अब झारखंड में भाजपा को झटका, आजसू से टूटा गठबंधन

लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटने वाली भारतीय जनता पार्टी के अच्छे दिन पर ग्रहण लगता दिखाई दे रहा है. महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा. हरियाणा में तो किसी तरह दुष्यंत चौटाला के साथ मिल कर सरकार बना ली लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना ने आंखें तरेरीं और गठबंधन तोड़ कर उसे झटका दिया. अब झारखंड में भी उसकी सहयोगी पार्टी आल झारखंड स्टूडेंट यूनियन (आजसू) ने उससे नाता तोड़ लिया है. झारखंड विधानसभा चुनाव में सीटों को लेकर दोनों दलों में तनातनी हुई और आजसू ने उन सीटों पर भी अपने उम्मीदवार खड़ा कर दिया, जिस पर भाजपा ने भी अपने उम्मीदवार दिए थे. कहा जा रहा है कि आजसू सत्रह से उन्नीस सीटें मांग रहा था लेकिन भाजपा आठ से ज्यादा सीटें ही उसे देना चाह रही थी. यानी दोनों का उन्नीस साल पुराना रिश्ता टूट गया.

झारखंड गठन के साथ 2000 में बने भाजपा और आजसू गठबंधन की राहें अलग हो गईं. आजसू ने एक सीट से यात्रा शुरू की थी. बिहार विधानसभा के लिए चुने गए आजसू के एक मात्र विधायक सुदेश कुमार महतो भाजपा सरकार से जुड़े. उसके बाद भाजपा की जितनी भी सरकारें बनी, आजसू साथ रही. आजसू के साथ पिछले चुनाव में भाजपा का फूलप्रूफ गठबंधन बना था. भाजपा 72, आजसू आठ और एक सीट पर लोजपा लड़ी थी. भाजपा को 37 सीटें मिलीं. आजसू ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की और लोजपा एकमात्र पाकुड़ की सीट नहीं जीत पाई थी. भाजपा और आजसू गठबंधन की सरकार बनी. लेकिन झाविमो के छह विधायकों को तोड़कर भाजपा ने संख्या बढ़ा ली.

पांच साल में झारखंड की राजनीति में काफी उठापटक हुई. आजसू जिन सीटों पर 2014 में दूसरे स्थान पर था या सीटें जीतीं थी, उन्हीं सीटों पर उसने दावेदारी की. लेकिन बातचीत के बाद भी कोई हल नहीं निकला. भाजपा आजसू के दावे को खारिज करती रही और आजसू अड़ी रही. चंदनकियारी पर आजसू ने दावेदारी का आधार 2009 और 2014 के परिणाम को बनाया क्योंकि 2009 में उमाकांत रजक आजसू से जीते थे और 2014 में दूसरे स्थान पर रहे. उधर अमर कुमार बाउरी के झाविमो से जीतकर भाजपा में शामिल होने की वजह से भाजपा ने इसे अपनी सीट माना.

अमर बाउरी को लड़ाने के लिए भाजपा ने आजसू के दावे खारिज किया. उसी तरह लोहरदगा में 2014 में आजसू के कमल किशोर भगत जीते थे. लेकिन फिर वह सजायाफ्ता हो गए. इस सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस के सुखदेव भगत जीते. भगत एक महीना पहले भाजपा में शामिल हुए और उन्हें लोहरदगा से पार्टी के उम्मीदवार बनाया. आजसू को इसके लिए भाजपा ने विश्वास में भी नहीं लिया. भाजपा प्रदेश नेतृत्व ने आजसू के साथ सीटों के तालमेल को लेकर रणनीति नहीं बनाई. दोनों के बीच समन्वय का अभाव दिखा. सब कुछ दिल्ली के भरोसे छोड़ दिया गया. दिल्ली ने झारखंड की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर तालमेल के लिए आजसू को कोई तवज्जो नहीं दी.

इससे पहले 2005 में विधानसभा चुनाव भाजपा 63 सीटों पर लड़ी थी और तीस सीटें जीतीं थीं, जबकि आजसू ने चालीस सीटों पर उम्मीदवार खड़ा किया और दो जीते थे. पांच साल बाद 2009 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 67 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और 18 पर जीत दर्ज की थी. आजसू ने 54 सीटों पर चुनाव लड़ा और पांच सीटें जीतीं थीं. इसी तरह 2014 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 72 सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटें जीतीं जबकि आजसू ने आठ सीटों पर चुनाव लड़ा था और पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी. भाजपा इसी आधार पर आजसू को सीटें देना चाह रही थी जो आजसू को मंजूर नहीं हुआ. पार्टी प्रमुख सुदेश महतो ने साफ किया कि वे लॉलीपाप से संतुष्ठ नहीं होंगे. वे बड़ी हिस्सेदारी चाह रहे थे. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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