जनरल बिपिन रावत के सियासी बयान से मचा घमासान

भारतीय सेना के राजनीतिकरण को लेकर सवाल फिर खड़े हो गए हैं. पिछले कुछ सालों में सेना का इस्तेमाल सत्ताधारी दल ने अपने सियासी फायदे के लिए लगातार किया है और विपक्ष सरकार पर इसका आरोप भी लगाता रहा है. सेना के अधिकारियों ने जिस तरह सरकार के पक्ष में कई बार परोक्ष रूप से बयान भी दिए, जिसकी वजह से सरकार को फायदा हुआ. सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के हालिया बयान ने अब इस बहस को और आगे बढ़ाया है कि क्या भारत पाकिस्तान के रास्ते पर तो नहीं बढ़ रहा है क्योंकि सेना का लगातार सियासी हस्तक्षेप बढ़ रहा है.

सेना प्रमुख बिपिन रावत भी बखूबी जानते होंगे उनके बयान के बाद देश में तूफान उठ खड़ा होगा. लेकिन फिर भी उन्होंने बयान दिया और इसके सियासी मतलब निकाले जाने लगे. न सिर्फ विपक्ष बल्कि एनडीए के सहयोगी दलों ने भी रावत को नसीहत दी कि वे सियासी मामलों में बिना वजह हस्तक्षेप न करें. रावत ने नागरिकता संशोधन क़ानून पर हो रहे विरोध-प्रदर्शन को लेकर जो टिप्पणी की उस पर न केवल उनकी निंदा की जा रही बल्कि अब उनसे माफ़ी मांगने और सरकार से भी संज्ञान लेने का आग्रह विपक्ष ने किया. यह मांग गलत भी नहीं है.

माकपा से लेकर एआईएमआईएम और जदयू ने भी रावत के बयान को गलत बताया है. माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने पार्टी के पोलित ब्यूरो की तरफ से सेना प्रमुख के बयान की स्पष्ट रूप से निंदा करते हुए ट्विटर पर लिखा कि जनरल रावत के इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि मोदी सरकार के दौरान स्थिति में कितनी गिरावट आ गई है कि सेना के शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति अपनी संस्थागत भूमिका की सीमाओं को लांघ रहा है. ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं हम सेना का राजनीतिकरण कर पाकिस्तान के रास्ते पर तो नहीं जा रहे. लोकतांत्रिक आंदोलन के बारे में इससे पहले सेना के किसी शीर्ष अधिकारी के ऐसे बयान का उदाहरण आज़ाद भारत के इतिहास में नहीं मिलता है.

पोलित ब्यूरो ने सेना प्रमुख से उनके बयान से लिए देश से माफ़ी मांगने को कहा. साथ ही पार्टी ने सरकार से भी मामले में संज्ञान लेते हुए जनरल की निंदा करने की मांग की. नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में पिछले कई दिनों से देश के अलग-अलग हिस्सों में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए हैं. इस दौरान देश के कई शहरों में हिंसा भी हुई. कई जगहों पर उपद्रवियों की भीड़ से तीखी झड़प भी हुई. हुड़दंगियों को काबू करने के लिए कई जगह पुलिस को लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया. तो कहीं पुलिस ने जबरन घरों में घुस कर उत्पात मचाया. पुलिस ने एक खास समुदाय को निशाना बनाया और उसकी गोलियों से कई लोग मारे गए. गुरुवार को सेना प्रमुख बिपिन रावत ने भी इस कानून को लेकर टिप्पणी की थी. अब इसे लेकर वे राजनेताओं के निशाने पर भी आ गए हैं.

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता दिग्विजय सिंह ने बिपिन रावत के बयान पर आपत्ति जताई है. रावत ने एक कार्यक्रम में कहा था कि भीड़ को दंगे के लिए भड़काना नेतृत्व नहीं है. दिग्विजय सिंह ने कहा कि मैं जनरल साहब की बातों से सहमत हूं, लेकिन नेता वे नहीं हैं जो अपने अनुयायियों को सांप्रदायिक हिंसा के नरसंहार में लिप्त होने देते हैं. क्या आप मेरे से सहमत हैं जनरल साहेब. ओवैसी ने कहा कि नेतृत्व का मतलब यह भी होता है कि लोग अपने ऑफिस की मर्यादा को न लांघे. यह नागरिक वर्चस्व के विचार को समझने और उस संस्था की अखंडता को संरक्षित करने के बारे में है, जिसका आप नेतृत्व करते हैं.

