ने मेरे हाथ पैर पकड़ लिए.... बल्लू भइया को देखी.... उनका मुंह खुला था... आंखे गुस्से से लाल हो रही थी.... उन्होंने.... मेरा मुंह खोला... तेज चाकू से मेरी जीभ काट दी.... खून से नहाने लगी.... आखें खुलीं तो सिरहाने मां बैठी थी बाबूजी... पैताने सिर झुकाये बैठे थे.... दोनों रो रहे थे....।
मैं.... उन्हें पुकारना चाहती थी.... बाबू जी मां पर मुंह से.... गों गों की आवाज ही निकल रही थी.... दर्द से जान निकली जा रही थी....। अब मैं सत्यं वद बोल नहीं सकती इसीलिए लिखती हूँ, खुद से वायदा किया है सत्यं लिख....।


प्रतीक्षा


शहर से तीनके किलोमीटर की दूरी पर नई काॅलोनी बनी है।.... यूं तो काॅलोनी मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वालों के लिए ही बनायी गयी.... आवासीय योजनान्तर्गत बने मकानों की तरह ही है... सच कहूँ.... तो इन काॅलोनियों को देखकर नयन सुख में कमी ही हो जाती है.... कारण है की सभी मकान एक जैसे ही होते हैं.... खिड़की दरवाजों की साइज व संख्या भी एक समान....आकार प्रकार भी समान.... विविधता तो.... थोड़ी देर से ही होता है और तब काॅलोनी.... मुहल्ले में सहज प्रेम.... ।
हाँ तो जिस काॅलोनी का परिचय दिया है उसका नामकरण किया गया है बसन्त विहार... पहली बार तो नाम सुनते ही मैं हंस पड़ी थी.... जिस जगह 80 प्रतिशत लोग अवकाश ग्रहण कर चुके हैं..... उनके करीब आने का दुस्साहस बसंत कभी नहीं करता.... ऐसे में नाम की सार्थकता.... कहां है बल्कि विद्रूपता ही दिखाई देती है। बसंत विहार के एम.आईजी. नं. 235 में सद्यः अवकाश ग्रहण कर रहनें आये थ रमानाथ शुक्ला और उनकी रमा यानि उनकी धर्मपत्नी तारिणी देवी....।
नियमित दिनचर्या, संतुलित खान-पान, बच्चों के साथ दिन गुजारने वाले, सदैव प्रसन्न रमाकांत स्पृहणीय स्वास्थ्य के अधिकारी हैं, उनकी सतर देह, सधे कदमों वाली चाल अभी भी युवकोचित ही है.... पर समय तो अपना काम करता है अतः प्राचार्य पद से निर्धारित समय अवकाश मिल गया....। बागवानी और अध्ययन जैसे रोचक कामों के लिए अब जाकर समय मिला है तो इस समय का भरपूर सदुपयोग करते हैं एक नया काम और जुड़ गया है इन दोनों के साथ वह है.... बच्चों की प्रतीक्षा....।
वो जो बरामदे में कुर्सी डालकर बैठी भद्र महिला गुनगुनी धूप का आनंद ले रही है..... हाँ.... वही हैं तारिणी देवी.... सामान्य कद.... मोटापे की ओर झुकता शरीर.... गंगी जमुनी बालों के बीच मोटी गाढ़ी सिंदूर रेखा..... माथे पर दरदप करती गोल fबंदी.... ओठों पर तृप्ति की मुस्कान, गले में सयत्नं पहना मंगलसूत्र, कलाईयां लाल चूड़ियों से भारी... सौम्य दर्शना प्रौढ़ा हैं.... बिटिया को ससुराल भेज चुकी उसकी ओर से निश्चित है, एक मात्र बेटा मुंबई में है अच्छी तनख्वाह पाता है  सुंदर बहू है.... हाँ.... पोते की याद बहुत आती है । उसके बाल सुलभ प्रश्नों का उत्तर देते-देते खीझ जाती हैं फिर भी उसी की प्रतीक्षा करती रहती हैं।
आज खुश है तारिणी.... देख रही है रमाननाम जी भी बागवानी छोड़कर लग पड़े हैं पोते के साथ.... ‘‘दादाजी आप आॅफिस नहीं जाते क्या ।’’ गोरे गदबदे fमंटू के मुंह से मानो फूल झर रहे थे उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में अपार कौतूहल है.... हंसकर दादाजी ने कहा - ‘‘आॅफिस ने मुझे छुट्टी दे दी है न..।’’
‘‘वाह ! तो क्या दादी के आॅफिस की भी छुट्टी है.... वो भी तो घर में ही है....।’’ अगला प्रश्न था fमंटू बाबू का....।
बड़ा मजा आया... तारिणी को छेड़ने का सुनहरा मौका गंवाना नहीं चाहते थे शुक्ल जी तत्काल बोले- ‘‘अरे वाह ! ये तो तुम दादी से हो पूछो ।’’
पोते के लिए स्वेटर बुनने में लगी थीं तारिणी.... बस हो ही गया.... जरा एक बार नापना चाहती थी ताकि सिलाई कर सकें.... तिरछी नजर से तक बार चिरपरिचित कौतुक प्रिय पति को देखकर बोली- ‘‘fमंटू तुम्हारे का जवाब तो तुम्हारे दादाजी के पास ही है.... सारा जीवन तो घर संभालने, बच्चे पालने में ही बीत गया....। कभी एम.ए. की थी बी.एड. किया था..... सब.... भूल गई.... हुंह.... नून तेल लकड़ी....।’’
fमंटू क्या समझा क्या नहीं फिर दादाजी से पूछा- ‘‘आपको आॅफिस से छुट्टी क्यों दे दी.... मेरे पापा तो रोज आॅफिस जाते हैं.... देर घर आने पर.... मम्मी डांटती है....।’’
तारिणी बुदबुदाई ‘‘बाप के उन तो डांटने का कभी असर नहीं हुआ तो बेटे पर क्या होगा ?’’ सुन तो लिया था रमानाथ जी ने तुरंत बोले- ‘‘दया करके अपना अनुभव अपनी बहू को सुना देना..... ताकि मनीश को मेरे समान रोज रोज.... हलाकान होना न पेड़.... वैसे अलका समझदार लड़की है....।’’
‘‘हाँ.....हाँ..... नासमझ तो एक मैं ही हूँ.... भूलिये मत कि आपके बच्चों पढ़ा लिखाकर यहाँ तक इस नासमझ ने ही पहुंचाया है.... आपको तो यह भी याद नहीं रहता था कि बच्चे कब कौन सी परीक्षा दे रहे हैं।’’ आवेश में आ गई थी तारिणी । fमंटू तारिणी के हाथ के स्वेटर को छूकर बोला- ‘‘दादी..... सुंदर स्वेटर है..... दादाजी के लिए है न..... मेरी मम्मी मेरे लिए स्वेटर नहीं बनाती....।’’
दुलार से भरकर दादी बोली- ‘‘ये स्वेटर मेरे fमंटू के लिए है.... देखूं तो फिट बैठता है नहीं....।’’ खुश होकर ताली बजाने लगा fमंटू..... दादाजी की ओर गर्व से देखकर कहा- ‘‘आपके लिए स्वेटर नहीं है.... मेरे लिए है.... कितना सुंदर है न....?’’
छोटी-छोटी बातें बच्चों को कितनी खुशी देती हैं ?.... उनकी खुशी से हम बड़े भी अछूते नहीं रहते.... ये खुशियां ही तो जीवन को गति देती हैं वरना.... दिन.... पहाड़ हो जाता है.... वक्त काटना कठिन हो जाता है.....।
उन्हें गुमसुम देख तारिणी बोल उठी- ‘‘क्यों.... पोते से जलन हो रही है..... चलिये आपके लिए भी फुल स्वेटर बना ही देंगे....।
fमंटू गंभीर होकर बोला- ‘‘ऊहूँ.... आप मेरी दादी हैं, मेरे लिए स्वेटर बनायेंगी.... दादू.... इस्स दादाजी की दादी थोड़ी हैं....।’’
वाह ! कितनी सहजता से दादा जी जैसे भारी भरकम शब्द को दादू में बदल दिया fमंटू ने.... वैसे भी दादाजी सुनने से रमानाथ खुद को खांसते-खंखारते बूढे़ के रूप में देखना पंसद नहीं करते.... दादू.... बड़ा मीठा लगा.... प्यारा संबोधन.....।
रूप में देखना पंसद नहीं करते....दादू.... बड़ा मीठा लगा.... प्यारा संबोधन....। लगता है fमंटू के पास सवालों का खजाना है.... पूछ बैठा’’आप मेरे साथ खेलेंगे- दादू.... छोटी सी जीभ बाहर निकल आई धीरे से बोला इस्स....।’’
fमंटू को अपनी ओर खींच उसके गाल के नाक घिसते हुए बोले रमानाथ ‘‘fमंटू.... तुम दादू ही कहो.... दा-दा जी.... ऊहूँ इससे दादू अच्छा लगता है.... हाँ खेलने की बात कह रहे थे.... चुलो...लुकाछिपी खेंले....।’’
बड़े बूढ़ों की तरह सिर हिलाकर असहमति जताते हुए fमंटू ने अपना फैसला सुनाया- ‘‘अच्छे बच्चे लुकाछिपी थोड़े न खेलते हैं ? घर का सामान इधर-उधर हो जाता है फिर ठोकर खाकर बच्चे गिर भी तो जाते हैं न.... अच्छा दादी.... दादू कुछ नहीं जानते क्या ?’’ सुनते ही दादी निहाल गई छोटे से fमंटू ने उनको बड़ा सा प्रमाण पत्र जो दे दिया..... समझदारी का प्रमाण पत्र.... जो आज तक किसी ने नहीं दिया....। गद्गद् होकर बोली- ‘‘अब तुम आये हो न.... दादू को कुछ सिखाओ.... देखो न.... हेलीकाॅप्टर, म्यूजिकल गाड़ी, रोबोट, ट्रामटेन सब तो हैं तुम्हारे दादू को इनसे खेलना नहीं आता....।’’ वर्शों पूर्व, पीछे छूट गया दाम्पत्य मानों fमंटू के साथ लौट आया था..... वयस्का तारिणी.... अनुराग भरी, सोहागसनी दृश्टि से रमानाथ की ओर देखने लगी..... स्न्नेह की ऊश्मा रमानाथ तक पहुंची.... सालों बाद मीठे-पल छिन उनके जीवन में लौट आये थे सच.... बच्चों के साथ बच्चा बन जाना भी कितना सुखद होता है। जीवन के सारे उत्तरदायित्व पूरे करने के बाद.... अवकाश के इन क्षणों में किसी बच्चे का साथ.... ऊर्जा से भर देता है, प्राण-खिल उठते हैं.....। बुढ़ापा.... सार्थक लगने लगता है.... पर कितने दिनों की है यह सार्थकता... fमंटू.... इनं सारी खुशियांे को समेटकर चल देगा.... फिर वही सूनापन.... दो बूढ़े बूढ़ी.... बीते दिनों को याद करते.... दिन काटने को यहाँ रह जायेंगे....।
आधुनिक जीवन शैली ने आदमी को बहुत पैसा दिया है.... सुख दिया है ऐशो-आराम की कमी नहीं है..... पर संयुक्त परिवार टूट गया है। रोजी-रोजगार के चलते लोग एकल परिवार में सिमट गये हैं.... नुकसान हुआ है अवकाश प्राप्त-बूढ़े माता-पिता का, इस उम्र में उन्हें नाती पोतों का साथ चाहिए.... थोड़ी सी देखभाल चाहिए.... अपनों का संरक्षण चाहिए और इनकी कमी.... पैसों के बल पर पूरी नहीं की जा सकती..... पैसों से नौकर तो रखे जा सकते हैं..... उनसे सेवा भी कराई जा सकती है.... पर अपनों का स्न्नेह, सम्मान.... आत्मीयता..... इनकी कमी कैसे पूरी हो सकता है ?
‘‘दादू-दादू.... देखो.... दादी का रोबोट चित्त हो गया.... मेरा रोबोट शान से खड़ा है.... हार गई ताली बजाते हुए fमंटू उछल रहा था....।’’
‘‘हाँ fमंटू.... मैं हार गई, मेरा रोबोट बूढ़ा हो गया है न..... कहते-कहते तारिणी की आंखें भर आई.... आसन्न एकाकीपन..... उसकी आंखों से झरने लगा था... रमानाथ आहत हुए..... झट से गिर गये रोबोट को उठाकर खड़े कर दिए..... तारिणी की पीठ पर सान्त्वना भरी थपकी देते हुए fमंटू से बोले’’ fमंटू बाबू.....तुम्हारी दादी का रोबोट..... हारा थोड़े ही है..... ये देखो फिर खड़ा हो गया.... जब तक तुम्हारी दादी साथ देगी.... रोबोट हारेगा ही नहीं....।’’
हाँ.... बड़ी से बड़ी मुश्किल आ पड़ने पर भी रमानाथ हारते नहीं..... तारिणी को संभालते रहे हैं.... बच्चों के चले जाने से तो तारिणी बिखर ही गई थी..... पति के साथ ने ही तो उन्हें बिखराव से बचाया है.... चुपके से.... उन सुदृढ़ हाथों को छू लिया.... हल्का सा स्पर्श कितना अर्थपूर्ण होता है कि कुछ कहने सुनने की आवश्यकता नहीं रहती..... सुदीर्घ दाम्पत्य स्पर्श की भाशा सिखा देता है।
  (2)
यूं भी खुशियों की मियाद कम ही होती है बादलों भरे दिन में दिख गये धूप के टुकड़े की तरह....। कल बेटे बहू वापस मुंबई चल देंगे.... इस बार उनका जाना ज्यादा साल रहा है.... क्यों ? शायद उनका नहीं..... fमंटू का जाना.... साल रहा है.... बड़े बूढ़े कहते हैं न, मूल से प्यारा ब्याज, बेटे से प्यारा पोता....। तो रमानाथ जी..... अब मान ही लीजिए कि आप बदस्तूर बूढे़ हो गये हैं.....।
‘‘पापा आपसे कुछ जरूरी बातें करनी थीं’’ मनीश दरवाजे पर खड़ा था। रमानाथ जी अपनी सोचों को परे कर मनीश से बोले- ‘‘हां बोलो क्या कहना चाहते हो?’’
थोड़ा हिचकिचाते हुए.... मनीश ने कहा- ‘‘पापा आप ड्राईग रूम में आ जायें सब मिलकर बातें करेंगे..... वहां अलका और मम्मी भी हैं.....।’’ सोच में पड़ गये, रमानाथ, ऐसी क्या बात है ? इतना गंभीर तो मनीश कभी दिखता नहीं..... कही ऐसा तो नहीं कि वो हमें अपने साथ ले जाना चाहता है.... हम यहाँ अकेले पड़े रहते हैं तो उसे दुश्चिन्ता तो होगी.... आखिर इकलौता बेटा है.... खुद भी परिवार वाला हो गया है.... दुनियादारी समझने लगा है.....। नहीं.... इस बार उसे मना नहीं करूंगा.... अब हम साथ ही रहेंगे.... fमंटू से खेलते... उसका होमवर्क कराते शेश दिन बिताना ही ठीक रहेगा फिर तारिणी को भी रसोई पानी से मुक्ति मिलेगी.... सारा जीवन.... बनाती खिलाती आई है.... चार दिन बहू के साथ का खायेगी..... गृहस्थी की झंझटों से मुक्त होकर बहू की सेवा का सुख उठायेगी.... हां.... यहाँ किसके लिये पड़े रहंे.... धीरे-धीरे समवयस्क मित्रों, रिश्तेदारों का आना जाना भी तो कम हो गया है.... हंस पड़े रमानाथ.... इसी को तो सेकण्ड इfनंग कहते हैं....। इस बार अलका बुलाने आई- ‘‘प्लीज पापाजी.... आइये.... रात हो रही है और कल तो चल ही देना है....।’’ रमानाथ जी ड्राइंग रूम में आकर तारिणी के बाजू वाले सोफे पर बैठ गये.... उसकी ओर देखा..... शायद कोई संकेत मिले.... नहीं वो भी अनजान ही थी तभी तो चेहरे पर कोई विशेश भाव नहीं था...।
‘‘अलका तुम बताओ’’ कहकर मनीश ने अलका की तरफ देखा....।
अलका को ससुराल में बेटी की तरह ही समझा जाता है उसकी बात भी मानी जाती रही है और इसकी जानकारी भी उसे है, वो भी जाने क्यों कुछ कहने से हिचक रही थी इसलिए बोली- ‘‘नहीं आप ही कहिये..... मैं अच्छी तरह समझा नहीं सकूंगी.....।’’
ठीक है.... मैं ही बताता हूँ कहकर एक बार मम्मी पापा को देखकर सिर झुकाकर मनीश बोला- ‘‘बात ये है पापाजी कि मुझे मिडिल ईस्ट जाने का मौका मिला है प्रतिश्ठि कंपनी है..... तीन साल के लिए बात हुई है, समय-सुविधा देखकर आगे भी उसी कंपनी में रहा जा सकेगा नहीं तो.... कोई दूसरी अच्छी कंपनी....।’’
बेटे के विदेश जाने की खबरे सुनकर तारिणी देवी तो खुशी से डगमग.... ‘‘भगवान् की कृपा है बेटा.... इसी तरह उन्नति करो..... हाँ तनख्वाह क्या देंगे ।’’ पति गर्व से झूमती अलका ने कहा- ‘‘मम्मी अभी तो.... (कुछ हिसाब लगा कर) .... हा भारतीय मुद्रा में तीन लाख तक देंगे.... आगे काम देखकर बढ़ायेंगे....।’’
‘‘तुम लोग कब तक जाओगे.... पूछा रमानाथ ने । दो महीने तो लग ही  जावेंगे... तब तक यहाँ भी तो बहुत कुछ समेटना है न ? इधर उधर देखते हुये मनीश ने कहा....।’’
‘‘यहां.... यहां क्या समेटना है? हां मुंबई का सामान.... वहीं बेंच बांच देना.... इतनी दूर तक लाने में सामान टूटेगा फूटेगा.... फिर यहाँ जगह भी तो नहीं है... तारिणी देवी ने अपना सुझाव दिया...।’’ रमानाथ जी को लगा बात इतनी सी नहीं है... कुछ ऐसा है जिसे कहने में मनीश को दुविधा हो रही है... उसे प्रोत्साहित करते हुये बोले- ‘‘हाँ- मनीश कोई और बात हो तो.... कहो.... हम तो हैं न....?’’
अलका ने भी पति को उत्साहित किया- ‘‘कहिये न.... आखिर मम्मी पापाजी को भी तो यहाँ का समेटना सहेजना होगा....।’’
चौक गये शुक्ला जी... आखिर क्या सोचा है इन लोगों ने.... उत्सुकता बढ़ने लगी.... तब तक मनीश संभल चुका था बोला- ‘‘पापाजी हम लोगों ने सोचा है कि यहाँ आप लोगों की देखभाल करने वाला तो कोई है नहीं.... हम भी चले जायेंगे.... इतने बड़े घर में आप दोनों.... अकेले.... कुछ हो गया.... तो... इसलिए... आप लोग इस पर को बंेच दें.... रूपया आपके एकाउन्ट में जमा कर देंगे....।’’
बात पूरी नहीं हुई थी कि तारिणी तेज स्वर में बोली- ‘‘क्यों बेच दें ? फिर हम लोग रहेंगे कहाँ ?’’ रमानाथ जी मौन थे.... अंदर तूफान आ गया था.... हड़कम्प मचा हुआ था.... पर अभी कुछ और बचा था अतः सुनाई दिया कह रहा था ‘‘आप लोग’’ ‘सांध्यनीड़’ में रहियेगा- वहाँ आप लोगों की उम्र के लोगों का साथ रहेगा.... सुख दुख पड़ने पर.... सब लोग रहेंगे....। उनके यहाँ नियमित डाॅक्टर आते रहते हैं... अपना अस्पताल है उनका...। आरामदायक आधुनिक सुख सुविधापूर्ण कमरे हैं.... आप लोगों को कोई तकलीफ नहीं होगी....।’’
इस बार रमानाथ जी ने भूकंप का झटका खाया.... सारी सोचें... बेटे बहू के साथ रहने का सपना... चकनाचूर हो गये....।
तारिणी तो रोने बोली- ‘‘हे भगवान् ! यह कैसा बेटा है जो हमारी गृहस्थी उजाड़कर हमें वृद्धाश्रम भेज रहा है.... इसी दिन के लिए इसे पाला पोसा पढ़ाया लिखाया था ?’’
मनीश... चुप सिर झुकाये बैठा था अलका ने बागडोर संभाली’’ आप लोगों के वहां रहने पर हम लोगों को कोई fचंता नहीं रहेगी इसीलिए.... फिर वहां की अग्रिम जमानत राशि पांच लाख तो ये जमा कर देंगे.... आगे भी वहां से रूपये भेजते रहेंगे....।’’
गरज उठे रमानाथ, स्वभाव विरूद्ध आचरण कर बैठे, तारिणी का हाथ पकड़कर उठते हुए बोले- ‘‘तरू ! चलो.... तुम्हारा ब्लडप्रेशर बढ़ जायेगा.... रोओ मत.... अभी मैं हूं.... तुम लोगों को हमारी fचंता करने की कोई जरूरत नहीं है.... निश्ंिचत होकर जहां जाना है जा सकते हो.... रही बात सांध्यनीड़ की तो.... हमारा सांध्यनीड़ यही घर है.... हम यही रहेंगे जब तक भगवान् ने चाहा.... साथ रहेंगे.... नहीं तो... जा छूट गया वह अकेले ही रहेगा....।’’
कमरे की ओर जाते-जाते मुड़कर आगे बोले- ‘‘कल दस बजे गाड़ी आ जावेगी.... तुम लोगों को एयरपोर्ट पहुंचाने के लिए....।’’


