कुसुम - कथा : उपन्यास

कुसुम - कथा

(उपन्यास)

सरला शर्मा


सर्वाधिकार: डाॅ. नवीन शर्मा
आवरण: रविशंकर शर्मा
प्रथम संस्करण  : 2006
मूल्य  75 रू.

प्रकाशक
वैभव प्रकाशन
सागर प्रिंटर्स के पास, अमीनपारा चौक,
पुरानी बस्ती, रायपुर (छत्तीसगढ़)
दूरभाश: (0771) 22622338 मो. 094253-58748
      

समर्पण


प्रणय से प्रणव तक की यात्रा
करने वालों को पाथेय ‘कुसुम कथा’

सादर समर्पित है।

सरला शर्मा 
19 जून 2006 
भिलाई (छ.ग.)


भूमिका


    जीवन की आपाधापी के बीच ही प्रायः श्रेश्ठ लेखा की साधना चलती है। विशेशकर महिला कलमकार जीवन के कई मोर्चो पर सतत जूझते हुए लेखकीय दायित्व पूरा करती हैं।
    छत्तीसगढ के यशः शेश कवि शेशनाथ शर्मा ‘शील’ की प्रतिभाशाली सुपुत्री श्रीमती सरला शर्मा ने विगत तीस वर्शाें में चुपके-चुपके लगभग पूजाभाव से उर्जस्वित होकर लेखन किया है। अब तक कहानी, कविता एवं निबंध विधाओं की तीन कृतियाँ उनकी प्रकाशित हो चुकी हैं। छत्तीसगढ़ी एवं fहंदी में समान अधिकार से लिखने में दक्ष श्रीमती सरला शर्मा का यह पहला उपन्यास ‘कुसुम कथा’ प्रस्तुति और कथा कौशल के साथ ही समन्वयवादी उदार दृश्टि के कारण विशिश्ट बन पड़ा है। कथा-सूत्र कुछ इस तरह है:
    उड़ीसा की अभावग्रस्त किशोरी कुसम वक्त के थपेड़ों को सहकर भिलाई में जवान होती है और इसी शहर में साठ की उम्र पार लेखिका के माध्यम से अपनी व्यथा कथा हम सबको सुनाती है।
    अर्थाभाव से ग्रस्त कुसुम के पिता उड़ीसा के गाँव बिस्नूपुर में उनकी परवरिश नहीं कर पाते इसलिए वह अपने चाचा के साथ भिलाई आ जाती है। यहाँ एक अधेड़ मुसलमान के यहाँ उसे काम मिलता है। विधुर मुसलमान की अपने से दस वर्श छोटी बिटिया की परवरिश करने वाली कुसुम धीरे-धीरे उस घर परिवार की सदस्य तो बन जाती है मगर रिश्ते पवित्र रहते हैं।
    वह पान ठेला और चाय का टपरा चलाती है तथा आज्ञयदाता मुसलमान की दिवंगत पत्नी का नाम ‘कुलसुम’ को कई नाजुक अवसरों पर न चाहकर ओढ़ भी लेती हैं। लेकिन रिश्तों की पवित्रता पर आँच तब भी नहीं आती।
पिता के मरने की खबर पाकर कुसुम जब गाँव बिस्नूपुर जाती है तब परिवार के लोग आश्रयदाता मुसलमान का वास्ता देकर उसे उलाहना देते हैं और दंडित भी करते हैं। जबकि प्रतिमाह भिलाई से पैसा भेजकर वह इन्हीं दंडाकांक्षी स्वजनों का पालन-पोशण करती रही। वह भी उसी मुसलमान संरक्षक की उदारता के बल पर ही।
यही उपन्यास में रिश्तों का खोखलापन, आधुनिक युग में भी जड़ परंपराओं के पाश में छटपटाता जीवन और अज्ञान के अँधेरे में राह टटोलकर चल रहे लोगों का दर्द परत उघड़ना प्रारंभ होता है।
    कुसुम कहानी स्वयं लेखिका के परिवार की है। उपन्यास का तीसरा आयाम है श्री जगन्नाथ जी का भव्य पुण्य लोक और जग प्रसिद्ध महात्मय।
    छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के बीच जो सांस्कृतिक एकता है उसे भिन्न-भिन्न कृतियों में हम पढ़ते हैं। सरला शर्मा ने अपने उपन्यास में एकदम नए ढंग से इस पारस्परिकता को आकार दिया है। स्त्री जीवन पर इन दिनों खूब लेखन हो रहा है। यह उपन्यास भी स्त्री के संघर्श पूर्ण जीवन पर ही केfन्द्रत है लेकिन यहाँ उनका संघर्श उन्हें सतत् परिपक्व और सक्षम बनाता है। यथार्थ की धरातल पर पांव रखने का उनका अंदाज दूसरों को भी प्रेरित करता है।  
    दीप जलाने की उज्ज्वल पंरपरा को पोशित करती कुसुम कथा की fस्त्रयाँ विलक्षण प्रभाव छोड़ती हैं। अति और आत्मदया से बचकर सरला शर्मा ने संतुलित और प्रेरश चरित्रों का सृजन किया है। सरला शर्मा के पास छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के जीवन की गहरी जानकारी है। सीमांत पर स्थित जन्म स्थान ने उन्हंे दो भिन्न-भिन्न प्रांतों के संस्कारों को जानने समझने का भरपूर अवसर भी दिया जिसे हम कुसुमकथा में महसूस करते हैं।
    कहानी कहने की कला सरला शर्मा को छुटपन से ही दादी नानी से मिली। अपने अध्ययन और कौशल से उन्होंने इस अक्षय पूँजी को भरपूर विस्तारित किया। आशा है, कुसुमकथा उपन्यास उनके लेखकीय जीवन का वह मोड़ सिद्ध होगा जहाँ से नई दिशाओं का संधान कर रचनाकार श्रेश्ठतर और श्रेश्ठतम को अर्जित करने का कीर्तिमान रचता है।


डाॅ. परदेशीराम वर्मा
         अध्यक्ष, अगासदिया एवं जनवादी लेखक संघ, जिला-दुर्ग
                एल.आई.जी.- 18, आमदी नगर हुडको, भिलाई


    स्वीकारोक्ति

    कतिपय इतिहासकार जिनमें विद्वान साहित्यकार भी शामिल हैं उन्होंने उपन्यास को इतिहास का शत्रु कहा है। मैं भी स्वीकार करती हूँ कि उपन्यास में इतिहास अपने विशुद्ध स्वरूप में नहीं पाया जाता, क्योंकि इतिहास सत्य घटनाओं का वर्णन है जबकि उपन्यास में सत्य होता है पर कल्पना से आच्छादित होता है। कभी-कभी यह आवरण इतना सघन हो जाता है कि सत्य छिप जाता है तब सत्यान्वेशण के लिए उपन्यासकार की दृश्टि की आवश्यकता होती है।
    उपन्यास के पात्र काल्पनिक हैं- जिनके चरित्र-चित्रण में मानवीय संवेदनाओं का चित्रण शत-प्रतिशत सत्य है। यही सत्य पाठक को पात्रों के मनोभावों को आत्मसात् करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। ये पात्र पाठक और लेखक दोनों में पूर्वज्ञान, अनुभूति और कल्पना को मूर्त करते हैं।
    उपन्यास समग्र जीवन की कथा तो हैं ही वर्णित काल की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मान्याओं, विचारों का दर्पण भी है।
    प्रस्तुत उपन्यास में आदि का उल्लेख है, तो गीता का कर्मयोग भी छूटा नहीं है, शिव पुराण के देवाधिदेव शंकर की उपासना का महत्व भी वर्णित है। यद्यपि स्थानाभाव के कारण इनका यथोचित, विस्तृत वर्णन संभव नहीं हो पाया है।
    पुरी-यात्रा में खण्डगिरि, साक्षी गोपाल जैसे महत्वपूर्ण स्थानों का वर्णन छूट गया है इसके लिए पाठक क्षमा करेंगे। चैतन्य महाप्रभु पर भी लिखना था, उपन्यास महाकाय न हो जाए इस भय से लेखन का लोभ संवरण करना ही पड़ा।
    दीर्घकालीन तल्लीनता और पूर्ण मनोयोग का जो आनंद मैंने प्राप्त किया यह मेरे लेखेकीय-जीवन की अभूतपूर्व उपलब्धि है।
    उपन्यास लेखन का साधिकार आदेश fहंदी व्यंग्य लेखन के सशक्त हस्ताक्षर श्री विनोद साव से मिला अतः उनेक प्रति कृतिज्ञता व्यक्त करती हूँ।
    आलस्य जब सिर पर सवार होने लगता, लेखनी की गति क्रमशः श्लथ होने लगती तो उशा पाण्डेय की मृदु भत्सना ही चेतना को उद्बुद्ध करती रही है, अतः वह आशीर्वाद और आंतरिक स्नेह की पात्र है।
    मेरी लेखनी को द्वादश वर्शीय निश्कासन से मुक्त कराने का श्रेय मेरे पुत्र द्वय नमन और नवीन को है उन्हें क्या दूँ ? मेरा सब कुछ तो उन्हीं का है।
    मेरे मित्रगण साधुवाद के पात्र हैं जिन्होंने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उपन्यास लेखन में मुझे सहयोग दिया है।
    अतनु प्रणयी नरेन्द्र को स्मरणांजलि देती हूँ।

15.05.06
सरला शर्मा 

प्रकाशकीय

    कहते हैं औरत ही औरत का दर्द समझ सकती है कुसुम-कथा में लेखिका ने कुसुम की व्यथा को समझा और उसकी व्यथा को पूरी संवेदना के साथ उभारा है। कुसुम कथा उपन्यास में पूरी कथा कुसुम नाम के नारी पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है।
    कुसुम उड़ीसा के बिस्नूपुर के एक गरीब परिवार की लड़की है जो गाँव में अकाल पड़ने पर अपने चाचा के साथ कमाने खाने की लिए शहर आती है। शहर में एक मुस्लिम परिवार के यहाँ वह आश्रय पाती है उन्हीं के द्वारा दिये गये पैसे को वह गाँव भेजती है जिससे उसका घर चलता है। लेकिन अपने पिताजी के देहांत होने पर वह अपने घर लौटती है तो उसे अलग बैठा दिया जाता है क्योंकि वह एक मुस्लिम परिवार के यहाँ रहती है। समाज में आज भी कई प्रकार की कुरीतियाँ, कुप्रथाएँ, रीति रिवाज व्याप्त है। जरूरत है उन सब रीति-रिवाजों को तोड़ने की दूसरों को तकलीफ देते हों। एक स्वस्थ सोच की आवश्यकता है जिससे समाज आगे बढ़े। कुसुम-कथा में कुसुम नारी पात्र है जिसमें अदस्य साहस है जो एक बिन पैदा की बच्ची की माँ बनकर तथा बिन ब्याह पत्नी बनकर अपना पूरा जीवन बिता देती है। अपने बच्ची के भविश्य के लिए अपना नाम भी बदल लेती है। नारी को ममतामयी बताया गया है जो इस उपन्यास में कुसुम के माध्यम से देखने को मिलता है।    
    दूसरी तरफ इस उपन्यास में लेखिका की स्वयं की कहानी भी साथ-साथ चलती है जिसमें पति-पत्नी के भावानात्मक संबंधों का बताया गया है। दोनों जीवन रूपी रथ पर सवार होकर किस तरह एक दूसरे का साथ निभाते हुए जीवन व्यतीत करते हैं, कहीं-कहीं पर यह उपन्यास इतना भावुक हो जाता है कि संभव है आप रो पड़े। लेखिका ने हर अध्याय में जीवन दर्शन के विविध आयामों की भी व्याख्या की है। जगन्नाथ पुरी की यात्रा उसका महात्म्य पढ़ने लायक है इससे लेखिका की रचनाशीलता और उनकी रूचि का पता चलता है।
    सरला शर्मा जी का यह पहला उपन्यास है। इसके पहले एक कहानी संग्रह छत्तीसगढ़ी में सुरता के बादर तथा एक कविता संग्रह वनमाला प्रकाशित हो चुकी है। सरला शर्मा जी का उपन्यास पठनीय है। आशा है सभी इस उपन्यास को पढ़कर आनंदित होंगे। अशेश शुभकामनाओं के साथ-

डाॅ. तृशा शर्मा
संचालक, वैभव प्रकाशन

एक
    हमेशा की तरह बसंत आया है, आम का पेड़ बौरों से लद गया है, छोटी-छोटी झाड़ियाँ भी फूलों का ताज पहन इतराने लगी हैं। नील निरभ्र आकाश का कोना-कोना उजली धूप से भर गया है। फगुनहट बयार तन-मन को गुदगुदा देती हैं ऐसे में रविवार की अलस दोपहरी मुझे कुछ लिखने को उकसाती है। दाहिना हाथ कलम थाम लेता है.....मन ललचाता है, आप बीती-जगबीती को कागज पर उतारने को...... लोभ संभाले नहीं संभल रहा है तो लिखने बैठी..... पर लिखूं क्या.....? ओह...... तारस्वर में घंटी चीखने लगी..... सोचती हूँ इस समय कौने आया बड़े बेमन से दरवाजा खोली...... ममदू खड़ा है ‘‘नानी जी दीदा ने आपके लिए पान भेजा है।’’ या ना सुने बिना पुड़िया मेरे हाथ में पकड़ा ममदू वापस गेट की तरफ दौड़ पड़ा।
    इकहरे बदन का दस-ग्यारह साल का गोरा चिट्ठा लड़का है ममदू..... रोज स्कूल जाने के नाम पर अपनी माँ से डांट-फटकार तो कभी मार भी खाता है...... जाने उसे स्कूल से क्या दुश्मनी है? ऐसा नहीं है कि फेल-वेल होता हो...... पर उसे होमवर्क करते या पढ़ते कभी किसी ने देखा नहीं है..... कई बार उसे समझाती हूँ सुबोध बालक की तरह कहता है- ‘‘कल से रोज स्कूल जाऊँगा, पढूँगा भी नानी जी......।’’ पर वो कल कब आवेगा ? अभी तक तो आया नहीं है। वैसे आज्ञाकारी है, कभी अटक जाऊँ तो दौड़कर सौदा सुलफ ला देता है। मेरी बात सुनता है शायद इसीलिए मुझे आकर्शित करता है। कभी कुछ देती हूँ तो लजाकर मुस्कुराता हुआ थैंक्यू कहना नहीं भूलना।
    दरवाजा बंद कर पान की पुड़िया लिए कुर्सी पर बैठ गई..... कल से दिन में गरमी का अहसास होने लगा है पर रात बारह के बाद अभी भी चादर ओढ़ने की जरूरत पड़ती है। बस कुछ दिन और फिर वहीं गरमी...... वही तपन......।
    गिलौरी मुंह में रखी....... रोज की तरह सोची अब पान खाना छोड़ दूँगी आज आखिरी है। जाने कितनी बार प्रतिज्ञा करती हूँ..... फिर तोड़ने के लिए......। ऐसा नहीं है कि छोड़ने का मन न करता हो पर आदत बुरी बला है......। बरसों पहले इन्होंने जब पहली बार पान खिलाया था तो कट गई थी...... दो-तीन तक कुछ खा नहीं सकी थी। इन्हें पान का शौक था पर आदत कभी नहीं रही, हाँ खाना खाने के बाद सिर्फ एक पान फिर दिन भर पान को याद नहीं करते थे।..... मेरी आदत की शुरूआत तभी से हुई..... सो उम्र बढ़ने के साथ-साथ आदत में बढ़ोत्तरी हो गई और अब..... तो जान की दुश्मन बन गई है। खुद पर बड़ी झुंझलाहट होती है.....। कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ है कि महीनों पान नहीं खाई...... फिर जाने कौन सी कुघड़ी आ खड़ी होती फिर वही......पान.....सच आजिज आ गई हूँ इस आदत से..... पान का नशा हो गया है..... और कोई नशा छुड़ाए नहीं छूटता..... यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई है।
असल बात ये कि कोई भी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक बार-बार दुहराते रहने से आदत बन जाती है। यही देखिए न किसी को ऊँगलियाँ चटकाने की आदत पड़ जाती है तो कोई पढ़े बिना नहीं सो पाता, किसी चाय जरूर चाहिए तो किसी को लगाई बुझाई किए बिना चैन नहीं..... कहने का मतलब यही है कि क्रियाओं का दुहराव ही आदत बनती है। चूंकि मन के दो भाग हैं चेतन और अचचेतन तो क्रिया चेतन-मन के अधिकार क्षेत्र में है और आदत अवचेतन मन के। इसीलिए तो मन को वश में करने की बात साधकों ने बार-बार कही है। भाशा चाहे जो हो भाव यही है कि मन ही हमारे कार्यकलापों का नियंत्रण कत्ताZ है तब तक जब   
मfस्श्क जागृक नहीं होता कारण मस्तिश्क बुद्धि से संचालित होता है बुद्धि तर्क शक्ति का आधार है जो हमें उचित अनुचित, हित, अहित का बोध कराती है।
    हाँ..... तो अब लिखना शुरू करूँ..... नहीं अभी एक पान और बचा है..... खा ही लेती हूँ कल से पान..... एकदम बंद..... हाँ अब ठीक है......। कल यदि ममदू पान लेकर आया तो उसे मना कर दूँगी..... ममदू..... की दीदा..... रिश्ते में वह नानी है। ...... पर जाने क्यों उसे दीदा कहते हैं......। ममदू की दीदा..... साठ की उम्र होगी। कसा हुआ शरीर अब भी है, बाल खिजाब से काले किए जाते हैं, आगे के दो दांत नहीं है..... साफ धुल कपड़े पहनती हैं, पान की गुमटी में सुबह से रात आठ बजे तक बैठी ग्राहकों को पान, चाय, सिगरेट बेचती है। हर उम्र और पेशे के ग्राहक वहाँ आते हैं। सबसे उसे निपटना होता है...... मीठी जबान, हँसकर बोलना...... सब को दिखाई देता है पर उधार वसूलने के लिए किया गया तकाजा लाल मिर्च की झाल
में सना होता है। उस समय दीदा को देखने पर काली माई याद आ जाती है।
    मेरे घर के बाई ओर जो चौराहा है उसी के कोने में पान की गुमटी है उसके बाद और भी दुकानें हैं....... जहाँ रोजमर्रा की चीजें मिल जाती हैं। पान की गुमटी के पीछे छोटा सा कमरा है साथ में एक झोपड़ी सी है जहाँ रसोई पानी का इंतजाम है...... हाँ एक बात बड़ी अजीब लगती है कि दीदा अपना खाना खुद बनाती है उसी गुमटी में ही..... वहीं रात को सोती भी हैं।..... कमरे में उसके बेटी दामाद रहते हैं वही ममद् के माँ-बाप हैं। ममद् को मिलाकर दो भाई दो बहन हैं। पिता किसी प्रायवेट फर्म में सामान्य कर्मचारी हैं सीधे सज्जन...... सुबह साइकिल के कैरियर में टिफिन रखकर काम पर निकल जाते हैं तो शाम को घर लौटते हैं। कभी किसी से उन्हें मिलते जुलते देखा नहीं। आस-पड़ोस से बस औपचारिक संबंध रखते हैं। महीनों उनकी आवाज नहीं सुनाई देती, बड़े निस्पृह इंसान हैं। कभी-कभी तो मुझे ऐसा भी लगता है कि जैसे जमाने भर से उन्होंने कोई शिकायत है..... उनकी चुप्पी मुझे कुछ अजीब लगती है, मन होता उन्हें रोकू-पूछूं भाई! आखिर आपकी परेशानी क्या है ? पर कौन दूसरों के फटे में टांग अड़ाए सोचकर हो जाती हूँ। ममदू की माँ गुलनार.... दुहरे बदन की सांवली महिला है। पूरे मुहल्ले की खबरें उसी से मिलती हैं। सिलाई मशीन पर बैठी दिखती है, बच्चों पर खीझती चिल्लाती चार पैसों का जुगाड़ करके गृहस्थी चलाने में पति की मदद करती है। मीठी बोली उसका सबसे बड़ गुण है। मुहल्ले भर में उसके आंटी, अंकल, भइया, भाभी हैं, जिनसे वक्त जरूरत पर मदद भी लेती रहती है।
मैं कभी-कभी ईश्याZ से भर उठती हूँ कि इस भीशण मंहगाई में चार-चार बच्चों को पालना उनकी पढ़ाई लिखाई का खर्च...... कैसे हँसकर संभालती हैं।
इकलौते कमरे में पूरा परिवार...... कैसे गुजर-बसर करता है ? किस कमरे में सारे सदस्य एक-साथ चल फिर भी नहीं सकते वहाँ बच्चे कहाँ सोते हैं? बमुश्किल 12.14 का कमरा होगा। हैरत तो तब होती है जब देखती हूँ वहीं आल्मारी भी है, सोफा सेट की दो कुर्सियाँ भी हैं बाकी बक्से पिटारे हैं ही। छोटा टी.वी. भी चलता रहता है। इकलौती खिड़की में कूलर भी लग गया है, पिछली गरमी में।
    कल तो बड़ा मजा आया...... मैं स्कूल जाने के लिए रिक्शा ढूँढ रही थी कि उसने कहा- ‘‘मैडम परेशान मत होइए, बड़ा लड़का वजीर आपको छोड़ देगा, लूना में बैठ सकोगी न ?’’ थोड़ी देर तो मैं आँखे फाडे़ं उसे देखती रही...... तो सकुचाकर मुस्कराते हुए उसने कहा- ‘‘पुरानी लूना है मेकेनिक के पास से दो हजार में ले ली हूँ किश्तों में पैसा दे दूँगी..... मैडम बाल बच्चों वाला घर है, एक गाड़ी घर में रहे तो मौके बेमौके काम ही आती है।’’
    मैं नये सिरे ये यह सोचने लगी कि जहाँ 35 रूपये किलोदाल है गेहूँ 12 रू. किलो वहाँ इतनी कम तनख्वाह में ये महिला इतनी सुव्यवfस्थ्त गृहस्थी की मालकिन कैसे बनी ? पुरानी ईश्याZ नए सिरे से जाग उठी...... पर सभ्यता भी तो अपनी जगह है तो कुछ नहीं कहा..... ‘‘थैंक्यू रिक्शा आ रहा है’’ ही बोल पाई।

                        दो
   
भौतिक अभावों की कड़वाहट को मिटा देने की शक्ति प्रेम में होती है। तभी तो गुलनार की छोटी सी गृहस्थी अपने समस्त अभावों के बाद भी मेरा ध्यान खींच लेती है, सच प्रेम रहने से सब भरा पूरा लगता है। यही देखो न, सुबह-सुबह घर के पिछवाड़े आम की डाल पर बैठा कोकिल पत्तों की स्निग्ध छांव में बैठा पंचम स्वर में पुकार रहा है अपनी प्रेयसी कोकिला को। प्रेम यदि न हो तो पक्षी की पुकार में इतनी मिठास, इतना तीव्र आवाहन...... हो ही नहीं सकता।
    आम की घनी शाखाओं के ऊमर टंगा आकाश आज कुछ ज्यादा नीला लग रहा है। हाँ !  दीवाली पास आ रही है, शरद के आगमन से मेघमाला चली गई है इसीलिए आज आकाश नया-नया सा लग रहा है मानों आज से पहले पृथ्वी के ऊपर इस तरह का शुभ्र नीलवर्णी आकाश कभी था ही नहीं।
    अभी-अभी हवा का जो झोंका मुझे छू गया है, वह छुअन शिशु के कोमल त्वचा की तरह मुलायम,
नरम स्पर्श लिए हुए हैं, फूलों की गंध से महकता पवन....... बड़े प्यार से झाड़ियों, लताओं, पेड़ों को दुलराता है......।
    वर्शा धुले गाढ़े हरे पत्ते ताली बजाकर स्वागत कर रहे हैं शरद का। पेड़ों की छांव में कहीं-कहीं धूप के टुकड़ पड़े हैं, उजली धूप हरी घास पर लोटपोट कर खिलखिला रही है, ये सब प्रेम के भिन्न-भिन्न रूप ही तो हैं जो मन को बांध लेते हैं।
प्रकृति के संपर्क में आकर हम कितना कुछ जानते हैं,  सीखते हैं पर आज की मशीनी जिन्दगी हमें प्रकृति की पाठशाला में प्रवेश ही नहीं करने देती शायद इसीलिए हमारे जीवन में प्रेम का अकाल हो गया है, सिवाय फिल्मों, कहानियों के प्रेम के दर्शन ही नहीं होते......।
    ‘‘अरे भाई! चाय-वाय मिलेगी या नहीं...... मैडम आपकी छुट्टी है हमें तो आॅफिस जाना है.....।’’ पिछले एक दशक से यह स्वर मेरे हृदय में गूंजता रहता है। fनःसंदेह स्वर का सुदर्शन मालिक मेरे पल-छिन का भी मालिक है......। प्रेम का एक रूप यह भी तो है। बगीचे में गूँजता नर कोकिल का सुर भी तो इसी स्वर को संगत देता है।
    ‘‘चाय चढ़ा दी थी, बस अभी लाई।’’ कहती हई रसोई की ओर कदम बढ़ाई ही थी..... कि अरूण सामने आ खड़े हुए......मुस्करा कर बोले-बीच-बीच में तुम कहाँ खो जाती हो सुधा।...... डर लगता है..... कहीं मुझे छोड़कर किसी आश्रम-वाश्रम में तो नहीं चल दोगी......?
    चौंक कर अरूण को देखी...... नहीं नहीं..... परिहास नहीं है..... वही आतुर प्रणयी..... विरह की आशंका से विचलित हो रहा है......। आँखें भर आई। कहाँ प्रकृति में प्रेम खोज रही हूँ मूर्तिमान प्रेम तो मेरे पास है, साथ है। चपला प्रेयसी ने गfर्वाणी पत्नी से हार मान ली..... ‘‘क्या उलटा पुलटा बोलते रहते हैं, अरे! दस साल हो गए, अब जाना कहाँ है? फिर दो-दो चौकीदार जो नियुक्त कर दिया है आपने.....।’’ तिरछी चितवन से इन्हें एक बार फिर रसमग्न करती चाय लेने चल पड़ी.....।
    प्रतिदिन की तरह ये आॅफिस चले गए.... तो बच्चों की तरफ ध्यान दी, बड़े को पकड़कर नहलाई तब तक छोटे बाबू खिलखिल करते आए, बाल्टी से पानी उलीचने लगे, खुद तो क्या नहाते, मुझे ही भिगो दिया...... खीझ गई..... अब फिर कपड़े बदलने होंगे, दोनों को दूध दलिया देना हैं....... फिर खाना बनाना है ठीक 11 बजे डिब्बा वाला आ जावेगा, इनके लिए आज कुछ विशेश बनाकर भेजूंगी सोची थी..... इन बच्चों के मारे..... कभी समय ही नहीं बचा कि कुछ अतिरिक्त बना संकू......। बड़े को टावेल दी, ‘‘चलो बेटा..... कपड़े पहनो’’, बात पूरी हुई नहीं थी कि छोटे कहाशय ने टाबेल ही खींच दिया दोनों भाई गुत्थमगुत्था हो गए.....सुबह की रसमग्नता आंगन के गीले फर्श पर लोटने लगी....... दोनों को खींचकर अलग-अलग की....... उनके भीगे गालों पर चांटा रसीद कर दी, दोनों तारस्वर में रोने लगे.... किसी तरह दोनों को तैयार की..... सच कहूँ थक गई...... कहाँ तो सोची थी..... जल्दी से काम निपटा कर कागज कलम लेकर बैठूंगी छुट्टी का सदुपयोग करूंगी....... कहाँ ये बच्चे.....। सच...... महीनों बीत जाते हैं कागज कलम को हाथ लगाये......। भुनभुनाते हुए रसोई में गई......दाल, चावल चढ़ा दिया...... सब्जी काटी....... छौंक लगा कर आटा गूंधने बैठी ही थी कि फिर दोनों हाजिर..... ‘‘मम्मी भाई ने मेरी कापी छीन ली, पेंसिल को फेंक दिया......।’’ बड़े ने नालिश की......। ‘‘मम्मी भइया ने फिर कालूराम कहा, मैं साबुन से नहाया हूँ, पाउडर भी लगाया हूँ......।’’ छोटे की चिरपरिचित फरियाद सुनी.....।

हे भगवान् क्या करूँ ? तुमने कैसा अन्याय किया हैं प्रभु ! बड़ा तो हैं गोरा चिट्टा गुलगोथना...... तो छोटा सांवला सलोना......। दो साल का अंतरइतना ज्यादा तो नहीं है कि तुम्हारे भंडार में गोरा रंग खत्म हो गया.....। मित्र, परिचित, रिश्तेदार बच्चों के सामने ही रंग का अंतर बताने लगते हैं,..... तो छोटा..... मुरझा जाता है उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों में प्रश्न उभरता है ‘‘मम्मी मैं भइया जैसा गोरा क्यों नहीं हूँ ?’’ इस प्रश्न का कोई उत्तर मैं उसे नहीं दे पाती। पहले-पहले वो कुछ समझाता नहीं था..... तब उत्तर देने की झंझट नहीं थी अब वो बड़ा होने लगा है।...... उसके बाल-मन पर सांवले रंग को लेकर हीन भाव न घर कर ले इसका डर सताता है....। कभी-कभी बहुत भय होता है। बच्चे का आहत मन सहज स्वाभाविक विकास न करके हीनता बोध और ईश्याZ से कलुशित न हो जावे.....?
    यथा संभव उसे मेरा श्यामसुंदर, राजा बेटा कहकर अतिरिक्त दुलार देने की कोशिश करती हूँ। कुछ दिन ठीक चलता है कि फिर कोई आता है, रंगभेद को उजागर कर जाता है। बड़ी कोफ्त होती है, पढ़े-लिखे दुनियादार लोगों से क्या कहूँ ? कैसे समझाऊँ कि बच्चांे के समाने ऐसी तुलना उचित नहीं है.... बच्चों पर गलत असर पड़ता है। चाहकर भी कुछ नहीं पाती सामाजिक शिश्टाचार मुझे अवश बनाकर चुप कर जाता है।   
    मुझसे कोई उत्तर न पाकर छोटे ने लोटे का पानी परात में डाल दिया आटा गीला हो गया..... पता नहीं क्या हुआ कि आटे वाले हाथ से ही उसकी पीठ पर एक धौल जमा दी..... पर ये क्या..... वो रोया नहीं..... अप्रत्याशित मार से अकबकाकर टुकुर-टुकुर मेरी तरफ देखने लगा..... शायद बड़े को भी स्थिति की गंभीरता का अंदाजा नहीं था, पल भर चुप रहकर मुझे देखा.....फिर भाई को अपनी तरफ खींचकर गले से लगा लिया बोला..... ‘‘गंदी मम्मी..... गंदी मम्मी..... चल नैनी...... हम खेलेगे...... शाम को पापाजी से शिकायत करेंगे...... वो मम्मी को मारेंगे......।’’
    मैंने देखा, कृश्ण बलराम की जोड़ी ही तो बालरूप धर मेरे सामने खड़ी है.....।
पलक झपकते भातृ-प्रेम ने मुझे विपक्षी बना दिया.....। सहज प्रेम के सामने मेरा-मातृत्व, मेरा वात्सल्य बौना हो गया।
    इन अबोध लघुकाय बालकों का विशालकाय प्रेम..... कितना निश्छल है कितना सहज है। आँखों के साथ-साथ हृदय भी भर आया, बिना हाथ धोये ही दोनों को गले से गला ली..... साच मातृत्व विधाता का अनमोल वरदान है..... जिसके बिना जीवन अपूर्ण है।...... गृहस्थ जीवन को सार्थक करने वाले ये पल.....छिन...... किसने बनाए हैं?


                    तीन

    ‘‘माँ जी.....डिब्बा......?’’ रामभरोसे की आवाज आई साइकिल की घंटी भी सुनाई थी। ‘‘दो मिनट राम भरोसे.....।’’ कहकर डिब्बा थैले में डाल दरवाजे की ओर बढ़ी......। ‘‘नमस्ते माँ जी....। आज आपकी छुट्टी है न इसीलिए देर लगी..... मैं जानता हूँ..... नहीं तो रोज थैला दरवाजे में रखा मिलता है।’’ मेरा उत्तर सुने बिना ही रामभरोसे चल पड़ा.....।
    पिछले पांचेक सालों से रामभरोसे पूरी कालोनी से डिब्बे इकट्ठा करके आॅफिस पहुँचाता है..... साल में शायद ही चार दिनों का नागा करता है.....। पैसों के लिए कभी कुछ नहीं कहता..... कभी-कभी सात तारीख हो जाती है, मुझे ही संकोच होता है तो कहती हूँ ‘‘रामभरोसे इस बार बहुत देर हो गई पैसे देने में.....।’’
    ‘‘कोई बात नहीं माँ जी काम चलता रहता है..... यदि कभी अटक जाऊँगा तो आप ही लोगों के सामने तो हाथ पसारूँगा।’’ रामभरोसे का उत्तर..... बड़ा ही सहज है पर मैं सोचने लगी...... इन पाँच सालों में उसे कभी भी एडवांस माँगते नहीं देखा, अरे वो अपनी मजदूरी ही नहीं माँगता तो एडवांस तो बहुत दूर की बात है.....। गाँव में घर जमीन खेती..... बाड़ी होगी..... वरना इस महँगाई में घर चलाना कितना कठिन है......? यही देखें न, हम लोग दोनों कमाते हैं फिर भी महीने के अंत में..... आल्मारी का कोना कतरा खंगालते हैं शायद एकाध नोट दबा छुपा रह गया हो।
    मैं तो भगवान से मनौती मनाती हूँ कि 25 तारीख के बाद कोई मेहमान न आवे..... बच्चों की तबीयत ठीक-ठाक रहे.....। तकरीबन 6 महीनों से कह-कह कर हार गई कि चेन घिस कर टूट गई है बदल दें..... पर ये महाशय...... ‘‘इस महीने माफ करो, बस अगले महीने सबसे पहले चेन बदलवा दूँगा...... अरे हाँ भई मोटी सी चेन दिलवा देंगे.....कई सालों के लिए छुट्टी.....ठींक.....।’’ जाने वो अगला महीना कब आवेगा......।
    जाने कब तक सोचती बैठी रहती कि ‘पोस्टमेन’ शब्द कानों में पड़े......हाथ बढ़ाकर लिफाफा ले लिया प्रेशक का नाम देखी मनोरमा तिवारी......मन उचट गया...... हर दो तीन महीने बाद ऐसा एक लिफाफा आता है।
जो मेरी गृहस्थी का सुख चैन उड़ा देता है। भाशा चाहे जैसी हो, अक्षर चाहे कैसे भी हो उद्देश्य सदैव एक ही होता है..... ‘‘कुछ रूपयों की नितांत आवश्यकता है यथाशीघ्र भेजो.....’’ आवश्यकता का आकार-प्रकार कम ज्यादा हो सकता है पर यथाशीघ्र की सील मुहर वही होती है। कड़वाहट की भी लहरें होती होंगी तभी तो धीरे-धीरे मेरा मन उन लहरों में डूबने उतराने लगा है। लिफाफा खोलने जा रही थी कि सोची...... आॅफिस से आने पर दे दूँगी आखिर इनके नाम का लिफाफा है फिर छुट्टी का दिन है बच्चों के साथ आनंद मनाऊँ, कुछ जरूरी गैर जरूरी गैर जरूरी काम निपटाऊँ...... आखिर होना तो वही है..... अपना दिन क्यों खराब करूँ......? सच! हमारा मन कितना विचित्र है, सतत आनंद की खोज में रहता है येन-केन प्रकारेण fचंता, अवसाद, दुख को दूर रखना चाहता है.....।
किसी व्याख्यान में सुनी थी परमात्मा का एक नाम आनंद है और हम उसी के अंश हैं सो अंशी की तलाश तो रहेगी ही। ऊँह भारी भरकम दर्शन की मीमांसा मेरे वश की बात नहीं है चलूं...... सफाई अभियान चलाऊँ। कहाँ से शुरू करूँ सोच ही रही थी कि फिर मुकदमा शुरू हो गया इस बार वादी और प्रतिवादी दोनों रो रहे थे.....। सुबह पहनाए कपड़े धूल धूसरित हो रहे थे अरे ! ये क्या.... मनु के हाथ में फटी पतंग ..... ओह भगवान् क्या करूँ इस लड़के का हजार बार समझाई हूँ..... थोड़ा बडे़ हो जाओ तब पतंग उड़ाना..... पर नहीं..... किसी की पतंग हाथ में अति ही उसके मुँह पर तृप्ति का, प्राप्ति का सुख छा जाता है। ‘‘मम्मी नैनी ने पतंग फाड़ दिया......।’’ मनु की फरियाद सुनीं...... कुछ कहूँ इससे पहले ही अपनी छोटी सी नाक को यथासंभव फुलाकर, पैर पटककर नैनी ने प्रतिवाद किया ‘‘मम्मी पतंग मैंने उठाया था तो मेरा हुआ न? भइया ने मुझसे पतंग छीना है।’’ लिफाफे ने वैसे ही अशांत कर दिया था जो कसर बाकी थी इस पतंग ने पूरी कर दी..... मनु के हाथ से पतंग छीनकर फेंक दी दोनों के कान उमेठी..... ‘‘फिर गंदे हो गए, चलो..... कपड़े बदलो और होमवर्क करने बैठो.......।’’ जाने कितनी तिक्तता भरी थी मेरी आवाज में कि दोनों सहम गए..... फिर एक-दूसरे की ओर देखकर छोटे-छोटे कदमों से आंगन की ओर बढ़ गए।
    आज फिर कुछ नहीं लिख सकी..... बच्चों को खिला-पिला कर सुला दिया...... दिन ढला शाम पाँच बजे ये आए...... बच्चों को पूछा....... फिर चाय की माँग...... चाय देते समय इन्हें देखो, बच्चों के साथ हंस बोल रहे हैं सच...... बड़ी भाग्य शालिनी हूँ मैं...... कितने जिम्मेदार हैं ये......स्नेही पिता, अनुरक्त पति और उत्तरदायी पुत्र हैं...... फिर याद आई लिफाफे की..... उहं चाय पी लेने पर ही दूँगी......। ‘‘अच्छा बेटा अब तुम लोग दूध पी लो फिर खेलो...... हम अपनी मैडम का हाल-चाल पूछते हैं।’’ कहते-कहते मेरी ओर देख भरपूर मुस्कान के साथ बोले- ‘‘हाँ तो मेडम! कैसी बीती आज की छुट्टी..... और हाँ कुछ लिखने वाली थी..... चलो सुनाओ क्या लिखा है।’’
    झमक कर बोली- ‘‘लिखना हो चुका...... आपके बच्चों से फुरसत मिले तब लिखूँ न......?’’ पल भर में ये गंभीर हो गए बोले- ‘‘छोटे बच्चे शरारतें करते ही हैं, तुम यह बात भूल क्यों जाती हो ..... अच्छा चलो आज की डाक में कुछ आया है क्या ?’’
    जाने क्यों मुझे लगा कि इन्हें शायद लिफाफे के आने की संभावना थी..... सो लिफाफा इनकी ओर बढ़ा दिया...... पढ़ने पर इनकी प्रतिक्रिया क्या होगी ? जानने के लिए वहीं बैठ भी गई। लिफाफा खोल कर इन्होंने पढ़ा...... पल-पल इनकी गंभीरता बढ़ती जा रही थी...... पत्र समाप्त करते ही इनके मुँह से ऊहं....... निकला, लंबी सांस खींचकर बोले- ‘‘तो मैडम..... आपकी चेन तो बनेगी नहीं बल्कि कुछ और रूपयों का भी जुगाड़ करना होगा......।’’ मुझे समझ में नहीं आया पूछ बैठी ‘‘क्या लिखा है।’’
तो पत्र मेरी तरफ बढ़ा दिए आशय यह कि पढ़ लो.....। पत्र पढ़ी...... सार इतना निकला कि दस हजार रूपये चाहिए घर से लगी जमीन माता जी ने अपने नाम खरीदी है, पाँच हजार कम पड़ रहे हैं और हजार जमीन की रजिस्ट्री के लिए चाहिए। बड़े भइया ने तीन हजार दिए हैं बाकी का इंतजाम माता जी ने कर लिया है। बड़ी झुंझलाहट हुई..... हमेशा तो कहती रहती हैं मंझली बिटिया की शादी करनी है पैसे बचाकर चलो तो अभी तो शादी हुई नहीं है, फिर जमीन खरीदने में पैसे खर्च करने की जरूरत क्या है?
    बोल ही पड़ी- ‘‘हाँ फरमान जारी हुआ है..... पर लड़की शादी को भी तो 6 महीने ही रह गए हैं उस समय पैसों का इंतजाम कैसे होगा.....? दस हजार अभी दे दिए तो शादी में कितना, क्या और कहाँ से देंगे....?’’
    ये चुपचाप मेरी बात सुनते रहे..... समझ गई अरण्य रोदन कर रही हूँ सदा की तरह...... फिर भी आक्रोश में भर कर बोल पड़ी...... ‘‘ हम यहाँ कैसे घर चलाते हैं उसकी fचंता किसी को नहीं है..... आखिर हर छठे छमासे कहाँ से दें...... बच्चे स्कूल जाने लायक हो गए..... खर्चे बढ़ रहे हैं..... शहर में रहना है तो यहाँ के तौर-तरीकों को भी अपनाना होगा...... कोई गाँव खेड़ा तो है नहीं...... ढंग के कपड़े लत्त..... चार लोगो के बीच उठना-बैठना...... आना-जाना......।’’ मेरा भाशण चल ही रहा था कि टोक दिए- ‘‘भूलो मत मैडम कि बड़ी हसरतों से मुझे पढ़ाया है, माताजी ने बड़ी तकलीफें उठाकर मेरी फीस भरी है इंजीनियfरंग की पढ़ाई का खर्च.....।’’ वही पुरानी कहानी सुनने का मूड नहीं था सो झुंझला पड़ी...... ‘‘वही खर्च तो वसूला जा रहा है ...... ऐसे ही वसूलना था तो बेटे की शादी ही क्यों किए..... न शादी होती न बच्चे.... होते..... न खर्च बढ़ता.....।’’ मेरा वाक्य पूरा हुआ भी नहीं था कि लिफाफा टेबिल पर पटक कर ये खड़े हो गए.....। गोरा चेहरा...... तमतमाने लगा...... पर आज मैं भी चुप नहीं रहूँगी...... चाहे ये कितना भी नाराज हो..... सो बोली- ‘‘बच्चे टी.वी. देखने दूसरों के घर जाते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता..... हमारे पास ढंग का सोफा भी नहीं है..... गहनों की चाहत मुझे नहीं है पर रोज स्कूल जाना होता है वही घिसी पिटी..... बदरंग हो चुकी साड़ियाँ......। आखिर सहेलियों के ताने मुझे भी तो सुनने पड़ते हैं.....रूआँसी हो उठी मैं.....।
    तब तक कत्तZव्यनिश्ठ बेटा जाग उठा था जो हमेशा स्नेही पिता और अनुरक्त पति को पछाड़ता आया है आज भी व्यतिक्रम नहीं हुआ..... जलद गंभीर स्वर सुनाई दिया.....। ‘‘हम दोनों को मिलने वाला बोनस इस महीने बैंक में आ जावेगा बाकी जो बचा उसे किसी तरह जुगाड़ लेंगे..... तुम चिन्ता मत करो.....।’’ अंतिम निर्णय सुना दिया गया था। अब कहीं किसी अपील की कोई गुंजाइश नहीं है जानते हुए भी गिड़गिड़ाई- ‘‘देखिए इस बार के बोनस को तो टी.वी. के लिए सोचा था आपने.... अभी अगर माताजी को यह बात समझा दें तो कैसा रहे?......
हाँ शादी में जरूर हम लोग उन्हें पैसे देंगे.....।’’
    ‘‘मैडम भूल जाइए टी.वी. को और फिर जमीन खरीदी जा चुकी है, रजिस्ट्री तो करवानी ही पड़ेगी..... बिना रजिस्ट्री के बैनामा निरस्त हो जावेगा.....। माता जी का भरोसा टूटेगा सो अलग।’’ कुछ और कहने का अवसर दिए बिना माताजी के आज्ञाकारी पुत्र..... उठकर चल दिए.....। समझ गई अब कुछ कहना सुनना व्यर्थ है..... रो पड़ी..... विवशता के आँसुओं में डूब गई टी.वी., बह गई साड़ियाँ। सोची थी जरा भरा रंग जमा सकूंगी..... दो साड़ियाँ जरा अच्छी तो दो सामान्य तो ले ही लूंगी..... आखिर अलानी- फलानी सभी तो नई साड़ियों में सजी संवरी स्कूल आती हैं....।
    कितना इतराकर मिसेज चौधरी कहती हैं- ‘‘अब क्या करें भाई.... हमारे श्रीमान तो कुछ सनते ही नहीं..... दुकान गए तो चार साड़ियाँ बंधवा लिए....... नए फैशन की साड़ियाँ ही इन्हें पसंद आती हैं.....   वरना हमारा क्या....।’’ सुहागवती पत्नी का पतिगर्व..... लोगों को ईश्याZ कातर बना देता है।
    मिसेज चड्डा याद आई- ‘‘अरे मैडम क्या कहें हमारे हसबेंड को तो बीवी को सजी-धजी देखना ही पसंद हैं हजार मना करें..... आल्मारी में पड़ी साड़ियों की दुहाई दें पर हर दूसरे तीसरे महीने साड़ियाँ उठाए चले आते हैं.....सच....तंग आ गई मैं तो.......।’’
    मिसेज चड्डा की लिपिस्टिक रंगी मुस्कान...... न लाल होती है न गुलाबी वो तो...... मुझे काली ही नजर आती है। पर क्या कहूँ.....मेरी किस्मत ही ऐसी है.....। माँ की याद आई कहती हैं- ‘‘बिटिया तुम तकदीर वाली दो इंजीनियर पति, खुद की नौकरी...... हीरे जैसे दो बेटे...... ससुराल का भरा पूरा घर, जमीन-जायदाद......।’’ हाँ ठीक है, मेरी जैसी सामान्य रंगरूप की लड़की और उससे भी सामान्य पिता की बेटी के लिए ऐसा घर-वर..... तो भाग्य से ही मिलता है। अब क्या कहूँ.....किससे कहूँ कि इस भाग्य की चमक को बनाए रखने के लिए भी शहरों में अतिरिक्त खर्च की जरूरत होती है।
    दान में हाथी मिल भी जावे तो उसे पोसने की औकात भी तो होनी चाहिए। गाँव की ससुराल और शहरी जीवन के खर्च के बीच तालमेल बिठाते-बिठाते इन दस सालों में ही मैं थक गई हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं पति की विवशता को नहीं समझती या मुझे शानो-शौकत ने अंधा बना दिया है...... पर अपने बच्चों को कुछ अच्छे ढंग से पालना चाहती हूँ..... चाहती हूँ कि उनमें कोई हीन भावना.....कोई कुण्ठा.....ईश्याZ, न जागे। वे अपने दोस्तों के साथ बराबरी से खेलते कूदते...... पढ़ लिख सकें..... तभी तो उनके व्यक्तित्व का सर्वागीण विकास हो सकेगा। पर मेरी बातों को किताबी बातें कहकर अनसुनी कर देना भी इनकी आदत है या शायद विवशता ही हैं.....या शायद मेरी बात मानकर मुझे अतिरिक्त प्रश्रय नहीं देना चाहते......कौन जाने ?..... चलूं रात के खाने का इंतजाम करूँ.....।


