बिलासपुर वैभव: तीसरा विकास लोग जनसंख्या

लोग
जनसंख्या Population
सन् 1921 की गणना के अनुसार बिलासपुर जिले की जनसंख्या 11,94,590 है। इनमें 7,82,859 पुरुष और 6,11,731 स्त्रियाँ है। सन् 191 में यहाँ की जन संख्या 91,46,223 थी। सन् 1911 की गणना के अनुसार तहसीलवार जनसंख्या यों थी - बिलासपुर तहसील - 3,66,150, मुंंगेली तहसील - 2,14,851, जांजगीर तह. - 4,08,258, कटघोरा तह. - 1,56,964 । बिलासपुर तहसील में 936, मुंगेली तह. में 942, जांजगीर तह. में 850 और कटघोरा तह. में 766 गाँव हैं। इस प्रकार कुल गाँवों की संख्या 3464 है। इनमें कुछ गाँव ऐसे हैं, जहाँ बस्ती नहीं है।

जाति Caste 
इस जिले में अनुसूचित जाति को संख्या सबसे अधिक है। उनका औसत 20 सैकड़ा निकलता है । फिर गोंड, रावत, तेली, पनिका और कुर्मियों का नंबर है। जमींदारियों को छोड़ खालसे में ब्राह्मण, बनिया और कुर्मी ही ज्यादा मालगुजारी करते हैं।

अनुसूचित जाति
अनुसूचित जाति की मालगुजारी कुल 81 गाँवों में हैं। इनका शरीर दृढ सांचे में ढला-सा होता है । ये अधिकतर किसान हैं या किसानी कामों के लिए दूसरों नौकर (कमिया) । हैं। प्रत्येक गाँव का एक पैकहा होता है। इसका बस्ती के मरे हुए ढोरों पर हक होता है। इसे प्रतिवर्ष गाँव के मालगुजार को  जितने जोडे़ जूतों की जरूरत हो, मुफ्त देना पड़ता है। स्न्रियाँ दाई का काम करती हैं।

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ब्राह्मण Brahmin
ब्राह्मण संख्या में तीन सैकडों से भी कम हैं, पर मालगुजारी भोग रहे हैं 26 सैकड़ा गाँवों की। बात यह है कि पुराने जमाने में राजाओं के यहाँ इनका बड़ा मान था। बिम्बाजी राजा के समय में महाराष्ट्र ब्राह्मणों ने क्या मालगुजारी, और क्या माफी, अनेक गाँव प्राप्त किये थे। छत्तीसगढ़ी ब्राह्मणों में अधिकांश कनौजिया या सरवरिया हैं । इनका कहना है कि हम पचास पुश्तों से यहाँ निवास कर रहे हैं। लोगों का विश्वास है कि राजा कल्याण साय के समय में (सन् 1536-1573) ब्राह्मण बहुत बड़ी संख्या में उत्तर भारत से  यहाँ आ बसे थे। इन ब्राह्मणों में सकार्रा, सिंघरी और मोछ के मालगुजारों Malguras of Sakarra, Singhari and Mocha का घराना बड़ा ऊँचा समझा जाता है। ये आपस में चचेरे भाई हैं। ये अपने पूर्व पुरुष की कथा यों बताते हैं -अयोध्या के पास त्रिफला नामक गाँव में पं. मानिकदेव बडे़ विद्वान थे । ये पुरी-यात्रा को गए और लौटती बार रतनपुर राज दरबार में अपनी पंडिताई का चमत्कार दिखाकर राजा को प्रसन्न कर लिया। राजा ने इन्हें राजपुरोहिती दे दी। ये यहीं रह गए। इस समय इस वंश के पं. हीरालाल मोछ वाले राजमान्य पुरुष हैं।
दूसरा परिवार खेड़ा ( तह. मुंगेली ) के पांडे का है । इनके 13 गाँव हैं और 11 गाँवों में हिस्सा है। ये अपने पूर्व पुरुष का नाम अधार पाण्डेय बताते हैं। करनौद और लोहरसी के तिवारी भी अच्छे ब्राह्मणों में गिने जाते हैं । ये कोई 31 गाँवों की मालगुजारी भोग रहे हैं।