अनावृत मातृ हृदय 


जंबू द्वीप भरत खण्डे एक fवंशति शताब्दे प्रथम चरणे शरण पूर्णिमा के प्रफुल्ल चंद्रमा को साक्षी मानकर अपनी माँ के बारे में जो कुछ कहूंगा सच कहूंगा चाहे इसके लिए मुझे समाज के ठेकेदार जो सजा दें....। वैसे आप लोग मेरी माँ को पहचानते तो हैं नहीं, उनका नाम न जानना स्वाभाविक है.... हाँ.... मेरी माँ विख्यात या कुख्यात दोनों मंे से कुछ भी नहीं थी.... थीं एक साधारण गृहिणी.... घर की चार दीवारी में ही सिमटी हुई थी उनकी दुनिया.... लोग उन्हें पति अन्तप्राण कहते थे.... और मुझे मां अन्तप्राण कहते थे.... ये बात और है कि लोगों का भ्रम टूटने में अधिक समय नहीं लगा... और इस भ्रम को तोड़ने वाला भी मैं स्वयं हूँ... मैं यानि श्रीमान सुनील चौधरी आत्मज स्व. गंगाधर चौधरी....। चलिये.... अब तो बता दूँ कि मेरी माँ थी.... श्रीमती मीरा चौधरी....।
‘‘जजमान.... जल्दी कीतिए.... fपंडदान के बाद अस्थि विसर्जन भी तो करना है... चौंक उठा... अरे हाँ.... मैं तो संगम स्थल पर आया हूँ....? वो तीर्थ जहाँ मृतात्मा की शांति के लिए उत्तर क्रिया सम्पन्न की जाती है....। पंडित जी को जल्दी थी.... अभ्यस्त कण्ठ से सारे श्लोक पढ़ डाले..... यह संकेत था इस बात का कि मैं भी जल्दी ही अस्थि विसर्जित कर दूँ.... माँ को तो अपने से दूर बहुत पहले कर चुका था.... आज उनकी अस्थियों को भी स्वयं से ही नहीं इस संसार से भी दूर कर दिया....। पंडित जी के बढ़े हुए हाथ पर दक्षिणा रख.... चल पड़ा...। मयूर लाॅज ज्यादा दूर नहीं है.... पैदल ही चल पड़ा.... दस मिनट में ही पहुंच गया...। सिर भारी हो रहा था... इसीलिए चाय मंगवा लिया.... कुछ खाने की गया....। सिर भारी हो रहा था.... इसीलिए चाय मंगवा लिया.... कुछ खाने की ईच्छा जरा भी नहीं थी....।’’
जो गाड़ी मुझे वापस अपने घर, अपनी दुनिया में ले चलेगी उसे आने में पूरे आठ घंटे बाकी हैं.... इलाहाबाद घूमने.... अथ्वाा कहीं और जाने का मन नहीं था.... सोच लिया कि यही आठ घंटे हैं मेरे पास.... मां को देने के लिए.... एक बार अपनी दुनिया में पहुंचा कि.... खुद के लिए भी वक्त निकालना कठिन हो जायेगा.... आखिर शहर का नामी गिरामी डाॅक्टर हूँ..... अपना नर्सिंग होम है। ‘‘नीलू.... थोड़ी देर सो ले....।’’
लगा संास थम जाएगी... ये आवाज दसों दिशाओं से आ रही है या मेरे ही छिद्रों से निकल कर दसों दिशाओं में गूंजा रही है.... मैं तो एक डाॅक्टर हूँ अच्छी तरह जानता हूँ कि मनुश्य की मृत्यु के साथ् ही उसकी आवाज भी खो जाती है सदा-सदा के लिए.... फिर मां की आवाज मैं कैसे सुन सका....? आत्मा, परमात्मा इन पर मुझे विश्वास नहीं है, मैं तो नास्तिक हूँ....।
माँ ! दुख में, अभाव में जब तुम्हें मेरी आवश्यकता थी तब संतान होने के नाते मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं कर सका । आजन्म तुमसे पाता ही रहा.... इस पाने को अपना अधिकार समझ लिया इसीलिए देने का कत्तZव्य भूल गया मुझे लगा यह पाना तो स्वाभाविक है।
माँ.... तुम तो जानती हो.... तर्पण, श्राद्ध, अशौच-पालन इन सबों पर मुझे कभी विश्वास नहीं रहा तभी तो पिताजी के न रहने पर जब मैंने सिर नहीं मुड़ाया तो औरों ने... हाँ.... मित्र, परिचित, रिश्तेदारों ने प्रत्क्षय, अप्रत्यक्ष बहुत कुछ कहा.... एक मात्र तुम्हीं थी जिसने कुछ नहीं कहा- फिर आज तुम्हारे चले जाने पर मैं गंगा में तुम्हें विसर्जित करने क्यों आया ? नहीं...मां...मेरे विचार बदले नहीं हैं....सिर्फ तुम्हारी आंतरिक इच्छा को मान रखने ही आया हूँ तुम्हीं ने कहा था- ‘‘नीलू.... संसार के दुख शोक से जलते भुनते आदमी के दिन काटता है.... मरने के बाद.... गंगा का शीतल जल यदि उसकी अस्थियों की जलन-तपन शांत कर दे तो बुरा क्या है.... इसे धार्मिक अनुश्ठान न समझ कर... मृतात्मा को दी गई श्रद्धांजलि समझो....।’’
मैं तब आठवीं में पढ़ता था.... पिताजी को उस साल ठेकेदारी में बहुत फायदा हुआ था... उन्होंने सबके लिए... मनपसंद चीजंे खरीदी.... तुम्हारी बारी आने पर जब तुमसे पूछा गया तुमने कहा था- ‘‘ विमला को घर बुला लीजिए.....।’’ पिताजी.... थोड़ी देर... तुम्हें देखते रहे थे.... कुछ बोले नहीं... धीरे धीरे.... कमरे से बाहर चले गए....। दादी नाराज हो गई खुब बकबक की ‘‘क्या जरूरत थी.... विमला का जिक्र करने की.... जो हमारे मान-सम्मान को धूल में मिला गई... चार लोगों के बीच हमारी नाक काट गई उसी कुल बोरनी को घर बुलाने की तुम्हें सूझी कैसे ? खामखा गंगाधर को नाराज कर दिया... तुम्हें कब अक्ल आयेगी बहू....?’’
अपने स्वभावानुसार ही उत्तर दिया था तुमने- ‘‘दोनों भाई बहन मिलने के लिए तड़प रहे हैं मां..... पर पहल करने में हिचक रहे हैं एक अपराबोध से तो दूसरा अहंभाव से ग्रस्त है.... मैंने तो मात्र पहल की है जो किसी तरह से अन्याय नहीं हैं....।’’
विमला बुआ.... उम्र में मुझसे सातेक बड़ी थी... लगती बड़ी बहन ही थी.... लड़ाई-झगड़ा छोटी छोटी बातों में होते रहता । मनोज भइया तब हमारे घर प्राय: आया करते.... मुझे गणित का होमवर्क करने में मदद करते.... बाॅलीवाल खेलना उन्हीं से सीखा.... तो मुहल्ले की नाटक मंडली में अभिनय करने का अवसर भी उन्हीं की वजह से मिला.... उन दिनों मैं मनोज भइया जैसा ही बनना चाहता था आदर्श थे वे मेरे....। विमला बुआ तो मेरे साथ ही रहती थी.... कब उन लोगों के बीच साथ जीने करने का वायदा हुआ.... कोई नहीं जान पाया....। उस दिन विमला बुआ ने एक लिफाफा देकर मुझसे कहा था- ‘‘नीलू.... अपने मनोज भइया को ये लिफाफा दे सकेगा.... सावधान.... किसी और को पता न चले । मुझे तो मनोज भइया से मिलना अच्छा ही लगता था या कहूं कि उनसे मिलने के बहाने खोजता था तो गलत नहीं होगा.... भाग्य से मनोज भइया अपने कमरे में ही थे... लिफाफा खोलकर पढे़-ऐसा लगा- कुछ चिन्तित हो गये.... बोले- ‘‘अच्छा नीलू तुम अब जाओ....किसी से लिफाफे वाली बात मत कहना ।’’
एक ही सावधान वाणी उन दोनों से सुनकर सोचने लगा- ऐसी कौन सी गुप्त बात लिखी है उस लिफाफे में....। सब तो कुछ जानने समझने की उम्र ही नहीं थी.... घर लौटने पर तुमने पूछा था- ‘‘हां रे नीलू तुम्हारी विमला बुआ.... मनोज के घर जाती है क्या ? मेरे मुंह से लिफाफे वाली बात निकलने ही वाली थी कि सावधान वाणी कानों में गूंज उठी और मैं तुम्हें बता नहीं पाया.... सिर्फ इतना कहा- ‘‘वाह रे ! मनोज भइया ही तो हमारे घर आते हैं.... देखा नहीं मुझे गणित भी तो समझाते हैं पर तुम.... यह पूछ क्यों रही हो.....।’’
‘‘वो कुछ नहीं.... तुम नहीं समझोंगे.... अच्छा जाओ...’’ कहकर तुम चुप हो गई.....। सुबह उठा तो पिताजी खूब जोर-जोर से चिल्ला रहे थे.... दादी रो रही थी.... तुम चुप खड़ी थी बाद में समझा कि पिताजी तुम पर ही चिल्ला रहे थे....। विमला बुआ.... घर छोड़कर चली गई थीं आर्य समाज में जाकर मनोज भइया से शादी भी कर ली थी । पिता जी ने फैसला सुनाया- ‘‘मीरा ! तुम्हें मैंने.... घर की जिम्मेदारी सौंपी है, विमला पर नजर क्यों नहीं रख सकी ? विमला तुम्हारी ननद है यदि बेटी होती तो तुमसे  यह गलती नहीं होता.... तुमने सोचा होगा.... चलो....बला टली... वह भी बिना दान-दहेज के....।’’
मां-तुम्हारा चेहरा सफेद फक्क पड़ गया था.... आंखें फटी पड़ रही थी.... थर-थर कांप रही थी तुम.... पर मुंह खोलना तो तुमने तुमने सीखा ही नहीं था....।
पिताजी का आदेश था- ‘‘विमला का नाम इस घर में कोई न ले वो हम लोगों के लिए मर गई....।’’ बहुत बाद में समझा था कि मनोज भइया विजातीय थे.... क्षत्रिय थे.... ठाकुर....।
मंदिर जाने की बात कहकर.... सहेली से मिलने जाने का बहाना करके तुम विमला बुआ से मिलने जाती बुआ से मिलने जाती थीं.... तीज त्यौहार पर उसे नेग देती थीं.... घर में कुछ बना तो डिब्बे में भर चुपचाप मुझे उनके घर भेजती थीं....। विमला बुआ ने ही बताया था कि अपने सोने के जड़ाऊ कंगन तुमने उसे दे दिए थे....। राखी और भाई दूज पर विमला बुआ खीर बना कर भेजती थी तुम किसी को कुछ बताये बिना.... पिता जी की थाली में वही खीर परोसती थी...। अच्छा मां... बिन किए अपराध की सजा इतनी खामोशी से कैसे भुगत लेती थीं ?
मां.... तुमसे एक बात के लिए माफी मांगनी है.... आज गंगा में खड़े होकर.... मैंने किसी और का भी तर्पण किया है.... पंडित जी की आंख बचाकर थोड़े से तिल, चावल, फूल, दूर्वादल दोने में रख लिया था.... जानती हो मां.... किसका तर्पण किया.... तुम्हारी सहेली अंबा मौसी का....।
उसी अंबा मौसी का जिसके कारण तुम्हारे दाम्पत्य जीवन के अंतिम सात साल.... विशयमय हो गये थे.... ऊपरी तौर से सब ठीक चल रहा था.... पर मैं जानता था कि पिताजी के साथ तुम्हारी बोलचाल बंद हो गई है.... और यह भी कि.... रात गहरा जाने पर.... जब सब सो जाते थे.... तुम चुपके से उठकर.... कोने वाले कमरे में चली जाती थीं.... सुबह, किसी के भी जागने से पहले... कोने वाला कमरा फिर से बंद कर.... नित्यकर्म में लग जाती थीं....।
अंबा मौसी के पति.... बहुत जल्दी दुनिया छोड़ गये थे.... प्राइवेट फर्म की नौकरी थी इसलिए.... जमा.... कुछ था नहीं....। घर के एक हिस्से को किराये पर दे दिया था.... मामूली सी पेंशन मिलती थी.... पर बढ़ती महंगाई, दोनों लड़कियों की पढ़ाई लिखाई.... घर चलाना मुश्किल हो गया था...। तुम दोनों सहेलियों के रिश्ते से ही पिताजी और मौसा जी भी मित्र बन गये थे.... समय बीतने के साथ-साथ दोनों की मित्रता ने प्रगाढ़ बंधुत्व का रूप ले लिया था इससे.... तुम दोनों सहेलियों को खुशी ही हुई थी।
पिताजी.... उसी मित्रता के नाते अंबा मौसी के घर जाते.... रूपये पैसे की भी मदद करते.... उन्हें भी एक पुरूश सरंक्षण की जरूरत थी.... सालों गुजर गए.... लड़कियों की शादी हो गई.... अंबा मौसी अकेली रह गई.... तुम भी उनकी मदद करती थीं.... जब तब.... जिस किसी बहाने से उन्हें हमारे घर बुलाती रहती थीं....।
उस दिन जब मैं बाहर निकलने ही वाला था तुमने कहा था ‘‘नीलू ! ये सत्यानारायण का प्रसाद है जाते-जाते अपनी अंबा मौसी को दे देना....।’’
मैंने कहा था ‘‘माँ ! मुझे वैसे ही देर हो गई है.... लाइब्रेरी बंद हो जायेगी.... मुझे ये पुस्तकंे लौटाकर दूसरी लानी है... किसी और को भेज दो....।’’ मैं जानता था मां.... तुम किसी और के हाथ पवित्र प्रसाद भेजना नहीं चाहती.... अनिच्छापूर्वक बोला- ‘‘लाओ दे ही दूं.... वरना तुम्हें रात भर नींद नहीं आयेगी....।’’ दुर्भाग्य ही था कि मेरी अनिच्छा ने तुम्हें नाराज कर दिया..... और तुम खुद ही प्रसाद पहुंचाने अंबा मौसी के घर चल पड़ीं....। उस समय तो मुझे यही लगा कि चलो जान बची..... कितना नासमझ था मैं.... नियति का निर्मम संकेत समझ ही नहीं पाया....।
वह तो बहुत बाद में शायद मृत्यु से दो महीने पहले अंबा मौसी ने मुझे बताया था कि तुमने उस दिन पिताजी को उनके घर देखा था । पहली बार तुम्हें पता चला था कि पिता जी मित्रधर्म निबाहते.... अंबा मौसी के करीब होते चले गए थे..... उनके बीच दर्द के एक नये रिश्ते ने जन्म ले लिया था....। इस नये रिश्ते पुराने रिश्तों को तोड़ा नहीं था बल्कि असमय बिखर जाते परिवार को जोड़े रखा था ।
पिताजी के साथ तुम्हारे शीत युद्ध की शुरूआत तभी हुई थी.... आश्चर्य यह कि अंबा मौसी की देखभाल में तुमने कभी कोई कमी नहीं की उनकी लड़कियां जब भी मायके आतीं.... उन्हें खाने पर बुलाती, उनकी विदाई-साड़ी कपड़े देकर करती.....। माँ ! तुम्हारी सहनशीलता, क्षमाशीलता के गुण तो दुश्मन भी गाते थे फिर तुम पिता जी को ही क्षमा क्यों नहीं कर पाई ?
अंबा मौसी के चले जाने के बाद पिताजी पंाच साल और जीवित थे.... पर तुम्हारा मौन व्रत.... नहीं टूटा....। हाँ.... उनको जाने के बाद.... तुमने सफेद साड़ी पहनना, एकादशी करना विधवाओं के सारे नियमों को माना.... सिर्फ माना नहीं निश्ठापूर्वक पालन किया....। याद है तब मैं एम.बी.बी.एम. पास कर चुका था.... नौकरी की तलाश करने को कहा पिताजी ने.... पिताजी के पास नीता के पापा आये.... रिश्ते की खोज में ही आये थे....।

मैं लंदन जाकर एम.डी. करना चाहता था । उन दिनों-पिताजी की ठेकेदारी....  तकरीबन बंद हो गई थी.... अब वे पहले की तरह दौड़ धूप नहीं कर सकते थे.... उम्र भी हो चली थी..... ब्लड प्रेशर भी काम होने का नाम नहीं लेता था..... सबसे बड़ी बात यह कि उनमें काम के प्रति उत्साह नहीं रह गया था... सिर्फ काम के प्रति क्यों जीवन के प्रति भी वे हतोत्साहित हो गये थे..... बुझे-बुझे से रहने लगे थे।
मेरी दोनों बहनों की शादी सम्पन्न और प्रतिश्ठित घरों में हुई है, सुखी हैं दोनों.....। ‘‘दोनों जीजा प्रतिश्ठित घरों में हुई है, सुखी हैं दोनों.....। ‘‘दोनों जीजा प्रतिश्ठित कंपनियों में इंजीनियर हैं.... हां.... इतना अवश्य हुआ कि पहली शादी के लिए गांव की जमीन बेचनी पड़ी तो दूसरी शादी को शानदार बनाने के लिए शहर के पाॅश काॅलोनी में बना दुमंजिला मकान रातों रात बेचना पड़ा..... अब हमारे पास सिर्फ वही घर बचा जो पुश्तैनी था....। माँ.... उस समय पिताजी बहुत अकेले पड़ गये थे..... उन्हें तुम्हारे सहारे की जरूरत थी..... उसी अकेलेपन ने उन्हें शराब का साथी बना दिया.....। तभी तो उनकी मृत्यु लीवर डेमेज होने से हुई थी.....।’’
याद है मां.... मैंने शादी के लिए इंकार किया था क्योंकि अपने मित्रों से नीता के बारे में सुन चुका था.... दिखने में जितनी काली थी उतनी ही स्वभाव से भी थी.... पिता का ऐश्वर्य उसकी उद्दण्डता थी....। वैभवशाली पिता की नकचढ़ी, सिरफिरी लड़की थी.... दो साल से बी.एस.सी. फाइनल में फेल हो रही थी...। मेरा दुर्भाग्य कहूं या नीता का सौभाग्य आज भी समझ नहीं पाया.....। नीता के पिता ने मेरे लंदन की शिक्षा का खर्च वहन करना स्वीकार किया बल्कि यह वायदा भी किया कि पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरे वापस आने पर.... मुझे नौकरी नहीं करनी होगी.... सुसज्जित, आधुनिक डिस्पेंसरी मेरे लिए तैयार रहेगी....। मेरे उज्ज्वल भविश्य के लिए ही पिताजी ने रिश्ता स्वीकार कर लिया उनके मन में एक ग्रंथि थी कि वे बेटे के लिए कुछ नहीं कर पाये..... सो इस तरह करने की सोचे..... शायद हर पिता संतान के भविश्य को सुरक्षित देखकर ही संसार से विदा होना चाहता है.....।
मां ! सारा आक्रोश....सारी शिकायतें तुमसे है..... थी.... और रहेंगी कि तुमने भी मुझे बुलाकर पितृ आदेश सर्वोपरि ही समझाया.... यही नहीं मातृ ऋण की याद दिलाने में भी नहीं चूकीं.... क्यों मां.... ऐसा क्यों किया तुमने ? शादी हो गई... ससुराल आते ही नीता ने रंग दिखाना शुरू किया..... हमारे घर.... का पानी भी उसे पचता नहीं था.... नौकरांे चाकरों का अभाव खलता था.... अपनी मित्र मण्डली को हमारे टूटे फूटे पुराने घर में न बुला पाने का अफसोस..... अपनी जली कटी बातों से प्रगट करती.... इधर मेरे इंग्लैण्ड जाने का वीसा पासपोर्ट तैयार हो गया.... क्कीन मार्गरेट युनिवर्सिटी में मुझे प्रवेश मिल गया था.....। निर्धारित दिन जब मैं जाने लगा तो.... पिताजी से भेंट करने कमरे में गया.... पूरे होश में थे । उस दिन मेरा हाथ पकड़ कर बोले- ‘‘हो सके तो मुझे क्षमा कर देना और मेरे बाद अपनी मां का ख्याल रखना.....।’’
आज मैं कहना चाहता हूँ ‘‘पिताजी मुझे क्षमा दीजिएगा मैं आपकी विवशता को, पुत्र स्न्नेह को समझ नहीं पाया....।’’ इंग्लैंड से वापस आया..... तब तक नीता ने अपने पिताजी से कह कर डिस्पेंसरी के ऊपरी हिस्से को अपना आशियाना बना लिया था..... साजो सामान से भरा हुआ....। इतनी कृपा उसने अवश्य की थी कि अपने आशियाने में दस बाई का कमरा तुम्हें दे दिया था.....।
शुरू हुई मेरी दौड़.... घर में तो मेरे लिए कोई आर्कशण बचा नहीं था.... नीता अपनी किटी पार्टी और क्लब के आयोजनों में व्यस्त रहती..... रही तुम.... तो तुमने खुद को उस कमरे में कैद कर लिया था.... सच कहूँ मैं भी कहां तुम्हें माफ कर पाया ? पिताजी को दिये वचन की रक्षा करने रोज रात को एक बार तुम्हारे कमरे में जाता अवश्य, कैसी हो मां जैसे औपचारिक कथन के अतिरिक्त कभी कुछ जानने, समझने का प्रयत्न ही नहीं किया। तुम शायद मेरे मनोभावों से परिचित हो चुकी थी इसीलिए कभी कोई बात नहीं पूछती...... न अपनी बताता.....।
नीता अहसान जताने में पीछे नहीं रहती थी....। हमारे एक मात्र पुत्र..... अमित की सारी जिम्मेदारी तुम पर थी..... नीता को तो जैसे एक आया ही मिल गई थी। जिस उम्र में तुम्हें आराम की, स्न्नेह की, संरक्षण की, सेवा की जरूरत थी तुम सारे दिन....अमित की देखरेक में लगी रहती । कभी नीता की शिकायत नहीं की...... अमित को खूब दुलारती..... इसके लिए भी तुम्हें नीता की जली कटी सुननी पड़ती....। आये दिन नौकर भाग जाते..... तो कभी महरी काम छोड़ देती..... असल बात यह थी कि नीता के स्वभाव के कारण कोई टिक नहीं पाता..... दुश्परिणाम यह होता कि सारे काम तुम्हें करने पड़ते। तुम्हारे पूजा की घंटी नीता की नींद में बाधा देता.... अगरबत्ती की गंध से उसे एलर्जी थी..... इसलिए तुम्हारे भगवान् भी सोते रहते..... दस बजे तक.... तो कभी-कभी बारह बजे तक.... और तुम बिना भगवान की पूजा किये मुंह में एक दाना भी नहीं डालती.... यह मैं जानता था । एकादशी हो या पूरणमासी नीता को तो नाश्ते में आमलेट चाहिए ही..... परिणाम यह कि तुम्हें निराहार रहना पड़ता.... पर क्यों मां.... अपनी बात तुम कभी क्यों नहीं कह सकीं ? मेरे जन्म दिन पर खीर बनाना कभी नहीं भूली..... संतान सप्तमी का पुआ.... प्रसादी फूल के साथ मेरी टेबल पर रखती रही.... हर साल.....।
डस्पेंसरी.... अच्छी चलने लगी थी.... कुछ लोन लिया और नर्सिंग होम खोल लिया.... मरीजों की संख्या बढ़ती रही..... साथ-साथ बढ़ती रही मेरी व्यस्तता..... बढ़ती रही मेरी आमदनी.... दूर होता रहा घर से.... अपने आप से.....। नीता और मेरे बीच की दूरी तुमसे छिपी नहीं थी..... तभी तो तेज बुखार में भी मेरा हाथ पकड़कर तुमने कहा था- ‘‘अमित को किसी अच्छे हाॅस्टल में रखकर पढ़ाना’’.... बस.... और कुछ नहीं.....।
सुबह के चार बजे नर्स ने बताया कि तुम अब नहीं रही.... नीता की नींद तो खुलने से रही..... फिर अकारण उसे कश्ट क्यों दूँ.....? नर्स को भी आराम करने को कह.... तुम्हारे सिरहाने बैठा रहा.... रो नहीं सका.... आंसू निकले ही नहीं.... हां एक निर्णय अवश्य ले लिया कि ‘‘ अमित को सैनिक स्कूल में पढ़ाऊँगा.... वहीं हाॅस्टल में रहेगा..... कम से कम तुम्हारे अंतिम आदेश का पालन तो कर सकूंगा....।’’ मां..... हमारे संबंधों की यह कैसी परिणति हुई ? तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सका.... यह सोचकर क्षुब्ध हूँ.... मैं तुम्हें समझ क्यों नहीं सका....?
पिताजी, अंबा मौसी, नीता, विमला बुआ मैं स्वयं कोई तुम्हारे अनावृत्त हृदय को समझ नहीं सका....। मां.... क्षमा कर देना ।
कमरे का इंटरकाम बज उठा ‘हलो’ बोलते ही विनयपूर्ण स्वर गूंजा- ‘‘डाॅ. सुनील चौधरी टैक्सी आ गई है कृपया रिसेप्शन में आ जाइये....।’’

विदाई 


इधर सप्ताह भर से उमस से परेशान हो गई थी.... चिपचिपी गरमी.... न तो पसीना बहता.... न.... हवा के झोकों से ठंडक मिलती.... ठंडक मिले कहां से ?.... हवा..... तो मानो थम कर कहीं खड़ी हो गई थी.... कोई पत्ता हिलता हुआ नजर नहीं आता था.... ऐसे में.... कुछ करने का मन ही नहीं होता.... वैसे घर में काम ही कितना है ? महरी आती है ऊपर का सारा काम निबटा जाती है..... रही रसोई..... तो दो लोगों का खाना.... गिन कर रोटियाँ.... बिना मसाले मिचीं की सब्जी.... बहुत हुआ तो दाल बना ली....। अपने मन से कुछ विशेश बना लें इसकी कोई गुंजाइश ही नहीं है.... सब कुछ अनिला की मनमर्जी के मुताबिक ही होता है..... आखिर वो मकान मालकिन जो है....।
अनिला.... नहीं.... नहीं- मेरा कोई रिश्ता नहीं है उसके साथ.... मेरे कहने का अर्थ यह है कि नातेदारी नहीं है.... जो रिश्ता है उसे क्या नाम दूँ ? उम्र मंे मुझसे चार साल बड़ी है.... पर.... आदर भरा संबोधन देने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं की...। सच कहूँ..... उसको भी अच्छा लगता है बराबरी  का संबोधन.... शायद इससे वह स्वयं को मेरी हम उम्र समझ कर संतुश्ट होती है । कहती है ‘‘असल में मेरे नानाजी ने स्कूल में मेरी उम्र दो साल बढ़ाकर लिखवाया था, इस तरह तो मैं तुमसे दो ही साल बड़ी हुई न ।’’ चलो..... मुझे उसके साथ कोई रोटी- बेटी का संबंध तो जोड़ना नहीं है.... अगर वो मुझसे दो साल छोटी होने का दावा पेश करे तो भी मेरा कुछ बनता बिगड़ता तो है नहीं इसलिए मैं उसे प्रश्रय ही देती हूँ ।
स्थानीय गल्सZ हाईस्कूल में बत्तीस साल तक अर्थशास्त्र पढ़ाकर पिछले चार सालों से अवकाश- पर्व व्यतीत कर रही है अनिला....। पांच फुट दो इंच लंबी, दोहरे शरीर की सांवली महिला है, गोल चेहरे में सबसे आकर्शक है उसकी नाक..... जिसे साहित्यकार खड्गनासिका कहते हैं.... कुंचित माथे पर पड़ी सिलवटें बताती हैं.... कि वह हमेशा दुश्चिन्ताओं से घिरी रहती है..... पतले-पतले ओठों पर दूज के चांद सी मुस्कान की एक रेखा....। सुन्दरी न तो अभी है, न कभी रही होगी..... सामान्य सी है।.... असामान्य है उसकी जीभ.... विपक्षी पर सपासप अदृश्य कोड़े बरसाने में उसे महारत हासिल है..... कौन-कितना लहूलुहान हुआ इसकी fचंता उसे कभी नहीं होती.... इसी के चलते.... ने बेटी दामाद.... आते हैं न बेटा बहू कभी अपने पास बुलाते हैं..... इतने बड़े घर में अकेली रहती है । रूपये पैसों की कमी न थी- न-है-न होगी....। पति महोदय पी.एच.ई. में सिविल इंजीनियर थे.... दोनों हाथों बेटाकर बैंक मंे रख गये हैं.... खुद तो उपभोग कर नहीं पाये बावन साल की उम्र में ही भगवान के घर चल दिये । खुद की पंेशन है ही... घर का एक हिस्सा किराये पर दे रखा है.... समय समय पर बेटा डालर भेजता रहता है अपनी अनुपस्थिति की भरपाई करने.....।
बड़ी दुनियादार महिला है.... भविश्य के लिए बदस्तूर fचंता करती है..... इसीलिए पैसों का हिसाब किताब जरूरत से ज्यादा करती है..... सोचती हूँ अर्थशास्त्र पढ़कर अनर्थ ही कर बैठती हैं।
अब देखो न.... दो पेइंग गेस्ट रखी हैं.... जिसमें से एक तो मैं ही हूँ.... पेइंग गेस्ट कम, आया ज्यादा.....। खाने पीने रहने का हजार रूपये कहीना देती हूँ.... प्रायः दोनों समय का खाना मैं ही बनाती हूँ..... दया करके कभी अनिला रसोई घर में गई भी तो पूरे रसोई घर की जो दुर्गत होती है उसे देखकर.... डर जाती हूँ.... दूसरे यह भी कि जितनी देर मैं रसोई घर में रहती हूँ उसकी वाणी को विश्राम मिलता है मेरे दोनों कान भी स्वस्ति की संास लेते हैं ।
आप लोग सोचेंग..... यदि इतनी शिकायतें है तो उसके साथ रहती क्यों हूँ ?


पहली बात सुरक्षा मिलती है.... दूसरी यह कि मेरे पास सिर छिपाने की जगह जो नहीं है । मेरी  जैसी अविवाहित वयस्क महिलाओं का जो हाल होता है वही और क्या ?
सारा जीवन नौकर करके भाई बहनों को पालती रहीं... अब भाfभंया सास बन गई हैं... घर छोटा पड़ने लगा है.... माँ बात तो कब के स्वर्ग सिधार गये हैं.... मैं भी रिटायर हो गई हूँ.... पेंशन की रकम इतनी आकर्शक तो नहीं है कि एक कमरा मेरे नाम कर दिया जाये.... तो कहाँ जाऊँ.... कोई और ठिकाना तो है नहीं.... अपने लिए भी कभी घर की जरूरत होगी यह तो सोचा ही नहीं था.... सोचने का अवकाश भी नहीं था औकात भी नहीं थी....।
पूरा वेतन तो कभी हाथ में आया ही नहीं.... भाईयों की पढ़ाई का लोन खत्म भी नहीं हुआ कि बहन की शादी का शुरू हुआ.... फिर पिताजी की लंबी बीमारी....।
बहुयें आईं तो मां ने कहा- ‘‘पराये घर से लड़कियाँ आ रही हैं.... लता ! ऐसा करो पार्ट फाइनल निकलवा लो.... दो कमरे अटैच-लैट-बाथ बन जावेगा तो उन्हें रहने में सुविधा होगी.... बड़े घर से आ रही हैं.... यहाँ की असुविधा नहीं झेल पायेंगी लगे हाथ किचन को भी सुधरवा लो....।’’ मातृ आदेश का पालन हुआ....घर की बहुयें.... राजरानी बनकर ही रहने लगीं.... जब तक मां थी.... रसोई संभालती रही कहती ‘‘अहा ! अभी तो उनके हंसने खेलने के दिन हैं.... फिर.... मैं ही बैठे-बैठे क्या करूंगी... लता ! तू नाहक परेशान होती है.... अरे ! सिर पर पडे़गा तो सब संभाल लेंगी....।’’
ठीक कहा था मां ने जब उनके जाने के बाद सिर पर पड़ा तो... रसोई के दो भाग हो गये... समस्या तो यह खड़ी हुई कि लता नामक प्राणी का थी करें ? निर्णय हुआ कि सुबह का नाश्ता खाना.... बड़ी के पास तो शाम की चाय और रात का खाना छोटी के पास...। कुछ दिन ठीक चला.... फिर दोनों घरों में अचानक पैसे की तंगी दिखाई दी.... हुकुम लता दीदी आखिर पैसों का करेंगी क्या ? सो दोनों घरों में एक हजार की सहायता कर दिया करें.....।
उस दिन पहली बार रोई थी.... बड़ी देर तक रोती रही थी.... अपनी निरीहता को कोसी थी... अपनी भावुकता पर आक्रोश आया था । याद आई बड़ी बुआ जी, जो कहा करती थी.... लता ! समय रहते.... शादी कर ले अरे ! कोई दुहाजू भी मिल जाये तो शादी कर ले.... उम्र बीत जाने पर पछतायेगी..... भाई भाभी का घर कभी अपना नहीं होता....। तब लगता था ऊँह ! जिस घर के लिए मैं अपना सारा जीवन दे रही हूँ वह मेरा कैसे नहीं होगा भतीजे भतीजियाँ.... आगे पीछे डोलेंगी..... बुआ..... बुआ सुनते शेश दिन कट जायेंगे.....। कितनी अलीक कल्पना थी यह तो तब समझ में आया जब भतीजी ने कहा- ‘‘बुआ ! आप नीचे का सीढ़ी के बाजू वाला कमरा ले लीजिए.... थोड़ा छोटा है पर आपका काम चल जावेगा.... आपके पास तो कोई आता जाता है नहीं.... मेरी सहेलियां- वहेलियां आती रहती हैं.... पढ़ना लिखना होता है....। समथर्न के लिए लाडली बिटिया ने तत्काल अपने पापा का सहारा का सहारा लिया....।’’
लाडली बिटिया का दुलार पूरा करने की जितनी जरूरत थी उससे ज्यादा जरूरत थी पत्नी के आदेश पालन की अतः इधर उधर देखते, नजरें चुराते हुए बड़े भाई ने कहा था ‘‘सुमी ठीक कह है दीदी.... न हो आप ही एडजस्ट कर लें.... मैं रामू को कहकर आपका सामान नीचे शिफ्ट करवा देता हूँ....।’’
मेरी सहमति की आवश्यकता तो थी ही नहीं..... पितृगृह से विदाई प्रथम चरण इस तरह पूरा हुआ था।
जुलाई की 31 तारीख.... आज आॅफिस में मेरा आखिरी दिन था.... जी हां अवकाश- ग्रहण दिवस....। बहुत रोना आ रहा था यह सोचकर कि कल से यहाँ आना नहीं होगा.... घर का अकेलापन यहाँ सहकर्मियों के साथ ही तो भुला पाती थी....। छोटा सा पोस्टआफिस.... तो टिफिन टाइम में एक दूसरे के घर की सब्जी अचार के आदान प्रदान के साथ संधि वार्ता सफल हो जाती ।
सच कहूँ.... तो यही मेरा परिवार था.... । पोस्ट मास्टर पाण्डेजी ने कहा- ‘‘मैडम ! कभी किसी तरह की आवश्यकता हो तो अवश्य बताइयेगा.... हां बीच-बीच में आती रहियेगा....।’’
अनिता कुलकर्णी तो हिचक हिचक कर रोने लगी- ‘‘लता दी... आपकी कमी बहुत खलेगी.... आपके भरोसे ही मैं वक्त जरूरत.... घर चली जाती थी.... घर का सुख दुख आपसे बांट लेती थी....।’’
घर तक छोड़ने आये विलास शुक्ला और मीतुल सोनी.... लजाते हुए पांव छूकर बोले- ‘‘लता दीदी..... अगले दिसंबर में हम लोग शादी करने जा रहे हैं आपको अवश्य आना होगा....।’’
असल जीव अब शुरू हुआ दो दिन बाद सुबह-सुबह सुमी नीचे आई ‘‘बुआ ! मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है प्लीज आप किचन देख लीजिएगा.... मुझे काॅलेज के लिए देर हो रही है ।’’ उत्तर की प्रतीक्षा उसे नहीं थी, वह तो आदेश सुनाने आई थी उल्टे पांव लौट गई....।
इस तरह बड़ी भाभी के हिस्से की रसोई में मेरा प्रवेश हुआ.... सोची... ठीक ही है.... कोई काम तो है नहीं.... थोड़ा व्यस्त रहूंगी....।
दसके दिन बाद की बात है..... दोपहर को कमर सीधी कर रही थी.... शायद झपकी लग गई थी कि दरवाजे पर खट्खट् हुई उठने की इच्छा तो थी नहीं.... थोड़ा व्यस्त रहूंगी....।
दसेक दिन बाद की बात है.... दोपहर को कमरे सीधी कर रही थी.... शायद झपकी लग थी कि दरवाजे पर खट्खट् हुई उठने की इच्छा तो थी नहीं बोली ‘‘दरवाजा खुला है भाई ! अंदर आ जाओ...।’’
शिरीश ने दरवाजे से ही झांककर कहा- ‘‘बुआ ! हम लोग पिक्चर जा रहे मैं मम्मी ने कहा है.... लौकी की सब्जी और रोटियाँ बना देंगी और हाँ प्लीज मेरे लिए रवे की खीर बनाना मत भूलियेगा....।’’
शिरीश चला गया.... छोटे भाई का यह लड़का.... प्यारा है.... अभी मसें भीगी नहीं है.... स्वस्थ सुंदर लड़का है.... इस साल ग्यारहवीं की परीक्षा देगा.... इंग्लिश मीडियम में पढ़ता है, होशियार है गणित और कम्प्यूटर साइंस लेकर पढ़ रहा है.... हम सब सोचते हैं इसे आई.आई.टी. से कम्प्यूटर साईंस में ही बी.ई. करवायेंगे....।
अहा.... मेरे हाथ्ज्ञ की खीर... चलो चलकर बना ही देती हूँ । उसी शाम को छोटी भाभी के रसोई में मेरा प्रवेश हुआ.... और फिर.... दोनों रसोइयां.... मेरी हो गईं.... हंसी आती है..... रानी की तरह राज करने नहीं..... नौकरानी की तरह काम करने, खाना बनाने के लिए......।
उस दिन..... बड़ी भाभी को कहते सुनी.... पड़ोसन मिश्राइन चाची से कह रही थी- ‘‘आखिर दिन भर पड़े-पडे़ उकता भी तो जाती हैं..... आफिस तो छूट गया है.... फिर उन्हें बनाने खिलाने का शौक तो था ही.... अब जाकर समय मिला है तो.... हमने भी सोचा चलो दीदी का शौक भी पूरा होगा और वक्त भी कटेगा इसीलिए तो उन्हें रसाई सौंप दिये हैं.....।’’
भरी पूरी गृहस्थी में दो रसोईयों में चाय, नाश्ता, खाना बनाते-बनाते बदन टूटने लगता..... बिस्तर पर पड़ती तो लगता हाथ पांव अलग हो जायेंगे.... आये दिन बच्चों की फरमादशें पूरी करनी पड़तीं..... तो भाभियों की किटी पार्टी की व्यवस्था.... भाइयों के मित्रों का सपत्नीक आगमन..... मेरे पाक कला की परीक्षा होती रहती थी..... इनाम में सुनने को मिलता ‘‘नमक मिर्च का अंदाजा दीदी को जरा कम ही है....।’’
‘‘रोटियां तो गरम ही अच्छी लगती हैं....।’’ आदि-आदि....।
जाने कौन सी घड़ी थी कि अनिला से यह सब कह बैठी.... क्या करूं.... मन भर आया था कहती भी तो किससे ? अनिला अकेली रहती थी उसे रात में अकेले रहने से डर भी लगने लगा था प्रस्ताव रख दिया कि उसके साथ ही खाऊँ, सोऊँ हाँ प्रतिमाह एक हजार जो वहां देती हूँ यहाँ दे दूँ..... इस तरह दिन भर रसोई में खटने बच जाऊँगी.... मैं भी भाभियों की रसोई से बाहर आना चाहती थी सोची अनिला से गप्प मारूंगी पढ़ी लिखी रिटायर महिला हैं हमारी बातचीत घिसी पिटी साड़ी चूड़ी से ऊपर की होगी....। भाभियों की नाराजगी की परवाह न करके हामी भर दी..... घर में महाभारत मचा, लोगों ने मुझसे बातें करना बंद कर दिया....।
दोनों भाभियों की आग्रेय दृश्टि मेरे तन मन को झुलसा देती, सहोदरों की अवज्ञापूर्ण दृश्टि ने रिश्तों की परिभाशा ही बदल दी, भतीजे-भतीजी कतराकर निकल जाते।
महीने भर ठीक चला कि अनिला की रोटी वाली बाई अज्ञातवास पर चली गई अनिला ने कहा- ‘‘जब तक दूसरी नहीं मिलती हम मिलकर खाना बना लंेगे....। कोई ज्यादा झंझट नहीं नहीं करेंगे..... सादा खाना ही तो बनाना है- क्यों ?’’
आपत्ति मुझे भी नहीं थी पर यह सिलसिला चल पड़ा तो अनिला ने दूसरी रोटी वाली की तलाश बंद कर दी....। मैंने खुद को समझाया यहाँ तो फिर भी अच्छा है दो लोगों का खाना क्या....?
इसी बीच अनिला की तबियत खराब हो गई... पहले तो मौसमी बुखार समझे....फिर खंासी.... और अब सांस बढ़ने लगी.... पिछले गुरूवार को रात में ग्यारह बजे के आस-पास अनिला की बेचैनी बढ़ गई.... सांस धौंकनी की तरह चलने लगी.... घबरा कर मैं पड़ोसी श्रीवास्तव जी तो बुला कर लाई.... वे अपनी कार से हमें डाॅक्टर के पास ले गये....।
अनिला ने कहा ‘‘लता ! किसी कम उम्र के लड़के को पेइंग गेस्ट रख लेते हैं.... रात बिरात.... वक्त जरूरत पड़ने पर सहायता करेगा....। आखिर हम दोनों की भी उम्र हो रही है.....।’’
स्थानीय अखबार में विज्ञापन दिये तो आठ दस लड़के आये.... अनिला ने इंटरव्यू लिया.... विजयेन्द्र इंटरव्यू में पास हो गया....। भले घर का लड़का है यहाँ के काॅलेज में पढ़ता है.... इस तरह अब हम तीन हो गये.... वाह री मेरी किस्मत कि रोटी वाली नहीं ही मिली....।
चलो.... दिन कट रहे थे कि रविवार को जब मैं अपने कमरे में पहुंची तो देखा दरवाजा खुला हुआ है..... ताला तो मैं लगाती नहीं थी.... पर कोई मेरे कमरे में आता ही नहीं था.... कोई चोर भी आकर क्या करता.... एक छोटा पलंग..... दो सूटकेस एक छोटी अलमारी कुछ पुस्तकें कुल संपत्ति है जिसकी आवश्यकता आजकल के चोरों को भी नहीं होती।
दरवाजे पर पहुंची तो देखी दीवार से लगी आलमारी कमरे के बाहर कर दी गई है वहाँ कोने में कम्प्यूटर रखने की व्यवस्था हो रही है.....। सोची.... मुझ पर इतनी महरबानी किसने की.... और क्यों? तब तक शिरीश, खुश लग रहा था हंसते हुये बोला- ‘‘बुआ ! पापा मेरे लिए कम्प्यूटर खरीदे हैं ऊपर तो जगह है नहीं इसलिए यहाँ लगवा रहे हैं।’’ इतने में उसके मम्मी पापा भी आ गये बोले- ‘‘आप तो अनिला दीदी के घर ही रहती हैं..... इसीलिए कम्प्यूटर यहीं लगवा रहे हैं.... यहाँ शिरीश को कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा.... न हो आप अपने सूटकेस.... वहीं ले जाइये.... आलमारी सीढ़ी के नीचे पड़ी रहेगी...।’’
क्या कहूँ ? किससे शिकायत करूँ....। भरी आंखों से इधर-उधर देखने लगी यह आशा थी कि रविवार है, बड़े भइया घर पर ही होंगे..... शायद वे कुछ कहें पर नहीं.... ऊपर से कोई.... नहीं उतरा...।
रिक्शा बुलाकर लाई, अपने दोनों सूटकेस और किताबें रखी..... हां दीवार पर टंगी मां बाबूजी की फोटो उतार कर रख ली.... जाने क्यों ऐसा लगा मानों वे भी कर रहे हों ‘‘हमें छोड़कर मत जाओ लता ! यहाँ हमें देखने वाला कोई नहीं है....।’’
रिक्शा अनिला के घर की आर चला तो मुड़कर देखी दरवाजे पर कोई नहीं खड़ा था.... पितृगृह से यह मेरी दूसरी विदाई थी......।