चार

    हजारों शब्द जहाँ अपनी बात मनवाने में असमर्थ सिद्ध होते हैं वहाँ एक शब्द मौन जीत का परचम लहरा देता है। शाम से ही बदली छाई थी अभी रात के नौ बजे हैं ठण्डी हवा के झोके ने दिन भर के तप्त मन शीतल कर दिया। हल्की बूंदा-बांदी शुरू हुई और मैं बरामदे में आ खड़ी हुई..... आकाश की ओर देखी पूर्णिमा का चांद बादलों में छिप गया है फिर भी धुधली-सी चांदनी चारांे ओर बिखेर गई है..... प्रकृति के इस रूप ने मुग्ध कर दिया कि कंधे पर चिरपरिचित स्पर्श मिला मुड़ी, तो पाया ये खड़े हैं..... सफेद पैजामे कुरते में.....। कभी-कभी हल्का सा स्पर्श, सारे उपालंभ दूर कर देता है...... ‘देखिए...... कहकर चांद की ओर संकेत करने लगी थी कि देखा, चांद बादलों की ओट से निकल कर हमें रहा है। चाँदनी खिलखिलाकर हँस पड़ी.....। ‘‘सुधा तुम कुछ जानती-समझती हो, मेरी विवशता तुमसे छिपी नहीं है बस दोनों बहनों की शादी हो जावे, भाई अपने पैरों पर खड़ा हो जावे...... फिर तुम्हारी हर साध पूरी करूँगा, मुझ पर इतना विश्वास तो तुम कर ही सकती हो.....।’’
    इनके विगलित स्वर ने मुझे विभोर कर दिया खुद को धिक्कारने लगी fछः कभी-कभी मैं कितनी स्वार्थी हो जाती हूँ..... अरे मुझे तो ऐसे पति पर गर्व होना चाहिए जो रिश्तों का मान रखना तानता है, अपने कत्तZव्यों के प्रति पूरी निश्ठा रखता है.....। इनके मुँह पर हाथ रख दी। आज जाना कि समर्पित दाम्पत्य में मौन की भाशा ही अभिव्यक्ति का सशक्त और सार्थक माध्यम है। जीवन अपनी गति से चलने लगा..... गाँव में पैसे भेज दिए गए.....।
    शर्मा मैडम आपको fप्रंसिपल साहब ने बुलाया है। स्कूल का चपरासी बोधराम खड़ा था..... चलो - आती हूँ कहकर कापियाँ समेटने लगी सोच रही थी कोई गलती तो की नहीं हूँ तीसरा पीरियड तो खाली रहता है...... अभी परीक्षाएँ भी पास नहीं है कि प्रश्न पत्र के लिए बुलावा आवे..... फिर कोई जयंती, कोई समारोह या प्रतियोगिता भी तो नहीं फिर fप्रंसिपल ने क्यों बुलाया है..... ? ऊँह चल कर देख ही लूँ..... सोचती चल पड़ी, पर्दा हटाकर अनुमति मांगने ही वाली थी कि सदा गुरू गंभीर दिखने वाले fप्रंसिपल डाॅ. राजपत की आइए, आइए मैडम..... आपसे कुछ काम था बैठिए.....। शब्द सुनाई दिए। ‘‘कहिए सर क्या आदेश है......।’’ बोल कर बैठ गई..... देखी टेबल पर एक मोटी सी फाइल रखी है.... कुछ समझ में नहीं आया कि डाॅ. राजपूत बोले- ‘‘मैडम साहू सर ने वी.आर.एस. के लिए आवेदन पत्र दे दिया है अभी तक विद्यालय पत्रिका का संपादन वे ही करते थे..... मुद्रक का फोन आया था उन्हें पाण्डुपिपि कल तक चाहिए, नहीं तो समय पर पत्रिका छप नहीं सकेगी हमने पत्रिका के विमोचन की तिथि आगामी 28 को रखा है आपसे अनुरोध है कि ये फाइल ले जाइए और सम्पादन करके कल सुबह तक...... दे दीजिए......।’’ मेरे उत्तर की अपेक्षा उन्हें थी...... पर मैं सोच रही थी मात्र 24 घंटे का समय है फिर आज से पहले कभी किसी पत्रिका का संपादन तो किया नहीं है.....कैसे करूँगी किससे सहायता लूंगी..... हे भगवान् यह कैसर परीक्षा है.....?
पसीने-पसीने हो गई..... अभी-अभी तो स्थानान्तरण में घर के पास का स्कूल मिला है..... कहीं फिर..... नहीं नहीं...... मुझे संपादन कार्य करना ही होगा.....। खुद को संभालकर बोली- ‘‘सर इससे पहले कभी तो मैंने संपादन किया नहीं है फिर समय बहुत कम है..... यदि सोमवार तक का समय मिल जाता तो.....।’’
    इस बार fप्रंसिपल का अंदाज प्रशासक के आदेश में बदल गया- मैडम आप fहंदी की व्याख्याता हैं फिर कोई भी कम सीखने के लिए शुरूआत तो करनी ही होती है..... हाँ समय कम है तो ऐसा करिए..... अच्छी लिखावट वाले दो-तीन विद्यार्थियों को साथ में बिठा लीजिए..... पाण्डुलिपि तैयार करने में मदद मिल जावेगी..... संगीत कक्ष खुलवा देता हूँ..... वहीं बैठकर काम कीजिए।’’ स्वीकृति जाने बिना ही उन्होंने मोटी फाइल मेरी ओर बढ़ा दिया....। मरता क्या न करता वाले अंदाज में हाथ बढ़ाकर फाइल ली और स्टाक रूप में आ गई..... तीन चार शिक्षिकायें बैठी थीं सबको यह जानने की जल्दी थी कि fप्रंसिपल ने क्यों बुलाया था..... चुलबुली कांति तिवारी बोली- ‘‘अरे मैडम पसीने-पसीने हो रही हैं...... क्या कहें- fप्रंसिपल साहब की डांट.....।’’
    ‘‘नहीं नहीं उन्होंने कुछ नहीं कहा है, डांटा भी नहीं है...... कहती हुई रूमाल से पसीना पोंछने लगी.....।’’
    कमल वर्गिस.....जहर भरी मुस्कान के साथ मेरी ओर देखने लगी मानों वह कह रही हो लाख छुपाओ मैडम..... हमसे कुछ छिपा थोड़े ही है.....। इतनी देर में मैडम चौधरी का ध्यान मेरे हाथों में थमी फाइल पर गया..... वे वरिश्ठ हैं, भली महिला हैं सबका भला चाहती है वे बोली- ‘‘अरे फाइल में क्या ले आई बताओ.....।’’ अब तक मैं सहज होने लगी थी चौधरी मैडम के आश्वासन भरे स्वर ने और भी सहज बना दिया बोली- ‘‘मैडम-विद्यालय पत्रिका की फाइल है साहू सर की जगह इसके संपादन का काम मुझे दिए हैं कल ही पाण्डुलिपि तैयार करनी होगी.....।’’
    चौधरी मैडम ने स्नेह से मेरी ओर देखा, बोली- ‘‘तुम नई आई हो इतना गुरूतर कार्य तुम्हें दिया गया है बधाई हो..... तुम्हारी साहित्यिक प्रतिभा को पहचान कर ही संपादन तुम्हें दिया गया है..... घबराओ मत.... सब हो जावेगा।’’ सच कहूँ उस समय मैडम चौधरी मुझे मातृसमा लगी..... आश्वस्त हुई उन्हें बताई कि संगीत कक्ष खुलवाना पडे़गा..... अपने स्वभाव के अनुरूप उन्होंने न सिर्फ संगीत कक्ष खुलवाया बल्कि दो लड़कियाँ भी बुलवा दी जिनकी लिखावट अच्छी थी.....बोली- ‘‘मैं तुम्हारी चाय यही भिजवा दूंगी...... अब काम शुरू करो.....।’’ और चली गई।
    फाइल खोली..... छोटे-बड़े कागजों पर कहीं हाशिए सहित तो कहीं हाशिए रहित..... लेख, कविता, कहानियाँ.....। टेढे़-मेढ़े बेतरतीब मुडे़-तुड़े कागजों का पुfलंदा था......। बच्चों के अक्षर.....छोटे बड़े..... थोड़ी देर तो समझ में यही नहीं आया कि इस समुद्र से मोती निकालूं कैसे..... जब तक स्वयं पूरा न पढ़ लूँ..... संतुश्ट न हो लूँ रचनाओं का चयन कैसे करूँ ? पढ़ने बैठी तो...... लड़कियाँ क्या करेगी..... फिर समय तो बहुत जल्दी बीत रहा है छुट्टी की घंटी बजते ही ये लड़कियाँ क्या करेगी..... फिर समय तो बहुत जल्दी बीत रहा है छुट्टी की घंटी बजते ही ये लड़कियाँ घर चल देगी..... फिर पाण्डुलिपि कैसे तैयार करूँगी.....?
   
    ‘‘मैडम पहले हम लोग...... गद्य और पद्य अलग-अलग कर लेती हैं.....’’ विशाखा बोली सच विद्यार्थी भी गुरू का मार्गदर्शन करते हैं..... मेरी स्वीकृति के साथ ही पूनम और विशाखा ने मिलकर पुलिदें को दो भागों में बांट दिया पहला गद्य दूसरा पद्य..... इस तरह दो फाइलें हो गई....। काम आसान होने लगा तो उत्साह जागा, साहित्यिक अभिरूचि को अपने कौशल प्रदर्शन का सुयोग मिला।
     विशाखा ने त्वरित गति से गद्य को सुव्यवस्थित कर दिया..... अब मेरी बारी थी कहानियाँ और निबंध अलग-अलग करने की। तब तक पूनम ने कविताओं को अलग कर लिया था..... सो कविताएँ पढ़ने लगी..... कुछ तो मात्र तुकबंदी थी तो कुछ फिल्मी गानों की नकल..... हाँ कुछ कविताएँ अच्छी थीं...... इस तरह सात आठ कविताएँ अलग की और उन्हें पूनम को देकर बोली-बेटा अलग-अलग कागज में एक तरफ ही इन्हें लिखना..... दूसरी तरफ को खाखी छोड़ना..... रचनाकार का नाम और कक्षा अवश्य लिखना......।
    पूनम के कहा-मैडम कोरे कागज तो हैं नहीं..... किसमें लिखूँ सो नीचे भीगी...... कागज लेने......पर मुसीबत तो अकेली नहीं आती न.....? कागज दे कौन.....? क्लर्क गजभिये बाबू तो छुट्टी पर है...... फिर fप्रंसिपल के पास गई उन्होंने कहा- ‘‘मैडम बाजार से कागज मंगा लीजिए..... छोटी-छोटह बातों के लिए मुझमे पूछने की जरूरत नहीं है, समय कम है काम पर ध्यान दीजिए....।’’
     बड़ा गुस्सा आया-अरे मैं तो नौसिखिया हूँ आपको तो सारी व्यवस्था करके रखनी चाहिए थी..... पर बोल नहीं सकी.....। कागज आया..... पूनम ने कविताओं की प्रतिलिपि करना शुरू किया। बारी आई गद्य की..... तो कहानी..... अरे बाप रे..... कछुए खरगोश की..... तो राम-वनवास की..... सिर दुखने लगा फिर भी .... कुछ का चयन की.... विशाखा से प्रतिलिपि तैयार करने बोलकर स्वयं बैठ गई निबंधों को लेकर.....।
    अभी काम आधा ही हुआ था कि छुट्टी की घंटी बज गई..... पहली बार घंटी की आवाज ने मुझे बौखला दिया कहाँ तो इस घंटी की प्रतीक्षा करती थी कि कब जान बचे..... और घर जाऊँ। आज लगा बैरिन घंटी को अभी ही बजना था कुछ देर और नहीं रूक सकती थी पर वक्त तो अपनी रफ्तार से चलता है.....। छुट्टी हो गई..... विशाखा और पूनम को विदा कर दी..... सारी फाइलें समेट नीचे उतरी..... देखा fप्रंसिपल साहब खड़े हैं- ‘‘मैडम फाइलें घर ले जाइए.... कल आप दो बजे स्कूल आइएगा, मैं आपके घर से एक बजे तक पाण्डुलिपि मंगवा लूंगा।’’
    मन हुआ बोलूं मेरे घर पर दो बच्चे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, गृहिणी हूँ घर का काम-काज रसोई पानी कौन करेगा ? ‘‘अच्छा सर नमस्ते।’’ कहकर मैं घर की ओर चल पड़ी.....।
    घर का दरवाजा खुला था..... बच्चे दौड़कर आये..... तब तक ‘‘नमस्ते मैडम’’ सुनाई दिया चौंककर देखी भरे-भरे गुलाबी ओठों मंे शरारती मुस्कान कौंध रही थी आँखे उसका साथ दे रही थी..... शर्मा गई - ‘‘ये क्या बात हुई.....नमस्ते..... क्यों?’’ पूछी कम धमकाई ज्यादा। ‘‘अरे! आज तुम्हारे हाथ में इतनी फाइलें जो हैं.....।’’ बड़ी मासूमियत भरी आवाज थी, पति महोदय की।
    सच..... इनकी चालें..... उफ! क्या करूँ इनका......। फाइलें डाइfनंग टेबल पर पटक हाथ मुँह धोने चल दी..... कपड़े बदल कर चाय बनाई..... चाय लेकर आई तो देखी ये फाइलें देखने लग पड़े हैं.....। ‘‘चाय लीजिए.....।’’ बोली तो फाइल रखकर खड़े हो गए हाथ आगे कर बोले- ‘‘बधाई सुधा..... आज मैं बहुत खुश हूँ, तुम्हें तुम्हारी रूचि का काम मिला है..... सच सुधा नौकरी में मनोनुकूल काम मिलना भी भाग्य की बात है..... इस तरह के मौके ही हमारी काबिलियत को सामने लाते हैं..... तब नौकरी का मजा आता है।’’ सोचने लगी कितने अच्छे, कितने प्रेरणाप्रद विचार हैं इनके.... पत्नी की नौकरी को, उसके काम को कितना महत्व देते हैं सही मायने में हमसफर हैं मेरे श्रीमान..... गर्व हो आया अपने भाग्य पर..... इतरा उठी अपने कद्रदांन पर.....। धीरे-धीरे चाय के साथ पूरी बात इन्हें बताई, जानती हूँ इनका स्वभाव है चुनौती स्वीकारना। बड़े धीरज से बोले- ‘‘तुम fचंता मत करो मैं बच्चों को लेकर बाजार जा रहा हूँ कुछ सब्जी.... कुछ सामान भी खरीदना है तब तक तुम आराम कर लो......।’’ इनकी क्या योजना है पूछना चाहती थी पर रहस्य बनाए रखना भी इनकी एक आदत है..... सो बच्चों को लेकर बाजार चल दिए..... मैं वहीं दीवान में पसर गई..... आँख खुली कालबेल की चीख से ..... दरवाजा खोली, बच्चों के हाथ में उनकी पसंद के बैट बाल और कार थी चहक रहे थे दोनों- ‘‘मम्मी पापा ने हमको आइसक्रीम खिलाया.....।’’ मनु ने कहा तो नैनी कहाँ पीछे रहता- ‘‘मम्मी पापा ने हमें केक पेस्ट्री लेकर दिया है......।’’ अरूण इसी तरह बच्चों का दिल जीत लेते हैं.....। गैरेज बंद कर ये आए..... आते ही बोले- ‘‘सुधा! काफी हाउस से तंदूरी रोटियाँ और मटर पनीर पैक करवा के ले आया हूँ चलो गरम-गरम खा लेते हैं फिर बात करेंगे।
    एक तो सोकर समय गंवाई उसका पछतावा था फिर इस खान-पान के बेतुके सरंजाम ने चिढ़ा दिया..... भुनभुनाते हुए प्लेमें लगाने लगी..... मैं तो जैसे-तैसे गटक रही थी..... पत्रिका की पाण्डुलिपि कब..... कैसे तैयार करूँगी इसी fचंता में पड़ी थी.....। खाना खत्म कर बच्चे हाथ धोने चले गए तो ये बोले- ‘‘मैडम बच्चों को जल्दी सुला दो फिर हम दोनों रतजगा करेंगे..... क्यों मंजूर.....? इस बार तो मैं उबल पड़ी........’’ मैं fचंता में मरी जा रही हूँ आपको रतजगे की पड़ी है, कभी मेरी परेशानी की भी सोचते हैं आप ?’’ इस बार अरूण गंभीर हो गए बोले- ‘‘सुधा! किसी काम को बोझ कभी मत समझो...... हँसकर काम करो तो काम सहज भी हो जाता है सफल भी.....। मैं तो तुम्हारे काम की ही कह रहा था..... मैं फाइलें देख चुका हूँ प्रतिलिपि करनी है न...... तुम जानती हो मेरी लिखावट..... कुछ ज्यादा बुरी नहीं है.....।’’
    हे भगवान मैं अरूण को समझने में इतनी देर क्यों कर देती हँू..... तभी तो ये मुझे पढ़ी-लिखी बेवकूफ कहते हैं......। पल भर में मन उत्साह से भर गया..... बड़े लाड़ से बोली ऊहँू.....उससे पहले बोले- ‘‘हाँ चलो पान खाकर आते हैं...... गुलनार की माँ अच्छा पान बनाती है।’’
    आप जाइए तब तक मैं टेबल समेट कर बच्चों को सुलाती हूँ...... कहकर मैं काम में जुट गई।

पाँच

    दिन भर की धींगा मस्ती और मन पसंद खिलौनों की प्राप्ति का सुख मेरे बच्चों की पलकों पर छा गया..... सो गए दोनों.....। अहा! सोये हुए बच्चों का मुख कितना निश्पाप कितना भोला दिखता है उनके सिरों को सहलाते हुए, माथे पर चुम्बन जड़ी माँ.... के दुलार की सील मोहर.....। श्याम गौर की यह जोड़ी...... मेरे दाम्पत्य की किताब का अर्धविराम और पूर्ण-विराम ही तो है। भगवान् मेरे बच्चों को सदैव प्रसन्न रखना स्वस्थ रखना।
    ‘‘लीजिए मैडम बंदा पान लेकर हाजिर है..... कहते ये कमरे ये में आए..... पान मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले- ‘‘आपके बच्चे सो गए..... पर फाइलें जाग रही हैं अब उन्हें सुलाने चलें.....।’’ दबे पांव..... हम दोनों ड्राइंग रूम में आ गए। इन्होंने कहा.... ‘‘ऐसा करते हैं जो चयनित रचनाएँ हैं उन्हें मुझे दे दो मैं प्रतिलिपि तैयार करता रहूँ तब तक तुम अन्य रचनाओं का चयन कर लो..... काम जल्दी निपट जाएगा.....।’’
    इतनी तन्मयता से तो गणेश जी ने वेदव्यास की महाभारत का लेखन नहीं किया होगा जितनी तन्मयता से ये लिखने लग पड़े। रचनाएँ इन्हें थमाती गई ये लिखते रहे..... fनःशब्द रात गुजरती रही..... कब दो बज गए पता नहीं चला.....। टन-टन दो बार घंटी बजी चौंक कर दीवाल घड़ी की ओर देखी..... ओह.... इतनी देर हो गई....सुबह अरूण को आॅफिस जाना है....। पत्नी का कत्तZव्य जागा..... कागज समेट कर बोली...... ‘‘अब बस..... पाण्डुलिपि तैयार हो गई..... अब अनुक्रमणिका बनानी है, संपादकीय लिखना है, थोड़ा बहुत फिर से देखना है जो मैं सुबह कर लूँगी, अब आप चलिए सो जाइए.....।’’
    ‘‘हाँ.....चलो.....पर विशेश कश्ट न हो तो.....एक कप चाय पिला दो.... बहुत दिनों बाद हिन्दी में इतना कुछ लिखा है.....थकान सी लग रही है.......।’’ कहते हुए उठ खड़े हुए अरूण...... जो मेरे सुख-दुख के साथी हैं। सुबह इन्हें आॅफिस और बच्चों को स्कूल भेजकर फिर बैठी इस बार पूरी पत्रिका की पाण्डुलिपि तैयार थी, संपादकीय लिखी अपना नाम संपादक के तौर पर लिखते हुए आत्मातृप्ति मिली, कृति की संपूर्णता का आनंद इसी को कहते हैं।
    लगभग सारा काम निपटा चुकी थी...... पेपर पढ़ रही थी कि कालबेल बजी..... दरवाजा खोला तो fप्रंसिपल डाॅ. राजपूत खड़े थे...... हड़बड़ा गई.....नमस्ते सर आइए .....आपने तो किसी को भेजने को कहा था..... एक सांस में इतना सब कह गई.....। ‘‘पहले बैठने दीजिए फिर बताता हूँ...... अरे हाँ एक गिलास पानी देंगी...... कहते डाॅ. राजपूत साफे पर बैठ गए.....।
    पानी पीकर बोले- ‘‘लाइए देखूँ...... फाइल लेकर देखते रहें..... मैं उनके चेहरे पर आते-जाते भावों को पढ़ने की कोशिश करती रही, कुछ समझ में नहीं आया सो चुप खड़ी थी। ‘‘अरे आप बैठिए न मैडम..... खड़ी क्यों हैं?’’ मैं प्रश्नवाचक दृश्टि से उनकी ओर देखने लगी..... कुछ डर भी रही थी..... कि उन्होंने पूछा- ‘‘मैडम आधी से ज्यादा रचनाओं की लिखावट एक जैसा है, किसकी है? बड़ी साफ, सुन्दर लिखावट है.....।’’
    गर्व मिश्रित सकुचाहट से जवाब दिया मैंने- ‘‘इनकी लिखावट है.....।’’ मेरे साथ बैठकर इन्होंने प्रतिलिपि तैयार की है......।’’ ‘‘तो पतिदेव.....की भरपूर सहायता आपको मिली है..... उनकी तो जनरल शिफ्ट होती होगी न ? फिर भी रात जागकर आपके काम में हाथ बंटाते रहे......मैडम मैं आपसे उम्र में बड़ा हूँ आशीर्वाद देता हूँ आप दोनों आजन्म इसी तरह एक-दूसरे का साथ देते रहें.....। भाग्यशालिनी हैं आप जो ऐसा सहयोगी पति मिला है।’’ क्या कहती ? बड़ों के सामने पति के विशय में कुछ कहना नारी-जनोचित मर्यादा के अनुकूल नहीं है फिर सहज संकोच भी कुछ कहने नहीं देता.....।
    मोटे चश्मे से एक बार फिर मेरी ओर देखकर डाॅ. राजपूत बोले- ‘‘जानता हूँ मैडम कल आपको मुझ पर क्रोध अवश्य आया होगा, पर मैडम..... किसी की प्रतिभा को उजागर करने के लिए कभी-कभी सख्ती बरतनी पड़ती है। यह प्रशासक का एक गुरूतर कार्य होता है। आशा है आप मुझे गलत नहीं समझेंगी.....।’’
    हतप्रभ हो गई..... कितने अच्छे विचार हैं इनके.....। ‘‘अच्छा मैडम..... फाइल दीजिए..... मैं चलूँ...... फिर कभी आकर शर्मा जी से भेंट करूँगा.....।’’
    फाइल लेकर वे चले गए। मैं सोचने लगी आँखें जितना देखतीं हैं, कान जितना सुनते हैं, वह काफी नहीं होता किसी को जानने के लिए.....। पद की गरिमा भी कभी-कभी संबंधों की सहजता में बाधक होती है। डाॅ. राजपूत चाहते तो किसी किसी को भेजकर फाइल मंगा सकते थे किन्तु उन्हें जो कहना था उसे स्कूल में नहीं कह सकते थे......इसीलिए घर आए..... हाँ मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया......संपादन का काम सिखा गए जो मेरी रूचि का है, कर्मस्थल में मुझे विशिश्टता भी प्रदान करेगा।


                     छह
   
कितना काम फैला है...... कैसे समेटूँ 10.30 बज गए..... डिब्बा वाला आ रहा होगा..... स्कूल जाना है मनु के लिए टिफिन बनाना है तो नैनी का खाना टेबल पर रखना है.....दाल भिगोई हूँ उसे पीसना है..... ऐसा करूँ आज छूट्टी ले लेती हूँ पर अभी स्कूल खुले हफ्ता भर भी नहीं हुआ है, कौने चार बाते सुने, छुट्टी तो अपनी जाती है, बातें fप्रंसिपल की सुननी पड़ती हैं..... क्या करूँ......?
    ‘‘मम्मी जूतों पर पालिश क्यों नहीं की है ?’’ मनु बाबू चीख रहे हैं...... हे भगवान ये लड़का..... इतना बड़ा हो गया अपने जूते क्पड़े भी नहीं संभाल सकता.....? मेरे ही मन ने कहा खाखिर साढ़े आठ का ही तो है...... इस उम्र में बड़ी बुआ जब मेरी चोटियाँ बांधती थी तो मैं कितना हंगामा करती थी...... सच माताओं की नौकरी बच्चों का बचपन छीन लेती है.....। जूतों पर पाॅलिश करने बैठी थी कि मनु बोला मम्मी पान वाली आंटी आई है.....। झुंझला गई....एक तो वैसे ही समय की रहती है ऐसे समय कोई आ जाए तो सिर पीट लेने का मन करता है..... चलो देखूं.....। बाहर आई तो गुलनार की माँ खड़ी थी सांवले मुंह पर संकोच की लालिमा ओठों पर मीठी हँसी थी। नमस्ते करके बोली- ‘‘मैडम एक काम था अगर थोड़ा सा समय निकाल लेती तो.....।’’
    मैंने सोचा..... पान खाने का शौक इस तरह की बेगारी करवायेगा यह तो सोचा ही नहीं था खैर थोड़ी रूखी हँसी हँसकर बोली- ‘‘बैठिए बच्चे के जाने की तैयारी कर दूँ फिर आती हूँ।’’ उन्हें बिठाकर मनु को तैयार होने में मदद दी, इसी बीच सोच भी लिया कि आज तो छुट्टी लूंगी ही ताकि इत्मीनान से सारी तैयारी कर सकूं, आखिर सरे शाम किसी को चौंकानां भी तो है....।
    बाहर आई...... गुलनार की माँ से पूछी- ‘‘और सुनाइए सब ठीक तो है।’’
    अरे बाप रे.....बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया.... क्या? क्या कहें मैडम.....सोची थी, बेटी दामाद पास रहेंगे तो अकेलापन नहीं लगेगा, बुढ़ापा आराम से बीतेगा नाती-नातिन के साथ हँस बोलकर मन खुश रहेगा पर क्या बतायें, दामाद कभी सीधे मुँह बात नहीं करता..... बेटी के लिए अब मैं बोझ बन गई हूँ..... दुकान की आमदनी दिखती है......सामान भरने का खर्च कैसे जुगाडूँ.....? जो चार पैसा आता है बेटी को दे दूँ तो दुकान तो चार दिन में खाली हो जाएगी न.......? इसीलिए आजकल अपना खाना अलग बनाती हूँ..... फिर भी निस्तार नहीं है...... गुलनार....... कहती है ‘‘बाबू जी की दुकान है जो उसे चाहिए....... आपही बताइए इस उमर में मैं कहाँ जाऊँ..... क्या करूँ.....।’’ वे थोड़ा रूककर आँखें पोछने लगी और मैं सोच रही थी..... इस पूरे प्रकरण में मेरी क्या भूमिका है ? आखिर वे मुझे यह सब क्यों सुना रही हैं? यह तो उनका घरेलू मामला है फिर मेरे साथ कोई घनिश्ठता तो नहीं.....पान बनवाने ही तो जाती हूँ तो कभी कभार दो चार मामूली बातें हो जाती हैं..... पर कुछ न कहकर चुप रह जाना अभद्रता होती सो कहा- ‘‘हाँ गुलनार की माँ......दुकान चलाने के लिए जमा पूंजी तो लगती है..... तो कहिए मुझसे क्या काम है।’’
    ‘‘बहिन जी..... नहीं..... नहीं मैडम जी आप एक दरखास्त लिख दो न.....दुकान में बिजली लगवानी है...... वो क्या है कि गर्मी के दिन हैं, बिजली लग जावेगी तो कमरे में एक पंखा भी लगवा दूँगी छोटे-छोटे बच्चे सारी रात गर्मी के मारे बेहाल होते हैं रोते हैं, जो मुझको अच्छा नहीं लगता....।’’ फिर चुप हो गइ।
    आज समझ में आ गया, माँ तो बस माँ ही होती है न सगी न सौतेली.....। कागज लेकर लिखने बैठी पूछी किसके नाम से लिखूँ तो बोली- मेरे नाम से लिखो-नाम है कुलसुम बेगम......। कलम रूक गई क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार इनका नाम तो कुसुम है..... इन्हें मंदिर जाते भी देखती हँ.... मेरे मन का भाव शायद वे समझ गई हँसकर बोलीं- ‘‘मैडम आप सोच रही हैं मेरा नाम कुसुम है, ये नाम गुलनार की अपनी सगी माँ का नाम है..... पर बाबूजी मुझे भी इसी नाम से पुकारते थे..... अपने रहते ही उन्होंने दुकान मुझे दे दिया था, हाँ नाम भी उन्होंने कुलसुम बेगम ही लिखवाया था......।’’
    नाम का गोरखधंधा समझने लगूंगी तो देर हो जावेगी अभी ढेरों काम निपटाने हैं मुझे क्या ? सो विद्युत विभाग को एक आवेदन पत्र लिख दी...... अंगूठा लगाने बोली तो बड़ी मधुर हँसी हँसकर बोली- ‘‘मैडम जी मैं सातवीं कक्षा तक पढ़ी हूँ दस्तखत कर सकती हूँ पेन मुझे दीजिए.....।’’
    मुझे असंख्य प्रश्नों में उलझाकर गुलनार की माँ.....चली गई..... हाँ जाते समय.... पान देना नहीं भूली.....।
    मैंने खुद को प्रश्नों के जाल से बाहर निकाला....... और जल्दी-जल्दी साफ-सफाई...... रसोई घर के कामों में लगा दिया।
    चार बज गए......तब फुरसत मिली..... नहा धोकर तैयार हुई...... थोड़ी चंचल भी हो गई आज 19 जून है.... सुबह से एक बार भी अरूण ने याद नहीं किया, न ही विश किए, रोज की तरह आॅफिस चले गए...... अभिमान हुआ..... आखिर शादी की सालगिरह है इतना महत्वपूर्ण दिन कैसे भूल सकता है कोई.....। मैं ही याद करूँ......क्यों..... आखिर ? उनकी भी तो शादी हुई थी...... कि मेरी ही.......। हँस पड़ी..... शादी के साल बाद क्या ऊटपटांग सोच रही हूँ..... क्या मैं इन्हें जानती नहीं..... जरूर शाम को कोई सुंदर-सा उपहार लेकर आवेंगे...... फिर जल्दी मचावेंगे..... ‘‘अरे चलो सुधा..... उस भगवान को प्रणाम करके धन्यवाद तो वे आवें, जिसने हमें मिलाया......वरना.....हम कहाँ......तुम कहाँ.....आदि इत्यादि।
    गेट खुलने की आवाज से चौंकी, ये आ गए.... बच्चे दौड़कर इनसे लिपट गए..... ‘‘पापा जी हमने होमवर्क कर लिया है..... दूध पी लिया है..... अब हम सामने मैदान में खेलने जायें......।’’ दोनों बच्चों का रटा रटाया जुमला है..... फिर भी अच्छा लगता है......। बच्चों को विदा कर ये घर के अंदर आए..... घड़ी, पर्स, चाबी मुझे थमाकर...... हाथ मुँह धोने चल दिए..... हाँ एक लिफाफा भी थमा गए.... सोची देखंू क्या है......? फिर सोची.....ऊंह उनके काम का कागज होगा मुझे क्या, मैं तो..... जो खोज रही थी दिखा नहीं..... शायद गाड़ी में छिपा रखे हैं बाद में देंगे..... जाने क्या लाए हैं.......?
    ‘‘मैडम..... चाय-वाय मिलेगी...... कहते अरूण पास आ गए....... अरे सुबह से जिस बात की प्रतीक्षा है उसी का जिक्र नहीं है..... चाय देकर..... बोल ही पड़ी..... ‘‘ये क्या आपको याद नहीं आज हमारी शादी की सालगिरह है...... न तो विश किए न कोई उपहार....... शिकवा शिकायतों का दौर शायद कुछ और चलता कि ये भुवनमोहिनी हँसी छलकाते बोल पड़े- ‘‘सुधा रानी...... वो लिफाफा जो दिया, वही तो तुम्हारा उपहार है तुमने खोलकर देखा नहीं क्या ?’’
    बड़ा गुस्सा आया अरे मैं कोई अन्तर्यामी हूँ कि समझ जाऊँ लिफाफे में क्या है.....। विश करने को दो चार शब्द ही खर्च कर देते..... भाशा की कंजूसी तो कोई इनसे सीखे.....। मुंह फुलाए खड़ी थी कि चाय अधूरी छोड़ अंदर गए, बाहर आये तो हाथ में वही लिफाफा था..... हँसकर बोले..... लो सुधा आज तुम घरवाली बन गई....।’’ तुनक गई मैं ‘‘तो जनाब पिछले दस सालों से क्या थी ?’’ मेरे गाल पर हल्की सी चपत लगाकर बोले- ‘‘मैडम पत्नी थी..... हो, और रहोगी...... पर घर तो आज लिया न...... और जब घर हुआ तभी तो घरवाली बनी..... इतना नहीं समझती.....।’’
    परिहास का सच सामने आया लिफाफा खोलकर देखी..... हाउfसंग बोर्ड की रसीद थी एक एम. आई.जी के रजिस्ट्रेशन की रसीद...... अब समझी ये है विवाह वार्शिकी का उपहार.....। अभिभूत हो गई..... कहाँ तो..... घर चलाने को लेकर आए दिन होने वाली छड़प..... गाँव में पैसे भेजने को लेकर होता विवाद..... कहाँ यह उपहार...... वह भी घर का, जो हर गृहिणी का सपना होता है, हर स्त्री की चाहत अपना एक घर.....। आँखें भर आई सच..... अरूण तो बस अरूण ही हैं उनसे जीत जाऊँ ऐसा संभव ही नहीं है..... जीतना चाहती भी नहीं......।
   
                   
 सात
   
यूं तो बी.एस.पी. ने कई सुविधाएँ दे रखी हैं पर मुझे अच्छी लगती है..... भ्रमण सुविधा.....। हर चौथे साल भारत के किसी भी क्षेत्र के भ्रमण का लाभ उठाया जा सकता है..... अथवा हर दूसरे साल 750 किलोमीटर तक की यात्रा का आनंद लें। आज अरूण बता रहे थे इस गर्मी छुट्टी में हम कहीं जा सकते हैं बच्चों को बड़ा मजा आवेगा.....।
    मैं योजनाएं बनाने में माहिर हूँ आनन-फानन में निर्णय ले लिया जगन्नाथपुरी चलेंगे..... समुद्र तट पर खेतले मनु और नैनी..... फिर जगन्नाथ के दर्शन.....वाह....। मनु ने तुरंत कहा- ‘‘मम्मी समुद्र में तैरूंगा..... नैनी मायूस हो गया उसे तो तैरना आता नहीं..... पर पीछे हटना भी पसंद नहीं सो बोला- ‘‘पापा जी मैं आपके साथ बोfटंग करूँगा.....।’’हमारी बातें चल ही रही थी कि नौकरानी ने खबर दी गाँव वाले बाबूजी आए हैं.....। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा...... थोड़ा सा डर, थोड़ी सी आशंका लिए हम दोनों बाहर आए, उन्हें प्रणाम किया। कुशल मंगल के बाद बाबूजी ने बताया कि रात को खाने-पीने के बाद थोड़ी देर बैठेंगे तभी और बातें करेंगे, यात्रा से थक गए हैं, अभी थोड़ा आराम करेंगे।
    बाबू जी बिना पूर्व सूचना के कभी नहीं आते आखिर कौन सी जरूरी बात है..... लाख सोचने पर भी कोई कूल किनारा नहीं मिल पाया हारकर मन को समझाई..... थोड़ी देर में वो खुद ही बतायेंगे...... इतनी उतावली ठीक नहीं है..... जल्दी-जल्दी खाना बनाई...... बच्चों को खिलाया..... ये दोनों पिता-पुत्र खाकर ड्राईंग रूम में बातें करने लगे..... मेरा पेट तो उत्सुकता से भरा था किसी तरह एक रोटी चबाकर पानी पी, रसोई समेटकर हाथ धोने लगी थी कि बाबू जी ने बुलाया- ‘‘आओ बहू हम तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं।’’ बाबू की यही बात मुझे अच्छी लगती है, कभी वे अरूण से अकेले में कोई बात नहीं करते। बड़े ही निश्छल, उदार ससुर हैं बाबूजी...
बहुओं को पूरा मान देते हैं...... दुलारते हैं..... बल्कि कई बार माताजी का कोप भाजन बनने पर हमारी रक्षा करते हैं तब उनकी भूमिका बदल जाती है लगता है वे हमारे पिता ही हैं।
    ‘‘हाँ तो अरूण...... मेरे आने का कारण ये है - कि तुम्हारी माताजी एकादशी व्रत का उद्यापन करना चाहती हैं..... वह भी अगले महीने..... हम दोनों को जगन्नाथपुरी जाना होगा क्योंकि वहीं एकादशी उद्यापन किया जाता है।’’ चुप हो गए बाबूजी शायद हमारी प्रतिक्रिया जानना चाहते थे.....।
    अरूण....... हँस पड़े बोले- ‘‘बाबूजी हम लोग भी तो सोच रहे हैं कि बच्चों को पुरी का समुद्र दिखा लायें...... ठीक है मैं रिजर्वेशन करा लेता हूँ साथ ही चलेंगे......।’’
    ओह अरूण.....। ये क्या बोल गए, अरे मैं तो अपने पति पुत्रों के साथ घूमने जाना चाहती थी अब सास-ससुर के साथ क्या मौज मस्ती होगी बहू की मर्यादा..... सास-ससुर का लिहाज-सारा किरकिरा हो जावेगा.....। कभी तो मुझसे पूछ लेते....? नहीं..... जहाँ घर की बात आई..... मुझे दरकिनार कर देते हैं..... मेरी खुशी घरवालों के सामने कोई मायने नहीं रखती..... आदर्श बेटे की छवि को रंगमात्र भी धूमिल नहीं होने देते.....। सोच ही रही थी कि बाबूजी ने कहा- ‘‘वाह! अच्छी योजना है, सब साथ चलकर भगवान जगन्नाथ के दर्शन करेंगे..... तो यही तय रहा...... अच्छा अब तुम लोग भी आराम करो.....। क्यों सुधा तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं है.....? तुम्हारी तो गर्मी छुट्टी भी रहेगी.....।’’
    मन में सोची..... लायक बेटे के बाप हैं आप.... बहू की क्या मजाल जो चूं भी कर सके। कमरे में आकर उबल पड़ी। ‘‘मुझे कहीं नहीं जाना है आप ही आइए..... मैं बच्चों के साथ कुछ दिन माँ के पास रहूँगी.....।’’
    मेरे स्वर में छिपी नारजगी अरूण से छिपी न रही वैसे नाराजगी छिपाने की कोशिश तो मैंने की नहीं थी.....।
    पास आकर मेरे कंधों पर हाथ रखकर बोले- ‘‘सुधा बात को समझा करो..... आखिर बाबूजी लोग जा ही रहे हैं...... हम साथ रहेंगे तो उन लोगों की देखभाल कर सकेंगे इतनी गर्मी है...... उन लोगों की उम्र हो चली है...... कहीं....... तबीयत बिगड़-बिगड़ गई तो.....? फिर हमें भी तो वहीं जाना है अच्छा है साथ हो जावेगा बाबूजी..... पहले भी जा चुके हैं हमें उनका मार्गदर्शन मिलेगा..... माताजी के पास बच्चों को छोड़कर हम दोनों जरा निfश्चंत होकर घूम फिर सकेंगे...... सोचो भला..... सिर्फ तुम्हारा साथ.....।’’
    तड़प कर मैं बोल पड़ी- ‘‘हाँ इस गर्मी में सिर पर पल्ला लिए आदर्श बहू बनकर समुद्र तट पर घूमंूगी..... वाह क्या कल्पना है सिर्फ हम.....तुम.....अरे माताजी को जानते नहीं हैं क्या? वहाँ भी हुक्म नहीं का चलेगा..... जरा भी इधर-उधर हुआ नहीं कि आजकल की बहुओं के आचरण पर घंटे भर का व्याख्यान देंगी..... आप को क्या.....ऐसे समय में तो आप.....हमें भूल ही जाते हैं..... याद नहीं अमरकंटक में सिर का पल्ला संभालते.....साड़ी चप्पल से उलझ गई थी और हम गिर गए थे......। रूआंसी हो गई मैं...... बड़े स्नेह से मेरा सिर सहला कर ये बोले...... तब तुम नई थी अब तो सीनियर बहू हो.....अच्छा चलो हम तुम्हें अभय देते हैं..... पिछली बार की तरह तुम्हें गिरने नहीं देंगे......ठीक.....यदि कहो तो सलवार सूट सिलवा दूँ......।’’
   
