Raipur Rashmi History of District Hindi Gazetteer Darpani रायपुर रश्मि सातवीं झलक दर्पणी

अभनपुर Abhanpur - (जनसंख्या 1082) रायपुर से अठारह मील रायपुर-धमतरी रेलवे लाइन का स्टेशन है । यहाँ से रेल की एक शाखा नौ मील राजिम को गई है । यहाँ पर एक सरकारी आवपाशी का तालाब है । यहाँ प्राइमरी शाला, पुलिस थाना, डाक खाना और विश्राम बँगला भी है। गाँव मुआफी है और, रायपुरी के दूधाधारी मंदिर को लगा है। यहाँ मंगल और बृहस्पतिवार को बाजार भरता है।

आमदी Aamdi- (ज. 2079) धमतरी से सात मील बड़ा गाँव है। यहाँ तेलियों की अधिकता है। यहाँ की जमीन जिले भर में सबसे अच्छी है । यहाँ पर एक पाठशाला भी है।

आरंग Arang - (ज. 6052) सम्बलपुर की सड़क पर रायपुर से 22 मील है। यहां से महानदी चार मील आगे पड़ती है। आरंग नाम की व्युत्पत्ति लोग आरे से बतलाते हैं और कहते हैं यहाँ पर म्यूरध्वज का सिर आरे से काटा गया था। श्रीकृष्ण ने इनकी भक्ति परीक्षा करनी चाही, इसलिए बूढे़ ब्राह्मण का वेष धर राजा से जाकर कहा कि मेरे को बाघ ने पकड़ा था और इस शर्त पर छोड दिया कि आपका आधा दाहिना अंग मैं उसके भक्षण को ला दूँ, सो अब मैं आप से क्या प्रार्थना करूँ। राजा ने कहा- -कुछ परवाह नहीं, मेरा आधा शरीर काटकर बाघ को ले जाकर दे दो, मैं राजी हूँ। जब उनका शरीर आरे से चीरा जाने लगा और आरा नाक तक पहुँचा, तब राजा की बाईं आँख से एक आँसू टपक पड़ा । बूढे ने कहा - बस करो, राजा दान देते रोता है, मुझे उसका दान नहीं चाहिए। इस पर रानी ने तुरंत उत्तर दिया- -महाराज नाराज मत होइए, दाहिना अंग खुशी मनाता है कि मैं किसी काम में पड़ जाऊँगा, परंतु बायाँ इसलिए रोता है कि मैं किसी काम का न हुआ, वृथा फेंक दिया जाऊँगा। इस पर श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और राजा को अच्छा करके वरदान दिया। कहते हैं उस समय से तमाम छत्तीसगढ़ में आरे का उपयोग ही बंद कर दिया गया। बहुतेरों का मत है कि यह घटना रतनपुर में हुई थी न कि आरंग में । यथार्थ में कस्बे का नाम आरंगनामी वृक्ष पर से रखाया जान पड़ता है।यह एक छोटे प्रकार का झाड़ है जिससे लोग बहुधा कुल्हाडी के बेंट बनाते हैं। जान पड़ता है कि पहले आरंग बड़ा नगर था, यहाँ पर जैन और हिंदू मंदिरों के बहुत से खंडहर विद्यमान हैं।अभी तक एक सुंदर जैन मंदिर खड़ा है, जिसे लोग नग्न मूर्तियों के कारण भांड देवल करते हैं। इसकी कारीगरी दर्शनीय है। महामाया के मंदिर में कई भव्य मूर्तियों के टूटे-फूटे भाग पड़े हैं। यहाँ एक शिलालेख भी मिला था। नारायण ताल पर बड़ी-बड़ी विष्णु की मूर्तियाँ पड़ी हैं। खोदने से जमीन में गडे हुए खंभे आदि मिलते हैं। यहाँ पर दो ताम्र शासन भी मिले थे। इनमें से एक राजर्षि तुल्य कुल का है। उसकी तिथि 601 ई. लिखी है । जान पड़ता है इनकी राजधानी आरंग ही में थी। दूसरा शासन गुप्त वंशीय राजाओं का है, जो सिरपुर में राज्य करते थे। यहां पर पंद्रह-सोलह वर्ष पूर्व एक जैन मूर्ति स्फटिक की मिली थी, जो कांच समझकर दो-तीन रुपये में नीलाम कर दी गई । पीछे से वह महंगी बिकी । इनके प्रेम का गीत तमाम छत्तीसगढ़ में से गाया जाता है। आरंग में बहुत से साहूकार रहते और लेन-देन करते हैं । यहाँ 'पर आनरेरी मजिस्ट्रेटों की अदालत, लड़के और लड़कियों की पाठशालाएँ, डाकखाना, डाक-बँगला, अस्पताल और सराय है।

कटगी जमींदारी Katagi Jamindari - महानदी के दक्षिण में 57 वर्ग मील की छोटी सी जमींदारी है। बीच से जोग नदी बहती है । धान बहुत होता है । जंगल नहीं है। जमींदार पहले जोग नदी के तट पर कटगी गाँव में रहते थे, उनके निरपत्य हो जाने से जमींदारी अब बिलाईगढ़ के अधीन हो गई है, कटगी की बसीगत सघन है। गाँव 42 हैं। अन्य वार्त्त के लिए बिलाईगढ़ के नीचे देखो।

कसडोल Kasdol - (जनसंख्या 1073) बलौदाबाजार तहसील में महानदी के उस पार बलौदाबाजार कस्बे में 18 मील है। यह कसडोल परगने का सदर मुकाम है । इसमें पहले उनतीस गाँव थे। अब बँटवारा हो गया है । मालगुजार ब्राह्मण हैं । एक भाई ने अस्मिद में बड़ा तालाब बनवाया है, जिससे कुल परगने की आवषपाशी हो सकती है। यहाँ पुलिस थाना, डाकखाना और मदरसा हैं।

कांदाडोंगर - बिंद्रानमवागढ़ जमींदारी में गोंडहारी गाँव की हद में गरियाबंद से बीस मील मध्य जंगल में है।यह किला आदि का खंडहर है। पहले यहाँ एक राजा रहता था, जिसका जिक्र सन् 1145 ई. के शिलालेख में है, जो राजिग मंदिर में लगा हुआ है।

कुरुद् Kurud - (ज. 2535) धमतरी से 14 मील रेलवे स्टेशन है । यहाँ बहुत से तालाब हैं। मंगल को बाजार भरता है। यहाँ पर पाठशाला, डाकखाना और पुलिस थाना है। यहाँ के एक बुचुवा तेली की कहानी बन गई है, उसने अकाल के समय गरीबों की गुजर के लिए 400, तालाब का काम लगाने को सरकार को दिए थे। जब काम लगा, तब आप मय घर के लोगों के तालाब का काम करने लगे, परंतु मजूरी नहीं ली।

कुंवरा Kunvara - रायपुर से चौदह मील बड़ा गाँव है। कहते हैं कुंवर नामक राजा ने इसे बसाया था। यहाँ पर कई तालाब हैं, उनमें से एक रानी तालाब कहलाता है। बहुत से पुराने मंदिरों के खंडहर भी हैं। कई तुडवाकर रपटे और घाटों में लगवा दिए गए। यहाँ कई पुराने सतीचीरे भी हैं। इस गाँव में पाठशाला और डाकखाना है।

कौडिया जमींदारी Kaudiya Jamindari - महासमुद्र तहसील में 285 वर्गमील की जमींदारी हैं, इसमें 155 गाँव हैं । हैहयों के समय में यह खालसा तालुक था, परंतु बहुत समय तक एक ही तालुकेदार के कब्जे में रहने से उसको जमींदारी के अधिकार दे दिए गए। यहाँ का जमींदार गोड था। अब कोई पुरुष नहीं रहा। आखिरी जमींदार की विधवा विष्पु प्रिया देई मालकिन हैं । दो तिहाई रकबे में धान बोया जाता है, शेष में तिल, कोदों-कुटकी बहुत होती है। 60 वर्गमील में जंगल है। उसमें साल या साई बहुत होती है। सरकार को सालाना 12,500 टकौली लगती है । इस जमींदारी में दो मदरसे और सदर मुकाम पटौरा में एक पुलिसथाना और डाकखाना है। यहाँ एक आनरेरी मजस्टिट की अदालत भी है।