रेगिस्तान आँखें 


प्रशान्त की मृदु सांसों से आश्वस्त हुई, जानती हूँ यह स्वाभाविक नींद नहीं है.... डाॅक्टर जोशी आये थे उन्होंने नींद की दवा दी है.... ये गहरी नींद उसी का परिणाम है, प्रशान्त तो दवा लेना ही नहीं चाहते थे.... डाॅक्टर जोशी ने कहा- ‘‘भाभी जी दूध में गोली पीसकर घोल दें.... ऐसी हालत में प्रशान्त के लिए नींद बहुत जरूरी है.... उसकी हालत तो देख ही रही हैं.....।’’
सचमुच प्रशान्त की हालत पागलों सी हो रही थी.... डर गई थी मैं भी.... इसलिए तुरंत डाॅक्टर के आदेश का पालन की.... डाॅक्टर जोशी इनके मित्र भी है.... मुझ से पहले से इन्हें जानते भी हैं, समझते भी हैं। धीरे से उठकर मैं कमरे के बाहर आ गई.... हाँ आते-आते दरवाजा उढ़का दी..... कमरे से लगे बरामदे में बिना आवाज किये कुर्सी पर बैठी.... लकड़ी की जाली से घिरा यह बरामदा.... मेरा विश्राम कक्ष है.... यहाँ एक टेबल कुर्सी भी रखना दी हूँ.... जब भी खुद से बातें करने का मन होता है या देर रात कुछ लिखने-पढ़ने का मन होता है यहीं बैठती हूँ.... दिन में भी जब तब बैठती हूँ।
आंगन के कोने में लगाई रातरानी की खुश्बू से बरामदा भरा हुआ है.... ठंडी हवा का झोंका आया तन मन सिहर उठा....। आँखें जल रही हैं, पपोटे भारी लग रहे हैं- कौन जाने आँखें लाल भी हो गई हों..... सारे दिन... सूखी आँखों को पोंछती रही.... रगड़ती रही कि दो बूंद आंसू तो आ जावे.... पर नहीं...... आंखें रेगिस्तान की तरह हो गई हैं यादों का झोंका आता है.... तो रेत के कण उड़ते हैं, आंखें किरकिरा उठती हैं बस- इतना ही....। अरे शोक के दुख के, अवसाद के बादल जब तक नहीं छायेंगे.... आंसूओं की बारिश कैसे होगी ?
सुबह..... वैसी ही थी रोज की तरह प्रशान्त अखबार लेकर बैठे दूसरे कप चाय के लिए जल्दी मचा रहे थे..... तो महरी..... ‘‘ चलती हूँ बीबी जी.... आज शाम को नहीं आऊँगी गांव से मेहमान आये हैं’’ का आदेश सुना चलती बनी । गैस पर एक तरफ सब्जी छौंक कर दूसरी तरफ चाय का पानी रख दी.... आटा.... गूंथने बैठी.... जानती हूँ बिना दूसरी कप चाय के साहब बहादुर.... हिलेेंगे नहीं.... चाहे घड़ी का कांटा नौ पार करने लगे.... मजे की बात यह कि तब हमेशा की तरह सुनाई देगा ‘‘प्रभा ! किसी दिन तुम मेरी नौकरी छुड़वाओगी..... करती क्या रहती हो ? तुम्हारे कारण ही आॅफिस के लिए लेट होता हूँ.... आदि-आदि इत्यादि....।’’
आज यह सब सुनने का मेरा मन नहीं था दुfश्चंता के मारे रात भर सो नहीं पाई.... इनके आराम में बाधा क्यों दूँ सोचकर ही इन्हें कुछ बताया भी नहीं..... बताकर होता भी क्या ? पिता पुत्र में वार्तालाप बंद हुये साल से ऊपर हो गया.... चीखते चिल्लाते.... ब्लडप्रेशर बढ़ाते.... परेशानी मेरी ही बढ़ती....।
‘‘प्रभा ! अरे भई.... चाय मिलेगी या नहीं.....।’’ इनकी तेज-बेसब्र आवाज से होश में आई जल्दी से चाय छानकर कप इन्हें पकड़ाई..... पराठे सेकने चली आई.... आखिरी पराठा सेंंक रही थीं.... मन भटक रहा था.... कहां रह गया है लड़का.... सारी रात घर नहीं आया.... इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ है..... देर सबेर घर आता ही है.... याद आया कल उपका सण्ड मुसण्ड दोस्त दोस्त क्या तो नाम है.... लालू ने गली से ही आवाज दी थी, ‘‘सुमीत ! जल्दी आ.... आज काम खत्म करना ही है ।’’ नाश्ता अधूरा छोड़कर सुमीत जाने लगा था मैं बोली थी- ‘‘दोपहर खाने केे वक्त तक आ जाना.... मैं शाम को बाजार जाऊँगी....।’’
‘‘नहीं मां.... मेरा इंतजार मत करना.... तुम खा लेना.... कहते हुये विचित्र नजरों से मेरी तरफ देखा.... कुछ और कहूँ-पूछूं इससे पहले जूते पहन खड़ा हो गया..... और हाँ..... एक अजीब बात और हुई.... ठीक मेरे सामने मेरे दोनों कंधों पर हाथ रखकर मेरी ओर देखता रहा.... मानो कुछ कहना चाह रहा हो.... पर कह न पा रहा हो....। सिर उठाकर उसे देखी.... हाँ आजकल उसे देखने के लिए मुझे सिर उठाना होता है.... लंबा ताड़ जो हो गया है।’’
शायद मेरी आंखों में घिर रहे प्रश्रों को उसने समझा ‘‘वो कुछ नहीं.... चलता हूँ’’ बोलकर बिना पीछे मुड़कर देखे चल गया.... बाइक फर्राटे भरती निकल गई....। प्रशांत को तो वैसे भी बेटे से कुछ लेना देना रहता नहीं..... वे आॅफिस चले गये । शाम को घर आये, वही नित्य का नियम..... खा पी सो गये....। सोने से पहले पूछे भी ‘‘क्या बात है प्रभा ! तुम कुछ अनमनी सी लग रही हो? तबीयत ठीक है न?’’ बस......जिसकी fचंता में मरी जा रही हूँ उसके विशय में कोई प्रश्र नहीं.....।
फोन की घंटी चीखे जा रही थी.... घड़ी पर नजर गई साढ़े तीन बजे थे..... यानि अभी सुबह होने में काॅफी देर है..... तो असमय यह फोन..... धड़कनें बढ़ गई.... अनहोनी की आशंका ने मुझे जड़कर दिया था कि ये झुंझलाये ‘‘देखो ! किसका फोन है ? ये फोन भी अजीब मुसीबत है....।’’
हलो-बोलते ही उधर से आवाज आई ‘‘क्या यह मिस्टर प्रशांत भंडारी का घर है में सदर कोतवाली से इंस्पेक्टर सुशील वर्मा बोल रहा हूँ....।’’
इस समय पुलिस इंस्पेक्टर का फोन.... सुमीत.... सुबह से गया अभी तक लौटा नहीं है.... हे भगवान्..... फिर से आवाज आई- ‘‘हलो.... मि. भंडारी को बुला दें.... जरूरी खबर है.....।’’
भय को दूर हटाकर साहस जुटा कर बोली- ‘‘मैं मिसेज भंडारी बोल रही हूँ कहिये....क्या खबर है ?’’
इस बार स्वर में विनम्रता छलक रही थी- ‘‘मिसेज भंडारी..... अफसोस के साथ बता रहा हूँ कि बुरी खबर है सुमीत पुलिस से बचने के लिए भागते हुए रेल्वे लाइन पार करते समय टेªन की चपेट में आ गया..... सदर अस्पताल में उसकी मौत हो गई....।’’
रिसीवर मेरे हाथ से छूटकर गिर गया..... तब तक ये भी उठ बैठे थे.... दोनों हाथों से मुझे fझंझोड़ने लगे- ‘‘क्या हुआ प्रभा ! तुम इस तरह क्यों हो गई.... किसका फोन था ? क्या कहा उसने....।’’
जानती तो हूँ धीरज इनमें कुछ कम ही है..... पर बताना तो होगा.... किसी तरह बताई.... थोड़ी देर अपलक मेरी ओर देखते रहे..... फिर दोनों हाथों से सिर पकड़ लिये- ‘‘हे भगवान! ये क्या हो गया ? बच्चों की तरह रोने लगे.....इन्हें किसी तरह शांत कराई.... पड़ोसी मिस्टर सावंत को जगाई उन्हंे सब हाल सुनाई....। अपनी कार निकाल कर उन्होंने अन्य पड़ोसियों को बताया और इन्हें लेकर थाने चल दिये.....। पड़ोसिनें मेरे पास आ बैठीं.... सबके मन में उत्सुकता थी क्या हुआ, क्यों हुआ कैसे हुआ....?’’
भद्रतावश..... सब चुप थीं.... पूछने की पहल करने का साहस किसी में नहीं था.... आखिर एकलौता.... जवान बेटा.... इस तरह अचानक चला जावे..... तो घर ही उजड़ जाता है....।
सुबह हुई.... दोपहर तक पोस्टमार्टम भी गया..... खबर पाकर सारे शुभfचंतक, मित्र, रिश्तेदार आ गये थे.... दुनियादारी में निपुण लोगों ने सब संभाल लिया....प्रशान्त को ही संभालना कठिन था.... ‘‘सुमीत.... लौट आ मेरे बच्चे.... इस तरह पापा से नाराज नहीं होते.... अब कभी कुछ नहीं कहूंगा.... बूढ़े बाप का सहारा है तू....।’’ बेहोश हो गये थे प्रशान्त.... किसी तरह लोगों ने उन्हें संभाला.... तभी तो डाॅ. जोशी ने उनके लिए नींद जरूरी समझा.... ठीक भी है.... इस तरह.... कुछ शांत हो जायेंगे....।
रही मैं.... तो मेरे लिए रोना कठिन है.... सालों से रोती ही तो रही हूँ..... अब आंसू ही नहीं बचे हैं....। मेरा रोना... अरण्यरोदन ही रहा पति के लिए भी.... पुत्र के लिये भी....।
पहली बार सुमीत के लिए तब रोई थी जब उसके कपड़े धोते समय.... उसकी हाफ पैण्ड की जेब से सिगरेट मिला था.... आठवीं में तब गया था....। पढ़ने लिखने में तो उसका मन लगता ही नहीं था... मुहल्ले के लड़कों के साथ.... सैर-सपाटा.... फुटबाल-क्रिकेट....बस....। मैं कुछ कहूँ तो उसकी दादी सिर पर सवार हो जाती ‘‘अरे ! बच्चा है अभी उसके खेलने कूदने के दिन हैं.... तुम क्यों उसके पीछे पड़ी रहती हो बहू....?’’
इन्हें कभी इतनी फुरसत नहीं मिली कि बेटे का होमवर्क ही करवा दें, दिन भर आॅफिस, शाम को मित्रमण्डली के ताश की महफिल जो रात नौ बजे खत्म होती....।
सुमीत की दादी एकलौते पोते को मुझसे आंख बचाकर रूपया.... दो रूपया पकड़ा दिया करती.... यह अतिरिक्त लाड़ ही सुमीत को बिगाड़ रहा था... पर मेरी सुने कौन ? क्रमशः घर से पांच-दस रूपये गायब होने लगे.... होश तो तब आया जब इनके बटुये से सौ का नोट गायब हो गया.... पड़ोसी दुकानदार ने बताया कि सुमीत उनकी दुकान से बिस्टिक, दालमोल, पेप्सी ले गया है....। पहली बार इन्होंने सुमीत को मारा था.... पर वाह रे.... कबूल नहीं ही किया उसने.... दादी फिर बचाव करने आ गई....। किसी तरह बारहवीं तक पहुंचा.... तब तक उसकी.... दादी हमें छोड़कर चली गई थी.... द्वितीय श्रेणी ही ला पाया.... प्रशांत के सारे सपने चकनाचूर हो गये.... अन्य पिताओं की तरह उन्होंने भी बेटे को इंजीनियर, डाॅक्टर बनाना चाहा था....। बाप बेटे में झड़प हुई सुमीत ने बड़ी बेहयाई से कहा- ‘‘पापा ! अब मैं बड़ा हो गया हूँ मुझे क्या करना है, क्या बनना है उसके बारे में आप कुछ न ही कहें तो ही ठीक है.... आजकल नौकरी में क्या रखा है.... मैं बिजनेस करूंगा..... आखिर आप भर नौकरी करते रहे हैं कितना कमा लिये, क्या बना पाये......।’’
ब्लड प्रेशर के मरीज प्रशान्त का नपुंसक क्रोध..... विवेक की सीमा लांघ गया.... सुमीत को मारने हाथ उठाये ही थे कि सुमीत ने उनका हाथ पकड़ लिया..... खा जाने वाली नजरों से उन्हें देखा.... दांत किटकिटा कर बोला- ‘‘बहुत हुआ.... लिहाज कर रहा हूँ इसका मतलब यह नहीं कि आप चाहे के बाद आपसे..... रूपया पैसा नहीं मागूंगा....।’’
प्रशान्त पर दया आई.... पुरूश जब अपनी ही संतान से हारता है तो नितांत निरीह, असहाय हो जाता है। पहली बार प्रशान्त को अपनी बढ़ती उम्र का अहसास हुआ.... सिर झुकाकर कमरे में चले गये.... मैं चुप थी किसे क्या कहूँ.....?
स्थानीय काॅलेज में बी.काम. करने लगा सुमीत....संगति....ठीक नहीं मिली.... दिनों दिन उसका व्यवहार बदलता जा रहा था । तेज आवाज में गाने सुनना.... उसके कमरे में आकर बैठने वाले मित्रों का अजीब पहनावा, बेअदबी भरा व्यवहार.... कमरे में सिगरेट के धुंये के साथ अजीव कड़वी गंध....। देर रात कर घर लौटना....। सबसे अजीब लगता था कि न तो वो मुझ से पैसे मांगता.... न मैं देती.... कभी पूछी भी तो हंसकर कहता- ‘‘मा ! तुम fचंता मत करो.... अपना इंतजाम मैं खुद कर सकता हूँ.... ।’’ एकाध बार पूछी भी कि ‘‘कहां से कैसे इंतजाम करते हो....?’’ तो जवाब मिला- ‘‘शाम को पार्ट टाइम नौकरी करता हूँ- सेल्समेन का काम है।’’ उस दिन दोपहार को कालबेल बजी.... दरवाजा खोली तो देखी.... मोड़वाले मिश्राजी की बेटी अनुभा खड़ी है.... कैसी तो दिख रही थी.... आंखों के इर्द-गिर्द काला घेरा, निस्तेज, बुझा-बुझा चेहरा.... ‘‘सुमीत तो घर पर नहीं है बोली तो उसने कहा’’ मैं आपसे मिलने आई हूँ, आंटी.... क्या मैं अंदर जा सकती हूँ....।
दरवाजा छोड़कर उसे अंदर आने का इशारा की.... धम्म से सोफे पर बैठकर..... हांफने सी लगी थी अनुभा....। मेरे हाथ से पानी का गिलास लेकर ‘थैंक्यू आंटी’ बोल एक सांस में गिलास खाली कर दी...। उसे चुप देखकर मैंने पूछा- ‘‘हाँ- अनुभा तुम तो सुमीत के काॅलेज में ही हो न....?’’ तुम लोगों की परीक्षा तो हो गई है रिजल्ट कब तक आ जायेगा ? अनुभा ने कहा- ‘‘अंटी ! सुमीत ने बताया नहीं रिजल्ट तो कल आ गया.... वह दो विशय निकाल नहीं पाया....।’’
मेरे मुंह से ओह ! निकला जानती थी पिछले दो सालों से एक ही परीक्षा दे रहा है.... ‘‘हाँ ! तुम्हारा क्या रिजल्ट रहा ? आगे क्या करोगी.... पूछी ‘‘आंटी मैं प्रथम श्रेणी में पास हो गई.... आगे तो घर वाले पढ़ायेंगे नहीं.... और....और.....’’ हकलाने लगी अनुभा....।
समझ गई मैं शरमा रही है लड़की कि आगे पढ़ाई बंद कर.... शादी की बात सोच रहे हैं घरवाले..... उसकी हिचक.... अच्छी लगी.... तो अभी भी लड़कियाँ.... अपनी शादी की बात करने से हिचकती हैं....। सुशील लड़की है.... पढ़ने में भी होशियार है, देखने में ठीक ही है.... फिर कोई विश्वसुंदरी तो बनना नहीं है.... जिस घर जायेगी.... घर संसार ठीक से संभाल लेगी.... ममता उमड़ पड़ी.... वैसे भी मेरी अपनी लड़की तो ससुराल चली गई है....। मेरी तन्द्र टूटी उसकी आवाज से ‘‘आंटी.... वो मैं.... कुछ बताना चाहती हूँ..... सुमीत है न....।’’ टुकड़े-टुकड़े बोलकर चुप हो जा रही थी बच्ची.... उसे पुचकारते हुये बोली- ‘‘डरो मत अनुभा.... साफ-साफ कहो सुमीत क्या.... कुछ कहा है उसने तुमसे....।’’ मेरी सहानुभूति ने उसे भरोसा दिया.... या डूबते को तिनके का सहारा.... कि रोने लगी..... उसके सिर पर हाथ फेरकर पूछी- ‘‘बोलो बेटा.... क्या बात है.... डरो नहीं.... यहाँ सुमीत नहीं है....।’’
आंसू भरी आंखों से मुझे देखती हुई अनुभा ने कहा- ‘‘जानती हूँ आंटी.... सुमीत.... लालू लोगों के साथ है... वे लोग अच्छे नहीं हैं.... काॅलेज में चरस बेचने की खबर पाकर पुलिस आई थी तो इन लोगों को रात भर के लिए थाने में बंद भी कर दिया गया था... पर जाने कैसे छूट गये....? आंटी सुमीत को मैंने बहुत समझाया कि इनका साथ छोड़ दो.... पर वह मेरी नहीं सुनता... आजकल तो मुझसे मिलता भी नहीं.... बात करना तो दूर है....।’’
मन ही मन हंस पड़ी मैं.... अच्छा तो ये बात है.... पगली लकड़ी.... जो लड़की बाप की नहीं सुनता.... वो तुम्हारी क्यों सुनेगा ? उसे समझाने को बोली- ‘‘अनुभा.... सुमीत बड़ा हो गया है किसी की बात नहीं सुनता.... तुम तो अच्छी लड़की हो.... उसकी बात का बुरा मत मानो.... किसी दिन जबरदस्त ठोकर खायेगा तब अक्ल आयेगी....।’’
इस बार और भी जोर से रोने लगी अनुभा... मैंने भी उसे रो लेने दिया.... कुछ शांत होने पर उसने कहा- ‘‘बात ये है आंटी.... मैं सुमीत को बताना चाहता थी कि घरवालों ने मेरे लिए लड़का देख लिया है.... पंद्रह बीस दिनों में ही शादी कर देंगे....’’ चुप होकर मेरी ओर देखने लगी अनुभा....।
मैं सोच रही थी सुमीत से इसकी शादी का क्या संबंध हो सकता है कहीं ऐसा तो नहीं कि अनुभा उसे प्यार करती है..... नहीं....नहीं.....कहां सुमीत.... बिगडै़ल.... आवारा टाइप लड़का..... कहां..... होशियार संुदर सुशील अनुभा....। पूछ ही ली ‘‘तुम्हारी शादी से सुमीत का क्या लेना देना है.... और फिर तुम सुमीत से इस विशय में क्यों बात करना चाहती हो..... यह सब साफ-साफ बताओ....।’’
अनुभा आखिर आजकल की लड़की है अनावश्यक शर्म को दूर करके बोली- ‘‘आंटी सुमीत ने मुझसे शादी करने का वायदा किया था.... वह भी आज नहीं.... दो साल पहले ही.... उसने वचन दिया था.... पर अब.... फिर रोने लगी....।’’
थोड़ा गुस्सा आया, खीझ भी हुई कि इक्कीसवीं सदी में अंतरिक्ष की सैर करने वाली लड़कियों में भी इतनी भावुकता क्यों ? फिर सुमीत के बारे में सब कुछ जानती है.... बोली- ‘‘देखो बेटा ! शादी ब्याह जबरदस्ती तो होती नहीं.... ठीक है.... उसने वायदा किया होगा..... पर अब नहीं निभा रहा है.... तो तुम जोर जबरदस्ती तो कर नहीं सकती.... कोई भी जोर जबरदस्ती से तो जुड़ नहीं सकता.... तुम काफी समझदार लड़की हो.... माता-पिता का कहना मान कर.... घर बसा लो.... बचपने का यह खुमार.... घर गृहस्थी में डूब जाने पर ज्यादा दिन टिकेगा नहीं....।’’ चुप हो गई मैं । बिफरी शेरनी की तरह मुझे घूरती हुई अनुभा बोली- ‘‘आंटी..... अब बहुत देर हो चुकी है, उसने मुझसे शादी नहीं की.... तो मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी.... इस कलंक को लेकर जी भी नहीं सकूंगी.... कुछ ही दिनों में लोग सब कुछ जान जायेंगे, मेरे मां बाप की इज्जत धूल में मिल जावेगी....।’’ उस समय तो उसे समझा बुझाकर.... घर भेज दी कि मैं सुमीत से बात करूंगी..... पर मैं अच्छी तरह जानती थी कि.... सुमीत के इंकार को इकरार में बदलना मेरे वश में नहीं है। देर रात जब सुमीत आया.... तो मैं उसका इंतजार कर रही थी देखकर.... नाराज हुआ.... लड़खड़ा रहा था, नशे से बोझिल पलकों को किसी तरह खोल कर लटपटाती जबान से बोला-
‘‘वो पागल लड़की.... तुमसे मिलने आई थी.... उसकी इतनी हिम्मत कि मेरी शिकायत करे.... मैं सुमीत भंडारी हूँ मुझे रोकना..... तूफान को रोकना है.... ‘लीभ टुगेदर’ के जमाने में.... शादी.... हुंह.... गले में फंदा डालना मुझे मंजूर नहीं है.... मरने की धमकी से मैं डरता नहीं.... किसी के मरने, जीने से मेरा कुछ बनता बिगड़ता नहीं.... रही मेरी बदनामी की.... तो.... मेरी तरफ ऊंगली उठाने वाले का मैं हाथ तोड़ दूंगा..... जबान खींच लूंगा.... कुछ घृणा हुई पहली बार अपनी कोख को कोसी..... ऐसी संतान से तो निपूती भली थी....अरे... जो पुरूश-स्त्री का आदर न करे वह-पति, पिता या पुत्र कोई भी हो.... घृणा का ही पात्र होता है.... दुख तो इस बात का है कि इसे मैंने जन्म दिया है....। निरूद्देश्य आवेश से कांपने लगी मैं ।
इतना तो तय हो गया कि अनुभा सुमीत से मिल चुकी.... क्या जाने.... उस पर क्या बीती ?
दूसरे दिन..... महरी आई, उसी ने बताया कि मोड़वाले मिश्रा जी की लड़की ने फांसी लगा ली.... पुलिस आई है.... जवान लड़की.... मां बाप ब्याहने की सोच रहे थे..... अब छाती पीट रहे हैं और भी कुछ बोल रही थी.... पर मेरे कानों में अनुभा की बातें गूंज रही थी- ‘‘किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी.....’’ ओह लड़की ! भावुकता के पल भर की कीमत तुम्हें प्राण देकर चुकाने पडें़गे ऐसा तो तुमने सोचा नहीं होगा..... असफल प्रेम की कीमत पुरूश नहीं स्त्री ही चुकाती आई है.... विधि का कैसा विधान है कि अपराध की सजा स्त्री ही भुगतती है, कलंकित स्त्री ही होती है पुरूश सदा निर्दोश ही रहता है ।
सुमीत के व्यवहार पर ध्यान दी.... कोई अंतर नहीं आया.... कहीं कोई अफसोस नहीं.... कोई दर्द नहीं.... अपना ही बेटा.... उसी क्षण अपरिचित, पराया हो गया.... सच कहूँ तो अनुभा ही नहीं मरी थी मेरे लिए सुमीत भी उसी दिन मर गया था । उस दिन रोई थी पर वह रोना अनुभा के लिए था । ओह..... चिड़िया चहचहाने लगी.... एक और सुबह हो गई.... अब प्रशांत संभल जावेंगे..... पर सुमीत अनुभा की बात उन्हें तब ही नहीं बताई थी तो अब बताकर क्या होगा ? वैसे ही पुत्रशोक से अधमरे हो गये हैं.... एक और आघात उन्हें क्यों दूँ....?
प्रशांत.... नींद से उठे आठ बजे- तब तक डाॅक्टर जोशी आ चुके थे.... वैसे भी शोक का प्रथम आघात झेल चुके थे प्रशांत.... अब डरने की कोई बात नहीं थी.....।
दस बजे पुलिस इंस्पेक्टर सुशील वर्मा आये.... सुमीत की घड़ी, बटुआ आदि देने, उन्होंने ही बताया.... कि काॅलेज कैम्पस मैं ड्रग सप्लाई करने वालों के दल में काम करता था सुमीत.... कई दिनों से पुलिस को इस दल की तलाश थी....।
उस दिन नाइट क्लास लगने से कुछ पहले ही सादी वर्दी में पुलिस काॅलेज में पहुंच गई थी.... पकड़े जाने के डर से सुमीत और उसके साथी भागने लगे पुलिस ने पीछा किया.... रेल्वे क्रासिंग पर बाकी साथी तो भाग गये.... विपरीत दिशा से आती ट्रेन की चपेट में सुमीत आ गया था.... अस्पताल पहुंचते ही उसकी मृत्यु हो गई थी....। पुलिस वाले भी तो इंसान ही होते हैं इसलिए प्रशांत को मुझको सान्त्वना दिये.... उनकी ड्यूटी खत्म हुई....।
अच्छा हुआ कि डाॅक्टर जोशी थे.... प्रशांत-मौन फटी-फटी आंखों से सबको देखते बैठे रहे.... हां एक बात हुई कि अब उनकी आंखें भी रेगिस्तान बन गई थी....।


