दिल्ली की सर्द रात में आस्मा का एलान- मैं मर जाऊंगी लेकिन देश नहीं छोड़ूंगी

दिल्ली में दिन सर्द है और रात को यह सर्दी और बढ़ जाती है. लेकिन देश में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी को लेकर सियासी पारा भी चढ़ा हुआ है और सामाजिक पारा भी. दिल्ली की सर्द रातों में हफ्तों से महिलाएं खुले आसमान के नीचे तंबू ताने बैठीं हैं और सरकार के सामने सवाल खड़ी कर रहीं हैं. हालांकि दिल्ली में पारा इस बुरी तरह लुढ़का है कि नया रिकॉर्ड बन गया है सर्दी का लेकिन इन सबसे बेपरवाह सैकड़ों महिलाएंसैकड़ों महिलाएं ओखला इलाके के शाहीन बाग़ में धरना दे रही हैं.

ऊपर खुला आसमान है. सर्द हवाएं चल रहीं हैं लेकिन सर्द हवाएं इन महिलाओं को विचलित नहीं कर पा रहीं हैं. नागरिकता क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ देश के अन्य हिस्सों में चल रहे उग्र प्रदर्शनों से अलग है यह प्रदर्शन. महिलाएं देश और भारतीय संविधान के कसीदे पढ़ रहीं हैं. संविधान पर पूरी आस्था जता रहीं हैं और कह रहीं हैं कि संविधान को हम बचाएंगे. इन कसीदों के बीच ही बांसुरी से लोकप्रिय देशभक्ति गीत 'सारे जहां से अच्छा' बजाने लगता है और दर्शक इस धुन पर झूमने लगती हैं. दर्शकों में बूढ़े भी हैं, बच्चे भी, महिलाएं भी और पुरुष भी.

फिर सभी राष्ट्रगान गाने के लिए उठ खड़ होते हैं. यह प्रदर्शन बीते पंद्रह दिनों से जारी है. बिना हो-हल्ला और हिंसा के. प्रदर्शन का यह रंग नया है और इसमें हर जाति और धर्म के लोग शामिल हैं. प्रदर्शन की कमान भी महिलाओं ने थाम रखी है. महिलाएं नए नागरिकता क़ानून को वापस लेने और एनआरसी को देश में कभी लागू न करने की मांग की है.प्रदर्शन में आईं महिलाओं में ज्यादार घरेलू महिलाएं हैं जो अपने घरों से बहुत कम ही बाहर निकलती हैं, देर रात में इस तरह किसी प्रदर्शन में बैठना तो दूर की बात है. वे कहती हैं कि यह पहला मौका है जब वे धरने पर बैठीं हैं.

इनमें से ही एक हैं फ़िरदौस शफ़ीक़ जो कहती हैं कि हमें सरकार ने ऐसा करने के लिए मजबूर किया है. फिरदौस ने सर को हिजाब से ढक रखा है. उनके पास ही बैठी कुछ और महिलाएं सर और चेहरा ढंके बैठीं प्रदर्शन का समर्थन कर रहीं हैं. फिरदौस कहती हैं कि मैंने कभी अकेले घर से कदम बाहर नहीं निकाला. छोटी-मोटी खरीदारी भी करनी होती है तो साथ में मेरा पंद्रह साल का बेटा या शौहर साथ रहते हैं. मैं हर समय हिजाब पहनती हूं. इसलिए एक गृहिणी के रूप में मुझे यहां आकर बैठना बहुत मुश्किल लगता है. लेकिन बाहर आना और विरोध करना, अब मेरी मजबूरी है.

फ़िरदौस को लगता है कि यह शातिर समय है इसलिए सर्दी या शर्म के बारे में सोचने का कोई मतलब नहीं रहता. वे कहती हैं कि अगर हम अपनी नागरिकता साबित करने में नाकाम हुए तो हमें या तो किसी डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा या देश में एनआरसी लागू होने पर देश से बाहर निकाल दिया जाएगा. इसलिए देश से बाहर निकाले जाने से बेहतर है कि हम अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें.