खरियार जमींदारी Khariyar Jamindari - महा-समुंद्र तहसील क्षेत्र का रकबा 1489 वर्ग मील है । इसमें जोग सुंद्र और उदेत नदियाँ बहती हैं। जमीन उंचास पर है। कहीं जल की सतह से ऊँचाई 3000 फुट तक पहुँच गई है। इसमें 606 गाँव हैं जिसमें साठेक वीरान हैं। गोंड, कमार और अधिक बसते हैं। बहुत से भाग में उड्या भाषा अधिक बोली जाती है । प्राय: 700 वर्ग मील में जंगल है। उसमें सरई बहुत होती है। धान की खेती का प्राधान्य है। व्यासी का प्रचार तो है ही, परंतु जमींदारी के दक्षिणी भाग में रोपा भी लगाने की चाल है । सरकार को टकौली 7500 रुपये सालाना लगती है । यह जमींदारी पटना के महाराजा प्रताप देव के छोटे लड़के गोपालराव देव को पंद्रह-सोलह पीढ़ी पहले दी गई थी। कुछ भाग जयपुर के राजा से दहेज में मिला था। उसकी लडकी गोपालराव को ब्याही गई थी। इसमें खरियार खास के साथ खोलागढ़, गौरागढ़ और कुमरागढ़, जो पटना के अधीन थे, मिला दिए गए थे। यह वंश चौहान क्षत्रिय है और बड़ा उदार चरित्र है। राजा ब्रजराजसिंह देव ने सन् 1899-1900 के अकाल में 4500 रुपये दीन पालनार्थ खर्च किया था। ये 1907 ई. में मरे। उनके पश्चात् उनका लडका वीरविक्रम देव उत्तराधिकारी हुआ, परंतु वे छोटी ही उमर में चल बसे। अब उनके पुत्र लाल आर्त्तत्राणदेव जमींदार हैं। उनकी आयु 24 वर्ष की है। खरियार पहले अठारागढ़ जातों में लेखा जाता था। कहते हैं कि जिस समय छत्तीसगढ़ के जमींदारों को राजा के अधिकार बख्शे थे, उस समय खरियार के जमींदार उपस्थित नहीं हुए, इसलिए ये उन अधिकारों से वंचित रह गए। इस जमींदारी का सदर मुकाम खरियार है, जो रायपुर से 116 मील। कालाहडी की पक्की सड़क पर है। खरियार कोमना और नानवट नवापारा में पुलिस थाने हैं। मदरसे आठ हैं। खरियार खास में एक अंग्रेजी मदरसा, अस्पताल, डाकखाना और पुत्रीशाला है। यहाँ दो आनरेरी मजिस्ट्रेटों की अदालतें भी हैं। शुक्रवार को बाजार भरता है।

खरोरा Kharora - (ज. 1284) रायपुर से 33 मील और टिलदा स्टेशन से 15 मील है। यहाँ अन्न का व्यापार बहुत होता है। हर बृहस्पतिवार को बाजार भरता है। ढोर भी बिकने को आते हैं। यहाँ मदरसा और डाकखाना है । खरोरा से 6 मील पर कुसरंगा में सरकार ने आवपाशी के लिए 90,000 की लागत का तालाब बनवा दिया है।

खलारी Khallari - महासमुन्द तहसील में राजिम से 29 मील और रायपुर से 45 मील है। इसका प्राचीन नाम खलवाटिका था और हैहयवंशी राजा यहाँ रहते थे। राजा हरिब्रह्म देव के समय में एक मोची ने सन् 1415 ई. में एक मंदिर बनवाया था, जिसका उल्लेख एक शिलालेख में पाया जाता है। यहाँ पर किला आदि के खंडहर भी हैं। चैत में यहाँ खलारी माई का मेला भरता है । हर सोमवार को बाजार भी भरता है। यहाँ पाठशाला और डाकखाना है।

खारून नदी Kharun River - यह दुर्ग जिले की संजारी तहसील में एक तालाब से निकली है और उत्तर को बहकर दुर्ग और रायपुर किलों की कुछ दूर सीमा बनाती रायपुर तहसील में घुस गई है। पश्चात् कुछ दूर बहकर दोनों जिलों की बीच की सीमा पुन: बनाती शिवनाथ में मिल गई है। कुम्हारी के स्टेशन के पास इस पर रेल का पुल बना है । इसकी मुख्य सहायक नदी कुल्हान है।

चाम्पाझर Champajhar - राजिम से 6 मील महासमुन्द तहसील में छोटा-सा गाँव है। यहाँ एक छोटा सा जंगल है, इसी की ब्रह्माचार्य सम्प्रदाय के लोग चम्पारण्य मानते हैं और कहते हैं कि सम्प्रदाय के अधिष्ठाता यहीं पर पैदा हुए थे। यह महत्त्व इस स्थान को केवल 30 या 40 वर्ष से मिला है। अब यहाँ मंदिर और धर्मशालाएँ बन गई हैं और माघ में मेला लगने लगा है। राजिम माहात्म्य में यहाँ के चम्पकेश्वर महादेव का जिक्र है । ये लिंगस्वरूप जंगल ही में स्थिर हैं और उनकी विचित्र रूप से पूजा होती है। एक ओर अहिंसात्मक नैवेद्य चढाया जाता है, दूसरी ओर बकरे काटे जाते हैं। इस गाँव में और आस-पास के खेडों में होली नहीं जलाई जाती।

जोग नदी Jok River - इसको जोंक या भी कहते हैं। यह खरियार जमींदारी से निकली है और कुछ दूर तक उसकी सीमा पर बहकर कौडिया और फूलझर जमींदारियों की हद बनाती हुई देवरी जमींदारी में प्रवेश कर सोनाखान और कटणी से होती हुई शिवरी नारायण के पास महानदी में मिल गई है । लंबाई 100 मील है।

तरेंगा Tarenga - (ज. 2277) बलौदाबाजार तहसील में भाटापा स्टेशन से 4 मील है। यहाँ एक प्रख्यात ताहुतदार का सदरमुकाम है, जिसके 145 गाँव हैं । यहाँ पाठशाला और डाकघर है । हर सोमवार-शुक्रवार को बाजार भरता है।

तुमगाँव Tumgaon - महासमुन्द तहसील में रायपुर से 34 मील सजलपुर की सड़क पर है। इसके निकट शिकार अच्छा मिलता है, यहाँ विश्राम बँगला, पुलिस थाना, पाठशाला, डाकखाना और अन्य पड़ाव है। हर शनिवार को बाजार भरता है।

तुरतुरिया Turturiya - बलौदाबाजार में बहिरिया गांव के निकट एक तीर्थ है। वह शिरपुर से 15 मील और रायपुर से 50 मील है। यहाँ पर पहले बौद्ध भिक्खुनियों का बिहार था। यहाँ पर अब भी बुद्ध की एक विशाल मूर्ति है, जिस पर बौद्ध धर्म का बीज मंत्र खुदा हुआ है। विचित्र बात यह है कि यहाँ की पूजा केवल स्त्रियों द्वारा होती है। यहाँ पर हिंदू देवताओं की भी खंडित मूर्तियाँ हैं। यहाँ एक झरना है, जिसमें पानी सुरसुर या तुरतुर करता बहता है, इसलिए इस स्थान का नाम तुरतुरिया पड़ गया है। कोई उसे सुरसुरी गंगा कहता हैं। बाजे-बाजे इसे वाल्मीकि का स्थान कहते हैं और कहते हैं कि कुश और लव यहीं पैदा हुए थे और कुश ही के नाम पर इस देश का नाम कौशल पड़ा था।

देवकूट Dewkut - धमतरी तहसील के सिहावा इलाके में सिहावा से आठ मील महानदी के तट पर है। यहाँ पर छह प्राचीन मंदिर बने हैं। दो में अच्छी कारीगरी का काम है। एक में कांकेर के राजा बाघराज का बारहवीं शताब्दी का शिलालेख है।

देवभोग Devbhog - रायपुर जिले के बिलकुल दक्षिण कोने में बिंदानवागढ़ जमींदारी में है। रायपुर से वह 139 मील दूर है । सोमवंशी राजाओं के समय में वह एक जिले का सदर मुकाम था। उसका जिक्र महाराजा महाभवगुप्त के ताम्र शासन में आता है । यहाँ एक पाठशाला, पुलिस थाना और डाकखाना है। चावल, तिल और लाख का यहाँ कुछ व्यापार होता है।

दबवरी जमींदारी Dabvari Jamindari - यह एक 82 मील की छोटी सी जमींदारी बलौदाबाजर तहसील में सोनाखान और कंगेड्चा के बीचोबीच है। इसमें 37 गाँव है और टकौली 275 रुपये लगती है। धान, कोदों, कुटकी और तिल की खेती...........वर्गमील जंगल है, जिसमें साल या सरई बहुत है............... विंझवार जाति के लाल राजेंद्र शाह हैं। कर्ज के कारण जमींदारी कोर्ट ऑफ वार्ड्स के प्रबंध में है। सोनाखान का जमींदारी जो सन् 1857 में बागी हो गया था, उसको यहीं के जमींदार महाराज साय ने पकड्वा दिया था। सोनाखान का जमींदार महाराज साय का भतीजा था। वह जब फाँसी पर चढा दिया गया, तब सोनाखान थोडे दिन के लिए महाराज साय के ताबे कर दिया गया था। परंतु गोविंदसिंह ने महाराज साय को मारकर अपने बाप का बैर भंजा लिया। सोनाखान की जमींदारी मिट गई और वह खालसा कर लिया गया।