 विचार

  किशोरी गांव छोड़कर आना नहीं चाहती थी । बचपन से इसी गांव में पलकर बड़ी हुई है । नदी किनारे के जंगल, बांध के ऊपर खजूर, छीन पेड़ों की कतार, बरसात के पानी से भरी नदी के किनारे ही उसका शैशव किशोरावस्था में परिणत हुआ है।
किशोरी के पिता एक समय नामी व्यक्ति थे । कुछ एकड़ जमीन में धान की खेती करते थे । बची जमीन में आलू, सरसों, अरहर बोया जाता था, मौसमी सब्जियाँ भी उगाई जाती थीं। हट्टा-कट्टा परिश्रमी, शरीर का मालिक, निताई एक दिन छीन पेड़ से गिरकर घायल हो गया । इसके पहले भी अनेक बार छीन पेड़ पर चढ़ा था ।
उसी दिन क्या हुआ कौन जाने ? छीन पत्ता काटते-काटते हाथ फिसल गया । संभलने की हर कोशिश व्यर्थ हुई, कटे पत्ते के साथ ही निताई जमीन पर गिर पड़ा । भाग्य से कीचड़ में गिरा था इसीलिए प्राण बच गये किन्तु इस तरह बचने से मरना ही बेहतर था कारण कि इस तरह टूटे हाथ पांव, लाठी के सहारे झुकी कमर के साथ दरवाजे दरवाजे जाकर भीख मांगने की नौबत तो न आती ।
कुछ महीनों तक रायगढ़ के सरकारी अस्पताल में पड़े रहकर जब घर वापस आया तो निताई बिल्कुल बदल गया था ।
जिस तरह वो बदल गया था इस पृथ्वी का चेहरा भी बदल गया था । जिन लोगों की जमीन पर बटाई पर खेती करता था उन लोगों ने निताई की शारीरिक अक्षमता को देखो, वे समझ गये इस पंगु निताई से खेती नहीं हो पायेगी इसीलिए सारी जमीन निताई वापस लेकर अन्य किसानों को बटाई पर दे दिए । फलस्वरूप निताई के इतने दिनों के साथी दुर्बल हो गये, बैलों को बेचना पड़ा । प्राप्त रकम भी पेट में चली गई..... फिर भी कोई व्यवस्था नहीं हो पाई..... पत्नी और पुत्री किशोरी को लेकर ही उसका घर संसार है।
निताई की पत्नी मलिना आजकल धान उबाल कर मुर्रा, लाई आदि भूनकर कुछ पैसे कमाती है फिर दिन नहीं कटते । कश्ट भरे दिन.... सहजता से कैसे कटे.... एक दिन मुहल्ले की विमला मौसी इनके घर आई । निताई और महिला से बोली- ‘‘घर का तो ये हाल है, तुम्हारे तो दिन कटते नहीं हैं, उस किशोरी को मेरे साथ रायपुर भेज दो, वहां अच्छी नौकरी है, धनी मानी बड़े आदमी के घर रहेगी, पति और एकमात्र बेटी है खूब पैसे वाले लोग हैं। बंगला-गाड़ी सब है। मेरी जान पहचान वाला घर है पास में ही काम करेगी । पेट भर में ही काम करेगी । पेट भर खा पीकर, जी जायेगी, वे लोग लगभग तीन सौ रूपये मासिक तनख्वाह देंगे, खाना रहना फ्री होगा ।’’
विमला रायपुर में किसी के घर नौकरी करती है, इसी गांव के मदनपुर के फूल गली से आसपास के गांवों की अनेक लड़कियों बच्चों को रायपुर ले जाकर घरू नौकरों के रूप में काम दिलाई है, वे सब अब अच्छे से हैं ।
निताई ने भी यह बात सुनी है अब वह घर में ही रहता है। अधिक चलना फिरना कामकाज करना उससे नहीं होता ।
रस्सी बंटता है, चटाई बनाता है इस तरह दो पैसा कमाने की कोशिश करता है । निताई ने कहा- ‘‘तीन सौ रूपये महीने ।’’ निताई की पत्नी मलिना बेटी को अपने से दूर नहीं करना चाहती उसने कहा- ‘‘किन्तु किशोरी काम कर पायेगी,
 लड़की की उम्र मात्र चौदह-पंद्रह साल है, ठीक से काम काज नहीं जानती । मां- बाप का दुलार पाकर ही आज तक पली बढ़ी है।’’ विमला ने कहा ‘‘काम काज के लिए और लोग हैं, मालिक मालकिन दिन भर बाहर रहते हैं, उनकी बेटी की देखभाल के लिए एक जन नौकर खोज रहे हैं।’’ इसके बाद भी विमला ने सुनाया- ‘‘लड़की को बरतन कपड़ा करना नहीं होगा । बड़े आदमी की बेटी का मन रखकर काम करना होगा वही लोग किशोरी को आगे का लिखना पढ़ना भी सिखायेंगे, अच्छे कपड़े पहनने का देंगे, पाउडर, साबुन देंगे....सुख से रहेगी।’’
  निताई भी सोच रहा था इकलौती बेटी है उसको सुख से ही रखेगा । पाठशाला में पढ़ाता भी था । किशोरी पढ़ने में तेज है। कक्षा चौथी में थी.... पांचवीं में बड़े स्कूल गई होती । बड़े घर में शादी करता अनेक सपने देखे थे किन्तु कोई भी सपना पूरा नहीं हुआ, बिना देखभाल के जीवित रहने की लड़ाई-लड़नी होगी किशोरी को । इसीलिए विमला की बात पर वह बोला- ‘‘ओ किशोरी की माँ, उसे जाने दे इसी तरह शायद वो सुख से रहेगी, शहरी बाबू के घर । नहीं तो यहाँ इस घर में बिना खाये मरना होगा ।’’
मां का मन, बेटी के लिए चिन्तित होता ही है, किन्तु विमला बोली- ‘‘मैं तो हूँ । महीने दी महीने में कोई न कोई गांव आवेगा ही, कुछ गलत देखने पर किशोरी को वापस भेज दूँगी ।’’
किशोरी को यह गांव, यह परिवेश, मां-बाप को छोड़ कर परदेश जाना होगा । वहां दू मूठा भात पायेगी इसीलिए मां-बाप उसे शहर जाने को बोलने लगे- ‘‘चली जा किशोरी, वहां में अच्छे से रहेगी।’’
विमला बोली- ‘‘सिर के ऊपर पंखा घूमेंगा टी.व्ही. देखेगी । इतनी सब मिलेगा, फिर भी समय किशोरी की आंखें बरसने लगीं ।’’
निताई की आंखें भी छलछलाने लगीं। बेटी को खिलाने पहनाने की उसकी औकात नहीं है चलो लड़की अपनी मेहनत से कमा खा कर सुख से रहेगी सोचकर बोला- ‘‘जा बेटी, सुख से रहेगी सोचकर बोला- ‘‘जा बेटी, सुख से रहोगी, यहाँ तो भूखों मरोगी ।’’

(2)

जीवित रहने के लिए ही किशोरी विमला के साथ शहर आती है । विमला मौसी रायपुर का रास्ता घाट पहचानती है । यहाँ एक निचले मुहल्ले में घर लेकर रहती है ।
वहीं किशोरी को भी लाकर रखी ।
किशोरी को रूलाई आती थी । लंबा चौड़ा पक्के का घर नहीं टीन के दरवाजे वाली खोली ही थी । पक्के का घर नहीं टीन के दरवाजे वाली खोली ही थी । पक्का रास्ता भी नहीं, नालियों में गंदा बदबूदार पानी भरा हुआ । पेड़-पौधों की हरियाली भी नहीं ।
किशोरी ने पूछा- ‘‘यहीं रहना होगा मौसी ?’’
विमला ने कहा- ‘‘नहीं जी, तुम्हारे रहने की जगह दूसरी है, हां यहीं पास ही है ।’’
दूसरे दिन दिन ही विमला उसे लेकर एक बड़े घर में आई वहां से पैदल आया जाया जा सकता है। बीस पच्चीस मिनट लगता है । बीस पच्चीस मिनट लगता है । यह मुहल्ला बिरला है । उस तरफ तीन मंजिला मकान है, आगे बगीजा, अनेक पेड़-पौधों से भरा हरा भरा परिवेश । मकान के सामने ही दो गाड़ियाँ भी खड़ी थीं ।
संगमरमर से ढंका फर्श, लगता था पैर रखते ही किशोरी फिसल जावेगी ।
विमला का हाथ पकड़ लिया किशोरी ने.... भीत हिरणी सी ।
घर द्वार, साजो सामान को अवाक होकर देख रही थी किशोरी । घर में घुसते ही पांव के नीचे रंगीन नरम...नरम कुछ बिछा हुआ था, फर्श पर ।
उधर एक भद्र महिला ने उनकी ओर देखा ।
किशोरी की नाक में फूलों की महक भर गई, वही महक सारे घर में भरी हुई थी । भद्र महिला का रंग गोरा मानो दूध आलता मिला हुआ हो । पहनी हुई साड़ी मानो अभी खुल जायेगी, हाथ एवं शरीर का अधिकांश अनावृत्त । महिलाओं को इस तरह देखने की अभ्यस्त किशोरी नहीं है ।
भद्र महिला एक चोगे समान चीज को कान से लगा कर दूसरे तरफ चोगे पर मुंह रख कर कुछ बोल कर हंस-हंस के लोटपोट हो रही थी, ये दो लोग अंदर आ रहे हैं इस ओर उसका ध्यान ही नहीं था ।
मुंह रंगा हुआ, भद्र महिला के बाल गर्दन तक कटे हुए थे । किशोरी भयभीत दृश्टि डालकर देख रही थी ।
कितना समय तरह कट गया किशोरी को पता नहीं, वे दोनों एक जगह खड़ी थीं और उनकी बातचीत चल रही थी, वार्तापर्व समाप्त होते ही यंत्र को रखकर इनकी ओर नजर डालने का समय मिला भद्र महिला को ।
विमला ने कहा- ‘‘मेमसाहब ! लड़की को ले आई हूं यदि इसे छोटी मेमसाहब की सेवा में बहाल कर लें ।’’
इस बार भद्र महिला ने किशोरी को देखा ।
आपाद मस्तक किशोरी को देखकर बोली- ‘‘ये कर सकेगी ।’’
विमला बोली- ‘‘मेमसाहब ! नई है पर काम की लड़की है । खूब चटपट काम करती है.... पांच किलास तक पढ़ी भी है..... लिखना पढ़ना जानती है ।’’ कुछ सोचकर मेमसाहब ने कहा- ‘‘तो ठीक है, यदि छोटी मेमसाहब को पसंद हो । ऊपर ही है । खाना, रहना और दो सौ रूपये महीना अभी देंगे काम सीख लेने पर तनख्वाह बढ़ायेंगे ।’’
दो सौ रूपये महीने....। किशोरी क्या सपना देख रही है ? रूपये मिलने से मां पिताजी दोनों समय पेट भर भात सब्जी के साथ खा सकेंगे । इसलिए उसे यहाँ रहना ही होगा ।
विमला को एक अन्य व्यक्ति छोटी मेमसाहब के कमरे की ओर ले चला । साफ सुथरी सीढ़ियां, घर भी बढ़ा है, इस बार कानों में उच्च स्वर से बजते वाद्ययंत्र की आवाज टकराई । अनेक वाद्ययंत्र झम्मा झम एक साथ बजते जा रहे हैं । यह विकट ध्वनि क्रमशः बढ़ती जा रही है । वे लोग सीढ़ी से ऊपर उठने लगे । संगमरमर की सीढ़ियाँ, मोड़ पर लंबे स्टूल पर चमकते हुए पीतल के टब में झाऊ पेड़ या शायद विलायती छोटे ताड़ पेड़ के समान सब पौधे....। दीवलों पर एक दो चित्र, चित्रों को देखकर किशोरी चौंक गई ।
एक चित्र में अलग ढंग के वस्त्रों में एक लड़की.... बेढंगे तरीके से खड़ी थी । प्रयत्नपूर्वक लाई मुस्कान ने ओठों को अधखुला तो कर दिया पर आँखों की उदासी छिपा नहीं पाई थी ।
  वे लोग एक कमरे के सामने आकर खड़े हो गये । दरवाजा खुलते ही वाद्ययंत्रों का शोर और विकट हो.... गया । किशोरी ने देखा तंग पतलून और शर्ट पहने एक लड़की, बाल लड़कों की तरह कटे हुए, समस्त शरीर हिलाकर, कमर मटकाकर उद्दाम गति से वाद्य के साथ नाच रही है । गोरा मुंह लाल हो रहा है फिर भी नाच थम नहीं रहा है । किशोरी अवाक होकर देख रही है, कुछ समय तक नाच-कूद चला वाद्ययंत्र थमते ही नाच भी रूक गया ।
उस तरफ एक सफेद आलमारी में अनेक तरह के बोतल, खाने पीने की चीजों का पैकेट, फल आदि रखा है। उसी में से एक बोतल बाहर निकाल कर पानी पीकर इस बार लड़की ने विमला की तरफ देखा ।
विमला ने किशोरी को पहले ही सावधान कर दिया था । ‘‘यहाँ पर भूल से भी किसी को मां, दीदी ये सब मत बोलना । यह सब सुनकर ये लोग नाराज होते हैं उस मालकिन को बड़ी मेमसाहब और उस लड़की को छोटी मेमसाहब कहना ।’’
किशोरी ने पूछा- ‘‘और मालिक को ?’’
विमला बोली- ‘‘बनते तक उनके सामने न जाना, उनको सब लोग साहब बोलते हैं ।’’ अर्थात यहाँ मां, दीदी इन सबका कोई मूल्य ही नहीं ।
छोटी मेमसाहब ने कंधे पर गिरे बालों को शेर के गरदन के बालों की तरह झटका देकर पूछा, ‘‘यहाँ क्यों, ॅील ?’’
साथ में आये नौकर ने कहा- ‘‘बड़ी मेमसाहब ने भेजा है ।’’
किशोरी को दिखा कर कहा- ‘‘यह लड़की आपके पास रहेगी, आपके हुक्म की तामील करेगी छोटी मेमसाहब ।’’
‘‘ऐसा है क्या ?’’ इस बार छोटी मेमसाहब किशोरी को देखने लगी । विमला बोली ‘‘ बहुत काम-काजी लड़की है मेमसाहब, लिखना पढ़ना जानती है...... पाँच किलास तक पढ़ी भी है.....।’’
छोटी मेमसाहब ने तीखे स्वर में कहा ‘‘ल्वन ेजवच...।’’
अंग्रेजी न समझे हुए भी धमकी खाकर विमला सहम कर चुप हो गई । छोटी मेमसाहब ने किशोरी से कहा- ‘‘पढ़ोगी तो ।’’
किशोरी को हुकुम मानना ही होगा, मां बाप के बाप का सवाल है, जीवन मरण का व्यापार । कर सकेगी..... गरदन हिला दी, मौन स्वीकृति....।
छोटी मेमसाहब ने नौकर से कहा- ‘‘बिस्टू इसके लिए कुछ कपड़े ला दो, बदबू आ रही है, गंवइहा गंध अभी भी है ।’’
विमला से कहा- ‘‘तुम जा सकती हो ।’’
बिस्टू ही विमला को लेकर बाहर जाते हुए बोला- ‘‘ इसके कपड़े वपड़े लाता हूँ मिसि बाबा, उधर के बाथरूम में साबुन-वाबुन है ।’’
अब किशोरी अकेली, इतनी देर तक समझ नहीं पाई थी कि यह कमरा मानो ठण्डा है। एक मशीन चल रही है जिससे ठण्डी हवा आ रही है उसी से एक मृदु गुंजन भी सुनाई दे रही है ।
छोटी मेमसाहब ने पूछा- ‘‘मसाज करना जानती है,’’ किशोरी ने एक दृश्ट देखते हुए कहा ‘‘जी..?’’
मेमसाहब ने विरक्ति भरे स्वर में कहा- ‘‘हाथ पैर दबाना जानती है ?’’
अब की किशोरी बोली हां मेमसाहब । दबा दूं ? लड़की सिहर कर बोली- ‘‘नहीं नहीं.... अभी रूक । पहले अच्छे से साबुन लगाकर नहा, गंदे कपड़ों को उतार कर नये कपड़े पहन उसके बाद देखेंगे । सुन....।’’
इधर का सुसज्जित बाथरूम दिखा कर बोली- ‘‘यह मेरा बाथरूम है वहां मत जाना । उस तरफ तुम लोगों का बाथरूम है । वहां नहा कर उस तरह के कमरे में रहना, वहां से कपड़े बदल लेना तब यहाँ आना’’ अब जाओ ।
उसे बिदा कर एक सिगरेट जलाकर फिर से वाद्य यंत्र चालू करके सर्वांग मटकाते हुए फिर नाचने लगी छोटी मेमसाहब ।
बंद कमरे में सिगरेट की कटु गंध घुमड़ने लगी.... किशोरी वहां से सरक गई ।


(3)

मि. दत्त इन्हीं कुछ सालों में सामान्य अवस्था से उन्नति के चरम शिखर पर विराजमान हुए हैं, इस परिणाम में उन्नति करने के लिए कम परिश्रम नहीं करना पड़ा है । अब वे संभ्रांत अंचल के एक नामी प्रमोटर, बड़े-बड़े सरकारी इमारत तैयार किये हैं। आठ-दस भवन, इस अंचल के बहुत से धनी मानी लोगों के लिए वे ही बना रहे हैं । इसके अतिरिकि नगरों के बड़े-बड़े रास्त, पुल यह सब भी बनाते हैं । इसीलिए मि. मनोज दत्त को दिन रात परिश्रम करना पड़ता है । पदवी धारी कर्मचारियों के आस-पास रहना होता है । परिणाम स्वरूप कहीं तो सिर्फ कागजों में ही पुल निर्माण हो गया.... वही पुल धसक भी गया.... मरम्मत के लिए करोड़ों रूपयों का लेन-देन भी हुआ.... किन्तु यह सब मात्र कागजों में । हर द्वार में भाग बंटवारा देने पर भी मनोज दत्त की कपंनी ने अन्ततः पचास लाख रूपयों को प्रबंध कर ही लिया । इतना ही नहीं बाद में नये पुल- निर्माण को ठेका भी मिला । इस बार वहां असली पुल बनेगा लगभग करोड़ रूपयों का खर्च, उसमें से भी विशुद्ध लाभांश मिलेगा ही ।
अनेक लोग इी तरह से बड़े आदमी हो गये हैं, इसमें अकेले मनोज दत्त का ही अवदान नहीं है उनकी पत्नी लतिका का भी अवदान है । लतिका जब पहले पहल मनोज दत्त के संसार में आई तब मनोज साधारण भाव से ही रहता था.... छोटी-मोटी ठेकेदारी करता रहता था । गोलबाजार की ओर दो कमरों का घर वह भी किराये का ।
लतिका दिखने में सुंदरी ही है । वह भी अच्छे तरीके से रहना चाहती । रूपया-पैसा, वैभव-विलास.... साजो-सामान की लालसा उसे भी थी ।
वह भी किसी होटल में नौकरी करती थी । लतिका ने देखा समाज के एक श्रेणी के हाथों में ही पैसा है, उसने भी समझा प्रतिश्ठा के बंद दरवाजे की चाबी भी उन्हीं के हाथों में है । लतिका ने ही मनोज को टेंडर भरने को कहा । मनोज ने कहा- ‘‘मुझे कौन काम देगा, पैसा भी तो नहीं है ।’’
लतिका ने कहा - ‘‘इसके लिए fचंता मत करो ।’’
अपने चारों ओर कुछ लोगों को घूमते फिरते देखा है लतिका ने । उसने समझा कि उसके पास विशेश संपदा है जिसका उचित मूल्य ये लोग ही देना चाहते हैं ।
मनोज ने टेंडर भरा । उस विभाग के किस बडे़ कर्ता धर्ता को किस होटल में किस तरह आप्यायित किया जाये यह भी लतिका ने हीं मनोज को समझा दिया । बड़े साहब ने खुश होकर दत्त कम्पनी को ही टेंडर दिलवा दिया ।
वही पहली बार मनोज दत्त ने बड़ा काम पाया उसके बाद से ही मनोज दत्त समझ गया कि उसके व्यवसाय में उसकी पत्नी की प्रकृत भूमिका क्या हो सकती है। लतिका ने भी घर के बाहर एक नई दुनिया का संधान पाया । क्रमशः लतिका मनोज की कम्पनी में पार्टनर हुई । बड़ी-बड़ी पार्टियों में सज-धज कर जाने लगी । दिल्ली, मुम्बई के बड़े-बड़े होटलों में कर्ता धर्ता साहबों को आप्यायित करने का प्रबंध करने लगी ताकि कान्ट्रेक्ट हासिल कर सके ।
इन्हीं सब में पति पत्नी दोनों व्यस्त होते गये, उनके संसार में तब एकजन अतिथि आया, उनकी संतान नवनीता ।
लतिका प्रथम-प्रथम घर संसार लेकर ही व्यस्त रहती । व्यवसाय मनोज दत्त देखते किन्तु मनोज ही लतिका को पार्टी में ले जाने लगा ।
क्रमशः लतिका ने भी देखा कि घर संसार के चूल्हें चौके और चार दीवारों के बीच बनी रहने को उसको जन्म नहीं हुआ है । उसका मूल्य समाज के कुछ मनुश्य ही देना चाहते हैं । वह भी उन्हें प्रश्रय देकर अपना काम निकालने की कला में निश्णात हो गई ।
वे लोग गोल बाजार का किराये का घर छोड़कर स्वयं निर्मित बंगले में रहने आ गये । अब लतिका मिसेज दत्त के नाम से समाज में परिगणित है । समाज के उच्च अभिजात्य मनुश्यों के बीज यही उसका परिचय है । अब घर संसार की सीमा उसे बांध कर नहीं रख सकती । अब वह पार्टी, नेता, मंत्री गण को लेकर ही व्यस्त रहती है । व्यवसाय के लिए दिल्ली जाना पड़ता है वह भी हवाई जहाज से ।
यहाँ रहने पर आॅफिस का काम और सामाजिक गतिविधियों में ही मिसेज दत्त व्यस्त रहती है ।
मनोज दत्त भी व्यस्त । साइट जाना होता है अनेक कामों के लिए । शाम को क्लब, पार्टी करते-करते घर लौटते तब तक बिटिया दिन भर मां बाप का रास्ता देखते-देखते पारिचारिका की देख-रेख में सो जाती । मिस्टर और मिसेज दत्त की शारीरिक और मानसिक अवस्था बेटी संग भेंट मुलाकात करने लायक ही नहीं रह जाती । उनकी आंखों में सुरमई, गुलाबी नशा छाया रहता पार्टी में मान रक्षा करने हेतु मद्यपान करना ही पड़ता है ।
फिर भी मिसेज दत्त कभी कभार बेटी के कमरे में आती लड़खड़ाते कदम स्खलित-कण्टस्वर बेटी को प्यार करती कहती डल ेूममज ठंइलए नवीनता दिन भर मां बाप को नहीं देखती, घर में उसका समय कटता आया, नौकर आदि के साथ उसे मानना पड़ता परिचारिका का कठोर आदेश । दुख और अवमानना से लड़की बात ही नहीं करती । जिस महिला को देखती उनमें मां जननी वाली कोई बात नहीं.... एक तरह का क्षोभ होता उसे ।
मां बाप को मानो वह पहचानती ही नहीं । सुबह-सुबह वे दोनों नहा धोकर, नाश्ता करके निकल जाते । वे लोग स्वर्णमृग के पीछे दौड़ रहे होते उस समय नवनीता परिचारिका के पास पढ़ती होती, मां बाप के चले जाते हवा में सुगंधि फैलाते वे लोग लौटेंगे गहन गंभीर रात में ।
तो कभी किसी शाम को घर मंे पार्टी होती जहां नवनीता को जाने का हुकुम नहीं है । तीन तला के कमरे से देखती बगीचे में शराब का फौव्वारा छूट रहा है । मां को पहचानना कठिन हो जाता जैसे अन्य कोई रंगीन महिला हो... बाबा लड़खड़ाते हुए । किसी-किसी रात को बाबा पूरी बेहोशी में ड्राइवर, दरबान के कंधों पर बाहें रखे स्खलित कंठ से अशालीन भाशा में गाली गलौज करते आते ।
मां को भी देखा है किसी अन्य के साथ घर लौटते, गाड़ी से उतरते । उस भद्र पुरूश को जकड़े हंसती मां..... बुरा लगता है..... नवनीता को ।
वे दोनों खुद के लिए और रूपयों के लिए स्वप्र देखने में मग्न रहते नवनीता के लिए उनके जीवन में कोई स्थान ही नहीं है । वह मानो यहाँ अवांछित फालतृ एकजन है, तीव्र अवमानना से उसका मन जल उठा अकारण ही उस ज्वाला का शिकार हुई फूलदानी जिसे उठाकर फेंक दिया, कीमती फूलदानी टूट गई । टेबल को सशब्द उलट दिया उसने ।
नौकरानी और परिचारिका दौड़ कर आईं ।
‘‘ॅींज ींचचमदक घ् ैजवच पजण् पारिचारिका ने कठोर स्वर में कहा ।’’ चीत्कार करके उठी गरज कर उसने कहा ।
चीत्कार करके उठी नवनीता, उसके केश सिंह के केशर की तरह लहरा उठे गरज कर उसने कहा ।
मानो पगला गई लड़की, पारिचारिका की तरफ मोटी सजिल्द भारी किताब को फेंक दिया, जो उसके मुंह पर पड़ा उसका चश्मा छिटक कर जमीन पर गिर पड़ा, बिगड़ते हालात को नौकरानी खिसक गई ।
परिचारिका भी दूसरे दिन ही चली गई ।
मिसेस दत्त लड़की को डांटती, अच्छा व्यवहार, भद्र आचरण शिश्टाचार कुछ भी नहीं जानती ।नवनीता जवाब देती ‘‘वह सब तुम लोगों को सीखना उचित होगा ।’’ मनोज दत्त इस विद्रोहिणी को देखते रह जाते ।
विद्रोह की यह ज्वाला नवीनता के मन में बढ़ती ही चली गई । गाड़ी से स्कूल जाती । तब मां बाबा आफिस में होते- जब लौटती तब भी.... वे लोग कहां हैं इसे नवीनता नहीं जान पाती । स्कूल में एक दो सहपाठी मित्र मिले वे लोग बोलते- ‘‘नीता एक कश तो लो....।’’
वे लोग छिपकर सिगरेट पीने बगीचे में जाते नवनीता किसी जिद के वशीभूत हो कोई अन्याय करना चाहती इसीलिए एक दो कश लेते उसे अच्छा ही लगता । क्रमशः उस चीज का जुगाड़ वही लोग करने लगे । अब तो नवनीता घर में भी वही नशा करने लगी । सारा शरीर-मन एक अजीब उत्तेजना से भर उठता, आंखों के सामने पृथ्वी का रूप की बदल जाता ।
अकारण क्रोधित होकर लड़की झंझट करे, तोड़-फोड़ करे, आया, काम वाली लड़कियों को मारे, वे भी भाग कर जान बचातीं ।
मिसेज दत्त देशानी में पड़ गई । मनोज दत्त बोलते- ‘‘लड़की बिगड़ गई है । नौकर चाकर टिकते नहीं ।’’ मिसेज दत्त कहती ‘‘ठीक हो जावेगा...। नौकर-चाकरों की कमी नहीं है, कुछ ज्यादा रूपये देंगे ।’’
घर में, इसके बाद भी तीन चारजन आये मिसिबाबा का काम करने, सभी लोग दो तीन महीने में ही भाग गये । उनमें से एकजन ने तो दो तला से कूदकर प्राण बचाये ।

