भाजपा ने सरयू राय का टिकट काटा लेकिन भ्रष्टाचारी को टिकट दिया

झारखंड में दूसरे चरण के मतदान के लिए प्रचार अब उफान पर है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रचार के लिए आए और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी. केंद्रीय मंत्रियों की तो फौज लगी ही है प्रचार में. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी पूरा जोर लगा रखा है. भाजपा की हालत पस्त है. अमित शाह और नरेंद्र मोदी के भाषणों से इसे समझा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर के फैसले से लेकर जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल तक का इस्तेमाल वोटरों को लुभाने के लिए किया जा रहा है. झारखंड में इस बार जमशेदपुर पूर्व की सीट पर सबकी निगाहें टिकी हैं. इसलिए नहीं कि मुख्यमंत्री रघुवर दास वहां से चुनाव लड़ रहे हैं बल्कि इसलिए कि चुनाव मैदान में उनको चुनौती देने वाले उनके ही मंत्रिमंडल के सहयोगी और भाजपा के वरिष्ठ नेता सरयू राय हैं. सरयू राय को अब पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है.

रघुबर दास के समर्थन में प्रचार करने ख़ुद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जमशेदपुर पहुंचे. सरयू राय वही शख़्स हैं जिनके बारे में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की राय ठीक नहीं थी. टिकट के बंटवारे में नामों का जब फ़ैसला हो रहा था तब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने खुलकर उनकी दावेदारी पर अपनी असहमति जताई और उनका टिकट काट दिया. कई वजहें अमित शाह ने इसके लिए दी थीं. हालांकि सरयू राय का टिकट कटना बड़ी घटना कही जा रही है.

ऐसा माना जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनकी नजदीकी भी एक बड़ी वजह रही इसलिए जब उनका टिकट कटा तो नीतीश कुमार ने भी हैरानी जताई थी. नीतीश कुमार ने तो यहां तक कहा कि दस साल पहले जब सरयू राय चुनाव हार गए थे तो उन्हें बिहार लौटने को कहा था. लेकिन तब सरयू राय भाजपा छोड़ना नहीं चाहते थे. भारतीय जनता पार्टी के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी राय के टिकट न देने पर हैरत जताई थी. उन्होंने तो प्रधान मंत्री को उन्हें अगला मुख्य मंत्री बनाने की भी अपील की थी.

अमित शाह सरयू राय से नाराज क्यों है, इसे लेकर अपना-अपना आकलन है. वैसे सरयू राय अस्सी के दशक में दो कारणों से चर्चा में आए. पहली जेपी की प्रतिमा लगाने की वजह से. कांग्रेस के राज में इन लोगों को इसके लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा. पटना एक मात्र शहर होगा जहां नेहरु और इंदिरा के मूर्ति नहीं लेकिन जेपी के दो प्रमुख चौराहों पर मूर्ति लगी है. इसके अलावा सरयू राय कोआपरेटिव माफ़िया के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने की वजह से भी चर्चा के केंद्र में भी रहे थे. तब कोई सोच नहीं सकता था कि इस सहकारिता माफ़िया से कोई लोहा ले सकता है. लेकिन सरयू राय ने जब घटिया खाद के कारण किसानों के फ़सल बर्बाद होने का मुद्दा मुखर रूप से उठाया. भागवत झा आज़ाद की अगुआई में कांग्रेस की सरकार बनी तो उनकी रिपोर्ट के आधार पर सब सहकारिता समिति को भंग कर दया गया था.

जब 1990 में लालू यादव की सरकार बनी तो उन्हें कृषि और सिंचाई से संबंधित विषय पर जानकारी और रुचि के कारण तत्कालीन सिंचाई मंत्री जगदानंद सिंह ने सिंचाई आयोग का सदस्य बना डाला. लेकिन दो साल में ही राय का लालू यादव से मोहभंग हो गया. सरयू राय का मानना था कि लालू यादव वित्त मामलों में नियम क़ानून का पालन नहीं कर रहे थे. राय ने इन बातों को लेकर पटना के अखबारों में लिखना शुरू किया.

लेकिन लालू तब लोकप्रियता के शिखर पर थे. इसलिए उन्होंने उनके लिखे का कोई नोटिस नहीं लिया. राय के बहाने उन्होंने नीतीश कुमार को बहुत कुछ सुनाया था. नीतीश और सरयू राय के रिश्तों से लालू अनजान नहीं थे. यह वह दौर था जब अमित शाह अपने पाइप के बिज़नेस के सिलसिले में भुगतान के लिए लालू यादव के मुख्यमंत्री आवास का चक्कर लगाते थे. यह बात हाल के दिन में ख़ुद बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने एक सभा में लोगों को बताया. 