धमतरी तहसील Dhamatari Tahsil - क्षेत्रफल 1628 वर्गमील है, गाँव 580 हैं, जनसंख्या 2,31,240 है। सन् 1906 में दुर्ग जिला बनने से अब तहसील कुछ छोटी हो गई है। इस तहसील में बहुत से गोंड रहते हैं। उनकी दशा खराब है। तेली और कुर्मी विशेष कर किसानी और मालगुजारी करते हैं। धान, उडद, और अलसी की विशेष खेती होती है, गेहूँ बहुत थोडा बोया जाता है। सरकारी जमा 1,77,148 है। तहसील में 4 पुलिस थाने हैं। वे धमतरी, सिहावा, कुरुद्ध और मगरलोड में है। गाँव छोटे हैं, बडों में केवल धमतरी और आमदी है।

धमतरी कस्बा Dhamtari City - (ज. 12121) धमतरी तहसील का सदर मुकाम है, और रायपुर से 48 मील है । रायपुर से यहाँ तक एक छोटी लाइन रेल की बनी है। महानदी यहाँ मील पड़ती है । धमतरी प्राचीन स्थान है। कहते हैं कि पहले यहाँ घुरवा नामक गोड राजा था। उसने अपनी लडकी सिहावा के राजा को ब्याह दी और लड्का न होने के कारण अपना राज दामाद को दे दिया। सो गोंड राजा के समय यहाँ किले और खाई बनी थी, जिसके चिह्न मौजूद हैं। सिहावा वालों के वंश में संतान न होने से राज कांकेर के राजा को चला गया। इसमें संदेह नहीं कि धमतरी पहले कांकेर राऊ यान्तर्गत थी ! फिर पीछे से सरकार के हाथ चली गई । इसी कारण कांकेर के राजा धमतरी का पानी नहीं पीते। धमतरी में कई प्राचीन मंदिर हैं। उनमें रामचंद्र का मुख्य है। इसकी कारीगरी बहुत अच्छी है। यहाँ पर बिलाई माता का बड़ा माहात्म्य है। उसकी मदढिया गाँव के बाहर है । पहले उसे नरबलि दी जाती थी, अब बकरे चढते हैं। एक बार कांकेर के राजा ने 108 बकरे चढाए थे। माघ में मेला भरता है। किले के एक कोने में महादेव की स्थापना है, उनसे भी लोग बहुत डरते हैं। कहते हैं जब सन् 1907 ई. में प्लेग आया, तब महादेव ने उससे बड़ी लडाई ली और बहुत नुकसान करने नहीं दिया।
धमतरी में जंगल की उपज का व्यापार अधिक होता है, जैसे लाख, हर्रा, साई आदि। अनाज का भी व्यापार कम नहीं है। बाजार इतवार को भरता है। धमतरी में मेनोनाइट मिशन है, इसने एक अंग्रेजी हाई स्कूल और लड़के और लड़कियोंके मदरसे अस्पताल और कोढी आश्रम खोल रखे हैं। निकटस्थ रुद्री और बालोदगहन गांवों में भी अड़ा जमा लिया है और बातचीत करने के लिए टेलीफोन लगा दिया है। धमतरी में सन् 1881 ई. में म्युनिसिपालिटी स्थापित हुई, आमदनी 38000 रुपये है, इसके द्वारा एक अस्पताल और एक मिडिल स्कूल और उर्दू स्कूल भी चलता है । सरकारी पुत्रीशाला भी है। तहसीलदार और नायब तहसीलदार की अदालतों के सिवाय यहाँ पर आनरेरी मैजिस्ट्रेटों की बेंच है। मामूली पुलिस थाना, डाकघर, तारघर आदि हैं। इनके अलावा दो विश्राम घर और एक सराय भी है। धमतरी में बहुत से मालगुजार निवास करते हैं, यद्यपि उनके गाँव दूर-दूर है।

नर्रा जमींदारी Narra Jamindari - महासमुन्द तहसुल में 21 वर्गमील की बहुत छोटी सी जमींदारी है।यह सुबरमार और खरियार के बीचोबीच है । यथार्थ में 200 वर्ष पूर्व यह खरियार के अंतर्गत थी। उसे खरियार के जमींदार ने दहेज में अपनी लडकी को दिया था, तब वहाँ पर विश्वनाथ एक अदना जमींदार था। अंत में वह पूरा जमींदार बन बैठा। वर्तमान जमींदार विश्वनाथ सिंह के वंशज हैं, ये कंवर जाति के हैं । नर्रा में केवल १6 गाँव हैं। टकौली 900 रुपये है । नर्रा खास में एक स्कूल है। वह रायपुर से 66 मील है।

नवापारा Navapara - (ज. 3311) यह राजिम के सामने महानदी के इसी पार 7 बसा है और रायपुर से 28 मील है। अब्भनपुर से धमतरी लाइन की शाखा यहीं तक गई है। पहले यह राजिम का छोटा सा पारा था, जिसको राजा बिम्बाजी ने राजिम के मंदिर को गोबरी अर्थात् कण्डों के लिए दिया था। इसी से यह गोबरा कहलाता था, अब बढकर स्वतंत्र गाँव हो गया है । यहाँ पर उडिया कसार बहुत हैं, जो काँसे के बर्तन बनाते हैं। यह गाँव राजिम मंदिर को मुआफी में लगा है, यहाँ एक पाठशाला है। हर सोमवार को बाजार भरता है।

नेवरा Newara - (ज. 1635) बलौदाबाजार तहसील में टिल्दा रेलवे स्टेशन ३ से दो मील है। यहाँ बहुत से मारवाडी आप से हैं, ये बम्बई से नमक और यहाँ से गल्ला भेजते हैं। काँच की चूडियाँ यहाँ बहुत बनती हैं। हर बुधवार को बाजार भरता है, यहाँ पाठशाला और डाकखाना है।

पैरी नदी Pairy River - महानदी की सहायक नदी है । बिन्द्रानवागढ़ में मैनपुर के पास से निकलकर राजिम के पास महानदी में मिली है, यहाँ उसका पाट 600 गज हो गया है।

फिंगेश्वर जमींदारी Fingeshwar Jamindari - महासमुंद्र तहसील में है। रकबा 179 वर्गमील है। गाँव 26 हैं, टकौली 12000 रुपये हैं, जमींदारी बहुत पुरानी है । जमींदार गोंड हैं। वर्तमान जमींदार का नाम विश्वनाथसिंह है। गौड, तेली, चमार यहाँ अधिक बसते हैं। धान की खेती अधिक होती है। कोदों कुटकी भी बोये जाते हैं। 42 वर्गमील में जंगल लगा है। सब से बड़ा गाँव फिंगेश्वर है, यहाँ एक पाठशाला और डाकखाना है, फिंगेश्वर राजिम से दस मील है।

फुलझर जमींदारी Fuljhar Jamindari - यह एक बड़ी जमींदारी है, परंतु जंगली और पहाडी है, रकबा 852 वर्ग मील है। गाँव 527 हैं। प्राचीनकाल में खरियार और बिंद्रानमवागढ़ की नाईं इसकी गिनती पटना महाराजा के अधीन अठारहगढ़ जातों में होती थी। जमींदार गोंड हैं और अपना संबंध चान्दा के गोंड राजाओं से बतलाते हैं और कहते हैं कि इनके प्रथम पुरखा हरराजसाय ने 300 वर्ष पूर्व विजय करके पुराने मालिक से यह इलाका हस्तगत किया था। उसी के वंशज सारंगगढ़, रायगढ़ और सक्ती के राजा और सुवरमार के जमींदार हैं। ये लोग फुलझर को अभी तक जेठा घर मानते हैं। जब | सम्बलपुर के राजा सुरेन्द्रनाथ ने बलवा मचा दिया था, उस समय यहाँ के जमींदार जगसाय ने बड़ी सहायता की थी, जिसके उपलक्ष में सरकार ने उसे राजा की पदवी, खिल्लत और सनद दी थी, वह निस्संतान मर गया। तब उसकी रानी ने राजपाल साय को गोद लिया, उसने भी वर्तमान जमींदार लाल बहादुर सिंह को गोद लिया। सरकार को टकौली ................. जमींदारी में 8 मदरसे हैं और दो पुलिस थाने, एक सब पाली और दूसरा बसना में है। जमीदार पहले गढ़ फूलकर नाम गाँव में रहते थे, वहाँ पर राजा अनंतसाय ने 200 वर्ष पूर्व किला बनाया था। अब १4 मील हट कर सरईपाली सदर मुकाम बनाया गया है । यहाँ आनरेरी मैजिस्ट्रटों की अदालत है। जमींदार और उनके दीवान, दोनों आनरेरी मजिस्ट्रेट है। इसके अलावा स्कूल, डाकखाना और अस्पताल भी हैं, ढोरों के लिए अलग अस्पताल है। सरईपाली में ढोरों का बाजार भरता है।