महाराष्‍ट्र के ब्राह्मण
मुख्य महाराष्ट्र ब्राह्मण परिवार में एक तो रतनपुर के मालगुजार हैं। ये अपने पुरखों की कथा यों बताते हैं- बालापुर (अकोला) में कोई सखाराम गोपाल थे। वे वहाँ के कमायसदार थे। माधवराव पेशवा की चढाई होने पर ये निजाम की नौकरी छोड़कर नागपुर चले आये और पेशवा के प्रतिनिधि चिमनाजी बापू के साथ उड़ीसा की लड़ाई में चले गए। वहाँ ये उडीसा के सूबेदार बना दिए गए । बुढापे में ये रतनपुर चले आये और वहीं परलोकवासी हुए। तब इनका लड़का वहाँ का कमायसदार नियत कर दिया गया। तबसे फिर इनके वंशजों के हाथ में रतनपुर की मालगुजारी आ गई। इस समय ये तीन भाई हैं और जुदा कारबार करते हैं।
दूसरा प्रसिद्ध घराना शास्त्रियों का है। इनके दो भाग हैं। एक दिघ्रस्कर दूसरा विठालकर। इनके पूर्वज दिघ्रस नामक गाँव के निवासी थे।
इस वंश के कृष्णभट्ट, बिम्बाजी राजा के साथ रतनपुर चले आये और मुख्य राजपुरोहित हो 22 गाँवों की माफी भोगने लगे, पर अब माफी गाँव अधिक नहीं रह गए हैं। इनके वंश के पं. विश्वनाथ एकीस्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर थे। पं. रघुनाथराव शास्त्री और पं. रामचंद्रराव उर्फ रामभाऊ इस वंश की एक-एक शाखा के मुखिया है।
विठालकरों पूर्वज भी सतारा के बिठाल नामक गाँव के निवासी थे। ये भी भोंसला सरकार के पुरोहित थे, पर इनका दर्जा दोयम था। इन्हें भी दो गाँव माफी में भिले थे। इस वंश के पं. गोविंदशास्त्री शास्त्र और पुराणों के अच्छे ज्ञाता हैं ।

तेली Teli
तेलिथों की संख्या 7 सैकडा है। 80 गाँवों में इनकी मालगुजारी है। झिरिया, जंगली, इकबहियाँ आदि इनके कई भेद हैं। एक हाथ में काँच की चूडियों और दूसरे में रांग के कडे़ जिन तेलियों की स्वरियाँ पहनती हैं, उन्हें इकबहियाँ कहते हैं ¦ तेलियों की घानी सदा दायें से बायें घूमती हैं। तिलहन पदार्थों के भहँगा होने और परदेशी मुसलमान तेलियों के आ जाने के कारण यहाँ के तेलियों का रोजगार मारा जा रहा है। ये अब खुद तेल पेरने के बदले टुकानों से देशावरी तेल खरीदते हैं और लोगों में बेचते हैं।

रावत (अहीर) Ravat
7 सैकडा हैं, पर मालगुजारी केवल 11 गाँवों में है । ये 2 चराने का धंधा करते हैं । गृहस्थों में इनकी बड़ी माँग रहती है । ये नौकरी करते हैं और इमकी स्त्रियाँ चौका-बासन। छत्तीसगढ़ में यही एक जाति ऐसी है, जिसके हाथ का पानी महाराष्ट्र जाति को छोड़ सब पीते हैं।

कुर्मी Kurmi
कुर्मी अनुमान 5 सैकड़ा हैं। 160 गाँवों में इनकी मालगुजारी है। इनके मुख्य चार भाग हैं । देशहा, चंदनाहू, सरेठी और सनौढिया। देशहा कुर्मी मुंगेली तहसील में अधिक पाए जाते हैं। चंदनाहू, जांजगीर तहसील में ज्यादा हैं। पतरिया नामक एक खण्ड इनका और है, पर ये छोटी नजर से देखे जाते हैं, क्योंकि ये सन की खेती करते हैं और खेती में पतरी पर भोजन करते हैं । कुर्मी बडे़ किसान होते हैं। (Desha, Chandanahu, Sarethi and Sanodhia)

बैरागी, गुंसाई Bairagi Gusai
बैरागी, विष्णु और गुंसाई शिव के उपासक हैं । इनकी संख्य। लगभग 8000 हैं ¦ सच पूछिये तो ये अपनी जगह से बहुत नीठें गिर गए हैं । इनमें अब उस आत्मत्याग और सरलता के भाव नहीं रहे, 'ओ वास्तव में इनके मुख्य गुण होने चाहिए। इनमें से बहुतेरों ने अच्छी जायदाद बना ली है और पूरे गृहस्थ बन गए हैं । उदाहरण के लिए लोरमी के तालुकेदारों को ही ले लीजिए-इनके 104 गाँव हैं । जिले में दो-एक और मातबर आसापी हैं । इनके मातबर होने का कारण है । ये पुराने जमाने से मंदिर के पुजारी या मठ के महन्त होते आये हैं। उस समय मंदिर या मठ के खर्च के लिए राज्य की ओर से गाँव लगा दिए जाते थे। सिवा इनके जन साधारण से भी अच्छी चढोत्तरी हो जाया करती थी। सो से धीरे-धीरे धनी हो गए। गाँव खरीद कर जायदाद बढा ली। अपनी जगह पर दूसरा पुजारी रख दिया और आप गुलछर्रे उड़ााने लगे। ब्याह करना मना है, पर वह भी कर लिया। बाल-बच्चे भी हो गए। पूरी गृहस्थी भोगने लगे। नांदगाँव और छुई खदान के राज्य इसी प्रकार जमे हैं।
बैरागियों के नाम के पीछे दास लगा रहता है, जैसे भरतदास और गुंसाइयों के नाम के पीछे गीत या पुरी जैसे गनपतगीर, दामोदरपुरी। निहंगों का एक मठ शिवनारायण में है। इस मठ में कुल 18 गाँव लगे हुए हैं, जिनमें 6 गाँव माफी हैं।इस समय इस मठ के महंत लाल दासजी बडे सज्जन पुरुष हैं।