    ‘‘हाँ यही एक कसर तो बाकी रह गई है, माताजी बाबूजी के सामने सलवार सूट पहनूंगी..... और माताजी वहीं समुद्र की लहरों में मुझे विसर्जित कर देंगी...... यही चाहते हैं आप..... आपकी भी जान बचेगी..... नई नवेली ब्याह लाइएगा वह भी माताजी की मनपसंद बहू......। आँखें भर आई मेरी....।
    यही ताना अरूण कभी सह नहीं सकते..... स्नेह का आधिक्य भी क्रोध में बदल जाता है सो गुस्से से बोले- ‘‘क्या चाहती हो माताजी बाबूजी को छोड़कर तुम्हारे साथ चलूँ..... या फिर बाबूजी को ही साथ चलने को मना कर दूँ...... भूलो मत सुधा कि बी.एस.पी. माताजी बाबूजी के भ्रमण का खर्च भी देती है। हाँ, यदि उनके खाने-पीने का खर्च तुम्हें अखर रहा है तो बाबूजी से कह देता हूँ दोनों बूढ़े-बूढ़ी अपने लिए दाल-चावल की पोटली बांध कर ले चलें..... वहीं कहीं बना खा लिया करेंगे।’’ ...... तमतमाने लगे अरूण.....समझ गई.....आदर्श पुत्र....की मर्यादा में खरोंच नहीं लगा सकती..... मन को समझाने का प्रयास की, असफल हो रो पड़ी...... ऐसी परिस्थिति में ये कभी कुछ नहीं कहते..... चाहे जितना रोऊं..... तड़पूं...... निर्विकार भाव से पलंग पर आँखें मूंदे पड़े रहते हैं..... कभी करवट बदल कर भी मेरी ओर नहीं चला.....। दिनचर्या पूर्ववत् चल पड़ी....हाँ इतना अवश्य हुआ कि न तो ये मुझसे बात किए..... न ही मैंने पहल करने की कोशिश की..... हमेशा ऐसा ही होता है.... कुछ नया नहीं है, अब आगामी चार पांच दिन इसी अबोले पन के साथ कटेंगे।
    आज बाबूजी चल दिए..... एक बात तो तय है कि हम दोनों सफल अभिनेता हैं। बाबूजी को जरा भी आभास नहीं होने दिया कि हमारे बीच शीत युद्ध चल रहा है। स्कूल से आई तो देखती हूँ बच्चे सामने मैदान में खेल रहे हैं..... साहब बहादुर....... ने मुस्कुरा के स्वागत किया....सो अनदेखा कर आगे बढ़ गई...... ये पीछे-पीछे चले आए, जानती हूँ अपनी बात मनवाने का पहला चरण है ये...... पर इस बार इनकी नहीं सुनूंगी आखिर...... क्यों सुनूं.....? मेरी अपनी भी तो ईच्छा-अनिच्छा है..... जो अनुचित तो कदापि नहीं है.......।
    ‘‘सुधा आओ चाय पीते हैं..... नहीं जी..... आज मैंने तुम्हारी पसंद की नींबू चाय बना रखी है....... समझौते का दूसरा चरण......। हाथ झटककर.....बाथरूम चली गई। जरूरत से ज्यादा देर तक हाथ मुँह धोई......असल में रूलाई का आवेग संभाल रही थी..... आखिर कब तक अंदर रहती बाहर निकली तो देखी.... ये क्या......सेंटर टेबल पर चाय के साथ.....प्रिय आलू बोण्डे..... काला गुलाब जामुन..... और हाँ काँच की तश्तरी में मोंगरे की माला भी है.....। अंदर कुछ पिघलने गला..... अनभ्यस्त। हाथों से किया गया चाय का सरंजाम.....पति का दुलार नहीं..... प्रणयी पुरूश का आतुर निवेदन प्रतीत होने लगा.....।
    मैं फिर हारने लगी.....सम्मान पूर्वक मुझे सोफे पर बिठाया......बालों में मोंगरे की माला टांक दिए..... फिर धीरे से बोले- ‘‘सुधा! साॅरी..... माफ कर दो.....।’’ बस और सह नहीं सकती..... ‘‘चलिए बहुत हुआ अब चाय पीने दीजिए.....।’’ कह प्यालों मंे चाय डालने लगी.....।
    थोड़ी सी मनुहार..... छोटी सी पहल यदि पति की ओर से हो तो.....कभी किसी घर में तनाव.....झगड़े....तकरार की नौबत नहीं आएगी।
    इन्होंने बताया कि माताजी-बाबूजी के साथ बिलासपुर स्टेशन में हमसे मिलेगे यहाँ से हम अहमदाबाद एक्सप्रेस से निकलेंगे - अगले महीने की तीन तारीख को दो बजे.....। बिलासपुर से उत्कल एक्सप्रेस पकड़ेंगे, रिजर्वेशन हो चुका है सो दूसरे दिन सुबह पुरी पहुँचेंगे...... बाबूजी ने अपने पण्डे को पत्र लिख दिया है वे स्टेशन पर ही मिल जावेंगे.....शाम को दशमी आवाहन, पूजा करेंगे..... समुद्र तट पर सूर्यास्त देखेंगे......। दूसरे दिन एकादशी है सो सुबह से ही उद्यापन का आयोजन होगा। पूजा दो ढ़ाई बजे तक चलेगी..... फिर हम फ्री हो जावेंगे। वाह..... देख रही हूँ पूरे सप्ताह भर का भ्रमण कार्यक्रम बना लिया गया है...... इस बार मैं बोली- ‘‘चिल्का झील का प्रोग्राम अलग रखियेगा..... बच्चे वहाँ जाकर खूब खुश होंगे......।’’
    ‘‘जो हुकुम सरकार......’’ अरे आपका हुक्म न मानकर मरना है क्या ? बड़ी अदा से बोले अरूण.....। संधि वार्ता सफल हुई कि...... जेमिनी गणेशन की पिक्चरों के बिगुल वादकों की तरह मनु और नैनी हाजिर हो गए.......।
    दोनों को गले लगाकर गुलाब-जामुन खिलाई..... इन्हें देखकर जीभ निकाल चिढ़ाई..... बच्चों की आँख बचाकर इन्होंने घूंसा ताना.....मानों कह रहे हों मेरी बारी आने दो बताता हूँ मजा...... सारी कोर कसर पूरी कर लंूगा......।
   

                      आठ

    एकादशी उद्यापन तीन बजे सम्पन्न हुआ माताजी बड़ी खुश थीं....... प्रसाद ग्रहण करते, मंदिर से लौटते चार बज चुके थे..... बाबूजी को आराम की आवश्यकता थी सो वापस आए...... पुरी होटल..... जहाँ हम ठहरे थे...... थके तो बच्चे भी थे, जल्दी ही सो गए......।
    ‘‘सुधा......इन्होंने आवाज दी..... बच्चों के पास से उठकर मैं सोफे पर आ बैठी जानना चाहती थी ये क्या कह रहे हैं.....। अरे..... ऐसे विगलित से मेरी ओर क्यों देख रहे हैं..... कुछ बोलते क्यो नहीं.....? ‘‘क्या हुआ आप इस तरह क्यों देख रहे हैं...... कुछ बोलने चाहते थे न ? कहिए मैं सुन रही हूँ.....’’ लगा मेरी बात पर इनका ध्यान नहीं है थोड़ी देर बाद सम्हंले तो बोले- ‘‘सुधा ! इतने साल हो गए मुझे तुम्हारे साथ रहते पर तुम्हें समझ नहीं पाया...... मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ जिसे तुम पत्नी रूप में मिली हो.....।’’
    मुझे कुछ समझ में नहीं आया, असमय की वंदना...... आशंका को ही जन्म देती है सो पूछ ही लिया- ‘‘आप क्या कहना चाह रहे हैं......?’’ मेरे हाथों को अपने हाथ में लेकर बोले- ‘‘पण्डे ने जब स्वर्ण-दान की बात की तो माताजी की आँखों में दान करने की ललक के साथ असमर्थता का भाव छा गया था, बाबूजी भी तत्काल कुछ न दे सकने के कारण विवश लग रहे थे..... ऐसे समय तुमने अपनी एक मात्र अंगूठी उतारकर जिस सहजता से माता जी के हाथों में रख दिया वह मेरी कल्पना से परे था। आज तक तुम्हारे लिए सोना क्या चाँदी का छल्ला भी नहीं बनवा सका हूँ और तुमने..... बिना क्षण भर का विलंब किए अंगूठी उतार कर दे दिया...... तुमने देखा सुधा माताजी की आँखें भर आई थीं, तुम्हें कितना-कितना आशीर्वाद दे रही थी......।

 बाबूजी का सिर गर्व से ऊँचा हो गया था मानों माताजी को याद दिला रहे हों कि सुधा को तो तुमने नापसंद कर दिया था, मेरी जिद से सुधा बहू बनकर मेरे घर आई है......।’’
    हाँ अब याद आ गया- मैंने कहा ‘‘पर वह तो कोई बड़ी बात नहीं थी.....।’’ पर बड़ी बात यह थी कि माताजी ने मौन पराजय स्वीकर कर लिया, दस सालों बाद और बाबू जी दस साल पुरानी जीत के आनंद में विभोर हो गए थे। भावुकता को प्रश्रय न मिले इसलिए मैं बोली- ‘‘जनाब-मैं कोई बेवकूफ नहीं हूँ पुरानी, घिसी हुई अंगूठी थी..... दे  दिया...... पर यह मत सोचिए कि सेंत मेंत दे दिया...... समय आने पर दुगने मूल्य वाली अंगूठी लूंगी...... याद रखिएगा......।’’ मेरी बात पूरी नहीं हुई थी कि बोले- ‘‘इस साल दीवाली में तुम्हारे लिए अंगूठी बनवा दूँगा वह भी अपनी पसंद से .........।’’
    हमारी बातें जाने कब तक चलती कि बाबूजी ने आवाज दी - ‘‘चलो भई पास में ही शंकराचार्य का पीठ स्थान मठ है चल कर दर्शन कर लें, बच्चों का घूमना भी हो जावेगा...... वहाँ शाम को प्रवचन होता है, आ गए हैं तो हम लोग भी प्रवचन सुन लेगें......।’’
    घूमने के नाम पर बच्चे जल्दी-जल्दी तैयार होने लगे तब तक माताजी भी आ गई, हम सब रिक्शे से शंकराचार्य मठ की ओर चल पड़े.....।
    समुद्र तट से कुछ दूर हटकर है मठ......। संस्कृत श्लोकों का शुद्ध उच्चारण मन प्राणों को पवित्र भाव से भरे दे रहा था। मुंडित सिर सन्यासी इधर-उधर आ जा रहे थे.....गेरूये वस्त्रों से महिमामंडित सन्यासी भारतीय संस्कृति के जागृत प्रहरी प्रतीत हो रहे थे.....। आगे बढ़े तो पक्के आंगन के चबूतरे पर एक महात्मा प्रवचन कर रहे थे.... ज्यादा नहीं...... पचास के करीब लोग बैठे प्रवचन सुन रहे थे....... बाबूजी ने इशारा किया हम सब भी बैठ गए..... पर हमारे सुपुत्रों को प्रवचन रास नहीं आ रहा था वे तो बडे़ से आंगन की परिक्रमा करने लगे...... थोड़ी ही देर में वापस आकर- ‘‘पापाजी अब चलिए न.......।’’ की जिद शुरू हुई माताजी ने समझा बाबूजी प्रवचन छोड़कर नहीं जावेंगे सो बोली- ‘‘चलो अरूण बच्चों को घुमा लायें, घंटे भर में आ जावेंगे तब प्रवचन समाप्त हो जावेगा.....।’’
           
मैंने इनकी ओर देखा मौन भाशा में निवेदन किया प्लीज मुझे भी प्रवचन सुनने दीजिए..... आखिर मेरी बात ये न बात ये न समझे तो कौन समझेगा.....? आँखों से इशारा किए तुम बैठो...... और बच्चों के साथ माताजी को लेगर चल दिए.....।
    देदीप्यमान् मुख मंडल.....स्वस्थ बलिश्ठ शरीर, गेरूये वस्त्र से आच्छादित पद्यासन में बैठे प्रवचन कर्ता के दर्शन मात्र से मन सात्विक भावों से भर गया..... अकुतोभय मुद्रा.....सहज स्मिति धीर गंभीर वाणी..... श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर रही थी...... ध्यान दिया वे कह रहे थे..... ‘‘श्रोतागण आपमें से अधिकांश सज्जन यहाँ पुरी-यात्रा पर आये है, तीर्थ यात्रा सद्गृहस्थ के लिए आवश्यक है पर क्या आप में अंतर्जगत की यात्रा करने की लालसा है ? यदि है तो सुनिए..... अंतआZत्मा का आमंत्रण स्वर..... यही स्वर आपकी अंतर्चेतना में जागरण पर्व लायेगा.....। आपसे......हमसे, पहले.....सूर, मीरा, तुलसी आदि भक्त, संतगण इस जागरण-पर्व का महोत्सव मना चुके हैं..... ईश्वर के प्रति सर्वतोभावेन समर्पण ही इस यात्रा का एकमात्र उद्देश्य है।
तो पहले जानें कि ईश्वर क्या है, कौन है! महर्शि पतंजलि कहते हैं - ‘‘क्लेश, कर्म विपाक और आशय इन चारों से परे, इन चारों से परे, इन चारों से जो असम्पृक्त है, वही ईश्वर है। अर्थात् सर्वोत्तम है किसी भी प्रकार के कर्म अथवा दुख के परिणाम से ईश्वर अछूता है। तो जो अछूता है, असम्पृक्त है उसे किसी व्यक्तित्व में बांधा कैसे जा सकता है ? चाहे वह व्यक्तित्व राम का हो, रहीम का हो, ईसा का हो या गौतम बुद्ध का.....। ईश्वर का कोई निश्चित आकार हो ही नहीं सकता वह तो भाव रूप है...... भावना तो निराकार होता है..... हाँ अधिक से यह कहा जा सकता है।
    ‘‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभुमूरति देखी तिन्ह तैसी.....।’’
    ईश्वर को हम चेतना की एक परम अवस्था कह सकते हैं, एक ऐसी अवस्था जिसे किसी भी तरह का क्लेश, कर्म, विपाक और आशय न प्रभावित कर पाता है न स्पर्श। क्लेश के पाँच प्रकार होते हैं। 1. अविद्या 2. अस्मिता, 3. राग, 4. द्वेश एवं 5. अभिनिवेश, किन्तु क्लेश आपके हमारे जैसे मानवों के लिए है ईश्वर के लिए नहीं है।
     दूसरा नंबर है कर्म का तो यह भी चार प्रकार का होता है प्रथम पुण्यकर्म, द्वितीय पापकर्म, तृतीय पुण्य पाप मिश्रित, चतुर्थ पाप पुण्य रहित कर्म.....।
    वस्तुतः हम अपने जीवन में इन चारों प्रकार के कर्मों को करते हैं यथा समय कर्मों का यथोचित फल भोग भी करते हैं, अवश्य फल का नियामक हम भाग्य को बताते हैं।
    तीसरा नंबर है विपाक का अर्थात् वही कर्मफल....... तो भाई अच्छा कर्म करें तो सुफल मिलेगा बुरा कर्म करें तो कुफल भी हमीं को तो कुफल हमीं को मिलेगा इसमें भाग्य अथवा ईश्वर की भूमिका तो कहीं है नहीं......। अपने कर्मफल के नियामक हम खुद हैं। समस्त जीव इस विपाक के चक्र में बंधे कर्म फल भोग करते हैं।
    चौथा नंबर है आशय का इसका तात्पर्य है कर्म समुदाय.....। सच कहें तो यह आशय ही जीवात्मा को बाँधता है। मन को, चेतना को, यत्र तत्र सर्वत्र घसीटता फिरता है यह आशय ही......। परिस्थितियों एवं मानसिक स्थितियों के परिवर्तन का सारा खेल यही आशय खेलता है। यदि आशय न हो तो सर्वत्र आनंद ही आनंद है चूंकि ईश्वर का आशय बांध नहीं सकता इसीलिए ईश्वर का नाम सच्चिदानंद भी है।
    ध्यान देने योग्य बात यह है कि जो जीव इन चारों बंधनों वह ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेता है, फिर उसे मिलता है निर्मल, शाश्वत आनंद...... अविनश्वर आनंद..... जो जीवत्मा का परम लक्ष्य भी है, साधना का सुफल भी है। यही ईश्वर को जानना है और जिसने ईश्वर को जान लिया -
    ‘‘जानत तुम्हहीं, तुम्हही व्है जाई......।’’ अंश का अंशी से उसी तरह मिलन हो जाता है जैसे- ‘‘फूटा कुंभ जल जलहि समानी, यह तथ कथै गियानी......।’’
    जगत् ईश्वरीय लीला स्थली है, हम मनुश्य इस लीला के सहभागी बनें पर कर्म बंधन में न पड़े...... कर्मफल की इच्छा सारे अनर्थ की जड़ है...... योगेश्वर कृश्ण ने कहा भी है- ‘‘कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेशु कदाचन......।’’
श्रद्धालु श्रोतागण ! अंतर्जगत् की यात्रा का प्रथम पड़ाव है कर्म फल का त्याग.....। आज से, इसी क्षण से सोचिए कि न तो आप कर्ता हैं न कर्मफल के भोक्ता...... कर्ता कोई और है आप सिर्फ सहकर्मी हैं सारे फसाद दूर जा पडे़ंगे.....। आपकी अंतर्चेतना में आनंद निर्झर फूट पड़ेगा.....।
    असम्पृक्तता कैसे प्राप्त करनी होती इसके बारे में हम अगले प्रवचन में आपको बतायेंगे......। आज विश्राम करें.....।
    आह.....सुनने की चाह बलवती हो गई पर प्रवचन समाप्त हो गया था, बाबूजी उठ खड़े हुए..... तब तक देखी माताजी अपने पोतों का हाथ थामे इधर ही आ रही हैं। सकृतज्ञ नेत्रों से इन्हें देखी..... मुस्कुरा दिए...... मानों आश्वस्त किये मैं तुम्हारी रूचि से परिचित हूँ इसीलिए तो बच्चों को घुमाने ले गया था।
    कल पूरणमासी है। आकाश का चांद अपनी विजय यात्रा पूरी करने चल पड़ा है हम लोग भी वापस मुड़ चले...... पुरी होटल की ओर.......।


                        नौ
    आकाश मेघाच्छन्न है, अभी-अभी बूंदा-बांदी थमी है......ठंडी हवा चल रही है.....। बच्चे आज जल्दी सो गए हैं...... अपने पापाजी को याद कर रहे थे...... हाँ अरूण बेंगलोर गए हैं...... हफ्ते भर का प्रवास है......। ऐसा नहीं है कि मैं उन्हें याद नहीं कर रही हूँ...... पर आज मेरा मन पराई पीर से छटपटा रहा है,.....हुआ यूँ कि दोपहर को गुलनार की माँ आई थी लेकर.....। मेरे कहे बिना ही बैठ गई...... शायद कुछ कहना था मैं भी फुरसत में थी सो बैठ गई पूछा कहिए..... कैसी हैं अब ? वो बिजली लग अब कोई तकलीफ तो नहीं है? बातचीत शुरूआत के लिए यूँ ही पूछ लिया मैंने.....।
    ‘‘अच्छा मैडम जी आप मुझे गुलनार की माँ क्यों कहती हैं शायद आपको पता नहीं, मैं हिन्दू हूँ, मेरा नाम कुसुम है।’’ चुप हो गई भद्रमहिला। मैं आगे सुनने को व्यग्र हो गई जाने क्यों इस महिला की कहानी जानने की बड़ी उत्सुकता थी.....। मेरी जिज्ञासा को उसने पढ़ लिया अतः आगे बोलने लगी...... ‘‘मैडम जी आजकल गुलनार का व्यवहार असह्य होता जा रहा है, बात-बात पर जली कटी सुनाती रहती है..... दुकान खाली करने को कहती है....... उसके बच्चों का हक मारने का दोश लगाती है, अब तो दामाद् जी भी सड़क पर सामान फेंक देने की धमकी देते हैं। आप ही बताइए इस उम्र में मैं कहाँ जाऊँ?......। गुलनार को अपनी बेटी की तरह पाला है..... रोने लगी..... उम्र दराज महिला का रोना...... वह भी अहोधार आँसुओं के साथ...... सहना मेरे लिए कठिन हो गया तो उठी एक गिलास पानी लाई बोली- ‘‘चुप हो जाइए और ये बताइए कि आप की शादी कब और कैसे हुई...... अवश्य यदि बुरा लगे तो न बतायें....... मैं तो आपके मन का बोझ कम करने के लिए ही पूछ रही हूँ.....।’’

    मिनट भर तक मौन पसरा रहा शायद वे सोच रही थी कि क्या और कितना बतायें......। अचानक हँस पड़ी फिर बोली- ‘‘मैडम जी आज अपनी पूरी कहानी आपको सुनाती हूँ...... सालों हो गए किसी से इस विशय पर गुलनार ने जो घर छोड़कर चले जाने को कहा तो यही अपमान मुझे अंदर तक चीर गया...... विवश होकर ही, छोड़ आए घर-परिवार को याद कर रही हूँ..... तो सुनिए.....।’’
    हाथ पैर फैलाकर थोडे़ आराम से बैठी फिर शुरू की.....।
    ‘‘मैडम जी.....उड़ीसा में कांटाबांजी स्टेशन जानती हैं।’’ मैंने कहा हाँ जानती हूँ देखी नहीं हूँ कहने पर आगे बोलने लगी..... ‘‘कांटाबांजी स्टेशन में उतर कर बस पकड़नी पड़ती है, करीब 15 किलोमीटर पर है हमार गाँव, नाम है बिस्नूपुर.......पहले तो हम लोगों को पैदल ही जाना पड़ता था आजकल बस चलने लगी है.....। हाँ तो, उसी गाँव में गरीब किसान के घर मैं पैदा हुई थी, मुझसे बड़ी तीन बहनें और थीं उनसे बड़ा एक भाई था जो प्रायमरी तक की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाया और पिताजी के काम में हाथ बंटाने लगा.....। मेरी माँ अनपढ़ थी, अक्सर बीमार रहती थी..... बहनें मिलजुल कर घर का काम देखती थीं..... मेरे पैदा होने की खुशी तो दूर की बात है एक खाने वाली आ गई की fचंता ही अधिक थी.....। मेरे बाद एक और भाई का जन्म हुआ..... मेरी माँ कुछ और कमजोर हो गई पर पिताजी खुश हुए..... लड़का हुआ था न, बड़ा होकर माँ-बाप को दोनों भाई मिलकर दो जून भात-पानी तो दे ही सकेंगे...... वरना अकेला बड़ा बेटा...... कितना करता.....?’’
    दम भर रूक कर बोली- ‘‘पता नहीं किसने मेरा नाम कुसुम रख दिया, भाई बहनों से लड़ते-झगड़ते.....दिन बीत रहे थे कि किसी ने पिताजी से कहा बच्चों को स्कूल में भरती करा दो- कापी किताब वहीं से मिलेगा चार अक्षर पढ़ जावेंगे..... पर मेरा छोटा भाई अकेले स्कूल जाने से डरता था। माँ ने भी सोचा एक बहन साथ    
रहेगी तो भाई की देखभाल करेगी इस तरह छोटे भाई के साथ मेरा नाम भी स्कूल में नाम लिखा दिया गया.... मैं बहुत खुश थी क्योंकि मेरी तीनों बहनों को तो स्कूल की देहरी नसीब ही नहीं हुई थी......। धीरे-धीरे हम दोनों भाई-बहन पाँचवीं कक्षा में पहुँच गए। भाई का मन पढ़ने में कम लगता था वो रोज गुरूजी से मार खाता था..... मेरी कापियों से नकल करके किसी तरह पास भर हो जाता था पर मेरा मन पढ़ने में लगता था। मैं खूब पढ़ना चाहती थी। कक्षा में पहले, दूसरे बहुत हुआ तो तीसरे नंबर से पास होती थी..... दिन बीत रहे थे कि पास के गाँव से बड़ी दीदी के लिए रिश्ता आया..... जाने क्या हुआ कि वे लोग मंझली दीदी को भी अपने छोटे लड़के के लिए माँग लिए। गरीबों की शादी भात और बरा.....पीठा साथ में दोनों बहनों के लिए चार-चार साड़ियाँ......बीस पच्चीस बराती थे..... दोनों बहनें सुसराल चली गई। दोनों सगी देवरानी-जिठानी बन गई थीं।
    साल पूरा होते न होते......गाँव के ही सम्पन्न किसान ने तीसरी बहन की सुंदरता देखकर अपने छोटे लड़के के लिए उसे मांग लिया इस शादी में सारा खर्च लड़के वालों ने ही किया..... दीदी भी चली गई..... हाँ इतना जरूर था कि गाँव में ही थीं तो कभी-कभी भेंट मुलाकात हो जाती थी।
   
सुख के दिन बीत गए...... उड़ीसा में भीशण अकाल पड़ा..... पीने का पानी मिलना कठिन था अच्छे-अच्छे घरों में एक बार ही खाना बनता था, फिर हमारी तो पूछो मत..... इधर मेरी कमजोर माँ.....घर का काम...... कर नहीं पाती थी भरपेट खाना तो मिलता ही नहीं था। खेत से चार बीज अनाज नहीं मिला..... बड़ा भाई स्टेशन में कुली का काम करने लगा पर उससे भी पांच-प्राणियों का संसार कैसे चलता.....? जेठ-बैसाख की गर्मी..... जलावन लेने गई माँ लू के चपेट में आ गई.....तीन दिनों तक बुखार नहीं उतरा.....खाली पेट.... तालाब का मटमैला गंदा पानी..... पता नहीं क्या हुआ ? चौथे दिन पेट चलने लगा शाम होते-होते माँ हमें छोड़कर चल दी।
घर में अंधेरा छा गया, पिताजी सिर पर हाथ धरे बैठे रहते..... मुझसे जितना होता करती...... ऐसा लगा रातों रात, पिताजी बूढे़ हो गए, कमर गई.... भाई जो छोटा था बाहर काम करने नहीं जा सकता था.....। करमता भाजी उबाल कर पेट भरने की नौबत आ गई.... उधर गर्मी के दिन होने से स्टेशन में आने-जाने वाले कम हो गए थे इसलिए बड़े भाई को भी काम कम मिलने लगा था।
    स्कूल तो छूट ही गया...... पेट भरने की विद्या सीखने लगी पर कम उम्र थी कोई काम मिलता नहीं था। गाँव में तो सभी गरीब, किसान, खेतिहर, मजदूर ही रहते थे किसके पास काम मांगने जाती..... सब अपनी संभालने में ही बेहाल हो रहे थे..... ऐसे में एक दिन पड़ोसी का बेटा आया हम उसे चाचा कहते थे। उसने पिता जी से कहा- ‘‘कुसुम को मेरे साथ भेज दो मैं वहाँ किसी के घर काम पर लगा दूँगा..... खा पहन कर जी जावेगी थोड़े बहुत पैसे तुम्हें भी भिजवा सकेगी।’’ गरीबी और लाचारी ने मेरे पिताजी को बेबस  कर दिया था.......थोड़े से नानुकुर के बाद वे मुझे भेजने को राजी हो गए.....। छोटा भाई..... रोने लगा, अपने को असहाय समझने लगा। माँ चली गई थी, बहनें अपनी-अपनी सुसराल में थीं, ले देकर मैं ही बची थी, उसको भी छोड़ना पड़ेगा ये सोच ही भाई को रूला रही थी। दुखी तो मैं भी थी, डर भी लग रहा था, अपनो से बहुत दूर......न कोई जान न पहचान,..... फिर भी घर में कुछ पैसे भेज सकूँगी बूढ़े पिताजी और भाईयों की कुछ तो मदद कर सकूंगी बूढ़े पिता और भाईयों की कुछ तो मदद कर सकूंगी यही सोचकर मन को राजी कर लिया था.....।’’
    रोने लगी कुसुम......।
    मैं सोच रही थी गरीबी की तेजधार रिश्तों के मजबूत बंधन को भी कितनी सफाई से काट फेंकती है.....। कहीं पढ़ी थी जठराग्नि की ज्वाला सबसे विकराल होती है.... सारे नेह नाते जिसमें जलकर भस्म हो जाते हैं.......। सद्यः किशोरी कुसुम का बचपन गरीबी की भेंट तो चढ़ ही गया था...... भाईयों और बूढ़े पिता की माँ बन गई......। विधाता स्त्री को मातृत्व के गुण सिखाकर ही इस धरा-धाम में भेजता है। जननी चाहे जब बने.....। ठंडी सांस निकली, और मैं वर्तमान में आ पड़ी जहाँ गुलनार की माँ बैठी थी कुसुम तो फिर छिप गई थी।
    मैंने उससे कहा- ‘‘शाम होने आई, अब आप दुकान खोलिए..... मैं भी बच्चों को देखती हूँ..... आपकी कहानी फिर कभी सुनूँगी.....।’’
    गुलनार की माँ भी होश में आई पर आप बीती सुनाने का लोभ प्रबल होता है इसलिए बोली कल दोपहर को आऊँगी, कल तो रविवार है आपकी छुट्टी रहेगी..... आपसे अपनी बात कहकर हल्की चाहती हूँ। पचास सालों से जो बातें किसी से न कह सकी...... सुनता भी कौन ? वह सब आपसे क्यों कह रही हूँ नहीं जानती......। मेरे लिए थोड़ी तकलीफ सहिए मैडम जी और कुछ नहीं मेरी छाती का बोझ हल्का होगा।.... तो चलूं...... नमस्ते.....। कहकर वे चली गईं...... मैं भी बच्चों को संभालने लगी...... पर मेरा मन......अव्यक्त पीड़ा से भारी हो रहा था..... साहित्यकार का संवेदनशील मन ज्यादा और जल्दी आहत होता है यह भी विधाता का किया धरा है.....।

दस
   

‘‘वैश्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे......’’ पड़ोसी के घर से रेडियो पर बजता भजन सुनाई दिया..... मन शंात रस में गोते लगाने लगा...... भक्ति संगीत..... वह भी सुबह-सुबह लगता है हमारे चारों ओर पवित्रता भर गई है..... वैसे भी सुबह मन शांत रहता भी है।
    सोचने लगी कितना बड़ा सच है कि अपनी पीड़ा से तो हर कोई व्याकुल होता है पर जो पराये दुख को गले लगाये...... बिरले ही ऐसे लोग होते हैं। आज मैं भी गुलनार की माँ..... नहीं अब उसे कुसुम नाम से ही बुलाऊँगी वह नाम जो समय की धूल में दब गया था..... नाम ही तो मनुश्य की पहचान होता है और किसी से उसका नाम ही छिन जाये..... किसी और नाम से जो जीवन के चालीस साल बिता दे..... सिर्फ इसलिए कि किसी की बेटी का भविश्य सुरक्षित रहे..... क्या कि उसका अपना भविश्य अंधेरे में डूब गया......। प्रायः अशिक्षित, असहाय, कुसुम का त्याग कभी किसी की प्रंशसा नहीं पा सका अरे! प्रशंसा तो दूर, किसी की सहानुभूति भी नहीं मिली...... दुनिया वालों ने सिर्फ इतना देखा, इतना ही जाना कि एक हिन्दू लड़की बिना ब्याह किए मुसलमान के घर रहती है न उसे ईद की खुशी में शामिल किया गया न होली, दिवाली में कोई उससे गले मिला..... ओह! भगवान ये कैसा जीवन दिया कुसुम को......। जितना सोचती, उतना ही कुसुम के प्रति मेरा मन द्रवित होता गया.....।
    हम दोनों बैठे गइंZ थोड़ी देर चुप्पी छाई रही..... कहाँ से शुरू करूँ सोच रही थी कि कुसुम ने पूछा- ‘‘साहब नहीं हैं, आपने खाना-वाना खाया या नहीं मैडम जी.....।’’
    ‘‘हाँ मैंने खा लिया तुमने कुछ बनाया था कुसुम।’’
    पूछा मैंने..... बड़ी-बड़ी आँखों से कुछ देर मुझे देखती रही फिर मुस्कुराकर बोली- ‘‘इतने सालों बाद आपके मुँह से अपना नाम सुनकर बहुत अच्छा लगा...... वरना मैं तो अपना ही नाम भूल गई थी मैडम जी.....।’’
    अपने अस्तित्व की स्वीकृति हर कोई चाहता है तभी तो कुसुम अपना नाम सुनकर खुश हो गई। ‘‘तो मैडम जी आगे सुनाऊँ...... मेरे हामी भरने पर कुसुम ने कहना शुरू किया.....। पड़ोसी चाचा के साथ छोटी सी पोटली में अपने चीथड़े समेट चलने लगी तो भाई आकर लिपट गया-रो-रोकर कहने लगा ‘‘मत जा छोटी दीदी......मैं अब कभी तुमसे झगड़ा नहीं करूँगा तुम्हारे साथ काम करूँगा..... पोखर से पानी भी भर लाऊँगा....’’
चाचा ने मेरा हाथ पकड़कर खींचा रोते भाई को अपने से अलग कर चल पड़ी..... पर मैडम जी नहीं जानती थी कि वो घर हमेशा के लिए छूट रहा है.....। कांटाबांजी स्टेशन से दस बजे वाली गाड़ी में बैठकर दूसरे दिन यहाँ पहुँच गए.....। चाचा के घर आई। एक ही कमरा..... जिसमें उनके तीन बच्चे और चाची थी, उन्होनें मेरा स्वागत नहीं किया, कैसे करती ? उनके बच्चों ने दीदी.....दीदी कहकर भाई से बिछुड़े मेरे मन को स्नेह से भर दिया.....।
    दो दिन बाद चाचा मुझे लेकर एक पान ठेले पर आए वहाँ बैठे आदमी से क्या बातें हुई मैं नहीं जानती..... जाते समय मुझसे बोले- ‘‘कुसुम अब तुम यहीं रहना..... ये छोटी बच्ची है इस के साथ खेलना.....घर का काम-माज करना......।’’ चाचा चले गए.....तो बच्ची से मैंने नाम पूछा उसने तुतलाते हुए कहा-गुलनार.....। मुझसे दस साल छोटी रही होगी। सांवली, गदबदी, चपटी नाक, हाँ बाल घने, लंबे पर उलझे और रूखे थे शायद कई दिनों से किसी ने उसके बालों में न तेल लगाया न कंघी चोटी की थी.....। भाई-बहनों वाले घर से आई थी शायद इसीलिए मुझे गुलनार बड़ी प्यारी लगी..... उसे पास बुलाई..... पहले तो वो झिझकी फिर आ गई..... पान ठेले में बैठे आदमी से उसने पूछा- ‘‘बाबू जी ये हमारे घर रहेगी न..... मेरे साथ खेलेगी भी न......?’’
    बड़े प्यार से उसके बाबूजी ने उसके सिर पर हाथ फेरा फिर बोले- ‘‘हाँ बेटा..... तुम्हारे साथ रहेगी देखो तुम दोनों कभी झगड़ा मत करना..... अब जाओ उसे घर दिखा दो.....।’’
    गुलनार मेरा हाथ पकड़कर छोटे से कमरे में ले गई..... एक कोने में स्टोव रखा था..... जूठे बरतन.... गंदे कपड़ों का ढेर लगा था.....। जाने कितने दिनों से घर की सफाई नहीं हुई थी..... याद आया मैं तो काम करने को ही रखी गई हूँ...... तो शुरू ही क्यों न करूँ.....? गुलनार से मैंने कहा- ‘‘पहले घर साफ कर लेते हैं फिर खेलेंगे....।’’ घर का काम करना तो मुझे आता था..... धीरे-धीरे बरतन, झाडू, कपड़े सब निपटा डाली..... फिर गुलनार को नहला कर उसके कपड़े भी धोकर सुखा दिए......। बड़ी देर बाद पान वाला आया..... घर देखकर खुश हुआ...... हम दोनों को भात और सब्जी दिया.... खुद भी खाने बैठा.....खाते-खाते ही मेरे घर वालों के बारे में पूछा फिर बोला- ‘‘मन लगाकर काम करना, गुलनार को संभालना, तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा.....। हर महीने सौ रूपये तुम्हारे पिताजी के पास भेज दूँगा.....।
    मैडम जी सारी fजंदगी वे मेरे घर सौ रूपये भेजते रहे..... शुरू-शुरू में घर की, बूढ़े पिताजी की याद आती थी तो मैं रो पड़ती थी.....। धीरे-धीरे..... अच्छा लगने लगा असल बात ये है मैडम जी कि पेट भरता है तो आदमी अपने और सब अभावों को भूलने लगता है......। धीरे-धीरे जान गई गुलनार की माँ मर गई है..... यह भी जान गई कि ये लोग मुसलमान हैं। हमारे समान इनके घर तुलसी मंच नहीं होता इनके तीज-त्यौहार भी अलग होते हैं वैसे स्कूल की किताब में मुसलमानों के बारे में पढ़ी थी पर हमारे गाँव में कोई मुसलमान था ही नहीं इसलिए उनके बारे में कुछ जानती नहीं थी।

    दिन बीतने लगे..... साल पूरा होने को आया..... कि बाबूजी ने गुलनार को स्कूल में भरती करा दिया..... खुश थी गुलनार..... उसको स्कूल जाते देखकर मुझे अपना स्कूल याद आ जाता था..... मैं उसे पढ़ा दिया करती थी....... कभी-कभी मेरा मन स्कूल जाने को मचलने लगता पर...... मुझे तो काम पर रखा गया था पढ़ाने के लिए नहीं.....। मन मसोस कर जीना सीख गई......।
    तीन बजते न बजते घर का सारा काम निपटा लेती थी..... फिर रास्ता देखती कि कब गुलनार आयेगी...... बड़ी मुश्किल से पांच बजते, मैं सड़क पर खड़ी रहती, वह भी दूर से ही मुझे देखकर हाथ हिलाती..... मैं भी आगे बढ़कर उसका बस्ता थाम लेती.....घर पहुँचते कि बाबूजी रोज की तरह आवाज लगाते- ‘‘कुसुम गुलनार के हाथ-मुँह धुलाकर उसे चाय-पाव रोटी दे दो....... हाँ तुम भी लेना। चाय पी लो बातंे बाद में करना......।’’ और शुरू होता स्कूल पुराण कि कैसे गुलनार की पेंसिल टूट गई तो सुराज ने अपनी पेंसिल उसे उधार दी..... ‘‘आगे भी सुनो न कुसुम..... आज हम लोग मैदान में दौड़ लगाए..... मेरी बहिन जी ने कहा है गुलनार तुम वार्शिक खेलकूद प्रतियोगिता में 100 मीटर की दौड़ में भाग लेना.... रोज अभ्यास करोगी तो इनाम जीत सकोगी।’’ हाँ ठीक इसी तरह दिसंबर की ठंडी सुबह हमारे में स्कूल में भी दौड़ प्रतियोगिता होती थी। मैं हर बार प्रथम पुरस्कार लेती थी सच...... कितनी खुशी होती थी जब पुरस्कार लेकर घर आती, माँ गले से लगाकर प्यार करती...... दोनों भाई बड़ी ललक से पुरस्कार खोलकर देखते थे..... उस बार मेरी खेल शिक्षिका ने कहा था- ‘‘कुसुम अभ्यास पर ध्यान दो..... तुम्हें लेकर हम राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेने कटक जावेंगे.....।’’ पर मेरे भाग्य में तो दौड़ना नहीं, रेंगना बदा था बल्कि रेंगना भी नहीं घिसटना...... तभी तो माँ चली गई मेरा स्कूल छूट गया.....घर, गाँव छूट गया यहाँ पराए घर में दिन काट रही हूँ......।
    गुलनार मेरा हाथ पकड़कर झिझोंड़ रही थी- ‘‘कुसुम मेरी बात सुनती क्यों नहीं.....? तुम रोज सामने वाले मैदान में मेरे साथ दौड़ोगी न ?’’
    बड़े स्नेह से गुलनार का सिर सहलाई बोली- ‘‘ हाँ भाई ! क्यों नहीं दौड़ेंगे? पर तुम्हें भी वादा करना होगा कि प्रथम पुरस्कार लोगी।’’ गुलनार का चेहरा खिल उठा शरमाई हँसी के साथ बोली- ‘‘इनाम में जो मिलेगा उसका आधा तुम्हें दूँगी.....।’’बाबूजी से आदेश प्राप्त कर हम दोनों सामने वाले दशहरा मैदान में रोज शाम को दौड़ने का अभ्यास करने लगे..... गुलनार भारी बदन की थी सो जल्दी हाँफ जाती थी, कभी-कभी तो थककर बैठ जाती कहती- ‘‘हमसे नहीं होता दौड़ना.....चलो कुसुम..... घर चलें...... हम इनाम नहीं पा सकते......।’’
    जाने मुझमें इतनी ममता कहाँ से भर गई थी कि उसे दुलारती, पुचकारती....... अच्छा चलो बस आखिरी बार दौड़ते हैं कहकर उसके साथ दौड़ना शुरू करती...... आधी दूरी तय करते ही मैं अपनी रफ्तार धीमी कर देती.....गुलनार मुझे पिछड़ते देख उत्साह से भरकर और तेज दौड़ने लगती...... मुझसे जीत जाने की खुशी में खिलखिला पड़ती...... यही तो में चाहती थी..... खुद को हराकर दूसरों की झोली में जीत की खुशी डाल देने का यह भाव......मुझे अजीब सी खुशी देता, आत्मसंतोश देता.....।
    गुलनार की प्रतीक्षा सफल हुई उसे 100 मीटर की दौड़ में द्वितीय पुरस्कार मिला। पुरस्कार लेकर लौटी गुलनार को बाबूजी ने गोद में उठा लिया कृतज्ञ नेत्रों से मेरी ओर देखा बोले- ‘‘कुसुम तुम गुलनार से बहुत बड़ी तो नहीं हो पर उसकी देखभाल एक माँ की तरह करती हो अल्लाह तुम्हें उम्र दराज करे..... तुम्हें दुनिया की सारी खुशियाँ दे......।’’ बाबूजी का व्यवहार और गुलनार का प्यार पाकर मैं भूल ही जाती कि मैं इनके घर काम करने वाली हूँ...... नौकर हूँ..... खुद को उस छोटे से घर का सदस्य ही समझने लगती परिणाम यह होता कि बाप बेटी की  सेवा बेहद अपनेपन से करती..... घर का कामकाज बोझ नहीं लगता..... गुलनार की सफलता में अपनी हिस्सेदारी समझती.....। मैडम जी दिन पंख लगाकर उड़ने लगे..... गुलनासर पांचवी कक्षा की परीक्षा के लिए दिन रात मेहनत करती..... मैं भी उसे समझाती- ‘‘इस साल बोर्ड बोर्ड परीक्षा है अच्छे नंबरों से पास होओगी तभी स्कूल में भरती हो सकेगी.....।’’
    हम दोनों की लगन देखकर बाबूजी ने बरतन झाडू करने वाली बाई लगा दी, मेरे आपत्ति करने पर बोले- ‘‘गुलनार के साथ लगी रहती हो......थक भी जाती होगी..... और फिर दुकान भी तो अच्छी चलने लगी है।’’ हाँ...... मैंने ही बाबूजी से कहा था पान के साथ गुमटी में चाय भी मिलने लगेगी तो ग्राहक बढ़ेंगे..... फिर मैं चाय तो बना ही लेती हूँ.....चार पैसे ज्यादा मिलेंगे..... गुलनार की कापी किताबें खरीदने में पैसे काम आवेंगे....। बाबूजी ने मेरी बात मान ली थी..... धीरे-धीरे बाबूजी खुद भी भूलने लगे थे कि मैं नौकर हूँ, पराई हूँ, हाँ-महीने में एक बार मनीआर्डर करना कभी नहीं भूलते थे..... शायद उसी समय......वे मुझे और मैं उनको पराए लगते...... पर वह परायापन..... क्षण भर का होता था......। जब अपनत्व विस्तृत हो जाता है तो अन्य किसी भाव के लिए जगह बचती ही नहीं है...... यदि अन्य भाव आ भी गया तो वर्शा के धूप की तरह आनन-फानन में विलीन हो जाता है। विधाता ने रिश्तों के कैसे-कैसे रूप बनाए हैं कि कभी अपने पराये लगने लगते हैं तो कभी नितान्त अपरिचित पराये लोग अपने बन जाते हैं।
                  
ग्यारह
   

सागर तट से चलकर आई लोनी हवा ने धीमे से माथे को सहला दिया...... पलकें पूरी तरह खुल भी नहीं पाई थी कि देखा अरूण ओठों पर ऊँगली रख इशारा कर रहे हैं चुप...... फिर हाथ से दरवाजे की ओर बढ़ चलने का संकेत किए..... समझ गई यह सावधानी इसलिए है कि बच्चे न जाग जायें..... अरूण है कि भीड़ में भी, व्यस्तता में भी एकान्त के कुछ पल खोज ही लेते हैं...... हाँ वे पल होते हैं जो संबंधों को और भी सुद्दढ़ बनाते हैं।...... दबे पांव दरवाजा उढ़काकर हम बरामदे में आ गए...... मेरा हाथ पकड़कर, ये कोने वाली सीढ़ी की तरफ बढ़ चले...... छत पर पहुँचकर..... देखा एक अभूतपूर्व दृश्य...... वर्णनातीत भी था...... मोहक भी था।
    ......फेनिल नीले समुद्र के छोर से बाल रवि धीरे-धीरे आकाश की ओर किरणों के सहारे ऊपर उठ रहे थे.....।
    नील निरभ्र आकाश में क्षितिज से उठता वह लाल गोला..... बालूका राशि पर अपनी सुनहरी किरणें बरसा रहा था...... पक्षी कलरव करते हुए रैनबसेरा छोड़कर अनंत आकाश में विचरण करने लगे थे......। छोटे-छोटे पक्षी..... मानों उस लाल सुनहरे द्युतिमान पक्षी से मिलने जा रहे हों..... हाँ सूर्य को प्रकाश पंछी कह सकते हैं।........ मुग्ध होकर हम दोनों भुवन भास्कर की मौन वंदना करने लगे..... याद आया पुरी का सूर्सोदय और सूर्यास्त दोनों ही अभिराम होता है......। जाने कितनी देर खड़े रहते कि कानों में अमृत घोलता ‘‘आदित्य स्वतन’’ सुनाई पड़ा...... चौंक पड़े हम दोनों......स्वर की दिशा जानने मुड़े तो देखा..... बाबूजी सूर्य की ओर मुंह करके हाथ जोड़े खड़े हैं...... ऐसा लगा कोई पुराकालीन ऋशि ही सूर्य नमस्कार कर रहा है।
    बाबूजी को जितना देखती हूँ, श्रद्धा उतनी ही बलवती होती जाती है, गृहस्थी में जुटकर भी अंतर में दबा छुपा वैराग्य दिखाई दे ही जाता है। सारे नाते रिश्तों को बखूबी निभाते हैं कभी किसी को शिकायत का कोई मौका नहीं देते...... अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन पूरी सजगता से करते हैं फिर भी निस्पृत, शांत, निर्मल आचरण ही उन्हें विदेह की श्रेणी में ला बिठाता है।
    हम दोनों ने प्रमाण किया स्निग्ध हँसी हँसकर बोले- ‘‘अच्छा हुआ तुम लोग आ गए...... भगवान् भुवन भास्कर की विजय यात्रा का प्रारंभ अवश्य देखना चाहिए......।’’ चलो नीचे चलें, बच्चे जाग गए होंगे।हम लोग नीचे आ ही रहे थे कि माताजी का गर्जन तर्जन सुनाई पड़ा- ‘‘मनु- नैनी..... ब्रश करने में ही कपड़े भिगो लिए..... गीले कपड़ों में कितनी देर रहोगे..... चलो नहा ही लो...... फिर दूध पीना.....।’’ मेरे सुपुत्र चीख रहे थे। नहीं......नहीं.....पहले रोज-मिल्क मंगा दीजिए..... पापाजी को बोलिए गरम जबेली भी मंगाए..... हम बाद में नहायेंगे......।
    कमरे में घुसते ही सिर घूम गया...... लतर.....पतर......कपड़ों में दोनों बच्चे पलंग पर चढ़ बैठे हैं....... चादर गंदी हो गई है...... तकिए जमीन में पड़ हैं...... हे भगवान्......क्या करूँ इन बच्चों का...... इनकी शरारतें..... सुबह-सुबह शुरू हो गई। गुस्सा तो इतना आ रहा था कि पकड़ कर....... दोनों को चाटें लगाऊँ पर बाबूजी का लिहाज और माताजी की डांट के डर से चुप ही रही.......।
    बाबूजी ने कहा- ‘‘अरे वाह! मेरे कृश्ण बलराम के लिए दूध जबेली मंगाओ भाई......आओ मेरे बाल-गोपाल...... तुम्हारी लीला का आनंद उठायें......।’’