बलौदा बाजार तहसील Balodabazar Tahsil -यह तहसील सन् 1906 में बनाई गई। यह जिले के उत्तरीय भाग में है। रकबा १951 वर्गमील है। इसमें चार जमींदारियों अर्थात् कटगी, विलाईगढ़, भटगाँव और देवरी शामिल हैं, जिनका कुल रकबा 315 वर्गमील है। तहसील की जनसंख्या 3,67,732 है । इसमें से 61,655 जन जमींदारियों में रहते हैं। रायपुर तहसील को छोड अन्य तहसीलों से यह बहुत घनी बसी है। कुल गाँव 1011 हैं। इस तहसील के सब से बडे गाँव सिमगा, तरेंगा और भाटापारा हैं। यहाँ भाटा और मटासी जमीन की अधिकता है। जंगल 635 वर्ग मील में है। धान की खेती आधे से अधिक रकबे में होती है। कोदों-कुटकी भी धान की चौथाई बोई जाती है। गेहूँ बहुत कम बोया जाता है। सरकारी जमा 21,985 है। इस तहसील में 6 थाने हैं, वे बलौदा बाजार, सिंगमा, भाटापारा, बिलाईगढ़ पलारी और कसडोर में हैं-

बलौदा बाजार गाँव Balodabazar - (ज. 3288) बलौदाबाजार तहसील का सदर मुकाम है, भाटापारा स्टेशन से 16 है । यहाँ अनाज और ढोरों की बिक्री बहुत होती है। प्रत्येक सप्ताह में हजारेक जानवर बिक जाते हैं । बाजार मंगलवार पं को लगता है। यहाँ एक हिंदी पाठशाला है। मिशन ने एक अंग्रेजी-हिंदी पाठशाला भी खोल रखी है। तार और डाकघर, अस्पताल और ढोरों का चिकित्सालय, पुलिसथाना और तहसीलदार व नायब की कचहरियाँ मामूली हैं।

बिंद्रानवागढ़ जमींदारी Bindrawangarh Jamindari - इसका क्षेत्रफल 1559 वर्ग मील है, रकबे में इससे बड़ी जमींदारी दूसरी नहीं है।यह महासमुंद्र तहसील में है, इसकी पहाडियाँ समुद्र जल सतह से 2000 से लेकर 3000 फुट तक ऊँची हैं। ५ उत्तरीय भाग बहुत जंगली है, परंतु दक्षिणी भाग में खासा मैदान है, जहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ है। कुल गाँवों की संख्या 446 है। गोंड, कमार और लोग यहां अधिक पाये जाते हैं । कहते हैं यहां पहले राजा था, उसकी जमींदारी का नाम मरदा था। पच्चीसक पीढ़ी के पूर्व सिंहलसाय नामक गोंड लांजी से आया और छुरा में आ बसा। राजा का शंका हुई कि यह मेरा राज ले लेगा, इसलिए उसने सिंहलसाय को विष दे दिया। उसकी स्त्री गर्भवती थी। वह भाग कर पटना चली गई और एक ब्राह्मण के यहाँ नौकरी करने लगी। जब वह कचरा फेंकने को जा रही थी, उसी समय उसके लड्का पैदा हुआ। इस परसे उसका नाम कचरा धुरवा धराया गया। जब कचरा या कचना बड़ा हुआ तो वह महाराजा पटना की फौज में सिपाहीगिरी करने लगा। धीरे-धीरे वह सेनापति के पद पर पहुँच गया। महाराजा उससे खुश थे, उन्होंने एक बार उससे कहा. - तुम जो माँगना चाहो, माँगों । उसने मरदा की जमींदारी माँगी। महाराजा ने स्वीकार कर लिया। वह मरदा को गया था और वहाँ के जमीदार बाप का बैर भंजा लिया। फिर उसने आस-पास का क्षेत्र को जीत कर वर्तमान जमींदारी की नींव जमाई और नवागढ़ को अपना निवास बनाया। यहाँ बहुत बंदर थे, इसलिए इसका नाम बिंद्रानवागढ़ अर्थात् बंदरवाला नवागढ़ पड़ गया। तभी से इसकी गणना पटना महाराजा के 18 में होने लगी। सन् 1880 ई. में जमीनदार के नाबालिग होने के कारण जमींदारी कोरट कर ली गई। जमीनदार केवल साय छोटी ही अवस्था में मर गया। तब उसकी विधवा अधिकारिणी हुई। सन् 1902 में वह भी मर गई । तब इसी वंश की लहुरी ३ शाखा के छत्रसाल नामक प्रतिनिधि को यह जायदाद मिली। कंवल साय का यह भतीजा लगता था। इस जमींदारी में धान बहुत अच्छी होता है। तिल, कोदों, कुटकी भी बहुत होती है। 970 वर्ग मील में जंगल लगा है, यहाँ साल या सरई के झाड़ु बहुत होते हैं। सागौन भी उदन्ती नदी के किनारे होता है। टकौली 16000 रुपये दी जाती है। राजिम से देवभोग तक सड़क बनी है। जब कोरट था तब गरियाबंद में सदर मुकाम रखा गया था, और जमींदार के लिए एक महल बनवा दिया गया था। अब छुरा सदर मुकाम है। वह गरियाबंद से 14 मील है। कोरट ने महल और सड़क तीन लाख की लागत से बनवाई थी। जमींदार ने छुरा में भी एक महल बनवा लिया है। यहाँ पर पुलिसथाना, डाकखाना और एक हिंदी पाठशाला है। छुरी रायपुर से 56 मील और राजिम से 28 मील है। इस जमींदारी में 6 मदरसे, 7 डाकखाने और 4 पुलिस थाने हैं। थाने देवभोग, नवागढ़, गरियाबंद और छरा में हैं। कांदाडोंगर और देवभोग इस जमींदारी के प्राचीन ऐतिहासिक स्थान है ।

बिलाईगढ़ जमींदारी - बलोदाबाजार में 112 वर्ग मील मील की जमींदारी है, इसमें 74 गाँव हैं। फुलझर के गौड वंश का एक व्यक्ति पहले धनसिर में रहता था। उसको बारह गाँव दिए गए थे। इसलिए वह बरहिया कहलाता था। उस तरफ के गोंड लोग उस जमाने में जगन्नाथ जाने वाले यात्रियों को लूट लिया करते थे, इसलिए रतनपुर के राजा ने इसका प्रबंध करना चाहा और धनसिह के बरहिया को बिलाईगढ़ और कटगी की चौरासी देकर यात्रियों की रक्षा का भार उसके सिर पर रखा। उस समय मांझी मेवार बरहिया था। उसके लड़के मुखीराय और गुमानसिंह हुए, ये लडु पड़े और अपना बँटवारा करवा लिया। जेठे मुखीराय को बिलाईगढ़ और लहुरे को कटगी मिली, तब से ये अलग-अलग जमींदार हो गये। पचासेक वर्ष पूर्व कटगी में कोई वारिस न रहा, तब कटगी बिलाईगढ़ में फिर मिला दी गई । गदर के समय सोनाखान के जमींदार को पकङने में कटगी और बिलाईगढ़ दोनों ने सहायता दी थी। वर्तमान जमींदार दीवान रामप्रताप सिंह है । इस जमींदारी में उडद, तिल और अलसी की उपज अधिक है। बिलाईगढ़ और कटगी दोनों की मिलाकर 7000 रुपये टकौली देनी पड़ती है। बिलाईगढ़ रायपुर से 80 मील है। वहाँ पर किला और मंदिरों के खंडहर हैं। और पुलिस थाना, डाकखाना और पाठशाला भी है।

बिसरामपुर Bisrampur - (ज. 536) बलौदाबाजार तहसील में हथबंध स्टेशन से 8 मील है। यह जर्मन मिशन का गाँव है। देशी क्रिस्तान ही यहाँ रहते हैं। यहाँ लड़के और लड़कियों के लिए पाठशालाएँ हैं, डाकखाना और ५ छापाखाना भी है। प्रार्थना के लिए गिरजाघर बना है। सोमवार को बाजार भरता है।

भटगाँव जमींदारी Bhatagaon Jamindari - बलौदाबाजार तहसील में 64 धन माल की जमींदारी है। यह प्राचीन अद्ध चौरासी अथवा बयालीस थी। अब इसमें साठ गाँव हैं। तेली, चमार और चंदनाहु कुरमी यहाँ बहुत बसते हैं, खेती धान की विशेष होती है। उडद, तिल और कोदों भी बोया जाता है। जमींदार बिंझिया जाति के हैं । वर्तमान जमींदार बुधेश्वरसिंह हैं। इनके पुरखा जोगीराय रतनपुर के राजा कल्यान साय की सेवा में रहते थे और उनके साथ अकबर के समय दिल्ली दरबार को गए थे। 50 वर्ष पश्चात् रतनपुर के राजा जोगीराय के नाती बिजानीराय से नाखुश हो गए। इसलिए वह भाग निकला और महानदी के उस पार जंगलों में जा छिपा। तब वहाँ सम्बलपुर के राजा का राज था। राजा मे उसे ऊसर जमीन को आबाद करने की आज्ञा दे दी। तब उसने भटगाँव बसाया। पहले उसे कुछ लगान नहीं देना पड़ता था, पश्चात् मरहठों ने 400 रुपये टकौली लगाई, अब 2800 रुपये लगती है। भटगाँव के जमींदार ने सोनाखान के नारायणसिंह बागी को पकङने में सहायता दी थी। यह घराना सदैव राजभक्त रहा है।