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गोंड Gond
गोंड फी सैकड़ा 13 हैं। जमींदारों को छोड दें तो इनके अधिकार में केवल 31 गाँव रह जाते हैं। लोगों का विश्वास है कि आयोग के आने के पहले कुल मध्यप्रांत में गोंडों का राज्य था और इसलिए यह गोंडवाना भी ३ कहलाता था। इस समय इस प्रांत में ऐसा कोई भी जिला नहीं है, जहाँ ये बड़ी संख्या में न पाये जाते हों । इनके अधरिया, भिम्मा, ढोलेस आदि कई भेद हैं। माल खरौद के माफीदार राजगोंड़ हैं । ये देवगढ़ को अपना आदि स्थान बताते हैं। इनके अधिकार में फुलझर जमींदारी भी आ गई है।
बिर्रा Birra का गोंड़-परिवार अपना संबंध चांदी जिले के एक जमींदार वंश से बताता है । कहते हैं घराऊ झगडे़ के कारण धुरवा नामक पुरुष घर (चांदा जिला) छोड़ कौडि़या (जिला रायपुर) चला आया। घुरवा के एक पोते ने, जिसका नाम जोहरसिंह था, कौडिया छोड दी और बिर्रा चला गया। रतनपुर- राजा की सेना में नाम कमा कर इसने 50 गाँव प्राप्त किये, पर चीजम साहब के बंदोबस्त में इसके वंशज केवल 116 गाँव के अधिकारी माने गए। ये लोग अपने को गढामंडला के राजगोंडों का जाति-बिरादर बतलाते हैं।

पनिका Panika
पनिका 6 सैकडा हैं। ये गांडा या बजगरी (बाजा बजाने वाले) जाति से कुछ ऊँचे समझे जाते हैं। ये प्राय: कबीरपंथी होते हैं और मांस, मदिरा और मादक पदार्थों से परहेज रखते हैं। इस जिले के तीन चौथाई गाँवों में आप पनिका जाति के कोटवार पावेंगे।

कंवर-तंबर Kanwar Tanwar 
पंडरिया और कंतली के जमींदारों को छोडकर इस जिले के शेष आठों जमींदार जाति के कंवर हैं। ये 5 सैकड़ा हैं। कहते हैं-इनके पुरखों ने कौरवों की ओर से पाण्डवों के साथ युद्ध किया था, इससे ये कंवर कहलाये, पर जितने जमींदार हैं, वे अपने को कंवर के बदले तंवर कहते हैं और अपना पूर्व संबंध तुअर राजपूत से बतलाते हैं। कंवर जाति के आठ भेद हैं। आठवें भेद में जमींदारों की गणना होती है और वे तंवर या उमराव कहलाते हैं।
करगी Kargi के ठाकुर खुशालसिंह Thakur Khushal Singh तंवर हैं। करगी इलाके में 32 गाँव हैं। कहते हैं कि ये सब गाँव इनके एक पुरखे को उसकी शूरवीरता के कारण मिलते हैं। इनके इस पुरखे ने अपनी एक बंदूक से दूसरे जंगली जानवरों को छोड़ 155 सिंह मारे थे। यह बंदूक अब तक इस वंश में है। इसकी पूजा होती है। कोरी, सरखों और पंतोरावाले भी तंवर जाति के हैं।