    ऊँह...... दौड़ गए दोनों.....अरे......अरे बाबूजी की सफेद रेशमी धोती में दोनों के गीले हाथों की छाप लग गई...... डर रही थी माताजी कुपित न हों - ये क्या....... वे तो हँसे जा रही हैं बच्चों को शाबाशी दे रही हैं- ‘‘अपने हाथ- दादाजी की से पोंद लो बेटा.....।’’ महात्मा जी के श्वेतांबर में जरा गृहस्थी के दाग दिखाई दें....... वरना मैं तो जनम भर...... डरती ही रही हूँ कि कब ये राजा भरथरी बन जावेंगे........।’’
    बाबूजी ने मुड़कर माताजी की ओर देखा- ‘‘चौथापन आ गया पंडिताइन अब तो अपने बंधनों से मुझे मुक्त करो...... तुम्हारे नेह-बंधन में बंधा जीवन भर तुम्हारी चाकरी करता रहा...... अब उसकी चाकरी करने की इजाजत दो तो बात बने......।’’ कहते-कहते उन्होंने गहरा fनःश्वास लिया.......। माताजी क्षण भर मौन रहकर बोलीं- ‘‘जिन बंधनों की बात कर रहे हैं उनमें आप कभी बंधे ही नहीं, इसे मेरे सिवाय कौन जानेगा.....? अरे हाथी को कोई सांकल बांध ही नहीं सकती...... हाथी-सांकल को मान देता है...... बंधे रहने का अभिनय करता है...... करता है...... पैरों में लिपटी सांकल की क्या बिसात......जो गजराज को बांध सके....... आँखों का भरम है पंडित...... आपकी ही संगति ने इतना तो मुझे भी समझा दिया है।’’
    माताजी और बाबूजी के संबंधों का एक नया रूप आज देखने को मिला जिसने मेरे पूर्वानुभवों को हिला दिया अभी तक मैंने जो जाना था, समझा था सब पल भर में धूलिसात् हो गया..... मैं याद करने लगी...... कभी लाल मिर्ची सूखी मिर्च की चटनी के लिए, तो कभी गरौंसा खेत में गेहूँ की बुवाई के लिए, तो कभी माताजी के नए गहने की बनवाई देने के लिए, होता रहा विवाद-सब झूठा था, ऊपर से दिखने वाला विरोध, बात-बात में होने वाले विवाद-सब झूठा था, ऊपर से दिखने वाला विरोध, बात-बात में होने वाले विवाद सब व्यर्थ साबित हो गए।
    आज जान पाई दोनों एक दूसरे को कितनी अच्छी तरह समझते हैं - कैसा मौन समर्पण है, कुछ और जान लेने का लोभ संवरण नहीं हुआ तो बोल पड़ी.....’’ माताजी हाथी और सांकल वाली बात समझ में नहीं आई......।’’
    धीमे से मुस्कुरा दी माताजी शायद वे भी हमें कुछ बताना ही चाह रही थीं सो बोली- ‘‘बहू.....जीवन भर कभी तो कुछ कहा नहीं, तुम लोग इतना ही तो जानते हो कि मैं कठोर-हृदय स्त्री हूँ..... शासन करना मुझे अच्छा लगता है..... नहीं बहू ! सच इतना ही नहीं है...... इस सच के पीछे बहुत बड़ा समझौता छुपा है...... फिर बाबूजी को देखकर कहा- ‘‘क्यों पंडित...... बहू कुछ पूछ रही है आप अनुमति दें तो..... बता दूँ.....।’’ बाबूजी ने खिलंदडे अंदाज से कहा- ‘‘हाँ, अपने आलसी, अकर्मण्य पति का परिचय देना चाहो तो दो...... पर मुझे पाठ करना है मैं तो चला......।’’
    समझ गई बाबूजी......बचना चाह रहे हैं..... वे चले भी गए......तो माताजी वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गई, थोड़ी देर चुप रहीं लगा कुछ सोच रही हैं कि बेटा बहू से कितना बतायें कितना छिपायें...... गहरी साँस लेकर बोली- ‘‘बहू चालीस साल पहले की बात है..... हमारी शादी तय हुई गुरांवठ......मतलब हम दो भाई-बहनों की शादी तुम्हारे बाबूजी और उनकी बहन से.....उस जमाने में ऐसी शादियों का प्रचलन था एक बेटी दो एक बेटी लो...... दान दहेज की कोई समस्या नहीं थी......।’’
    क्षण भर की चुप्पी के बाद फिर शुरू हुई - ‘‘बहू..... बड़ी ही बेमेल शादी थी अत्यंत सुन्दर, सुशिक्षित भाई-बहन हैं, तुम्हारे बाबूजी और उनकी बहन तो हम दोनों भाई-बहन काली मिट्टी से गढ़े हुए हैं, उस पर मैं अनपढ़ गंवार...... पर मेरे पिताजी सम्पन्न किसान थे गाँव के मुखिया, वहीं तुम्हारे दादा-ससुर गरीब ब्राह्यण......गाँव के वैद्य, भागवती पंडित थे.......। इधर तुम्हारे बाबूजी सूरज कुंड वाले स्वामी जी से दीक्षित हो चुके थे उन्होंने शादी से इंकार कर दिया........घर छोड़कर स्वामी जी के आश्रम में रहने लगे.....खबर मेरे पिताजी के पास पहुँची...... मेरी माँ ने सिर पीट लिया...... शादी टूटने से जो सामाजिक अवमानना होगी इसके भय से पिताजी स्तब्ध हो गए। बात के धनी मेरे पिताजी, धीर स्वभाव के थे तुरंत बैलगाड़ी में बैठकर आश्रम पहुँचे..... तुम्हारे बाबूजी से उनकी क्या बातें हुई नहीं जानती पर पन्द्रहवें दिन मैं ब्याह कर ससुराल आ गई..... पहली ही भेंट में तुम्हारे बाबूजी ने कहा था- ‘‘मैं, मेरा घर, गृहस्थी के मामले में कभी कुछ नहीं कहूँगा..... बस एक बिनती है तुम मेरी साधना, मेरे स्वामी जी और आश्रम के कामों में मुझे कोई बाधा मत देना..... हम दोनों अपना-अपना कत्तZव्य निभाते हुए जीवन काट देंगे......बहू अपनी बात से वे कभी डिगे नहीं.......धीरे-धीरे जान गई कि बैरागी वर मिला है मुझे...... सांसारिक मोह-माया जिसके अंतर को छू भी नहीं सकती....... मैं क्या कोई रंभा, उर्वशी भी तुम्हारे बाबूजी के चित को मलिन नहीं कर सकती......।

    पहले-पहले......मान मनुहार करती थी......नादान उम्र थी...... धीरे-धीरे समझ गई......मत्त-गजराज को बांध रखने की शक्ति किसी सांकल में नहीं होती है।.......आज समझ सकी हूँ अवढ़र दानी, निरासक्त शिव की गृहणी-पार्वती भी मेरी ही बहन रही होगी......। बहू! ऐसे निरासक्त व्यक्ति के साथ घर-संसार चलाने में कठिनाईयाँ आती हैं, पर कई जन्मों के पुण्य से ऐसे संत हृदय पति का साथ मिलता है बेटी ! तभी तो...... युधिश्ठिर के साथ उनका श्वान भी स्वर्गारोहण कर सका था......।’’ कमरे में मौन पसर गया था अरूण की आँखें भर आईं । मैं चुपचाप उठी माताजी के चरणों में सिर रखकर प्रमाण किया...... मन ही मन बोली माताजी सहधर्मिणी किसे कहते हैं आज जान गई हूँ........ मुझे भी आशीर्वाद दीजिए......हर सुख-दुख में अरूण का साथ निभा सकूँ......... दो बूँद आँसू माताजी के चरणों में गिरे तो उन्होंने मुझे उठाया...... ‘‘आशीश देती हूँ बहू तुम चिर सौभाग्यवती रहो....... पति अनुगामिनी बनो......स्त्री जीवन का सबसे बड़ा सुख यही है........।’’
    दरवाजे पर नजर गई तो देखी बाबूजी का हाथ थामे मनु और नैनी खड़े हैं.........सदा प्रसन्न बाबू जी बोले- ‘‘सभा विसर्जित करके चलो शंकराचार्य मठ में प्रवचन सुन आवें, शाम की गाड़ी से तो वापस लौटना ही है......।’’
    मौन स्वीकृति के साथ हम दोनों सास-बहू तैयार होकर बाबूजी के साथ मठ की ओर चले-हाँ अरूण अभी भी व्यवस्थित नहीं हो पाये थे।
   
बारह

    ऋजु तन बाबूजी सधे कदमों से आगे बढ़ रहे थे उनका साथ देने के लिए मनु और नैनी को थोड़ा दौड़ना भी पड़ रहा था....... सामुद्रिक शास्त्र की किसी पुस्तक में पढ़ी थी, जिनकी चाल सीधी-सतर होती है ऐसे व्यक्ति द्दढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न, लक्ष्य के प्रति समर्पित एवं निश्ठावान होते हैं..... आज बाबूजी को देखकर पठित अंश का प्रत्यक्ष प्रमाण गया।
    मठ का आंगन साफ-सुथरा धुला हुआ था..... चबूतरे आसन लगा था अभी तक प्रवचनकर्ता आये नहीं थे....... हम लोग भी सामने बिछी दरी पर बैठ गए......। माँ बेटे में जाने क्या तय हुआ था कि प्रवचन शुरू होते दोनों बच्चों को लेकर वे लोग चले गए। बचे हम ससुर बहू......तो ध्यान से सुनने लगे...... आह......? क्या स्वर था मंद-मंद......मेघगर्जन........हृदय को आलोड़ित किये दे रहा था....... प्रशस्त ललाट......मंदस्मित सन्यासी पद्यासन में बैठ वार्धक्य को चुनौती देते से लगे रहे थे........।
    अकुतोभय मुद्रा, आशीश बरसाती दृश्टि.......मन श्रद्धा से भर गया....... सुनने लगी......। ‘‘श्रोता गण! आज हम भारतीय वाडगमय का महत्वपूर्ण अंश न्याय दर्शन का सामान्य परिचय आपको देंगे.......। तो सुनिए......।
    श्रोता गण! जीवन और जगत् सृश्टि और सृश्टिकर्ता, इतना ही नहीं आत्मा और परमात्मा से संबंधित ज्ञान को आत्मज्ञान कहते हैं। यही दर्शन है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है इसीलिए यहाँ ‘दर्शनशास्त्र’ अति महत्वपूर्ण, सारगर्भित एवं प्रामाणिक है। ऐसी विचारधारा जो तर्क की कसौटी पर खरी उतरे उसे ‘दर्शन’ के नाम से जानना चाहिए।
    समस्त दर्शनों में छः दर्शन सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए हैं वे हैं महर्शि गौतम का ‘न्याय’, कश्यप का वैशेशिक, कपिल का सांख्य, पंतजलि का योग, जैमिनी की पूर्वमीमांसा तथा बादरायण की ‘उत्तर मीमांसा’, जिसे वेदान्त’ भी कहा जाता है। आज संपूर्ण विश्व में ये ही वैदिक दर्शन के नाम से विख्यात हैं। ये सभी दर्शन वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं। इनका मूल रहस्य के उद्घाटन का गंभीर प्रयास।
    सभी दर्शनों में ज्ञान, माया, अविद्या, पुरूश एवं जीव शब्दों का प्रयोग हुआ है- तथापि भिन्न-भिन्न दर्शनशाfस्त्रयों ने इनकी विवेचना मंे अपने तर्क एवं विचार प्रस्तुत किए हैं। उद्देश्य एक ही है, वह है, मोक्ष प्राप्ति के क्रियात्मक उपायों को सर्वजन सुलभ करना।
    सृश्टि की उत्पत्ति, विकास और विनाश अनंत काल से चलता आ रहा है, चलता रहेगा। मानव आत्मज्ञान के लिए, आत्मदर्शन के लिए नित नए प्रयास करता रहता है। इस प्रयास में सर्वप्रथम हम महर्शि गौतम का स्मरण करते हैं उनके मतानुसार इस सृश्टि का संचालन किसी अज्ञात, दिव्य शक्ति द्वारा किया जाता है तथापि मनुश्य स्वकर्मों के द्वारा अपने जीवन-यापन की दिशा एवं दिशा तय करता है अर्थात् कर्म ही आत्म ज्ञान का मूल आधार है।
    कर्म बड़ी दूर तक पीछा करते हैं, पुनर्जन्म भी कर्म पर आधारित होता है। गौतम के ‘न्याय’ दर्शन के आधार पर यह माना जाना चाहिए कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है।   
आत्मा की अनंत-यात्रा का एक पड़ाव है, शरीर का नश्ट होना, नया शरीर पाकर पुनः कर्म करना जीव की नियति है। यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक जीव अपने कर्मों के द्वारा मोक्ष अथवा सद्गति को प्राप्त नहीं कर लेता, इसलिए जीव की अनंत-यात्रा में मृत्यु बाधा नहीं है, परिवर्तन का एक अंश मात्र है। जीव का विकास निरंतर- प्रवहमान प्रक्रिया है। मृत्यु रूपी संस्कार इस प्रवाह में यत्किfचंत व्याघात उत्पन्न करता है, प्रवाह को अवरूद्ध नहीं करता।
    इस संसार में भटकते जीवों को गन्तव्य तक पहुँचाने का कार्य न्याय दर्शन करता है। अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ते चलने की इस प्रक्रिया को आत्मनिरीक्षण कहते हैं इसके बाद ही आत्म ज्ञान प्राप्त होता है......।
इस आत्मनिरीक्षण के दो सहायक तत्व हैं प्रथम है fनःस्वार्थ प्रेम....बिना प्रत्याशा के प्राणिमात्र से प्रेम...... और यह प्रेम तभी किया जा सकता है जब मैं और मेरा...... तू और तेरा का भाव नश्ट हो जावे। इस भाव का मूल उत्स है मोह, इसका सहोदर है अज्ञान.......।
    इस सृश्टि का कुछ भी मेरा नहीं है यह जान, समझ लेने से ही fनःस्वार्थ प्रेम संभव होता है।
    दूसरा है निश्काम कर्म, तो भाव यह होना चाहिए कि कर्म प्रमुख है फल अच्छा हो या बुरा इसकी चिन्ता न करें वह इस तरह कि नाटक में अभिनय करने वाला व्यक्ति उस पात्र के कत्तZव्य करता है न तो उस कर्म का कर्ता होता है न भोक्ता।
    न्याय दर्शन तर्क पर आधारित है जो मनुश्य को स्वानुभूति के आधार पर सांसारिक कर्मों का विश्लेशण करने की क्षमता प्रदान करता है। चूंकि न्याय दर्शन जागतिक पदार्थों यथा देश-काल, कारण, भौतिक प्रकृति, मन, जीवात्मा, तथा ज्ञान विशयक तर्कपूर्ण अनुसंधान प्रस्तुत करता है इसीलिए न्याय आज भी प्रासंगिक है। इसका अध्ययन मानव जाति के लिए उपयोगी है सार्थक है।
    दूसरी ओर समस्त सृश्टि में व्याप्त वस्तुओं के विधान में परस्पर क्रिया- प्रतिक्रिया में संलग्न जीवात्मा का अध्ययन भी इसी न्याय दर्शन के अंतर्गत किया जाता है। तभी तो पांच प्राचीन विद्याओं में तर्कशास्त्र ही को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। कर्म का विश्लेशण तर्क के बिना न तो पूर्ण होता है न ही संभव होता है। कालांतर में तर्कशास्त्र ही वाद-विवाद, तर्क, बहस आदि के रूप में विकसित हुआ। खण्डन-मण्डन की प्रथा भी तर्क शास्त्र की ही देन हैं। प्राचीन विद्वान अनुभूत सत्य, ज्ञान एवं तथ्य का प्रतिपादन खण्डन, मण्डन पद्धति से ही करते रहे हैं।
    प्लेटो के ‘डायलाग्स’ से पता चलता है कि सुकरात वाद-विवाद का उपयोग सत्य के अन्वेशण के लिए करते थे। अरस्तू ने अपनी कृति ‘टापिक्स’ में मार्गदर्शन के लिए वाद-विवाद का सफल प्रयोग किया है। महर्शि गौतम के न्याय शास्त्र में संशय के रूप का प्रतिपादन आत्मा के स्वरूप, भौतिक देह, इfन्द्रयाँ तथा मन के विशय तर्कपूर्ण चिन्तन-मनन प्रस्तुत किया गया है।
    संकल्प शक्ति, शोक, दुख तथा उससे निवृत्ति के विशय में भी विचार रखे हैं। इतना ही नहीं निराधार आक्षेपों एवं निग्रह-स्थान का विवेचन में वर्णित है।
   
न्याय की प्रासंगिकता बताते हुए यह कहना समीचीन होगा कि न्याय में वर्णित सभी विशयों, उपविशयों पर चिन्तन मनन की, पुनर्वीक्षण की आवश्यकता आज भी है।
    न्याय का उद्देश्य है कि मनुश्य के चिन्तन का केन्द्र यह हो कि- ‘‘वह ज्ञान जो किसी इfन्द्रय के साथ पदार्थ का संयोग होने से प्रदूशित होता है, जो अनिर्वचनीय है तथा भ्रमरहित भी है।’’ उस तथ्य का प्रतिपादन सहजता पूर्वक हो, सर्वजन सुलभ हो। स्मरण रहे इfन्द्रयाँ, ज्ञेय पदार्थ, इfन्द्रय और पर्दाथ का संयोग, तथा तज्जन्य ज्ञान ये चारों तर्क के मूल प्रतिपाद्य विशय हैं जो न्याय शास्त्र के मूल विशय हैं।
    किसी पदार्थ को नाम और मान्यता प्रदान करने के लिए पंचइfन्द्रयों का आश्रय लेना पड़ता है जिनकी पाँच कसौटियाँ हैं। रंग, शब्द, गंध, स्वाद और स्पर्श। भौतिक जगत् में पदार्थ को जानने के लिए पंचेfन्द्रयों का उपयोग होता है तो मानसिक पदार्थों अर्थात् स्मरण, अनुभव, आप्त ज्ञान, संशय, प्रतिभा, स्वप्न, कल्पना, आनंद आदि का प्रत्यक्ष ज्ञान भी पंचेfन्द्रयों की सहायता के बिना संभव नहीं है, किन्तु पंचेfन्द्रयों के अतिरिक्त मन की उपस्थिति यहाँ महत्वपूर्ण हो जाती है।
    आत्मा का जो बोध है वह पंचेfन्द्रयों द्वारा नहीं बल्कि मन अर्थात् शश्ठोfन्द्रय द्वारा होता है। जीवात्मा मन की, साधना और चित्त की एकाग्रता के द्वारा ही आत्मदर्शन करता है, आत्म ज्ञान प्राप्त करता है। निश्कर्श यह कि भौतिक जगत् बाह्य जगत के पदार्थों का बोध करने के लिए पंचेfन्द्रय तथा आंतरिक तथ्यों, पदार्थों के बोध के लिए मन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
    सारांश यह कि पदार्थ के प्रत्यक्ष और त्वरित ज्ञान दोनों में समान तो हैं पर न्याय शास्त्र का अध्ययन इस ज्ञान को बोधगम्य बनाता है।
    श्रोतागण! आधुनिक युग में न्याय शास्त्र की उपादेयता बढ़ी है कम नहीं हुई है अतः इसका अध्ययन भी व्यापक स्तर पर किया जाना चाहिए।
    अब हम वाणी को विराम देते हैं।
    मेरे मन में न्यायशास्त्र के प्रति जो संशय का, अपरिचय जन्य कठिनता का भाव था वह समाप्त हुआ।
    बाबूजी और मैं खड़े हुए ही थे कि मनु और नैनी दोनों हाथों में गुब्बारे लिए दौड़ते आये, बाबूजी के पास बोले- ‘‘चलिए समुद्र तट पर गुब्बारे उड़ायें...... धूप में बच्चों को समुद्र तट भेजने का मेरा नहीं हो रहा था...... बाबूजी की समझ गए......बोले- ‘‘डरो नहीं सुधा...... हम जल्दी ही होटल चलेंगे......बच्चों की भावनाओं को भी समझना चाहिए.......चलो.......।’’ क्या कहती......चल पड़े सागर तट की ओर......।
   

                       
तेरह

   
बहुत पहले मेरे पिताजी के मुंह से सुनी थी कि कर पात्री साधु सन्यासी अंजुरी में जितना भोजन समाता है, उतना ही ग्रहण करते हैं और किसी भी घर, सराय या धर्मशाला में द्वितीय निशियापन नहीं करते...... एक तरह से इन्हें भ्रमणार्थी साधु कह सकते हैं साहित्य की भाशा में यायावर कह सकते हैं। आज समझ में आया- कि दूसरी रात न बिताने का रहस्य इतना ही है कि स्थान का मोह हो जाता है और साधु सन्यासियों का मुख्य उद्देश्य तो जीव को मोहमुक्त करना ही होता है, देखिए न पाँच दिनों में पुरी का मोहक सागर-तट..... जगन्नाथ मंदिर की शंखध्वनि......यहाँ की लोनी समुद्री हवा...... इन्हें छोड़कर जाने का जी नहीं कर रहा है पर जाना तो है।..... भारी मन से सामान समेटनी लगी...... इस यात्रा में बहुत कुछ नया, अनोखा पाया है......। सब से बड़ी बात अपनी सास की कलहप्रिया रूप के भीतर छिपी पति-परायणा स्त्री को देखा, जाना, समझा है। भरी-पूरी गृहस्थी के मालिक अपने ससुर के अंतरतम में बैठे वीतरागी संत के दर्शन किए हैं......। अच्छा हुआ कि इन लोगों के साथ आई....... तुरन्त याद आया कि इन्हीं लोगों को साथ न ले चलने के लिए अरूण से झगड़ा कर बैठी थी सचमुच कभी-कभी मुझे क्या हो जाता है ? ईश्याZ..... नहीं..... स्वार्थपरता सिर पर हावी हो जाती है, रिश्तों को समझने में इतनी बड़ी भूल मुझ जैसी स्त्री ही कर सकती है ठीक कहते हैं अरूण- ‘‘सुधा! तुम पढ़ी- लिखी बेवकूफ हो।’’ हूँ-तो-हूँ, मेरे लिए यह बेवकूफी बेशकीमती है इसी के चलते तो अरूण की स्थिर बुद्धि, दूरदर्शी दृश्टि की छांव मिलती है तो बनी रहे यह बेवकूफी......। सच अरूण की समझ पर गर्व हो आया....... राज की बात बता दूँ यह गर्व ज्यादा दिन टिकने वाला नहीं है....... बहुत जल्दी किसी न किसी घरू परेशानी में पड़कर मेरी चिरसंगिनी बेवकूफी फिर मेरे गले लग जाएगी......।
    यथा-समय गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ने लगी तो एक बार पुनः उत्कल भूमि को प्रमाण की........जगन्नाथ स्वामी को प्रमाण की......प्रभु फिर बुलाना.......। बाबूजी.माताजी के साथ बिलासपुर में ही उतर गए...... लाख कहने पर भी हमारे साथ नहीं आए......वही......खेती किसानी की बातें...... बाबूजी के मरीज उनकी राह देख रहे होंगे का चिरपरिचित वाक्य......सुनी।.......हम लोग मेल से भिलाई आ गए।
    यहाँ आकर.......वही.....घर गृहस्थी, बच्चे, स्कूल, इनका आॅफिस.....जीवन पुरानी पटरी पर दौड़ने लगा..... बीच-बीच में पुरी में बिताए दिन याद आ जाते.....कभी मनु, नैनी याद दिला देते तो कभी मैं ही अरूण से बातें करती.......हाँ......अरूण को शुक्रिया कहना नहीं भूली........आदतन ये मुस्कुरा दिए दिए बोले- ‘‘मैडम पति-पत्नी के बीच शुक्रिया, धन्यवाद शब्दों के लिए कोई जगह नहीं होती......। एक की गलती दूजा सुधार ले तो जीवन आसान हो जाता है।’’ दिन पंख लगाकर उड़ने लगे.....। गरमी बहुत है....... दोपहर को बच्चों को सुलाकर’’वयंरक्षामः’’ लेकर बैठी ही थी कि कुसुम आई....... नमस्ते करके बोली- ‘‘मैडम जी कहीं गई थीं क्या ? मैं दो बार आकर लौट गई......।’’
    ‘‘हाँ कुसुम हम जगन्नाथ पुरी गए थे.....वाक्य पूरा नहीं हुआ था कि कुसुम ने उठकर मुझे प्रमाण किया बाकायदा पद धूलि ली.......मैं अकबका गई कभी तो उसने प्रणाम किया नहीं.......फिर आज क्यों......? मेरे विस्मय का समाधान उसी ने किया।

‘‘मैडम जी आप मेरे उड़ीसा से आई हैं जगन्नाथ पुरी, से पदधूलि लेकर मैं संतुश्ट हो गई...... बहुत दिनों बाद अपनी जन्मभूमि के स्पर्श का ऐसा सुख मिला......।’’
    कुसुम बहुत पढ़ी लिखी तो नहीं है पर अपनी जन्मभूमि को प्यार करने के लिए तो किसी डिग्री, डिप्लोमा की जरूरत नहीं होती.......हाँ अभिव्यक्ति का माध्यम भिन्न हो सकता है, प्रेम की भावना तो शाश्वत होती है। हर प्राणी के हृदय का श्रृंगार है प्रेम......जो हर रिश्ते को अपनी मिठास से भर देता है.......सृश्टि का मूल आधार प्रेम ही है.....अन्य भावनायें तो संचारी भाव हैं, सागर की लहरों की तरह आती-जाती रहती हैं सागर तो प्रेम ही है.......।
    मेरी सोच पर आघात करते हुए कुसुम बोली- ‘‘मैडम जी......आपने तो कहा था मेरी शेश कथा भी सुनेगी.......समय हो तो आगे सुनाऊँ.......।’’
    उत्कल भूमि का सामीप्य अभी मेरे मानस में जागृत था सो इस निर्वासिता उत्कल नारी की कथा सुनने का लोभ संवरण नहीं कर सकी........बोली- ‘‘रूको तुम्हें जगन्नाथ स्वामी का महाप्रसाद दे दूँ फिर सुनूँगी......।’’
    बड़ी श्रद्धा से प्रसाद को आँखों से, सिर से, हृदय से लगाकर कुसुम ने प्रसाद ग्रहण किया..... पानी पींकर...... आगे बोलने लगी......।
    ‘‘मैडम जी दिन बीतते समय नहीं लगता......धीरे-धीरे पाँच साल बीत गए...... गुलनार.....छठवीं कक्षा में भर्ती हुई..... मैं साड़ी बांधने लगी.....हाँ.....उम्र भी तो उन्नीस-बीस की होने लगी थी....... एक नई विपत्ति आई...... आसपास के लड़के.......मौका मिलते ही छेड़ने लगे......। कोई सीटी बजाता........तो कोई सिनेमा का गीत गाकर फूहड़, अश्लील इशारे करता........। सुलग उठता तन-मन.......पर विवश थी उन शोहदों के मुँह लगकर अपनी ही मर्यादा नश्ट करनी होती...... इसलिए चुप रह जाती थी.....। इन सब लड़कों का सरदार था बुधराम...... सण्ड मुसण्ड, चेहरा रोबीला...... सुना था चोरी चकारी करने के जुर्म में दो बार सजा काट चुका है...... जाने उसकी आँखों में क्या था जो मुझे डरा देता था...... जब कभी वो सामने पड़ता...... मैं सिहर उठती थी....... अनजानी आशंका से छाती धड़कने लगती थी.....पूरी कोशिश करती थी कि सामने न पडूं पर वो नाछोड़ बंदा..... सुबह शाम......चाय......पान के बहाने गुमटी पर चला आता, अकारण...... इधर-उधर देखते, तब तक खड़ा रहता, जब तक मुझे देख न ले.........। उन दिनों.......रात में भी नींद खुल जाती थी डर लगता कहीं बुधराम दरवाजा तोड़कर आ तो नहीं गया......? पसीने-पसीने हो जाती......पर बाबूजी से कुछ नहीं कहती.....उन्होंने मुझे सहारा     दिया है कहीं बुधराम....... ने बाबूजी को कुछ कह दिया तो उनका यह असम्मान मैं सह नहीं पाऊँगी। पर मैडम जी बाबूजी ने दुनिया देखी थी...... उनकी अनुभवी आँखों से कुछ छिपा थोड़े ही था........बस कुछ कहते नहीं थे........डरते थे, बुधराम का क्या भरोसा-कहीं गुमटी ही उखाड़ फेंके....... इस उम्र में वे कहाँ जायेंगे......काई दूसरा ठौर तो है नहीं..... न सिर छिपाने की जगह है, न रोजी-रोटी का कोई दूसरा जरिया ही है।
    भीशण आशंकाओं से भरे दिन बीत रहे थे कि डर सच बनकर सामने आ ही गया........। हुआ यंू कि गुलनार को स्कूल भेजकर मैं फैल कपड़े समेटने बाहर आई, बाड़ में छिपा खड़ा था बुधराम......लपक कर मेरा हाथ पकड़ लिया बोला - ‘‘मेरे साथ चल रानी बनाकर रखूँगा....... मैं भी तेरी तरह उड़िया ही हूँ.......जात बिरादरी को दावत देकर.......पाँच पंचों के सामने तुझे अपनाऊँगा.......इस बूढे़ के साथ क्यों अपनी जवानी बरबाद कर रही है फिर वो है मुसण्डा..... उसने तुम्हारा भी धरम भ्रश्ट कर दिया है.....।’’ आगे सुन नहीं सकी.....बाबू जी के लिए अपमान जनक बातें मेरे कानों में पिघले सीसे की तरह पड़ी थीं...... पता नहीं क्या हुआ...... हाथ छुड़ाकर fसंहनी सी गरज उठी- ‘‘खबरदार बाबूजी के बारे में एक शब्द बोले तो......रही धरम की बात...... तो जब भूखों मरने की नौबत आ गई थी....... तब मेरे धरम के ठेकेदार कहाँ थे......तब तो किसी ने.......मेरे बूढ़े पिता मेरे छोटे भाई को दो मुट्ठी भात नहीं दिया...... बाबूजी की नजर में कभी कोई खोट नहीं आया वे मेरे शरणदाता हैं, रक्षक है..... आज भी उनके लिए पैसे मेरे परिवार के लिए बहुत बड़ा संबल हैं......।’’ क्रोध का अवसान रूदन में भी ठीक उसी तरह जिस तरह बादलों के गर्जन-तर्जन का अवसान बारिश के रूप में होता है। जाने क्या सोचकर....... बुधराम सिर झुकाए चला गया.....सिर उठाकर देखी बाबूजी सजल आँखों से इसी तरफ देख रहे हैं आँसूओं भरी आवाज में बोले- ‘‘कुसुम अंदर जाओ......डरो.....मत......तुम्हारे भरोसे को टूटने नहीं दूँगा...... मैं हूँ न......।’’
    डूबते को सहारा मिला...... मैं घर के अंदर आ गई मन ही मन बाबूजी को प्रमाण की.......जगन्नाथ स्वामी से प्रार्थना की कि वे बाबूजी को स्वस्थ और दीर्घजीवन दें ताकि उनकी छाया मुझ पर बनी रहे......। मैडम जी हम दूसरों के लिए जब दुआ मांगते हैं तो उसमें भी हमारा स्वार्थ कुछ न कुछ अंश में विद्यमान रहता ही है......शायद वही मानव.......स्वभाव है......जीवन के प्रति मोह या फिर निश्चित भविश्य....  निरापद जीवन की चाहत.....मैं नहीं जानती....... हाँ इतना तय है कि हर हाल में मनुश्य अपनी सुरक्षा पर पहले ध्यान देता है।
    कुसुम ने पानी मांगा......मैं समझ गई..... अतीत की गलियों में भटकते समय मन ही नहीं शरीर भी थकता है..... घावों की पपड़ी झड़ती है तो चिनचिनाहट तो होती है भले ही खून न निकले....... थोड़ी देर के लिए जख्म ताजे हो ही जाते हैं।
    पानी पीकर मुँह पोंछी, लगा समय की सिलवटें मिटा रही है, कुसुम फिर बोली- ‘‘मैडम जी मेरी आशंका तीसरे दिन भयावह रूप लेकर उपस्थित हो गई...... गुमटी बंद कर बाबूजी..... हाथ मुँह धो ही रहे थे कि बुधराम आया......अकेले नहीं चेले चपाटों को भी साथ लाया था......उन्हीं में से किसी ने कहा- ‘‘ये बुड्ढे! चल चाय-पान दे..... देखता नहीं दादा आया है.....।’’ शांत निर्विकार स्वर में बाबूजी ने कहा- ‘‘बेटा! रात हो गई है दूध भी नहीं है फिर गुमटी बंद कर चुका हूँ सुबह आइए..... तब आप लोगों को खिदमत करूँगा......।’’ नीली शर्ट वाले लंबे लड़के ने बाबूजी को धक्का देकर गुमटी की ओर ठेलते हुए कहा- ‘‘सरे शाम दुकान बंद क्यों किया?’’..... भीड़ से आवाज आई, जाने किसकी आवाज थी ‘‘अरे यार ! बासी कढ़ी में उबाल आया है..... बूढ़े तोते के चोंच में अनारकली...... अश्लील ठहाका गूँज उठा.......।मैडम जी मुझे लगा धरती फट जावे तो मैं उसमें समा जाऊँ..... पिता की उम्र के व्यक्ति का ऐसा अपमान...... कोई कैसे कर सकता है?’’
    इस बार बुधराम सामने आया, कड़क कर बोला- ‘‘मुसण्डे बुढ़ऊ! जान की सलामती चाहता है तो कुसुम को मेरे साथ कर दे..... नहीं तो......न तू रहेगा न तेरी मुमटी रहेगी.....।’’
    निरीह बाबूजी इतना तो समझ ही गए कि इन शोहदों के मुँह लगना बेमानी है......सो चुप.....चुप ही रहे.......।
    बुधराम ने कहा- छोकरी के एवज में हजार, पाँच सौ रूपये भी दे सकता हूँ पर हिन्दू लड़की को मुसलमान बनने नहीं दूँगा। धरम ईमान की बात है, बुधराम की बात एक बाप एक..... परसों दस बजे आऊँगा...... जात बिरादरी के पाँच पंच भी साथ लाऊँगा......। सीधे-सीधे मान गए तो तुम और तुम्हारी गुमटी सलामत रहेगी वरना..... तुम समझ ही रहे हो..... नहीं होगा तो एक बार तुम्हारे नाम से भी सजा काट लूँगा......।’’
    बुधराम के इशारा करते ही दुश्मनों का दल सड़क की ओर बढ़ चला.......।
    बाजार में अनेक लोग थे पर बुधराम के आतंक ने किसी को सामने आकर बात करने से रोक दिया था सब अपनी खैर मना रहे थे पराई पीर में कौन शरीक होता......।
    बाबू जी अंदर आए.......थरथर कांपती खड़ी थी मैं......थोड़ी देर मेरी ओर देखते रहे फिर बोले......’’कुसुम..... रास्ता चलते समय गंदगी में पाँव धो लेते हैं...... गंदगी के डर से रास्ता चलना तो नहीं छोड़ देते......। चलो.......खाना खा लेते हैं...... फिर सोचेगंे.....।’’
    बहुत थोड़ा-सा खाकर बाबूजी उठ गए और मेरे गले से तो कौर ही नहीं उतर रहा था बुधराम की करतूतें जग..... जाहिर थीं.....कोई अपराध ऐसा नहीं था जिसे करते समय उसे कोई हिचक होती हो......।
    इस विपत्ति से कैसे छुटकारा पाऊँ.....? यदि बुधराम ने जो कहा है, कर दिखाया..... तो मेरे कारण गुलनार और बाबूजी दोनों सड़क पर आ जावेंगे..... जिनके घर में मुझे शरण मिली उन्हीं को बेघर होते कैसे देख सकूँगी.....?
    यदि बुधराम की बात मान लूँ तो जीवन नरक हो जावेगा फिर.....गाँव की अमराई वाले मंदिर में जीवन ने कहा था- ‘‘कुसुम मेरी राह देखना...... पढ़ाई पूरी करके...... छोटी-मोटी नौकरी कर लूँगा...... अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँगा, अपना परिवार चलाने लायक कमा सकूँगा, तब तक तुम भी बालिक हो जाओगी.....यदि हमारे माँ-बाप ने विरोध किया तो हम सरकारी शादी कर लेंगे.... और भी कितनी बातें, सुनहरे भविश्य के कितने सपने मेरी आँखों में सजा दिए थे जीवन ने.....।’’
    मुझे उत्सुकता हुई कुसुम की कहानी में जीवन कहाँ से आ गया कौन है ये जीवन.....फिर......आया था तो चला कहाँ गया? अनेक प्रश्न जागने लगे.....पर तब तक पुत्र द्वय जाग गए थे उन्हें दूध-दलिया देना था सो प्रश्नों को अगले दिन के लिए टालकर..... कुसुम को विदा की।
   

                    चौदह

    आज शनिवार है, दोपहर के तीन बज रहे हैं...... कुसुम की कहानी में आये जीवन..... ने मुझे बेचैन कर रखा है..... इतना बेचैन कि कूलर की ठंडी हवा भी गरम झकोरे की तरह लग रही है...... किसी ने कितना सच कहा है प्रतीक्षा की घड़ियाँ काटे नहीं कटतीं..... प्रश्न मेरे मानस में नागफनी की तरह उग आया है..... नागफनी ही है..... देगी तो चुभन ही......।
    अपनी सोचों में इस कदर घिर गई थी कि कुसुम का आना जान नहीं पाई - ‘‘मैडम जी इतना क्या सोच रही हैं कि हमारे नमस्ते का जवाब भी नहीं दिया आपने.....।’’
    मैंने खुद को संभालकर कहा- ‘‘आओ कुसुम..... तुम्हारे बारे में ही सोच रही थी.....।’’ झट से कुसुम बोल उठी- ‘‘जीवन के बारे में सोच रही थीं ना ? हमसे गलती हो गई जीवन के बारे में हमें पहले ही बता देना था.....। चलिए आज बता देती हूँ......।’’
    बस इतना ही जानना काफी है कि जीवन हमारे गाँव के सम्पन्न किसान रामेश्वर fसंह का इकलौता बेटा था...... पढ़ने-लिखने में होfश्यार तो था स्वभाव का भी बड़ा भला था.... गाँव के हर घर के सुख-दुख में साथ देता था..... नयी पीढ़ी का था इसलिए गरीब अमीर का अंतर उसके मन में नहीं था.... हमारे स्कूल में नहीं था...... हमारे स्कूल में ही पढ़ता था मुझसे तीन जमात आगे आठवीं में था जब मेरी उससे जान पहचान हुई थी.......कुछ सोचते हुए कुसुम हँस पड़ी.....।
    समझ गई कुसुम का मन अतीत की सुगंध से भर उठा है..... वही मीठी गंध जो हर लड़की के तन-मन में छा जाता है जब बसंत...... कामदेव के साथ आता है, पहली बार जीवन में आता है..... अरे हाँ! मुझे तो जीवन के बारे में जानना है..... सो पूछी ‘‘हाँ कुसुम बताओ.....आगे बताओ.....क्या हुआ.....?’’
    कुसुम ने कहा - ‘‘मैडम जी पाँचवीं कक्षा में पढ़ते समय......100 मीटर दौड़ में मैंने भाग लिया था....... प्रथम आने की जिद में प्राणपण से दौड़ी..... दौड़ तो पूरी कर ली पर जाने क्या हुआ कि वहीं गिर गई..... आँख खुली तो देखी..... सब लोग मुझे घेर कर खड़े हैं..... बड़ी शर्म आई.....खेल बहिन जी ने कहा- ‘‘घर से खाली पेट आई होगी इसीलिए गिर गई.....।’’ हाँ....... बात सच थर पर लोगों को घर की गरीबी बताने में संकोच हुआ इसलिए बोली- ‘‘नहीं पन्ताभात आई थी..... पेट दर्द कर रहा है इसलिए गिर गई....।’’
    धीर-धीरे सब लोग चले गए..... एक लड़का फिर भी खड़ा रहा.....धीरे से उसने कहा- ‘‘कुसुम.....आओ पेड़ के नीचे बैठते हैं।’’.....उसके बोलने में अधिकार की गंूज थी.... ना नहीं कर सकी.....। दो पीठा निकाल कर उसने मुझे दिया कहा- ‘‘खाकर पानी पी लो..... सुस्ता लो, दूसरी पारी की दौड़ शुरू होने में अभी आधे घंटे की देर है.....।’’
    वो ऐसे बोल रहा था मानो हमारी बहुत पुरानी जान-पहचान हो..... उसकी आँखांे में मेरी गरीबी के लिए उपहास नहीं था....हाँ.....पीठा खाने के बाद शरीर में जान आई दूसरी पारी में भी जीत हासिल की..... उसी दिन जाना वो लड़का जीवन है..... फिर तो मिलते-ढेरों बातें करते..... वह आठवीं में पढ़ती था इसलिए पढ़ाई में भी मेरी मदद कर देता था..... धीरे-धीरे हम अच्छे मित्र बन गए.....।
    आपको याद होगा कि मैं आठवीं की परीक्षा नहीं दे पाई थी..... हाँ तब तक जीवन हाईस्कूल में पढ़ने लगा था वह भी कटक जाकर......। जिस दिन मैं यहाँ आ रही थी जीवन मुझसे मिला था पहली बार उसने अपने मन की बातें कहीं..... वही बातें, भविश्य के सुखद सपने.... तब तक वो ग्यारहवीं में पढ़ने लगा था..... मैडम जी....उसकी बातों पर मन रीझ गया.... बड़ी मुश्किल से सिर हिलाकर हामी भरी..... अजीब सी खुशी...... अनजाना सा भय..... और भी जाने क्या क्या..... मेरा छोटा-सा मन यह सब संभाल न सका तो रो पड़ी..... बड़े स्नेह से जीवन ने मेरे आँसू पोंछे..... और कहा- ‘‘कुसम..... किसी भी परिस्थिति में धीरज मत खोना.....साल भर का समय..... देखते-देखते बीत जावेगा..... और हाँ मुझ पर विश्वास बनाए रखना....।’’
    किशोर-वय का मेरा मित्र..... आज मेरा सहारा बनने की बात कर रहा था वो कब इतना बड़ा हो गया..... आँसूओं से भरी आँखें उठीं तो देखी...... हाँ.....जीवन का कद..... बड़ा हो गया है गोरे लंबोतरे चेहरे पर घनी बरौनी के नीचे चमकती काली आँखें.... विश्वास से भरी हुई थीं.... भरे-भरे गुलाबी ओठों के ऊपर मूंछों की पतली रेखा उभर आई थी.....। पौरूश के लक्षण दिखाई देने लगे थे..... मेरे मन ने सर्वतोभावेन समर्पण स्वीकर कर लिया.......।
   