भण्डार Bhandar - रायपुर तहसील में रायपुर से 32 मील है । यहाँ सतनामी पंथ के गुरु रहते हैं। उनके चरणामृत लेने को दूर-दूर से उनके अनुयायी आते हैं। ये लोग रामत को निकलने हैं और बहुत सा रुपया चढोतरी में पाते हैं । वर्तमान गुरु अजबलदार व मुखतावनदास हैं।

भाटापारा Bhatapara - (ज. 4714) बंगाल नागपुर रेलवे पर एक स्टेशन है, रेलवे के आने के पूर्व वह बहुत छोटी सी चर्मकारों की बस्ती थी। सन् .....में इसकी जनसंख्या थी। अब दस गुने से अधिक हो गई है और प्रतिदिन बढती जाती है। अब इसका गिनती कस्बों में की जाती है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में यहाँ व्यापार का एक मुख्य केंद्र हो गया है। अनाज, चमडा, हड्डी का यहाँ पर विशेष व्यापार होता है। मुंगेली और लवन की ओर से माल बहुत आता है, इतवार, बुधवार को बड़ा बाजार भरता है। यहाँ पानी की बहुत कमी है। यहाँ पर पाठशाला, पुलिस थाना, तारघर, डाकखाना और विश्राम घर बने हुए हैं। भाटापारा नोटीफाइड एरिया भी कर दिया गया है।

महानदी - यथा नाम यह केवल रायपुर जिले में ही नहीं वरन मध्य भारत या यों कहिये भारत को एक बड़ी नदी है। इस की लंबाई 550 मील | है। प्राय: अर्ध भाग मध्यप्रदेश में पड़ता है । रायपुर में वह प्राय: पौने दो सौ मील वही है। सिहावा के निकट एक छोटे से कुण्ड से निकल वह धमतरी में बहती हुई और फिर रायपुर और महासमुन्द्र तहसीलों के बीच की सीमा बनाती हुई बलौदा बाजार तहसील में प्रवेश करती है और शिवनाथ के संगम के पश्चात् वह बिलासपुर जिला और बलौदाबाजार की सीमा सरसीवां इलाके तक बना कर सारंगगढ़ रियासत में घुस गई है, उससे निकलकर फिर वह बिलासपुर जिले की सीमा बनाती हुई रायगढ़ रियासत से होकर सम्बलपुर जिले में प्रवेश करती है। फिर उडीसा की रियासतों में बहकर, कटक जिले में प्रवेश करती है और कटक नगर के पास अनेक धाराओं में बँट कर बंगाल की खाडी में जा गिरती है। इसकी बड़ी-बड़ी सहायक नदियाँ शिवनाथ, हस्दी, ईच, तेल, जोग और ओंग हैं। छोटी-मोटी तो बहुत सी उसमें जा मिली हैं।
महानदी का भाग, जो मध्यप्रदेश में पड़ता है, उसे चित्रोत्पला भी कहते हैं, '' उत्पलेश समासाद्य यावचित्रा महेश्वरी चित्रोत्पलेति कथिता सर्व पाप प्रणाशिनी | महानदी के किनारे कई पुण्यक्षेत्र हैं, उनमें से मध्यप्रदेश में बहुत प्रख्यात दो हैं। अर्थात् रायपुर जिले का राजिम और बिलासपुर जिले का शिवरी नारायण। महानदी का पाट बहुत चौडा है, कहीं-कहीं पर मील भर का हो गया है। 8 मास तक नदी की धारा बहुत साँकरी और उथली हो जाती है, परंतु चौमासे में वह विकराल रूप धारण कर लेती है। जब महानदी पूर में आती है, तब वह गंगा के समान समुद्र में बीस लाख घन फुट प्रति सेकंड फेंकती है। जब पूर आता है, तब राम ही से काम पड़ता है। दो भारी पूरों के दृश्य का दिग्दर्शन प्रथम झलक में करा दिया गया है। सम्बलपुर से कटक तक खूब नावें चलती हैं और उनके द्वारा माल भी ढोया जाता है, परंतु उसके ऊपर नाव बराबर नहीं चल सकतीं, जिससे नदी द्वारा इस प्रदेश का माल ढोया जा सके। रायपुर जिले में इस नदी का उपयोग आवपाशी के लिए किया जा रहा है। इससे एक बड़ी भारी नहर निकाली गई है, जिसकी लंबाई 187 मील है।

महासमुन्द Mahasamund -यह तहसील सन् 1906 में निर्मित हुई। उसका रकबा 5194 वर्ग मील है। इतने बडे विस्तार की मध्यप्रदेश में कोई भी तहसील नहीं है। यथार्थ में 22 जिलों में से 19 जिले रकबे में उससे छोटे हैं। इस तहसील में जमींदारियाँ बहुत हैं, जिनका रकबा 4594 वर्गमील बैठता है। इस प्रकार खालसे का रकाबा केवल 610 वर्गमील रह जाता है। जनसंख्या 5,44,089 है, जो पृथक-पृथक 11 जिलों की जनसंख्या अधिक बैठती है। साढे चार लाख जन इनकी जमींदारियों में रहते हैं। तहसील बड़ी जंगली है। जमींदारियों के आधे भाग में जंगल ही जंगल हैं। जमीन ऊंचाई पर है । वहाँ पहाडियाँ 3000 फुट तक ऊँची हैं। गोंड, बिंझाल और कर लोग विशेष पाये जाते हैं। बहुतेरे जमींनदार गोंड हैं, केवल खुरियार का क्षत्रिय और नर्रा का कंवर है । खेती विशेषकर धान की होती है। तिल, उडद, और कोदों कुटकी भी थोडी-बहुत हो जाती है। जमा 1,51,469 है। इस तहसील में पुलिस थाने १4 हैं। ये महासमुन्द, राजिम, तुमगाँव, पिठौरा, सुबरमार, नवापारा, कोमना, खरियार, देवभोग, मैनपुर, गरियाबंद, छुरा सरईपाली और बसना में हैं।

महासमुन्द गाँव Mahasamund - (ज. 2256) इसी नाम की तहसील का सदर मुकाम है । यह राजिम से 18 मील और रायपुर से 34 मील है। यहाँ मामूली कचहरियाँ के सिवाय डाकखाना, पुलिस था, अस्पताल और पाठशाला हैं। खरियार के जमींदार राजा ब्रजराजसिंहदेव की मृत्यु यहीं हो गई थीं, इक्षलिए पाठशाला की इमारत स्मारक रूप खरियार के जमींदार ने बनवा दी है। यहाँ एक सराय और विश्राम बँगला भी है। यहाँ जर्मन मिशन भी है।