बनिया Baniya
मराठों के समय में बखतदानी नामक एक बनिया उत्तर-भारत में आकर चंद्रपुर जमींदारी के एक गाँव में बस गया, पर उसके पुत्र मंत्रमधु साब ने स्थान बदल दिया और भैंसों गाँव (जांजगीर तह.) में घर बनाया। फिर उसे स्थान बदलने की सूझी। अबकी बार उसने कोसगाँव ( जांजगीर तह.) में घर बनाया। उसका पुत्र शंकर साव हुआ। इसने अपनी पुरखौती नीति को ध्यान में रख बिलासपुर में अपना घर बनाया और तबसे फिर इसके वंशजों ने पुरखों की नीति पर चलना छोड़ दिया और यहीं जमे हुए हैं। शंकर साव ने पहले मल्लार गाँव प्राप्त किया । फिर जब उसका लेन-देन बढ गया, तब तो उसने कई गाँव प्राप्त किये। इस समय इस वंश के मुखिया श्रीयुत अयोध्या प्रसाद जी और गेंदरामजी, दो भाई हैं। इनके गाँवों की संख्या करीब 51 है।
हैहयवंशी राजा कल्याणसिंह के समय में चैनसिंह नामक एक अगरवाला बनिया दिल्ली से रतनपुर आया और दरबार में नौकर हो गया। आगे चलकर इस वंश में घासीराम साव हुए । इन्होंने इस जिले के जमींदारी और तालुकेदारों के साथ खूब साहूकारी की। सन् 1873 में ये 100 रुपये मासिक वेतन पर खैरागढ़ दीवान हो गए। इनके वंशवाले अब 27 गाँवों की मालगुजारी भोग रहे हैं। घासीराम साव के छोटे भाई महर साव थे। इनके वंश में इनके पौत्र बाबू बालारामजी बी.ए. वकील हैं।

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राजपूत Rajput
इस जिले के राजपूतों में कई भेद हैं। चंद्रपुर के तालुकदार सुरवार राजपूत हैं। इनका गोत्र गर्ग है । ये कहते हैं-दिल्ली के निकट जो सिनपोस रियासत है, उसके राजा सूरजसिंह के हम वंशज हैं। हमारे पूर्वज सिरगुजा राज्य में नौकर थे। हमारे एक पुरखा बहादुरसिंह सरईकेला के राजा अभिराम सिंह के यहाँ नौकरी करने लगे। वहाँ उन्होंने एक अंग्रेज ऑफिसर को कोल और सन्तालों के मचाए हुए बलवान के दबाने में बड़ी सहायता पहुँचाई। उनके बाद उनके द्वितीय पुत्र रूपसिंह ने जो संबलपुर जिला में मुनसिफ थे, सन् 1857 के बलवे में अंग्रेजों को अच्छी सहायता दी थी। इसके बदले में उन्हें रायबहादुरी और 6 जमींदारियाँ इनाम में दी गईं। पीछे ये जमींदारियाँ वापस लेकर उनके असल मालिक को दे दी गई और इन्हें बदले में चंद्रपुर और पद्मपुर की जमींदारियों मिलीं। आजकल इस वंश के मुखिया ठाकुर भवानी शंकरसिंह हैं।
किसी सम्य मेवाड (जोधपुर) से झ सिंह नामक दो भाई जगन्नाथपुरी की यात्रा के लिए गए और वापसी में सिग्गुजा में नौकरी कर ली। बाद में ये रतनपुर राजा के आश्रय में गए ¦ ये पोंडी गाँव को अपना प्रथम स्थान बतलाते हैं। जब इस जिले का पहली बार बंदोबस्‍त हुआ, तब इस वंश में केवल 6 गाँव थे, पर पीछे से साहूकारी द्वारा खूतर धन कमाया गया और 45 गाँव और प्राप्त किये गए। इस सम्य इस वंश के भुखिया ठाकुर मनमोहनसिंहजी तथा ठाकुर विशालसिंहजी के भतीजे ठाकुर छेदीलालजी एम.ए. (आकसन) बैरिस्टर हैं।

भोंसला Bhonsala
चौहान राजपूतों की दासी स्त्री की संतान समझे जाते हैं। 'चौहान चोर' प्रसिद्ध हैं। ये देहातों में कोटवारी भी करते पाए जाते हैं। नरगोडा-गाँव के भोंसलों का कहना है कि हम लोग रतनपुर राजा बिंबाजी के काका महाजी के वंशज हैं। महाजी, बिंबाजी की सेना में 1000 घुडसवार और 2000 पैदल सेना के आफिसर थे। यह नरगोडा गाँव उन्हें माफी में मिला था और 200 मासिक वेतन भी मिलता था । उसके वंशज अब भी यह गाँव माफी भोग रहे हैं।
दूसरा भोंसला परिवार चिचिरदा गाँव में हैं। ये कहते हैं कि हम लोग बिंबाजी की छोटीरानी की बहन जीजीबाई की संतान हैं। जीजीबाई को उसके पति के मरने पर 3000 रुपये सालाना पेंशन मिलती थी तथा तीन गाँव माफी दिए गए थे। चिचरदा गाँव का माफी हक अब जाता रहा है तथा जीजीबाई के समय में मिलनेवाली पेंशन अब 128 रुपये मात्र रह गई है।

मुसलमान Muslim
मुसलमानों के घरों में मुंशी अकबर खाँ का घराना प्रसिद्ध है। इनके पूर्वज भोंसला-सरकार की सेना में सूबेदार थे। इनके 48 गाँव हैं। इनके सिवा बहेलिया, बंजारा, बरई, बरगाह, बसोर, बेल्दार, दरजी, ढमार, धोबी, धूरी, भाट, भील, कहार, कलार, कसेर, केवट, कोष्टा, लुहार, लोधी, माली, महरा, मेहतर, मोची, नाई, पविया, पासी, पटवा, सोनकर, सुनार आदि अनेक जाति के लोग इस जिले में पाए जाते हैं।