    कुसुम चुप हो गई सद्यः युवा जीवन...... उसकी चेतना को आच्छन्न कर रहा था। साठ वर्शीया किशोरी.....बन गई थी......। यादों पर तो उम्र का जोर नहीं होता न...... फिर कच्ची उम्र का पक्का समर्पण था जीवन का भी, कुसुम का भी।
    कुसुम को जीवन के साथ छोड़ मैं चाय बनाने चली गई...... कुसुम को चाय का कप पकड़ाई तो उसे सुध आई...... थोड़ी शर्मिदा हुई.....। चाय पीकर...... मैंने पूछा...... ‘‘हाँ कुसुम ! बुधराम का क्या हुआ वो फिर आया या नहीं.....।’’
    ‘‘हँस पड़ी कुसुम- ‘‘मैडम जी भगवान् जिसको बचाना चाहे उसका कोई कुछ बिगाड़ ही नहीं सकता......तो सुनिए......।
    कभी सोते, कभी जागते रात कट गई। गुलनार..... को तैयार कर स्कूल भेज दी......सोची अब जाकर बाबूजी से पूछँगी.....कि तभी साइकिल की घंटी बजी.....पोस्टमेन आया था...... मेर हाथ में कार्ड पकड़ा आगे चल दिया......। कार्ड में लाल स्याही के छीटे देखकर कांप गई.... पढूँ तब तक बाबूजी आ गए..... मेरे हाथ से कार्ड लेकर पढ़ने लगे.....कुछ बोले नहीं...... मेरी ओर देखे......उन आँखों में करूणा भरी थी..... पास आकर मेरे सिर पर हाथ रखे, बोल- ‘‘कुसुम.....धीरज धरकर सुनो.....तुम्हारे पिता जी नहीं रहे...... आज तीसरा दिन है..... अल्लाह की जो मरीज होती है उसे तो मानना ही पड़ता है..... तुम जल्दी से अपने कपड़े रख लो.... गजाधर रात की गाड़ी से उड़ीसा जाने वाला है उसका घर भी तुम्हारे गाँव के पास पाले
पर साभांठा गाँव में है तुम्हें घर तक पहुँचा देगा......।’’
    पिता जी का जर्जर बूढ़ा शरीर आँखों के सामने आ गया..... अहा.....अब उन्हें कभी देख नहीं सकूँगी.......मेरे दोनों भाई अब किसके भरोसे सूने घर में रहेंगे......बहनें तो कभी देख नहीं सकूँगी......मेरे दोनों भाई अब किसके भरोसे सूने घर में रहेंगे......बहनें तो अपनी घर गृहस्थी में मशगूल हैं..... पिता जी का शोक, भाइयों की fचंता में डूब गया..... जाने कब आँसू गिरने लगे थे.... एक बार फिर मुझे तैयार होने की हिदायत देकर बाबूजी गजाधर के घर चल दिए......।
    मैडम जी...... कपड़े संभालते, रखते समय बुधराम याद आया तो बरबस सोच बैठी..... चलो...... जान बची..... अब कल वो आयेगा तो मैं तो रहूँगी नहीं...... बाबूजी की गुमटी बच जावेगी.....। बड़ी शांति मिली.....हमारा मन भी कितना विचित्र है? अवसाद के घने अँधेरे में भी रोशनी की तलाश कर ही लेता है इसीलिए कहते हैं कभी-कभी दुख भी किसी सुख की शुरूआत बन जाता है।
    जाने से पहले रात का खाना बना ली...... गुलनार स्कूल से आई तो उसे अपने जाने की बात बताई...... पगली लड़की रोने लगी खुद भी साथ चलने की जिद करने लगी......उसे समझाई, आश्वासन दी कि जल्दी ही वापस आऊँगी...... मन लगारक पढ़ना...... बाबूजी को तंग मत करना....... आदि आदि.......। गजाधर आ गया तो बाबूजी अंदर आए चार सौ रूपये मेरे हाथ में पकड़ाकर बोले- ‘‘कुसुम ! तुम समझदार लड़की हो यहाँ का हाल देख ही रही हो पर तुम किसी बात की fचंता मत करना....... भाइयों को देखना..... काम काज ठीक से निपटाना....... और एक बात याद रखना...... जात बिरादरी के लोग कुछ बोलें तो धीरज मत खोना..... सुनना सबकी.... पर सच को याद रखना....... क्योंकि सच ही अंत तक हमारा साथ देता है.....। कोई भी निर्णय सोच समझ कर करना.... अपने भाईयों का भला सोचना क्योंकि अब तुम्हीं उन दोनों की माँ, बहन, बाप सब कुछ हो।’’

    बाबू जी को प्रमाण करके बोली- ‘‘बुधराम से झगड़ा मत कीजियेगा, कार्ड उसे दिखा दीजिएगा....मेरे वापस चले जाने से उसकी शिकायत दूर तो नहीं होगी कुछ कम अवश्य हो जावेगी......।’’
    बाबूजी बोले- ‘‘कुसुग..... कोई परेशानी हो तो चिट्ठी लिखना...... ये घर भी तुम्हारा ही है इसे याद रखना.....।’’
    बाबूजी को प्रमाण करके गुलनार को प्यार की..... गजाधर जल्दी मचा रहा था सो रिक्शे में बैठ गई......। पराए घर को छोड़कर अपने घर जा रही थी फिर भी इस घर को छोड़ने का दुख हो रहा था, गुलनार की fचंता हो रही थी। लगभग दस बजे गाड़ी कांटाबाजी पहुँची...... ठंड की शुरूआत नहीं हुई थी पर धूप में पहले सी तेजी भी नहीं थी......। गजाधर के साथ स्टेशन के बाहर आई......दोनों ने चाय पी..... बस स्टैण्ड की तरफ चल पड़े......घंटे भर बाद बस आई और हम धक्का-मुक्की करते बस में सवार हो गए.....।
    गजाधर मेरे साथ ही बिस्नूपुर में उतर गया..... सड़क से हमारा घर दो फर्लांग की दूरी पर है...... चुपचाप चलने लगे दोनों...... माँ तो पहले चली गई..... अब पिता भी नहीं रहे...... घर तो सूना हो गया होगा..... पिछली बार आई थी तो पिताजी ने बताया था कि मंदिर वाड़ा के गुरूनाथ बोहरा की मंझली लड़की तारा को उन्होंने बड़े भाई के लिए मांग लिया है...... अलगे फागुन में शादी कर देंगे..... माँ के कड़े-बिछुवे के साथ कान की लुरकी भी चढ़ावे में चढ़ा देगें।
     .....बहू आकर घर संभाल लेगी......। साल दो साल में घर संभल जायेगा तब मेरी शादी भी कर देंगे, हाँ छोटे भाई को रघुराजपुर के बड़े सेठ की दुकान में काम पर लगा दिया है.... चार पैसे की मदद भी हो जाती है, छोटा, काम भी सीख रहा है.....। टूटी गृहस्थी को जोड़ने की कितनी साध थी पिताजी को..... पर भगवान ने उन्हें बुला लिया..... जो सोचे थे कुछ भी नहीं कर पाए..... कोई बात नहीं.... मैं बड़े भाई की शादी करवा दूँगी..... बात तो पक्की हो ही गई है.....। पिताजी का काम-काज निपटा कर सवा महीने बाद ही लगन निकलवा लूँगीं..... घर को और ज्यादा दिनों तक सूना नहीं रखूँगी.....। बहू आवेगी तो पिताजी के चले जाने का दुख कुछ तो हल्का हो सकेगा।
    ओह......रास्ते में पड़े पत्थर से ठोकर खाकर गिरते गिरते बची......गजाधर ने कहा- ‘‘संभल कर चलो......गिर जाती तो.....।’’ तब तो जानती नहीं थी मैडम जी कि घर पहुँचने पर इससे भी बहुत बड़ी ठोकर लगने वाली है...... तन-तन को लहूलुहान न कर देने वाली ठोकर.......।
     मैडम जी ! कभी-कभी fजंदगी ऐसा ठोकर मारती है कि रोने का वक्त भी नहीं देती...... पल भर में हमारी उम्र दुगनी हो जाती है...... यही ठोकर मारती है कि रोने का वक्त भी नहीं देती..... पल भर में हमारी उम्र दुगनी हो जाती है...... यही ठोकर इंसान को असमय बूढ़ा भी कर देती है।
    आंगन का दरवाजा खुला हुआ ही था पर बरामदे में जहाँ पिताजी की खटिया रहती थी, वहीं चटाई बिछी थीं जिस पर पड़ोस के मदन चाचा बैठे थे थोड़ी दूर घुटा हुआ सिर लिए बड़ा भाई बैठा था..... बाईस-तेईस बरस का बूढ़ा......समझ गई पिताजी के चले जाने से भइदा बूड़ा बन गया है..... जोर से रो पड़ी..... रोने की आवाज सुनकर छोटा भाई दौड़ा आया- ‘‘छोटी दीदी पिता जी भी चले गए हम अनाथ हो गए.....’’ बोलकर रोने लगा.....।
    अपना रोना भूल गई बाबूजी की बातें याद आई भाइयों को तो मुझे ही संभालना होगा..... गले लगाकर उसकी पीठ थपकने लगी......फिर धीरे से उसे खुद से अलग किया और भइदा की ओर बढ़ी......भइदा के गले लगकर खूब रोना चाहती थी कि मदन चाचा बोले - ‘‘कुसुम असौच वाले आदमी को बाहर के लोग नहीं छूते.....।’’ जहाँ की तहाँ खड़ी हो गई......मैं तो भइदा की सगी गहन हूँ......बाप उसी का नहीं मेरा भी मरा है...... फिर अभी तो मेरी शादी नहीं हुई है तो मैं बाहर की कैसे हो गई......?
    कुछ पूछती इससे पहले मदन चाचा..... पत्तलें लेकर आता हूँ कहकर चल दिए......। मुझसे कुछ पूछा भी नहीं...... कुछ जाना भी नहीं....।
    गजाधर अपने गाँव जाना चाहता था यहाँ से कोस भर पैदल चलेगा तब परसाभांठा पहुँचेगा......। हमारी जात में मरी पड़े घर का पानी पराये गोत वाले नहान होते तक नहीं पीते..... इसे मैं जानती थी.....।
    ‘‘चलता हूँ कुसुम- ‘‘बोलकर गजाधर जाने लगा तो मैं बोली- ‘‘गजाधर काका नहान वाले दिन आना, आज तो पानी के लिए भी नहीं पूछ सकी।’’
     गजाधर के चले जाने के बाद भइदा से पूछी.... ‘‘पिताजी को क्या हुआ था?’’ पता चला.... बूढ़ा शरीर बरसात की मार न सह सका फिर मौसमी बुखार ने शरीर को और तोड़ दिया... गाँव के बैद की पुड़िया.... काढ़ा कुछ भी कारगर नहीं हुआ...।
    घर के एकमात्र कमरे में गई..... हंड़िया कलसी उघारे पड़े थे..... अलगनी में कथरी कमरा झूल रहे थे......बेतरतीबी का आलम था.... झाडू जाने कब से नहीं लगी थी..... जाले लटक रहे थे..... ढिबरी के धुयें से कोने वाली दीवाल काली पड़ गई थी..... गरीबी और किसे कहते हैं। टूटे-फूटे चार बासन बरतन भी कोने में पड़े थे.... जिस घर में स्त्री न हो वहाँ की दशा ऐसी ही होती है। यह वही घर था जो माँ के रहते..... गोबर से लिपा पुता..... सारे सामान करीने से लगे रहते थे.... गरीबी तब भी थी पर इतनी भयावह नहीं लगती थी।
    भइदा किसी काम से बाहर चले गए..... तो छोटू को बूलाकर काम में हाथ बंटाने को बोली। सबसे पहले जाले साफ की..... झाडू लगाई.....बरतन बासन..... आंगन में निकाली..... पोखर से छोटू पानी लाया तो बरतन साफ करके..... गोबर से घर लीप दिया..... अलगनी के कपड़े तहा कर रखी..... दो घंटे की मेहनत के बाद घर की सूरत कुछ बदली..... तब तक मैं भी थक गई थी..... छोटू को बोली पोखर में डुबकी लगा कर आती हूँ.....।
    दोपहर हो गई थी सो घाट पर कोई नहीं था....... पर ये क्या ? घाट पर उतरते ही सिर भन्ना गया पोखर का पानी....कीचड़ घुला मटमैला...... फिर काई-शैवाल के सड़ने की बू आ रही थी। घाट पर घोंघे..... दातुन की चिरी बिखरी थी...... बड़ी घिन आई..... पानी हाथ में लिया मुँह तक ले जाते ही जोर की उबकाई आने लगी.....। हे भगवान इतनी गंदगी..... तो घाट पर कभी नहीं रहती थी। खुद को समझाई शहर में रहते-रहते..... नहानघर में नहाने की आदत बन गई है फिर नल का साफ पानी..... अरे कुसुम इसी पोखर में डुबकी लगाते..... तैरते बड़ी हुई है चार दिन शहर में क्या रही..... बड़ी साफ-सफाई पसंद हो गई.....।
    मन को लाख समझाऊँ...... पर उस गंदे पानी में ऊंगली डुबाने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी..... किसी तरह नहाई..... हाँ नहाते ही ठण्डक पहुँची। शरीर और मन दोनों में।..... घर की ओर चल पड़ी.....।
    गीले कपड़े आंगन में बंधे तार पर फैलाने लगी तो याद आया..... इतनी देर हो गई मुझे आये, पास-पड़ोस का कोई मुझसे मिलने क्यों नहीं आया......? अरे और नहीं तो माँ की गंगाजल को तो आना था..... फिर मेरी भोजली...... भी तो अब तक दिखाई नहीं दी.....। जरूर कोई बात है...... मन को समझाई...... दोपहर का समय है खेत में काम करके थके हारे लोग दो मूठा खाकर आराम कर रहे होंगे.... शाम को तो आयेंगे ही......।
    चूल्हा जलाकर....... हांडी चढ़ा दी। थोड़ा फेना भात बना लेती हूँ......टमाटर की चटनी पीस दूँगी.....अभी का काम चल जावेगा.....। छोटू बोला- ‘‘दीदी मैं भी नहा आऊँ बड़ी भूख लगी है......।’’
    अहा बिचारा.....बच्चा...... हाँ जा जल्दी आना....कहकर टमाटर तोड़ने पिछवाड़े की ओर गई......। वापस आई तो देखा भइदा के पास मुहल्ले भर की चंपा चाची बैठी हैं..... उनसे थोड़ी दूर पर...... गंगाजल मौसी और मेरी भोजली माँ भी बैठी है.... पर किसी ने मुझको अपने पास नहीं बुलाया..... अंदर जाने लगी तो चंपा चाची बोली- ‘‘कुसुम हमने चूल्हा बुझा दिया है.....’’ हमारे घर से भात तरकारी आ रही है ये लोग वही खायेंगे तुम्हें भी वही खाना होगा...... तुम्हें रांधने पसाने की तकलीफ न करनी पड़ेगी.....।
    चाची के मुँह लगना....राई का पहाड़ बनाना है फिर भी बोली- ‘‘पहले की बात और थी, भाई लोगों के लिए आपने खाना दिया अब तो मैं आ गई हूँ..... दो मूठा भात रांधने में कितनी देर लगेगी..... अब आप तकलीफ न उठायें मैं कर लूँगी.....।’’
    तीनों महिलाएँ एक दूसरे का मुँह देखने लगी.... आँखों-आँखों से कुछ इशारे किए..... भोजली माँ की कुहनी को छूकर गंगाजल मौसी ने इशारा किया कि तुम कहो...... हिचकिचाते हुए इधर-उधर देखते बेमन से भोजली मां बोली- ‘‘बात ये है कुसुम कि..... दुख-सुख तो लगा रहता है..... जात-बिरादरी के बीच रहकर ही..... दुख-सुख काटना पड़ता है..... बिरादरी के मुखिया.... पंच लोग जो नियाव करेंगे वो मानना पड़ेगा..... संझा समय सब लोग तुम्हारे आंगन में जुडें़गे.....तभी....चार बात कहना सुनना.....होगा.....तब तक तुम आराम करो..... इतनी दूर से आई हो..... दो कौर खाकर...... पड़ी रहो......।’’
    मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि बिरादरी के पंच क्या कहना-सुनना चाहते हैं.....? फिर भात रांधने के लिए बिरादरी की मंजूरी कब से ली जाने लगी..... सोचा...... शायद...... पिता जी की मृत्यु..... शोक वाली कोई बात हो.....। इतने में चैती भात..... तरकारी लेकर आ गई.....।
    चंपा चाची ने दोनों भाइयों के लिए पत्तलों में भात, तरकारी ऊपर से थोड़ा सा दही डाल दिया.....।
    अपनी-अपनी पत्तलों से थोड़ा-थोड़ा भात लेकर दोने में डाला और भइदा दोना लेकर..... गली की और चलने लगे..... अब ध्यान गया कि मेरी पत्तल में से भात तो लिया ही नहीं..... शायद भूल गए...... हाथ में थोड़ा सा भात लेकर पीछे दौड़ी..... तो चंपा चाची ने कहा- ‘‘तुम रहने दो कुसुम..... तुम्हारे हाथ का भात पानी.... तुम्हारे पिताजी को नहीं मिलेगा....।’’   
    ये क्या हो गया है इन सबको..... मेरे पिताजी जब तक जिये हर महीने मेरे कमाये पैसे से भात खाते रहे..... तो आज मरने के बाद मेरे हाथ का दिया हुआ क्यों नहीं खा सकते.....? विवाहिता बेटी पराये गोत की होती है पर मैं तो अभी तक इसी कुटुम परिवार, गोत की हूँ.....।
माँ..... पिताजी के जाते ही मैं कितनी पराई हो गई.... आज माँ होती तो..... आगे सोच नहीं सकी.... रात भर की यात्रा.... दोपहर तक खाली पेट किया गया परिश्रम....और मन की उथल-पुथल ने आँखों के सामने गहरा काला परदा खींच दिया.....
    आँख खुली तो देखी भोजली माँ की गोद में मेरा सिर है..... उठने लगी तो उन्होंने सहारा देकर बिठा दिया पहले की भोजली माँ बन गई थीं प्यार से बोली- ‘‘कुसुम दो कौर खाकर पानी पी लो बेटी...... जी थिरा जायेगा..... सोच मत...... बेटी हम औरत जात हैं जातबिरादी का जुलुम हमें ही सहना पड़ता है क्योंकि पचं तो सब मरद होते हैं..... खुद ही नियम कायदा बनाते हैं..... खुद तोड़ते हैं तो दोस उन्हें नहीं लगता..... सारा दोस अपराध तो हम औरतों को लगता है.....।’’
    तरकारी में भात मिलाकर मेरे मुँह में देने लगी..... माँ की याद आई..... आखें भर आई.... भूखा पेट..... खाना मांग रहा था..... सो गटकने लगी..... पानी पीकर.....वही बिछी कथरी में लुढ़क गई.... भात नींद में खो गई.... देखी बाबूजी आए हैं- ‘‘उठो कुसुम.... तुम्हारे धीरज की परीक्षा है आज,.... उठो..... भाइयों की ओर देखो.... उनका घर दुआर संभाल दो.... तुम्हारे सिवा तो उनका कोई नहीं है.....।’’
    बाबूजी..... कहती उठने लगी..... पर ये क्या बाबूजी कहाँ गए ? बाहर देखी...... आँगन में मुहल्ले के लोग बैठे हैं..... कुछ औरतें भी हैं सुनी..... किसी ने कहा- ‘‘कुसुम को बुलाकर साफ-साफ बात कर लेते हैं..... आखिर हमारा भी तो ईमान धरम है..... बोलो भाइयों..... बाल बच्चेदार हैं हम लोग..... सादी बिहाव...... जनम-मरन तो सबके साथ लगा रहता है......। बिरादरी के नियम कायदे तो मानने ही पड़ते हैं।’’ अब और सहा नहीं जाता आखिर मैंने अपराध क्या किया है कि बिरादरी के सामने..... मुँह छिपाऊँ.... बाहर आई तो लोग बोले..... ‘‘आ गई कुसुम..... मुखिया काका आप ही बात करें....।’’
    सब लोग मेरी ओर देखने लगे..... मैडम जी ऐसा लगा ये सब मेरा तमाशा देखने आए हैं..... गाँव..... में इस तरह की पंचायत में लोग सिर्फ इसलिए जाते हैं कि थोड़ा मनोरंजन हो..... पराई fनंदा का रस.... ताड़ी..... महुआ के नशे से भी ज्यादा मादक और जहरीला होता है।
    मुखिया ने कहा- ‘‘कुसुम तुम शहर में मुसलमान के घर रहती हो उनका छुआ खाती, पीती हो फिर उस घर में कोई औरत जात नहीं है तो तुम किस हैसियत से वहाँ रहती हो......तुम्हारा उनसे क्या संबंध है ? यह भी हम नहीं जानते...... पांच-पंचों और बिरादरी वालों का विचार है कि जब तक तुम डांड़ भात नहीं देती..... बिरादरी तुम्हें जात में नहीं मिलाएगी..... तुम्हारे हाथ का छुआ..... पानी भी कोई नहीं पियेगा....। बोलो डांड़भात तुम्हें मंजूर है ?’’
    मैडम जी..... जिन नुकीले, धारदार प्रश्नों का सामना करने से बचना चाहती थी वही प्रश्नी मेरे साथ-साथ यहाँ भी चले आए थे। बुधराम ने भी बाबूजी जैसे भले आदमी का अहित करना चाहा था..... यहाँ भी लोग मेरी अपनी बिरादरी के लोग..... मुझ पर ऊंगली उठा रहे थे..... बाबूजी को भी मेरे दुर्भाग्य के साथ जोड़ रहे थे..... अब कहाँ...... जाऊँ..... क्या करूँ...... बाहर की मार से बचकर लोग घर आते हैं जब वही लाठी पत्थर घरवालों के हाथों में दिखे तो आदमी कहाँ जाएं....।
    डांड़ भात..... यानी पूरी बिदादरी को बरा-भात...... खिलना होगा...... किसलिए......? पेट की खातिर मुसलमान के घर नौकरी की..... उन्होंने तो कभी मुझे मंदिर जाने से नहीं रोका...... उन्हीं के दिए रूपये हर महीने पिताजी को मिलने रहे हैं..... रूपयों को छूत नहीं लगती शायद.....।’’
    मेरा मन विद्रोह हो उठा.....नहीं.....डांड़भात देकर...... अपने जाति भ्रश्ट होने को स्वीकार नहीं करूँगी..... जब मैंने धर्म परिवर्तन किया ही नहीं है तो डांड़ भात देकर..... अनकिए अपराध की सजा क्यों भुगतूं क्यों उस देवता स्वरूप बाबूजी को मुसलमान होने की सजा दूँ ?..... इन जात बिरादरी वालों से तो वे हजार गुना अच्छे हैं अभी भी आते समय चार सौ रूपये दिए हैं..... फिर उन्हीं ने तो कहा है सच का साथ मत छोड़ना.....।
    मैडम जी एक बार अन्याय का विरोध करने की ठान लेने पर भगवान हमको ताकत देता है...... हाथ जोड़कर बोली- ‘‘मुखिया काका..... मैं मुसलमान घर रहती हूँ.... चार पैसा घर भेजती हूँ। उन्होंने कभी मुझे मुसलमान बनने को नहीं कहा है...।
भगवान साक्षी है..... बाबूजी ने मुझे गुलनार की तरह ही रखा है वे मुझसे दुगने उम्र के हैं..... उनके मन में कोई खोट-न था, न है......। आप लोग मेरी बात पर विश्वास करें तो ठीक है...... हाँ मैं डांड़भात तो दूंगी नहीं...... किस दोश के लिए दूँ..... मैंने कोई दोश नहीं किया है......।’’
    पंचायती लोग थोड़ी देर चुप रहे शायद उन्हें मुझसे इस जवाब की आशा नहीं थी...... थोड़ी देर बाद मुखिया काका ने कहा- ‘‘कुसुम अगर तुम डांड़भात नहीं देना चाहती तो अपने पिताजी के काम-काज में तुम्हारी कोई भागीदारी नहीं होगी...... न ही कोई तुम्हारे हाथ का पानी भी पियेगा.....।’’
    मैं चुप रही..... तो लोग भुनभुनाते हुए चले गए...... लोगों का क्या उन्हें तो भरपेट भात बरा चाहिए बस.....। अपने निर्णय से संतुश्ट होकर मैं निfश्चंत होकर सो गई.....।

पंद्रह
   
    नींद तो मेरी उड़ गई है..... लिखना शुरू करते समय सोची नहीं थी कि मेरे द्वारा रचे गए पात्र मेरे ही खिलाफ हो जावेंगे..... लेखकों की यह विडम्बना सदा से रही है..... घटनाचक्र में पड़कर पात्र अपनी मनमानी करने लगते हैं, कलम भी उन्हीं का साथ देती है.... देखिए न..... गुलनार की माँ कब कुसुम रूप में आ खड़ी हुई और जब अपनी लड़ाई अपने ढंग से लड़ रही है, मैं तो सिर्फ लेखक हूँ..... शायद विधाता द्वारा रचित मनुश्य जब मनमानी करता है तब उसे भी मेरे समान ही पेशोपेश में पड़ना होता होगा......।
    चलो अब तो जो कुसुम का निर्णय होगा उसे ही मानना होगा मुझे भी आपको भी.....।
    दूसरे शनिवार को फिर कुसुम हाजिर हुई..... हाँ हमारे बीच अलिखित समझौता था कि सिर्फ शनिवार को दो घंटे हम साथ बैठेंगे..... वो कहेगी..... मैं सुनूँगी क्योंकि बाकी दिन तो स्कूल, घर, बच्चे इनसे ही फुरसत नहीं मिलती.....।
    आज कुसुम अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा निfश्चंत लग रही थी..... पूछी तो बोली- ‘‘मैडम जी गुलनार को बोल दी हूँ...... जीते जी तो दुकान छोडूंगी नहीं..... मेरे मरने के बाद तुम्हें जो अच्छा लगे करना..... आखिर दुकान और पान बीड़ी बेचने का लाइसेंसे तो मेरे ही नाम पर है..... आखिर सारा जीवन इसी गुमटी को दुकान बनाने में खपा दी हूँ.....। ठीक ही कहा कुसुम ने..... आजकल दुकान पक्की बन गई है, शटर लग गया है, चाय बनाने के लिए गैस चूल्हा आ गया है, छोटा-सा पंखा.... टेबल टी.वी..... ट्यूब लाइट...... किसी दुकान के लिए जो.... जो.... चाहिए सब जुगाड़ लिया है। कुसुम का कठिन परिश्रम का फल है दुकान.....।
    मुझे पकड़ा कर कुसुम बोली-आज मैं वो सुनाने वाली हूँ जिसने मुझे कुसुम के कुलसुम बना दिया..... बिन ब्याही पत्नी, बच्ची जने बिना माँ बना दिया.....। नाम, जाति, धर्म सब कुछ बदल गया.....।
    हाँ तो..... बिस्नूपुर ही चलें..... सुबह के सात बजे होंगे कि तीन चार पड़ोसिनें आई..... मरिया पोखर में नहाकर पिताजी को मिल, दूब, चांवल सहित पानी देना था......हमारी तरफ यह मान्यता है कि ऊरई को घाट किनारे रोपकर मृतात्मा का तर्पण किया जाता है इसे ही पानी देना कहते हैं.....।
     मैं भी घाट पर जाने को तैयार हो गई.... सबके साथ नहाई..... घड़ी बूढ़ियों ने पानी दिया..... जब मैं अंजुरी में पानी लेकर ऊरई की तरफ बढ़ रही थी तो चंपा चाची ने मेरा हाथ झटक दिया...... झमकर कर बोली- ‘‘तुम जात बाहर हो गई हो तुम्हारे हाथ का पानी ऊरई में नहीं पड़ेगा.....।’’
    मैं अपमान की आग में जल उठी..... दुख, रोश, आँसू सब एक साथ सिर पर सवार हो गए..... मैडम जी ! जात निकाले का अपमाने छाती फाड़ देता है..... खुद को इतना असहाय..... इतना अकेला कभी नहीं पाई थी...... फिर भी धीरज ने साथ नहीं छोड़ा..... चुपचाप घर आ गई..... फिर वही नाटक..... अलग पत्तल में परोसा भात..... दुख तो इस बात का था कि भइदा भी मेरी तरफदारी नहीं कर रहे थे.....।  
    उन्हें तो सब मालूम था, यहाँ आकर अपनी आँखों सब देख गए थे..... तो परायों से सहानुभूति की आशा ही व्यर्थ थी......। अकेली बैठी यही सब सोच रही थी कि छोटू आया..... अभी तक वही साथ निभा रहा था- ‘‘बोला दीदी...... पिताजी के काम- काज के लिए चंदन बोहरा ने भइदा को पैसा दिया है......।’’ मेरे कान खड़े हो गए मैं चंदन बोहरा को अच्छी तरह जानती हूँ सूदखोर महाजन है। मूल तो कभी चुकता होता ही नहीं, सूद में ही बदन की चमड़ी तक उतरवा लेता है..... सोचने लगी वो इतना परोपकारी कब से हो गया कि- भइदा जैसे बेरोजगार, गरीब को उधार दे..... कहीं उसकी नजर हमारे घर पर तो नहीं है......? हाँ, हो सकता है क्योंकि हमारा घर उसकी बाड़ी से लगा हुआ है..... हमारी जमीन अगर उसकी बाड़ी में मिला दी जावे तो..... चौरस..... बड़ी बाड़ी बन जावेगी.....। हो न हो यही बात है पता लगाना होगा....... चंदन बोहरा अपने मनसूबे में कामयाब हो गया तो मेरे भाई बे-घर बार हो जावेंगे..... बाप दादा की निशानी है यह डीह..... छूटा तो गाँव..... घर छूटने पर जो दर्द होता है उसे मुझसे अधिक कौन समझेगा....? नहीं अपने भाइयों का इतना बड़ा नुकसान नहीं होने दूँगी...... पर क्या करूँ ? कौन मेरी बात सुनेगा ?...... भइदा तो मुझसे बात ही नहीं करते.....। कोई उपाय तो करना ही होगा..... भोजली माँ की याद आई..... वही मुझसे स्नेह करती है उनके घर चलकर उनसे पूरा हाल सुनूँ......चल पड़ी भोजली माँ के घर..... इस समय घर में वे अकेली थी..... पास बिठाई..... पूछी- ‘‘कहो कुसुम ! कैसे आना हुआ.....?’’
    मेरी बात ध्यान से सुनीं फिर ठंडी सांस खींचकर बोली- ‘‘तुम्हारे भइदा के पास कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं है बेटी.....।’’ ‘‘भोजली माँ हमारे घर को बचा लीजिए.... मेरे भाईयों पर दया कीजिए.....।’’ वे बोलीं- ‘‘बेटी मेरे हाथ में क्या है..... चार पैसे का जुगाड़ तो कर नहीं सकती..... तीन सौ रूपये तो मेरे लिए सपना ही है.......।’’
    मैं बोली....... ‘‘आप मेरे सिर पर हाथ रखिए..... बस..... फिर मैं सब संभाल लूंगी।’’.....उन्हें बताई मेरे पास चार सौ रूपये हैं..... तीन सौ खर्च हो गए तो भी सौ रूपये बच जावेंगे.....। भोजली माँ ने मेरा साथ दिया..... भइदा को समझाई कि चंदन बोहरा के स्टाम्प पेपर पर दस्तखत न करे पैसों का इंतजाम कुसुम करेगी.....।
    हाँ मैडम जी...... काम-काज निपट गया, जात-बिरादरी को नहान का खाना देकर मेरे भाई शुद्ध हो गए...... पर बोहरा की नजर टेढ़ी हो गई...... उसकी आशोओं पर पानी जो फिर गया था.....। भोजली माँ के लाख समझाने पर भी मुझे काम-काज में शामिल नहीं किया गया...... कभी-कभी अपमान की मार से आँखों में आँसू आ जाते पर भाइयों के सिर पर छांव बनी रहेगी यह संतोश ओठों की मुस्कान बन जाता था......।
    दिन...... बीते......सप्ताह.....बीता...... पन्द्रहवें दिन तारा के पिताजी आए, गरजने लगे..... ‘‘कुसुम अभी तक घर में है और तुम दोनों भाई उसके हाथ का बना खा रहे हो..... मैं अपनी लड़की तुम्हारे घर नहीं दे सकता..... आज मैं मंगनी तोड़ने आया हूँ...... तुम लोग भी दूसरी लड़की देखो..... मैं भी कोई और लड़का देखकर तारी की शादी करूँगा....।’’
        मैं सोच रही थी ये नई विपत्ति कहाँ से आई ?...... तारा के पिताजी से बोली- ‘‘गाँव काका..... मैं ऊपरी काम ही करती हूँ भाप रांधने का काम तो छोटू ही करता है..... भाई लोग मेरे हाथ का नहीं खाते..... आप निfश्चंत रहिए..... तारा की सगाई तोड़िए मत.....।’’ मैडम जी भाग्य अच्छा था कि छोटू बाहर आकर बोला- ‘‘दीदी आज हांडी में भात ज्यादा है मैं उतार नहीं सकूँगा..... भइदा भी नहीं हैं..... क्या करूँ..... छोटू के सिर पर हाथ फेरकर बोली- ‘‘जा भाई लकड़ियों को चूल्हे से खींचकर आग बुझा दे हांडी में ढक्कन मत लगाना..... फेनाभात बन जावेगा..... रात की सब्जी बची है भइदा आयेंगे तब...... तीनों खा लेंगे.....।’’
    मैडम जी..... कभी-कभी भगवान बिगड़े को बनाने में हमारी मदद इसी तरह करता है.....।
    तारा के पिताजी..... कुछ शांत हुए..... छोटू के हाथ से उन्हें पानी दिलवाई..... उन्हें जो जानना, देखना था वो तो पूरा गया..... वे चले गए.....। मैं सोचने लगी आखिर कितने दिन मैं इस तरह अपमानित होगी रहूँगी...... ये बिरादरी वाले डांडभात लिए मुझे चैन से जीने नहीं देंगे..... किन्तु निरपराध होकर भी सजा भुगतना, अकारण डांड़भात देकर अनकिए अपराध को स्वीकार करना भी तो मुझे मंजूर नहीं है। पर..... जाऊँ कहाँ ? मैं ही सारे अनर्थों की जड़ हूँ...... माँ, पिताजी चले गए.....। भगवान की मरजी थी पर..... जीवन कहाँ गया..... इतने दिनों में एक बार भी मिलने नहीं आया..... कहीं उसने लोगों की कही बातों पर विश्वास तो नहीं कर लिया.....? नहीं....नहीं..... वह तो वैसे भी हमारी बिरादरी का नहीं है..... तो आया क्यों नहीं....? मरता क्या न करता..... अशरण-शरण मानकर जीवन को ढूँढने निकली..... उसके घर तो जा नहीं सकती थी..... याद आया भोजली को वो बहन मानता था उसे जरूर मालूम होगा....।
     भोजली के घर गई..... लपक कर गले लगी.... हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई.....। मेरे मन की अशांति ज्यादा देर तक छिपी नहीं रही...... भोजली ने पूछा- ‘‘तुम कैसी हो, क्या सोच रही हो बताओगी नहीं.....।’’ बाल सखी के स्नेहपूर्ण व्यवहार ने पिघला दिया खूब रोई..... भोजली ने भी मुझे रो लेने दिया..... फिर बोली...... ‘‘कुछ बोलो भई! अच्छा इतना बताओ कि आगे क्या हो सोची हो...... ?’’ अरे ये तो जीवन की बात ही नहीं कर रही है..... चलो मैं ही पूछूँ..... ‘‘भोजली..... एक बात पूछनी थी...... सब लोगों को तो देखी..... पर जीवन..... कहीं दिखाई नहीं दिया..... एक बार भी मुझसे मिलने नहीं आया, शिकायत नहीं है ? आश्चर्य से मेरी ओर देखती रही भोजली..... मानों कह रही हो..... कैसी बौड़म हो...... कोई खोज-खबर नहीं रखती....।
    सूखी हँसी हँसकर बोली- ‘‘तो तुम्हें कुछ पता नहीं है क्यों ? मेरे हामी भरने पर बोली- ‘‘तुमसे जिस दिन मिला था..... वही इस गाँव में उसका आखिरी दिन था क्योंकि किसी ने उसके पिताजी से तुम्हारे और उसके बारे में बता दिया था..... ज्यादा तो नहीं जानती..... पर सुनी थी कि बाप- बेटे में गरमा-गरम बहस हुई, बात इतनी बढ़ गई कि जीवन के पिताजी ने उसे घर से निकल जाने को कह दिया.... कपूत बेटे से निपूता भला कहकर खूब कोसा......।
जीवन भी सह नहीं सका..... उसी समय घर छोड़कर चला गया..... वो दिन और आज का दिन..... किसी ने जीवन को गांव में नहीं देखा.....। अब वो कहाँ है, क्या करता है..... कोई नहीं जानता...... कोई चिट्ठी-पत्री भी नहीं लिखता.....। राखी के दिन वो जरूर आवेगा..... ऐसा सोच रही थी..... पर कितनी राखियाँ मेरे पास जमा हो गई हैं..... राखी बंधवाने वाले की कोई खबर..... कोई खबर.....कोई ठिकाना ही नहीं लिखता.....। राखी के दिन वो जरूर आवेगा..... ऐसा रही थी..... पर कितनी राखियाँ मेरे पास जमा हो गई हैं..... राखी बंधवाने वाले की कोई पता.... ठिकाना ही नहीं मिल पाया.....।
    मैडम जी ! मुझे ऐसा लगा कि सैकड़ों ईटें धड़धड़ा कर मुझ पर गिर रही है वही ईटें जिन्हें चुन-चुन कर सजाई थी जीवन का घर बनाने के लिए.....। सुन्न पड़ गई देह..... मन के पास कुछ सोचने समझने की शक्ति ही नहीं बची.....।
     भोजली हमारे बारे में कुछ जानती थी बोली- ‘‘जो जानती थी बोली- ‘‘जो जानबूझकर खो गया हो उसकी खोज-कैसे और कहाँ करे भोजली! बचपना समझकर तुम भी सब भूल जाओ..... अभी तुम्हारे आगे पूरी fजंदगी पड़ी है..... जो पीछे मुड़कर भी नहीं देखता उसे कब तक पुकारती रहोगी’’...... चुप हो गई भोजली.....। अब क्या करूँ...... ? आखिरी सहारा भी टूट गया..... जीवन ही नहीं रहा तो मेरा ये जीवन किस काम की.....?’’ चलती हूँ भोजली....।’’ कहकर बाहर आई.....। सोच लिया..... अब किसके लिए खुद को बचाए रखूँ..... किसी को मेरी जरूरत तो है नहीं ..... बल्कि सबों पर बोझ ही बन गई हूँ तो इस बोझ को पोखर में डुबो देती हूँ ..... उद्देश्यहीन जीवन का विसर्जित हो जाना ही ठीक है....। दृढ निश्चय कर ली..... पोखर में डूबकर सारी समस्याओं से मुक्त हो जाऊँगी.....।
    मंदिर में बैठकर अँधेरा होने का इंतजार करने लगी ताकि घाट सूना हो जावे.......।
    अभी तो ठीक से अंधेरा हुआ नहीं था.... इधर-उधर देख रही थी कि पुराने अखबार का टुकड़ा पड़ा दिखा.....समय तो काटना था, अखबार के टुकड़े को उठा ली अभ्यासवश पढ़ने लगी..... ये क्या..... हे भगवान..... ये कैसी खबर छपी है.... ठीक से पढ़ी छपा था- ‘‘शहर का कुख्यात चोर बुधराम..... पुलिस के हत्थे चढ़ गया.... उसके पास से दो किलो गांजा, तीन देसी कट्टे और दो fजंदा कारतूस बरामद हुए..... पुलिस हिरासत में बुधराम के साथियों ने गुनाह कबूल कर लिया..... बुधराम को साथियों के बयान के अनुसार गिरफ्तार किया गया है..... कम से कम सात वर्श का सश्रम कारावास तो तय है.....।’’
    तारीख देखी.... आठ दिन पहले का अखबार है..... मैडम जी.... शायद भगवान ने ही वो अखबार का टुकड़ा दिखाया ताकि में आत्महत्या के पास से बच जाऊँ..... मरते को जीने की राह तो वही दिखाता है....। भवान शिव को प्रणाम की, उसे समय के देवता, महाकाल के नाम से भी लोग पुकारते हैं.... तभी तो पलभर में उसने मेरा समय बदल दिया.....। अब कोई डर नहीं है गुलनार के पास चली जाऊँगी..... बाबूजी ने कहा था- ‘‘कुसुम ये घर भी तुम्हारा है..... हिचकना मत..... सीधे चली आना.....।’’ fजंदगी का मोह शायद इसी को कहते हैं...... धीरे से उठी..... एक बार फिर भगवान को प्रणाम करके घर आ गई.....।