राजिम Rajim - (ज. 1734) महासमुन्द तहसील में महानदी के दाहिने तट पर एक प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र है। वह रायपुर से 26 मील है। यहाँ पहुँचने के लिए महानदी के बायें तट पर नवापारा तक रेल बनी है। खुले दिनों में नवापारा से राजिम जाने को अस्थायी पुल बना दिया जाता है। छत्तीसगढ़ में राजिम का बड़ा माहात्म्य है। यहां जीवलोचन का मंदिर है। दर्शन करने को दूर-दूर के सहस्रों यात्री प्रति वर्ष आते हैं। माघ सुदी अष्टमी से यहाँ बड़ा मेला भरता है, जो एक मास तक रहता है, माघ की शिवरात्रि को जमघट पचास हजार से कम नहीं रहता। यहाँ पर अनेक प्राचीन मूर्तियाँ हैं, शिला और ताम्रलेख हैं, जिनसे वह स्थान की प्राचीनता प्रकट होती है। राजीवलोचन का मंदिर बड़ा भव्य है। इसके चारों कोनों में चार मंदिर वराह, नरसिहं, बद्रीनाथ और वामन के बने हैं। इनके सिवाय तीन और - जगन्नाथ, राजेश्वर और दानेश्वर के बीच-बीच में हैं। पिछले दो शैव हैं, शेष सब वैष्णव हैं। सब के मध्य में राजीवलोचन का मंदिर है। वह 59 फुट ऊँचा है। इस मंदिर में दो शिलालेख हैं, एक की तिथि 1145 ई. है । दूसरा उससे सौ वर्ष पूर्व का है । यह बहुत टूट-फूट गया है । उसमें लिखा है कि विष्णु के लिए यह मंदिर बनवाया गया था, इससे जान पड़ता है कि मंदिर की रचना आठवीं शताब्दि के लगभग हुई होगी । दूसरे लेख को हैहयों के अधिकारी जगपाल ने खुदवाया था। उसमें जगपाल के जीते हुए रजवाडों का जिक्र है, जैसे मचका सिवा ( धमतरी तहसील का वर्तमान मेचका व सिहावा), कांदाडोंगर, जो बिंद्रामवागढ़ जमींदारी में विद्यमान हैं), काकरय (कांकेर, कान्तार, कुसुमभोग इत्यादि। कहते हैं कि जगपाल दुर्ग में रहता था और नित्य राजीवलोचन की पूजा करने को राजिम जाता था।
राजिम राजीव का अपभ्रंश हैं, परंतु स्थानीय लोग उसकी व्युत्पत्ति एक तेलिन के नाम से बताते हैं। कहते हैं कि राजिव नाम की तेलिन ने अपनी टोकनी एक दिन एक पत्थर पर रख दी। तब से उसके तेल पात्र से चाहे जितना तेल निकालते जाओ, कभी घटता ही नहीं था। उस पत्थर को वह घर उठा ले गई और उसे पूजने लगी। जब राजा ने यह हाल सुना तो उस पत्थर को भेजा, तेलिन उसे देती नहीं थी। बाद में उसके बराबर सोने की तौल के बदले में देने को राजी हुई, जब पत्थर नखरिये पर रखा गया तो तुल के बराबर हो गया। वह देखकर तेलिन ने कहा कि मैं इसे इस शर्त पर दूँगी कि मेरा नाम इसके आगे चले। इसलिए देव का नाम उसके नाम पर से राजीवलोचन रखा गया। राजीव लोचन के मंदिर के सामने एक छोटा सा मंदिर बना है। उसमें एक सती चीरा सा है, जिस पर सूर्य, चंद्र और कुंभ सा खुदा है, उसके नीचे स्त्री-पुरुष आसीन हैं और बगल में दो दासियाँ खडी हैं। इनके नीचे व्यवसाय दर्शक-घानी और एक बैल का चित्र खुदा हैं। यदि तेलिन की दंत कथा में कुछ सार है तो जानना चाहिए कि वह अपने इष्टदेव राजीवलोचन के सामने सती हुई। इस मंदिर में यह एक विचित्रता है कि पुजारी क्षत्रिय होते हैं न कि ब्राह्मण। इनके पास एक ताम्र शासन है, जिसमेँ पांडववंशी राजा तीवर देव के पिंपरोपद्रक नामक गाँव किसी ब्राह्मण को दान करने का लेख है, इस लेख की मंदिर में पूजा की जाती है। राजा जगपाल के शिलालेख में मंदिर की शाल्मलि गाँव नैवेद्य के लिए देने का उल्लेख है।यह अवश्य सेमरडीह है, जो अभी तक मंदिर को लगा है।
जान पड़ता है जगपाल ही ने जो राजमाल जाति का था, क्षत्रियों को पुजारी बनाया। कदाचित् वह ब्राह्मणों में धोखा खा गया था, इसलिए उनको नियुक्त करना उचित नहीं समझा। ब्राह्मणों ने इस प्रकरण को बिना समाधान किये जाने नहीं दिया, उन्होंने राजिम माहात्म्य रचकर शौनक से प्रश्न करवाया। सर्व क्षेत्रेश्रतं पूर्व पूजका: ब्राह्मणश्शुभा: । याक्षेत्रे कर्य तावत् क्षत्रिया: पूजकाऽभवन्। सूतजी उत्तर में कहते हैं, चंद्रवश में रत्नाकर नाम प्रतापी राजा हुआ, उसने विष्णु यज्ञ करना प्रारंभ किया ,तब राक्षसों ने बाधा डाली | उसने विष्णु की स्तुति की । भगवान ने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कर दर्शन दिए और कहा वर माँग। राजा ने कहा था, आप तो इस पृथ्वी 'पर इसी रूप से निवास करें और के हाथ से पूजा ग्रहण करें । तब विष्णु ने कहा.
एवमसतु ग्रहीष्यामि स्वल्पकालेन भूपते ।
दिव्याँ ते वंश्य हस्ताचीं सादूतो लोक पावनीम्।॥
अन्यत्र विप्र हस्ताचीं ग्रहीष्याभि नूरोत्तम।
अत्र ते वंश वंश्यैश्च कृतां पूजां प्रसन्नत: ॥
अर्थात् प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारे वंशजों के हाथ से पूजा लगे । इस पकार स्वयं विष्णु ही से निबटारा करवा दिया गया। कहते हैं कि कांकेर में पहले कंडरा राजा था, वह राजिम को नष्ट कर मूर्ति को नाव में धर कर कांकेर लिये जाता था। धमतरी पहुँचने पर उसे स्वप्न हुआ कि उसका नाश हो जाएगा। इसलिए उसने मूर्ति को राजिम वापिस कर दिया। तिस पर भी उसका राज चला ही गया।
राजिम ने महानदी और पैरी का संगम हुआ है, इस संगम के बीच में कुलेश्वर का मंदिर बना है। दंत कथा के अनुसार इसको ताम्रध्वज राजा ने बनवाया था। इसमें एक रानी का चित्र खुदा है। इसे झनकावती बतलाते हैं, वह मंदिर में लाख दीपक रोज जलाया करती थी। राजिम में खोदने से बहुत दीये मिलते हैं, ये उसी समय के दीये बतलाये जाते हैं। कुलेश्वर मंदिर के चबूतरे पर एक बड़ा झाड़ु लगा है। 90 वर्ष पूर्व जब महानदी का बड़ा पूर आया था, तब एक साधु ने जो उस मंदिर में रहता था, झाड़ पर चढ तीन दिन कारे थे, इसके स्मारक में उसने मंदिर में सोरठा बनाकर खुदवा दिया है, वह यों हैं-
जादिन व्यापे अंब, छूटत शिव गिरि गहि रह्यो ।
जगतराव तहं खम्ब, शम्भ सुखासन रह्यो तहँ ॥।
राजिम के आसपास पंचकोशों में चंपेश्वर, बाबनेश्वर, फंगेश्वर, कोपेश्वर और पाटेश्वर महादेव हैं। कहते हैं आदि में आकाश से कमल का पत्ता गिरा था, जिससे इन महादेवोंपर्यत भूमि गई थी। यही कमल या पद्म क्षेत्र कहलाया। पश्चात् राजीवलोचन का मंदिर बनने पर क्षेत्र का वर्तमान पड़ गया।
राजिम ने पाठशाला, डाकखाना, पुलिस थाना और विश्राम बँगला है। १ 1 बाजार रोज लगता है, परंतु शनिवार को बड़ा बाजार भरता है। लाख और हर्रे का व्यापार अधिक होता है। मेले के समय हर प्रकार की वस्तुएँ आती हैं। ढोर तक बिकने को आते हैं। सन् 1896 ई. के मेले में साढे चार लाख रुपये का माल बिक्री के लिए आया था। उसमें से दो लाख का बिक गया था। कोई 900 दुकानें आई थीं, अब कुछ कम आती हैं। इस कस्बे का प्रमुख वंश महाडोक का है, इसके प्रसिद्ध नायक राय बहादुर राघोबा महाडीक अब इस लोक में नहीं है। इनके कोई 20 गाँव * थे। इस वंश का संबंध नागपुर के राज घराने से था। राजिम में कई विद्वान् पुरुष रहते हैं। उनमें से कुछ कविता भी करते हैं । कुछ वर्ष पूर्व यहाँ एक कवि समाज की स्थापना की गई थी। छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला पद्यात्मक ग्रंथ यहाँ के पं. सुंदर लाल द्वारा रचा गया था।

रायपुर तहसील Raipur Tahasil - रकबा 1014 वर्ग मील है। सन. 1906 के पूर्व इसका रकबा 5802 वर्गमील था, जबकि मध्य प्रदेश में उनसे बड़ी तहसील कोई थी ही नहीं । जब दुर्ग जिला बना और महासमुंद्र में नई तहसील स्थापित हुई। तब से महानदी के उस पार की जमींदारियाँ महासमुन्द में मिला दी गईं। इसी से रायपुर तहसील का रकबा विशेषकर घट गया। अब यह जिले में रकबे के हिसाब से सब से छोटी तहसील है । जन संख्या 2,53,615 है। सब तहसीलों में यह अधिक घनी बसी है । कृषकों में सतनामी चमार और तेलियों की अधिकता है । जंगल बहुत कम हैं । दो तिहाई भूमि में धान बोया जाता है, शेष में कोदों कुटकी और थोडी बहुत उडद, गेहूँ, तेबरा, अलसी,चना और मसूर हो जाती है। तहसील की जमा 2,27,500 रुपये है। इसमें 5 पुलिसथाने - रायपुर अल्भनपुर, धरसीवां, आरंग और खरोरा में हैं।