सेना प्रमुख ने कहा था कि नेता वे नहीं हैं जो हिंसा करने वाले लोगों का साथ देते हैं. छात्र विश्वविद्यालयों से निकलकर हिंसा पर उतर आए, लेकिन हिंसा भड़काना नेतृत्व करना नहीं है. उन्होंने कहा कि नेता वो नहीं है जो लोगों को अनुचित मार्ग दिखाए. हाल ही में हमने देखा कि कैसे बड़ी संख्या में छात्र कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से निकलकर आगजनी और हिंसा करने के लिए लोगों और भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे. हिंसा को भड़काना किसी तरह का कोई नेतृत्व नहीं कहलाता. बिपिन रावत ने कहा था कि नेतृत्व क्षमता वह नहीं है जो लोगों को गलत दिशा में लेकर जाती हो. रावत ने कहा था कि नेतृत्व एक मुश्किल काम है. आपके पीछे लोगों की बड़ी संख्या होती है, जो आपके आगे बढ़ने पर साथ चलती है.

ओवैसी ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि किसी के पद की सीमाओं को जानना ही नेतृत्व है. नागरिक सर्वोच्चता के विचार को समझने और अपने अधीन मौजूद संस्थान की अखंडता को सुरक्षित रखने के बारे में है.' उन्होंने कहा कि अगर सेना प्रमुख की बात सच है तो मैं पूछता हूं कि प्रधानमंत्री अपनी वेबसाइट पर लिखते हैं कि आपातकाल के दौरान उन्होंने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. सेना प्रमुख के बयान के मुताबिक वह भी ग़लत था. जेपी ने छात्रों को इंदिरा गांधी के आपातकाल का विरोध करने को कहा था. क्या वे भी ग़लत थे, रावत यह भूल गए कि अटल बिहारी वाजपेयी ने एडमिरल विष्णु भगत को हटाया था. लिहाजा सेना प्रमुख का बयान ग़लत है. सरकार की वो बेइज्ज़ती कर रहे हैं.

बिपिन रावत ने इससे पहले भी इसी तरह का एक सियासी बयान दिया था जिसमें उन्होंने असम के राजनीतिक दल और भाजपा पर टिप्पणी की थी. उनकी इस टिप्पणी पर भी खूब बवाल हुआ था. जनरल रावत ने अपनी टिप्पणी में भाजपा और एआईयूडीएफ पर टिप्पणी की थी. उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि राज्य में भाजपा से भी ज्यादा तेजी से एआईयूडीएफ बढ़ रही है. सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के बांग्लादेशी नागरिकों की असम में घुसपैठ और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट पर दिए गए बयान पर फिर घमासान छिड़ा था. ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने सेना प्रमुख के बयान पर पलटवार करते हुए कहा था कि पार्टी बढ़ रही है तो सेना प्रमुख को चिंता क्यों हो रही है. अजमल ने इस मुद्दे पर ट्वीट कर अपनी बात कही थी.

उन्होंने एक ट्वीट में कहा था कि सेना प्रमुख बिपिन रावत ने एक राजनीतिक बयान दिया है, जो चौंकाने वाला है. सेना प्रमुख को चिंता क्यों है कि भाजपा की तुलना में लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर आधारित एक राजनीतिक पार्टी तेजी से बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि बड़ी राजनीतिक पार्टियों के गलत रवैए की वजह से ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और आप जैसी वैकल्पिक पार्टियां तेजी से आगे बढ़ी हैं. उन्होंने कहा कि इस तरह का बयान देकर सेना प्रमुख क्या खुद को राजनीति में शामिल नहीं कर रहे हैं, जो कि संविधान के खिलाफ है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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