मंदराजी... एक सार्थक और जरूरी फिल्म

- वीरेन्द्र बहादुर सिंह- मुन्ना बाबू

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद बहुमुखी विकासक्रम में क्षेत्रीय फिल्मों का निर्माण और प्रदर्शन ने कई उतार चढ़ाव देखे तब जाकर आज छत्तीसगढ़ी फिल्मों को अपना एक दर्शक वर्ग मिला है। यह यहां के समर्पित कलाकारों-निर्माता निर्देशकों की तपस्या का ही परिणाम है। इसी क्रम में आज जहां व्यवसायिक लटके-झटके, मारधाड़, प्रेम-मुहब्बत की कहानियों वाली फिल्में धूम मचा रही हैं, वहीं नाचा के पुरोधा स्व. मंदराजी की बॉयोपिक का निर्माण-साहस करने वाले सारवा ब्रदर्स की जितनी तारीफ की जाए कम है। सारवा ब्रदर्स ने नाचा के भीष्म पितामह दाऊ दुलार सिंह 'मंदराजी पर बॉयोपिक फिल्म का निर्माण कर छत्तीसगढ़ की जनता के समक्ष एक सार्थक और जरूरी फिल्म को प्रदर्शित किया है, जो एक साहसिक कार्य है।

लोक विधा नाचा में छत्तीसगढ़ की आत्मा बसती है। पाश्र्व संगीत के झंकार से मन मयूर नाच उठता है। आज की पीढ़ी के लिए यह दुर्लभ है, किन्तु युवा निर्देशक विवेक सारवा ने इस फिल्म के माध्यम से इस विषय की महत्ता और अनिवार्यता को प्रदर्शित कर सही समय पर सही कार्य किया है। बायोपिक फिल्म में सिलसिलेवार नैरेशन, पाश्र्व संगीत के साथ दृश्यों का आगे बढऩा दर्शकों को न केवल उस समय-काल में ले जाता है अपितु प्रापर्टी, मेकअप, सेटअप, कास्ट्यूम्स आदि संपूर्ण फिल्म से जोड़ देता है। इसमें दो मत नहीं कि फिल्म के संवाद बड़े सरल और मर्मस्पर्शी है। पात्रानुसार कलाकारों का चयन और उनका वितरण, पात्रों की भंगिमा में ढल जाना दर्शकों को प्रभावित करता है। हेमलाल कौशल की अदाकारी जहां दर्शकों को खूब पसंद आयी, वहीं केन्द्रीय भूमिका में करण खान ने दर्शकों का मन जीत लिया। मंदराजी की पत्नी की भूमिका में राजनांदगांव की ज्योति पटेल की जितनी तारीफ की जाये कम है। पिता की भूमिका में अमर सिंह लहरे और मां की भूमिका में लता ऋषि चन्द्राकर ने अपने पात्रो के साथ भरपूर न्याय किया है। लोहार की छोटी सी भूमिका में नवीन देशमुख, अंग्रेज सार्जेंट के रोल में राजू शर्मा और वेदप्रकाश चंदेल (चुकुल) दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहे हैं । शेष सहायक पात्रों ने बड़ी संजीदगी के साथ अपने पात्रों को जीया है, यह एक बड़ी बात हैं।

फिल्म का दृश्यांकन, मेकअप, कंटीन्यूटी, शेड अब तक निर्मित किसी भी कलात्मक फिल्म से कहीं कमतर नहीं है। इससे बड़ी कलात्मकता और क्या देखना चाहते हैं कि अंतिम दृश्य में मंदराजी की मृत्यु के दृश्य का कथन चिकारा के गिरने और टूटने के संकेत के साथ दिखाया गया है। यह निर्देशक की उद्दाम कलात्मक सोच है और इस सोच का दर्शक वर्ग इससे संतुष्ट है। दृश्यों की कैप्चरिंग बड़ी मन भावन है। खेत-नदी-नाले बांध से गुजरते हुए कलाकारों का दृश्यांकन आंखों को सुकून देता है, वहीं दशकों से आर्टिफिशियल, चमकदार, भव्य लाइट शेड की चकाचौंध से ऊब चुके दर्शकों को प्राकृतिक दृश्यों, हरियाली, नदी, नाव, गांव, मिट्टी के घर देखने के बाद मन को प्रसन्नता प्रदान करती है।

पाश्र्व संगीत कथानुरूप है और गीत कर्णप्रिय हैं। महादेव हिरवानी और कविता वासनिक सहित अन्य गायक-गायिकाओं की आवाज सिनेमा हाल में बैठे दर्शकों को वाह कहने पर मजबूर कर देती है। कुल मिलाकर 'मंदराजी' एक जरूरी फिल्म है जो दर्शकों को पूरी अवधि तक बांधे रखती है। छत्तीसगढ़ में फिल्म निर्माण क्षेत्र की दिशा में बॉयोपिक निर्माण की यह पहल  रूकनी नहीं चाहिए। यह फिल्म राजनांदगांव के कमल टॉकीज में लगी है। दर्शकों को इस फिल्म को देखने जरूर जाना चाहिए। फिल्म के टाइटिल में सभी सहयोगियों का नाम दिया गया है जो निर्देशक की सदाशयता है। फिल्म के निर्माता किशोर सारवा और नंद किशोर सारवा, गीत-लक्ष्मण मस्तुरिया, संवाद नवीन देशमुख, छायांकन नागेश सारवा और रमाकांत सारवा, कोरियोग्राफर और मेकअप विलास राऊत, पार्श्व  स्वर संजय बत्रा और संपादन तुलेन्द्र पटेल का है।

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