हबीब तनवीर : एक रंग-व्यक्तित्व (छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण संदर्भ)

“मेरा जन्म रायपुर मे, सितम्बर सन्‌ 1923 को हुआ। भिलाई के पास छत्तीसगढ़ का इलाका है, आप रायपुर को उसकी राजधानी कह सकते हैं। मेरी मॉं मध्यप्रदेश की थी पर मेरे वालिद पेशावर से आकर रायपुर मे बस गये थे। वही उन्होंने शादी की और हम सब भाई-बहनो का जन्म भी वहीं हुआ। वहां के लारी म्युनिसिपल हाई स्कूल से मैने मैट्रिक किया, और नागपुर के मॉरिस कालेज से बी. ए.। बाद मे एम. ए. के लिए अलीगढ़ गया लेकिन पढाई पूरी किये बिना ही बम्बई चला गया। बम्बई में कुछ फिल्‍मों, कुछ रेडियो मे काम किया। फिर इष्टा की तरफ गया, वहाँ रहा छ:-सात साल , और उसके बाद आ गया दिल्‍ली 1954 के आखीर मे। आते ही दिल्‍ली के थियेटर से जुड़ा और काम शुरू किया लेकिन ज्यादा दिन टिक नहीं पाया। मौका मिला और मै ट्रेनिंग के लिए चला गया लंद॒न। इंग्लैंड मे कई जगह ट्रेनिंग ली, फिर योरोप मे घूमता रहा, थियेटर देखता रहा, थियेटर करने के मनसूबे बनाता रहा। इसमें निकल गये तीन साल। 1958 मे दिल्‍ली लौटा और तबसे वहीं हूँ। लौटकर उसी साल हिन्दुस्तानी थियेटर शुरू किया। सन्‌ 1959 में, उससे अलग होकर नया थियेटर शुरू किया, तबसे उसी के साथ हूँ। इस साल (1984) नया थियेटर को पचीस साल हो गये पूरे। यह है मेरे अब तक के सफर की दास्तान।”
अत्यंत सक्षेप मे अपने जीवन के साठ वर्षो के सफर के इतिहास को प्रस्तुत करने वाले ये भारतीय रंगमच के सुप्रसिद्ध निर्देशक हबीब तनवीर थे। जिन्होंने 6 मई सन्‌ 1984 को नाट्य शोध सस्थान मे बातचीत करते हुए ये तथ्य दिये थे।

अपने पचास वर्षो से अधिक के रंगमचीय जीवनकाल में हबीब तनवीर ने प्रचुर काम किया है, अनुभव प्राप्त किया है, अनेक बार नई जमीन तोडी़ है, नागर और लोक अर्थात्‌ शहरी और ग्रामीण रंगमच के बीच सम्बन्ध स्थापित करने की दिशा मे महत्वपूर्ण काम किया है, लोक-कलाकारों को अपने नाट्य दल का अभिन्‍न अंग बनाकर अपनी प्रस्तुतियों को प्रामाणिकता के साथ-साथ एक नया आयाम दिया है, समन्वित थियेटर (टोटल थियेटर) की आधुनिक अवधारणा के परम्परागत रूप को दर्शकों के सामने रखकर उन्हे अपनी समृद्ध विरासत से परिचित कराया है और इस प्रकार कला के क्षेत्र मे शहर और गांव, शिक्षित और अशिक्षित, अमीर और गरीब, सुसंकृत और असंस्‍कृत आदि शब्दो के बेहिचक प्रयोग के सम्बन्ध मे हमे ठिठककर सोचने को प्रेरित किया है। संभवत: हमारे देश मे हबीब ऐसे एकमात्र निर्देशक है जिन्होने तथाकथित सभ्य-सुसंस्कृत शहरी प्रस्तुतियों मे लोकनाट्य या लोकपरम्परा का छौंक लगाकर उसे सुस्वादु बनाने या चटपटापन प्रदान करने की कोशिश नही की है, कोशिश की है तो लोकनाट्य और लोककला की ताकत और शख्सियत को समझाने की, उसे दिल में गहरे उतारने की और उसके प्रति लोगो के मन में इज्जत पैदा करने की। हजारों वर्षो से दो भिन्‍न धरातलो पर विकसित हो रही नाट्य परंम्पराओ का मिलन सदा समन्वित हो पाया हो, एक-जी हो पाया हो सो नही पर जहाँ हो पाया है वहां एक नये रस, नये आनन्द, नये जोग और नयी ताकत का अनुभव जरूर होता है और यही नाट्य जगत को हबीब तनवीर के योगदान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हमे पता है इस्लाम में बुत-परस्ती की मुमानियत हे। तिस पर हबीब के वालिद हाफिज मुहम्मद हयात खान हाफिज बहुत मजहबी शख्स थे तो आर्ट वगैरह की दिशा में उनसे कुछ बढा़वा मिलने का सवाल ही नहीं था लेकिन वालिद के अलावा परिवार के और लोग किसी न किसी रूप में जुड़े थे सगीत और साहित्य से। एक मामू बडे़ अच्छे गायक थे शास्त्रीय सगीत के, दूसरे शेर बहुत अच्छा लिखते थे। बडे़ भाई रायपुर की कालीबाडी़ से जुडे़ थे और नाटको में भाग लिया करते थे। जी हाँ, रायपुर में भी कालीबाडी़ थी। दरअसल ब़गाली जहां-जहां भी गये, उन्होंने कालीबाडी़ बनायी जो असलियत में आर्ट और कल्चर का सेंटर हुआ करती है। हबीब तनवीर का थियेटर के साथ पहला परिचय हुआ रायपुर की कालीबाडी़ के नाटकों के माध्यम से।