(4)
इसके कुछ दिनों के बाद किशोरी यहाँ आई । विचित्र है यह परिवेश, दिन भर घर में नौकर चाकरों का राजस्व रहता हैं।
साहब, मेम साहब नहीं रहते ।
मिसिबाबा के स्कूल की छुट्टी है । दिनभर वाद्ययंत्र का कानफोडू संगीत, तीन लड़के भी आ जुटते । तिक्त, कटु विचित्र गंध वाला सिगरेट पीते हैं एक लड़का तो मिसिबाबा को लिपटा लेता है ।
किशोरी कमरे में घुसते ही चौंक गई । मेमसाहब ने आकर झट से उसे लात मारकर दूर फेंक दिया गरजने लगी- ‘‘यहां क्यों ? गेट आऊट यू ।’’ माथे पर चोट लगी खून रिसने लगा । किशोरी बाहर आ गई । उसको आज तक किसी ने नहीं मारा । गरीब हैं वे लोग- किन्तु कभी भी किसी की लात खाने को नहीं मिली ।
किशोरी बोली- ‘‘मारी ?’’
‘‘व्हाअ ? मेरे काम की कैफियत देनी होगी ?’’
‘‘आई शैल किल यू ।’’ बिफरी सिंहनी गरज उठी छोटी मेमसाहब....।
उस तरफ रखा फल काटने का चाकू उठाकर उसके गाल में धंसा दिया, खून बहने लगा माथे से भी खून बहने लगा । हाथ में चाकू, बाल पकड़कर कुछ बाल काट दिये । कश्ट, दुख, अपमान से एक झटके में किशोरी ने स्वयं को मुक्त किया, उसी रक्ताक्त अवस्था में ही दौड़ने लगी । पीछे-पीछे चाकू हाथ में लिये बाघिन की तरह वही लड़की... रही है ।
किशोरी दरवाजा खोलकर प्राणभय से व्याकुल दौड़ कर रास्ते पर आ गई..... चीत्कार करने नगी ‘‘ बचाओ, मार डाला.... बचाओ ।’’
उसे इस तरह लहूलुहान देखकर आस-पास के लोग दौड़कर आये । नवनीता दरवाजे पर थमक गई, से छूट गये शिकार को देखने लगी ।
तब तक लोग जुड़ गये, आक्रमणकारी धनी बाप की दुलारी बेटी को लोगों ने देखो । उत्तेजित जनता चीत्कार करने लगी किसी दुकानदार ने हाल देखकर थाने में फोन कर दिया ।
पुलिस आई, जनता नाना प्रकार की बातें करने लगी- ‘बड़े बाप की बेटी बोलकर जो मन में आये वही करेगी । लड़की को मार ही डालती ।’’
तब तक फोन पर सूचना पाकर मिस्टर दत्त भी आ गये । अन्ततः पुलिस आहत, भीत किशोरी का उद्धार कर साथ ले चली । जनता की किसी बात पर पुलिस ने कान नहीं दिया । किशोरी अर्ध मूर्छित.... प्यास से गला सूख रहा था, रह रहकर आंखों के आगे अंधेरा छा जाता था....। उसी अंधेरे में .... अपना घर मां बाप.... दिख जाते.... फिर अंधेरा....।
(5)
निताई सपना देखता कि उसकी लड़की रायपुर में राज कर रही है । अच्छा अच्छा खाना खाती है, अच्छे कपड़े पहनती है । घर में तीन सौ रूपये भेजेगी । कुछ पैसे जोड़कर लड़की की शादी करूंगा.... हाँ घर जमाई ही चाहिए.... बुढ़ापे का सहारा....।
उस तरफ मलिना बरामदे में धूप में बैठी आग जलाकर धान उबाल रही है, उसके बाद ढेंकी में कूटकर चांवल बनावेगी उसी धान को धूप में सुखाकर ।
कठिन परिश्रम करने से ही दो- जून भात जुटता है । बेटी के भेजे पैसे.... किशोरी के ब्याह में काम आवेंगे ।
निताई बोला - ‘‘और इतना परिश्रम करना नहीं होगा किशोरी की मां, अब तुम्हारी बेटी लोगों को पोंसेगी, राज करेगी रायपुर में ।’’
अचानक बरामदे में किसी को आते देखा निताई ने, माथे पर पट्टी, हाथ में भी, गाल में भी पट्टी बंधी । सिर के बाल उलझे रूखे मानो बहुत दिनों से तेल नहीं लगा है, मैली, फटी साड़ी पहने है ।
‘‘किशोरी ! आर्तनाद कर उठा निताई । उसकी समस्त आशा, सारे स्वप्र किसी निर्मम आघात से चूर-चूर हो गये ।’’
मां को पकड़ कर सिसक-सिसक कर रोने लगी किशोरी । पंगु, असहाय निताई गरज उठा ‘‘ये तुझे क्या हुआ, किसने मारा है तुमको ?’’
लड़की व्याकुल होकर रो रही है किन्तु पंगु निताई गरज रहा है निश्फल गर्जन ।
‘‘उसको मार मार कर अधमरा कर दूंगा बोलो..... । मेरी बेटी को मारने का साहस किसमें है जरा देखूं तो....।’’
किशोरी, बात के निश्फल गर्जन की ओर ध्यान नहीं देती, जानती है वहाँ तक उसकी गर्जन ध्वनि कभी नहीं पहुंचेगी वे लोग बहुत दूर रहते हैं, बहुत ऊपर .....। गरीबों का रोना धोना अमीरों के कानों तक नहीं पहुचता वहाँ तो रूपयों की खनक ही सुनाई देती है ।
रो रही है किशोरी, रोकर ही ये लोग अविचार के राज्य में सान्तवना पाने की व्यर्थ चेश्टा करते हैं। विचार पाने के लिए भी तो रूपयों की जरूरत होती है उन्हीं रूपयों की जिसका अभाव किशोरी जैसे लोगों के जीवन में सदैव रहता हैं, रहता था रहेगा ।

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अपराजिता 


घर भरा है.... मायके ससुराल के रिश्तेदार तो हैं ही मित्र-स्वजन भी कम नहीं हैं.... बंगले का कोई कोना जनविहीन नहीं है.... दुल्हन की तरह सजा है बंगला.... आखिर शहर के नामी वकील करण राजसिंह की बेटी की शादी थी.... सारा शहर ठमड़ पड़ा था.... शहनाई के सुर.... क्रमशः दूर और दूर होते गये.... बेटी की विदाई होते ही भरा घर सूना लगने लगता है.... मैं तो मां हूं न इसलिए मुझे तो चारों तरफ सन्नाटा ही लग रहा है....। थक हारकर अपने कमरे की बाल्कनी में छुप गई....।
पिऊ.... पिऊ.... पिऊ.... ओह ! ये आवाज कानों के रास्ते सीधे हृदय में उतरने लगी है.....। घबरा कर दोनों कान बंद कर कर ली.... मर्मभेदी पुकार अंतरतम को मथे डाल रही है.... आह ! तभी तो कवियों ने इसे कसाइन कहा है....। झुंझला गई.... नहीं आवाज से अधिक खुद पर.... आखिर क्यों इतना ध्यान दे रही हूँ.... एक चिड़िया की आवाज ही तो है... पास के बगीचे में जाने कितनी चिड़ियाँ चहकती रहती हैं फिर इसी पर इतना अवश क्रोध क्यों ?
काश ! एक गुलेल मिल जाता.... ताक कर गुगेल चलाती ताकि पिऊ..... पिऊ..... सदा के लिए मौन हो जाता ।
ओह.....गुलेल....हां....गुलेल.... वह तो अनंत के पास ही छूट गया....।
....प्रिया...चौंक पड़ी...जिस नाम को सालों पहले मन की गहराइयों में कैद कर लिया था, आज चेतना के बंद कपाट खोल, जादुई जिन्न सा सामने क्यों आ गया ? जिसे भुला देने की प्राणपण चेश्टा में प्रतिक्षण लहूलुहान होती रही है । कभी आंसुओं ने ढरकना भी चाहा तो रात के अंधेरे का दामन थामना पड़ा... वही नाम.... क्यों...?
पसीने से नहा गई प्रिया... कमरे में आकर निढाल हो पलंग पर औंधी गिर गई....किसी ने बालों को सहलाया तो सिर उठाकर देखी....सिया....खड़ी थी...उसकी प्यारी ननद...जो जाने कब प्रिया की सहेली बन गई....वरना ससुराल और पति....के तानों के बीच जीना कठिन हो जाता । सोच में बाधा पड़ी सिया कह रही थी ‘‘भाभा! थक गई हैं, लो नींबू की शिकंजी लाई हूँ पी लो नींबू की शिकंजी लाई हूँ पी लो... जी थिरा जायेगा....।’’

आम लड़कियाँ सजा से नि.जात पाकर खुश होतीं पर प्रिया अपमानित होती उसके गाल तमतमा जाते....।
लड़के ही पहाड़े याद करें.... गणित का ज्ञान उन्हीं के लिए जरूरी क्यों हैं ? हम लड़कियाँ क्यों नहीं पहाड़े याद करें....गणित क्यों न पढ़ें ? खीज....जिद बन जाती और प्रिया....सारे पहाड़े रटकर अभ्यास के प्रश्न हल कर डालती.... मोती जैसे अक्षरों में प्रश्नों के सही उत्तर देखकर बिसाहू तिवारी हो.... हो-हो हंसते, लड़कों को उसकी कापी दिखाते कभी-कभी खुश होकर कहते- ‘‘प्रिया.... आगे चलकर राजपूत घराने का नाम रोशन करेगी....।’’
उस दिन प्रिया खुशी से फूली न समाती....। घर आकर दादाजी को अपनी कापी दिखाती....खुश होकर दादाजी प्रिया को नये पैसे का सिक्का इनाम में देते...। दादी.... नाराज होकर कहती- ‘‘लड़की की जात को सिर न चढ़ायें ठाकुर साहब.... वकील बैरिस्टर तो उसे बनना नहीं है.... घर गृहस्थी ही तो चलानी है....।
लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने से उनका गुमान बढ़ता है जो घर गृहस्थी के लिए घातक भी हो जाता है।’’
दादाजी स्न्नेहपूर्वक प्रिया का माथा चूमते, हंसकर कहते- ‘‘जा बेटी....तेरी दादी खुद तो पढ़ी लिखी है नहीं..... उसकी बात मत सुन.... खूब ध्यान से पढ़ाई कर तुम्हें शहर में रखकर पढ़ाऊंगा.... जा....।’’
भुनभुनाती दादी को चमकता सिक्का दिखाकर चिढ़ती हुई भाग खड़ी होती थी प्रिया....।
दिसम्बर की एक कनकनाती सुबह.... सारे बच्चे स्कूल के मैदान में इकट्ठे हुए थे.... वार्शिक क्रीड़ा प्रतियोगिता में भाग लेने.... 400 मीटर की दौड़ में भाग लेने प्रिया भी खड़ी थी...रूमाल हिलाकर सीटी बजाई गई, दौड़ शुरू हुई अभी आधी दूरी ही तय की थी प्रिया ने कि पैर के तलवे में कुछ गड़ा.... दर्द पैर में चढ़ने लगा.... प्रिया पिछड़ने लगी...पर नहीं उसे जीतना है, दौड़ पूरी करनी है.... विचारों ने गति पकड़ी साथ ही प्रिया ने भी...दौड़ पूरी हुई प्रिया प्रथम स्थान पर थी... कि आंखों में अंधरों छा गया...गिर गई प्रिया...। मुंदती आंखों से देख पाई कि वही गोरा लड़का अनंत दौड़कर पास आया अपनी कमीज उतार कर प्रिया के पैर में बांधने लगा ताकि बहता खून रूक जाये...। यही था अनंत से प्रिया का प्रथम परिचय...।
फिर क्या... परिचय... प्रगाढ़ होता गया...। रोज मिलते... ढेरों बातें करते.... कभी अनंत उसके गृहकार्य में मदद करता तो कभी प्रिया दादी के हाथों बने पकवान अनंत को खिलाती। पिछवाड़े की अमराई.... में कच्ची अमियां पटापट पटापट गिराता अनंत... हां उसके गुलेल का निशाना अचूक जो था....। तो कभी प्रिया कच्चे पक्के अमरूद तो मीठे बेरों का स्वाद चखाती अनंत को....।
अनंत ने ही बताया कि उसके पिता प्रिया लोगों के मंदिर के पुजारी हैं निर्धन गरीब, ब्राह्यण, प्रिया के दादाजी द्वारा पड़ोसी गांव से बुलाकर बसाये गये हैं। मंदिर की चढ़ोत्री और पुरोहिताई ही जीविका का आधार था।
कभी अनंत अपने पिता के साथ घर आता तो दादा-दादी उसका विशेश आदर जतन करते.... कारण प्रिया के लिए उसने हो गया....वार्शिक परीक्षा हो गई....।
प्रिया की श्रेणी से उत्साहित दादा जी ने उसे शहर भजने का विचार किया, वैसे भी प्रिया के पिताजी रायगढ़ में वकालत करते थे... यश और धन दोनों ही के मालिक थे निरंजन सिंह...।
अशर्फी देवीकन्या में प्रिया ने प्रवेश लिया। नया स्कूल, नये शिक्षक, नये सहपाठी... पर प्रिया का मन बार-बार गांव की पाठशाला के आंगन में पहुंच जाता, जहाँ अनंत था....। छुट्टियांे की प्रतीक्षा रहती थी प्रिया को ताकि गांव जा सके।
क्रमशः प्रिया पर घर से निकलने की पाबंदी होने लगी। बात-बात पर दादी टोकती- ‘‘धीगड़ी हो गई... सऊर नहीं है, ये सहर नहीं, गांव सयानी लड़कियां घर से बाहर जिस किसी से मिलती जुलती नहीं... लोग चार तरह की बातें करते हैं...।’’
   प्रिया क्षीण प्रतिवाद करती- ‘‘दादी अनंत को जिस किसी में क्यों गिनती हो...?’’
प्रतिवाद दादी की धमक में खो जाता...।
काॅलेज की पढ़ाई के लिए घर में फिर विरोध शुरू हुआ इस बार तो अम्मा भी दादी के दल में शामिल हो गईं...। बाबूजी दादाजी का मुंह देखने लगे... आखिर दादाजी ने ऊंच नीच समझाया तो दादी नरम पड़ी फिर भी शर्त थी ‘‘प्रिया लड़की जात है, घर गृहस्थी का काम सिखाई जाने वाली पढ़ाई ही हो तो आगे पढ़ेगी... वरना...बहुत हुआ.... कोई अच्छा घर-वर देखकर विदा करो...।’’
प्रिया ने दादी को समझाया गृह विज्ञान की पढ़ाई गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाने में मदद ही देगी...। महत्वाकांक्षिणी प्रिया... आगे बढ़ी। किरोड़ीमल महाविद्यालय में प्रवेश ले लिया।
15 अगस्त सुबह से रिमझिम बारिश हो रही थी पर भाशण प्रतियोगिता थी सो जाना जरूरी था। यथी समय प्रतियोगिता का परिणाम घोशित हुआ, प्रथम पुरस्कार मिला था अनंत शुक्ला को। चौंक गई थी प्रिया... बलिश्ठ, सुदर्शन युवक हाथों में पुरस्कार थामे मंच पर खड़ा था... वही निर्मल दृश्टि... वही निश्छल मुस्कान....। खुशी से आंखों में आंसू आ गये। प्रिया को द्वितीय पुरस्कार मिला था... मंच पर दोनों आमने-सामने थे.... लगभग चार सालों बाद मिले थे....। पुराने दिन मानो लौट आये थे। पर क्या अकेले.... नहीं... साथ आया था यौवन... सद्यः प्रस्फुटित यौवन... उद्दाम यौवन ने तो कभी किसी अवरोध के आगे सिर नहीं झुकाया... यहां भी व्यक्तिक्रम नहीं हुआ। नियति का अमोध नियम... दो युवा हृदयों को बांधने लगा....।
हर मुलाकात बंधने को और भी मजबूत बनाया गया। प्रणय-कथा तो सदैव एक सी ही होती है... हां यह अवश्य है कि भाग्यवान होते हैं वे जिनका प्रणय... परिणय का रूप ग्रहण करता है। अधिकांश प्रणय की परिणति वियोग ही होती है। प्रिया के उत्साहवर्धन ने अधिक बल दिया या अनंत के प्रेम ने कह सकना कठिन है... पर... साहसपूर्वक अनंत ने अपने पिता से प्रिया के संबंध में कहा... ब्राह्यण देवता तो अग्रि शर्मा बन गये... पुत्र की लानत मलामत की...। राजपूतों की नमक हलाली की याद दिलाये। माँ ने भी जाति का वास्ता दिया... वही पुराना हथियार... मां के आंसू... पिता का गर्जन तर्जन...। कुलांगार बेटा जनने के लिए मां को भी भत्सZना नहीं सुननी पड़ी। कन्यादाय ग्रस्त पिताओं द्वारा उल्लेख किए गए दहेज की भारी रकम का वास्ता भी दिया गया।
इधर प्रिया.... की दशा तो और भी शोचनीय थी.... दादी.... उसकी पढ़ाई को कोस रही थी.... तो अम्मा.... बाबूजी को झट मंगनी.... पट ब्याह की सलाह दे रही थी.... बात यहीं तक रहती तो प्रिया निपट लेती.... प्यारे दादाजी भी विरोधियों में शामिल हो गये। जाति-पांति के साथ चिरिपरिचित... अमीर-गरीब का अंतर समझाया जाने लगा....फिर राजपूत मालगुजार.... अपने ही आश्रित गरीब ब्राह्यण को अपना समधी स्वीकार कैसे करें.... सामाजिक प्रतिश्ठा.... की दुहाई दी जाने लगी....।
चाचाजी ने तो अनंत के परिवार को पुरोहितगिरि से बर्खास्त कर, गांव छोड़ देने की धमकी भी दे दी....।
पूरा परिवार प्रिया का दुश्मन बन बैठा....। वो दादाजी जो प्रिया के मधुर बोल-चाल के लिए लाड़ से उसे प्रियंवदा कहते थे.... प्रिया से बात करना ही छोड़ दिये....।
कभी-कभी प्रिया आत्महत्या की बात सोच बैठती तो अनंद की याद आ जाती जो कहता था- ‘‘प्रिया! आत्माहत्या कायरता है, हम कायर नहीं हैं, अपने प्यार के लिए हम अपने परिवार वालों को दुख, कश्ट, अवमानना नहीं देंगे। जियेंगे.... परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विशम हों हमारे अंतर में हमारे प्यार का दीपक, निश्कम्प जलता रहेगा।’’
प्रिया की आंखें बरसने लगीं...दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी.... शायद सिया बुलाने आई है।
शाम होते न होते मेहमान विदा हो गये, आपाधापी के इस दौर में किसी के पास इतना समय ही नहीं हैं कि चार दिन ठहर कर पहुनाई का सुख ले दें। सिया को ही जबरन रोक लिया.... सिया का साथ प्रिया को हमेशा सुख देता है।
सभी तो थके हुए थे नाममात्र का खाना पीना कर सबने बिस्तरों की शरण ली.....प्रिया ने भी....पर....मन है कि यादों की गलियों में भकटता फिर रहा है.... विवश है प्रिया.....।
उन दिनों बाबूजी के जूनियर वकील के रूप में वकालत शुरू करने वालों में से एक थे सुदर्शन, महत्वाकांक्षी युवक करण राज सिंह....। सजातीय भी थे.... उनके पिता उत्तरप्रदेश से यहाँ आये थे.... सरकारी मुलाजिम बनकर....। बाबूजी की निगाह करण राजसिंह पर ठहर गई.... फिर क्या था आनन फानन में सगाई हुई.... पन्द्रहवें दिन शादी। प्रिया.... दुल्हन बनी ससुराल आ गई.... यहाँ आकर देखी, रातपूतानी शान ही बची है.... जमा जथा तो कुछ नजर नहीं आ रहा था। पुश्तैनी अकड़.... पुरूश प्रधान परिवार में रचा बसा था.... बात-बात में बड़े घर की बेटी का ताना सुनने को मिलता....। प्रिया की पढ़ाई लिखाई का मूल्य मात्र इतना था कि सास को रामायण बांच कर सुनाना पड़ता।
महत्वाकांक्षी करण अपने की प्रगति में डूबे रहते.... कानून की किताबें ही उनकी संगिनी थी प्रिया की उपयोगिता रात को कुछ देर के लिए सिद्ध होती.... उसमें भी अंतरंगता, प्रेम-साहृचर्य के पल कभी आये ही नहीं। शरीर धर्म प्रमुख रहा.... प्रकृति ने अपना काम किया और गोद भर गई....। ममता जीत गई.... प्रिया गोल मटोल स्वस्थ सुंदर बिटिया को पाकर निहाल हो गई.... जीने का आधार मिल गया। कारण की भौहों पर बल पड़ गये.... उन्हें वंश चलाने को बेटा चाहिए था..... सास, ससुर की निगाहों में बहू सुलक्षणा नहीं थीं..... आते ही परिवार के लिए बोझ पैदा करने वाली बहू आदर जतन तो ही नहीं सकी....। कटूक्तियों में बढ़ोत्तरी हो गई.....। ज्यों-ज्यों असम्मान बढ़ता गया प्रिया की जिद बढ़ती गई..... बिटिया का नाम रखा.... अपराजिता.... हृदय का सारा ममत्व ढालकर बेटी को पालने लगी....। बिटिया की शिशु सुलभ भोली मुस्कान.... उसकी तोतली बातें प्रिया को सुकून देती....। करण भूलकर भी राजी को गोद में नहीं लेते....उनकी उपेक्षा प्रिया को चोट पहुंचाती।
कौन जाने....किसकी दुआ काम आई या फिर भगवान् को प्रिया पर दया आई कि इस बार वंश का नाम रोशन करने उसकी गोद में बेटा आया....। करण का मुखमंडल गर्व की लालिमा से उद्भासित हो गया....सास ने प्रिया की पूछ परख शुरू की....। इस सब में राजी और भी उपेक्षित होती गई.....। सास ने पोते को छाती से लगा लिया.... पिता के साथ ही दादा दीदी के अतिरिक्त लाड़ प्यार में अविनाश बड़ा होने लगा।
पति ने स्वतंत्र रूप से वकालत शुरू की तो लक्ष्मी चलकर घर के दरवाजे पर आ खड़ी हुई। रूपया बरसने लगा तो अविनाश को सौभाग्यदाता पुत्र का आसन मिल गया। उसकी हर जिद पूरी की जाती.... महंगे स्कूल में उसे भरती कराया....। घर में पढ़ाने के लिए शिक्षक नियुक्त हुआ। अपराजिता सरकारी स्कूल में पढ़ती रही, प्रिया उसे पढ़ाती कुशाग्र बुद्धि बालिका..... हमेशा कक्षा में प्रथम आती.... पर सिवाय प्रिया के किसी ने उसके सिर पर हाथ फेरकर उसे शाबाशी नहीं दी.... बेटी जो थी.... कितना भी पढ़े आखिर तो दहेज का सामान बटोरकर ससुराल ही जायेगी जबकि अविनाश.... कमाकर लायेगा.... बहू के साथ दहेज भी लायेगा ही सो उसकी कदर बढ़ती गई..... साथ ही बढ़ती गई अविनाश की उद्दण्डता.... मां बहन की तो कभी परवाह की नहीं.... दादा-दादी ही उसके जिदों को पूरा करने वाले प्रियजन थे तो निरंकुशता को प्रश्रय देते थे पिता करण राजसिंह।
दिन गुजरते रहे.....सामान्य द्वितीय श्रेणी में हायर सेकेण्डरी पास कर अविनाश काॅलेज पहुंचा.... पिता की गद्दी उसे ही संभालनी थी अतः वकालत पढ़ने लगा.... छात्र राजनीति में सक्रिय हो गया.... कुछ मित्र बने जो अविनाश को मिलने वाले पैसों पर निर्भर थे उसकी चाटुकारिता करने में दिन-रात लगे रहते। कभी प्रिया ने कुछ कहना चाहा तो करण का पुत्रमोह.... प्रिया को निरूत्तर कर देता।
बुद्धिमति प्रिया ने बेटे का भविश्य देख लिया था... अपराजिता उसकी ममता के छांव तले.... आगे बढ़ती गई.... अर्थशास्त्र में एम.ए. किया, स्वर्ण पदक प्राप्त किया उसने.... हां उस दिन दीक्षांत समारोह में कारण राजसिंह को गर्वोन्नत पिता की भूमिका में देखकर प्रिया के ओठों पर तिरछी मुस्कान आई.... पर वह तो दादाजी की प्रियंवदा ही है ? अप्रिय कुछ बोलना तो उसने कभी सीखा ही नहीं था। धन्यवाद ज्ञापन में अपराजिता ने मंच पर कहा- ‘‘आज की उपलब्धि का श्रेय मेरी मां प्रिया राजसिंह को मिलना चाहिए, जिनके स्न्नेहपूर्ण मार्गदर्शन से ही मैं स्वर्ण पदक प्राप्त कर सकी हूँ।’’
प्रिया का मन भर आया.... आंखों में कुछ कसकने लगा....। आंखें पोछकर देखी अपराजिता सामने थी.... लगा प्रिया की साधना सफल हुई।
दादी अपने दूर के रिश्तेदार से अपरातिजा शादी कर कन्यादान से मुक्त होना चाहती थीं कि अपराजिता ने प्रिया के गले में बाहें डालकर लाड़ से कहा- ‘‘मां मुझे पी.एस.सी. की परीक्षा देनी है मैं बाल एवं महिला विकास अधिकारी बनना चाहती हूँ ताकि समाज में सदियों से उपेक्षित महिला वर्ग के लिए कुछ कर सकूँ....।’’
प्रिया विभारे हो गई लगा उसकी आशाओं, आकांक्षाओ ने ही प्रिया को भाशा दी है। पहली बार प्रियंवदा का प्रतिवादी स्वर, पूरी दृढ़ता से घर आंगन में गूंज उठा.....।
‘‘अपराजिता प्रतियोगी परीक्षा देगी.... शादी बाद में देखी जायेगी....।’’
करण पराजित से लगे....दादी भुनभुनाती रहीं और अविनाश को तो कोई मतलब ही नहीं था। मां बेटी परीक्षा की तैयारियों में जुट गई....प्रिया.... किताबें व्यवस्थित करती.... स्वयं प्रतियोगिता दर्पण जैसी पत्रिकायें पढ़ती....सामान्य ज्ञान की किताबें पढ़कर महत्वपूर्ण अंश अपराजिता को बताती। परिणाम तो पूर्व निर्धारित ही था.... अपराजिता.... महिला विकास अधिकारी बन गई.....।
प्रिया का सपना साकार तो हुआ पर....सारा श्रेय प्रतिश्ठित वकील करण राजसिंह को मिला.... बधाईयाँ उन्होनें बटोरी....। भव्य पार्टी का आयोजन हुआ गर्वित पिता घूम घूम कर बेटी की सफलता का बखान करते रहे....। गणमान्य अतिथि गण.... योग्य पिता की योग्य पुत्री कहते थक नहीं रहे थे। हमेशा की तरह प्रिया.... अलग थलग एक कोने में दुबक गई थी।
उस दिन याद आया कभी अनंत ने ही कहा था- ‘‘प्रिया! हमारी बेटी होगी उसे खूब पढ़ायेंगे....।’’ अरे हाँ ! उसी ने तो अपजिता नाम सोचा था....। करण को तो बेटी के नामकरण की कोई उत्सुकता ही नहीं थी....। प्रिया के दिये अपराजिता नाम को सुनकर हंस दिये थे।’’ वाह! आज के युग में इतना भारी भरकर नाम.... खैर तुम्हारी बेटी है जो नाम रखो....।’’
कथन से स्पश्ट था बेटी प्रिया की है। हां बेटा होता तो बात कुछ और होती..। इसीलिए जब बेटा हुआ तो वकील साहब ने पंडित जी से पूछ परखकर नाम रखा अविनाश....।


(3)