धर्म Religion
सनू 1911 की मनुष्य गणना के अनुसार यहाँ हिंदू 10,77,338, मुसलमान 13964, ईसाई 2011, मूलनिवासी 542425 और अन्य धर्मवाले 485 कुल 11,46, 223 थे। ऊँची जाति के लोग विष्णु, शिव या देवों की उपासना करते हैं पर नीच जाति में कबीरपंथियों की संख्या बहुत है । पनिका, कोष्ठा, महरा, धोबी, तेली, कुर्मी, अहीर, लोधी, कसौं धन बनिया प्राय: कबीर पंथी हुआ करते हैं। सतनामी और सक्तहा भी पाए जाते हैं। चंद्रपुर और पद्मपुर की ओर रामनामी की संख्या अधिक है। रामनामी अपने सब शरीर में राम-राम गुदाए रहते हैं। सतनामी चमार सतनाम कह कर सबकी वंदना करते हैं। कबीरपंथी और सतनामी मांस-मछली तथा नशीली चीजों से बड्डा परहेज रखते हैं।

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बोली Language
इस जिले की बोलचाल की भाषा विशेषकर छत्तीसगढ़ी है। छत्तीसगढ़ी को हिंदी का बिगड़ा हुआ रूप समझिए। छत्तीसगढ़ी, अवधी भाषा से बहुत कुछ मिलती-जुलती है । डॉक्टर गियर्सन का मत है कि यदि कोई छत्तीसगढ़ी अवधप्रांत में जाकर रहे तो वह एक ही सप्ताह में वहाँ की बोली इस तरह बोलने लगेगा, मानो वही उसकी मातृ भाषा हो। अवधी भाषा से छत्तीसगढ़ी भाषा के मिलने-जुलने का कारण हैहयवंशी राज्य भी हो सकता है, क्योंकि हैहयवंशी आदि में उधर ही के रहनेवाले थे और उनके द्वारा यहाँ उसका प्रचार होना असंभव नहीं है, जैसाकि वर्तमान समय में अंग्रेजी भाषा का हाल है। छत्तीसगढ़ी भाषा का व्याकरण काव्योपाध्याय हीरालाल-धमतरी-निवासी ने हिंदी में बनाया था, जिसका अंग्रेजी अनुवाद गवर्नमेंट डॉक्टर ग्रियर्सन के द्वारा कराकर प्रकाशित किया था। हाल ही में उसने इसका संशोधन पं. लोचन-प्रसादजी पाण्डेय से कराकर फिर प्रकाशित किया है।

प्राचीन कवि Ancient poet
राजा राजसिंह के समय में गोपाल कवि Gopal Kavi प्रसिद्ध हुए हैं। इन्होंने संवत् 1747 में 'खूब तमाशा' नामक नीति विषयक ग्रंथ लिखा था। यह पुस्तक श्रीवेंकटेश्वर प्रेस Shri Vankateshwar Press में छप चुकी है। इस कवि का भक्त चिंतामणि नामक ग्रंथ संवत् 1757 में लिखा गया था। इसमें श्रीकृष्णजी चरित्र-वर्णन है। यह छप चुका है । इसके आवरण पृष्ठ पर छपा है- कांकेर राज्याधिपति श्रीमन्नहरि देव महाराज के आश्वित रतनपुर निवासी कविवर श्रीगोपाल मिश्र Gopal Mishr द्वारा विरचित। इससे जान पडता है कि कवि महाशय बाद में रतनपुर छोड कांकेर आ बसे थे। इस कवि का लिखा रामप्रताप नामक ग्रंथ भी छप गया है, पर इसके पिछले अंश में माखन कवि की छाप है। कहते हैं पिता गोपाल की आज्ञा से पुत्र माखन ने इसे पूरा किया था। इस ग्रंथ का विषय रामचरित्र है। इसकी रचना कुछ-कुछ काव्य के ढंग पर हुई है। गोपाल कवि का एक ग्रथ 'जैमिनी अश्वमेध' Jaimini Ashwamegh भी है।
रेवाराम बाबू Rewaram Babu का जन्म संवत् 1870 के लगभग हुआ था और मृत्यु सं. 1927 के अनुमान में । ये बडे ही प्रतिभाशाली कवि थे। इनके रचे जिन ग्रंथों का पता चला है, उनके नाम ये हैं-. सार रामायण दीपिका, 2. ब्राह्मण स्तोत्र, 3. गीत माधव काव्य, 4. नर्मदाष्टक, 5. गंगालहरी, 6. रामाश्वमेघ, 7. विक्रम विलास, 8. रत्नपरीक्षा, 9. दोहावली, 10. माता के भजन, 11. श्रीकृष्णलीला के भजन, 12. लोकलावण्य, 13. रतन पुरका इतिहास । नं. 12 की पुस्तक लोकलावण्य बिलासपुर के एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर वीरूबाबू की आज्ञानुसार लिखी गई थी और चीफ कमिश्नर साहब को समर्पित की गई थी । रामाश्वमेध और माता के भजनों को छोडकर शेष सब पुस्तकें अप्रकाशित हैं। इनके निवासस्थान रतनपुर में इनके संबंध की कई बातें, जिनसे इनकी प्रतिभा का पता चलता है, प्रचलित हैं। इनके कई ग्रंथ संस्कृत भाषा में हैं।
रतनपुर के पं. तेजनाथ शास्त्री संस्कृत और भाषा के सुकवि थे। आपने संस्कृत में रामायण सार संग्रह नामक एक काव्य ग्रंथ संवत् 1895 में लिखा था।

