विरोध के बावजूद सरकार रेलवे को निजी हाथों में देने की तैयारी में

देश भर में रेलवे के निजीकरण का विरोध हो रहा है. लेकिन सरकार के पास बहुमत है. राष्ट्रभक्ति का ठप्पा लगा ही है, इसलिए किसकी सुनना और क्यों सुनना. बेचने की तैयारी पूरी कर ली गई है. तेजस को शुरू कर इसकी बुनियाद रखी भी गई है. अब सरकार की नजर रेलवे की संपत्तियों पर है. विपक्ष रह नहीं गया है और लोग राग देशभक्ति में मशगूल हैं इसलिए कोई सुध लेने वाला नहीं. कर्मचारी जरूर प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन उन कर्मचारियों की सुनने वाला भी कोई नहीं.

भारत में सबसे बड़े माल वाहक और यात्री वाहक साधन, यानी भारतीय रेलवे को केंद्र सरकार निजी हाथों में देने पर विचार शुरू कर चुकी है. जी हां, वही रेलवे, जिसका बजट अलग से पेश करना 2014 में बंद किया जा चुका है. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जो बजट 2019 पेश किया था, उसमें साफ तौर पर कहा गया है कि भारतीय रेलवे को अब जन सहभागिता, यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप, मतलब पीपीपी मोड पर चलाया जाएगा.

इसके साथ ही वित्तमंत्री ने एक बार फिर से केंद्र सरकार की योजना के तहत एयर इंडिया को बेचने का भी एलान कर दिया है. जो भारतीय रेलवे देश के सबसे ज्यादा यात्रियों को ढोने का काम करती है, उसको अब निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है.नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में चुनाव प्रचार की शुरूआत में सार्वजनिक संभाओं में अपनी कविता मैं देश नहीं बिकने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा, गाकर युवाओं को दिल जीत लिया था. इसके बाद बालाकोट में एयर स्ट्राइक के दिन राजस्थान के चुरू में जनसभा में भी यही कविता गाई थी. जिससे युवाओं को एक बार फिर लगा था कि वास्तव में मोदी देश को नहीं बिकने देंगे.

लेकिन वित्तमंत्री के बजट में रेलवे को निजी हाथों में देने की बात कहने के बाद सोशल मीडिया पर मोदी के खिलाफ लोगों ने मोर्चा खोल दिया था. तेजस से इसकी शुरुआत कर भी दी गई है. कहा जा रहा है कि देश की करीब देढ़ सौ ट्रेनों को निजी हाथों को सौंप दिया जाएगा और इसी तरह सैंकड़ों रेलवे स्टेशन अब सरकार की मिलकियत नहीं रहेंगी, बल्कि उन पर निजी कंपनियों या कहें के उद्योगपतियों का कब्जा हो जाएगा.

हालांकि इसे लेकर मोदी सरकार की इस मामले में तीखी आलोचना हो रही है. हर तरफ रेलवे को निजी हाथों में देने और एयर इंडिया जैसे सरकारी उपक्रम को बेचने की बात पर युवाओं ने मोदी को सोशल मीडिया पर आडे हाथों लिया है. यह महज संयोग नहीं है कि सरकार रेलवे जैसे उपकरण को, जो कि फायदे का सौदा है, उसको प्राइवेट हाथों में देकर चलाना चाहती है, बल्कि इसके पीछे बड़ी साजिश बताई जा रही है. जिस तरह से यूपीए सरकार ने विदेश निवेश पर जोर दिया था और तब पूरी भाजपा समेत तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी तीखी आलोचना की थी. लेकिन अब वही भाजपा, और वही नरेंद्र मोदी मीडिया और बीमा क्षेत्र में सौ फीसद एफडीआई लागू करने जा रहे हैं. इससे साफ है कि राजनीतिक दल कहते कुछ और करते कुछ और हैं. भारतीय रेवले दुनिया का सबसे ज्यादा दूरी तय करने वाला माध्यम है. इसमें करीब 16 लाख से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं. इसको अभी तक घाटे में भी नहीं धकेला गया है.

इस बीच, आर्थिक मोर्चे पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को झटका लगा है. माल व सेवा कर (जीएसटी) संग्रह सितंबर में घटकर 91,916 करोड़ रुपए रह गया. यानी अगस्त के मुकाबले इसमें 6286 करोड़ रुपए की कमी आई है. अगस्त में जीएसटी संग्रह 98,202 करोड़ रुपे रहा था. लेकिन अब जारी सरकारी आंकड़ों में यह जानकारी दी गई है. एक साल पहले समान महीने (सितंबर, 2018) में जीएसटी संग्रह 94,442 करोड़ रुपए रहा था. वित्त मंत्रालय ने बयान में कहा कि सितंबर में कुल सकल जीएसटी संग्रह 91,916 करोड़ रुपए रहा. इसमें सीजीएसटी 16,630 करोड़ रुपए, एसजीएसटी 22,598 करोड़ रुपए, आईजीएसटी 45,069 करोड़ रुपए और उपकर का हिस्सा 7,620 करोड़ रुपए रहा. बयान में कहा गया है कि अगस्त के लिए 30 सितंबर तक कुल 75.94 लाख जीएसटीआर 3बी रिटर्न दाखिल किए गए. बयान के अनुसार सितंबर में राजस्व में पिछले साल के समान महीने में जुटाए गए राजस्व की तुलना में 2.67 फीसद कम रहा. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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