‘‘प्रिया....स्न्नेह सिक्त पुकार ने अंतरतम को भिगो दिया.... जाने कब से इस पुकार को सुनने के लिए कान तरस रहे थे.... हृदय जाने कितनी बाद रोया है.... कितनी साध थी आकुल आह्नान की....। पलकें खोलने में डर लग रहा था.... कहीं सपना टूट न जाये.... माथे पर मृदु स्पर्श.... पलकों की जड़ता क्षणार्ध में विलीन हो गई.... प्रिया की चकित आंखों ने देखा.... करण बैठे हैं सिरहाने.... पर.... हड़बड़ाकर उठने लगी थी प्रिया, कि हल्के हाथों से उसे पुनः लेटा कर ओठों पर ऊंगली रखकर चुप रहने का संकेत किये....।’’
हतप्रभ प्रिया..... स्वप्र और जागरण का अंतर ही भूल बैठी.... कि करण ने कहा- ‘‘प्रिया तुम्हारे जैसी भाव प्रवण भाशा तो मेरे पास है नहीं- फिर भी आशा है मेरी भावनाओं को समझने में तुम्हें कठिनाई नहीं होगी....।’’ थोड़ी देर अपलक प्रिया को देखते रहे.... प्रिया की तो कुछ भी समझ पाने की शक्ति ही नहीं थी..... लंबी सांत खींचकर करण फिर बोले ‘‘प्रिया! हो सके तो मुझे माफ कर दो, तुम्हारी तपस्या ने तुम्हें अपराजिता की गर्विणी माता के पद पर प्रतिश्ठित कर दिया है, अपनी भूल को स्वीकार कर लूँ.... तुम हमेशा सही थी.... बेटी उपेक्षा की अधिकारिणी कदापि नहीं होती, उचित पालन पोशण से वे भी समाज में पिता का सिर गर्वोन्नत कर सकती है। उन्हें भी थोड़ा सा दुलार चाहिये....।’’
करण मौन हो गये, प्रिया की आंखें भर आईं.... पति का यह रूप तो उसने देखा ही नहीं था.... दूसरी बात भारतीय नारी पति को असम्मानित नहीं देख सकती.....अनुशोचना के अंधेरे से करण को बाहर निकालने के लिए प्रिया बोली- ‘‘चलिए वकील साहब! तो आज आपकी अदालत में हम जीत गये.....।’’
करण ने प्रिया के दोनों हाथों को थपकते हुए कहा- ‘‘हम अपनी हार से खुश हुये हैं प्रिया....। हाँ एक अनुरोध है अविनाश को संभालो.... मैंने तो उसे आदमी बनने लायक ही नहीं छोड़ा है.... तुम उसे अवश्य एक योग्य पुत्र, सभ्य नागरिक बना सकोगी।’’
प्रिया को तीनों लोकों का राज्य ही मिल गया.... पुलकते हुए बोली- ‘‘आप fचंता न करें.... मैं तो बिल्कुल खाली हो गई हूँ, अविनाश पर नजर रखूँगी जब अपराजिता सफल हो सकती है तो अविनाश क्यों नहीं, सगे भाई बहन हैं दोनों। आप जरा भी fचंता न करें....।’’
करण की पलकों से दो बूंद आंसू प्रिया के हाथों पर गिर पड़े.... पुरूश की आंखों से गिरी आंसू की बूंदे fस्त्रयों को विचलित कर देती हैं....। प्रिया ने भी करण के हाथों को थपक कर आश्वस्त किया।
दाम्पत्य जीवन में ऐसे भी क्षण आते हैं जब भाशा खो जाती है, मौन मुखर हो जाता है। हृदय का स्पन्दन ही इन क्षणों का साक्षी होता है।
करण राजसिंह सोच रहे हैं ‘‘प्रिया तुम दोनों मां बेटी अपराजिता हो।’’ पराजित तो मैं हूँ पति और पिता दोनों रूपों में।

फिनिशिंग पॉइंट 

मन विशाद से भरा हो तो शरीर भी श्लथ हो जाता है इसीलिए भारी बोझिल कदमों से आरती ने दरवाजा खोलकर घर में प्रवेश किया। पिछले शनिवार को भी इसी तरह अवसन्न मन लेकर सुबोध के साथ सुसराल गई थी। भगवान की कृपा से आरती की सास और सासों की तरह नहीं है, भावप्रवण महिला है, निश्छल स्वभाव है, दूसरों का दुख जानती है इसीलिए सद्यः मातृहीना बहू को गले से लगाकर सान्तवना दे सकीं, यही नहीं सुबोध से भी कहा- ‘‘आरती की मन अपनी मां के चले जाने से भाराक्रान्त है उसका विशेश ख्याल रखना।’’ आरती का मन सास के व्यवहार से भर गया।
मां के असमय चले जाने से मायके में पिता के सिवाय दूसरा कोई नहीं है। मां बाप की इकलौती संतान है आरती, मां के स्न्नेह, ममता, दुलार की एकमात्र अधिकारिणी। साल भर ही हुआ है ब्याह कर ससुराल आये पर मां हफ्ते, पन्द्रह दिनों में एक बार खुद ही आरती के पास आ जायी या आरती को ही दिन भर के लिए बुला लेती। शहर में ही ससुराल होने से आनेजाने में कोई दिक्कत भी नहीं थी, सबसे बड़ी बात न तो सुबोध ने कभी कोई शिकायत की न सास ने कभी टोका।
मातृवियोग आरती के लिए ज्यादा कश्टकर इसलिए हुआ कि वह अच्छी तरह जानती थी बाबूजी मां की अवहेलना ही करते रहे। सुबह से एक पहर रात तक बाबूजी अपने कारोबार में डूबे रहते.... घर में मां अकेली पड़ी रहतीं। ठेकेदारी के काम में बाबूजी ने प्रचुर धन कमाया, घर में सुख सुविधा के सामानों की बहुतायत ही थी, नौकर चाकरों की पूरी फौज थी। गहनों, कपड़ों से आल्मारियाँ भरी हुई थीं। खाने पहनने के शौकिन बाबूजी ने घरू खच्रZ में कटौती करने की कभी सोचा भी नहीं। आये दिन की पार्टियां भी मां को फूटी आंखों नहीं सुहाती थीं। आरती जैसे-जैसे बड़ी होती गई उसने अपने लिए एक नया संसार बसा लिया, जिस संसार में पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद, संगी साथियों का अभाव नहीं था। दिनों दिन अकेली होती गई पहले पति फिर पुत्री का सान्निध्य पाने को तरसती रहीं। उनका अकेलापन दिनोंदिन बढ़ता ही चला गया।
काॅलेज पहुंचते तक आरती समझदार होने लगी, रिश्तों की गरमाहट महसूस करने लगी तब उसने महसूस किया मां का अकेलापन उनके लिए जानलेवा बनता जा रहा है। आरती घर पर रहते तक मां का साथ देती पर वो घर पर रहती ही कितनी देर थी ?
नई उम्र में बंधु बांधव का साथ ही सुखद लगता है। एम.एस.सी. करने लगी थी कि सुबोध से परिचय हुआ, वह परिचय भी कितना नाटकीय था बिल्कुल सिनेमा, उपन्यास की तरह। हुआ यूं कि उस दिन शहर में हड़ताल हो गई थी। बसें, टैक्सी, रिक्शा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था आरती काॅलेज के सामने वाले चौराहे पर खड़ी थी कि तेज हवा के साथ पानी की बछौरें शुरू हो गई। सड़कें वैसे भी सूनी हो गई थी कि एक कार बिल्कुल पास आकर रूकी। ड्राइfवंग सीट पर बैठे सुदर्शन युवक ने सहेली सुधा को आवाज देकर कार में बैठने को कहा।

सुधा तैयार हो गई आरती असमंजस में खड़ी थी, अपरिचित व्यक्ति की कार में लिफ्ट लेना उसे ठीक नहीं लग रहा था। सुधा ने उसकी हिचकिचाहट को समझा-हंसकर बोली- ‘‘आरती ये सुबोध भैया हीं हमारे पड़ोस में रहते हैं, डरो नहीं.... फिर मैं तो हूँ....।’’
सुधा की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि कार मालिक, उसी सुदर्शन व्यक्ति ने हंसकर कहा- ‘‘आइये मैडम ! आज शहर में व्यापारी वर्ग की मांगों को लेकर ह़ताल हो गई है, कोई वाहन तो मिलने से रहा। फिर हमें भी सेवा का अवसर दें, न हो तो बस का किराया हमें ही दे दीजिएगा।’’
आरती को झुंझलाहट हुई जान न पहचान बड़े मियां सलाम। आये बड़े परोपकारी बनने। इधर सुधा जल्दी मचा रही थी आसपास कोई और वाहन भी नहीं था। शाम गहराती जा रही थी, मां fचंता कर रही होगी। विवश होकर ही कार की पिछली सीट पर सुधा के साथ बैठ गई।
बड़े बाजार से थोड़ा आगे ही सुधा का घर था सो उतर गई, आरती भी उतरने लगी तो सुबोध ने हंसकर कहा- ‘‘सुधा! पानी बरसाना बंद नहीं हुआ है भीगने से सरदी जुकाम होना निश्चय है इसीलिए अपनी सहेली का पता बता दो तो घर तक छोड़ दूँगा।’’
सुधा ने हंसकर आरती के घर का पता बता दिया.... आरती के मुंह से कुछ निकला ही नहीं कार सर्र से आगे बढ़ गई। घर के पास कार रूकी तो आरती ने
धन्यावाद दिया, सुबोध ने खिलदंड़े अंदाज में कहा- ‘‘सूखे धन्यवाद से पेट नहीं भरता। कुछ चाय पानी को तो पूछिये ?’’
आरती हतप्रभ हो गई, अपरिचित व्यक्ति को घर पर कैसे बुलाये, मां क्या कहेगी ? कहीं बाबूजी नाराज हो गये तो ? वैसे भी आजकल लड़के इसी तरह जान पहचान बढ़ाते हैं। आरती को विचार मग्र देखकर सुबोध हंस दिये बोले- ‘‘डरिये मत, मजाक कर रहा था.... चाय फिर कभी.... अभी इजाजत दीजिये और हां भाशा की इतनी कंजूसी ठीक नहीं होती।’’ कार मुड़कर आगे चली गई तब आरती ने कालबेल बजाया।
उस दिन की मुलाकात ने अनेक मुलाकातों का सिलसिला जारी कर किया.... परिणाम....सुबोध से आरती की शादी हो गई। आज आरती सुबोध जैसे पति को पाकर अपने भाग्य पर इतराती है तो ससुराल मिलने वाले स्न्नेह, आदर-जतन के लिए भगवान को धन्यवाद देती है।
अनाहूत चले आये विचारों को सिर हिला कर झटकते हुये आरती ने ड्राईंग- रूम को सरकारी निगाह से देखा कहीं कोई नहीं है। दरवाजा औंधा कर बाबूजी और कमला मौसी कहां चले गये ? आगे बढ़ी डाइfनंग टेबल पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। कमला मौसी को घर और बाबूजी का भार सौंपकर गई थी अभी एक हफ्ता ही हुआ है उसे यहाँ से गये.... इसी बीच घर का क्या हाल हो गया हैं ? अच्छे से कमला मौसी को धमकाने की सोचते हुए आगे बढ़ी पर.... ये क्या.... दोनों कमरे खाली हैं..... कहीं कोई नहीं है....। हां एक बात अवश्य नई है कि हर दीवार पर मो की फोटो टंगी है। किसने टंागी और क्यों ?
  याद आया कि सुबह फोन पर मौसी ने बताया था कि बाबूजी का दिमाग ठीक नहीं है.... वे मां की फोटो टांगकर.... फोटो को फूलमाला पहनाते हैं मिठाई खिलाते हैं। पर जीवित रहते तो मां की कोई परवाह बाबूजी ने नहीं की। यहाँ तक कि दिनों दिन पीली कमजोर होती मां को डाॅक्टर के पास भी नहीं ले गये हुकुम जारी कर दिया कि डाॅक्टर मिश्रा के पास ड्राइवर रामखेलावन के साथ चली जावे और भी याद आया कि अंतिम दिन जब मां की हालत बिगड़ती जा रही थी।
आरती बाबूजी के मोबाइल पर मां की हालत की खबर कई बार देती रही, हर बार बाबूजी ने कहा घबराने की बात नहीं है डाॅक्टर की दी हुई दवायें देती रहो, न हो तो डाॅक्टर को घर पर बुला लो, जरूरी काम है टेन्डर खुलने वाला है, यह टेन्डर हाथ से निकला तो लाखों का कारोबार हाथ से निकल जायेगा।
आरती का मन बाबूजी के प्रति सदय तो कभी रहा नहीं.... विरक्ति से भर उठा....आज भी बाबूजी के लिए कोई सहानुभूति उसे नहीं है, हां बेटी होने का फर्ज निभाने ही यहां चली आई है। आगे बढ़कर उसने मां बाबूजी के शयनकक्ष का दरवाजा ठेला.... ठेलते ही दरवाजा खुल गया.... अपार विस्मय से आरती ने देखा....सामने वाली दीवार पर मां की आदतकद फोटो लगी है.... जैसे मां ही खड़ी है और क्या.... मां के गहने फोटो पर लगे हैं.... झन्ना उठा सिर.... गहनों की इस तरह नुमाइश की जाती है.... कहीं किसी ने हाथ साफ कर दिया तो ? नौकर चाकरों, वाला घर ठहरा....। क्रोध और झंुझलाहट आरती को विवश किए दे रहे थे।
किसी की गहरी सांस सुनकर आरती चौंक उठी.... अब देखी कि मां की फोटो के सामने बाबूजी बैठे हैं जैसे कोई पुजारी उपासना कर रहा हो....। एड़ी से चोटी तक आग लग गई.... ऊंह.... ढोंग कर रहे हैं.... जिस मां की इतनी उपेक्षा किये उसी की याद में आंसू बहा रहे हैं। तीखी आवाज में बोला- ‘‘बाबूजी .... यहाँ क्यों बैठे हैं ?’’
शांत स्वर में उत्तर सुनी-’’आरती कब आई बेटा....।’’
उफनते दूध में ठंडे पानी की बूंदें पड़ गई.... ध्यान से देखी बाबूजी.... असहाय निर्बल लग रहे हैं बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी से गाल भर गये हैं.... तो आंखें निश्प्रभ-निस्तेज.... थके हारे बाबूजी का यह रूप आरती की समझ से परे था....जाने क्या था कि बाबूजी का हाथ पकड़कर उठाई जबरदस्ती बाथरूम में ढकेल कर बोली- ‘‘फ्रेश होकर आइये....।’’
कमला मौसी की आवाज आई ‘‘आरती....चाय चढ़ा दूँ।’’ बाबूजी को आ जाने दो मौसी..... कहती हुई आवाज कमरे से बाहर आई। कमला मौसी ने कहा- आरती अपने बाबूजी को अपने पास ले जा.... यहाँ रहे तो पागल हो जायेंगे....। दिन भर घर में बैठे तेरी मां की फोटो देखते, उससे बातें करते रहते हैं। नहाने-खाने के लिए भी दस बार बोलना पड़ता है..... मैं इन्हें नहीं संभाल सकती मुझे छुट्टी दो....।
आरती ने कमला मौसी से पूछा- ‘‘मौसी बाबूजी आॅफिस नहीं जाते ? तुनक कर कमला ने कहा’’ कैसा आॅफिस.... तुम्हें मालूम तुम्हारे बाबूजी ने आॅफिस बेच दिया.... कल प्रदीप वर्मा आकर चेक दे गया है। राम खेलावन की भी छुट्टी होने वाली है, पड़ोसी जायसवाल बाबू से बात हो गई है, गाड़ी भी कल परसों तक बिक जावेगी, वही जायसवाल बाबू खरीद रहे हैं। लबीं सांस खींचकर कमला चुप हो गई।
आरती मानो आसमान से गिरी.... जो आॅफिस बाबूजी को प्राणों से प्यारा था दिन का अधिकांश समय वे वहीं रहते थे, घर में तो खाने सोने ही आते थे.... उसी को बेच दिए.... फिर गाड़ी.... बाबूजी को नई गाड़ियों का शौक सदा से था....। अभी पिछले साल तो सेन्ट्रो लिये थे....। क्या गया है बाबूजी को ? कहीं सचमुच पागल-वागल तो नहीं हो जायेंगे ? पर पागल किसके लिए....मां के लिए.... नहीं.... नहीं.... मां का निश्प्रभ चेहरा आंखों में झूलने लगा....।
बीमार मां के पास दो घड़ी बैठने की जिन्हें फुरसत कभी नहीं मिली उस मां के लिए....पागल.... होना....। प्रेम का यह कैसा रूप है ? बाबूजी के मन के किस कोने में इतना प्रेम पड़ा था.... आरती तो क्या उसकी मां भी तो यह कभी जान नहीं पाई।
ओह मां ! काश तुम आज बाबूजी को देख पाती.... जीवन भर का उपालंभ धुल जाता.... जिस प्रेम को तुम दुश्प्राम्य समझ बैठी थीं वह तुम्हारे कितने पास था.... कितना सहज था उस प्रेम को पाना... ओह मां.... तुमने दाम्पत्य जीवन के इतने सारे सालों में बाबूजी को क्यों नहीं पहचाना ?
बाथरूम का दरवाजा खुला....बाबूजी बाहर आये.... इस बार सफेद कुरते पाजामे में क्लीन शेव बाबूजी.... चिरपरिचित बाबूजी लग रहे थे। क्षण भर में इस घने अवसाद में गुम होते बाबूजी को....रोजमर्रा की fजंदगी में वापस लाना होगा.... मां को खो चुकी.... अब पिता को खोकर.... समय से पहले अनाथ नहीं होना चाहती।
‘‘चाय.... सुनते ही आरती की चेतना लौटी.... बाबूजी से बोली- बाबू जी चाय पीकर तैयार हो जाइये.... आज कहीं बाहर खाना खायेंगे.... बहुत सी बातें करनी है।’’
‘‘बातें यहीं कर लेंगे.... बाहर जाकर क्या होगा ? बाबूजी ने मिनमिनाते सुर में प्रतिवाद किया।’’
आरती ने जारे देकर कहा- ‘‘नहीं.... मैं कुछ नहीं सुनूंगी.... कितने दिनों से आपके साथ बाहर नहीं गई.... आप तैयार होइये मैं राम खेलावन को कहकर गाड़ी निकलवाती हूँ....।’’
राम खेलावन.... गाड़ी निकालने की बात सुनकर...खुशी से उछल पड़ा बोला- ‘‘बेबी! छोटा मुंह बड़ी बात न समझें तो कुछ कहूं.... आप यहीं आ जाइये.... साहब गाड़ी बेचने की बात कर रहे हैं, बरसों से घर का नमक खाते आया हूँ, इस उम्र में कहीं और नौकरी करना कठिन होगा....।’’ आंखें भर आई रामखेलावन की....।
आरती.... जानती है रामखेलावन....ईमानदार आदमी है.... इस घर को अपना समझता है, बाबूजी दुख को भी समझता है....। अच्छा लगा आरती को बल्कि अपने निर्णय पर गर्व हुआ....।
कमला मौसी को अपने लिए कुछ बनाकर खा लेने की हिदायत देकर.... बाबूजी को साथ लिए आरती कार में बैठी....रामखेलावान को बड़े बाजार के तृप्ति रेस्टोरेन्ट चलने को बोली....।
रास्ते भर बाबूजी चुप बैठे रहे..... आरती ने भी उन्हें सहज होने का मौका दिया।
‘तृप्ति’ पहुंचकर आरती कोने वाली टेबल पर बैठी.... बेयरे को बुलाकर बाबूजी की पसंद का शाही पनीर, मलाई कोपता, तड़के वाली दाल, नान और कश्मीरी पुलाव लाने को बोली.... बाबूजी से सूप के लिए पूछा तो उन्होंने सिर हिलाकर हामी भरी।
आरती ने बाबूजी की आंखों में सीधे देखकर पूछा- ‘‘बाबूजी आॅफिस क्यों बेच दिये.... बाहर क्यों नहीं निकलते.... सारा व्यवसाय चौपट होने की कगार पर है.... अपनी कैसी हालत बना लिये हैं....। आखिर आपने क्या सोचा है ?’’
विशादपूर्ण हंसी हंसकर बाबूजी बोले- ‘‘अरे बाप रे ! इतने सारे सवालों का जवाब एक साथ कैसे दूँ..... और फिर यह भी तो सोच रहा हूँ कि मेरी नन्हीं सी बिटिया इतने भारी भरकम सवाल कैसे कर रही है ?’’
ठुनकते हुए आरती ने कहा- ‘‘टालिये मत बाबूजी.... अब मैं बड़ी हो गई हूँ.... आपके लिए सोचने वाला मेरे सिवाय है भी कौन ?’’
गहरी.... लंबी.... सांस खीचकर बाबूजी ने कहना शुरू किया ‘‘आरती! मैं जानता हूँ तुम्हें भी तुम्हारी मां को भी मुझसे शिकायतें रही हैं.... मैं तुम लोगों के लिए समय जो नहीं निकल पाता था। सारे दिन पैसे कमाने के चक्कर में पड़ा घर से दूर ही रहता आया.... पर बेटा.... वह कमाना.... किसके लिए था.... यह नहीं सोचा.... मैं तो अपने परिवार को सुखी सम्पन्न बनाना चाहता था.... दुनिया का हर ऐशो आराम.... देनो चाहता था। मेरे जीवन का उद्देश्य सिर्फ पैसा कभी नहीं रहा.... मेरा सुख.... तो तुम लोगों को सुखी देखने में ही था.....। अफसोस..... सिर्फ इतना है कि मुझे किसी ने समझने की कोशिश ही नहीं की..... इतना ही नहीं.... दोशी भी करार कर दिया.... अपनी बीमारी को मुझसे छिपाकर मां ने मुझे कितनी बड़ी सजा दी है.... इसका अनुमान तो उसे भी नहीं रहा होगा....।’’
बाबूजी की बड़ी-बड़ी आंखों में आंसुओं की धार बहने लगी..... आरती को लगा हिमालय के पिघलने पर ही तो अलकनंदा जन्म लेती है.... वही पतितपावनी गंगा का रूप धारण कर लेती है। पाश्चाताप के आंसुओं ने आरती को भिगो दिया.... आरती का मन पवित्र गंगाजल में स्न्नान कर पावन हो गया। आज उसने बाबूजी को पहचाना, जाना कि खिलंदड़े बाबूजी का हृदय कितनी गहन भावधाराओं से भरा हुआ है।
अपनी आंखें पोंछकर आरती ने कहा- ‘‘बाबूजी नियति के आगे किसकी चलती है.... मां को जाना था चली गई.... मृत्यु को तो टाला नहीं जा सकता....। बाबूजी मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता.... उसकी यादें मन में बसाये हुए भी शेश जीवन को सहजता पूर्वक काटना पड़ता है। अवसाद....दुःख....शोक जीवन को बोझिल बनाते हैं.... जिससे जीवन काटना कठिन हो जाता है।’’
बीच में आरती को बाबूजी बोले- ‘‘आरती....जीवन एक दौड़ है बेटा.... पर हर धावक दौड़ने से पहले फिनिfशंग प्वाॅइंट को छू कर दौड़ना शुरू करता है.... दौड़ चाहे जितनी लंबी क्यों न हो धावक जानता है लौटकर उसे फिनिfशंग प्वाॅइंट पर ही आना होगा। धावक के कदम आगे और आगे दौड़ते चलते हैं पर मन तो वहीं रहता है न बेटा।’’ पल भर मौन रहकर.... भरी-भरी आंखों से आरती को देखते रहे फिर....बोलना शुरू किये तो आरती को लगा बाबूजी की आवाज बहुत दूर से आ रही है।

आंसू भीगी थरथराती आवाज में बाबूजी ने कहना शुरू किया- ‘‘बेटा.... मेरा फिfनंfशंग प्वाॅइंट ही नहीं रहा.... तो अब क्या दौड़ना, कैसा दौड़ना.... दौड़ भी लूं तो लौटकर किसके पास आऊंगा ? दौड़ की जीत से किसे खुशी दे पाऊंगा....? नहीं बेटा.... अब सब कुछ बेच बांचकर.... हरिद्वार चल दूंगा..... शेश जीवन वहीं काटूंगा.... रही तुम.... तो तुम्हें सुबोध जैसा पति मिला है.... वह तुम्हें कभी कोई तकलीफ होने नहीं देगा।’’
आरती ने बाबूजी के हाथ पर अपना रख दिया ‘‘बाबूजी मैं आपको फिनिfशंग प्वाॅfटंग लौटांऊगी....। अभी आप पचपन साल के हैं.... अभी लंबी fजंदगी सामने पड़ी है.... सोचिये अगर बीस पच्चीस साल और जीना पड़ा तो.... ? नहीं बाबूजी.... मैं कमला मौसी को आपका फिनिfशंग प्वाॅइंट बनाऊंगा....।’’
आरती का गला रूंध गया, आंखों से दो मोती टपकने को हुये, बिना क्षण भर का विलंब किए बाबूजी ने मोतियों को सहेज लिया, आखिर सफल व्यवसायी हैं.... सच्चे मोतियांे की कीमत पहचानने में उनसे भूल कैसे हो सकती है ?
आरती ने तुरंत सुबोध को फोन करके अपना निर्णय सुना दिया.....। मन ही मन मां से बोली- ‘‘मां आप जहां भी हैं, मेरे इस निर्णय से आप खुश होंगी, कमला मौसी आपकी प्रिय सहेली हैं, निराश्रित....है..... आपके जाने से वह भी अकेली पड़ गई है..... बाबूजी भी.... तो ये दो अकेले मिलकर शेश दौड़ पूरी करेंगे....।’’


