महाराष्ट्र की सियासी बिसात पर पवार की चाल से भाजपा को मिली मात

महाराष्ट्र में सत्ता का चौसर बिछा है और चालें चलीं जा रहीं हैं. सियासी बिसात पर महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार चालें चल रहे हैं. चुनाव से पहले ईडी की नोटिस ने शरद पवार को ताकत दी और भाजपा से उन्होंने दो-दो हाथ करने की ठानी तो फिर उसे सत्ता से दूर करके ही छोड़ा. भाजपा ने राकांपा नेताओं को तोड़ कर पार्टी में शामिल कराया, तब पवार खामोश रहे थे लेकिन उन्होंने अब तीस साल का गठबंधन तुड़वा कर भाजपा को उसी अंदाज में जवाब दिया. सरकार गठन को लेकर भाजपा व शिवसेना में तनातनी बढ़ी और महाराष्ट्र की सियासत के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार ने अपनी चाल चली और भाजपा चारों खाने चित. पवार ने सारा खेल खेला. सत्ता के इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए रणनीति बना कर भाजपा को हाशिए पर डाल दिया. शरद पवार इस पूरे संकट में लगातार सोनिया गांधी के संपर्क में थे. पवार ने इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए 11 नवंबर का दिन चुना था. सोनिया गांधी भी अपनी रणनीति बनाने में जुटी थीं. वे भी अपने पार्टी नेताओं के साथ सलाह-मशविरा में जुटी थीं.

शुरुआत में सोनिया शिवसेना को किसी भी हालत में समर्थन नहीं देने पर अड़ी थीं. वजह थी कांग्रेस की केरल लॉबी क्योंकि वहां से कांग्रेस के पंद्रह सांसद आते हैं. एके एंटोनी और वेणुगोपाल कांग्रेस के शिवसेना को सर्मथन के पक्ष में नहीं थे. उनका कहना था कि कांग्रेस कैसे शिवसेना को समर्थन दे सकती है. माना जा रहा कि राहुल गांधी भी शिवसेना को अंदर या बाहर से सर्मथन देने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन महाराष्ट्र के कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे, पृथ्वीराज चौहान और अशोक चव्हाण सोनिया गांधी से मिले. तीनों ने सोनिया गांधी को इस बात के लिए समझाया कि कांग्रेस ने शिव सेना को समर्थन नहीं दिया तो पार्टी टूट सकती है. फिर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सोनिया गांधी से फोन पर बात की और अधिकारिक रूप से कांग्रेस का समर्थन मांगा.

सोनिया गांधी ने उद्धव ठाकरे से कहा कि वे उन्हें बाद में बताएंगी. फिर पवार ने सोनिया गांधी से फोन पर बात की और उनसे कहा कि कोई भी निर्णय जल्दबाजी में न लें. पहले हमें बातचीत करनी चाहिए.इन सबके बीच ही मुंबई में उद्धव ठाकरे और शरद पवार की मुलाकात हुई. शाम साढ़े सात बजे एनसीपी नेता अजीत पवार का बयान आया कि हम कांग्रेस के समर्थन की चिट्ठी का इंतजार कर रहे हैं और जब तक कांग्रेस की चिट्ठी नहीं आती हम इंतजार करेंगे. समर्थन की चिट्ठी राज्यपाल को देनी होगी तो हम साथ में देंगे. लोगों को लगा कि कांग्रेस चिट्ठी देने में देरी कर रही है लेकिन यह शरद पवार और सोनिया गांधी की बातचीत में तय हो गया था कि हम जल्दबाजी में समर्थन की चिट्ठी नहीं देने वाले हैं. यह शरद पवार की एक और चाणक्य नीति थी.

उधर शिवसेना बिना समर्थन की चिट्ठी के राज्यपाल के पास पहुंची और उसे चौबीस घंटे के अंदर बहुमत साबित करने के लिए कहा गया. अब फिर शरद पवार ने सोनिया गांधी से संपर्क किया और उनसे कहा कि हमें शिवसेना को समर्थन देना चाहिए और सरकार में शामिल होना चाहिए. सोनिया गांधी पहले हां करने से कतरा रही थीं लेकिन जब यह सवाल आया कि कांग्रेस के लिए भाजपा बड़ी दुश्मन है या शिवसेना, तो सोनिया गांधी समर्थन देने के लिए लगभग राजी हो गईं. दिल्ली में मौजूद महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेता लगातार सोनिया पर दबाब बना रहे थे कि वे शिवसेना को समर्थन देने के लिए मान जाएं. इन्हीं कांग्रेसी नेताओं ने जयपुर में मौजूद कांग्रेस विधायकों की राय भी सोनिया गांधी को बताई और कुछ विधायकों से बात भी कराई.

शरद पवार ने सोनिया गांधी को समझाया कि एनसीपी और कांग्रेस शिव सेना को समर्थन देती हैं और सरकार में भी शामिल होती है तो सरकार पांच साल चल पाएगी. आखिरकार सोनिया गांधी मान गईं और पवार से कहा कि वे तीन नेताओं को मुंबई भेज रहीं हैं. मुंबई जाने वाले तीन नेताओं में सोनिया गांधी के सबसे विश्वस्त और उनके राजनीतिक सलाहकार और कांग्रेस के मौजूदा कोषाध्यक्ष अहमद पटेल, महाराष्ट्र के कांग्रेस प्रभारी मल्लिकार्जुन खडगे और राहुल के करीबी केसी वेणुगोपाल शामिल थे.

तीनों नेता 12 नवंबर की सुबह जाने वाले थे लेकिन फिर खबर आई कि वे नहीं जा रहे हैं. फिर से सोनिया गांधी और शरद पवार के बीच फोन लाइन खुल गई. आखिकार दोपहर बाद तीनों नेता मुंबई पहुंचे और शरद पवार से मिले. लेकिन तब तक एनसीपी ने राज्यपाल से और वक्त मांगा जिस पर राज्यपाल ने मना कर दिया. दूसरी तरफ, दिल्ली में दोपहर में ही प्रधानमंत्री ने ब्राजील जाने के पहले कैबिनेट की बैठक बुलाकर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन पर मुहर लगा दी. बस राष्ट्रपति का इंतजार था जो उस वक्त पंजाब में थे. शाम होते-होते उनकी मुहर भी लग गई.

मुंबई में अहमद पटेल और शरद पवार ने साझा प्रेस कॉंफ्रेंस की और महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन की आलोचना की. उन्होंने कहा कि राज्यपाल को कांग्रेस को भी मौका देना चाहिए था. उन्होंने सरकार बनाने पर कहा कि कांग्रेस और एनसीपी के नेता आपस में बैठकर तय करेंगे कि आगे क्या करना है और बाद में शिव सेना को इससे अवगत करा दिया जाएगा. यानी पवार ने सारा 'पावर' अपने हाथ में ही रख लिया और शिवसेना अब ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां उनकी नैया एनसीपी और कांग्रेस की पतवारों के बिना किनारे तक नहीं पहुंच सकती है. महाराष्ट्र में शरद पवार ने जो खेल खेला उसने अमित शाह की सारी रणनीति को फेल कर डाला. अब सरकार बनना लगभग तय है. दिल्ली में पवार और सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद इस पर मुहर लगनी बाकी है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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