वर्तमान कवि 
साहित्याचार्य काव्यसुधाकर रायसाहब बाबू जगन्नाथ प्रसाद 'भानु कवि' का नाम प्रत्येक कविता प्रेमी जानता होगा। यद्यपि ये इस जिले के निवासी नहीं हैं तथा इससे वे बडा प्रेम रखते हैं तथा बिलासपुर शहर में अपना स्थायी निवास स्थान बना लिया है। पहले ये असिस्टेंट सेटलमेंट आफिसर थे, अब पेंशन पा रहे हैं। इन्होंने एक प्रेस खोल रखा है जिकसा नाम ' जगन्नाथ-छापा खाना' है। इनके रचे हुए मुख्य ग्रंथों के नाम हैं- छन्द: प्रभाकर Chhand Prabhakar, काव्य प्रभाकर Kavya Prabhakar, नवपंचामृत रामायण, हिंदी-काव्य प्रबंध-माला आदि। भानु-कवि बडे़ उदार हैं। इनका यश बहुत फैला हुआ है।
पं. मालिकराम भोगहा Malikram Bhogha शिवरीनारायण के मालगुजार के बडे़ लड़के थे। आप संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, बंगला, मराठी, उडिया आदि भाषाओं के अच्छे ज्ञाता थे। प्रसिद्ध विद्वान् ठाकुर जगन्मोहनसिंह विजय राघवगढ वाले इनके काव्य गुरु थे। खेद है कि सन् 1909 में इनकी मृत्यु हो गई। आपका 'रामराज्य वियोग' Ram Rajya Viyog नाटक छप गया है।
पं. गनेशप्रसाद तिवारी युक्त प्रांतवासी है। इन्होंने हिंदी में कई पुस्तक्रें लिखी हैं और छपाई हैं। इनका भाषण उत्तम होता है। ये बिलासपुर शहर में रहते हैं।
श्रीगयादीनजी युक्तप्रांत निवासी हैं, पर अब चंद्रपुर इलाके के तेंदूमुडी गाँव में बस गए हैं। बड़ी सरस और सुंदर कविता करते रहे । कवित्त लिखने में परम चतुर हैं।
पं. शिवदास पाण्डेय आशु-कवि भी युक्तप्रांतवासी हैं, पर अब इस जिले में स्थायी रूप से रहने लगे हैं। आप संस्कृत के ज्ञाता और हिंदी के सुकवि हैं। बम्बई के सेठ खेमराज श्रीकृष्ण दास के लिए आप कुछ काम करते रहे हैं। इसके सिवा आपने पाँचवीं पुस्तक, दानलीला (छत्तीसगढ़ी भाषा में) आदि प्रकाशित तथा कई अप्रकाशित पुस्तकें लिखी हैं । ये शिक्षक का कार्य करते हैं ।इस समय इन्हें बिलासपुर डिस्टिक्ट कौंसिल ने अपने त्रैमासिक पत्र विकास के सम्पादन संबंधी कार्यों में लगा दिया है।
पं. शुकलालप्रसाद पाण्डेय छत्तीसगढ़ी ब्राह्मण हैं। रहनेवाले शिवरीनारायण के हैं। बडे़ ही योग्य कवि हैं। सरस्वती आदि ऊँचे दरजे की मासिक पत्रिकाओं में आपकी कविताएँ निकलती रही हैं। आपने प्रसिद्ध नाटककार शेक्सपियर के कामेडी ऑफ एरर्स को छत्तीसगढ़ी रूप दे छत्तीसगढ़ी भूल भूलैया के नाम से छपाया है। आप शिक्षक का कार्य करते हैं।
ठाकुर छेदीलाल एम.ए. बैरिस्टर अकलतरा के रहनेवाले हैं। आप पहले छत्तीसगढ़ी हैं, जिसने विलायत जाकर अपने देश-भाइयों के लिए विदेश-यात्रा का मार्ग खोल दिया है। आपने 'हालेण्ड की स्वाधीनता' और 'एशियावालों के प्रति यूरोपियनों का व्यवहार' नाम की पुस्तकें लिखी हैं। आप प्रयाग से निकलने वाली सेवा पत्रिका के प्रधान संपादक हैं। आपका व्याख्यान बड़ा प्रभाव शाली होता है। आपकी गिनती बिलासपुर जिले के ही नहीं वरन हिंदुस्तानी मध्यप्रांत के नेताओं में होती है।