देवधर की शांति


दाहिना हाथ थोड़ी देर तक छाती को थपकी देता रहा, आखिर छाती के भीतर दुंदुभी जो बज रही थी....हाँ.... अनवरत् स्वर सुन पा रहे हैं दोनों कान। किसी भी तरह स्वर थम नहीं रही है.... शांति बाई को समझ में नहीं आ रहा है.... क्या करें कि स्वर थमें.....। आखिर खुश पर ही नाराज होने लगी- ‘‘ऐसा क्यों हो रहा है..... कभी तो हुआ नहीं थी....शादी.... शब्द में कौन सा जादू है.... जिसने इस उम्र में शांतिबाई को विचलित कर दिया है ? सिर भारी होने लगा है, आंखें जलने लगी हैं।
देवधर, सुखराम, रामदुलारे सब चबूतरे में बैठे हैं सबके चेहरे कुछ बदले से लग रहे हैं मानो सबने सोच लिया है कि भगवान ने अच्छी तरह से मुश्किल आसान कर दिया है। परिस्थिति जन्य गंभीरता को दूर करने के लिए ही देवधर हारमोनियम पर सा रे गा मा बजाने लगा.... थोड़ी ही देर में गाने लगा.... ‘‘दिल की चोट ने न दिया चैन से रहने, जब चली ठंडी हवा, मैंने तुझे याद किया....।’’
गाते-गाते उसने शांतिबाई की ओर देखकर बायां हाथ उठाकर माथे से छुआ लिया....। सब हंस पड़े.... शांति बाई को लगा वे लोग उसी की ओर देख रहे हैं शायद अपने ढंग से उसके मन मिजाज को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे अवसरों पर शांति बाई हंसी दिल्लगी में साथ दिया करती है कि कुछ नहीं तो सूखी हंसी का उपहार तो दे ही देती है पर आज मन हालत जैसी उसमें लबीं ठंडी सांस ही छाती से उठकर बाहर आ गई। मन में तोड़ जोड़ अनवरत् चल रहा है। सामने देखने लगी शाfतं बाई, सूर्यास्त होने वाला है, सूर्य की किरणें नदी के लहरों पर अठखेलियां कर रही हैं..... पश्चिम आकाश का कोना-कोना रिक्तम हो उठा है। शांति बाई की आंखें अतीत के दृश्य देख रही हैं, सारी यादें छाती में धक्का मुक्की कर रही हैं, पलकें भारी होने लगीं.....दृश्टि धुंधला गई। आंचल के छोर से आंखें पोंछ सोचने लगी ‘‘किस्मत में क्या लिखा है कौन जाने.... कौन बताये कि विधाता क्या चाहता है.... ?’’
चौंक उठी शांति बाई अरे ! इसी किस्मत ने तो उसके साथ सारा जीवन आंखमिचौली का खेल खेला है। इसी ने तो उसे घर और घरवालों के प्यार से वंचित रखा है कहीं ऐसा तो नहीं यही दुश्मन उसे यहां खींच लाई है ?
राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहते हैं.... आखिर संगम स्थल तो है ही भगवान राजीव-लोचन का धाम भी है....। बड़े दिनों की साध थी राजिम जाकर संगम स्नान करने की.....। पतित पावन राजीव लोचन को गान सुनाने की.... सरंपच की सिफारिश पर सरकारी आमंत्रण मिला.... हुलसती शांति बाई दल बल के साथ यहाँ आ गई.....।
आज सबने मिलकर संगम किनारे दरी बिछाकर गाने बजाने का आयोजन किया था, सुखराम इस तरह के आयोजनों में विशेश उत्साह से भाग लेता है....। गाना-बजाना जमने लगा था किन्तु शंाति बाई का मन रमा नहीं.... कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ भी अच्छा नहीं लगता.... किसी से बात करने का भी मन नहीं होती.....सबने पूछा भी ‘‘क्या हुआ....?
‘‘शांति बाई ने हाथ उठाकर ‘‘कुछ नहीं.... का इशारा किया.... देवधर की आंखों का सामना नहीं कर सकी.... कभी कर ही नहीं पाई... पिछले पांच सालों से शांति बाई की मंडली में शामिल हुआ है.... बलिश्ठ शरीर.... ताम्रवणी घने केश.... सुतवां नाक, ऊँचा माथा, सबसे आकर्शक है उसकी आंखें.... बड़ी-बड़ी लाल डोरे वाली.... जो ओठों की हंसी का रहस्य मौन भाशा में उजागर करती हैं....। नशे-पानी की लत उसे नहीं है.... खिलखिलाकर हंसते तो कभी देखा नहीं गया। अपने बारे में बात करना पसंद नहीं करता....। पैसों के भाग बंटवारे को लेकर कोई झंझट झगड़ा भी नहीं करता.....।शुरू में शांति बाई ने उसे भी अन्य संगतकारों की तरह ही देखा था..... धीरे- धीरे समझ गई कि देवधर बिना बोले कहे.... शांति बाई की सुख सुविधा का विशेश ध्यान रखता है। शांति बाई के साथ अगर कोई गलत व्यवहार करने की कोशिश करे सीना तान प्रहरी की भूमिका ग्रहण कर लेता है। किसी अपरिचित से शांति बाई हंसे बोले यह उसे पसंद नहीं है.... बोलता कुछ नहीं.... उसकी आंखों की भत्सZना मुखर हो उठती है....।’’
पिछले साल भानपुर में शांतिबाई का प्रोग्राम.... आयोजक भूतपूर्व मालगुजार ही थे..... शांतिबाई की प्रशंता करते-करते कब चाटुकारिता पर उतर आये पता नहीं चला...। उसकी रंगीन मिजाजी बढ़ने लगी.... हाथ में पान लेकर शांतिबाई को पान खाने का अनुरोध करने लगा.... शांति बाई.... क्या करे.... न करे सोच कर पसीने-पसीने हुई जा रही थी कि देवधर आया- ‘‘बाई गांव से तुम्हारे बाबू आये हैं अभी भेंट करना चाहते हैं जल्दी चलो....।’’ बोलकर आदेश भरी आंखों से शांति बाई को देखने लगा....।
शांतिबाई को तो उठने का बहना ही चाहिये था.....कृतज्ञ आंखों से देवधर को देखी..... उसी दिन से देवधर का अधिकार प्रतिश्ठित हो गया.... अलिखित अधिकार- पत्र पर मौन स्वीकृति की मुहर लग गई। मंडली के अन्य सदस्यों ने भी देवधर को मंडली प्रधान के रूप में स्वीकार कर लिया....। शांतिबाई को देवधर का आधिपत्य अच्छा लगा.... हर स्त्री की आंतरिक कामना होती है कि कोई ऐसा हो जो उस पर अपना अधिकार अधिकार जताये.... क्रमशः मंडली के कार्यक्रमों की तिथि-तारीख रूपया पैसा.... यहाँ तक कि शांति बाई के पोशाकों का चयन भी देवधर की कर्मसूची में सम्मिलित होता गया।
चिन्तन में बाधा पड़ी.... शाम गहराने लगी थी.... अब डेरे पर चलना होगा.... रात को प्रोग्राम है.... तैयार होना है देवधर की सजग दृश्टि से शांतिबाई की अन्यमनस्कता छिपी नहीं रही। पास आकर उसने पूछा- ‘‘आज तुम उदास क्यों हो, शरीर ठीक है न ?’’
शांति बाई संभल नहीं पाई बोल पड़ी ‘‘मन नहीं लग रहा है प्रोग्राम कैसे करेंगे.... टाल नहीं सकते क्या ?’’
देवधर ने पास आकर उसके माथे को छुआ ‘‘बुखार तो नहीं है फिर तुम्हारी ईच्छा से ही तो यहां आये हैं, प्रोग्राम का पैसा भी ले चुके हैं....।’’
‘‘ सो तो है पर देवधर। आज गाने बजाने का मन नहीं है.... सुर खो गये हैं...... क्या गाऊँगी....?’’ शांतिबाई ने अपनी विवशता को छिपाया नहीं।
इस बार चौंक कर देवधर ने शांति बाई की आंखों में देखा.... क्या देखा.... क्या समझा यह तो वही जाने..... पर घुटनों के बल बैठ गया पहली बार इतने पास बैठा था.... दाहिनी हथेली से शांति बाई के सिर को सहलाकर बोला- ‘‘जो बीत गया है, वो कभी लौटकर नहीं आता.... चाहे सुख हो या दुख....  फिर उसे सोचकर अपना आज और आने वाला कल क्यों खराब करती हो, अभी तो लंबी fजंदगी सामने पड़ी है उसके बारे में सोचो.... अकेली जान.... गा बजाकर कितने दिन काटोगी.... घर परिवार बनाने की सोचो.....’’ चुप हो गया देवधर....।
शांति बाई का हृदय फिर दुंदुभी बजाने लगा.... कैसे बताये कि अकेलेपन से जूझती लहुलुहान हो गई है शांति बाई.... किसी का सहारा चाहती है.... बहुत भागमभाग हो गई अब थिराना चाहती है.... आंखें बरसने लगीं.... बलिश्ट हथेली की पुश्ट ऊंगलियों से बहते आंसुओं को पोंछकर, बड़े दुलार से देवधर बोला- ‘‘चलो.... प्रोग्राम जरूर होगा.... मैं तो हूँ न.... तुम देववंदन गाना .... बाद में हम लोग संभालेंगे.... तुम साथ देना.... आखिर में भजन सुना देना....।’’
जो कहा वही किया देवधर ने.... प्रोग्राम निपट गया.... दूसरे दिन मंदिर दर्शन करना था.... सभी लोग राजीव लोचन मंदिर की ओर चल पड़े....।
भगवान राजीव लोचन के दर्शन कर शांतिबाई का मन थिराने लगा.... आंखें बरसने लगी.... पंडित जी से अनुरोध की पंडित जी ने सहर्श स्वीकृति दे दी....। बिना किसी साज के, सधे कंठ से गाने लगी शांति बाई ‘‘कबहुँकहौं यह रहनि रहौगो जथा लाभ संतोश सदा काहू से कुछ न चहौगो।
....तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अविचल हरिभक्ति लहौगों।
दर्शनार्थी मौन मुग्ध.... ऐसा लगा यह विनयपत्रिका तुलसी की नहीं है यह तो शांति बाई का आत्म निवेदन है.... पंडित जी आरती की थाली लेकर आगे आये शांति बाई ने आरती ली.... माथा प्रभु चरणों में पुनः नत हो गया....। देवधर के सामने आरती की थाली आई.... पंडित जी के संकेत पर देवधर ने आरती ली जाने किस भावावेश में अनामिका उंगली से शांति बाई के माथे पर पूजा का कुंकुंम लगा दिया....। दर्शनार्थी भगवान राजीव लोचन की जय जयकार करने लगे....।
शांति बाई निश्प्रभ निर्वाक् प्रस्तर प्रतिमा अहिल्या की तरह खड़ी थी.... ये क्या कर दिया देवधर ने.... वह भी देवता के सामने.... हृदय तो मुस्कुरा उठा.... पर मस्तिश्क चीत्कार कर उठा....शादी....विवाह....पूर्व अनुभूतियों ने ताण्डव आरंभ कर दिया.... थर थर कांपने लगी शांति बाई मनोवेगों को संभाल न पाकर देह अवश हो देवधर के पैरों पर ही लुढ़क गई....। जाने कितनी देर पड़ी रही शांति बाई.... आंखें खुली तो देखी.... देवधर की गोद में उसका सिर है, परम ममता से देवधर अपने अंगोछे की छोर से शांति बाई के ललाट पर से पसीने की बूंदे पोंछ रहा है.....।
सुखराम, रामदुलारे तथा अन्य संगतकार.... आश्चर्य चकित तो थे पर सबकी दृश्टि में प्रसन्नता की झलक भी थी। पंडित जी के आदेश पर देवधर सहारा देकर शांतिबाई को.... डेरे पर ले चला....।
स्वस्थ होकर शांति बाई ने देवधर की ओर दृश्टि से देखा....। अकुतोमय मुद्रा में खड़ा था देवधर....धीरे-धीरे पास आकर शांति बाई के सिर पर हाथ फिराने लगा।
वाचाल तो वह था ही नहीं सिर्फ इतना कहा- ‘‘शांति बाई जो मैंने उचित समझा किया, यदि तुम्हें स्वीकार न हो मैं अभी यहीं से अपने घर लौट जाऊंगा.... फिर जीवन भर तुम्हारे सामने नहीं पडूंगा....।’’
शांति बाई....अतीत में खो गई.... भूशण लाल उसका पूर्व पति.... गाने का दुश्मन ही था....शांति बाई के गले से सुर निकला नहीं कि उसके हाथ शांति बाई की मरम्मत कर बैठते....।
उसकी काल्पनिक दुश्चरित्रता का fढंढोरा पीटने में भूशण लाल को कभी शर्मिंदगी नहीं हुई....। अंतिम फैसला तो उस दिन हुआ जब घर को सूना पाकर शांति बाई ‘‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई....।’’ तन्मय होकर गा रही थी....सुध बुध खो बैठी थी कि पीछे से पीठ पर बंेत बरसना शुरू हो गया....भागकर शांति बाई आत्मरक्षा करने लगी थी पर वार खाली नहीं गया बायें हाथ की चूड़ियों का तोड़ता हंसिया धंस गया.... लहू की धार देखकर भूशण लाल भाग खड़ा हुआ...शांति बाई चीख उठी.... पास पड़ोस वालों ने अस्पताल पहुंचाया.... लगभग महीने भर बाद घाव तो भर गया.... निशान अभी भी है.... आज फिर वही दाग.... चिनचिनाने लगा है....।
सुखराम कीचीख सुनाई दी ‘‘शांति बाई देवधर को रोक लो.... उसने कोई अन्याय नहीं किया है....।’’
उम्रदराज रामदुलारे ने आगे बढ़कर शांतिबाई के दोनों हाथ पकड़ लिये ‘‘शांति बाई तुम मेरी बेटी जैसी है.... पुरानी बातें भूल जाओ.... भगवान का प्रसाद समझकर देवधर को स्वीकार कर लो.... तुम्हारे अकेले जीवन को सहारा मिल जायेगा....।’’
सभी संगतकार....हाँ....हाँ करने लगे....। देवधर लड़खड़ाते कदमों से चौखट पार करने लगा कि धीमी किन्तु स्पश्ट आवाज आई ‘‘रूक जाओ देवधर, मुझे और इन सबको भी तुम्हारे सहारे की जरूरत है...।’’
क्षण भर स्तब्ध खड़े रहकर देवधर ने मुड़कर देखा शांतिबाई की आंसू भरी आंखों में अतीत का अवसाद और भविश्य की आशा झिलमिला रही थी....।
सालों पहले बिछुड़ गई सहेली की तरह वापस आई लाज ने शांतिबाई के गालों पर सुहाग की लाली मल दी.... सूखे ओंठ मंद मुस्कान से सज गये...।

एक और दिवाकर

लेखन भी एक नशा है, नशे की हुड़क जब उठती है आदमी समय असय नहीं देखता लाख कोशिशों के बावजूद को रोक नहीं पाता। यही देखिये ने सुबह के सात बजे हैं, हवा, धूप-अगरबत्ती और हरसिंगार की भीनी खुश्बू लिये मेरे घर के कोने-कोने में घूम रही है। ध्वनि विस्तारक यंत्र....आदिशक्ति जगत जननी की आराधना के गीत प्रसारित करने में लगा हुआ है.... आज विजयादशमी जो है, जनसमुदाय राम की
जयजयकार कर रहा है.... असत् पर सत् की विजय का पर्व....।
मैं सोच रहा हूँ क्या सचमुच रावण मरा था ? नहीं.... आज तो रावण हमारे भीतर गहरे बहुत गहरे पैठ गया है उसे मारने के लिए किसी राम की आवश्यकता नहीं है। आसुरीकृति के नाश के लिए, शक्ति के अवतरण की प्रतिक्षा न करके हम अपने अंदर की शक्ति को जागृत क्यों नहीं करते ? समस्या और समाधान दोनों हमारे पास हैं तो हम हाय-हाय क्यों करते हैं ? असंख्य प्रश्न नागफनी की तरह चेतना को छलनी किए जा रहे हैं....। बड़ा कठिन है खुद से लड़ना जूझना क्योंकि हम अपने ही तीर-तरकश से आहत होते हैं। खुद को दर्द भी देते हैं, दवा भी....। शायद यही मनुश्य की नियति है.... विधाता ने अन्य प्राणियों को fचंतन न देकर उन पर बड़ा उपकार किया है पर मनुश्य fचंतन की शक्ति पाकर आजन्म स्वयं से जूझता रहता है। कभी जीतता है कभी हारता है, इस हार जीत में कोई अन्य शामिल नहीं होता...।
मैं दिवाकर पटेल.... अरे! मैं तो उत्तम पुरूश है जो बोलता है, सुनने वाला मध्यम पुरूश होता है तो जिसके बारे में बातें हो वह अन्य पुरूश हुआ.... असल समस्या तो यही है कि व्याकरण कायह सामान्य नियम मुझ पर लागू ही नहीं होता क्योंकि दिवाकर पटेल नामक व्यक्ति ही उत्तम, मध्यम और अन्य पुरूश तीनों है.... निपट एकाकी जो है....। सालों हो गये fलंग, वचन, पुरूश का विधान मेरे लिए समाप्त हो गया है.... अथवा यूं कहें कि हाशिये में चला गया है....। पर इससे जीवन में कोई विशेश अंतर नहीं आया है... यथा नियम सुबह होती है आवश्यक-अनावश्यक कामों के बीच झुप्प से शाम आ जाती है.... थका-टूटा शरीर नींद से युद्ध करते-करते शैय्याशायी हो जाता है, रात गुजराती है और जीवन का एक दिन कम हो जाता है। पिछले पच्चीस सालों से दिवाकर पटेल इसी तरह जी रहा है.... व्यतिक्रम दिखाई दिया.... कल शाम को, जब रोज की तरह दिवाकर यानि मैं कंपनी बाग के दाहिने कोने वाली बेंच पर बैठा.... जुगाली कर रहा था.... बीती यादों की जुगाली....।
धीमी, मीठी, जीवंत हंसी की मधुर ध्वनि ने मुझे आकृर्शित किया मुड़कर देखा अशोक के तने से सिर टिकाये एक नवजवान जोड़ा घास पर बैठा है.... दुनिया से बेखबर अपने में मशगूल.... ऊंह....होंगे.....मुझे क्या शोभा देता है कि उनकी तरफ देखूं....उम्रदराज हूँ....नजर अंदाज करना ही वाजिब होगा.... तभी युवती का स्वर सुनाई दिया ‘‘मांटू..... और कितना टालोगे.... अब शादी वादी कर ही लो..... स्थिर होकर बैठने का समय आ गया है....।’’
युवक ने उत्तर दिया- ‘‘प्लीज रानू.... थोड़ा सा वक्त और दो.....बस अबकी बार....पीछे नहीं हटूंगा.....।’’
मैंने अनजाने ही परिचय पा लिया..... कि दोनों माण्टू और रानू हैं जो घर बसाने की बात कर रहे हैं इस संसार में लाखों सालों से लाखों जोड़े इसी तरह अपने नये संसार की रचना करते आये हैं। रानू का स्वर सुनाई दिया ‘‘मांटू-मेरी भी सोचो.... पढ़ाई पूरी हो गई.... मां-पिताजी को सुबह शाम मेरी शादी के लिये.... कोंचती रहती है.... अब तो पिताजी भी सक्रिय हो गये हैं, मित्रों, रिश्तेदारों को कमाऊ दामाद तलाशने की बात कहने लगे हैं....।’’
मांटू अधीर होकर छटपटाती आवाज में बोला- ‘‘रानू....बड़े भइया की गृहस्थी से मैं तो बाहर आ जाऊंगा..... पर विधवा मां को कैसे पीछे छोड़ आऊँ.... भइया के बाल बच्चे बड़े हो रहे है उनकी...... पढ़ाई लिखाई.....का खर्च संभालते हुए घर चलाना भाभी के लिए कितना मुश्किल है ? उस पर मां का बोझ उन पर बना रहे.... यह तो ठीक नहीं है..... आखिर मेरी भी तो कोई जिम्मेदारी है।’’
तनुक कर रानू ने कहा- ‘‘पिछले दो सालों से यही तो सुनती आ रही हूँ..... जब भी मिलते हो.... यही कहते हो..... मैं तो तुम्हें मां की छोड़ आने को नहीं कह रही हूँ.....।’’
मैं सोचने लगा मध्यमवर्गीय परिवार की वही पुरानी कहानी है..... नया कुछ नहीं है.....कन्यादायग्रस्त पिता.... जैसे तैसे सारी जमापूंजी लगाकर एक अदद दामाद खोजकर कन्यादान कर देगा.....रानू.....ससुराल जाकर आज की शाम को भूल जायेगी.... न भी भूली तो मन की अंधेरी में इन यादों को बंदकर ताला लगा वक्त के हाथों चाबी सौंप देगी....। घर गृहस्थी का काम निपटा.... पति के आॅफिस से लौटने की प्रतीक्षा करेगी..... इस बीच बच्चे हो जायेंगे.... उन्हें पालेगी पोसेगी, पढ़ायेगी.... एक दिन वे बच्च जवान होकर इसी कंपनी बाग में बैठेंगे..... एक नये संसार की रचना में व्यस्त हो जायेंगे.... यही नियम है इस संसार का.... नहीं....नहीं यह दुखद अंत क्यों ?
शायद मैं अपनी नजर से आपबीती को ही दुहराना चाहता हूँ....। ऐसा नहीं होना चाहिए.... अन्यथा.... एक और दिवाकर पटेल... इस बेंच पर आकर बैठने को विवश हो जायेगा....। कुछ करना चाहिए.... पर क्या ? कुछ समझ में नहीं आ रहा है....?
चेतना लौटी....बाग का चौकीदर सामने खड़ा था ‘‘बाबूजी.... रात हो गई....घर जाइये.....।’’
चौंक कर मैंने देखा मांटू और रानू जा चुके थे..... बाग खाली हो गया था.... घर चलूं.... चौकीदार के कत्तZव्यपूर्ति में बाधक क्यों बनूं....?

(2)

नमस्ते साहब, गुड मार्निंग सर, नमस्कार पटेल जी..... कानों में पड़ने वाली अभ्य चिरपरिचित आवाजें..... जिनमें कोई नयापन नहीं है। आत्मीयता तो है नहीं..... जो है उसे औपचारिकता ही कह सकते हैं..... फिर भी अच्छा लगता है....घर में पसरे सन्नाटे से उबरने में ये आवाजें मदद करती हैं..... अभी तक मैं इसी दुनिया में हूँ इसका अहसास कराती हैं.....। मंद मुस्कान से अभिवादन स्वीकारते, सधे कदमों से अपने कक्ष में प्रवेश कर गया.....।
कांच लगी बड़ी सी टेबल, रिवाfल्वंग चेयर, साफ सुथरा कक्ष..... छोटी सी फ्ुल दानी में ताजे गुलाब का गुच्छा..... चंदन की भीनी सुगंध वाली अगरबत्ती से धुयें की पतली सी लकीर अभी भी छत छूने का प्रयास कर रही है.....।
प्रतिदिन की तरह हाथ जोड़कर अदृश्य विधाता को प्रणाम किया.... हां इतना तो कृतज्ञ हूँ ही कि सामान्य घर के अति सामान्य युवक दिवाकर को आज उसी विधाता ने प्रवर अधीक्षक, मुख्य डाकघर रानीगंज के पद तक पहुंचाया है।
घंटी बजाते ही.... टोपी ठीक करते, तोंद संभालते जो व्यक्ति हाजिर हुआ वह है चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शिवराम....। यूं तो वह सरकारी मुलाजिम हैं पर जाने क्यों मेरे प्रति अतिरिक्त आदर, सम्मान का भाव रखता है.....। ‘‘सब ठीक तो है न शिवराम’’ पूछते ही रोज की तरह जवाब मिला ‘‘आपकी दया है साहब....।’’ उपस्थिति रजिस्टर मंगाकर देखा..... सभी कर्मचारी उपस्थिति हैं या नहीं क्योंकि किसी के उपस्थित न रहने पर काम....बांटना पड़ता है.... नहीं.... सब ठीक ठाक है....।
जरूरी कामों की सूची देखी, पेंशन प्रकण निपटाना है। कुछ एन.एस.सी. कुछ मासिक आय प्रकल्पों का भुगतान करना है.... संबंधित व्यक्तियों को बुलाकर आवश्यक निर्देश दिये.... कार्योलय का काम सुचारू रूप से आरंभ हो गया। तब तक शिवराम चाय लेकर हाजिर हो गया.... चाय देकर..... गया नहीं.... मैं समझ गया..... शायद कुछ कहना चाहता है.... प्रश्न भरी आंखों से उसकी ओर देखते ही..... हाथ मलते, मोटे ओठों को फैलाकर मुस्कुरा दिया....।
‘‘शिवराम ! कुछ कहना चाहते हो..... बोलो.... क्या बात है.....।’’ चाय पीते हुए पूछा। ‘‘साहब.... वो कम्प्यूटर बाबू आये हैं न.... वो आपसे मिलना चाहते हैं....।’’ बोलकर  ऐसे चुप हुआ मानो अभी कुछ और कहना बाकी है।
‘‘हाँ....मयंक चौधरी न....तो....भेज दो....इसमें पूछने की क्या बात है? उत्तर देकर शिवराम की ओर देखा....हिचकिचाते हुए शिवराम ने कहा ‘‘साहब नयी-नयी नौकरी है....उठती उम्मर में हजार परेशानियां आती हैं उस पर मेहरबानी कीजिएगा....।’’ चुप हो गया शिवराम....। मैं सोचने लगा.... परेशानियां तो आती रहती हैं यदि व्यक्तिगत परेशानी है तो मेरी मेहरबानी की जरूरत ही नहीं है, यदि कार्यालयीन है तो कहने में हिचकने की जरूरत ही नहीं है....। चलो देख ही लूं.... बोला ‘‘शिवराम जाओ मयंक चौधरी को बुला लाओ....।’’
थोड़ी देर में चुस्त दुरूस्त युवक कक्ष में हाजिर हुआ....वाह....सुदर्शन युवक है, बुद्धि-दीप्त आंखें, पतले ओठों पर विनय भरी मुस्कान, मेदहीन शरीर.... लंबा, ऊँचा पूरा युवक है....। साधारण पेंट शर्ट में भी जंच रहा है, सुरूचि संपन्नता पहली नजर में ही किसी को भी प्रभावित कर सकती है....।
‘‘गुड मार्निंग सर....।’’ मयंक चौधरी.....सामने खड़ा था.... इशोर से उसे बैठने को कहा. ‘‘हूँ.... कहिये क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए....।’’ पूछा मैंने....अधिकारी के रौब-दाब का सम्मान करते हुए मयंक चौधरी बोले- ‘‘सर मैंने जी.पी.एफ. लोन के लिए अर्जी दी है, कृपया मेरी मदद करें.....।’’
शिवराम को आदेश दिया ‘‘चौधरी जी की फाइल और दरख्वास्त ले आओ।’’ आदेश का पालन हुआ.... दरख्वास्त देखा.... पैंतीस हजार चाहिए....फाइल देखीं.... मयंक चौधरी की नौकरी मात्र दस महीने पुरानी है....और..... लोन तो मिल ही नहीं सकता...कार्यालयीन नियमों के अनुसार....।
‘‘सर.... बहुत परेशानी में हूँ..... कृपा करके लोन दिलवा दीजिए.....।’’
मयंक की आवाज आई.....चौंक गया मैं..... आवाज पहले कहीं सुना हूँ..... कहाँ.... ? मित्र, परिचित, रिश्तेदार सबको याद किया.... नहीं.... उनमें से किसी की आवाज नहीं है.... फिर....कहां....कब....कैसे....सुना....?
मेरी चुप्पी से अधीर होकर मयंक फिर बोल उठे- ‘‘विश्वास कीजिए सर.... कहीं और से इंतजाम नहीं कर पाया.... इसीलिए....।’’ उसका वाक्य पूरा नहीं हुआ था.... मैं भी उसकी आवाज को पहचान नहीं पा रहा था.... न पहचान पाने की विवशता....झुंझलाहट बन कर उभर आई मैंने कहा- ‘‘मि. चौधरी आप अच्छी तरह जानते हैं कि कुल कटौती का तृतीयांश ही लोन के रूप में मिलता है और अभी आपके खाते में तो पैंतीस हजार जमा भी नहीं हुये हैं फिर....।’’
अधीरता से बोल पड़े मयंक चौधरी ‘‘जानता हूँ सर..... पर मुझे अपनी विधवा मां के साथ अलग घर लेकर रहना है, अब तक नौकरी न होने की वजह से भइया भाभी के साथ रहने पर विवश था.... उनका दो कमरों का घर उनके और उनके बच्चों के लिए ही पड़ता है..... प्लीज सर.... मेरे वेतन से हर महीने किश्तें भरता रहूंगा....।’’
उस आवाज ने फिर मुझे परेशान कर दिया....कितनी विवशता भरी थी..... ऐसा लगा कि पांच फुट दस इंच लंबा युवक छोटे बच्चे की तरह रो न पड़े.... हां.... उसकी आंखें नम होने लगी थी ....दया आई.... पर कत्तZव्यनिश्ठ अधिकारी कितनी विवश होता है कार्यालयीन नियम कानूनों के चलते....। ठीक कहा है उसने.... शत प्रतिशत उचित है कि आखिर वह इसी विभाग का कर्मचारी है.... किन्तु कार्यालयीन नियमों में इस तरह की छूट का कोई प्रावधान नहीं है.....। खुद को भावुक होने से बचाते हुए मैंने अंतिम निर्णय सुना- ‘‘मुझे खेद है मि. चौधरी मैं विभागीय नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता...।’’
विवशता कभी-कभी उग्रता बनकर उभरती है ‘‘आप अधिकारी हैं सर! हम जैसे निम्न मध्यवित्त सामान्य कर्मचारी की विवशता को कभी समझ नहीं सकेंगे..... प्रशासक हैं न आपको काम चाहिए, हमारी मजबूरियों से तो आपको कुछ लेना देना है नहीं.... ठीक है मैं अपनी दरख्वास्त वापस ले लेता हूँ....।’’ मेरी ओर आग्रेय दृश्टि से देखकर, फाइल उठाकर मयंक चौधरी कमरे बाहर चले गये....।
रोज की तरह आॅफिस से निकल कर कंपनी बाग पहुंचा..... परिचित बेंच पर बैठ भी गया..... काम की वजह से मयंक चौधरी बात को भूल गया था.... यहाँ एकांत में सब याद आने लगा.... याद आने लगा अतीत.... इसी तरह की विवशता थी.... पिताजी के अचानक चले जाने से घर गृहस्थी का बोझ मुझ पर आ गया था.... दो-दो बहनों की शादी करनी थी छोटे भाई को पढ़ाना था.... डाक विभाग में डिस्पेच क्लर्क की छोटी सी नौकरी ततोधिक छोटी राशि वेतन की....।
इधर अमृता से मेरे संबंध कब प्रगाढ़ हो गये पता ही नहीं चला....। हम दोनों घर बसाने की सोचने लग पड़े थे.... इधर दो सालों से मैं अपनी समस्याओं से जूझ रहा था पर अमृता के घर वाले उसका हाथ पीले करने लड़का तलाश रहे थे....। आखिर कब तक माता-पिता को टालती भी किस भरोसे पर अंतिम मुलाकात यहीं हुई थी उस दिन.... रो पड़ी थी अमृता.....क्रोध, विवशता, उपालंभ जाने कितनी भावनायें एक साथ बह निकाली थीं.....। सप्ताह भर का समय लिया था मैंने कि अगले रविवार को उसके पिता से उसका हाथ मांग लूंगा..... पर वाह री नियति..... घर पहुंचने पर मां ने बताया कि पड़ोसी केदार नायक की बहन ने अपने इकलौते बेटे के लिए रश्मि का हाथ मांगा है, दान दहेज नहीं चाहिए.....
भर पूरा घर है..... रश्मि की सुघड़ता, सरलता से वे लोग प्रभावित हुए हैं......अगले महीने ही शादी करना चाहते है।
मां की बातें सुन रहा था....... अमृता की सिसकियां कानों में गूंज रही थी..... अन्यमनस्क हो गया था कि मां ने कहा- ‘‘ज्यादा सोच मत बेटा! अपने पुराने गहनों को तुड़वाकर.....नाक, कान, गला के लिए गहने बनवा लूंगी....।’’ कुछ पैसे बचाकर रखी हूँ.... कुछ तुम लोन ले लेना....ऐसा अच्छा लड़का, घर द्वार बार-बार नहीं मिलते....।
सांसों को घुट जाने से बचाने का प्रयास करता हुआ मैं हाथ मुंह धोने उठ गया था.....शादी की तैयारियों में लग पड़ा..... आज सुखी गृहिणी है रश्मि मेरी बहन..... हां इतना अवश्य हुआ कि अमृता के पिताजी से नहीं मिल पाया..... किसी से सुना था..... अच्छे घर में उसकी शादी हो गयी थी..... आज वो कहां है कैसी है नहीं जानता..... हां मैं वहीं उसी जगह रोज शाम को बीते दिनों को तलाशने चला आता हूँ..... यहीं कहीं घास में मेरी उम्र के वे दिन बिखरे पड़े हैं....

