झारखंड में वोटरों को लुभाने के लिए हरी व लाल पर्ची का खेल

झारखंड विधानसभा चुनाव में पांच चरणों में चुनाव होना है. पहले चरण के लिए शनिवार को वोट डाले जाएंगे. झारखंड में चुनावी रंग उफान पर है. गांव, शहर और कस्बे इस रंग में रंग गए हैं और अब तो झूमने भी लगे हैं. वोटरों को लुभाने के लिए मांस-भात, अंग्रेजी शराब, देसी दारू व हंडिया की पार्टी धड़ल्ले से चल रही है. चतरा, गुमला, बिशुनपुर, लोहरदगा, मनिका, लातेहार, पांकी, डालटनगंज, विश्रामपुर, छतरपुर, हुसैनाबाद, गढ़वा और भवनाथपुर विधानसभा क्षेत्र के किसी भी गांव में चले जाएं, उम्मीदवारों के एजंट और ठेकेदारनुमा समर्थकों ने वोटरों के लिए पूरे जुगाड़ का बंदोबस्त कर रखा है. कुछ गांवों को छोड़ दें तो ज्यादातर गांवों में मांस के लिए बकरा-बकरी और मुर्गा-मुर्गी की खरीद-बिक्री बढ़ गई है.

एजंट के पास जाते ही पैसा मिल जाता है. फिर क्या है पौ बारह. यानी पांच अंगुली घी में. पैसा लें और खुद ही मांस-वास-दारू खरीद कर पार्टी करें. एजंटों ने गांव के टोलों में चावल की बोरी पहले ही पहुंचा दी है. गांवों में ही हंडिया बनान-बेचने वालों को पिलाने का ठेका दिया गया है. स्थानीय कार्यकर्ता वोटरों को सीधे हंडिया की दुकान पर पर्ची लेकर भेज दे रहे हैं. उधर, कोल्हान प्रमंडल की तेरह विधानसभा क्षेत्रों में भी कमोवेश यही हाल है. चूंकि यहां पर मतदान सात दिसंबर को है, इसलिए पार्टी पूरी तरह परवान नहीं चढ़ी है. यहां एक दिसंबर से पार्टियों का सिलसिला शुरू होगा.

शहरों में तस्वीर थोड़ी जुदा है. यहां हंडिया और मांस-भात से ज्यादा लाल पानी का बोलबाला है. उम्मीदवारों के एजंट वोटरों के बीच लाल व हरे रंग की पर्ची बांट रहे हैं. जिनके पास लाल वाली पर्ची है, उन्हें सीधे दुकान से पाउच वाली शराब मिल जा रही है. जिनके पास हरी पर्ची है, उन्हें अंग्रेजी शराब हाथ लग रही है. विश्रामपुर क्षेत्र के एक वोटर ने दो टूक कहा कि नेताजी की पर्ची लेकर दुकान पर जाएं, शराब लेकर आएं.

दरअसल चुनाव आयोग की डर से उम्मीदवार सीधे वोटरों को पैसा या लाल-हरी पर्ची नहीं बांटता है. उम्मीदवार एजेंट, समर्थक व ठेकेदार की मदद ले रहे हैं. यानी उम्मीदवार से पैसा एजंट के पास आता है. एजंट उसे रखा जाता है जो सियासत में सक्रिय नहीं होता. उस पर न तो चुनाव आयोग की नजर होती है और न ही प्रशासन की नजर में वह खुल कर आता है. फिर पैसे का बंटावरा होता है. स्थानीय कार्यकर्ता उम्मीदवार के एजंट से पैसे लेकर वोटरों तक सामग्री और दूसरी सुविधाएं पहुंचाता है. स्थानीय कार्यकर्ता का ताल्लुक संबंधित गांव से होता है.

इस कड़ी में चौथा नाम आता है समर्थक या ठेकेदार. यह उम्मीदवार के लिए खुद की जेब से खर्च कर वोटरों के लिए भोज का आयोजन करता है. लोग इसे उम्मीदवार का खास समझते हैं. घाटशिला विधानसभा क्षेत्र से झारखंड पीपुल्स पार्टी के उम्मीदवार सूर्य सिंह बेसरा कहते हैं कि गांवों में मांस, भात, हंडिया, शराब, दारू और पैसे के प्रलोभन ने चुनाव जैसे पवित्र कार्य को दूषित कर दिया है. इस कारण अच्छे उम्मीदवार भी चुनाव हार जाते हैं. चुनाव आयोग को इस पर नकेल कसने के लिए और मजबूत तंत्र विकसित करना चाहिए. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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