सोलह

    घर लौटते समय चाल तेज हो गई..... बहुत दिनों बाद गाँव की गलियाँ अपनी लगीं......। मन में निश्चय कर लिया गाँव छोड़ दूँगी पर जाने से पहले भाइयों की गृहस्थी संभाल जाना जरूरी है कौन जाने......? फिर किसी बहाने से चंदन बोहरा स्टाम्प पेपर लेकर हाजिर हो जावे..... मौके की तलाश तो उसे करनी भी नहीं पड़ेगी...... भइदा की शादी को ही भंजा लेगा..... नहीं नहीं आज ही मुझे तारा से मिलना होगा वो स्त्री है मेरी बात समझेगी..... आखिर आज नहीं तो कल इस घर को संभालना तो उसी को है।
    मैं सोचने लगी भगवान किस धातु से तुम कुसुम जैसी fस्त्रयों का हृदय बनाते हो। पुरूशों का हृदय बनाते समय उस धातु का छोटा सा टुकड़ा भी उपयोग में नहीं लाते क्या? रक्त-मांस, नस-नाड़ी, शिरा-उपशिरा, श्वसन प्रक्रिया सब कुछ तो स्त्री और पुरूश में समान है फिर भी अनुभूति की तीव्रता fस्त्रयों में अधिक क्यों है ? क्यों कोई स्त्री..... दूसरों के लिए जीना पसंद करती हैं..... मातृत्व उसके विचारों में, आचरण में, व्यवहार में, सर्वोपरि क्यों होती है ? इसीलिए ऋशि मुनियों ने सृश्टिकर्ता को आदिशक्ति माँ के रूप में देखा है। ठीक ही तो है सृश्टि का सृजन, पालन कोई स्त्री ही कर सकती है तभी तो हम उस सृश्टिकर्ता को जगत जननी कहते हैं।
    ‘‘या देवी सर्वभूतेशु मातृ रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।’’
    अन्यमनस्क हो गई थी कुसुम की पुकर से चौंकी...... ‘‘हाँ फिर आगे क्या हुआ कुसुम.....। पूछी तो कुसुम नये उत्साह से सुनाने लगी.... ‘‘शाम को छोटू को साथ लेकर तारा के घर गई..... ‘‘चलो तारा अमराई तक घूम आवे’’ कहकर उसे अकेले में ले चली छोटू को उसके घर पर बच्चों के साथ खेलने के लिए छोड़ दिया.....।
    बहुत दिनों बाद तारा के साथ भेंट हुई थी.... अब की ध्यान से देखी.... शरीर भर गया है, सांवले रंग पर चमक आ गई है.... निखर गई है....। उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोली- ‘‘तारा मैं क्यों आई हूँ यह तो तुम समझ ही गई होगी.... माँ पिताजी के चले जाने के बाद भइदा और छोटू को देखने वाला तुम्हारे सिवा कोई नहीं है.... मैं चाहती हूँ... तुम जितनी जल्दी हो सके अपना घर दुआर संभाल लो..।’’
    आगे और कब तक बोलती रहती कि तारा ने अपना हाथ छुड़ा लिया.... तीखी आवाज में बोली ‘‘हम तो गांव की अपढ़ गंवार हैं भाई ! शहरी बोल चाल नहीं जानती..... सीधी साफ बात कहते हैं..... सीधी साफ बाते सुनते हैं चाहे किसी को बुरा ही क्यों न लगे..... हाँ....।’’ मैडम जी मैं तो सन्न रह गई.... उसके बोलने में प्रेम तो था ही नहीं..... बल्कि छुपा हुआ तिरस्कार ही था.... थोड़ी देर तक मुझे कुछ सूझा ही नहीं.... तब तक तारा खड़ी हो गई थी बोली- ‘‘मेरे पिता जी गए थे तुम्हारे घर..... वो तो राजी ही हैं पर बिना डांड़भात दिए जात बिरादरी से बाहर लड़की के साथ हम नहीं रह सकते..... आखिर अपने घर-परिवार को तो हमें ही देखना होगा न ? दूसरी बात..... तुम्हारी माँ के तीन नेग जेवर और दो लाली, fपंऊरी साड़ी चढ़ावा में चढ़ाने की बात तुम्हारे पिताजी ने कबूल किया था.....
दो सौ पीठा और बीस किलो चावल भी देना पेड़गा आखिर बिरादरी को एक जून का ज्यौनार तो देना होग..... यदि तुम्हें ये शर्ते कबूल हो तो बोलो....।’’
    मैं सोच रही थी कितनी दुनियादार है मेरी भाभी..... चलो घर-परिवार इसके हाथों सुरक्षित रहेगा.... रही बात मेरी.... तो मुझे तो वैसे भी यहाँ नहीं रहना है....। छोटू के लिए थोड़ी fचंता अवश्य हुई... पर मैं कर भी क्या सकती हूँ.... फिर मरद की जात है.... नहीं होगा.... अपना कमायेगा... खायेगा.... दो-तीन साल बाद उसकी भी शादी हो जायेगी.... एक कुरिया अपने लिए बना लेगा....जमीन अपनी रही तो... कुरिया छाने में.... क्या लगता है। तारा मेरी ओर ही देख रही थी हँसकर उससे बोली- ‘‘ठीक है तुम्हारी शर्तें कबूल हैं....तो तुम्हारे पिताजी से कहकर पंद्रह दिन बाद का लगन निकलवा लेते हैं...तब तक सोग का सवा महीना भी बीत जावेगा....।’’
    तारा ने सोचा नहीं होगा कि मैं इतनी आसानी से बात सुलझा लूंगी, कुछ नरम पड़ी बोली- ‘‘हमारी बात से तुम्हारा दिल दुखा हो तो माफी देना भाई! पर हम क्या करें? गाँव वाले चार आदमी, पंच पंचाइत सभी तो..... यही कहते हैं....।’’ उसके हाथ को थपक कर उसे शांत की ‘‘तारा! लोगों की बात जाने दो..... चलो घर चलें......छोटू रास्ता देख रहा होगा।’’
    भोजली माँ ही फिर आगे आई..... सौ रूपये मेरे पास बचे थे..... इस बार भइदा ने भी सौ रूपये दिए..... फिर भी खर्च पूरा नहीं पड़ रहा था..... क्या करूँ सोच रही थीं कि कान में कोई कीड़ा घुसा सो कान खुजाने हाथ लगाई तो बाली को छू ली..... खुशी से चिहुंक उठी..... मेरी खुशी का कारण भोजली माँ समझ नहीं सकी..... टुकुर-टुकुर मेरी तरफ देखती रही..... तो मैंने कहा- ‘‘भोजली माँ मेरे कान की बालियाँ आधा भरी (तोला) से कुछ ही कम हैं इसे बेच देते हैं..... शादी का बाकी इंतजाम हो जावेगा.....।’’
    भोजली माँ ने मुझे गले लगा लिया पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली- ‘‘कुसुम! तेरा हाथ तो एकदम खाली हो जाएगा बेटी ! दूसरी बात तारा का मिजाज थोड़ा तेज है..... तेरा निभाव उसके साथ होना मुश्किल है..... तू कहाँ जायेगी, क्या करेगी...... गांव का हाल तो जान समझ ही गई....।’’
    पता नहीं मैंने भोजली माँ को संतोश दिया या खुद को..... बोली ‘‘मेरी fचंता मत करो, मैं फिर शहर लौट जाऊँगी.... वहाँ अपना पेट पाल लूँगी..... फिर अब तो यहाँ की fचंता रहेगी नहीं.....।’’ चार पैसे जोड़कर.... नई बाली बनवा लूँगी..... तो भोजली माँ..... जैसे पिताजी का काम काज की वैसे ही भइदा की शादी करवा दो तो मैं निfश्चंत हो जाऊँगी..... आपको बहुत तकलीफ दे रही हूँ..... पर इस बार आखिरी है..... फिर कभी कोई तकलीफ नहीं दूँगी..... गला भर आया मेरा..... अब तक अच्छी तरह समझ गई थी..... इस लंकापुरी में यही त्रिजटा माता है....।
    ज्यादा क्या कहूँ मैडम जी..... गरीबों की शादी.... दो दिन में बहू घर आ गई..... बहुत दिनों के बाद भइदा को खुश देखी.... रही छोटू की तो उसकी समझ में घर गृहस्थी की बातें नहीं आतीं.... वो तो बस इसलिए खुश हो गया कि भाभी आ गई, अब उसे घर के काम नहीं करने पड़ेंगे....।
      दूसरे दिन मैंने भइदा से कहा- ‘‘अब मुझे इजाजत दो..... टिकिट लायक पैसे अभी मेरे पास बचे हैं, रात वाली गाड़ी में बैठूँगी तो दूसरे दिन दस बजे तक पहुँच जाऊंगी.....।’’ आखिर सगा भाई.... वह भी बड़ा..... रो पड़े भइदा- ‘‘मत जा कुसुम.... गजाधर के मुंह से तब सुन लिया हूँ..... बुधराम..... तुझे कहीं का नहीं छोड़ेगा...। थोड़ा धीरज धर जुरमिल कर कमायेंगे.... चार पैसाा होते ही डांड़भात भर देंगे.... फिर सब ठीक हो जावेगाा...।’’
    इस बार मैं चिढ़ गई- ‘‘भइदा जब तुम अपनी आँखों से शहर में मेरा रहना देख आये थे..... फिर गजाधर ने भी बताया ही था तो इतने दिन चुप क्यों रहे..... अपनी बहन का अपमान, जात बाहर का दुख कैसे सहते रहे? बड़े भाई हो बिरादरी के सामने तनकर खड़े क्यों नहीं हुए ? बड़ा भाई बाप बराबर होता है..... जाने दो भइदा..... मेरा मुँह न खुलवाओ.....। हाँ एक बिनती करूँगी छोटू को देखना.... तुम्हारे सिवा अब उसका कोई नहीं है..... मेरे समान उसको भी डांड़भात देने की नौबत मत आने देना.....।
    मन में घुमड़ते बादलों ने बरसना शुरू किया तो बांध ही टूट गया जाने कितनी देर रोती रही..... कि छोटू आया बोला- ‘‘दीदी, तुम अब यहाँ मत आना.... मैं थोड़ा और बड़ा हो जाऊँगा तो शहर आ जाऊँगा फिर हम दोनों भाई-बहन किराये का घर लेकर रहेंगे..... कुछ नहीं तो रिक्शा चला लूँगा.....। तब तक तुम रिक्शा खरीदने के लिए पैसे जमा कर लेना.....।’’
    मैडम जी छोटा भाई.... अब छोटा नहीं रहा..... पिता की तरह, बड़े भाई की तरह उसने संरक्षण का भार ग्रहण कर लिया। सच.... बड़ा सुख मिला..... चलो अभी भी कोई है, जो मेरा ख्याल रखता है सोचकर बड़ी तसल्ली मिली....।
    दीदियों को क्या कहती वे बिचारियाँ अपनी ससुराल की ही होकर रह गई थी फिर भी गाँव वाली दीदी ने रास्ते के लिए रोटी-पीठा बनाकर दिया।
    भोजली माँ ने थोड़ा सा fचंवड़ा और गुड़ दिया..... माथे को चूमकर बोली- ‘‘बेटी ! औरत जात धरती की तरह होती है..... चुप रहकर सब सहती है...... धरती डोल जाये तो..... दुनिया तहस-नहस हो जाएगी.... जा बेटी ! सबको क्षमा करना.... अपने मन में किसी के लिए रोश मत रखना.... नहीं तो तेरी हाय लेकर किसी का कल्याण नहीं होगा.....।’’
    आखिरी बार अपने घर, गाँव को देखी..... समझ गई थी.... अब यहाँ आना नहीं होगा....छोटू के हाथ में दो रूपये रखी तो रो दिया..... ‘‘ नहीं दीदी मैं स्टेशन तक चलूंगा..... तुम्हें गाड़ी में बिठाकर....आऊँगा.....।’’ अपनी साड़ियों में जो सबसे अच्छी थी उसे तारा को दे दी..... भइदा को प्रमाण की..... हम दोनों चुप थे.....। इस बार अकेली थी..... पर डर नहीं लग रहा था..... बहुत हल्का महसूस कर रही थी....।
    दूसरे दिन यहाँ आई तो..... गुलनार की खुशी का ठिकाना नहीं था..... केला लाई थी उसे दी तो बोली- ‘‘खाना वाना बाद में पहले ये बताओ.... अब फिर वापस तो नहीं जाओगी न.....।’’
    बाबूजी ने कुछ नहीं पूछा..... ‘‘कुसुम थक गई होगी नहा धो लो तब तक गुलनार चाय बना लेगी..... बाकी बातें रात को करेंगे......।’’
    मैडम जी मैं अपने घर गई थी....।

                    सत्रह

    पूरे दस साल गुजर गए..... लिखना..... बंद था...... बहुत हुआ तो कोई छोटी- मोटी कविता लिख ली..... तो कभी किसी पत्रिका के लिए छोटा-सा लेख, वह भी विवशता-वश ली..... तो कभी किसी पत्रिका के लिए छोटा-सा लेख, वह भी विवशता-वश..... विवशता इस तरह कि कोई आग्रह करे तो मैं ना नहीं कर सकती.... पर वह लिखना..... मान रखना ही था।
            ‘‘मानियों का यही मनाना है
            मान कर बात, मान रख लेना.....।’’
    इस बार नैनी आया..... हाँ अब वो बड़ा हो गया है..... समझदार भी..... सुबह उसे नाश्ता दी..... तो मुझे भी बिठा लिया बोला- ‘‘माँ! एक बात कहती थी..... पर पहले बता दूँ आपको मेरी बात माननी पड़ेगी.....।’’
    मैंने सोचा- शायद कोई लड़की पसंद आ गई होगी.... चलो अच्छा हुआ.... यह जिम्मेदारी भी पूरी कर दूँ..... सो उत्साह से बोली- ‘‘हाँ-हाँ बोलो बेटा! पर एक शर्त है..... शादी यहीं से करूँगी.....।’’
    अरे ये क्या ? सालों बाद नैनी को खिलखिलाकर हँसते देख रही हूँ..... वरना.... कोई भी खुशी हो डेढ़ इंची मुस्कान में ही लिपट कर रह जाती है..... अकबकाई- सी उसे देख रही थी कि हँसी थामकर बोला- ‘‘माँ..... मेरी इकलौती माँ...... पहले बात तो सुनो..... शादी..... वादी तक बाद में पहुँचना..... फिर हंस पड़ा..... अबकी मैं झुंझला पड़ी -’’पहले हंस ले..... फिर बताना.....।’’ बोल कर बैठ गई।
    मेरे पास आकर नैनी ने मेरा हाथ पकड़ लिया..... बोला- ‘‘माँ ! आप फिर से लिखिये, पहले लिखती थी...... आपकी पुरानी कापी मैं खोजकर निकाल लिया हूँ..... अब तो हम दोनों भाई बाहर रहते हैं आपके अनुसार..... पढ़लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं...... पैसों की fचंता मत कीजिए..... लिखिए...... हम लोग प्रकाशित करवा देंगे..... आपका अकेलापन दूर होगा..... समाज को आपके अध्ययन का लाभ मिलेगा.... लेखन प्रतिभा ईश्वर की देन है हर किसी को नहीं मिलती..... आप इस प्रतिभा का उपयोग कर ईश्वर के दान का सम्मान कीजिए......।’’
    देखने लगी ये वही छोटा-सा नैनी है क्या ? जो मेरी कापी-मेरी पेन लेने के लिए जिद करता था.... न दूँ तो पापा से शिकायत करता था.... कब इतना बड़ा हो गया कि मेरी कापी..... पेन आज मुझे ही पकड़ाने चला है......। पुत्र ने पिता की भूमिका का निर्वाह किया है। पिछले दस साल का वक्त रेत की तरह मेरी बंद मुट्ठी से फिसलता रहा.... मुझे होश ही कहाँ था.... एक ही धुन सवार थी अरूण के सपने को साकार करना है..... बच्चों को डाॅक्टर, इंजीनियर बनाना है..... बस और कुछ सोचने करने की फुरसत ही नहीं थी....। अरूण असमय चले गए..... जाते-जाते कह गए- ‘‘मैडम ! बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देना..... ताकि मनु-नैनी समाज में सिर उठाकर जी सकंे...... मुझे और किसी बात की fचंता नहीं है।’’
    जहाँ डाॅक्टर उनके जीवन की fचंता कर रहे थे..... उनके चोटों की fचंता कर रहे थे.....नात-रिश्तेदार, मित्रगण उनके स्वास्थ्य की fचंता कर रहे थे..... वहाँ अरूण.......बच्चों के भविश्य की fचंता कर रहे थे....।
     हाँ....उनकी fचंता..... सही थी क्योंकि अरूण जब गए मनु-नैनी ने हायर सेकण्डरी भी नहीं किया थी..... मृत्यु ने अरूण को हमसे दूर कर दिया..... सच कहूँ..... मैं ही जीते जी मर गई.... नहीं मरी तो अरूण की fचंता..... जो मेरे मन प्राणों में बस गई थी।
    अपना ध्यान सिर्फ बच्चों में केfन्द्रत कर दिया मैंने...... बच्चों ने भी मेरा साथ दिया..... और दस साल गुजर गए..... इन सालों में.... होली कब आई..... दिवाली कब गुजर..... कुछ भी पता नहीं चला..... जाने कब सुबह हो जाती..... और रात चुपके से आकर थके तन-मन को..... नींद के हवाले कर देती....।
    आँखें भर-भर आ रही थीं..... पहली बात तो खुद पर विश्वास नहीं था कि लिख सकूँगी..... यदि लिख भी लिया..... तो किसे समर्पित करूँगी..... जो मुझे प्रेरणा देते शाबाशी देते..... वो अरूण नहीं हैं, मेरा साहित्य जिसे आनंदित करता वह पिता नहीं रहे, जो मुझे दुलार कर मेरा उत्साहवर्धन करते वे बाबूजी भी चले गए, मेरी पढ़ी-लिखी बहू कहकर गर्व से मुस्कारा देने वाली सास ने भी..... परलोक को अपना घर बना लिया....। इन सालों ने..... कितना कुछ छीन लिया है....। ऊँह.... अभी तो चलूँ बेटा आया है उसके लिए कुछ विशेश बना देती हूँ उसकी पसंद का भरवांभटा, मटर-पनीर की सब्जी..... चावल की खीर भी बना दूँगी.....।
    चार बजे शाम की चाय पीने के बाद नैनी मुझे बुलाकर ले गया, मेरे ही शयनकक्ष की टेबल के पास.......कुर्सी खींचकर मुझे बिठा दिया- बोला- ‘‘अब दो घंटे यहीं बैठिए..... कापी को पढ़िए..... एक दो दिन में फिर लिखने लगेंगी..... मैं बाहर बैठकर टी.वी. देख रहा हूँ....।’’ मेरा उत्तर सुने बिना ही दरवाजा भिड़ाकर चला गया.....। अगत्या पढ़ना शुरू की..... धीरे-धीरे उपन्यास की शक्ल उभरने लगी..... अनायास कलम चलने लगी..... कहाँ तो नैनी ने एक दो दिन का समय दिया था कहाँ दो घंटे में ही लिखना शुरू हो गया.....। हमेशा बड़े ही बच्चों को सीख दें जरूरी नहीं है, बच्चे भी बड़ों को सीख देते हैं फर्क इतना ही है कि बड़े अधिकार पूर्वक डांटते डपटते हैं, छोटे मनुहार करते हैं, जिद करते हैं पर उस जिद में भी उनका प्यार भरा आदेश शामिल होता है।
    काश ! अरूण अपने बच्चों का यह रूप देख पात.....।
    पर मैं ऐसा क्यों सोच रही हूँ? भारतीय दर्शन शास्त्र तो मैंने पढ़ा है.... गीता....पढ़ी हूँ..... शरीर नश्ट होता है आत्मा नहीं..... जीव की अनंतयात्रा का पड़ाव है मृत्यु..... मत्यु जीवन का अंत कदापि नहीं है.....। शास्त्र की बातें छोड़ भी दूँ तो- यह तो मानना पड़ेगा ही कि अरूण आज भी मेरी सोच में..... मेरे मन में हैं..... हमेशा रहेंगे...... यादें तो कोई छीन नहीं सकता..... हमारे जीवन का अविच्छिन्न अंश है हमारा अतीत..... यह अतीत आजन्म हमारे साथ रहता है..... वर्तमान पर ही नहीं भविश्य पर भी अपना प्रभाव डालता है।
    यही देखूं न..... मनु की शादी की..... सगे-संबंधियों की भीड़ में, रस्मो-रिवाजों को पूरा करते समय अथवा शहनाई की धुनों के बीच भी अरूण एक पल के लिए भी ओझल नहीं हुए..... कोई और माने न माने उनकी उपस्थिति का भान हर पल मुझे होता रहा था....।
   
    दस दिन बीत गए, आज नैनी जा रहा है..... मुंबई से परसों की फ्लाइट लेगा.....। उसके जाने की तैयारी में व्यस्त हूँ...... कुछ मीठा, थोड़ा सा नमकीन..... तो और भी छोटी- मोटी चीजें.... रखनें संभालने में लगी थी कि नैनी आया- ‘‘माँ आपके लिए दो नई पेन और दो मोटी कापियाँ ले आया हूँ.... अब लगातार लिखिएगा.... और हाँ माँ..... कविता लिखिए मना नहीं करता..... पर माँ आपका गद्य-लेखन अच्छा है, आपकी भाशा, आपकी वर्णन शैली अनूठी है इस आप उपन्यास लिखित.....।’’ बाप रे..... ये लड़का तो ही पड़ गया है..... उसकी ओर देखी..... हाथ में बण्डल थामे खड़ा था कितना तो लंबा हो गया है सिर उठाकर उसे देखना पड़ता है तो देखी,.... गंभीर, निर्मल दृश्टि-मुस्कराते आंेठ..... तुरन्त नजरें हटा ली, कहीं मेरी ही नजर न लग जाये बच्चे को। माँ हूँ न..... बुरी नजर से डरती हूँ। भगवान से प्रार्थना की- ‘‘प्रभु मेरे दोनों बच्चों को स्वस्थ रखना, दोनों के तन, मन, धनख् मान और जीवन की रक्षा करना, उन्हें सन्मार्ग पर ले चलना.....।’’

                    अट्ठारह

    जनवरी के दो दिन और बाकी हैं, नए साल का पहला महीना..... जिसने मेरे जीवन को नया आयाम दिया है..... आप बीती को जगबीती के साथ जोड़कर प्रस्तुत करने का.....। उम्र के इस मोड़ पर आकर एक बार पीछे पलटकर देखने का समय आ गया है.... हर आदमी के जीवन में यह समय आता है, फर्क सिर्फ इतना है कि लेखक अपनी अनूभूतियों को शब्दों में ढ़ालकर लोगों के सामने रख पाता है....।
    नैनी दो बजे वाली गाड़ी से चला गया......। इस बार मैं रोई नहीं..... समझ गई..... यही नियति है.... माँ बच्चे को पाल पोंसकर बड़ाकर करती है..... जीवन समर में जूझने के लिए विजय पाने के लिए विदा करती है.....। मैं नहीं चाहती मनु या नैनी मेरे अकेलेपन के बोझ से दब जावें..... अपना जीवन मैंने जी लिया..... अब उनकी बारी है.... स्वच्छंद होकर अनंत आकाश में विचरण करें.....। मैं इस बाल्कनी में बैठी- उन्हें निहारूँ.... उनकी सफलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँ.... बच्चों को याद रहे कि माँ उनकी प्रतीक्षा कर रही है..... माँ उनके लिए प्रार्थना कर रही है.....। बादलों की छांव में छिप गई है सूरज की किरणें.... लगता है आस-पास कहीं वारिश कहीं वारिश हुई है, हवा से माटी की सोंधी गंध आ रही है.....। प्रकृति का यह भीगा-भीगा रूप बड़ा मोहक होता है ऐसे में चुपचाप बैठे रहना अच्छा लगता है.... फोन की घंटी ने.... ध्यान आर्शित किया.....।
    ‘‘हलो माँ..... आपकी उदासी बादल बनकर मुंबई के आकाश में छाने लगी है...... बरसना बाकी है..... हो-हो..... हँसी....।’’
    दुश्ट लड़का है ये मनु..... अपनी बातों से पल भर में उदासी दूर कर देता है खिलंदड़ा स्वभाव अभी गया नहीं है..... पता नहीं इतनी जिम्मेदारी वाली नौकरी करता कैसे है....?
    अँग्रेजी में एक शब्द है हतवनदक बनसजनम सटीक हिन्दी क्या होगी नहीं जानती, भाव यह कि खेल के मैदान में हार-जीत का सामना करते-करते खिलाड़ी..... जीवन के सुख-दुख को भी सहजता से स्वीकर करना सीख जाता है..... इसके पीछे अभ्यास का बहुत बड़ा हाथ होता है।
    तभी तो ‘‘योगः कर्मसु कौशलम्.....? कहते हैं.....।’’ हलो माँ..... मैं मनु बोल रहा हूँ.... आप लाइन पर हैं न.....? ‘‘आवाज आते ही मैं आपे में आई हँसकर बोली- ‘‘सुन भी रही हूँ, गुन भी रही हूँ..... कि शुद्ध गणित वाला लड़का इतनी साहित्यिक बातें कैसे कर लेता है.....।’’
    ‘‘हूँ...... माँ..... पापाजी ने गणित के प्रति सम्मान पैदा किया, ठीक है पर कहीं न कहीं उस सम्मान में जोर जबरदस्ती भी शामिल थी,...... पर आपने जो चुपचाप रहकर भाशा का, साहित्य का ज्ञान दिया उसने सोने में सुहागे का काम किया, आज जिस च्वेज पर मैं हूँ उसके लिए भाशा वरदान है माँ.....।’’ और भी कुछ कह रहा था मनु..... पर अंधड़ चलने लगी, फोन लाइन कट गई..... रिसीकर मैं फिर बाल्कनी में आ गई.....।
बच्चे कहते है बाल्कनी माँ का शांति निकेतन है..... ठीक ही कहते हैं..... यह एकान्त..... मेरे लिए जरूरी भी है, प्रिय भी है.....। यहाँ बैठकर प्रिय पुस्तकों का अध्ययन..... बड़ी शांति देता है..... समय कब बीत जाता है..... पता ही नहीं चलता हाँ.....कृतज्ञ हूँ..... कि ईश्वर ने अध्ययन के प्रति अतिरिक्त आकर्शण दिया है..... विशेशकर बंगला- साहित्य के प्रति..... मेरा झुकाव लोगों को प्रश्न करने पर विवश कर देता है कि..... ‘‘हिन्दी भाशी होकर भी बंगला के मोह में कब और कैसे पड़ गई.....?’’
    लंबी कहानी है इसे छोड़ ही दें तो ठीक है.... इतना अवश्य कहूँगी कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर से ज्यादा प्रिय शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय हैं..... विभूति भूशण भी कम आकर्शक नहीं हैं। आशापूर्णा देवी की बकुल कथा हो या अग्नि परीक्षा.... हर बार नई लगती है। महाश्वेता देवी का संथाल प्रेम अनुकरणीय है तो बुद्धदेव गुह..... शंकर और जरासंघ का साहित्य..... पूरी रात इस शांति निकेतन में गुजार देने को विवश कर देता है।
    दीवाली की खरीददारी में कटौती करनी भी पड़े तो कोई बात नहीं..... ‘देश’ का शारदीय विशेशांक खरीदना मैं कभी नहीं भूलती....। ओह....फोन.... अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है.... अच्छा भला मौन हो गया था.... इतनी जल्दी क्या थी राग मल्हार गाने की ?.... भुनभुनाती हुई रिसीवर उठाई.... ‘‘हलो.... सुनते ही मन प्रसन्न हो गया....’’ फोन देवाय नमः कहने का मन हुआ.... उस तरफ माँ थी, पूछ रही हैं नैनी चला गया तो.... रोने तो नहीं बैठ गयी... खाना खाई हूँ.... या नहीं....?’’
    हँसी आ गई पचास साल की बूढ़ी बेटी को हिदायतें दे रही हैं पचहत्तर साल की बूढ़ी माँ....। सोचने लगी माँ तो माँ होती है.... न बूढ़ी... न जवान...मातृत्व तो भावना है और भावना की उम्र नहीं होती... वह तो कम... या ज्यादा भी नहीं होती...।
    ‘‘हलो बेटा... सुन रही हो न...।’’ माँ की आवाज आई उन्हें आश्वस्त करने के लिए बोली.... ‘‘हाँ माँ सुन रही हूँ... खाना भी खाई हूँ..... आप fचंता मत करिए..... बच्चों केा विदा करने की तो अब आदत पड़ गई... आखिर पाँच साल हो गए....।’’
    माँ को अपनी बात कहने की जल्दी थी सो बोली- ‘‘बेटा मैं एकादशी का उद्यापन जगन्नाथ धाम में करना चाहती हूँ.... सुबोध आया था वे लोग होली के समय पुरी रहे हैं.... तुम्हारे भाई लोग मुझे जाने नहीं दे रहे हैं..... तुम अपने भाइयों को समझाओ.... अब मैं एकादशी व्रत का पालन ठीक से नहीं कर पाती शरीर दिनोंदिन कमजोर होता जा रहा है.... बिना उद्यापन किए मर गई तो..... एकादशी का फल अधूरा हो जाएगा..... तुम्हारी बात कोई नहीं टालेगा.....।’’
    माँ को आश्वस्त की..... मेरा आश्वासन पाकर उन्होंने फोन रख दिया.....।
    मन में एक नई सोच पैदा हो गई..... माताजी (सास) भी एकादशी..... उद्यापन के लिए व्याकुल थीं.....। ऐसा नहीं है कि मैं एकादशी-व्रत पालन नहीं करती.... पर अंधश्रद्धा नहीं है.... उद्यापन के लिए पुरी जाना भी जरूरी नहीं समझती..... पूजा तो पूजा है.... कहीं भी रहकर करो..... भगवान तो सर्वव्यापी हैं..... फिर बिना उद्यापन किए व्रत का फल नहीं मिलेगा क्यों भाई ? हमारा जमा-जथा किसी और के खाते में क्यों जुड़ेगा.....? भगवान..... रोकड़बही लिखने में सिद्ध हस्त हैं.... उनको और कोई काम तो है नहीं......? दूसरी बात यह भी कि..... 
       
    इस जीवन में जो पाया, खोया, लिया, दिया वो पर्याप्त है..... परजन्म के लिए इतनी fचंता क्यों..... यह कोई ‘‘फिक्सड डिपाजिट’’ है क्या.....? धर्म- धारण करने को होता है..... लेन-देन करने या व्यापार करने को नहीं..... आध्यात्म..... अन्तर्यात्रा के लिए होता है..... तीर्थ यात्रा के लिए नहीं.....।
    मेरी बातों से माँ को तो समझाया जा नहीं सकता..... उन्होंने ठान लिया है तो पुरी जायेंगी.....ही....भाइयों को ही समझाऊँ....।
    फोन पर छोटा भाई था बोला- ‘‘दीदी ! माँ समझ नहीं रही है मार्च में बच्चों की परीक्षा है इसलिए हम लोगों में से कोई उनके साथ जा नहीं सकेगा, उनका शरीर बहुत कमजोर और अशक्त हो गया है, सुबोध भाई के भरोसे कैसे भेजें? कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गया तो बिचारे सुबोध भाई परेशान हो जायेंगे.....।’’ उसकी बातों से सहमत तो मैं भी थी..... पर हमारी माँ जननी को कौन समझाए ? बोली- ‘‘भाई ! इस उम्र मंे उनकी बात न मानकर हम उन्हें दुख ही देंगे..... उनके अपने विचार हैं, अपनी मान्यताएँ हैं, जो वे इस उम्र में बदल तो सकती नहीं..... हमें ही कुछ व्यवस्था करनी होगी.....।’’ बातचीत करके हमने तय किया कि मैं भी माँ के साथ जगन्नाथ पुरी जाऊँगी.... मेरा भी एकादशी उद्यापन हो जायेगा, माँ की भी देखभाल हो जाएगी.....।
    मार्च के प्रथम सप्ताह में जिस दिन एकादशी पड़ेगी उससे पहले वाले दिन हमें पुरी पहुँचना होगा। भाई बिलासपुर से दो टिकिटों का आरक्षण करवा देगा....। उत्कल एक्सप्रेस ही ठीक रहेगा....। पुरी में हमारे पारिवारिक पंडा हैं श्री रघुनाथ fसंगारी उन्हीं से पूजा-पाठ करवा लेंगे....वहीं ठहरने की व्यवस्था भी तो जावेगी....।
    इतिहास जब पुनरावृत होता है तो अतीत मूर्तिमान वर्तमान बन जाता है.....। भूली-बिसरी घटनाएँ चलचित्र की तरह आँखों के समाने आने लगती हैं। तब के जाने में और अब के जाने में कितना अंदर है....बच्चे....अरूण.....माताजी, बाबूजी, भरा-पूरा परिवार.....लेकर गई थी....हाँ इतनी समानता है कि तब सास थी आज माँ है....। एकादशी उद्यापन ही तब भी उद्देश्य था आज भी है.....।
    पता नहीं.... मेरी आँखें बरस पड़ीं थी.... या आकाश बरसने लगा था.... मेघाच्छन्न तो दोनों ही थे.... मेरा मन भी और आकाश.....।
    जानती हूँ आज नींद तो ओयगी नहीं....नैनी का बताया उपाय कारगर लगा..... कमरे में आ लिखने बैठ गई.....।
   

                    उन्नीस
    आदमी हमेशा दूसरों से ही नहीं हारता खुद से भी हारता है, और फिर हार तो हार है चाहे जिससे हारंे....खीझ, झुंझलाहट, आत्मग्लानि, अवमानना तो भुगतनी ही पड़ती है। खुद से हारना इसलिए भी ज्यादा घातक है क्योंकि आदमी दूसरों से जूझकर जान बचा सकता है खुद से भाग कर कहाँ जावेगा ?
    मजे की बात ये है कि यह हार आदमी खुद चुनता है नहीं समझे अरे भाई! व्यसन....आदत.... कुटेव से हार। में भुक्तभोगी हूँ पान की शौकीन थी कभी-अब वही पान जी का जंजाल बन गई है, हजार कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं। रोज रात को निश्चय करती हूँ, बहुत हो गया अब कल से पान बंद.... सुबह हुई कि फिर पान.... चलिए पान पुराण बंद करके पानवाली का इतिहास बखानें.... डरिए मत समाप्त प्राय है कुसुम कथा....।
    इस बार महीने भर बाद आई है कुसुम। बीमार थी.... दवा दारू.... गुलनार ने ही करवाया। ‘‘बेटा आया था न मैडम जी इसलिए नहीं आई....।’’ कहकर कुसुम बैठ गई।
    तबीयत के बारे में पूछी, असल बात यह है कि मैं भूल नहीं पा रही थी कि कोई स्त्री बिन ब्याहे पत्नी कैसे बन सकती है? ज्यादा देर तक इंतजार नहीं करना पड़ा कुसुम ने शुरू कर दिया- ‘‘हाँ तो मैडम जी यहाँ आकर फिर गुलनार की देखरेख में समय गुजरने लगा.... काम वाली बाई लग जाने के कारण मुझे भी समय मिल जाता था..... गुलनार की किताबें पढ़ने लगी....पर भगवान की तो मुझसे कभी पटी ही नहीं....मेरा सुख....मेरा चैन भगवान की नींद उड़ा देता होगा। बाबूजी ने बिस्तर पकड़ लिया.... महीने भर में उनकी पुरानी बीमारी उभर आई थी.... इस बार तो खांसी, बुखार के साथ, दम फूलने लगा था, कफ इतना बनने लगा था कि गले से घड़-घड़ की आवाज आती थी। गुमटी में बैठना कठिन हो गया..... मेरे न रहने पर चाय बननी तो बंद हो ही गई थी.... ग्राहकों की कमी ने अपना असर दिखाना शुरू कर ही था कि बाबूजी की बीमारी ने रही-सही कसर पूरी कर दी.....।
    आखिरकार बाबूजी से कह सुनकर मैं ही गुमटी में बैठने लगी....चार पैसे आने शुरू तो हुए.... पर बाबूजी ने जिद पकड़ लिया कि बड़ पेड़ की छाया में उनकी खटिया डाल दूँ.... कमरे में बंद रहते उनका दम घुटता है.... आते-जाते लोगों से चार बातें कर उनका मन बहलेगा.... दुकानदारी की ऊँच-नीच भी देखते रहेंगे।’’
    मैं समझ गई बाबूजी कुसुम को बुरी नजर से बचाना चाहते थे..... बुधराम वाली घटना दुबारा न घटे इसलिए..... कुसुम का अभिभावक बन गए....। ठीक भी था कुसुम अब जवान हो गई थी..... दुनिया वाले अकेली, जवान लड़की.... वह भी पान की गुमटी पर बैठने वाली श्रद्धा के फूल तो चढ़ाते नहीं..... अलबत्ता लाल गुलाब भेंट करने वालों की कमी नहीं थी..... बात यहीं तक रहती तो भी... कुसुम चला लेती....पान रंगे ओठों में दबी सिगरेट का धुंआ.... कुसुम पर ही छोड़कर..... मोंगरे की माला पेश करने वालों की संख्या शाम ढलने के साथ बढ़ने लगती थी....। कुसुम के लिए यह अवमानना नयी नहीं थी पर इस तरह के कुत्सित इशारों से उसका शरीर मन दोनों सुलग उठते....।
    मेरी कल्पना को थाम कर कुसुम में आगे कहना शुरू किया.... ‘‘मुसीबतों ने मेरा पीछा करना छोड़ा नहीं था मैडम जी! बाबूजी की बामारी जाने का नाम नहीं ले रही थी....गुलनार को पढ़ने में कोई मदद नहीं कर पा रही थी परिणाम वही हुआ, जिसका मुझे डर था अर्धवार्शिक परीक्षा में गुलनार फेल हो गई.... हम दोनों रो पड़ीं तो बाबूजी ने समझाया रोने से बात नहीं बनतीं, बात बनाने का उपाय यही है कि अभी वार्शिक परीक्षा होने में चार महीने की देर है.... तुम दोनांे सुबह जल्दी उठा करो..... ताकि गुमटी खोलने से पहले गुलनार की पढ़ाई पूरी हो जावे....। बाबूजी का कहना हम दोनों ने माना..... कुछ दिन ठीक चला कि.... एक दिन दोपहार लगभग बाराह बजे..... दो सिपाही आये.... मुझसे पूछने लगे- ‘‘दुकान किसकी है? पान, बीड़ी, तंबाखू का लाइसेंस दिखाना पड़ेगा.....।’’ दूसरे सिपाही ने टोपी उतारकर हवा करते हुए- कहा ‘‘पान-चाय पानी तो ठीक है..... ये बताओ इसके सिवाय और..... कुछ मिलेगा.... डरो नहीं..... हम सरकारी आदमी हैं इसका लाइसेंस नहीं देखेंगे....।’’
    मैडम जी ऐसा लगा गंदी नाली के बदबूदार पानी ने सिर से पैर तक मुझे सराबोर कर दिया.... उबकाई आने को हुई.... बाबूजी की ओर देखा.... भगवान की दया से उन्हें झपकी आ गई थी..... सुने नहीं कुछ भी.....। कितनी गलत सोच थी मेरी यह भी तुरन्त समझ में आ गया.....। पहले सिपाही ने घुड़की दी- ‘‘हमारे पास फालतू टाइम नहीं है..... लाइसेंस दिखाओ.... थाने में तुम्हारे गुमटी की शिकायत की गई है कि यहाँ गांजा मिलता है..... कौन जाने..... कहीं बोतल वोतल भी छिपी हुई हो.....।’’
    अब की बार बाबूजी..... ने कहा- ‘‘सलाम साहब जी..... आपकी ही दुकान है.... आपकी दया से चार पैसा कमाकर पेट पालते हैं..... सब झूठ बात है चाय-पान- सिगरेट छोड़कर यहाँ और कुछ नहीं बिकता....।’’ ....ठीक है..... लाइसेंस दिखाओ बोतले हुए सिपाही बाबूजी की खटिया की ओर बढ़ गए.....।
     हाथ जोड़कर बाबूजी बोले- ‘‘साहब, लाइसेंस का कागज तो पेटी में रखा है पर चाबी लेकर लड़की गुलनार स्कूल चली गई है हूजूर! थोड़ा वक्त दीजिए..... रहम कीजिए बीमार आदमी हूँ..... स्कूल तक जाकर लड़की के पास से चाबी लाने की ताकत नहीं है.....।’’
     तब तक मैं दो पान बना चुकी थी गिलास तो दोनों सिपाहियों को दे ही चुकी थी..... हाथ बढ़ाकर पान पकड़ाने ही वाली थी कि बाबूजी ने ख्ंाखार कर कहा- ‘‘कुलसुम..... साहब लोगों को तश्तरी में रखकर पान पेश करते हैं..... उमर बढ़ती जा रही है पर अकल अभी तक नहीं आई.....।’’
    मैडम जी..... मैं तो जैसे आसमान से गिर पड़ी...... तश्तरी में तो कभी किसी को पान दिया नहीं...... फिर मुझे कुलसुम क्यों कहा बाबूजी ने.....? सबसे बड़ी बात वे तो कभी झूठ नहीं बोलते..... आज चाबी वाली बात जो कहे वह तो सरासर झूठ है..... गुलनार के पास तो उसके साइकिल की चाबी छोड़कर कोई दूसरी चाबी नहीं है।
    सिर घूमने लगा..... सिपाही लोग.... ठीक है.... कल इसी समय आयेंगे कहकर चले गए....।
    बाबूजी ....थक गए थे पसीने से नहा गए थे.... हांफते हुए खटिया में पड़ गए.....आँखों से दो बूंद आँसू लुढ़क पड़े....।
    खटिया के बाजू में बैठकर मैंने बाबूजी के माथे से पसीना पोंछा..... बची चाय को गरम करके...... उन्हें पिलाई, सांस कुछ थमी.... तो पूछी- ‘‘आपकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई है क्या ? रिक्शा बुलाऊँ डाॅक्टर के पास जावेगें....? बाबूजी ने सिर हिलाकर मना किया हाथ उठाकर इशारा किए कि गुमटी बंदकर उन्हें कमरे में ले चलूँ, घबरा गई थी मैं..... हाँ इतना अवश्य समझ गई थी..... कि बाबूजी सिपाहियों से कोई बात छिपा रहे थे.... वो कौन-सी बात थी यह तो मैं नहीं जानती थी.....पर उम्र कम होने से क्या हुआ....? परेशानियाँ झेलते-झेलते मैं असमय ही अतिरिक्त सयानी हो गई थी।
    बाबूजी को सहारा देकर कमरे में ले आई.... पीठ के पास तकिया लगाकर बिठाकर दी..... अब तक वे कुछ ठीक लगने लगे थे। मुझे अपने पास बुलाए..... तकिए के नीचे से चाबी का गुच्छा निकाल कर दिए..... आले पर रखी पेटी की ओर इशारा समझ गई ताला खोलने को कह रहे हैं.....।
    आले से पेटी उतार कर बाबूजी की खटिया के पास ले आई बड़ी मुश्किल से जंग लगा ताला खुला..... पेटी का ढक्कन खोलते ही पुराने कपड़ों और डामर गोली की भभक से कमरा भर गया। इस बार देखी-कुछ पुरानी साड़ियाँ..... पुराने फैशन के ब्लाउज के साथ रखी थीं.... ज्यादा नहीं पांचेंक साड़ियाँ थीं उन्हें निकालकर जमीन पर रखती गई तले में कपड़े की सिली थैली निकली.....। बाबूजी ने इशारे से थैली खोलने को कहा- ‘‘हाथ कांपने लगे पता नहीं क्या है थैली में.... हाँ इतना समझ में आ गया था कि पेटी गुलनार की माँ की होगी तभी तो साड़ी ब्लाउज रखे हैं..... पीला पड़ गया कागज जतन से प्लास्टिक थैले में रखा था.... निकाल ली..... बाबूजी ने फिर इशारा किया पढ़ो.....। लाइसेंस ही था..... हे भगवान ये क्या लिखा है.... गुमटी और लाइसेंस कुलसुम बेगम के नाम था.... बुद्धि चकरा गई..... ओह! बाबूजी ने मुझे कुलसुम क्यों कहा ? सिपाहियों के सामने मुझे कुसुम नाम से क्यों नहीं पुकारा... सारे प्रश्न.....जीवित हो गए.....। उत्तर पाने बाबूजी की ओर देखी..... उनके चेहरे पर पीड़ा की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं..... अपने एक हाथ से उन्होंने अपनी ही छाती को सहलाना शुरू किया.... पेटी खुली छोड़कर मैं उनके पास गई..... एक गिलास पानी और दवाई की गोली लाकर उन्हें दी..... धीरे-धीरे वे शांत हो गए....।
    तकरीबन आधे घंटे की चुप्पी के बाद कांपती आवाज में बोले- ‘‘कुसुम मुझे गलत मत समझना..... गुमटी से ही हम तीनों का पेट चलता है..... ऐसे में कुलसुम बेगम नहीं है तो लाइसेंस जब्त हो जायेगा.....सोचो.... हम तीनों का क्या हाल होगा...? मेरी तबीयत अब संभलने वाली नहीं ही मौत का घंटा बज गया है..... अब सांसें उखड़ने में ज्यादा देर नहीं है।’’ हांफने लगे बाबूजी.... थोड़ी देर लगी सांसों को संभालने में..... रही मैं..... तो कुछ न पूछिए मैडम जी- कहीं बाबूजी को कुछ हो गया तो.... मैं कहाँ जाऊंगी..... फिर गुलनार का क्या होगा ? अपने जीवन में मृत्यु को साक्षात् देखने का अवसर तो इससे पहले कभी मिली नहीं था..... फिर भी मेरा मन आशंका से कांप रहा था..... लगा बाबूजी के पीछे कोई खड़ा है जो दिखाई तो नहीं दे रहा है उसकी छाया अवश्य बाबूजी पर पड़ रही है..... कमरे की हवा भारी लगने लगी थी....।
बाबूजी फिर बोलने लगे- ‘‘कुसुम..... मेरे बाद गुलनार का इस दुनिया में कोई नहीं है..... तुम उसे देखना..... मैं जानता हूँ तुम्हारा भी कोई नहीं है..... तुम दोनों का गुजारा इस गुमटी से ही चलेगा इसलिए तुमसे दरख्वास्त करता हूँ कि तुम अब अपना नाम कुलसुम बेगम ही बताना..... कल जब सिपाही लाइसेंस देखने आयेंगे तो मैं तुम्हें कुलसुम बेगम के रूप में पेश करूँगा..... इस नाम को कुबूल कर लो..... ये नाम ही तुम्हारी और गुलनार की हिफाजत करेगा....। भूल जाओ कुसुम को..... जो नाम तुम्हारी हिफाजत न कर सके, दो वक्त की रोटी न दे सके उसे ढोते रहने से क्या फायदा.....?’’
    बाबूजी थककर चुप हो गए..... आँखें बंद कर लेट गए.... अब फैसला मुझे करना था..... कुसुम के मिटे बिना कुलसुम की गुमटी नहीं बच सकती.... यदि गुमटी चली गई तो हमसें से कोई नहीं बचेगा....। विपत्ति के दिनों में बाबूजी ने शरण दी, मेरी-मेरे इज्जत की रखवाली पिता की तरह करते रहे हैं। आज उनकी बेटी के भविश्य का भयाचह प्रश्न उपस्थित है..... बोटी-बोटी नोंच खाने वाले भेड़ियों की कमी न कुसुम के लिए कम थी न गुलनार के लिए कम होगी.....।
    जीवन..... का किया वायदा तो हवा के झोंके की तरह था.... फिर कभी उससे भेंट होगी इसकी भी आशा नहीं है..... गाँव के दरवाजे..... गलियाँ पहले ही बंद हो चुके थे.....।
    मैडम जी..... मैं फिर से आत्महत्या का रास्ता चुन भी लेती..... पर गुलनार को कौन देखेगा? जितने दिन बाबूजी हैं इस बीमार-बूढें शरीर के साथ वे कहाँ जायेंगे?
सोचते-सोचते सिर फटने लगा..... गला सूख गया.... छाती में किसी भारी पत्थर के रखे जाने का दबाव महसूस करने लगी.... तो जीने का यह रास्ता अपना लिया.... कुसुम को उसी भारी पत्थर के नीचे अपनी ही छाती में दबा दिया.....।
    दूसरे दिन सिपाही आये उनसे बोली मैं कुलसुम बेगम हूँ.... लाइसेंस उन लोगों को बाबूजी ने दिखा दिया.... गुलनार स्कूल गई थी उसे पता नहीं चला.... आठवें दिन बाबूजी चल बसे।
    धीरे-धीरे लोग गुलनार की माँ कहने लगे। लाइसेंस का नवीनीकरण करवा ली.....। गुलनार को मैट्रिक तक पढ़ाई फिर उसकी शादी कर दी, घर जमाई ढूँढ़कर ही शादी की ताकि नाती-नातिन के साथ बाकी जीवन काट दूँ..... बस इतनी सी तो कहानी है....।


