उस घनी बस्ती की तंग गलियों में संस्कृत के श्लोकों का पाठ करते हैं मुस्‍लिम छात्र

राजस्थान के जयपुर में एक सरकारी स्कूल में मुस्लिम विद्यार्थियों ने संस्कृत की पढ़ाई में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाई है. स्कूल में मुस्लिम विद्यार्थियों का बाहुल्य है.
वहां कोई दो सौ ज़्यादा मुस्लिम बच्चे संस्कृत में तालीम ले रहे हैं. इनमें छात्राओं की संख्या ज़्यादा है.
इन बच्चों का उच्चारण देख कर शिक्षक भी अभिभूत हैं. स्कूल में पौने तीन सौ विद्यार्थियों में 227 मुस्लिम समुदाय से हैं.
वैसे जयपुर के नाहरी का नाका स्थित ये स्कूल उपेक्षा का शिकार रहा है.
उस घनी बस्ती की तंग गलियों से गुजर कर ये बच्चे जब स्कूल में दाख़िल होते हैं और पढ़ने बैठते हैं, माहौल संस्कृत श्लोकों की वाणी से गूंज जाता है.
वे जिस परिवेश और परिवारों से आते हैं, वहां कभी संस्कृत का बसेरा नहीं रहा.
इन बच्चों में छात्राओं की तादाद अधिक है. इन बच्चों से बात करो तो वे संस्कृत में धारा प्रवाह बोलने लगते हैं.
इन बच्चों के माता-पिता मेहनत मजदूरी कर ज़िंदगी बसर करते हैं.
आठवीं कक्षा की मनिया के पिता बारदाना की सिलाई करते हैं.
लेकिन मनिया संस्कृत की शिक्षक बनना चाहती हैं.
‘संस्कृत पढ़ना अच्छा लगता है’
मनिया कहती हैं, “संस्कृत कोई जटिल भाषा नहीं है. मुझे संस्कृत पढ़ना बहुत अच्छा लगता है.”
ये जयपुर का वो इलाक़ा है जहाँ नागरिक सुविधाओं का भी अभाव है.
संकरी गलियां, छोटे-छोटे मकान और अपने परवरदिगार की बंदगी में मुब्तला इंसानियत.
लेकिन स्कूल के शिक्षक और विद्यार्थियो के लिए तो तालीम ही इबादत है.
राजकीय ठाकुर हरि सिंह मंडावा प्रवेशिका संस्कृत विद्यालय के प्रिंसिपल वेदनिधि शर्मा कहते हैं, “इस मुस्लिम बहुल इलाक़े में बच्चों के अभिभावक भी स्कूल का पूरा सहयोग कर रहे हैं. हम इन परिवारों के सतत सम्पर्क में रहते हैं और मिलते रहते हैं. संस्कृत के साथ अंग्रेजी, गणित और विज्ञान जैसे विषय भी बराबर पढ़ाए जा रहे हैं.”
वे कहते हैं, “सबके सहयोग से ही अच्छा शैक्षणिक माहौल बना है. स्कूल को दो पालियों में चलाया जा रहा है.”
इस स्कूल में साधन सुविधाओं की किल्लत है लेकिन जब साधना मजबूत हो तो सुविधाओं की कमी रास्ता नहीं रोक पाती.
जब स्कूल के लिए कोई जगह नहीं थी, किसी दानदाता ने ज़मीन उपलबध करवा दी.
अभी स्कूल के पास आधी अधूरी इमारत है. कुछ कमरों की बुनियाद रख दी गई है पर निर्माण अभी बाक़ी है.
स्कूल के शिक्षक बताते हैं कि इन सबके बीच बच्चों की ज़िंदगी में शिक्षा की मजबूत नींव रख दी गई है.
इन बच्चों में सातवीं जमात की परवीन फर्राटे से संस्कृत बोलती हैं.
वो कहती हैं, “संस्कृत बहुत अच्छी लगती है.”
परवीन कहती हैं कि उसके माता पिता उसे संस्कृत पढ़ता देख कर बहुत खुश हैं.
इस क्षेत्र के विधायक अमीन कागजी आगे आए और स्कूल की इमारत के लिए अपने विधायक कोष से दस लाख रुपये स्वीकृत किये.
वे पहले भी स्कूल की मदद करते रहे हैं.
स्कूल में पढ़ रही शबा के पिता मिस्त्री हैं. शबा का ख्वाब भी शिक्षक बनना है.
शबा कहती हैं, “घर जाकर दिन भर में पढ़ाई की प्रगति अपने माता पिता को बताती हूं तो वो मेरा हौसला बढ़ाते हैं.”
स्कूल के प्रिंसिपल शर्मा ने बीबीसी से कहा, “अभी बच्चियां सब स्कूलों में बच्चों से पढ़ने में आगे हैं. हम भी बच्चियों को प्रोत्साहित करते रहते हैं. स्कूल की इमारत बनने से हमारे लिए और भी बेहतर हो जाएगा.”
ये बच्चे जब श्लोकों का उच्चारण करते हैं तो ऐसे लगता है जैसे कोई संस्कृत में भावप्रवीण व्यक्ति देवभाषा में मुखातिब है.
स्कूल में संस्कृत की शिक्षक कोमल शर्मा कहती हैं, “इन बच्चों में संस्कृत पढ़ने की ललक देख कर शिक्षकों का भी उत्साह बढ़ गया है. हम भी पूरे मनोयोग से पढ़ा रहे हैं. इन बच्चों में न केवल ललक है बल्कि प्रतिभा भी है. इन बच्चों की प्रगति देख कर हम सब खुश हैं.”
हर जबान में एक मिठास होती है. भाषा कोई भेद नहीं करती. वो फ़ासलों की दीवार भी खड़ा नहीं करती. मगर जब कोई जबान में तल्खी लाता है, भाषा बेबस हो जाती है. पर इसमें भाषा का क्या कसूर है.
-BBC

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