उपेंद्र कुशवाहा के आमरण अनशन से घबराए नीतीश कुमार, मिल रहा है जन समर्थन

शिक्षा का सवाल बिहार में बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. बिहार के सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता है. बिहार में शिक्षा का निजाम चौपट है. शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है. यह बात अलग है कि सिर्फ साइकिल और लिबास बांट कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी पीठ थपथपाते रहे हैं, लेकिन किताबें जो सत्र शुरू होने से पहले बच्चों को मिलनी चाहिए वह समय से नहीं मिलती. पिछले कई सालों से बच्चों को दी जाने वाले किताबें सालाना परीक्षाओं से पहले मिलतीं या मिलतीं ही नहीं. इससे समझा जा सकता है कि नीतीश कुमार शिक्षा को लेकर कितने गंभीर हैं. शिक्षा के सवाल पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने बिहार में आरपार की लड़ाई छेड़ दी है. करीब तीन साल से राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की अगुआई में बिहार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था के सवाल पर रालोसपा लगातार आंदोलन करती रही है.

अब उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार की सरकार के खिलाफ अंतिम हथियार का इस्तेमाल किया है. वे आमरण अनशन पर बैठ गए है. पटना के मिलर हाई स्कूल के मैदान में मंगलवार से उपेंद्र कुशवाहा ने इस एलान के साथ आमरण अनशन शुरू किया कि शिक्षा सुधार वर्ना जीना बेकार. बड़ी बात यह है कि कुशवाहा के इस सवाल ने महागठबंधन के दलों को तो धार तो दी ही, वाम दलों को भी एनडीए सरकार के खिलाफ लड़ने का हथियार दिया क्योंकि शिक्षा का सवाल सियासी कम सामाजिक ज्यादा है. उपेंद्र कुशवाहा के इस अनशन को महागठबंधन के तमाम दलों का समर्थन मिला. राजद के तेजस्वी यादव को छोड़ दें तो सभी बड़े नेता उनके समर्थन में पहुंचे और उनकी इस लड़ाई में साथ देने का एलान किया.

पहले दिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा, हम के प्रमुख जीतीनराम मांझी, वीआईपी के मुकेश सहनी, राजद के विधायक रामानुज यादव, भाकपा के सत्यनारायण सिंह और भाकपा माले के विधायक महबूब आलम पहुंचे तो बाद में राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे, तनवीर हसन सहित दूसरे दिग्गज नेताओं का साथ मिला. लेकिन तीसरे दिन भाजपा के एमएलसी संजय पासवान का उनके समर्थन में आना चौंकाना वाला कदम रहा. हालांकि नीतीश कुमार के बयानवीर और भाजपा के नेता इसे सियासी नौटंकी बताते रहे और उनमें से तो कइयों ने इस अभियान को जनसमर्थन मिलता देख कुशवाहा को एनडीए में वापस आने का न्योता तक दे डाला है.

यूं तो देश भर के सरकारी स्कूलों की हालत कमोबेश एक जैसी ही है लेकिन बिहार में पिछले पंद्रह सालों में सरकारी स्कूलों पर बिहार के मुख्यमंत्री ने ध्यान नहीं दिया. सच तो यह है कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था बदहाल है. सरकारी स्कूलों की कोई सुध लेना वाला नहीं. नारों में जरूर नीतीश कुमार कहते रहे हों कि पढ़ेगा युवा, तभी बढ़ेगा युवा. लेकिन सच्चाई यह है कि सरकारी स्कूलों पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया. नीतीश कुमार के डिग्री लाओ और नौकरी पाओ की योजना ने ऐसे-ऐसे शिक्षक पैदा कर डाले जो मुहावरों में नहीं हकीकत में नौ और छह में फर्क नहीं समझते हैं. बिहार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ राष्ट्रीय लोक समता पार्टी करीब ढाई साल से बिहार में बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए सरकार के खिलाफ आंदोलनरत है.

रालोसपा का मानना है कि शिक्षा सुधार, जन-जन का अधिकार है. रालोसपा सड़कों पर भी उतरी और इस दौरान पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा पर पुलिस ने लाठियां भी बरसाईं. लेकिन पार्टी का शिक्षा सुधार कार्यक्रम जारी रहा. नीतीश कुमार के रवैये से यह लगने लगा है कि वे पिछड़ों-अतिपिछड़ों, गरीबों, अल्पसंख्यकों, दलितों को शिक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं. नहीं तो सरकारी स्कूलों की हालत इतनी खस्ता नहीं होती. रालोसपा ने उनके सामने शिक्षा में सुधार के लिए पच्चीस सूत्री मांग भी रखी थी, लेकिन सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया.