बालपुर के मालगुजार Malgujar of Balpur पं. पुरुषोत्तमप्रसाद जी पाण्डेय छह भाई हैं। ये सबके सब मातृभाषा के सेवक हैं। पं. पुरुषोत्तम प्रसादजी के लिखे अनेक निबंध 'आनंद की टोकनी' नामक पुस्तक में छपे हैं। आपके छोटे भाई पं. लोचनप्रसाद जी Lochan Prasad Pandey हिंदी के प्रसिद्ध कवि और लेखकों में से हैं। आपकी विद्वत्ता से प्रसन्न हो बामड़ा नरेश ने आपको काव्य विनोद की पदवी दी है। आपकी लिखी अनुमानित 40-42 पुस्तकें प्रकाशित हैं। आपने 'कृषक बाल-सखा' नामक एक पुस्तक छत्तीसगढ़ी बोली में लिखकर प्रकाशित कराई है। आपने एक छत्तीसगढ़ी गीता भी लिखी है। आप हिंदी भाषा के सिवा उडिया, बँगला, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा के ज्ञाता हैं। अभी हाल में आपने अंग्रेजी में लिखे छत्तीसगढ़ी व्याकरण का संशोधन किया है, जिसे मध्यप्रदेश की सरकार ने प्रकाशित कराया है। आप मध्यप्रांतीय चतुर्थ हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति बनाये गए थे। सम्मेलन का यह अधिवेशन जबलपुर में हुआ था। उस समय आपने सभापति की हैसियत से जो भाषण दिया था, वह बडा मर्मपूर्ण था। आपके उद्योग से छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मंडली नामक एक संस्था स्थापित हुई है। ईश्वर चाहेगा तो यह कुछ काम दिखाएगी। आपने छत्तीसगढ़ को ऊँचा उठाने में जो प्रयत्न किया है, वह शायद ही किसी छत्तीसगढ़ी ने किया हो। अनेक अच्छे-अच्छे मनुष्य, जो कुछ वर्ष पहले अपने को छत्तीसगढ़ी समझकर सदा सकुचाए रहते थे, आज छत्तीसगढ़ी होने में अपना गौरव मानते हैं।यह केवल आपके उद्योग का फल है। आपने अपने पूज्यपाद पिता स्वर्गीय पं. चिंतामणिजी की जीवनी, जो लिखकर छपाई है, उसकी प्रशंसा मध्यप्रदेश के मंत्री श्रीशंकर माधो चिटनबीस तथा रायबहादुर हीरालाल तक ने की है। आपको पुरातत्व से बड़ा प्रेम है। आपने इस संबंध में बहुत कार्य किया है।
पाण्डेय जी के छोटे भाई विद्याधरजी तथा वंशीधरजी ने भी कुछ लिखा है । मुरलीधरजी कुछ न कुछ लिखते ही रहते हैं। सबसे छोटे भाई मुकुटधर बडे ही प्रतिभाशाली कवि हैं। छोटी ही अवस्था में ये उत्तम कविता रचने लगे हैं। पाण्डेय-बंधु सरयूपारीय ब्राह्मण हैं। चार गाँवों में इनकी मालगुजारी है।
श्री सैयद अमीर अली मीर का नाम ऐसा कौन हिंदी-प्रेमी होगा, जो न जानता हो । ये देवरी जिला सागर के निवासी हैं। आपका नाम हिंदी-साहित्य सम्मेलन के सभापति के लिए कई बार प्रस्तावित हो चुका है। आप बहुत ऊँचे-दरजे के कवि और लेखक हैं। आपकी 'बूढे का ब्याह' नामक पुस्तक प्रसिद्ध है। आप बोलते भी बहुत अच्छा है। वर्तमान समय में इनके सदृश हिंदी का विद्वान शायद ही कोई मुसलमान हिंदुस्थान में होगा। 'नदा नाव संयोग' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए आजकल ये अपने जीवन के पिछले 4 वर्ष छत्तीसगढ़ में काट अब बिलासपुर शहर में निवास कर रहे हैं।
सम्पादकाचार्थ्य पं. माधवरावजी सप्रे Madhav Rao Sapre का नाम तो भूले ही जा रहे हैं। आपने पेंडरा से 'छत्तीसगढ मित्र' Chhattisgarh Mitr नामक मासिकपत्र निकाला था। इसके पश्चात मातृभाषा और मातृभूमि के उद्धार के लिए आपने जो कार्य किये हैं, उनका उल्लेख यहाँ करना सूरज को दीपक दिखाना है। इस समय आप रायपुर में रहते हैं।
पं. कपिलनाथ मिश्र खरौदवासी, पं. मेदिनीप्रसाद पाण्डेय, पं. पुत्तीलाल शुक्ल, श्री शंकर प्रसाद और ठाकुर मेहरबानसिंह, पं. दु:खीराम अवस्थी, पं. रामभरोसे शुक्ल, पं. सरयूप्रसाद तिवारी आदि सज्जन भी अच्छे लेखक और केवि हैं।

