बालिकाओं के खेल गीत - फुगड़ी

फुगड़ी छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध खेल है, जो लड़कियों के द्वारा खेला जाता है। इस खेल में कम से कम दो से लेकर बारह पंद्रह लड़कियाँ शामिल हो सकती हैं। खेल शुरू होने के पहले सभी लड़कियाँ एक पंक्ति में उकडू बैठ जाती हैं और लीपने की तरह जमीन पर हाथ फिराते हुये गाती हैं -

गोबर दे बछरू गोबर दे
चारों खूंट ला लीपन दे
चारों देरानी ला बइठन दे
अपन खाते गुदा-गुदा
मोला देथे बीजा
ऐ बीजा ला काय करहूँ
रई जहूं तीजा
तीजा के बिहान दिन सारी सा री लुगरा
हेर दे भउजी कपाट के खीला
काँव-काँव करथे मंजुर के पीला
एक गोड़ म लाल भाजी, एक गोड़ म कपूर
कतेक ला मानव मैं देवर ससुर।
फुगड़ी के फूँवा फूँ
फुगड़ी के फूँ।

'फुगड़ी के फूँवा फूँ' की आवाज निकालते हुये उकडू बैठने की स्थिति में ही दोनों पैरों को विपरीत दिशा में छटकाती हुई फुगड़ी खेलना शुरू कर देती हैं। जो लड़की अंत तक बिना रुके खेलती रहती है, वह विजयी होती है। इस गीत में छत्तीसगढ़ी संस्कृति की छुवन है। कृषि की प्रधानता होने के कारण लड़कियाँ बछरू यानि बछडे़ से गोबर माँग रही हैं और घर आँगन के कोने-कोने को लीपना चाह रही हैं। इस गीत में ससुराल की तकलीफों का, जेठानी के व्यवहार का जिक्र है, जो खुद फल का गूदा खाती है और उसे फल का बीज देती है, जिसे खाया नहीं जा सकता। इसलिये वो छत्तीसगढ़ का सुप्रसिद्ध त्योहार तीजा यानि बिना अन्न-जल ग्रहण किये उपवास करने की बात कहती है। 'कतेक ल मानव मैं देवर ससुर' कहने में ये अलग ध्वनित होता है कि मैं तो देवर और ससुर अर्थात् छोटे-बडे सभी का आदर करती हूँ, इस पर भी अगर वे संतुष्ट नहीं हैं तो फिर मुझे भी इसकी कोई
परवाह नहीं है। मैं तो अब फुगड़ी खेलूँगी। बंधनों के प्रति एक बेपरवाही भी झलकती है। जो छत्तीसगढ़ की प्रमुख विशेषता है। यहाँ स्त्रियों पर बंधन अन्य समाजों की तरह सख्त नहीं हैं। इस तरह इस गीत में छत्तीसगढ़ की विशेषताएँ स्वत: झलक उठती हैं।

आले आले डलिया
पाके बुंदेलिया 
राजा घर के पुतरी
खेलन दे फुगड़ी
भरवा काड़ी के पटा बना ले
सिकुन काड़ी के गुजरी
आबे रे पंचालिन टूरी 
संगे खेलबोन फुगड़ी
फुगड़ी के फूँवा फूँ
फुगडी के फूँवा फूँ।
अर्श गोटी पर्श गोटी
का का बनी दे
अइसन बिज्जति भइया
फुगड़ी खेलन दे
फुगड़ी के फूँवा फूँ
फुगड़ी के फूँ।

इस गीत में लड़की दूसरे मोहल्ले की लड़की को फुगड़ी खेलने का आमंत्रण देते हुये कहती है- हमारे पास राजा के समान धन सम्पति और पुतरी (गहना) नहीं है, पर हमारे पास डलिया भर पके हुये टमाटर हैं। यानि हमारी मेहनत का फल हमें मिला है और साथ ही मिला है वो अवसर कि हम जी- भर के खेल सकें । तुम भी आना हम मिलकर साथ में फुगड़ी खेलेंगे। अंतिम पद में मन माफिक मजदूरी न मिलने पर मजदूर औरत कहती है कि क्या भैया आपने मन माफिक मजदूरी तो दी नहीं, चलो कोई बात नहीं मगर हमें फुगड़ी तो खेलने दो। इस खेल में जीत के बाद जो जीत जाती है, वो हारी हुई लडकियों को चिढाते हुये गाती है -

हारगे भउजी हारगे
लीम तरी पसारगे
लीम मोर भैया
तैं मोर भउजइया
फुगड़ी के फूँवा फूँ
फुगड़ी के फूँ।

अर्थात् हारने वाली इतनी बुरी तरह हारी है कि पस्त होकर नीम के नीचे पसर गयी है। अब वो मेरी भाभी है, क्योंकि जिस नीम के नीचे वो पसरी पडी है, वो मेरा भाई है। इस नाते वो मेरी भाभी बन गयी है। इसी तरह इन पंक्तियों के माध्यम से भी हारने वाली को चिढ़ाया जाता है -

बेल बाई बेल
कांटा छबेल
मारेंव मुटका
हेरेंव तेल
फुगड़ी के फूँवा फूँ
फुगड़ी के फूँ।

अर्थात् ये हारने वाली बेल के काँटे के समान तेज थी, मगर मेरे सामने टिक नहीं पाई, मैंने एक ही मुक्के में इसका तेल निकाल दिया। यानि मैंने इसे बुरी तरह से हराया है।

- उर्मिला शुक्ल
यू ट्यूब में उपलब्‍ध एक फुगड़ी गीत और खेल प्रदर्शन वीडियो -

छत्‍तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्‍सों में प्रचलित फुगड़ी गीत का महत्‍वपूर्ण संकलन आलोक शुक्‍ल जी की साईट में भी है।

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1 Comments

  1. बहुत सुन्दर , अब तो कोनो फुगड़ीच नइ खेलय लागथे।

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