भाजपा के धोबीपाट से नीतीश कुमार चित

बिहार उपचुनाव के नतीजे ने दो बात साफ कर दी. पहली डबल इंजन की सरकार पूरी तरह डिरेल हो गई है और दूसरी भाजपा और जदयू में अंदरखाने एका नहीं है. लोकसभा चुनाव के बाद शुरू हुई किचकिच और बाढ़ व जल-जमाव में जिस तरह दोनों दलों के बीच बयानबाजी हुई उसने रिश्तों में कड़वाहट घोली थी. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व पर भी सवाल उठा और उनकी कार्यशैली को भी भाजपा नेताओं ने निशाने पर लिया था. नेतृत्व पर भी सवाल उठे. हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नीतीश कुमार की अगुआई में चुनाव लड़ने की बात कह कर जारी कलह को विराम जरूर दिया लेकिन कलह थमा नहीं. उपचुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है. भाजपा ने जदयू उम्मीदवरों की जीत के लिए जी-जीन नहीं लगाया. बल्कि दरौंदा में तो भाजपा के बागी ही जदयू उम्मीदवार के खिलाफ मैदान में थे, वे चुनाव जीते भी. भाजपा ने उनके खिलाफ कार्रवाई करने में बहुत देर की. चुनाव जीतने के बाद उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने तो उन्हें एनडीए का उम्मीदवार तक बता डाला.

सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा है कि बिहार की विधानसभा की पांच और लोकसभा की एक सीट पर हुए उप चुनाव में सिर्फ एक सीट पर लड़ रही भाजपा हार कर भी जीत गई. भाजपा भले ही किशनगंज सीट हार गई लेकिन पिछले चुनाव की तुलना में उसका वोट शेयर बढ़ा है. लेकिन सबसे बड़ी बात कि भाजपा ने नीतीश कुमार को संदेश दे दिया है कि भाजपा से पंगा लेना मंहगा पड़ेगा. उपचुनाव में नीतीश कुमार की करारी हार के पीछे भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी बड़ी वजह मानी जा रही है. दरअसल उप चुनाव के दौरान ही पटना में पानी से तबाही मची और इसके बाद जदयू-भाजपा में जमकर तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई. दोनों पक्ष से नेता एक दूसरे को देख लेने की धमकी देने लगे.

नतीजा यह हुआ कि भाजपा और जदयू के बीच दूरी बढ़ी. बाद में अमित शाह ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का एलान कर मामले को शांत जरूर किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उपचुनाव में किसी सीट पर भाजपा-जदयू के बीच तालमेल नहीं बन पाया. दरौंदा में भाजपा नेता कर्णवीर सिंह उर्फ व्यास सिंह चुनाव मैदान में कूद गए. पार्टी ने उन्हें निष्कासित जरूर किया लेकिन भाजपा पूरी मुस्तैदी से व्यास सिंह के पक्ष में लगी थी. पूर्व सांसद ओमप्रकाश यादव से लेकर पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष मनोज सिंह जैसे नेता खुल कर व्यास सिंह के पक्ष में वोट मांग रहे थे. नतीजा सामने है. व्यास सिंह चुनाव जीत गए. जीत भी करीब सत्ताइस हजार से ज्यादा वोटों से हुई है. जदयू के अजय सिंह को तकरीबन 24 हजार वोट मिले तो भाजपा के बागी व्यास सिंह को दो गुणा से भी ज्यादा 51 हजार से भी अधिक वोट मिले. 

नाथनगर सीट पर भी भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी साफ दिख रही थी. भाजपा के कार्यकर्ता चुनाव में उदासीन थे. जदयू का खेल एक निर्दलीय उम्मीदवार अशोक कुमार ने बिगाड़ा. अशोक कुमार को 11 हजार से ज्यादा वोट आए. स्थानीय लोगों के मुताबिक निर्दलीय प्रत्याशी को आए सारे वोट एनडीए के ही थे. नाथनगर में जदयू कड़े संघर्ष में किसी तरह जीत पाई है. बेलहर के जदयू उम्मीदवार गिरधारी यादव से पहले से ही भाजपा के कार्यकर्ता खफा थे. भाजपा के कार्यकर्ता जदयू के चुनावी अभियान से दूर ही रहे. बीच में सुशील मोदी सहित भाजपा के कुछ और नेताओं पार्टी कार्यकर्ताओं को समझाने की कोशिश की लेकिन दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में तालमेल नहीं बना. जदयू यहां से हारी और ऐसा ही कुछ हाल सिमरी बख्तियारपुर का भी रहा. भाजपा ने बिहार के हर क्षेत्र में बूथ पर अपना सेटअप तैयार कर रखा है. लेकिन भाजपा के बूथ मैनेजमेंट सिस्टम ने कहीं भी जदयू के उम्मीदवार के लिए काम नहीं किया. 

इस उपचुनाव में भाजपा ने सिर्फ एक सीट किशनगंज से चुनाव लड़ा था. पार्टी की उम्मीदवार स्वीटी सिंह भले ही तकरीबन दस हजार वोटों से चुनाव हार गईं. लेकिन उनके वोट पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले ज्यादा मिले, 2015 के विधानसभा चुनाव में स्वीटी सिंह ही भाजपा उम्मीदवार थीं और वे 17 हजार 200 वोट से चुनाव हारी थीं. पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत भी बढ़ा है.

उपचुनाव के नतीजों से नीतीश कुमार की परेशानी बढ़ सकती है. भविष्य की राजनीति का भी संकेत नतीजों से मिला है और चुनौती का भी. हालांकि नीतीश कुमार चुप बैठेंगे लगता तो नहीं है. वे जिद्दी स्वभाव के हैं और भाजपा से बदला समय आने पर जरूर लेंगे. उन्होंने दिल्ली और झारखंड में चुनाव लड़ने के संकेत देकर भाजपा को भी परेशानी में डाला है. लेकिन बिहार में उनके लिए चुनौती बड़ी है. बिहार में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. सांगठनिक तौर पर जदयू की स्थिति कमजोर कही जा सकती है. जदयू का संगठन ज्यादातर कागजों पर ही सिमटा है. लेकिन भाजपा ने हर विधानसभा क्षेत्र में अपना तंत्र खड़ा कर रखा है. अगर भाजपा के तंत्र ने आगे भी गच्चा दिया तो फिर 2020 की डगर नीतीश के लिए बेहद मुश्किल होगी. फिर महागठबंधन को भी उपचुनाव के नतीजों से ताकत मिलेगी. लेकिन नीतीश कुमार के लिए भाजपा बड़ी परेशानी कड़ी करेगी. आने वाले दिनों में बिहार की सियासत में खुला खेल फर्रूखाबादी देखने को मिलेगा. इंतजार करें. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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