                        बीस

    मार्च का प्रथम सप्ताह है..... धरती पर वसं त उतरा है..... अकेला तो कभी आता नहीं.... पूरे दल-बल के साथ आता है। भिलाई से बिलासपुर, फिर वहाँ से पुरी स्टेशन तक की यात्रा में इसका प्रमाण मिलता रहा..... बेशक दूर से दिखता रहा। मनुश्य का स्वभाव है जितना दिखता है उसमें अपनी कल्पना और पूर्वानुभूतियों का मिश्रण करके मनोनुकूल विचारों का चादर ओढ़ लेता है।
सुबह ग्यारह बजे उत्कल एक्सप्रेस पुरी स्टेशन पहुँची.... धूप में तेजी तो नहीं थी पर गर्मी का अहसास होने लगा था। कुली की सहायता लेनी पड़ी क्योंकि सामान के साथ माँ को भी उतारना था। इधर-उधर देख ही रही थी कि सफेद धोती और उत्तरीय में गौर वर्ण, सुदर्शन युवक पास आया..... उम्र होगी 28-30 के आस-पास.... विनम्रतापूर्वक बोला- ‘‘आप लोग भिलाई से आ रही हैं क्या ?’’ मेरे द्वारा हाँ में सिर हिला देने पर बोला- ‘‘क्षमा करें थोड़ी देर हो गई-मुझे fसंगारी जी ने भेजा है.... आइए गाड़ी लेकर ही आया हूँ....।’’
    युवक की विनम्रता से प्रभावित हुई..... यह कहने में संकोच हुआ कि हमने ‘परिचय लाज’ में कमरा बुक करवा लिया है.... ऐसा लगा कि आतिथेय का असम्मान कर रही हूँ पर विवश थी.... मेरे ज्येश्ठ पुत्र का आदेश था..... धर्मशाला वगैरह में ठहरने की जरूरत नहीं है वहाँ आप लोगों जैसी उम्र दराज लोगों को पूरा सुविधा नहीं मिल पायेगी..... बात जबानी जमा खर्च की होती तो भी टाल जाती..... ‘परिचय’ में कमरा भी उसने मुंबई से ही बुक करवा दिया था....। सुबोध भाई ने अर्थ को महत्व दिया और युवक के साथ चलने को राजी हो गए..... बड़ी असमंजस की स्थिति थी यथासंभव विनम्रता पूर्वक मैंने क्षमा मांगी उन्हें बताया कि हमें ‘परिचय लाॅज में ठहरना है..... यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बिना हिचक के उसने उत्तर दिया... ‘‘ठीक है मैडम वहाँ आपको सुविधाएँ मिलेंगी तो ऐसा करता हूँ आप लोगों को वहीं छोड़ देता हूँ वहाँ के मैनेजर से मेरी जान पहचान है, उनसे आपका परिचय करवा दूँगा ताकि अन्य कोई पंडा आकर आप लोगों को अकारण विरक्त न करे....।’’
    युवक की वाक्चातुरी पर मुग्ध हो गई इतनी कम में कितना व्यवसाय- कुशल है..... कहीं हम कोई दूसरा पंडा न कर लें.... इसकी व्यवस्था उसने कर ली.....। व्यर्थ ही लोग प्रबंधन का कोर्स करते हैं..... पूजा पाठ में भी व्यवसायीकरण ने दखल जमा लिया है..... चलो-अच्छी बात है आखिर पंडों का भरण-पोशण इसी पर तो निर्भर करता है।
    ‘परिचय लाॅज’ का मैनेजर जो मालिक भी था लगभग उसी उम्र का होगा या शायद दो चार साल बड़ा होगा..... बड़ी आत्मीयता से मिला.... परिचय हुआ.... कमरा नं. 06 हमारे लिए था, माँ को चढ़ने उतरने की तकलीफ से बचाने के लिए ही मनु ने ग्राउण्ड फ्लोर का कमरा बुक करवा दिया था.... अच्छा लगा....। कमरे तक युवक छोड़ने आया, जाते समय बोला- ‘‘मेरा नाम रविशंकर मिश्रा है- अभी आप लोग आराम कीजिए-शाम को हाजिर होऊँगा..... तब समुद्र दर्शन को चलेंगे, वहाँ आप लोग पुरी का प्रसिद्ध नयनाभिराम सूर्यास्त देख सकेंगी.....।’’
    माँ नहाने चली गई तो मैंने सामान व्यवस्थित करके चाय का आदेश दे दिया....। नहाधोकर चाय पीते हुए खिड़की के बाहर नजर गई..... अरे वाह ! समुद्र तो दिखाई दे रहा है मतलब यह कि सुबह शाम हम सागर तट पर घूम सकेंगे.....। माँ थक गई थी, लेट गई मैं साथ लाया अखबार देखने लगी आँख लग गई थी..... दरवाजे की घंटी बजी तो..... देखी श्यामवर्णी किशोर उम्र होगी पंद्रह-सोलह साल की दरवाजे पर खड़ा था- नमस्ते करके पूछा- ‘‘मैडम खाना यहीं खायेंगी या बाहर जायेंगी.....।’’
धूप तेज होने लगी थी अतः माँ की ओर देखकर उत्तर दी- ‘‘यही खायेंगे पर हम निरामिश-भोजी हैं।’’ इस बार मुस्कुरा दिया किशोर..... उज्जवल दंत पंक्ति की चमक उसकी आँखों में भी छा गई बोला- ‘‘मैडम हमारे होटल में निरामिश भोजन ही मिलता है - यहाँ तक कि अंडा भी कहाँ नहीं आता। हाँ इतना और बताइए कि भोजन कमरे में ही लाऊँ या हाॅल में चलेंगी.....।’’
    कमरे में ही लाने का आदेश दिया मैंने..... जाने से पहले मुड़ते-मुड़ते रूककर उसने कहा- ‘‘मैडम मेरा नाम मुकुंद है.....किसी चीज की जरूरत हो तो पलंग के पास लगा काला बटन दबा दीजिएगा मैं हाजिर हो जाऊँगा....।’’
    सोचने लगी इस सांवले किशोर का मुकुंद नाम किसने रखा होगा कितना सटीक नाम है.....।
    पिछली बार अरूण ने सी साइड इन में दो कमरे बुक कराए थे..... वह भी समुद्र तट पर ही था..... अब तो यहाँ चारों तरफ इमारतें ही इमारतें हैं..... जरूर यही कहीं होगा....शाम को देखूंगी..... और देखकर क्या करूँगी ? नहीं..... कुछ भी याद नहीं करूँगीं, माँ को मेरी मनःस्थिति का पता न चले तभी ठीक होगा..... बड़े उत्साह से आई हैं, बच्चों जैसी उत्सुकता से चारों तरफ देखती हैं...... भीड़ में मेरा हाथ पकड़ लेती हैं ठीक उसी तरह जिस तरह कोई छोटी बच्ची माँ का हाथ थाम निfश्चंत हो जाती है। प्रेमचंद ने लिखा है- बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है।’’ कितना सही है.....। माँ मुझ पर कितना निर्भर हो गई हैं, अभी नहाने जाते समय बोल रही थीं कि उनके लिए कपड़े निकाल दूँ....। खाने में दो सब्जी भले न हो रायता जरूर मंगाऊँ..... मीठा दही मिले तो और अच्छा है। बढ़ती उम्र में रिश्ता बदल जाता है क्या ? कभी वो मेरी माँ थी आज मैं ही माँ हूँ..... अपने बच्चों की माँ के साथ ही अपने बच्चों की माँ के साथ ही अपनी माँ की भी माँ.....। ममता, संरक्षण, सेवा इसी का नाम तो माँ है..... करवट बदल कर देखी..... दुबली-पतली गोरी-मुश्किल से पाँच फीट के शरीर वाली माँ..... सोती हुई, किसी बच्ची सी ही लग थीं.....। सुतवां नाक..... पतले ओंठ.... सन से सफेद बाल.... गुड़ी-मुड़ी होकर पलंग के एक किनारे सो रही थीं..... डर लगा माँ कहीं गिर न जाये..... यह डर ठीक वैसा ही था जैसा मनु, नैनी को पलंग के किनारे सोते हुए देखकर लगता था.....।
     संभवतः बच्चों को अपने पास न पाकर मेरी ममता.... माँ पर निछावर हो रही थी....।
    शाम साढ़े पाँच बजे रविशंकर आया संकोचपूर्वक बोला- ‘‘यहाँ से सागर तट मात्र एक किलोमीटर है आप लोग पैदल जा सकेंगी न ? माँ को चलने में तकलीफ होगी सोचकर रिक्शा लाने को बोली..... इतनी देर तक माँ चुप थी, अब बोली- ‘‘नहीं बड़े नोनी ! धीरे-धीरे पैदल जायेंगे तो आसपास को देखगे हुए जा सकेंगे..... घूमने तो आए हैं रिक्शा मत बुलवाओ.....।’’
    पुरी का सागर तट..... हमारे समान असंख्य भ्रमणार्थी.....। कोई नहा रहा था- कोई घूम रहा था.....। बच्चे उल्लास से भरे उछल-कूद रहे थे.....। क्षितिज तक फैला समुद्र..... लहरें मचलती हुई आती, बेला भूमि को दुलारतीं..... फिर लौट जाती अपने घर.....।
    पश्चिम में दिनकर.....अपनी किरणों का जाल समेटता दिखाई दिया.... मुग्ध हो गई..... माँ मेरा हाथ पकड़े खड़ी थीं..... अचानक बोली- ‘‘सूर्यास्त होने में ज्यादा देंर नहीं है, अस्ताचल गामी सूर्य को अध्यZ दूंगी....पूजा-अर्चना करूंगी....पंडे को बुला दो.....।’’ मुग्ध बालिका माँ..... धर्मपरायण माँ में रूपायि हो गई थी.... वही पुरानी माँ.....। मुश्किल हुई, यहाँ पंडा कहाँ पाऊँ ? मेरी परेशानी रविशंकर समझ गया तुरंत बोला- ‘‘मैडम जी फिक्र न करें मैं भी संस्कारवान् पंडा परिवार का ही हूँ..... माँ जी का अध्यZ दान सम्पन्न करा दूँगा.... पर यहाँ भीड़ है चलिए थोड़ा आगे चलें.....।
    लोगों की गहमागहमी से दूर एक शांत स्थान देखकर....रविशंकर ने माँ से कहा- ‘‘माँ जी अंजलि देने का सामान ले आऊँ....।’’ पोपले मुँह पर आत्मगरिमा छा गई इंकार में सिर हिलाकर माँ थैले से सामान निकालने लगीं..... धोती, नारियल,मोती, चांदी, चांवल, मिठाई, केला और जाने क्या-क्या.... तो माँ-पूरी तैयारी से आई हैं..... अच्छा लगा.....।
    पूरी श्रद्धा से समुद्र पूजा करके.....माँ ने अस्ताचलगामी दिवाकर को अध्यZ दिया.....माँ के पैरों पर लहरें पछाड़ खा रही थी। सूर्याभिमुख माँ हाथ जोड़े, आँखें मूंदे खड़ी आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ कर रही थीं....पचहत्तर वर्शीया वृद्धा..... दिखने में अशिक्षित महिला के मुँह से श्लोकों का विशुद्ध, सस्वर उच्चारण.... अवाक् देखता रहा.....। मुझे लगा मूर्तिमति श्रद्धा ही सागर तट पर खड़ी भगवान् अंशुमाली को अंजलि दे रही है..... इन्हीं से तो पूजा के श्लोक सीखी हूँ.....।
    प्रमाण करके माँ, रविशंकर को दक्षिणा देने लगी..... मैंने देना चाहा तो रोक दी अभिप्राय यह कि तीर्थ क्षेत्र में बेटी के रूपयों से दान करना ठीक नहीं है। अब चले माँ....पूछी तो माँ ने कहा- ‘‘सागर तट की गीली रेत पर सबका नाम लिखूंगी..... एक-एक नाम लिखूंगी.... समुद्र की लहरे नामों को मिटाती जायेंगी..... जिसका नाम लिखूंगी..... उसका समुद्र स्नान हो जावेगा....।’’
    बिचारा रविशंकर भौंचका खड़ा देखता रहा.... गीली रेत पर सुंदर अक्षरों में माँ ने पहला नाम लिखा- शेशनाथ शर्मा.....।’’ हाँ पिताजी का नाम..... श्रद्धापूर्वक नाम को प्रणाम कीं लहरें आई.....नाम मिट गया.....। मुझे लगा माँ की आँखों से आँसुओं की कुछ बूँदें भी नाम के साथ ही लहरों पर सवार हो हृदय में समा गई।
    ऐसा क्यों होता है कि जिन्हें हम भूलना चाहते हैं, fजंदगी के हर मोड़ पर वो सामने आ खड़े होते हैं। यादों की डोर इतनी मजबूत होती है कि भविश्य की ओर बढ़ते वर्तमान को खींचकर अतीत की ओर ले चलती हैं.... इस खींचतान में जो हर बार टूटकर बिखरता है वो मनुश्य का मन ही तो है। किसी अपने से बिछुड़ कर जीना कठिन है..... कितना कठिन है स्मृति-धारा से स्वयं को अलग करना....सोची थी सालों से कहीं नहीं गई.... बाहर निकलूंगी तो नए माहौल में मन बहलेगा.... पर नहीं..... वही ढ़ाक के तीन पात चरितार्थ हो रहा है।.....माँ मेरे मनोभावों को समझ गई..... आखिर माँ है न..... तुरंत बोली- ‘‘अब चलो मंदिर चलते हैं आरती का समय हो रहा है..... जगन्नाथ स्वामी की आरती देखेंगे.....।’’ संभवतः रविशंकर को भी मंदिर पहुँचने की जल्दी थी..... तब तक सुबोध भाई, भाभी ने भी हाँ मिलना शुरू कर दिया था। हमारा काफिला मंदिर की ओर रवाना हो गया....।
अभी मुख्य बजार तक ही पहुँचे कि देखी-अपार जनसमूह जगन्नाथ स्वामी की जयजयकार करता मुख्य द्वार की ओर बढ़ रहा है। हम भी समूह का हिस्सा बन गए.....। मुख्य द्वार के दाहिनी ओर की दुकान में चप्पलें, पर्स, मोबाइल रखकर कूपन ले लिया..... माँ ने टोका..... आरती का सामान ले लेते हैं। रविशंकर ने बताया अंदर सीढ़ी के बाजू दुकान fसंगारी जी की है वहाँ हम लोगों के लिए पहले ही सारी व्यवस्था की जा चुकी है।
    माँ की ईच्छानुसार 108 बत्तियों वाला प्रदीप ली। भीड़ से घबराने लगी थी माँ सो मेरी ओर हाथ बढ़ा दीं..... बड़ी सावधानी से उन्हें लेकर मैं सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।.....दीप स्तंभ के पास रूककर रविशंकर ने बताया.... नीराजन यहीं से किया जा सकेगा-इसके आगे.....जाने के लिए कूपन लेना होगा.....।
    मैंने माँ की ओर देखा उनकी आँखों में मूक प्रश्न था यहाँ तक आकर भी दूर से नीराजन क्यों ? रविशंकर को कूपन लाने कहकर मैं माँ के साथ एक ओर हटकर खड़ी हो गई.....। हाथ जोड़े माँ..... प्रार्थना करने लगीं..... इस उम्र में भी माँ का स्वर अत्यंत सधा हुआ है..... जड़ता का नामोनिशान नहीं है....। आस-पास के लोग शुभ्रवस्त्रावृत्ता वृद्धा को सुनने लगे.... एक सिपाही आया मुझसे बोला- ‘‘बहिन जी भीड़ बहुत है माँ जी को आगे तक ले जाना कठिन है यदि आप चाहें तो मैं सहायता कर सकता हूँ।’’ अंधा क्या चाहे दो आँखें..... रविशंकर प्रदीप लेकर साथ चला-सिपाही ने माँ का हाथ पकड़ा.... भीड़ को ठेलता हुआ..... आगे बढ़ता चला - मैं भी पीछे-पीछे चलने लगी.....। इस बार हम मंदिर प्रबंधन द्वारा लगाए बेड़े के पास पहुँच गए..... सामने बलभद्र सुभद्रा के साथ जगन्नाथ स्वामी विराजमान थे..... दर्शन में मन लगा ही था कि माँ ने मुझे हिलाया..... ओह! माँ की ऊँचाई बहुत कम है इसलिए वे दर्शन नहीं कर पा रही थीं वे व्याकुल हो रही थीर..... मेरे साथ-साथ सिपाही की समझ में भी बात आ गई थी..... अपना सिपहिया रौब इस्तेमाल करके सामने वालों को हटाकर उसने माँ के लिए जगह बना दिया..... माँ के चेहरे पर तृप्ति की मुस्कान छा गई ‘‘जगन्नाथो नाथः सुभग मनहारी....।’’
    माँ के करूणा विगलित आत्मनिवेदन ने भीड़ पर ही नहीं..... प्रदीप जलाने वाले पंडे के मन को भी छुआ..... उसने परम स्नेह से माँ का हाथ पकड़ उन्हें बाड़े के अंदर कर लिया..... ले चला मंदिर के गर्भगृह की ओर.... मैं वहीं खड़ी रही..... तनिक भी घबराए बिना भावाविश्ट सी माँ पंडे के साथ चली जा रही थी.... सिपाही, रविशंकर और मैं मुग्ध होकर देख रहे थे। श्रद्धा का कितना व्यापक प्रभाव होता है कि नितांत अपरिचित भी सहायता के लिए आगे बढ़ आता है.....।
रविशंकर ने इशारा किया हम बाई ओर मुड़कर आंगन में आ गए..... थोड़ी ही देर में पंडे का हाथ पकड़े माँ आई..... उल्लसिता माँ- मनोवांछित खिलौना पाकर हुलसती बच्ची-सी माँ.... ‘‘बड़े नोनी- इस पंडा बाबू नोनी को कुछ दे दो..... इसी ने मुझे जगन्नाथ स्वामी के प्रत्यक्ष दर्शन करवाया है..... हाँ-वेदी को छूकर प्रणाम भी कर आई हूँ..... आँखें पोंछने लगी माँ। कुछ देना चाहती थी कि पंडे ने हाथ जोड़ दिए.... ‘‘नहीं बहन.....माताजी को दर्शन करवा सकने का सुख मुझसे छीनिए मत.... दक्षिणा तो रोज मिलती है.... यह पुण्य बड़े भाग्य से मिला है..... अच्छा माताजी चलता हूँ।’’ कहकर वह परोपकारी पंडा भीड़ में समा गया।

    सिपाही का नाम पूछा पता चला वह ब्राह्यण है उड़ीसा के ही सुदूर गाँव का निवासी, नाम है रामेश्वर पाणिग्रही..... उसे धन्यवाद देकर बिदा की.....। रविशंकर ने भी इजाजत मांगी-माँ ने उससे कहा- ‘‘बेटा हम एकादशी उद्यापन के लिए आए हैं आज दशमी है कल के लिए..... पंडे से बात करवा दो.....।’’
    इस बार हम वहाँ पहुँचे जहाँ एकादशी महराज कोने में बँधे पड़े़ हैं। लोकश्रुति के अनुसार एकादशी को अहंकार हो गया था कि सारा संसार निराहार रहकर एकादशी व्रत का पालन करता है, भगवान विश्णु की विशेश कृपा दृश्टि उसे प्राप्त है। भगवान भक्तों का अंहकार दूर करने सदा तत्पर रहते हैं..... तभी तो भक्त और भगवान समान हो सकेंगे। जगन्नाथ स्वामी ने एकादशी को बाँधकर कोने में बंदी बना दिया.... उस दिन से जगन्नाथ मंदिर में एकादशी को भी अन्न भोग ही लगता है। यही नहीं जगन्नाथ जी का महाप्रसाद अन्नभोग होने के बावजूद सारे मंदिरों में, व्रत, उपवासों में भी ग्राह्य होता है। अपनी मित्रता को आजन्म स्थाई व सुद्दढ़ रखने के लिए महाप्रसाद को साक्षी रखकर मित्रता की नींव रखी जाती है...... इस तरह दोनों मित्र आजीवन एक दूसरे को महाप्रसाद संबोधन देते हैं। एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ निभाते हैं मित्रता का यह बंधन पारिवारिक नातों- रिश्तों से अधिक मजबूत होता है। जो छत्तीसगढ़ में प्रचलित है।
    इस बार मैंने रविशंकर को विदा कर दिया। उसे आश्वस्त कर दी कि मैं पहले भी जगन्नाथ धाम आ चुकी हूँ, यहाँ के रास्ते मेरे लिए अपरिचित नहीं हैं। मैं माँ को लेकर ‘परिचय लाॅज’ पहुँच जाऊँगी।
    माँ से पूछी ‘‘माँ, थकी तो नहीं हो ?’’ निश्छल उल्लासपूर्ण हँसी हँसीकर माँ ने कहा- ‘‘नहीं बेटा! चलो मंदिर चत्वर में घूमें..... इस बहाने परिक्रमा भी हो जावेगी फिर दक्षिण दरवाजे से निकल कर रिक्शा पकड़ लेंगे.....।’’
    कौतूहल-वश पूछी- ‘‘माँ आपने तो इससे पहले कभी पुरी की यात्रा की नहीं है फिर दक्षिण दरवाजा, परिक्रमा-पथ ये सब कैसे जान गई।’’
    थोड़ी देर चुप रहकर माँ ने कहा- ‘‘एक तो तुम्हारे पिताजी के मुँह से कई बार पुरी का महात्म्य सुन चुकी हूँ दूसरे ‘जगन्नाथ दर्शन’ नामक किताब भी मेरे पास है.... उसे कई बार पढ़ी हूँ..... बड़ी इच्छा थी यहाँ आकर दर्शन करने की..... पर बेटा जब तक वो खुद नहीं बुलाते..... कोई भी उनके दर्शन नहीं कर सकता....।’’
    परिक्रमा करके समय ध्यान दी कि छोटे-छोटे कई मंदिर, मंदिर प्रांगण में हैं। ये मंदिर बाद में बनवाए गए होंगे।
    श्रद्धा और अंधश्रद्धा में थोड़ा सा ही अंतर है..... यही देखिए न.... कदम-कदम पर कोई पंडा..... बांस की खपच्ची से बना चिमटा लिए खड़ा मिलेगा..... एक हाथ से चिमटा आपके माथे पर छुआ दूसरा हाथ आपके सामने फैला देगा.....। तो प्रसाद देने वालों, टीका लगाने वालों की भीड़ से बचना और भी मुश्किल है हर कहीं फैले हुए हाथ दिखेंगे..... पंडागिरी का व्यवसायी करण अच्छा है.... पर उसका यह प्रदर्शन मन में अश्रद्धा ही नहीं जगाता, वितृश्णा भी उत्पन्न करता है। भगवान के नाम पर पैसा वसूली का यह कायदा कमोवेश सभी स्थानों में दिखाई पड़ता है।
   

इक्कीस

    सुबह दैनिक कर्म से निबटते....चाय पीते साढ़े छः बज गए....रविशंकर आया उसके साथ मंदिर पहुँचे...।
    पंडा जी तैयार ही थे....माँ आसन पर बैठीं....आचमन किया भगवान विश्णु का आवाहन की-
                ‘‘शांताकारं भुजग शयनं पद्यनाभ सुरेशं,
                विश्वाधारं गगन सद्दशं मेघवर्ण शुभांगम्।
                लक्ष्मीकांत कमलनयनं, योगिर्भिध्यान गभ्यम्,
                वन्दे विश्णुं भव हरणं, सर्व लोकैक नाथं।’’
    यथा समय उद्यापन सम्पन्न हुआ..... माँ की श्रद्धा देखकर मन तृप्त हो गया..... हाँ, मैंने भी उद्यापन किया पर पंडा जी की लालची प्रवृति ने फिर एकबार पीड़ित किया। रविशंकर चुप रहा..... अभी तक उसने हमसे कुछ भी नहीं माँगा था..... मेरा मन इतना विद्रोही हो गया था कि एकादशी उद्यापन कराने वाले पंडे को दी जानी वाली राशि मैंने रविशंकर को दे दिया। पंडा जी तिलमिलाते रह गए.....।
    बाबूजी के साथ सुने पिछले प्रवचन याद आ गए..... माँ की ओर देखी उनकी सहमति पाकर रविशंकर से प्रार्थना की कि वो हमारे लिए टाटा इंडिका या मारूति किसी भी गाड़ी का प्रबंध कर दे ताकि कल सुबह हम fलंगराज दर्शन के लिए भुवनेश्वर जा सकें..... कुछ एडवांस देना चाहती थी कि वह उठा- ‘‘fचंता मत करें....। गाड़ी सात बजे हाजिर हो जावेगी आप लोग तैयार रहियेगा.....।
    रविशंकर तो हमारे साथ आना चाह रहा था मैंने ही मना कर दिया कहा- ‘‘आप कोई दूसरा दर्शनार्थी देखें जिससे आपको चार पैसे मिलेंगे.... हम मठ पहुँच जावेंगे....।’’
    कुछ जगहें ऐसी होती हैं जो सालों बाद भी जरा भी नहीं बदलती..... अवश्य छोटे पौधे.....वृक्ष बन गए होते हैं तो पुरानी जीर्ण दीवारों की दरार कुछ और चौड़ा हो गई होती है....।
    मठ का वही धुला-धुला प्रांगण.... वही चबूतरा....प्रवचनकर्ता का आसन भी लग चुका था.... श्रोताओं के बीच हम भी बैठ गए.... माँ को टिकने की सविधा मिले इसीलिए चबूतरे के पास ही बैठी। यथा समय.... स्वामी जी आए.... थोड़े ध्यान से देखी तो पहचान गई.... वही निश्पाप दृश्टि..... प्रशस्त ललाट में भाजें पड़ गई हैं....ऋजु शरीर को समय ने स्थूलता का उपहार दे दिया है बस..... नहीं बदली है उनकी  वाणी का ओज.... भाशण भंगिमा..... अभय मुद्रा।
    माँ से पूछी- ‘‘माँ आपको अच्छा न लगे....तो बताना.....यदि थक जाओ तो भी बताना.....हम तुरंत चल देंगे।’’ माँ कुछ बोलती इसके पहले जल्द गंभीर स्वर कानों में पड़ा, ‘‘अभ्यागत श्रोतागण! आप लोगों ने आत्म ज्ञान कराने वाले दर्शन के विशय में जिज्ञासा व्यक्त किया है यथा संभव हम आपकी जिज्ञासा का समाधान प्रस्तुत करेंगे......तो ध्यान दीजिए.....। आज हम जीवात्मा और उसकी नियति पर चर्चा करेंगे चूंकि हम सब जीवात्मा हैं अनंतकाल से जन्म मरण के चक्रव्यूह में उलझे हुए हैं तो जीवात्मा की नियति तो हमारी ही नियति हुई.... इसकी चर्चा सर्वजन हिताय होगी ऐसी आशा है....।
    आत्मा एक यर्थाथ सत्ता है इसके गुण हैं, ईच्छा, द्वेश, संकल्प, सुख,दुख तथा ज्ञान किन्तु स्मरण रहे ये गुण भौतिक गुण नहीं है अपितु इन्हें चैतन्य की परिवर्तन शील अवस्थाओं के रूप में जानना, मानना चाहिए।
    उद्योतकर के मतानुसार ‘मैं’ रूपभाव का प्रमेय पदार्थ आत्मा है जिसकी सत्ता निरंतर विद्यमान रहता है। यदि कोई व्यक्ति जीवात्मा का अस्तित्व स्वीकार नहीं करता तो उसके लिए कोई ज्ञान अथवा स्मृति संभव नहीं होगी। चेतना का अस्तित्व भी उसके लिए नहीं होगा जबकि भौतिक वादी मानते हैं कि चेतना देह का गुण है।
    चेतना देह का गुण नहीं है क्योंकि देह प्रकृति से संबंद्ध है तो प्रकृति में भी देहानुसार चेतना होनी चाहिए.... जो नहीं है। प्रकृति जड़ है इसीलिए चेतना को आत्मा का गुण मानना चाहिए। चेतना देह का गुण इसलिए भी नहीं है क्योंकि देहगत प्रक्रियाएँ बदलती हैं तब चेतना विलुप्त हो जाती है जैसे मृत देह में अथवा समाधिस्थ देह में चेतना देह की सहायक भी नहीं है वह तो अभिव्यक्ति मात्र में ही साधन और सहायक की भूमिका निभाती है।
    चेतना आत्मा का अनिवार्य गुण भी नहीं है कारण यह कि प्रत्येक देह में आत्मा होती है पर हर आत्मा की अनुभूति और अभिव्यक्ति समान नहीं होती उदा. के लिए सुख-दुख की अनुभूति और अभिव्यक्ति प्रत्येक जीवात्मा में अलग-अलग होती है।   
    देह की रचना जीवात्मा के पूर्व कर्मों के फलों के अनुसार नियति की अदृश्ट शक्ति द्वारा होती है। देह के साथ आत्मा का संयोग उन्म कहलाता है और वियोग मृत्यु।   
ृ    जब जीवात्मा के दंड अथवा पुरस्कार दिलाने वाले गुणों अवगुणों का भंडार fनःशेश हो जाता है तो उसे पुनर्जन्म के चक्रव्यूह से छुटकारा मिल जाता है हम इस छुटकारे को ही ‘मोक्ष’ अथवा मुक्ति की संज्ञा से अभिहित करते हैं। प्रश्न है ‘मोक्ष’ क्या है मुक्ति की अवस्था किसे कहते हैं? मोक्ष परम आनंद को कहते हैं, जब जीवात्मा पूर्ण शांति से युक्त एवं कलुशता से रहित हो जाता है, तभी उसे मुक्ति की प्राप्ति होती है।
    ‘मोक्ष’ या मुक्ति को स्थाई सुख नहीं कहा जा सकता क्योंकि सुख या दुख की अनुभूति के लिए देह की, चेतना की आवश्यकता होती है इसीलिए तुलसी दास जी ने मोक्ष की कामना नहीं की है कहा है- ‘‘जेहि जोनि जनमऊँ, कर्मवश, तहं राम पद अनुरागऊँ.....।’’ न्याय दर्शन ही हमें समझाता है कि प्रयत्न एवं क्रियात्मकता और चेतनता का पूरा अभाव तथा शरीर एवं मन से आत्मा का सर्वथा पृथकत्व ही मोक्ष है। इसकी तुलना प्रगाढ़ शांत निद्रा से की जाती है। मुक्तावस्था में जीवात्मा प्रकृति से पृथक हो जाती है परिणाम स्वरूप प्रकृति अपना कार्य बंद कर देती है अतः जीवात्मा अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाती है इस तरह प्रकृति का जड़तत्व   अत्यध्कि बुद्धिपूर्ण एवं महत्वपूर्ण साबित हो जाता है।
    न्याय दर्शन के अनुसार व्यक्ति या मनुश्य न तो आत्मा है न देह बल्कि इन दोनों के संयोग का परिणाम है। जब दोनों पृथक हो जाते हैं तो न तो चेतना बचती है, न संवेदना, न ही अनुभूति एवं अभिव्यक्ति का कोई मूल्य रह जाता है।
    इस तरह जीवात्मा की नियति न तो मोक्ष है न मुक्ति बल्कि देह और आत्मा के संयुक्त तत्वावधान में कर्म करना.... अनुभूति को अभिव्यक्ति प्रदान करना है। कर्म को श्रेश्ठ से श्रेश्ठतम कर्म की ऊँचाइयों पर पहुँचाता है।
       
    जीवात्मा के साथ चेतना का संबंध कर्मशीलता के लिए है, क्रियात्मकता के लिए है अतः जीवात्मा की नियति ज्ञान, कर्म और इच्छा का संयोजन है ऐसा संयोजन जो लोकमंगलकारी हो साथ ही अन्तर्जगत् की यात्रा का अवलम्बन हो तभी आत्मज्ञान की उपलब्धि हो सकेगी।
    ‘‘ऊँ शांfतः शांfतः शांfतः’’ का निनाद वातावरण में गूंजता रहा या शायद मेरे मानस में अनुगुंजित होता रहा कह नहीं सकती.....प्रवचन समाप्त हो गया था.....ध्यान दी माँ की ओर.....जो चबूतरे की दीवार के सहारे बैठी थी......नहीं.....शायद झपकी आ गई थी, उन्हें उठाई.....रात के नौ बज रहे थे.....परिचय के ठिकाने पर आ गए.... दिन भर की भाग दौड़ से माँ थक गई थीं, मुकुंद को बुलाकर खाना मंगाई..... जो खुसी से हँसता हुआ बोला- ‘‘आप लोगों के लिए मंदिर से प्रसाद आया है..... अभी लाता हूँ.....।’’ शीघ्र ही लौटा..... उसके हाथों में दो हांड़िया थीं..... केले के पत्ते में लिपटा प्रसाद था..... टेबल पर रखने को बोली..... मुकुंद खड़ा रहा शायद कुछ कहना चाह रहा था- मेरे पूछने पर उसने बताया- ‘‘मैडम ये महाप्रसाद है इसे जमीन पर बैठकर ग्रहण कीजिएगा साथ ही जूठा करके फेंकिएगा मत.... जितना खा सकें उतना ही पत्तल में निकालिएगा..... नहीं तो प्रसाद का अपमान हो जाएगा.....।’’ ठीक है..... कहकर उसे जाने का इशारा की..... चला गया मुकुंद.....।
    एक हांड़ी में खीर था पनीर का खीर..... दूसरे में दाल था..... बण्डल खोली तो देखी चार मालपुर थे..... पुलाव था और थी सब्जी..... मीठी सुगंध से कमरा भर गया.....। हम दोनों के लिए तो बहुत था इसलिए केले के दो पत्तों में खा सकने लायक प्रसाद निकाली माँ को बुलाई..... प्रसन्नता से खिलकर माँ ने कहा- ‘‘बेटा पुरी का प्रसाद अमृत है, यहाँ किसी व्यंजन में हल्दी का प्रयोग नहीं होता, कोई सब्जी या दाल छौंकी नहीं जाती..... मिट्टी के बर्तनों में ही प्रसाद रांधा जाता है..... वह भी पुरूश ही यहाँ के रसोइए होते हैं.....। मैं सुन रही थी कि माँ ने बताया बेटा! जगन्नाथ धाम में जाति बंधन नहीं है यद्यपि यहां पंडे पुजारियों की भीड़ है पर रसोई बनाने वालों के लिए ब्राह्यणत्व अनिर्वाय नहीं है। दूसरी बात पुरी के अंागन में जब पंक्ति भोज होता है सभी जाति, वर्ण एवं भाशा के लोग एक साथ, एक पंक्ति में बैठकर प्रसाद पाते हैं....।’’
    मैं सोचने लगी भारतीय संस्कृति की विशालता का यह चरम उदाहरण है यहाँ भगवान दीनबंधु दीनानाथ हैं..... अन्नदाता हैं उसके दरबार में कोई ऊँच-नीच, अमीर-गरीब नहीं हैं तभी तो भगवान को समदृश्टा कहते हैं।
    तृप्त होकर हमने प्रसाद पाया अबकी बार मुकुंद को बुलाई तो वह तुरंत हाजिर हो गया.... अलग निकाल कर रखा गया प्रसाद उसे दी तो आनंद से उसकी आँखें झिलमिल करने लगीं गद्गद् होकर बोला- ‘‘मेरे ध्यन भाग मैडम कि आपने महाप्रसाद दिया..... नौकरी करते हैं..... दिन भर की चाकरी के बीच इतना समय ही कहाँ मिलता है कि जगननाथ प्रभु की चाकरी कर प्रसाद पा सकें....। एक बार फिर हमें नमस्कार कर मुकुंद चला गया। हम लोग भी थके थे, बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ गई।
   

बाइस

        ‘‘न जननी जनको न च सोदरम्
        न तनयं न च भूरि बलं परं,
        अवनि कोऽपि न काल वशं गतं
        भजतु रे मनुजा गिरिजा पतिम्।’’
    कोकिला कंटी माँ की स्वरलहरी कमरे में गूंज रही थीं.... आँखें खुली तो देखी नहाधोकर तैयार माँ शिव-स्तवन कर रही थीं। शांत-स्निग्ध, मुख मंडल, मूर्तिमति भक्ति के दर्शन हुए इसी मुख के लिए कवि ने लिखा होगा- ‘‘सकाले उठिया से मुख हेरूम दिन जाबि आज भालो गो....।’’
    पिछले तीस सालों में पहली बार ऐसा हुआ है कि मैं पूरी तरह माँ के साथ हूँ.... नहीं थोड़ा सुधार कर लूँ अपनी पूरी fजंदगी में पहली बार माँ को साथ मिला है, पूरा साथ, जब हमारे बीच कोई तीसरा नहीं है।
    हर बच्चा चाहता है माँ का स्नेह, ममता, दुलार पर उसका एकाधिपत्य हो, यह एकाधिपत्य पचास साल बाद मुझे मिला है मन में संकल्प किया इन क्षणों का पूरा-पूरा सदुपयोग करूँगी.....। शेश जीवन के लिए यह संबल पर्याप्त होगा।
    तैयार होने का इशारा किया माँ ने..... कपड़े लेकर बाथरूम में चली गई..... नहाकर निकली तो देखी माँ ने चाय मंगवा ली है.... बोली- ‘‘बड़े नोनी! आज fलंगराज में रूद्राभिशेक करने के बाद ही खाना पीना करेंगे.....। आज मास शिवरात्रि है..... शिव पूजन के लिए श्रेश्ठ दिन है.....।’’
    मुकुंद ने आकर बताया गाड़ी आ गई है.... कमरे में ताला लगा कर बाहर आए..... रविशंकर खड़ा था माँ को प्रणाम किया मुझसे बोला- ‘‘मैडम गाड़ी तैयार है.....रात नौ बजे तक वापस आ जाइएगा..... दोपहर का भोजन..... माँ ने टोक दिया ‘‘fचंता मत करो हम व्यवस्था कर लेंगे....।’’
    टाटा इंडिका थी..... माँ का भारी भरकम थैला देखकर समझ गई..... पूजा की पूरी तैयारी करके ही चल रही है..... चलें उनकी खुशी ही तो मुझे काम्य है.....। कार पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी..... सड़क के दोनों ओर खड़े नारियल के पड़े....हरे-भरे खेत....उड़ीसा की उर्वर भूमि का परिचय दे रहे थे। यहाँ की मुख्य फसल धान है इसलिए रबी और खरीफ दोनों फसलों के रूप में धान की ही खेती की जाती है।
    एक बात मुझे व्यथित कर रही थी कि इतनी उपजाऊ धरती है.... जिसे अन्न क्षेत्र कहा गया है, वहाँ इतनी गरीबी क्यों है? शिक्षा का अभाव भी दिखाई पड़ता है....हाँ, उड़ीसा का सांस्कृतिक धरोहर अमूल्य है....कटक, भुवनेश्वर, संबलपुर, पुरी आदि स्थानों ने आधुनिकता को भी अपनाया है..... पर्यटन विभाग ने भी इन क्षेत्रों को विकसित करने का भरपूर प्रयास किया है.... फिर भी वांछित प्रगति आज भी नहीं हो सकी है।
    धौलगिरी में महात्मा बुद्ध के दर्शन किए... माँ को बताई कि यही वो कfलंग युद्ध क्षेत्र है जहाँ हुए भीशण रक्त-पात ने चण्ड अशोक का हृदय परिवर्तित कर दिया था....विनाश ने निर्माण को जन्म दिया...अशांति पर शांति की विजय हुई। अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया...बौद्ध धर्म के प्रसार में कोई कमी नहीं आने पाई... यहाँ तक कि अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को शांति का संदेश देकर श्रीलंकाभेजा....।
       
अशोक के शासन काल में भारत में ही नहीं श्रीलंका, चीन, तिब्बत, मलाया आदि देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। थोड़ी देर सुस्ता कर.... हम चल पड़े.... माँ को भुनवेश्वर पहुँचने की जल्दी थी.... इसलिए मैंने ड्राइवर से सीधे भुवनेश्वर चलने को कहा.....।
    दोपहर से पहले ही हम भुवनेश्वर पहुँच गए....माँ को तो कुछ खिला नहीं सकी.... हाँ नारियल पानी पिया हम दोनों ने.... ड्राइवर को नाश्ते चाय के लिए पैसे दी.... और हम मंदिर की ओर बढ़ चले.... मुख्य द्वार से प्रवेश करते समय बाई ओर...नारियल, फूल आदि पूजा सामग्री की दुकानें थीं वहाँ से पूजा के लिए फूल खरीदी... आगे सीढ़ियाँ थी, सो माँ का हाथ थामी.... धीरे-धीरे चढ़ने लगे....।
    नंदी स्तंभ के पास मैं रूकी....कुछ चढ़ाना चाह रही थी कि माँ ने कहा- ‘‘नहीं.... बेटा! मंदिर में पूजा अर्चना करके लौटते समय....यहाँ चढ़ावा चढ़ावेंगे.... वह चढ़ावा एक तरह से भगवान शंकर के द्वार पर नंदी को धन्यवाद ज्ञापन है.....।
    मैं सोचने लगी यद्यपि मैं पहले आ चुकी हूँ.... और माँ पहली बार आई है पर कितना कुछ जानती हैं इन स्थानों के बारे में....। हाँ.....किसी व्यक्ति या स्थान को जानने के लिए.... पुस्तके सशक्त माध्यम हैं..... अवश्य यदि अध्ययन में रूचि हो। कभी-कभी आश्चर्य होता है कि मात्र दूसरी fहंदी तक की औपचारिक शिक्षा मिली है माँ को.....पर उनके अध्ययन में इससे कोई कमी नहीं आई.....।
    पास आने पर देखी..... मंदिर के जीर्णोद्धार का काम चल रहा है.....। यहाँ भीड़ नहीं थी.....विशाल मंदिर चत्वर प्रायः सूना ही था....। माँ को साथ लिए मंदिर में प्रवेश की....पंडों की धक्का मुक्की भी नहीं थी.... अपेक्षाकृत कम उम्र के एक पंडे को संकेत से पास बुलाई.....उसे समझाया कि माँ को रूद्राभिशेक करना है। हँसकर पंडे ने कहा- ‘‘किसी प्रकार की fचंता न करें.....भीड़ नहीं है आइए.....।’’ पंड़े के साथ माँ अंदर गई प्रमाण की..... हाँ fलंगराज मंदिर में बैठकर पूजा करने की व्यवस्था नहीं है.... इसलिए माँ को थाम कर खड़ी रही....फर्श गीला था.... पैर फिसल जाने पर.... माँ को चोट न लग जावे इसका भी डर था....। विधि-विधानपूर्वक पूजा हुई हम बाहर आए.... इस बार माँ ने कहा- ‘‘बेटा यहीं किसी जगह बैठते हैं.... तुम मुझे शिव मानस पूजा रूद्राश्टक सुनाओ.....।’’
    समझ गई यात्रा की थकान.....खाली पेट, उम्र का तकाजा सबने अपना प्रभाव दिखावा शुरू कर दिया है..... पंडे से अनुमति लेकर....कोने में हम दोनों बैठ गई।
    मैंने माँ को शिव की मानस पूजा और रूद्राश्टक सुनाया..... प्रणाम करके सिर उठाई तो देखा वही पंडा बड़े से दोने में प्रसाद लिए खड़ा था....बड़ी आत्मीयता से आग्रहपूर्वक हमें प्रसाद दिया.....। माँ की उम्र का ध्यान रखकर जी के लायक....होटल नहीं है इसलिए मैं और एक दोना प्रसाद ला देता हूँ..... माँ ने धन्यवाद देकर कहा- जो मिला है वह पर्याप्त है। द्वादश् ज्योतिर्लिग की परिकल्पना के अनुरूप ही प्रांगण के पिछले भाग में छोटे-छोटे शिवfलंग स्थापित हैं.... इसके अतिरिक्त पातालेश्वर, लहकेश्वर मंदिर भी हैं..... ये सभी भगवान शंकर के भिन्न-भिन्न नाम हैं।
    घूमकर बाई ओर आए वहाँ किसी महात्मा का प्रवचन चल रहा था.... हम लोग भी वहीं बैठ गए।
    महात्मा कह रहे थे- ‘‘शिव सदा कल्याणकारी हैं, वे समय के देवता हैं इसीलिए उन्हें महाकाल कहते हैं....पूजा अर्चना के लिए हर तिथि, वार, नक्षत्र महत्वपूर्ण होता है किन्तु प्रत्येक माह के कृश्ण पक्ष की त्रयोदशी भगवान शंकर की पूजा के लिए निर्दिश्टि है।
    देवाधिदेव महादेव की उपासना के द्वारा आत्मबोध होता है, मनुश्य इस जन्म में पूर्वजन्मकृत दुश्कर्मों का प्रायश्चित करता है। इसलिए शिवोपासना को बोधोत्सव मानकर सत्यासत्य का ज्ञान प्राप्त करें, चेतना को उध्वZमुखी करें, इसी से ‘‘आत्मानं विद्धः’’ अर्थात् संसार के साथ-साथ स्वयं को जानने, पहचानने का अवसर मिल सकेगा यही मानव जीवन की सार्थकता भी है।
    अध्यात्म का एक अंग मोक्ष भी है, तो मुक्ति मार्ग पर चलने वाले प्रवीण साधक व्यक्ति का परिश्कार करने के लिए जिस साधना पथ को चुनते हैं हम संक्षेप में उसका परिचय आप लोगों को दे रहे हैं।
    व्यक्तित्व को शरीर, प्राण और चेतना इन तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। यही तीन प्रकृति, जीव और ब्रह्य हैं। इन्हीं को स्थूल, सूक्ष्म और कारण के रूपों में भी देखा जाता हैं। इस इस त्रिवर्ग की विवेचना मनीशियों द्वारा कर्मयोग, ज्ञान योग एवं भक्तियोग के नाम से की गई है। इन तीनों के केन्द्र fबंदु क्रमशः नाभि, हृदय और ब्रह्यरंध्र में माने जाते हैं जिनमें शिव, विश्णु और ब्रह्या का वास स्थान होता है। शक्ति के उपासक काली, लक्ष्मी और सरस्वती का प्रतीक भी इन्हें ही मानते हैं।
    श्रोतागण ! प्रत्येक मनुश्य इनमें से किसी एक विचारधारा का, किसी एक मान्यता का आश्रय लेकर व्यक्तित्व का परिश्कार कर सकता है तदुपरान्त ही आत्मबोध संभव होता है।
    मन की बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता अंतः करण की भाव संवेदना, सेवा परायणता आदि उदात्त मनोभाव इन्हीं तीनों क्षेत्रों को परिश्कृत करते हैं, समुन्नत करते हैं। शव से शिव तक की साधना इसी को कहते हैं, आत्मा शिव तत्व को प्राप्त कर शिव में ही विलीन हो जाती है यही मानव जीवन का प्रेय भी है श्रेय भी। भगवान शिव की आराधना जीवन को कल्याणप्रद बनाने के लिए की जाती है।
    शिवोपासना के दो सहायक तत्व हैं, पहला इंद्रिय निग्रह और दूसरा आत्म संयम। यहाँ इfन्द्रय निग्रह का अर्थ कठिन उपवास नहीं है- मन का निग्रह है मान लें कि हमने शिवरात्रि उपवास किया वह भी निर्जला व्रत, पर हमारा मन.... खाद्य पदार्थों को याद करता रहे अथवा आँखें..... ताजे फलों, मिठाइयों को देखती रहें अथवा पाक-कला की चर्चा करते रहे तो उपवास का फल नहीं मिलेगा। इसी संयम का अर्थ भी व्यापक है जिसके अंतर्गत समय-संयम, अर्थ संयम, विचार संयम भी शामिल है।
    शिव की उपासना के लिए, अक्षत, फूल, दूब, फल मात्र उपकरण हैं प्रतीक हैं पूजन के।
    इfन्द्रयनिग्रह द्वारा संययपूर्वक आत्म परिश्कार, यही शिवत्व की प्राप्ति है। आइए स्मरण करें उस देवाधिदेव, भूतभावन, महादेव शिव की।
    ‘ऊँ तत्पुरूश विद्महे, महादेवाय धीमाहि तन्नो रूद्रः प्रचोदयात्।’’
    ऊँ नमः शिवाय, शिवाय नमः.....।
    प्रवचन समाप्त हो गया। याद आया ड्राइवर प्रतीक्षा कर रहा होगा, अभी तो खण्डगिरी भी देखना है शाम तो यही हो गई.... माँ से चलने को बोलीं तो थोड़ी अनिच्छापूर्वक उठीं....उनका हाथ पकड़ कर उन्हें उठने में मदद दी.... मन को हल्का करने के लिए लिए बोली- ‘‘माता राम! समय संयम भी तो जरूरी है न ?’’ हँस पड़ी माँ.... इस बार गन्तव्य था खण्डगिरि.....।
   