संपूर्ण दुर्ग गजेटियर 1921 दुर्ग दर्पण पढ़ें इस लिंक से

पत्र
इस जिले में सबसे पहले निकलने वाला पत्र छत्तीसगढ मित्र था। अब यह बंद हो गया है। इस समय इस जिले की डिस्टिक्ट कौंसिल विकास नामक त्रैमासिक पत्र निकाल रही है, जो अच्छा चल रहा है।

गाँवों के नाम Village names
बिलासपुर जिले में विशेष कर जंगली भागों में गाँवों के नाम प्राय: वृक्षों पर से रखे गए हैं। जैसे अमली से अमलडीहा, आम से आमगाँव, लीम से लिमतरा, लिमहा, खैरसे खैरा, चारसे चारगाँव, परसा से परसदा, महुआ से मोहगाँव, सेम्हर से सेम्हरा, सेम्हरी, बेल से बेल गहना, बेलहा आदि। अन्य वस्तुओं पर से जो नामकरण हुए हैं, उनके कुछ उदाहरण नीचे लिखे जाते हैं-
तालाब-सेमरताल, बेलसरा।
भैंसा-भैंसो, भैंसाझर, भैंसामूंडा।
पशु-बिल्लीबंद, गदहाभाठा, गौबन्द, कूकुरडीह, हाथीवारा।
पक्षी-कौवा कापा, सारसताल, कोइलारी ।
कीडा डोंगरी, केकराडीह ।
पत्थर-पथरिया, ठाढ, पखना, पथना, पथरताल।
भूमि-कछार, कन्हारपुर, कालीमाटी, लालमाटी, लालखदान, दुर्राभाठा।
राजा-रानी-रत्नपुर, तखतपुर, राजपुर, रानीगाँव, रानीडेरा, रानी बछाली, रानीसागर, राजा कापा।
रिश्ता-ममा-भांजा, देवरानी-जेठानी, बापापूती ।
(Bilaspur district names of the villages are often kept from trees. Such as Amli to Amaldiha, Mango to Amgaon, Lim to Limatra, Limha, Khairse Khaira, Charace Chargaon, Parsa to Parsada, Mahua to Mohgaon, Semhar to Semhara, Semhari, Bel to Bel Jewel, Belha etc. Some examples of nomenclature derived from other items are written below- Talab-Semratal, Belsara. Buffalo-buffalo, buffalo, buffalo. Cattle, Gaddabhatha, Gauband, Kookurdih, Hathivara. Bird-crow Kappa, Sarasatal, Koilari. Kida Dongri, Kekradih. Pathar-Patharia, Chic, Pakhna, Pathana, Pathartaal. Land Cachar, Kanharpur, Kalimati, Lalmati, Lalkhadan, Durrabhatha. Raja-Rani-Ratnapur, Takhatpur, Rajpur, Ranigaon, Ranidera, Rani Bachali, Ranisagar, Raja Kappa. Rishta-Mama-Bhanja, Devrani-Jethani, Bapaputi.)

मनुष्यों के नाम Name of men and women
पुरुष और स्व्रियों के नाम से यहाँ की जातियों में कभी महीने पर से, कभी दिन पर से, कभी मनमाने रखे जाते हैं, जैसे, कार्तिकराम, बैसाखू, चैतू, फगुवा, सवना, फगुनी, चैती, बैसखिया, शुकबारा, बुधवारा, इतवारी आदि। बडे आदमियों के यहाँ भी जब लड्के-बच्चे अकसर नहीं ठहरते, मर जाते हैं तो नये पैदा हुए बच्चों के नाम छोटी जाति पर से रख देते हैं। जेसे झन्दू, भंगी, आदि। (Kartikaram, Baisakhu, Chaitu, Faguva, Savana, Faguni, Chaiti, Baisakhia, Shukbara, Budhwara, Itwari, Jhadu, Bhangi, etc.) इस कड़ी को क्लिक करके विलास वैभव Bilaspur District Gazeteer मुख्‍य पृष्‍ट पर वापस जायें ..

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