इस इलाके में कई दिनों से इसका विरोध हो रहा है. दुकानें बंद हैं और कुछ रास्तों को दूसरी तरफ मोड़ दिया गया है. प्रदर्शन की वजह से कालिंदी कुंज और नोएडा जाने वाली सड़कें बंद हैं. प्रदर्शन की कीछ ही दूरी पर बड़ी तादाद में पुलिस वाले मौजूद हैं और किसी भी अप्रिय घटना के लिए तैयार दिखते हैं. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि स्थानीय लोग इस विरोध प्रदर्शन से परेशानी महसूस कर रहे हैं क्योंकि न केवल सड़क और बाज़ार बंद हैं, बल्कि इससे स्कूल जाने वाले बच्चों सहित यात्रियों की आवाजाही भी बाधित हो रही है.

हालांकि कॉलेज में पढ़ने वाली हुमैरा सैय्यद जिनके माता-पिता और भाई भी प्रदर्शनकारियों में शामिल हैं, कहती हैं कि इस विरोध प्रदर्शन का मकसद न तो हिंसा है और न ही किसी को परेशान करना. हुमैरा कहतीं हैं कि यह क़ानून हमारे देश के संविधान का उल्लंघन है और इससे फ़िलहाल मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है. लेकिन धीरे-धीरे अन्य समुदायों (ग़ैर-हिंदू) को भी टारगेट किया जाएगा. पढ़ाई प्रभावित होने के सवाल पर वे कहती हैं कि अगर मुझे डिग्री मिलती भी है और मुझे यह पता नहीं कि मैं इस देश में रह पाउंगी या नहीं, तो मैं ऐसी डिग्री का क्या करूंगी. प्रदर्शन करने वालों में दिहाड़ी मज़दूर सुल्ताना भी हैं.

सुल्ताना कहती हैं कि हम इतना जानते हैं कि हमें रोटी कमाने के लिए रोज़ कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. हम नहीं जानते कि उन क़ागज़ों को कहां से और कैसे लाया जाएगा. नागरिकता साबित करने वाले क़ागज़ कौन से होंगे, हमें नहीं पता. हमें धर्म के आधार पर विभाजित किया जा रहा है. हम पहले भारतीय हैं और बाद में हिंदू या मुसलमान. ठंड में प्रदर्शनकारियों को गर्म रखने के लिए कंबल से लेकर चाय तक की व्यवस्थाएं हैं. यह सब इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इस जगह प्रदर्शन रात भर चलता है. अगर किसी और चीज़ की ज़रूरत होती है तो इसका एलान किया जाता है. स्थानीय लोग उसका इंतजम करने में किसी तरह की कोताही नहीं करते. पंद्रह दिसंबर को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई के बाद शुरू हुआ यह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, विश्वविद्यालय के आस-पास देखी गई हिंसा के बिल्कुल विपरीत है.

पुलिस ने विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश और बल के कथित रूप से इस्तेमाल के बाद विश्वविद्यालय से सटा हुआ इलाक़ा युद्ध के मैदान में तब्दील हो गया था. इससे हिंसा और आगजनी हुई थी. प्रदर्शन में मंच का संचालन कर रहे कुछ वक्ता पुलिस की 'बर्बर' कार्रवाई का उल्लेख तो करते हैं, लेकिन लोगों को हिंसा से दूर रहने का आग्रह भी करते हैं. सत्तर साल की आस्मा ख़ातून हालांकि पुलिस और सरकार के रवैये से नाराज और आहत हैं. प्रदर्शन में हिस्सा लेने के सवाल पर वे कहतीं हैं क्यों नहीं मैं हिस्सा लूं इसमें. मैं मर जाऊंगी लेकिन मैं इस देश को नहीं छोड़ूंगी. लेकिन मैं यह साबित नहीं करना चाहती कि मैं भारतीय हूं. सिर्फ़ मैं ही नहीं, मेरे पूर्वज, मेरे बच्चे और पोते सभी भारतीय हैं. लेकिन हमें यह किसी को साबित नहीं करना है. (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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