                   तेइस

    शाम घनी होने लगी थी....साथ में आए सुबोध भाई की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी..... उल्टी हो गई, तो भाभी और भी घबरा गई।
    ड्राइवर से पूछी आसपास किसी डाॅक्टर का क्लीनिक मिलेगा ? भाग्य से दो किलोमीटर जाने के बाद ही डाॅक्टर का क्लीनिक दिखाई दिया..... गाड़ी रूकवा कर सुबोध भाई को डाॅक्टर के पास ले गए.... डाॅक्टर ने बताया घबराने की कोई जरूरत नहीं है, कुछ उल्टा-सीधा खा लिया होगा..... जगह जगह का पानी भी कभी-कभी नुकसान करता है..... दवाई दे दिया हूँ.... आराम करने से सुबह तक ठीक हो जावेंगे, यह भरोसा दिलाया।
    खण्डगिरि का प्रोग्राम टाल कर हम पुरी वापस आ गए.... सुबोध भाई की तबीयत को ध्यान में रखकर माँ ने उन्हें ‘परिचय’ में ही ठहरने को कहा.....भाभी घबरा गई थीं....अकेले सुबोध भाई को संभालने में स्वयं को असमर्थ पा रही थी अतः रूक गई....। डाॅक्टर ने जैसा कहा था, दूसरे दिन सुबह सुबोध भाई ठीक हो गए।
    भाभी ने ही सुझाव दिया पहले सागर की लहरों का आनंद उठा लें उसके बाद मंदिर चलेंगे, दर्शन करके दक्षिण दरवाजे से बाहर निकले.....चैतन्य महाप्रभु का आश्रम देखने चलेंगे..... लगे हाथ बाजार से कुछ खरीददारी भी हो जावेगी....।
    योजनानुसार बाजार पहुँचना था कि रास्ते में शंकराचार्य मठ दिखाई दिया....जाने क्यों मेरा मन उसी ओर fखंचने लगा.... सुबोध भाई, भाभी से कहने में संकोच भी हो रहा था क्योंकि इसके पहले वे लोग प्रवचन सुनने आने से इंकार कर चुके थे....।
    कभी-कभी हमारी सोच, हमारी इच्छा तुरंत पूरी हो जाती है, कौन पूरी करता है ? यह तो कोई नहीं जानता.... शायद नियति.... शायद नियति.... शायद भगवान या शायद हमारे मन के अंदर कोई कल्पतरू है जिस क्षण हमारी ईच्छा उस कल्पतरू की छांव में पहुँच जाती है हमारी मनोकामना पूरी हो जाती है।
    माँ ने प्रस्ताव रखा कि यहाँ तक आए हैं तो मठ में थोड़ी देर बैठ लें.... मेरी ईच्छा को पूर्णता दी भाभी ने बोली- ‘‘हाँ....हाँ....चलें....हम लोग भी मठ देख लेंगे.... कल तो वापस चल देंगे.... कौन जाने.... फिर आना हो, न हो.....।

        पहले की तरह कम, आँगन में श्रोताओं के लिए बिछी दर वर बैठ गए....। प्रवचनकर्ता के आसनस्थ होते ही जो धीमा शोर हो रहा था वह भी थम गया....।
    ‘‘आध्यात्म प्रेमियों! आज हम आत्मा के विशय में चर्चा करेंगे, आदि शंकराचार्य के मतानुसार आत्म को यfत्कंचित जानने का प्रयास करेंगे....।?
    आप और हम सभी इस बात से सहमत हैं कि आत्मा है पर यह है क्या ? सान्त है अनन्त है, ज्ञान है अथवा परमानंद हैं, मात्र साक्षी है या उपभोक्ता भी है या इनमें से कुछ भी नहीं है.... तो क्या है आत्मा ?
    शंकर, यथार्थ आत्मा को विशय अथवा प्रमेय पदार्थ से भिन्न करते हुए, साधिकार कहते हैं कि विशय तथा विशयी, प्रकाश तथा अंधकार की तरह ही एक दूसरे के विपरीत है, अर्थात् आत्मा की यथार्थ सत्ता को स्वीकार करना, नित्य ब्रह्य की यथार्थसत्ता को स्वीकार करना है। ब्रह्य की यथार्थता का प्रमाण यही है कि वह प्रत्येक आत्मा की यथार्थभूमि है।
    भौतिकवादी देह, आत्मा और इंद्रियों को एक मानते हैं किन्तु शंकर का तर्क है कि यदि ये तीनों एक है तो प्रत्येक आत्मा की चेतना का स्तर समान होना चाहिए, प्रत्येक की अनुभूतियाँ समान होनी चाहिए जबकि व्यावहारिक जीवन में देखा जाता हैं कि प्रत्येक आत्मा की संवेदनशीलता का स्तर भिन्न होता है।
    यदि आत्मा का यथार्थस्वरूप ज्ञान को मान लें तो यह चेतनसत्ता जो अचेतन जगत् का कारण है, परिमित शक्तिशाली चेतना नहीं है, अपितु निरपेक्ष है। चूंकि चेतना में अनेक पदार्थ तथा घटनाएँ अवस्थित नहीं होती इसलिए इसे मानवीय चेतना के साथ नहीं मिलना चाहिए।
    आत्मा को प्रज्ञा के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानना चाहिए, प्रज्ञा ही उसका अनन्य स्वरूप है ठीक उसी तरह जिस तरह नमक की राशि का स्वरूप उसके नमकीन स्वाद में है।इसलिए यह स्वीकार करना चाहिए कि आत्मा में चैतन्यता सदैव विद्यमान रहती है भले ही ज्ञातव्य विशय उपस्थित न हो।
    आत्मा विशुद्ध प्रकाश है हमारे समस्त ज्ञान का आधार, हमारी दृश्टि का प्रकाश है। सतत् प्रवाहमान, ज्योतिनिर्झर के रूप में आत्मा की कल्पना की जा सकती है।
    थोड़ी देर के लिए प्रवचन रूका.... इस बार प्रवचनकर्ता की ओर ध्यान गया.... मुखमण्डल सदैव की भांति उद्भासित नहीं है.... गोरे मुख पर थोड़ी लालिमा है.... संभवतः शरीर स्वस्थ नहीं है.... तभी तो खल्वाट सिर और माथे पर पसीने की बूँदे झिलमिल कर रही हैं.... वाणी में भी ओज का अभाव है.... सोची साधु सन्यासियों का भी तो पंचभूत का शरीर है.... देह जन्य व्ययाधियों का प्रकोप उन्हें भी सहन करना ही पड़ता है.... यही तो प्रकृति का समाचरण है....।
    दो घूँट जल ग्रहण कर उन्होंने प्रवचन को आगे बढ़ाया.... शंकर का दर्शन अद्वैतवाद का पोशक है उन्होंने बताया कि जीवात्मा का ब्रह्य के साथ विलय ही मोक्ष है कर्म, कर्मबंधन और कर्मफल से मुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है....। रसबोध में बाधा पड़ी.... मंचस्थ प्रवचनकर्ता.... आसंदी पर लुढ़क गए थे.... मुखमण्डल लाल हो गया था, शरीर पसीने से तरबतर हो रहा था, एक हाथ से वे वक्षस्थल के बांयें भाग को थपक रहे थे....हाँ, हृदयस्थल पर ही पीड़ा अनुभव कर रहे थे....।   

देखो....देखो....पानी लाओ की पुकार मच गई.... दो युवा, बलिप्ठ कार्यकर्ताओं की मदद से उन्हें....मैं कार तक ले आई.... ड्राइवर को जल्द से जल्द डाॅक्टर तक ले चलने का आदेश दी.....।
    सारी क्रियाएँ इतनी त्वरित गति से हुई कि मैं स्वयं अवाक् रह गई.... जाने किस भावावेश में मैं उन्हें डाॅक्टर के नर्सिंग होम तक ले आई..... डाॅक्टर से अनुरोध की यथाशीघ्र उपचार के लिए..... निश्चय ही डाॅक्टर को स्थिति की गंभीरता का अंदाज हो गया था बिना वक्त गंवाये वे फौरन उपचार में जुट गए.....। मैं मठ दोनों कार्यकर्ताओं के साथ.... बेंच पर बैठ गई.... इसी समय नर्स बाहर आकर मरीज का नाम पूछने लगी.... क्या बताती.... मुझे भी तो कुछ मालुम नहीं था.... साथ आए व्यक्तियों में अपेक्षाकृत वयस्क व्यक्ति ने कहा- ‘‘हम लोग मठ में उन्हें जीवनचार्य के नाम से संबोधित करते हैं, पूर्व जीवन में उनका नाम क्या था, हम नहीं जानते.....।’’
    दूसरे कर्मचारी ने कहा - ‘‘लोगों से सुना है वे यहीं के हैं.... कांटाबांजी के पास बिस्नूपुर गांव में उनका जन्म हुआ था....।’’ यह जनश्रुति है इसमें सचाई कितनी है मैं नहीं जानता।
    मेरी चेतना में गर्म तेल की बूँदें पड़ी....बिस्नूपुर के बारे में पहले कहीं सुनी थी....किससे, कब सुनी थी....? याद करने की कोशिश की.....कुछ याद नहीं आ रहा था पर बेचैनी हो रही थी।
    करीब आधे घंटे बाद डाॅक्टर आए मुझसे पूछे आप इनके साथ आई हैं? सही समय पर आप इन्हें ले आई अन्यथा जीवन संकट उपस्थित हो जाता.... खैर डरने की बात नहीं है फिलहाल खतरा टल गया है.... दिल का दौरा पड़ा था....तात्कालिक उपचार हो गया है.... कुछ दवाईयाँ मंगा लीजिए....नींद का इंजेक्शन दे दिया है कम से कम तीन चार घंटे तो नींद में रहेंगे....।’’
    स्वस्ति की सांस ली डाॅक्टर को धन्यवाद दी....वे आगे बढ़ गए.... अब साथ आए लोगों की ओर मुड़ी- ‘‘भाई आप लोगों का परिचय तो नहीं जानती गाड़ी मेरे साथ है आप लोगों में से कोई मेरे साथ चलिए तो मैं दवायें भिजवा दूँगी....।
    वयस्क व्यक्ति ने कहा- ‘‘मेरा नाम प्रबोध है, इसका नाम गुणधर है, बहन! हम गृहस्थ नहीं हैं फिलहाल हमारे पास रूपये पैसे नहीं हैं। मठ जाकर ही रूपयों की व्यवस्था कर सकेंगे। आपने हमारे लिए इतना किया भगवान आपको सुखी रखे.....।’’ अरे....साधु सन्यासी भी हम गृहस्थों की भाशा बोलते हैं, भाव विह्नल होते हैं जानकर अच्छा लगा.... आखिर मानवीय संवेदनायें तो सभी में एक समान होती हैं।
    गुणधर को साथ लेकर बाजार गई.... दवायें खरीद कर उसे दी.... एक रिक्शा कर दिया हिदायत दी कि कोई एक जन वहाँ रूक जावें और दूसरा मठ में जाकर मठधीश को सारी स्थिति समझा दे....। गुणधर सहमा हुआ था बोला- ‘‘आप साथ चलकर प्रबोध को दवायें दे दीजिए..... आखिर आप मठ ही तो जायेंगी, आपके बाकी साथी तो वही हैं मैं भी आपके साथ ही मठ चलूँगा....।’’
    युक्तिपूर्ण बात लगी सो वापस नर्सिंग होम आए, प्रबोध को सब समझाकर....मठ आई....मठधीश से भेंट को उन्हें भी डाॅक्टर के विचार बताई....। माँ, सुबोध भाई, भाभी के साथ ‘परिचय’ लौटी....।
        इस भागमभाग में बिस्नूपुर भूल गई थी.... माँ के आग्रह पर पलंग में लेटी कि पीठ पर सपाक से चाबुक पड़ा.... तिलमिला गई.... कुसुम का बिस्नूपुर.... हे भगवान....जीवनाचार्य....बिस्नूपुर....कहीं कोई सूत्र तो है जो उलझ गया है.... सुलझाने की कोशिश में झपकी लग गई।

                    चौबीस

    माँ को भाभी के साथ कर दी, अनुरोध की, मेरी प्रतीक्षा न करके वे लोग..... घूम फिर लें..... मैं नर्सिंग होम जाकर पता करती हूँ..... आचार्य जी की तबीयत कैसी है ? माँ मुझे अकेली जाने देना नहीं चाहती थी उनकी नजर में मैं लड़की जात हूँ न..... सोचते ही हँसी आ गई बोली- ‘‘माँ! डरो मत, भूलो भी मत कि मैं पचास पार कर चुकी हूँ।’’
    खैर....गीड़ी....माँ लोगों को चाहिए होगी सोचकर बोली- ‘‘चलिए आप लोग मुझे नर्सिंग होम छोड़ दीजिए..... घूमघाम कर लौटते समय वहीं से मुझे साथ ले आइएगा.....।’’
    नर्सिंग होम पहुँची तो देखी प्रबोध और भी लोग हैं, मुझे देखकर सबने हाथ जोड़ दिए....बड़ी शर्म आई....कई तो मुझसे बड़े थे जो छोटे थे वे भी तो पूज्य ही हैं आखिर वे लोग मठ-निवासी....तपस्वी लोग हैं....। प्रत्युत्तर में हाथ जोड़कर बोली- ‘‘आप लोग मुझे लज्जित न करें और बताएँ कि आचार्य जी की तबीयत कैसी है?
    प्रबोध ने कहा- ‘‘अभी तक किसी को अंदर जाने की अनुमति नहीं मिली है, दवायें....नर्स को दे दिया था.....।’’
    नर्स ने उसी समय प्रवेश कर कहा- ‘‘मरीज को होश आ गया है डाॅक्टर साहब ने उन्हें नारियल पानी या ताजे फलों का रस देने को कहा है।’’
    ‘‘मैं ताजा नारियल लेकर आया हूँ।’’ बोलता एक ग्रामीण आगे आया अधेड़ उम्र का ही होगा..... मैं उसकी सहज बुद्धि की प्रशंसी किए बिना न रह सकी।’’
    डाॅक्टर के राउण्ड का समय हो गया था, तय हुआ कि मैं ही उनसे मरीज के विशय में बात कर लूँ....।
    करीब बीस मिनट बाद डाॅक्टर आये, बिना पूछे ही हँसकर बोले- ‘‘मैडम ! नारियल पानी दे दिया गया है, घंटे भर बाद जूस दीजियेगा.....सब संभल गया है.... कमजोरी तो है....आज उन्हें आई.सी.यू. में ही रहने दें वार्ड में आ गए तो आराम न करके, बातें करेंगे....कौन जाने प्रवचन ही शुरू कर दें....।’’
    डाॅक्टर की विनोद प्रियता ने आश्वस्त किया। मृत्यु से इतनी बार इन डाॅक्टरों का सामना होता है कि मृत्यु अपनी भयावहता खो देती है। यदि ये लोग मृत्यु को महज एक घटना मानकर न चलें तो इनके लिए भार हो जाएगा। जाते-जाते मुड़कर डाॅक्टर ने कहा- ‘‘आप में से कोई एक आदमी दो मिनट के लिए अंदर जा सकता है..... अधिक बातें न करें इतनी सावधानी रखिएगा।’’
    जाने किस आधार पर उन लोगों ने तय किया कि मैं ही अंदर जाऊँ.... आपत्ति की.... ‘‘मुझे वे पहचानते तो हैं नहीं....आप लोगों में से कोई जावे ताकि उन्हें आश्वासन मिल सके.... आदि-आदि कहा।’’
    हमारी बातचीत चल ही रही थी कि मठाधीश पधारे.....सो तय किया कि वे अंदर जायें.....संकेत से उन्होंने मुझे बुलाकर अपने पीछे आने को कहा।
    अगत्या चली....वैसे भी आई.सी.यू. से मुझे भय ही होता है....ऐसे ही आई.सी.यू.में मैंने अरूण का प्रस्थान देखा था....खुद को संभाली....शुभ....शुभ....सोचूं....।
    मठाधीश fनःशब्द खड़े रहे शायद भगवान से प्रार्थना कर रहे थे....आचार्य जी ने आँखें खोलकर हमें देखा....पलकें तुरन्त मुंद गई....क्षर्णाध में पलकें फिर उघरीं....ओठों पर कम्पन्न हुआ....फुस-फुसाती सी आवाज में बोलें....’कु....सु....म....।’ हे भगवान.... मैं ठीक सुन रही हूँ.... या कोई पूर्व स्मृति.... मेरी कल्पना को सच साबित करने पर तुली है.... मठाधीश जी की ओर देखीं....ओठों पर ऊंगली रखकर.... मौन रहने का संकेत किये.... धीमे से अपना हाथ.... आचार्य जी के माथे पर रखा.... इस बार आचार्य जी की पलकें तो अधखुली रहीं पर अपेक्षाकृत स्पश्ट स्वर में बोले....कुसुम....। अब संदेह के लिए स्थान नहीं था....।
    मठाधीश के पीछे-पीछे बाहर आने लगी तो उन्होंने कहा- ‘‘आपसे एक अनुरोध है कि आपने जो सुना उसके विशय में किसी से कुछ न कहें।’’ मौन स्वीकृति दी....बाहर आए तो उन्होंने खर्च किए रूपयों का जिक्र किया....।
    मैंने उत्तर दिया- ‘‘fचंता न करे, अधिक नहीं है, उतना खर्च मैं वहन कर सकती हूँ फिर नर्सिंग होग का बिल तो अभी तक आया नहीं है जब आवेगा आप लोग पेमेन्ट कर दीजिएगा।’’ गाड़ी का हार्न सुनकर बाहर देखी....माँ लोग आ गए थे....कल आऊँगी कह कर सबसे विदा लेकर गाड़ी में बैठ गई....।
    रात बड़ी देर तक जागती रही....घटनाओं के तार मिलती रही....। थक-हार-कर सोची जिस नियति ने घटनाओं का ये जाल बुना है वही समाधान भी करेगी। मेरे पास मौन दर्शक बने रहने के सिवाय कोई दूसरा उपाय तो है नहीं....।
    थकीं पलकें....कब मुंद गई पता नहीं चला....। नींद खुली तो कमरे में सूरज की सुनहरी किरणें शुभ प्रभात का संदेश दे रही थीं।
    बाथरूम से पानी गिरने की आवाज आ रही थी, समझ गई माँ नहा रही है....।
घंटी की आवाज सुनकर दरवाजा खोली भाभी खड़ी थी- ‘‘अरे, तुम तैयार नहीं हुई.....माँ जी कहाँ है, गाड़ी आ ही रही होगी.... अपने प्रश्नों का उत्तर सुनने की आवश्यकता उन्हें कभी नहीं रहती.... वैसे सरल हृदय हैं....हमारी उम्र में साल भर का ही अंतर होगा....या शायद उससे भी कम....पर अवसर पीते ही रौब जमाना भी नहीं भूलती....। रिश्ते में बड़ी होने का भरपूर लाभ लेती हैं.... इशारे से उन्हें बैठने को कहकर-कपड़े निकालने लगी तब तक माँ आ गई थी.... सुबह-सुबह भाभी के प्रश्नों की झड़ी में भींगने से बाथरूम में जाकर नहा लेना बेहतर समझ कपड़े उठा बाथरूम में घुस गई....।
    नहाकर आई तो माँ ने बताया आज चिल्का झील जाने की योजना है दिन भर लग जाएगा....रात आठ बजे तक ही लौटना होगा।
    क्षण भर के लिए जीवनाचार्य याद आये....फिर सोचीं मेरे कारण माँ लोगों का प्रोग्राम क्यों फेल हो? दूसरी बात मठ से या जीवनाचार्य जी से मेरी जान पहचान ही कितनी देर की है.....? हाँ एक जिज्ञासा है जो मुझे चैन नहीं लेने दे रही है किन्तु यह जिज्ञासा औरों के लिए अवांछित भी तो है,
    किसी के विशय में जानने का कौतूहल....ठीक है पर! कौतूहल भी तो कभी-कभी भद्रता की सीमाएँ लांघ जाता है जो दोनों पक्षों के लिए हानिकार होता है। मन को समझाई, दुनियादारी की याद दिलाई....। तब तक चाय आ गई थी....माँ को कहकर पीने का पानी मंगवा ली....गाड़ी आ गई थी देर न कर....हम सब चिल्का की ओर रवाना हो गए....।
    वहाँ पहुँचते....दोपहर होने में ज्यादा देर नहीं थी इसलिए रास्ते में ही एक शाकाहारी भोजनालय में सबने खाना खाया....ड्राइवर को थोड़ा सुस्ता लेने का समय देने के लिए आसपास घूम भी लिए....। यहाँ से आंधप्रदेश अधिक दूर नहीं है.....नारियल के ऊँचे-ऊँचे पेड़, केले के फलदार पेड़....प्रकृति प्रदत्त थे....तो कहीं घनी झाड़ियाँ भी मिलीं. घने ऊँचे पेड़ों की छांव....यात्रा को सुखद बना रही थी....।
    चिल्का झील....समुद्र की छोटी बहन ही है....किनारों में पानी ज्यादा गहरा नहीं है....विभिन्न पक्षी झील पर मंडरा रहे थे....सैलानियों की भीड़ भी थी....। पहली बार डाल्फिन देखी....। उड़ीसा सरकार ने पर्यटन स्थल के रूप में यहाँ को विकसित करने में कोई कसर नहीं उठा रखी है।
    मछलियों का संसार देखे....रंग-बिरंगी मछलियाँ.....आँखों को बाँध लेती हैं। यहाँ आकर मन शांत हो गया....सारी जिज्ञासाएँ शांत हो गई....मौन प्रकृति....कितना कुछ सिखाती रहती है इसका पता तो तभी चलता है जब हम उसके पास जाते हैं।
    शाम ढलते....ही वापसी की सोच रहे थे कि ड्राइवर ने सलाह दी सूर्यास्त देख लीजिए....बड़ा ही सुन्दर दृश्य होता है, जब झील के जल में दिन भर का थका सूरज डुबकी लगा लेता है.....। ठीक कहा था ड्राइवर ने....यदि न रूकते तो उस अभूतपूर्व दृश्य को देखने से वंचित हो जाते....।
    ‘परिचय’ पहुँचते तक रात के साढ़े नौ बज गए थे....थकान तो थी ही....कमरे में ही खाना मंगा लिए आज चारों ने साथ खाना खाया.....सुबोध भाई लोगों को कल सुबह दस बजे की गाड़ी पकड़नी होगी, उनका आरक्षक कfलंग एक्सप्रेस में है।
    हमारे पास कल का दिन और है परसों हम वापस होंगे उसी उत्कल एक्सप्रेस से....बिलासपुर फिर वहाँ से कोई टेªन पकड़ कर भिलाई।
    ‘‘रात बहुत हो गई अब सो जाओ बेटा’’ कहकर माँ सोने की तैयारी करने लगीं....उनके मुँह से गजेन्द्र मोक्ष का पाठ सुनना बड़ा अच्छा लगा....।
    माँ के सान्निध्य ने बरसों पहले छूट गए बचपन को इस कमरे में वापस बुला लिया है। उम्र के इस मोड़ पर अपने बचपन से मिलने को सुख वही जान सकता है जिसने कभी यह सुख भोगा है। दबे पांव आकर नींद मेरे और माँ के बीच पसर गई.....।
   

                    पच्चीस

    सुबह नौ बजे भाभी लोग चले गए। माँ से पूछी-अब कहाँ घूमोगी बताओ ? माँ झट बोल पड़ी- ‘‘चलो मंदिर चलते हैं। कोई पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम तो था नहीं इसलिए आराम से तैयार हुए आज माँ ने पैदल जाने की जिद की अजीब-सा तर्क दिया ‘‘तीर्थ यात्रा का पुण्य पैदल चलने से मिलता है....आज आखिरी दिन तो थोड़ा सा पैदल चलूँ....भले ही वापसी में धूप तेज हो जाने पर रिक्शा कर लेंगे....।’’
    माँ का मन रखना - उन्हें खुशी देना भी तो मेरी जगन्नाथ यात्रा एक उद्देश्य था-सो मंदिर चले....। आज लक्ष्य किया कि सुबोध भाई के सामने माँ कुछ संकुचित भाई के सामने माँ कुछ संकुचित सी रहती थीं आज बड़ी सहज लग रहीं, यहाँ के रिक्शे इतने ऊँचे क्यों है ? यहाँ के लोगों की खेती-बाड़ी नहीं है क्या ? जाने कितने प्रश्न पूछे जा रही थीं....मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था....मंदिर पहुँचे....तो मंदिर प्रबंधन कार्यालय के पास माँ रूक गई....पूछीं ‘‘ये कैसा आॅफिस है....?’’ दानकर्ता यहाँ दान देकर रसीद लेते हैं बताने पर....खुश हुई....बोली- ‘‘चलो-चलो....तुम्हारे पिताजी के नाम से कुछ दे आयें....।’’
    कार्यालय पहुँच कर पिताजी के नाम पर रसीद कटवा दी....माँ को बताई साल भर तक पिताजी के नाम पर मंदिर में खिचड़ी का भोग लगेगा....वे खुश हो गई....। रसीद हाथ में लेकर देखने लगीं....मैं भूल गई थी कि माँ पढ़ना जानती है। अपना नाम पढ़कर पूछी- ‘‘नोनी! तुमने मेरे नाम की भी खिचड़ी चढ़वाने की रसीद कटवा दिया है।’’ यह बात मैं उन्हें बताना नहीं चाह रही थीं....पर अब बतानी पड़ी....सोच रही थी कहीं नाराज न हो जावें....थोड़ी देर रसीद को हाथ में लिए खड़ी रही फिर बोली- ‘‘नोनी! तुमने अच्छा किया.....आत्मा तो समान होती है न? बेटा और बेटी का फर्क तो हम इंसान करते हैं भगवान तो नहीं करता।’’
    अच्छा लगा यह जानकर कि इस उम्र में जहाँ आम बुजुर्ग पूर्वाग्रह ग्रस्त रह अपनी और अपने लोगों के लिए परेशानियाँ बढ़ाते हैं, माँ कितनी प्रगतिशील विचारों वाली हो गई, मेरे लिए माँ के विचारों का यह परिवर्तन इस यात्रा का शुभ फल है...।         माँ का हाथ थाम....आगे बढ़ गई....आज अपेक्षाकृत कम भीड़ थी....इसलिए बिना किसी परेशानी के दर्शन हो गए....माँ ने पूरा मंदिर घूमना चाहा....तो आगे चले....मंदिर के बाईं ओर वाला आँगन पार कर रहे थे कि एक जगह तीर का निशान बनाकर ‘रसोई घर’ लिखा था- माँ ने इशारा करके कहा- ‘‘नोनी! चलो इधर चलें... यहाँ का रसोईघर संसार प्रसिद्ध है....।
    हम कूपन लेकर आगे चले....। उघाड़े बदन-घुटनों तक धोती पहने....पानी की कलसी कंधे पर उठाए लोग,...तो लकड़ियाँ उठाए....चलते लोग....दिखाई दिए....। अंदर जाने की मनाही थी....झिरी से झांककर देखे....। असंख्य चूल्हे जल रहे थे इस छोर उस छोर तक छोटी-बड़ी हांड़ियों में कहीं सब्जी-कहीं दाल, कहीं चांवल पक रहा था....एक मोरी से पसाए चांवल का मांड़ बहकर बाहर आ रहा था....थोड़ा और उचक कर झांकी....सौ लोग तो होंगे ही सब के सब मनोयोग पूर्वक काम में लगे थे.....मैं सोच रही थी इतनी गरमी में....चूल्हों की आंच के सामने काम करना पंचाग्नि तापने जैसा ही था। महाप्रसाद बनाना इनके लिए पुण्यZ कर्म है, सेवा है।
    पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इस काम में लगे रहते हैं....पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ....।
    कुछ देर और रूकते कि मेरे मोबाइल ने अपनी उपस्थिति दर्ज की....यहाँ आकर मैंने....’परिचय’ के मैंनेजर को अपना नंबर दिया था और किसी को भी नहीं दिया अनावश्यक फोन से बचना चाहती थी....जरूर कोई जरूरी बात होगी....हलो कहते ही उधर से आवाज आई ‘मैडम नर्सिंग होम से मठ वाले प्रबोध जी आए हैं आपसे बात करना चाहते हैं।’
    मेरी अनुमति लेकर फोन प्रबोध जी ने उठा लिया-नमस्कार कहकर उन्होंने सूचना दी जीवनाचार्य जी वार्ड में आ गए हैं, अच्छे हैं, मुझसे मिलना चाहते हैं।
    मिलना तो मैं भी चाहती थी पर दुविधा में थी....चलो अच्छा हुआ कि उन्होंने स्वयं बुला लिया अब fनःसंकोच मिल सकूंगी....।
    ‘‘ठीक है, मैं आधे घंटे में नर्सिंग होम पहुँच जाऊँगी कहकर फोन आॅफ की....इस बार कठिन परीक्षा सामने थी....कारण यह कि मंदिर परिसर में मोबाइल रखने की अनुमति नहीं थी.... प्रमादवश मैं साथ लिए चली आई थी....।
    लाख समझाने पर भी कत्तZव्यनिश्ठ जगन्नाथ सेवक ने हमें रिहाई नहीं दी....। फिर प्रबंधन कार्यालय आना पड़ा....जाने कितनी देर लगती कि रविशंकर मिश्रा आता दिखाई दिया, भगवान को धन्यवाद दी, सच कहूँ रविशंकर उस समय मेरे लिए देवदूत बनकर ही आया। कुछ आवश्यक, कुछ अनावश्यक चेतावनियों के बाद जान छूटी....रविशंकर को हार्दिक धन्यवाद देकर हम मंदिर से बाहर आए....गन्तव्य वहाँ से ज्यादा दूर नहीं....फिर भी माँ के साथ चलने में देर लगने की संभावना को ध्यान में रखकर रिक्शा बुलवाई.....रिक्शे के साथ-साथ मेरे विचार भी दौड़ने लगे.....।
    जीवनाचार्य जी ने मुझे क्यों बुलवाया होगा....? सांसारिक जीवों की तरह चुकी धन्यवाद देने की औपचारिकता का कोई अदृश्य बंधन तो उन्हें था नहीं। उनके साथ मेरा पूर्व परिचय भी नहीं था, रूपयों की वापसी के लिए तो पहले ही विनम्रतापूर्वक मना कर चुकी थी, फिर क्या बात होगी ?
    रिक्शा थमा तो देखी हम नर्सिंग होम पहुँच चुके थे, रिक्शे वाले को दस रूपये दिए....। माँ का हाथ पकड़ीं....आगे बढ़ने लगी....बमुश्किल दस कदम चले होंगे कि प्रबोध जी दिखाई दिए....दूर से ही मैंने हाथ जोड़ लिए, इसके पहले कि वे नमस्कार करें।
      कुशल मंगल जानकर मन आश्वस्त हुआ...प्राइवेट वार्ड था अतः साफ सुथरा व्यवस्थित तो होना ही था....स्टूल पर गुणधर बैठा था....हमें देखकर उठ खड़ा हुआ हुआ। मैंने जीवणाचार्य जी को नमस्कार किया....माँ का परिचय दिया.... तबीयत के बारे में पूछी तो मुस्कुरा दिए बोले- ‘‘ठीक हूँ....कल परसों तक मठ वापस सकने की उम्मीद है....।’’निर्निमेश मुझे देखते रहे.... फिर प्रबोध से बोले- ‘‘माताजी को आराम से बिठाओ और गुणधर तुम नारियल ले आओ.... छांटकर लाना....जिसमें पानी कुछ ज्यादा हो,....ताजा नारियल लाना....।
    आदेश का पालन हुआ....मेरी ओर देख बैठने का संकेत किए....पलंग के पास रखे स्टूल पर बैठे गई....। कौतूहल मेरी शिराओं, उपशिराओं में सिहरन पैदा कर रहा था।
मृदु स्वर में उन्होंने कहा- ‘‘मठाधीश जी ने मुझे बता दिया है कि उस दिन अर्धचैतन्य अवस्था में आपको देखकर मेरे मुँह से....पूर्व जीवन का भूला बिसरा नाम निकल गया था, आप अन्यथा न लें,....साथ ही आपको धन्यवाद भी देता हूँ, कृतज्ञ हूँ कि आपने नितान्त अपरिचित होकर भी मेरे लिए इतना कुछ किया....उत्तेजना उन्हें नहीं मुझे व्याकुल किए दे रहीं थी गंभीरता दूर करने बोली- ‘‘सांसारिक लोगों की तरह औपचारिक बातें आपसे भी सुनने को मिलेंगी सोची नहीं थी।’’ बीच में ही मुझे रोककर बोले- ‘‘यदि आपकी कोई जिज्ञासा हो तो fनःसंकोच उसे दूर कर लंे.... इस अभयदान ने मुझे साहस दिया और पूछ बैठी- ‘‘आपका पूर्व जीवन का नाम जीवन ही है न ? बिस्नूपुर का जीवन ?’’ स्वीकृति सूचक संक्षिप्त शब्द उनके मुंह से निकला हाँ....। फिर चुप....लगा गये। कुसुम सामने आ खड़ी हुई है कह रही है- ‘‘मैडम जी....जीवन कैसे हैं....मुझे याद करते हैं या नहीं ? प्रश्न वृद्धा गुलनार की माँ का नहीं था किशोरी कुसुम का था मुग्धा प्रणयिनी का....अंतर भींग गया, अनायास मेरे मुंह से निकल गया- ‘‘जीवन अच्छे हैं कुसुम....।’’ इस बार आचार्य चौंक उठे....वर्शों का मौन, आतुर स्वर बन बह निकला.... ‘‘आप कुसुम को जानती हैं, कहाँ है, कैसी है?’’ यह आतुरता जीवनाचार्य की नहीं थी यह थी सद्यः युवा प्रणयी जीवन की.....। तुरंत संभल गए वर्शों से अनुशासित, संयमित दिनचर्या ने चित्त की व्याकुलता को व्यवस्थित कर दिया, पुनः शांत हो गए....उत्तेजना की लहरें जो उठी थीं प्रशांत मानस सागर में विलीन हो गई....।
    इस बार निर्विकार भाव से बोले- ‘‘ईसाइयों में त्रुटि संशोधन के लिए ‘बवदfमेेपवदश् की परम्परा है, जो अनुकरणीय है, इससे मन का बोझ हल्का हो जाता हैं आज मैं भी आपके सामने वही बवदfमेेपवद कर भार मुक्त होना चाहता हूँ.....।’’
    डरते-डरते मैंने कहा- ‘‘किन्तु डाॅक्टर ने तो ज्यादा बोलने से मना किया है।’’ धीमें से हँसकर बोले- ‘‘जानता हूँ....प्रवचन का अभ्यास है.....बोलना हानिकर नहीं होगा....यदि आपको जल्दी न हो क्योंकि धीरे-धीरे ही बोल सकूँगा.....।’’
    उनके कथन का सारांश यह कि पिता से प्रताड़ित होकर घर छोड़ने के बाद कटक में उन्हें....मिशन छात्रावास में शरण मिली....पादरी का विशेश स्नेह मिला....पढ़ाई निर्विघ्न चलने लगी....कुछ बन जाने की तीव्र लालसा ने अच्छे नंबरों से मैंट्रिक करवा दिया.....।
    उत्कल विश्वविद्यालय से इलेfक्ट्रकल इंजीनियर की डिग्री लेकर लौटे तो फादर ने कटक में ही विद्युत विभाग में जूनियर इंजीनियर की नौकरी दिला दी.....। पहला वेतन हाथ में आते ही....फादर का शुक्रिया अदा करके गाँव पहुँचे....सबने स्वागत किया। बूढ़ी माँ तो थी....पिता के दर्शन न हो सके, दो वर्श पूर्व वे दिवंगत हो चुके थे.....। जिसे देखने....जिससे मिलने आये थे उसी के दर्शन नहीं हो सके....पता चला कि कुसुम ने भी उनके साथ ही गाँव छोड़ दिया था....बातों-बातों में बिरादरी वालों द्वारा की गई लांछना.... डांड़भात....सब सुना.....। नियति के क्रूर परिहास ने उन्हें तोड़कर रख दिया....वापस....लौट चले.....फादर के पास आए तो उनकी मंशा भी जाहिर हो गई वे चाहते थे कि जीवन परम दयालु ईसा मसीह की शरण में जायें....बपतिस्मा लेकर इसाई धर्म ग्रहण कर लें.....। फादर अपने किए उपकारों को याद दिलाने में भी पीछे नहीं रहे.....
आहत हृदय....विरक्त हो गया....नौकरी छोड़ दी....पुरी आ गए.....मठ में चलने वाले प्रवचनों से मन शांत होने लगा....संसार के प्रति मोहभंग तो हो ही चुका था....मठ में तत्कालीन मठाधीश से मंत्र दीक्षा ले लिए.....। स्मृतिमंथन में डूब गये जीवनाचार्य।
    इस बार वे बोले- ‘‘आदि शंकराचार्य के अद्वैत-दर्शन के अध्ययन से शांति मिली। नियति की क्रीड़ा-विलासिता अगम्य है तभी तो इस तरह आप मिलीं.....।’’
    मौन हो रहे जीवन....। अबकी बार मैंने कहा- ‘‘कुसुम भिलाई में है आज भी अविवाहित है, अपने आश्रय दाता की बेटी को ममता देकर माँ का कत्तZव्य पूरी तरह निभाया है उसने....मेरे घर आती है....।
    आत्मकथा सुनाते-सुनाते ही आपकी कथा भी सुना चुकी है अवश्य वहीं तक जहाँ तक उसका संबंध आपसे था.... आप दोनों का उत्तर जीवन तो एक दूसरे से भिन्न रहा है....वो आज भी नहीं जानती कि आप कहाँ हैं, कैसे हैं....? यदि आप अनुमति दे तो वहाँ जाकर उसे आपके बारे में बता दूँ....।
    धीर गंभीर आचार्य का रूप सामने था....जीवन अतीत के कुहासे में फिर विलुप्त हो गया था साथ ले गया था कुसुम को भी....।
    जीवनाचार्य ने कहा- ‘‘पूर्व जीवन की चर्चा सन्यासी कभी नहीं करते....विडम्बना यह है कि मैं मन से सन्यासी अब तक नहीं हो सका हूँ.....पूर्व जीवन की स्मृति अभी भी हृदय में व्यथा जगाती है इसीलिए स्वेच्छा से ही दंडधारी सन्यासी नहीं बना।
    जीवन संध्या प्रारंभ हो चुकी है....मोह....समाप्त हो गया है, स्मृति शेश है जो चेतना के जागृत रहते तक जीवात्मा के साथ रहेगी....। आवागमन के पथ पर मृत्यु एक पड़ाव मात्र है.... जीवन का अंत नहीं है, कृत कर्मों के अनुरूप पुनर्जन्म की प्राप्ति होती है, इस जन्म में नियति ने कुसुम और जीवन का साथ इतने ही दिनों का तय किया था....। नियति के विपरीत आचरण न तो शक्य है न शोमनीय....। जरा, मरण तो देहजनित क्रियाएँ हैं.... इसके लिए न तो शोक करें न मोह....। आपसे प्रार्थना है कुसुम से यहाँ के वृतान्त की चर्चा न करें.... उसके हृदय में अकारण मोह, संताप, व्यथा आदि भावनाएँ जन्म लेंगी....देह परिवर्तन के इन पलों में मैं फिर से उसकी व्यथा का कारण नहीं बनना चाहता....।’’
    समझ गई....अपनी भावनाओं को कठोर संयम से बांध लिया है जीवन ने.... अद्वैत दर्शन के अध्यवसायी जीवन के चित में एक छोटा-सा अंश....कोमल, अति संवेदनशील अंश अभी भी सुरक्षित है। प्रणय....समस्त आचार-विचारों, मत-मतान्तरों से अछूता है यह कोमल ‘नाजुक’ किन्तु इस्पात सम दृढ़ है.... ‘‘वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि....।’’
    कहने सुनने को कुछ बचा नहीं था....इस बार उन्हें प्रणाम कर....धीरे-धीरे कक्ष से बाहर आ गई....।
    समझ गई कि लौकिक प्रेम में इतनी शक्ति होती है कि वह पारलौकिक प्रेम का माध्यम बन जाता है। व्यश्टि में विलय ही प्रेम का यथार्थ स्वरूप है।
    यथा समय हम....पुरी यात्रा समाप्त कर घर आ गए।
   
उपसंहार

    प्रबुद्ध पाठकों को यह बताना जरूरी समझती हूँ....कि वापस आकर कुसुम से मिली पर अब उसे गुलनार की माँ की नजर से देखी।
    जीवनाचार्य को दिया वचन याद था, फिर मैं भी समझने लगी थी, जीवन के जो शेश दिन बचे हैं, उसमें नई बाधा क्यों उपस्थित करूँ ? अतीत को वर्तमान तो बनाया नहीं जा सकता, वर्तमान तो वैसे भी नाना समस्याओं से बोझिल है उस पर पूर्व स्मृति का बोझ और क्यों लादूँ ? एक मौन.... हजार सुख....।
    हाँ इतना अवश्य हुआ कि गुलनार की माँ की इज्जत मेरी दृश्टि में और बढ़ गई।
    यदि प्रबुद्ध पाठक मेरे दृश्टिकोण से असहमत हों तो विनम्र क्षमायाचना के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प मेरे पास नहीं है, जिसे अपनाकर इस उपन्यास के समापन तक पहुँच सकती....।
                       
इत्यलम्।
सरला शर्मा           

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