अब नवादा ओर औरंगाबाद के देवकुंड में केंद्रीय विद्यालय खुलवाने के लिए रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा आमरण अनशन पर बैठ गए हैं. मिलर स्कूल मैदान में कुशवाहा के आमरण अनशन को राजद, कांग्रेस, हम, वीआईपी, भाकपा, माकपा और भाकपा माले ने समर्थन दिया. इन दलों के नेता व प्रतिनिधि यहां पहुंचे. कुशवाहा सहित विपक्षी नेताओं ने राज्य सरकार पर शिक्षा व्यवस्था बदहाल करने का आरोप लगाया. दरअसल इन दोनों जगहों पर केंद्रीय विद्यालय खोलने की मंजूरी तब मिली थी, जब कुशवाहा केंद्र में मानव संसाधन राज्य मंत्री थे.

इसे लेकर पिछले साल दिसंबर में कुशवाहा ने देवकुंड और नवादा में मंत्री रहते हुए प्रदर्शन भी किया था. राज्य सरकार स्कूलों को जमीन मुहैया कराने में आनाकानी कर रही है. जबकि देवकुंड में तो एक महंत ने अपनी निजी दस एकड़ जमीन सरकार को दान के रूप में दी है कि उस पर स्कूल खोला जाए. महंत ने राज्यपाल के नाम जमीन रजिस्ट्री भी कर दी है लेकिन उस जमीन को भी अब तक एनओसी नहीं मिला है. जबकि पिछले साल अगस्त में ही इन स्कूलों को खोलने की मंजूरी केंद्र सरकार ने दी थी.

उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि इन दोनों जगहों पर केंद्रीय विद्यालय खोलने के लिए राज्य सरकार के प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने पिछले साल ही अनुमति दे दी थी. लेकिन अब तक राज्य सरकार ने जमीन हस्तांतरित करने सहित प्रक्रिया पूरी नहीं की है. इस साल 19 सितंबर को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भेज कर प्रक्रिया पूरा कराने का अनुरोध किया था. केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री रहते हुए बिहार के छह जिलों शेखपुरा, सुपौल, मधुबनी, कैमूर, मधेपुरा और अरवल में केंद्रीय विद्यालय खोलने के लिए केंद्र सरकार की योजना में शामिल कराया था.

केंद्र सरकार ने 2016 में बिहार सरकार से प्रस्ताव भी मांगा था लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ली. यह अपने आप में हैरत में डालने वाली बात है. उन्होंने सवल किया कि आखिर बिहार के मुख्यमंत्री बच्चों को अनपढ़ क्यों रखना चाहते हैं. हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतनराम मांझी ने कहा कि सरकार नहीं चाहती कि गरीबों के बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ें. अमीरों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं, लेकिन गरीबों के बच्चों को सरकारी स्कूल का आसरा रहता है. इसलिए सरकारी स्कूलों में पढ़ाई व्यवस्था सुधारना चाहिए.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. मदनमोहन झा ने कहा कि सरकार गैर जिम्मेदाराना कार्रवाई कर रही है. विपक्ष की उचित मांगों पर सरकार को ध्यान देना चाहिए. आम लोग अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और विधि व्यवस्था की उम्मीद सरकार से रखते हैं. भाकपा के राज्य सचिव सत्यनारायण सिंह ने कहा कि कहा कि राज्य में शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए सरकार सख्त कदम उठाए. अनशन के तीसरे दिन गुरुवार को कुशवाहा की तबीयत बिगड़ी. उनका वजन भी कम हुआ है. सरकार ने डर कर अनशन स्थल की मंजूरी आनन-फानन में रद्द करने का नोटिस पार्टी को थमा दिया है.

इस बीच नीतीश कुमार ने साफ कहा कि वे किसी कीमत पर जमीन नहीं देंगे. अब सरकार उपेंद्र कुशवाहा पर मुकदमा दर्ज करने की भी तैयारी कर रही है. कहा जा रहा है कि मिलर हाई स्कूल के मैदान को मंजूरी देते वक्त पार्टी ने आमरण अनशन का जिक्र नहीं किया था, इसे लेकर ही कानूनी डंडा फाटकारने की कोशिश प्रशासन करने की तैयारी में है. दूसरी तरफ कुछ सामाजिक संगठन राज्य सरकार के खिलाफ पीआईएल भी दाखिल करने की तैयारी में हैं. फिलहाल तो इतना ही कि उपेंद्र कुशवाहा अनशन पर अडिग हैं. उनका साफ कहना है कि सरकार बच्चों को अच्छी तालीम दे नहीं तो वे जान देंगे. सरकार का अगला कदम क्या होगा, फिलहाल इसे लेकर अटकलें ही लगाई जा रहीं हैं. लेकिन जिस तरह लोगों का समर्थन इस अभियान को मिल रहा है उससे सरकार की परेशानी तो बढ़ी ही है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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