    (3)

आज....एक महत्वपूर्ण निर्णय लेकर खुश हूँ..... बैंक से पैंतीस हजार रूपये निकाल लाया हूँ.....। शिवराम को बोलकर मयंक चौधरी को बुलवाया..... आज मयंक चौधरी मुरझाये लग रहे थे..... आंखों की चमक खो गई थी..... ‘‘गुड मार्निंग सर..... आपने बुलाया.... कल के उग्र व्यवहार के लिए क्षमा चाहता हूँ..... बोल कर मेरी ओर देखने लगे.....।’’
आश्वस्त करते हुए मैंने कहा- ‘‘मि. चौधरी उस बात को भूल जाइये..... और हां आपके लिए इस लिफाफे में कुछ है.... लीजिए.....।’’ लिफाफा लेते हुए पल भर हिचके.... फिर लिफाफा लेकर धन्यवाद बोले......। हंसकर मैंने कहा ‘‘पहले लिफाफा खोलकर तो देखिए देखा मयंक चौधरी ने...... चेहरे में आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता छा गई..... मनचाहा खिलौना पाकर बच्चे की आंखों में जो चमक छा जाती है वह उनकी काली पुतलियों में छा गई..... ओंठ कांप कर रह गये.....। प्रसन्नता भी आदमी को मौन कर देती है यह सुना था आज देखा भी.....। मैंने ही कहा- ‘‘कुछ सोचिये मत जो किश्तें विभागीय कोश में भरते..... वही समझिये...... अथवा आपको जैसा सुविधा जनक लगे.....।’’
शिवराम अपनी उम्र का दबदबा बनाये रखकर बोला ‘‘अब खड़े क्या हैं..... सर के पांव छू लीजिए....
धन्यवाद वगैरह जैसा सुविधा जनक लगे....।’’
अपने पैरों पर झुकते मयंक को उठा लिया मैंने..... पल भर में ठण्डी सांस निकल गई..... सब कुछ ठीक-ठाक होता तो अमृता और मेरा बेटा आज इसी उम्र का शायद ऐसा ही होता......।

(4)

परोपरकार करके आदमी कितना खुश होता है..... आत्मप्रसाद भी जीने की रसद जुगाड़ देता है इसका अनुभव आज मुझे पहली बार मुझे पहली बार हुआ.....। आज बोझिल कदमों में से नहीं.....टहलते हुए..... छोटे-छोटे डग भरते डग भरते निर्दिश्ट बेंच पर जाकर बैठ गया.....। हवा का झोंका आया..... हल्की-सी सिहरन जागी..... शरद की शाम है न..... लक्ष्मी पूजा भी तो पास है.....। बड़े दिनों बाद अमृता का स्पर्श अनुभव किया.... ठीक दाहिने कंधे पर..... उसकी देह की खुश्बू.... आसपास बिखर गई है। बुदबुदा उठा ‘‘अमृता....बरसों पहले हुई भूल का थोड़ा सा प्रायश्चित कर सका हूँ.... संकोच वश मयंक चौधरी ने नहीं बताया था पर उसके जीने के बाद शिवराम ने बता दिया था कि मयंक जिस लड़की शादी करना चाहता है उसके पिता ने अन्यत्र लड़का खोज लिया है यदि मयंक जल्दी से इंतजाम न कर पाया तो.....। बुदबुदा उठा मैं ‘‘नहीं....नहीं..... एक और दिवाकर पटेल..... इस बेंच पर कभी नहीं बैठेगा....।’’
‘‘अरे! सर आप....गुड इवfनंग..... सर..... ये रानू है..... मतलब रंजना है..... वो सर बात ये है कि..... हकलाने लगे मयंक चौधरी....। तब तक रानू ने हाथ जोड़ दिये.... बड़ी प्यारी लड़की है..... असमंजस से उन्हें उबारने को मैंने कहा..... ‘‘गुड इवfनंग मयंक..... अरे.... याद आ गया यही तो मांटू की आवाज है.... तो मांटू ही मयंक चौधरी है....।’’


सौतेली माँ


जुलाई की बारह तारीख हो गई.... बारिश आई थी हफ्ते भर पहले.... लगा था गरमी से राहत मिल गई.... पर नहीं.... अब तो और भी बेचैनी बढ़ गई है, उमस भरे दिन-रात.... चिपचिप करता शरीर। सोने की कोशिश में ही थक गई सुमन.... कमरे की लाइट बंद कर पलंग पर लेटी रही..... खिड़की से मुट्ठी भर रोशनी जाने कब चुपके से आकर बिस्तर पर पसर गई.... धुंधली मटमैली रोशनी..... बचपन की धुंधली यादों की तरह....। ये धुंधली यादें..... सुमन को एकांत कमरे में डराती नहीं बल्कि सहेली की तरह गुपचुप बातें करती हैं..... जाने कितनी बातें..... नीम अंधेरा कमरा कब धीरे से रोशन हो जाता है, कलम लिखने लगती है.... लिखती जाती है.... सुबह की पहली किरण साधिकार आकर कलमबंद कर देती है..... सुमन की कहानियाँ इसी तरह जन्म लेती है।
नवजात कहानी की नायिका अपरूप सुंदरी युवती नहीं है, अस्सी बरस की बूढ़ी विधवा है, सुमन की बाल सखी गिगिरजा की मां मंगला.....। पूरे मुहल्ले में महेश की मां के नाम जानी जाती है असली नाम मंगला..... को तो लोग भूल ही गये थे वह तो सुमन ने जिद करके एक दिन पूछा था.... पहले तो टालमटोल करती रही ‘‘क्या होगा नाम जानकर ? मुझे किसी स्कूल में भरती करवाना है क्या या मेरे नाम कोई जमीन जायदाद लिखवानी है ?’’ कुछ झुंझलाकर गिरिजा की मां ने उत्तर दिया था पर सुमन तो नाछोड़बंदी है आखिर हारकर पीछा छुड़ाने के अंदाज में बोली- ‘‘मां बाप ने मंगला नाम रखा था, ससुराल जाते ही भोला की मां के नाम से पुकारी जाने लगी.....।’’ वाक्य पूरा नहीं हुआ था कि सुमन बोल पड़ी ‘‘काकी तुम भूलती बहुत हो.... भोला की मां कहां से आ गई, तुम्हें तो सब लोग महेश की मां कहते हैं......।’’
हां.....पल भर को चुप हो गई महेश की मां, अपनी भूल समझ जाने पर आदमी....चुप हो ही जाता है।
लंबी सांस खींचकर लड़खड़ाती आवाज में बोली- ‘‘सुमन.....तुमसे पार पाना मुश्किल है..... चलो आज बता देती हूँ पर खबरदार..... लिखना विखना मत..... कम से कम मेरे जीते जी तो..... नहीं ही लिखना..... बोलो मंजूर है.....?’’
सुमन ने स्वीकार किया बल्कि वचन दिया..... वचन को निभाया भी क्योंकि आज जब लिखने बैठी तब मंगला काकी को पृथ्वी छोड़े साल भर हो गया है।
उस दिन मंगला काकी ने बताया था कि उनकी पहली शादी राधापुर गांव के माखन साहूकार के बड़े बेटे से हुई थी.....। आस पास के पांच गांवों में नाम था उनका.... लोग...... रूपये पैसे के लिए अटक जाने पर माखन साहू के पास आते थे, सूद का धंधा था, खेती बाड़ी भी थी.....। सम्पन्न व्यक्ति.... दया, धरम भी करते थे। माखन साहू का बड़ा बेटा कामता प्रसाद.... खेती बाड़ी संभालता था.... स्वभाव से सीधा गऊ..... न किसी के तीन में न पांच में....। वैसी ही उसकी पत्नी भी थी.... घर संसार में व्यस्त रहती..... पहलौंठी संतान के रूप में भोला का जन्म हुआ.....। आनंद..... उमंग का ठिकाना न रहा..... माखन साहू पोता पाकर निहाल हो गये.....।
जाने क्या हुआ कि बहू को जचकी-घर छूटते ही बुखार रहने लगा..... पता चला पीलिया भी है..... दवा दारू हुई.... शहर के अस्पताल ले गये तब तक पीलिया ने भयंकर रूप धारण कर लिया था तीन महीने के बेटे को सास की गोद में डाल बहू परलोक चली गई।
छोटे बच्चे को सम्हालना, घर गृहस्थी चलाना बूढ़ी मां के लिए कठिन होने लगा तो बरसी होते की कामता प्रसाद पर फिर शादी कर लेने का दबाव डाला जाने लगा....। बड़े-बूढ़ों के समझाने पर हो या भोला के लालन-पालन के लिए हो बेमन से ही कामता प्रसाद ने पुनर्विवाह की स्वीकृति दे दी.....।
हमारे देश में कन्यादायग्रस्त पिताओं की कमी तो कभी थी नहीं, आज भी नहीं है सो आनन-फानन मंगला बहू बनकर राधापुर आ गई....।
सुमन ने पूछा- ‘‘काकी, आपको मालूम था कि वे दुजवर हैं और उनका एक बेटा है....।’’ काकी ने हंसकर कहा- ‘‘हां- भाई मालूम था मेरी उम्र चौदह पार कर गई थी....।’’
तुंरत सुमन ने कहा- ‘‘तो तुमने आपत्ति नहीं की ?’’ मीठी हंसी से काकी का चेहरा उज्जवल हो गया बोली- ‘‘पगली! उन दिनों लड़कियों से कुछ पूछा थोड़े ही जाता था।’’
सुमन आहत हुई सम्हल कर बोली- ‘‘हां! आगे बताओ न.....। फिर महेश की मां कब बनी और फिर भोला भइया कहां है ?
दुलार से झिड़क कर बोली काकी- ‘‘बहुत जल्दबाज हो तुम, धीरज नाम की चीज नहीं है.... इस तरह टोंकती रहोगी तो मैं कुछ नहीं बताऊंगी.....।’’ धमकी ने असर दिखाया या कहानी न सुन पाने का डर काम आया कि सुमन ने चिरौरी की ‘‘नहीं-नहीं काकी, अब चुपचान सुनूंगी.... अच्छी बच्ची की तरह.... अब बताओ.....।’’
जेठ की सूनी दोपहरी..... सुमन दत्तचित होकर सुनने लगी, सुनाने वाली भी उतनी ही तन्मयता से सुनाने लगी। सदा की अल्पभाशिणी मंगला काकी अपने अतीत को साकार करती मुखर बन बैठी थी....।
मंगला काकी ने बताना शुरू किया- ‘‘ससुराल में सास दुलार मिला.... तो कामता प्रसाद ने पहली भेंट में ही भोला को उसकी गोद में डाल दिया बोले ‘‘आज से अपना बेटा तुम संभालो.... बच्चे को पोसने आदमी बनाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है..... घर तुम्हारा है, हाँ..... बाहर से कमाकर लाना मेरा काम है।’’
मातृत्व, वात्सल्य स्त्री जाति को प्रकृति द्वारा दिया गया सहजात गुण होता है, जननी की गरिमा चाहे जब मिले.... इसीलिए भोला की मां संबोधन सद्यः युवती मंगला के लिए सहज ग्राह्य सिद्ध हुआ। समयानुसार उसकी गोद में बिटिया आई.....भोला बहन को पाकर खुश हुआ....। दिन पंख लगाकर उड़ने लगे.... भोला कुशाग्र बुद्धि का था, अच्छे अंकों से परीक्षा पास करके डाॅक्टर बन गया उसकी इच्छा इंग्लैंड जाकर सर्जरी पढ़ने की थी समस्या पैसों की थी.....घर में दादाजी के बाद बंटवारा हो चुका था पिता कामता प्रसाद अपने सरल स्वभाव के कारण सूद का कारोबार नहीं कर सके खेती पर ही निर्भर रहे....। उन्होंने अपनी विवशता को छुपाया नहीं.... भोला निराश हो गया तो मंगला ने कामता प्रसाद को समझाया कि खेत गिरवी रख दो, घर की बात घर में रहेगी.... भाई तो खेतों के बदले देने को तैयार ही हैं......
भोला जब पढ़ाई पूरी कर लेगा..... सारे कर्ज चुका देना.... हमारे सुख भरे दिन लौट आयेंगे। दबी जबान से कामता प्रसाद ने कहा- ‘‘सोच लो भोला की मां परदेश की बात- फिर जवान लड़का- वह भी सौतेला....।’’ बात पूरी नहीं होने पाई थी कि गरज मंगला ‘‘खबरदार अगर कहकर हम मां बेटे का अपमान किया तो अच्छा नहीं होगा.... अपनी जनी बेटी से ज्यादा भरोसा मुझे भोला पर है.... वो हमें कभी दुख नहीं देगा.....।’’ रो पड़ी मंगला.....। आंसू जीत गये और भोला ने मां को प्रमाण करते हुए कहा..... ‘‘मां .... देखते-देखते ये तीन साल कट जावेंगे..... मुझ पर भरोसा रखना.... वापस आकर मैं खेत छुड़वा लूंगा.....।’’
भरी आंखों से बेटे को विदा की मंगला..... हर पल भोला की याद आती...... दिन गुजरते रहे..... दो साल हो गये..... चिट्ठियां आती...... सावन के नागपंचमी के दिन खेत के मेड़ पर दूध लाई रखने गये कामता प्रसाद.... अकेले नहीं लौट.....चार लोगों के कंधे पर चढ़कर लौटे...... वहीं किसी बैरी सांप ने उन्हें डस लिया था....। मंगला.....की आंखों में अंधेरा छा गया.... यह कैसा सर्वनाश हैं? बिलखने लगी ‘‘भोला के बाबूजी..... बेटा आयेगा तो मैं क्या जवाब दूंगी...... बिना पानी बछिया के जल दिये..... सेवा का मौका ही नहीं दिये...... मुझसे क्या अपराध हुआ जो बिना कुछ कहे सुने मंझधार में छोड़ गये.... आपकी बेटी का गौना भी नहीं कर पाये......।’’
मुहल्ले की महिलाओं ने संभाला.... जात बिरादरी वालों ने कहा- ‘‘भोला के आते तक लाश बिगड़ जावेगी..... इसलिए छोटे भाई के बेटे से दाहक्रिया करवा देते हैं.....। चालाक देवर ने कहा- ‘‘भाभी..... मेरे भी बाल बच्चे हैं...... क्रिया कर्म का पैसा भी खर्च करने को तैयार हूँ पुश्तैनी घर को मेरे नाम कर दो...... नहीं तो जो दाहकर्म करेगा उसके नाम कर दो...... तुमको आदर जतन से रखूंगा..... अभी जैसे रह रही हो वैसे ही मालकिन बनकर ही रहना....।’’
मंगला..... के पास दूसरा रास्ता तो था नहीं.... रोते सिसकते स्टाम्प पर दस्तखत कर दी......। दुर्दिन की शुरूआत तो हो ही चुकी थी..... बेटी की ससुराल वाले समझदार थे......इसलिए अगहन लगते ही बिटिया रानी को गौना करवा कर ले गये...... देवर देवरानी का व्यवहारा दिनों दिन बदलता गया..... मंगला की दुनिया अपने कमरे तक सिमट कर रह गई..... दो जून का खाना मिलता तो था पर जली कटी बातों के साथ....। रोज डाकिये का रास्ता देखती.... सैंतीस की उम्र में साठ की दिखने लगी....।
आखिर डाकिया आया.....समाचार तो मिला..... खुशी होनी चाहिए थी हुई नहीं.... रो पड़ी..... ऐसा लगा आखिरी सहारा भी छूट गया..... अब किस आधार पर जिये...... बार-बार पढ़ने लगी.... भोली ने लिखा था ‘‘मां..... तुम्हारे लिये बहू लेकर अगले महीने आ रहा हूँ लिजा अच्छी लड़की है, मेरे साथ ही डाॅक्टर है, तुमसे मिलने के लिए आजकल वो हिन्दी पढ़ रही है..... उससे मिलकर तुम्हें अच्छा लगेगा....।’’
मंगला.... क्या करे ? जात-बिरादरी वाले तो नाता तोड़ ही लेंगे...... विजातीय बहू-वह भी गोरी मेम....। देवर-देवरानी..... का ताना और पैना हो जायेगा..... वैसे भी उन लोगों ने अंतिम फैसला सुना दिया है कि या तो भोला ब्याज समेत रकम अदा करके गिरवी रखा घर छुड़ा ले..... या अपनी मां को साथ ले जावे.....।
आखिर..... वो दिन भी आ गया जब भोला ने बहू के साथ मां को प्रणाम किया.....। लंबी, गोरी छरहरी लिजा की नीली आंखें छलक गई, बड़े प्यार से मंगला को प्रमाण कर गले लग गई...... मंगला के सारे गिले-शिकवे आंसू बनकर बह गये.... बड़े उत्साह से दाल, भात, आलूबरी की सब्जी, लालभाजी.. बनाई..... भोला ने हंसकर कहा- ‘‘मां अब यह सब खाने की आदत नहीं रही.... और तुम्हारी बहू..... ने तो कभी यह सब खाया ही नहीं है..... हम ब्रेड जैम लेकर आये हैं.. बस तुम अंडे उबाल दो.....।’’ आंखें फाड़कर मंगला भोला को देखने लगी ‘‘अण्डे तो इस घर में कभी आये ही नहीं..... भ्रश्ट हो गया है लड़का....।’’ आखिर भोला ने खुद ही अण्डे उबाल दिये....।
गांव-घर की खबरें लेते हुए भोला ने बहिन की खोज खबर ली..... बातें हो ही रही थी कि देवल बाबू आये.... भोला ने प्रणाम किया..... लिज़ा प्रणाम करने लगी तो देवल बाबू ने पैर पीछे हटा लिये.... जना दिया कि विजातीय बहू उन्हें स्वीकार नहीं है.....।
खंखार कर उन्होंने कहा- ‘‘भोला! भइया तो चल दिये..... इतने दिन तक हमसे जो बना हमने भाभी की सेवा की है... अब तुम आ गये हो..... अपना घर दुवार संभालो..... इस उमर में मुझसे ज्यादा कुछ होता भी नहीं है।’’ भोला समझ तो रहा था बात साफ करने को बोला- ‘‘काकाजी आप बड़े हैं जैसा कहंे.... मुझे मालूम है कि मेरे इंग्लैण्ड जाते समय बाबूजी ने खेत आपके पास गिरवी रखे थे..... फिर उनके क्रिया कर्म का खर्च भी तो आपने ही उठाया है.....।’’
हं.....हं.....कर उठे देवल बाबू ‘‘तुम भूल रहे हो बेटा......भइया ने तीन साल का इकरारनामा लिखा था और तुम्हीं गिन लो अब साढ़े चार साल पूरे होने आये......सो.....खेत..... पर तो मेरा ही कब्जा हुआ न बेटा ! लिखा पढ़ी...... तो पक्की है..... सत ईमान की बात है.... अरे भइया तो मेरे लिये भी बाप बराबर थे......’’ आंखें पोंछने लगे......।
मंगला कुछ बोलना चाहती थी कि भोला ने बरज दिया..... बोला’’काकाजी....उस समय तो बात यही हुई थी कि लिखा पढ़ी.... दिखाने भर को है..... जब भी मैं आऊंगा खेत.... मुझे मिल जावेंगे..... हां उस अवधि की फसल पर आपका हक रहेगा..... तो अब मैं आ गया हूँ..... मैं तो खेत बेचने की सोच रहा हूँ.... न हो आप ही ले लीजिए..... अपना पावना काटकर बाकी रकम मुझे दे दीजिए....।’’
मनुश्य जन्मजात अभिनेता होता है तभी तो देवल बाबू.... गला फाड़कर रोने लगे.... ‘‘अरे बेटा ! तुम मेरे बेटों से अलग थोड़े हो.... पर क्या करूं.... न्याय की बात को तो मानना ही पड़ता है.... इकरार नामा स्वर्गीय भइया के हाथ का लिखा है उसे न मानकर उनका अपमान तो मैं कर नहीं सकता....।’’
भोला पशोपेश में पड़ गया..... बोला ‘‘आखिर आप चाहते क्या हैं काकाजी साफ-साफ कहिये....।’’
देवल बाबू.... की रूलाई कुंवार के बादल की तरह काफूर हो गई..... बोले- ‘‘देखो बेटा..... बात तो साफ ही है खेत तो.... तुम्हारे भाइयों के पास ही रहेगा न.... अरे बेटा ! तुम तो वहां लाखों कमा रहे हो ये जाहिल गंवार ही रह गये..... खेती किसानी से ही पेट पालते हैं..... न हो यही समझ लो कि तुमने अपने भाइयों का भविश्य ही बना दिया.....।’’
भोला अवाक् रह गया काका जी की साम दाम दंड भेद नीति ने उसके मन में वितृश्णा को ही नहीं उभारा.... तिक्तता के साथ रिश्तों के आवरण में ढंके छिपे स्वार्थ को भी उजागर कर दिया.....।
भोला के मौन को उसकी कमजोरी और अपने पैंतरेबाजी की जीत समझ कर देवल बाबू कुटिलतापूर्वक हंसकर बोले.... ‘‘देखो भोला बेटा.... कोर्ट कचहरी की तो सोचना मत अव्वल तो दीवानी का मामला दस पंद्रह साल तो चलेगा ही तुम इंग्लैण्ड से कितनी बार पेशी में हाजिर देने आ पाओगे। दूसरे सही सबूत, गवाही, पटवारी तो सब मेरे ही पक्ष के हैं..... मान लो तुम्हीं जीत गये तो जितना खर्त तुम आने जाने में करोगे उतने में तो इन खेतों का चौगुना खरीद सकते हो.... रही बात घर की तो..... अभी तक जिस कमरे में भाभी रहती आई हैं अपने जीते तक वैसे ही रहती आयेंगी....तीजा तिहार.....तुम्हारी बहन को भी मैं अपनी बहन बेटियांे के साथ मानूंगा, पूछूंगा.... उसकी fचंता तुम मत करो....।’’
लिजा इतनी देर तक चुप सुन रही थी.... इस बार भोला से अंग्रेजी में बोली- ‘‘मां को हम अपने साथ ले चलते हैं.... यहां का मोह छोड़ो...... ये स्वार्थी लोग हैं इनसे लड़ाई झगड़ा करके भी कोई लाभ तो होगा नहीं...... अपना समय, पैसा और मानसिक शांति ही गंवानी होगी......।’’
लिजा का कहना सही था भोला ने मंगला से जब अपने साथ चलने को कहा तो वे रो पड़ी ‘‘नहीं बेटा..... इस उम्र में..... अपना घर, देश, नाते-रिश्ते ये सब छोड़कर नहीं जा सकती..... फिर तुम्हारी बहन भी तो यहीं है..... उसे कैसे छोड़ दूँ... यहाँ रहूंगी तो साल 6 महीने में उसे देखती तो रहूंगी....।’’
हार मान कर भोला.....रो पड़ा.....नौकरी छोड़कर यहाँ रहा नहीं सकता.... मां जाने को राजी नहीं है.... आखिर मंगला ने ही समझाया ‘‘दूरी-रिश्तों को खत्म थोडे़ ही कर देगी तुम निश्चिन्त होकर जाओ..... चिट्ठी पत्री से समाचार देते रहना.... साल दो साल में आते जाते रहना....।’’
इस तरह.... भोला वापस इंग्लैण्ड चला गया.... देवल बाबू ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू किया.... मंगला का जीना दुश्वार हो गया......।
सुमन बड़ी देर से सुन रही थी बोली- ‘‘काकी असली बात तो भूल रही हो..... अरे ! महेश की मां क्यों कहते हैं सब लोग..... यही तो नहीं बताई....?’’
आंसू पोंछकर हंस पड़ी मंगला काकी- ‘‘अच्छा तो अभी यह कहानी भी सुनना है.... चलो बताता हूँ.... पर बड़ी देर हो गई है.... थोड़े में ही बताती हूँ....।’’
सुमन ने सिर हिला दिया.... लंबी सांस खींचकर मंगला काकी ने कहना शुरू किया- ‘‘मौसमी बुखार से कमजोर तो हो ही गई थी कि एकादशी का उपवास बहाना बन गया..... सिर घूमने लगा था और मैं बेसुध गिर पड़ी..... जाने कितनी देर तक पड़ी थी कि समधी जी आये..... हालत देखकर पड़ोसन को बुला लाये.... होश आया तो लाज से धरती में गड़ जाने का मन किया.... समधी को चाय पानी पूछंू यह औकात तो थी नहीं.... रो पड़ी....।’’
पड़ोसन ने उन्हें बताया कि मंगला किस तरह दिन काट रही है..... सब सुनकर समधी...ने.... कहा ‘‘देखता हूँ.... भगवान ने कोई व्यवस्था कर सकूंगा अभी चलता हूँ सुमन ने पूछा ‘‘फिर उन्होंने क्या व्यवस्था की और कितने दिन बाद.... तब तक दिन कैसे कटे.... ?’’
मंगला काकी हंस पड़ी ‘‘एक सांस में कितना कुछ पूछती हो.... अरे.... धीरज
 धरो..... बता तो रही हूँ....।’’
सुमन ने हाथ जोड़कर सिर लगाया भाव यह कि माफ करो अब चुपचाप सुनंुगी.... सुमन की भावभंगिमा देखकर मंगला स्नेह से भरी हंसी हंसकर बोली ‘‘सप्ताह भर बाद समधी समधन दोनों आये उन्होंने बताया कि बारगांव वाले लखन साव जी की पत्नी का देहांत हो गया..... बड़ी उम्र की जचकी प्राणलेवा सिद्ध हुई.... उनका तीनेक साल का बच्चा है ये तीन साल.... भी लखन साव के लिए बड़ी मुश्किल से कटे हैं घर में और कोई नहीं हैं। उन्हें घर द्वार संभालने वाली अपने एकमात्र बेटे के लिए एक मां चाहिए.... इस उम्र में वे किसी कम उम्र कन्या को ब्याह कर लाना नहीं चाहते.... उम्र दराज महिला चाहते हैं.....। मंगला सब सुनती रही सोच रही थी - भगवान ये कैसी परीक्षा ले रहे है..... इस उम्र में..... फिर से घर गृहस्थी..... लोग क्या कहंेगे..... बेटा बहू-बेटी दामाद को क्या मुंह दिखाऊँगी....।’’
इस बार समधिन ने कहा ‘‘मंगला..... हां. कर दो..... हम तुम्हारे भले की सोचकर ही आये हैं..... इस घर में तुम्हारे दिन में तुम्हारे दिन कैसे रहे हैं हमसे छिपा नहीं है, अभी तो हाथ पांव चलते हैं तब ऐसी दुर्दशा हो रही है बुढ़ापे की सोचो.....। लखन साव तुम्हारे समधी के मित्र हैं भले आदमी हैं.... खाता पीता घर है..... फिर हमारे समाज में अघटन घट जाने पर चूढ़ी पहनाने का रिवाज है जिसे समाज में लोग मान्यता भी देते हैं.....।’’
समधी जी ने समझाया - ‘‘बेटी के घर आप रहना नहीं चाहतीं..... बेटा परदेश में है वहां भी जाना नहीं चाहती..... जीना तो पड़ेगा ही..... आत्मघात महापाप होता है..... यह आप भी अच्छी तरह जानती हैं.....। ऐसा ही समझ लीजिए कि किसी बिन मां के बच्चे को पालने पोंसने की जिम्मेदारी ही पूरी करने जा रही हैं.....वैसे आपने पहले भी भोला की जिम्मेदारी तो ली थी न.... वह भी तो बिन मां का ही था.... एक बार फिर वही तपस्या कीजिए....।’’
मंगला ने सोचा नितप्रति दुरदुराये जाने से तो वह अच्छा ही होगा..... कम से कम आसरा तो मिल जाऐगा.... अहा.... बच्चा.... बिचारा..... ओह भगवान.... क्या करूं......? मंगला बोली ‘‘सुमन बेटा.... जीने की लालसा बड़ी तीव्र होती है, वह भी सम्मानपूर्वक..... तो मैंने भी हामी भर दी.... और यहाँ आ गई.... हां यहाँ....महेश की मां बनकर ही आई.... साव जी ने आदर जतन में कभी कोई कमी नहीं होने दिया....।’’ थोड़ा रूककर फिर बोलने लगी.... ‘‘दिन बीतने लगे..... महेश बड़ा होने लगा.... फिर तुम्हारी सहेली गिरिजा आई.....भगवान की कृपा से दोनों भाई बहन पढ़ने लिखने लगे....। बड़े हुये.... और सुमन बेटा..... आज तुमने मेरे जीवन की कहानी सुनी.... मुझे भी अच्छा लगा.....। अब थक गई हूँ बड़ी देर हो गई.... तुम भी घर जाओ....।’’ बाद में सुमन ने समझा वो थकी नहीं थी उन्हें बुखार चढ़ने लगा था.... वो भी मामूली नहीं कालज्वर था मंगला काकी के मौत का परवाना लेकर आया था।
मंगला काकी के साथ वही अंतिम भेंट थी.... सुमन को याद है तकरीबन हफ्ते भर बाद ही उनकी मृत्यु हो गई थी....। खूब धूम से ही महेश भइया ने क्रिया कर्म, तेरही का खाना पीना किया था....। लोग कहने लगे कि पेट का जाना बेटा भी इतना नहीं करता.... सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह हुई कि भोला भइया....आये संग लिजा भाभी भी थी।
महेश भइया और उनके परिवार वालों ने उनको प्रेम से अपने घर में रखा.....। दोनों सगे भाई की तरह गले लगकर रो पड़े..... जीवन में पहली बार मिले थे किन्तु मंगला काकी की ममता की डोर में बंधे तो थे ही.... अपरिचय के लिए स्थान ही कहां था ? एक ही मां की ममता की छांव में भोला और महेश पले थे इसीलिए सुरूचि, स्न्नेह, संस्कार दोनों को समान रूप से मिले थे....। भोला भइया ने महेश की अनुमति और लिजा भाभी की सहमति से बारगांव में ‘मंगला स्वास्थ्य केन्द्र’ के लिए आवश्यक धन बैंक में जमा करवा दिया.... तो महेश भी पीछे नहीं रहा.... सड़क किनारे की एक एकड़ जमीन की रजिस्ट्री मंगला स्वास्थ्य केन्द्र के नाम कर दिया....।
आप लोग बार गांव जायें तो देखियेगा.... बस से उतरते ही.... सड़क के किनारे तालाब के दाहिनी ओर.... बड़ी सी इमारत है साइन बोर्ड लगा है ‘मंगला  स्वास्थ्य केन्द्र’। आसपास के गांवों से भी लोग इलाज कराने आते हैं.... तो बीच-बीच में बच्चों को पोलियो ड्राप देने की व्यवस्था भी की जाती है। हर महीने शहर से आई महिला रोग विशेशज्ञ के द्वारा महिलाओं का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है। महेश के साथ ही अन्य पांच गणमान्य लोगों को ट्रस्टी नियुक्त किया गया है जो स्वास्थ्य केन्द्र की व्यवस्था देखते हैं।
चिड़ियों का चहचहाना सुनकर सुमन ने कलम बंद कर दिया.... अब थोड़ी देर आंखें बंद.... करनी होगी.... नींद को इतना सम्मान तो देना ही होगा...।

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