रायुपर शहर Raipur City - (ज. 38,341) जनसंख्या के प्रमाण से मध्यप्रदेश के शहरों में इसका पाँचवाँ नम्बर बैठता है, यथार्थ में इससे बडे दो ही नगर नागपुर और जबलपुर हैं। शेष दो अमरावती और सागर बराबरी के हैं, केवल हजार-दो हजार जनसंख्या का फरक पड़ता है। यह नगर रायपुर तहसील, रायपुर जिला और छत्तीसगढ़ कमिश्नरी का सदर मुकाम है और बंगाल- नागपुर रेलवे लाइन पर कलकत्ता से 513 मील और नागपुर से 188 मील पड़ता है। यहाँ से एक छोटी लाइन धमतरी और राजिम को गई है। जान पड़ता है कि रायपुर चौदहवीं शताब्दी में बसाया गया, जब रतनपुरी हैहयों की एक शाख्र का नायक सिंहण खलारी से राजधानी यहाँ उठा लाया। लगभग उसी जमाने का बना हुआ यहाँ एक किला है, जिसके भीतर कई मंदिर हैं। किले के दो ओर तालाब हैं। यहाँ एक शिलालेख राजा ब्रह्मदेव के समय का मिला था, जो सिंहण का नाती था। उसकी तिथि 140 ई. में पड़ती है। यह शिलालेख नागपुर के अजायबघर में रखा है। रायपुर में भी नादगाँव के राजा घासीदास का बनवाया एक छोटा सा अजायबघर है, जिसमें सात आठ शिलालेख हैं। इनमें से तीन सिरपुर में मिले, एक खलारी में, शेष अन्य जिलों के हैं। रायपुर में दो बडे-बडे तालाब हैं । एक का नाम बूढा तालाब और दूसरे का महाराजबंध है । बूढा तालाब बहुत मनोहर लगता है। उसके बीच में एक द्वीप है, जिस पर झाड़ लगे हैं। एक ओर कम्पनी बगीचा लगा है। निकट ही दूधाधारी का मंदिर है, जिसकी बनावट बहुत अच्छी है। नवीन मंदिरों में ऐसी कारीगरी के मंदिर इस प्रदेश में विरले ही स्थानों में मिलेंगे। इसको राम सरन लाल बानी के पूर्वजों ने बनवाया था। अब यह मंदिर वैरागी महंत के प्रबंध में हैं। इसमें कोई तीसेक गाँव लगे हैं, यह बड़ा धनाठ्य मंदिर है। इसे अन्न का भंडार समझना चाहिए, किसी समय यहाँ एक लाख खंडी तक अनाज कोष में रहता था। इस मंदिर में सिरपुर से लाई हुई कई बौद्ध और जनमूर्तियों का संग्रह भी है।
रायपुर में सन् 1867 ई. में म्युनिसिपालिटी बनाई गई थी। आमदनी प्राय: 2,41,000 वार्षिक है। शहर में पानी के नल लगे हैं, जिनके बनाने के लिए नांदगाँव के राजा बहादुर बलराम दास ने दो लाख रुपये दिए थे। कुल खर्च प्राय: साढे तीन लाख पड़ा था। बलराम दास की उदारता के उपलक्ष्य में इस नलबल जल पूर्ति का नाम बलराम दास वाटर वर्क्स रख दिया गया। पानी खारून नदी से लाया गया है। यों तो अंग्रेजी अमल में सन् 1818 ई. से रायपुर छत्तीसगढ़ का सदर मुकाम रहा है, परंतु जब से यह रेलवे का स्टेशन बन गया है, तब से व्यापार में विशेष वृद्धि हुई है। गल्ले का रोजगार बहुत चलता है । यहाँ पर कुछ कारखाने भी हैं, जैसे तेल निकालने के, ईंट खपरे बनाने के। काँसे पीतल के बर्तन व गहने बनाना, कपड़ा बुनना, चाँदी-सोने के गहने बनाना, लकडी के खिलौने तैयार करना इत्यादि भी वहाँ की विशेषता है। रायपुर मैं छापाखाना भी है। उनमें अंग्रेजी, उर्दू, हिंदी, मराठी, उडिया आदि में छपाई होती है। यहाँ एक सेन्ट्रल जेल है। इसमें दरियाँ बहुत अच्छ बनती हैं। प्रेक्षणीय स्थानों में यहाँ पर राजकुमार कालेज है, जो राजाओं और रईसों के लडकों को पढाने के लिए बनाया गया है । मध्य प्रदेश में यह एक ही है। अजायबघर का जिक्र हो चुका है। दो बाजार अच्छे बने हैं। एक को गोल बाजार कहते हैं, दूसरे को फिलिप्स मारकेट | शिक्षा के लिये यहाँ पर एक सरकारी हाई स्कूल, एक मिशन हाईस्कूल, एक लारी अंग्रेजी मिडिल स्कूल, एक खालसा अंग्रेजी स्कूल और 10 प्राइमरी पाठशालाएँ हैं । मेहतरों के लिए एक अलग पाठशाला है, लड़कियों के लिए पाँच पाठशालाएँ हैं। अध्यापकी सिखाने के लिए पुरुषों के लिए एक नार्मल स्कूल है। यहाँ पर दो मिशन हैं। 3 पाठशालाएँ उन्हीं की हैं। अनाथों के लिए भी एक हिंदी पाठशाला खोल रखी है । रोगियों के लिए 3 अस्पताल हैं । उनमें एक पुलिस के लिए है। स्त्रियों के लिए डफरिन फंड से अलग अस्पताल हैं, एक आयुर्वेदिक शाला भी है, ढोरों के लिए भी म्युनिसिपालिटी ने चिकित्सालय खोल रखा है। सन् 1887 में यहाँ एक टाउन हाल 24,000 रुपये की लागत से बनाया गया था। कमिश्नरी जिला और तहसील संबंधी अदालतें और दफ्तर हैं । इसके सिवाय यहाँ मध्यप्रदेश के पोलिटिकल एजेंट का भी दफ्तर है। बारीक मास्टरी और आवपाशी के इंजीनियर, डाकखानों के सुपरिटेंडेंट और रजवाडों की शालाओं के इन्सपेक्टर भी यहाँ रहते हैं। डाक खाना, तारघर, सरकिट हाउस, डाक बँगला, सराय, धर्मशाला, पुस्तकालय, देशी व विलायती क्लब आदि भी विद्यमान हैं । रायपुर में बाजार रोज लगता हैं। पहले रायपुर में सन् 1902 तक कुछ फौज भी रहती थी। रायपुर शहर बाढ पर है। सन् 1873 में जनसंख्या 19 हजार थी। आज उसकी दूनी है।

रूद्री Rudri - धमतरी से दो मील महानदी के तट पर छोटा सा गाँव है। वहाँ पर माघ पूर्णिमा को रुदेश्वर-महादेव का मेला भरता है, जिसमें प्राय: दस हजार लोग जुड जाते हें । इस गाँव का नाम रुद्री रुदेश्वर के मंदिर Rudreshwar Tample होने के कारण ही पड़ा है, परंतु कोई-कोई कहते हैं कि कांकेर के राजा रुद्रदेव ने बसाया था। इसलिए वह रुद्री कहलाया। यहाँ पर कबीरपंथियों का चबूतरा भी है । इसलिए दूर-दूर के कबीरपंथी भी यात्रा करने को जाते हैं । धमतरी के मिशन वालों ने यहाँ एक बड़ा अनाथालय खोल रखा है और लड़के और लड़कियोंके लिए शालाएँ स्थापित कर दी हैं, इनमें कुछ धंधे भी सिखलाए जाते हैं, जैसे बढई, लुहार, दरजी का काम, निवास व रस्सियाँ बनाना, तेल पेरना इत्यादि। यहाँ अंधे-बहरे, मूकों के लिए भी एक अलग शाला है। धमतरी से रुद्री तक मिशनरियों ने टेलीफोन लगा दिया है, जिससे -: वे धमतरी में बैठे यहाँ के लोगों से बातचीत कर सकते हैं।

लभानडीह Labhandi - रायपुर से पाँच मील आरंभ की सड़क पर है। यहाँ पर करदिखाव खेती का सरकारी खितौला है, जो मध्यप्रदेश में श्रेष्ठ समझा जाता है। यहाँ पर खेती उत्तम प्रकार से कैसे होती है और उपज कैसे बढ सकती है, यह बात परीक्षा करके दिखलाई जाती है।यह खितौला सन् 1903 ई. में स्थापित किया गया था। लभानडीह से पाँच मील चलकर कुरुद है, वहाँ 1,19,000 की लागत से सरकार ने एक आवपाशी का तालाब बनवा दिया, जिससे 1600 एकड की सिंचाई हो सकती है।

लवन Lawan - लवन का अर्थ होता है नीची भूमि और यह इलाका ऐसे ही स्थल पर है। लवन बलौदाबाबाजार से कुछ दूर है, सड़क लगी है। रायपुर से वह 53 मील पड़ता है। यहाँ पर एक पुराने महल के खँडहर हैं। आसपास के इलाके को लोग लवन राज कहते हैं, इसमें 150 गाँव थे, जो दुर्ग जिले की नंदकठी के एक बनिया ताहुतदार के ताँबे में थे। यहाँ पाठशाला, डाकखाना और विश्राम बँगला है, शनिवार को बाजार भरता है, जिसमें ढोर बिकने को आते हैं। लवन से छह मील खैरा में आवपाशी का तालाब 70,000 रुपये की लागत से बनाया गया है। उससे 1000 एकड की सिंचाई हो सकती है।

शिवनाथ नदी - दुर्ग जिले से निकलकर सिमगा से 4 मील इस तरफ प से उत्तरीय सीमा बनाती हुई शिवरीनारायण के पास महानदी में जा मिली है। महानदी को छोड छत्तीसगढ़ में यह सब से बड़ी नदी है, इसकी लंबाई 160 मील है। बलौदाबाजार में बजारभाटा एक गाँव शिवनाथ के तट पर है, वहाँ इस नदी में स्लेट का पत्थर मिलता है।

