हिन्दी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर राजेंद्र यादव की आज पुण्यत‍िथ‍ि

नई द‍िल्ली। सुप्रसिद्ध हंस पत्रिका के सम्पादक हिन्दी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर राजेंद्र यादव की आज पुण्यत‍िथ‍ि है, 28 अक्टूबर 2013 की रात्रि को नई दिल्ली में 84 वर्ष की आयु में राजेंद्र यादव का निधन हुआ था । उन्हें मौजूदा दौर में हिन्दी साहित्य की कई प्रतिभाओं को सामने लाने का श्रेय जाता है। हिन्दी साहित्य जगत में उपन्यास, कहानी, कविता और आलोचना सहित साहित्य की तमाम विधाओं में राजेंद्र जी एक जैसी पकड़ रखते थे, हिन्दी साहित्य की दुनिया के एक मजबूत स्तंभ थे वे ।

राजेंद्र यादव का नाम चोटी के लेखकों में शुमार था। नयी कहानी के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन उन्होंने प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को प्रारम्भ किया था। यह पत्रिका सन् 1953 में बन्द हो गयी थी। इसके प्रकाशन का दायित्व उन्होंने स्वयं लिया और अपने मरते दम तक पूरे 27 वर्ष निभाया। इसके माध्यम से हिन्दी के नए लेखकों की एक नई पीढी़ भी सामने आई और इस पत्रिका ने दलित विर्मश और स्त्री विर्मश को भी स्थापित किया।

28 अगस्त 1929 को आगरा में जन्मे राजेंद्र यादव ने आगरा विश्वविद्यालय से 1951 में हिन्दी विषय से एमए की डिग्री हासिल की थी और कोलकाता में भी काफी दिनों तक रहे थे। बाद में वह दिल्ली आ गए और और राजधानी के बौद्धिक जगत की एक प्रमुख हस्ती बन गए। संयुक्त मोर्चा सरकार में वह प्रसार भारती के सदस्य भी बनाए गए थे।

कहानी-संग्रह
देवताओं की मूर्तियाँ1951,
खेल-खिलौनेः 1953
जहाँ लक्ष्मी कैद हैः 1957
अभिमन्यु की आत्महत्याः 1959
छोटे-छोटे ताजमहलः 1961
किनारे से किनारे तकः 1962
टूटनाः 1966,
चौखटे तोड़ते त्रिकोणः 1987,
ये जो आतिश गालिब (प्रेम कहानियाँ): 2008
यहाँ तकः पड़ाव-1, पड़ाव-2(1989)
वहाँ तक पहुँचने की दौड़, हासिल
उपन्यास
सारा आकाशः 1955 (‘प्रेत बोलते हैं’ के नाम से 1951 में)
उखड़े हुए लोगः 1956
कुलटाः 1958
शह और मातः 1959
अनदेखे अनजान पुलः 1963
एक इंच मुस्कान (मन्नू भंडारी के साथ) 1963,
मन्त्रविद्धा: 1967
एक था शैलेन्द्र: 2007

– Legend News

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