जहां तक चारा घोटाले की बात है तो निश्चित रूप से इस घोटाले के पीछे दस्तावेज़ देने वाले सूत्र सबको मालूम थे लेकिन उनकी बातों पर सरयू राय के अलावा कोई विश्वास नहीं करता था. लेकिन राय इकलौते व्यक्ति थे जिन्हें भरोसा था कि घोटाला हुआ है. बहरहाल जब घोटाला सीएजी रिपोर्ट के आधार पर सामने आया तो सारा पीआईएल ड्राफ़्ट करने का ज़िम्मा राय ने रविशंकर प्रसाद को दिया क्योंकि उन्हें एक आशंका थी कि अगर भाजपा के वरिष्ठ वकीलों को भी इस काम का ज़िम्मा दिया जाएगा तो लालू यादव उनको मैनेज कर सकते हैं. 

ये भी सच है कि चारा घोटाले में उस समय भाजपा हाथ डालने से इसलिए बच रही थी कि क्योंकि रांची में भाजपा के कई नेताओं के इस घोटाले के माफ़िया से संबंध जगजाहिर थे और पार्टी को लग रहा था कि इस मुद्दे के उछलने से पार्टी का दामन भी दागदार हो सकता है. तब केएन गोविंदाचार्य की तूती बोलती थी जिन्होंने बिहार भाजपा में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए सुशील मोदी, नंद किशोर यादव, सरयू राय जैसे नेताओं को आगे किया और 1996 के लोकसभा चुनाव से सरयू राय को झारखंड और उस समय चौदह लोक सभाक्षेत्रों का प्रभार दे दिया था यहां भाजपा का स्ट्राइक रेट हमेशा बेहतर रहा. 

जब अलग झारखंड राज्य का गठन दो हज़ार में हुआ तब उनकी एक भूमिका एक संकटमोचक की तौर पर रही. हालांकि तब वे बिहार विधान परिषद के सदस्य थे इसलिए झारखंड सरकार में सीधे शामिल नहीं हो सकते थे लेकिन जब पहली सरकार बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में बनी तो वह भी एक अल्पमत की सरकार थी और वह सरकार जनता दल यूनाइटेड के ऊपर निर्भर थी. इन लोगों को मनाना फुसलाना इन सभी कामों का ज़िम्मा सरयू राय के जिम्मे था. बाद में 2005 में जमशेदपुर से वे विधायक भी हुए लेकिन तब भाजपा की सरकार बहुत कम दिनों के लिए बन पाई और अब तक का सबसे विवादास्पद मधु कोड़ा की सरकार बनी जो एक निर्दलीय विधायक थे जिन्हें बाहर से झामुमो-कांग्रेस ने समर्थन दिया था.

इस दौर में लूटखसोट चरम पर था और उनके मंत्रिमंडल के अधिकांश लोगों पर घोटाले का न केवल आरोप लगे बल्कि मामले भी चला. उन्हें जेल भी जाना पड़ा उन्हीं में से एक आरोपी को भाजपा ने चुनाव में अपनी पार्टी में शामिल कराकर उसे पार्टी का उम्मीदवार भी बनाया. फिर 2014 के शासनकाल में सरयू राय मंत्री तो बने लेकिन धीरे-धीरे रघुवर दास ने उनके पर कतरे और उनसे धीरे-धीरे कई विभाग वापस ले लिए. नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे राय ने मंत्रिमंडल की बैठक में भाग लेना ही बंद कर दिया जो उनके टिकट काटने में एक मुख्य आधार भी था.

फ़िलहाल राय रघुवर दास के खिलाफ मैदान में हैं. भले ही जमशेदपुर पूर्व से चुनाव जीतें या हारें लेकिन झारखंड की राजनीति में उबाल तो ला ही दिया है. इसके अलावा विपक्षी दलों को भी उन्होंने एक मुद्दा तो दे दिया है कि जो भ्रष्टाचार उन्मूलन का दावा करने वाली भाजपा ने उनके जैसे घोटाले उजागर करने वाले को टिकट से बेदख़ल कर दिया और 130 करोड़ की दवा घोटाले के आरोपी भानू प्रताप ऐसे लोगों को पार्टी में शामिल कराकर टिकट से सम्मानित किया. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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