सांकरा Sankara - (ज. 2615) धमतरी से 35 मील सिहावा इलाके में है। इसको और आसपास के पाँच और गाँव अर्थात् नगरी, विरगुरी, सेमरा,आमगाँव और चुरियाना को कांकेर के राजा ने अपनी लड़की को चूडी के खर्च के लिए दिया था। यह लडकी बस्तर के राजा को ब्याही गई थी। इसलिए वे गाँव बस्तर राजा के अधीन मुआफी में अभी तक चले जाते हैं। कहते हैं कांकेर के राजा उडीसा से उसे पहले आये थे, तब नगरी में बसे थे, वहाँ पर किला-खंडहर अभी तक है। सांकरा 5 वर्ग मील का बड़ा गाँव है, यहाँ एक पाठशाला है। सोमवार को बाजार भरता है। ढोर और जंगल की उपज बिकने को बहुत आती हैं। सांकरा के लगभग नगरी के आबादी है, वहाँ 2308 जन रहते हैं।

सिमगा Simga - (ज. 2048) सन् 1906 ई. तक यह सिमगा नामक तहसील का सदर मुकाम था, अब बलौदाबाजार तहसील में है। वह शिवनाथ के तट पर टिल्दा स्टेशन से 9 मील पड़ता है। रायपुर से वह 28 मील बिलासपुर की सड़क पर है। यहाँ पर कुछ सतीचोरे मिले थे, जो अब रायपुर के अजायबघर में रखे हैं। यहाँ अस्पताल, पाठशाला, डाकखाना, विश्राम बँगला और सराय हैं। शनिवार और मंगल को बाजार लगता है। सिमगा में पान की बाडियाँ हैं।

सिरपुर Sirpur - महानदी के तट पर रायपुर से 37 मील महासमुंद्र तहसील ३ में है। प्राचीनकाल में यह महाकौशल अर्थात् छत्तीसगढ़ की राजधानी थी। इसका शुद्ध नाम श्रीपुर Shripur था। सातवीं-आठवीं शताब्दी में यहाँ सोमवंशी राजा, जिन्हें पिछले गुप्त भी कहते हैं, राज करते थे। यहाँ पर महलों और मंदिरों के विस्तीर्ण खंडहर हैं। एक विष्णु का मंदिर, जिसको लोग लक्ष्मण का मंदिर कहते हैं, अब भी खड़ा हैं, इसमें ईंटों की जुडडाई और कटाई ऐसी बारीकी से की गई है कि उसे देख कर आइचर्य होता है। जुडाई के गारे की मोटाईइंच के बीसवें अंश के बराबर हैं। वह कैसा गारा रहा होगा, इसका अनुमान ही नहीं बँधता। पत्थर की बहुत सी विशाल मूर्तियाँ इस मंदिर के निकट इकट्ठी करके रख दी गई हैं। उनकी कारीगरी अनुपम है। बहुत से खंभे और अन्य कारीगरी के काम लोग ढो-ढो कर राजिम, रायपुर, धमतरी आदि को ले गए और उनसे नए मंदिर बनवा डाले । स्वयं भोंसलों ने सिरपुर में खंडहरों से सामग्री लेकर वर्तमान गंधेश्वर (गंधर्वेश्वर) का मंदिर खडा कर दिया है।
इस मंदिर में कई पुराने शिलालेख भी लगवा दिए गए हैं। लक्ष्मण मंदिर Laxman Mandir में एक शिलालेख मिला था, जिसको राय बहादुर हीरालाल साहब ने पढ़कर यह सिद्ध किया है कि सिरपुर के राजा वहाँ थे, जो पीछे से कटक के सोमवंशी Somvanshi कहलाये। लक्ष्मण का मंदिर महाराजा शिवगुप्त Shivgupt की माता वासटा Vasata ने बनवाया था। वह मगध के राजा सूर्यवर्मा Sury Verma की लड़की थी। यहाँ पर गौतमबुद्ध की विशाल मूर्ति है, जिसमें बौद्ध धर्म का बीज मंत्र.-ये हेतु प्रभवा हेतु तेषां तथा गतो ह्यवदत्। तेषां च यो निरोध एवं वादि महा श्रमण: खुदा है अर्थात् धर्म होत जो हेतुसों, कहो तासु को हेत । पुन: दमन विधि को महाश्रमण करायो चेत । इसके अक्षर आठवीं-नवमी शताब्दी के जान पड़ते हैं, इससे प्रकट होता है कि यहाँ बहुत पीछे तक बौद्ध धर्म का प्रचार स्थिर रहा आया। दो किलों के खंडहर भी निकट ही हैं। सर्वत्र जंगल ऊग आया है। महलों की जगह चंद झोंपड़ियाँ बनी हैं। यहाँ केवल 94 जन रहते हैं, हुआ समय का फेर हाय पलटी परिपाटी, जो थे कभी सुमेरू आज हैं केवल माटी ।

सिहावा Sihava -धमतरी से 44 मील आग्नेय को है। यह जंगल के बीच ऊपजाऊ मैदान में हो यहाँ लोग शिकार को बहुत आते हैं, यहाँ पर छह पुराने मंदिर हैं । नामक मंदिर में एक शिलालेख है, जिसकी तिथि 1192 ई. में पड़ती है। उसमें लिखा है कि चंद्रवंशी राजा कर्ण ने 5 मंदिर बनवाए थे, उसके वंश का मूल पुरुष सिंहराज था, इसी नाम से कदाचित् सिहावा नाम पड़ा, सिंह अव: का अर्थ होता है सिंह का विश्राम स्थान। कर्ण की वंशावली कांकेर के शिलालेख से मिलती है। कांकेर के राजा कहते हैं कि उनके आदि पुरखा जगन्नाथ पुरी के थे, कोढ से पीडित होकर वे चल निकले और सिहावा के घने जंगलों में पहुँचे। वहां पर एक कुण्ड के पानी में नहाने से उनका कोढ जाता रहा। यही कदाचित् सिंहराज रहे हों। शिलालेख में कुण्ड का नाम देवह्रद तीर्थ लिखा है। सिंहावा ही से महानदी निकली है । यहाँ श्रंगी ऋषि Shringi Rishi का आश्रम बतलाया जाता है,वहाँ से ऽ मील रतावा में अंगिरस Angiras और 20 मील मेचका में मुचकुन्द Muchkund का आश्रम बतलाते हैं। जगपाल के 1145 ई. के शिलालेख से जान पड़ता है कि यहाँ पर कोई राजा रहता था, उसको जगपाल ने हरा कर मांडलिक बना लिया था। सिहावा से आठ मील देवकूट अर्थात देवताओं का पर्वत है। इन सब नामों से इस स्थान की प्राचीनता व पवित्रता झलकती है। माघ पूर्णिमा को महादेव का मेला भरता है । सिहावा में लाख, महुवा और का व्यापार होता है, प्रति इतवार- बुधवार को बाजार भरता है। इस ओर जादू का बड़ा जोर है और नरबलि देने का प्रमाण 1908 ई. तक मिलता है। सिहावा में पुलिसथाना, पाठशाला, डाकघर और अस्पताल है। सुबरमार जमींदारी - महासमुन्द तहसील में 199 वर्ग मील की जमींदारी है। हैहय वंशियों के राज में यह खालसा तालुक था। 200 वर्ष पूर्व तालुकेदार बागी हो गया, वर्त्तमान जमींदार के मूल पुरुष ने उसके दमन करने में सहायता दी, इसलिए यह तालुका उसे इनाम में दिया गया। वर्तमान जमीनदार लालगिरिराजसिंह गौड जाति के हैं और कहते हैं कि हमारे वंश में यह जमींदारी 13 पीढ़ी से चली आती है । जमींदारी के किस्सा के अनुसार उनके आदि पुरखा पूरनराय ने एक बड़ा भारी सुअर, जो खेती का नाश करता था, मार डाला था। इससे जमींदारी का नाम सुबरमार रखा गया, परंतु पुरातत्ववेत्ता कहते हैं कि यहाँ पहले सबर जाति के लोग बसते थे, इसलिए इलाके का नाम सबरमाल पड़ गया, उसका अपभ्रंश पीछे से सुबरमार हो गया। इस जमींदारी में 102 गाँव हैं। खेती, विशेषकर धान, कोदों, कुटकी और तिल की होती है। 67 वर्ग मील में जंगल है, टकौली 6250 रुपये लगती है। रायपुर कालाहंडी सड़क इस जमींदारी से होकर गई है । जमींदार कोमाखान में रहते हैं, जो सड़क से दो मील बाजू पर है । रायपुर से कोमाखान 62 मील और महासमुन्द से 29 मील है। कोमाखान में पाठशाला, पुलिस थाना और डाकखाना है । जमींदार आनरेरी मजिस्ट्रेट हैं। उनकी अदालत कोमाखान ही में है।
रायपुर रश्मि मुख्‍य पृष्‍ट विवरणिका में वापस लौटें ..

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