भाई नाटक मे पार्ट करते थे और हबीब मंत्रमुग्ध से उन्हे देखा करते थे, उनके साथ हँसते थे, उनके साथ रोते थे। बचपन मे देखे नाठक 'मुहब्बत का फूल' की चर्चा करते हुए वे बोले-
“रायपुर की कालीबाडी़ मे जाकर मैं नाटक देखा करता था। एक पारसी नाटक था 'मुहब्बत का फूल' हाफिज अब्दुल्ला का। उसमे मेरे बडे़ भाई जनाना पार्ट किया करते थे। मुझे उस नाटक की बहुत अच्छी तरह याद हे। नाटक शुरू होने का टाइम आठ बजे का होता तो आठ बजे से हॉल के बाहर बैंड बजना शुरू होता और जब तक बैंड बज रहा होता तब तक समझ लीजिए नाटक शुरू नहीं हुआ है। आठ का नौ, साढ़े नौ बज जाता, लोग इतमीनान से आते रहते। साढे नौ बजे तक बाहर बैंड बंद होता मतलब कि नाटक अब शुरू होनेवाला है। वहीं बैंड भीतर जाकर आरकेस्ट्रा बन जाता। उन दिनो पर्दा नीचे से ऊपर उठा था, लपेटवा पर्दा होता था। अब तो आड़ खुलता है या पूरा सीधा ऊपर जाता है। तब बांस के रोलर पर लपेटकर जाता था। मुझे बहुत अच्छी तरह याद है। पर्दे के पीछे तमाम ऐक्टर लोग सजकर खड़े रहते थे प्रार्थना के लिए। पर्दा लिपटना शुरू होता तो सबसे पहले उनके पांव नजर आते, उसके बाद जिस्म और उसके बाद चेहरा। आखिरी चीज़ चेहरा होती थी जो सबसे सजा होता था। इस तरह एक-एक करके ऐक्टर को देखने का ड्रेमेटिक असर कुछ और ही होता था।

इस चीज को मैने बाद में बम्बई मे कथकली में देखा। हनुमान की एट्री थी, कम से कम बीस मिनट लगाये। पर्दे के पीछे हनुमान छिपा रहा। पहले उसने अपने नाखून दिखाये, पर्दे के नीचे से अपनी सजावट दिखायी, फिर मुकुट का जरा सा फुदना दिखाया और फिर आंख तक पर्दे को नीचा करके पूरा मुकुट दिखा दिया और उसकी दसो उंगलिया पर्दे पे नजर आने लगी। नाखून चमकते हुए, पालिश किये हुए। बहुत अच्छा सजा हुआ-सफेद, सुनहरे और सुर्ख रंग की यह स्कीम थी। जब बीस मिनट मे धीरे-धीरे अपने को प्रगट करते हुए हनुमान ने रफ्ता-रफ्ता पर्दे को फेंक दिया तो मैं देखता रह गया, अजीब एक अनुभव था मेरे लिए। अगर वह एक साथ एन्ट्री ले लेता तो इतनी सजावट को एक नजर मे देख लेना मुश्किल होता। जिस तरह माइकेल अंजिलो के म्यूरल को एक बार मे पूरा देखकर उसे नहीं समझा जा सकता और आर्ट को किताबों मे उसके एक-एक टुकड़े छपते है, क्रास सेक्शन और उन सबको अलग-अलग स्टडी करने के बाद ही पूरा म्यूरल एक साथ देखा और समझा जा सकता है, उसकी हर बारीकी का लुत्फ उठाया जा सकता है उसी तरह कथकली के हनुमान का भी पहले एक-एक हिस्सा, एक-एक टुकड़ा दिखाया फिर धीरे-धीरे करके पूरा हनुमान सामने आया कि यह है टोटल हनुमान।

वह अनुभव और नाटक में लिपटवा पर्दे का उठना इन दोनो का मेरे ऊपर बहुत असर हुआ। 'मुहब्बत का फूल” मे आशिक को जंजीरो मे बांधकर गुफा मे डाल दिया जाता है। उसकी माशुका उसे रोते-रोते ढूंढ़ती फिरती है। माशुका का रोल मेरे भाई किया करते ये तो उनके साथ-साथ मै भी रोया करता था। उस रोने का किस्सा यहां तक चला कि मेरे मुहल्ले में एक दर्जी थे नबी मियां। उन्हे नाटक मे मेरे रोने के वाकयों का पता था। तब ही नहीं बाद मे भी रायपुर जाने पर जब भी मै गोल बाजार से गुजरता वे मुझे बाबा बाबा कहकर पुकारते, चाय-वाय पिलाते और फिर वही मजाक कि “कैसा रोये थे 'मुहब्बत का फूल” देखकर, क्यो ? मतलब मै अच्छा खासा जवान हो गया था उस पर भी उनका यह मजाक कायम था।

“मुहब्बत का फूल की कई बातें मुझे खूब याद है। बहुत लुत्फ आता था। एक धमाका होता था और सीन बदल जाता था। कुछ चक्की मंच (रिवाल्विग स्टेज) जैसा था, खड़खड़-खड़खड़ चीजें करती थी, इधर रफ्ता-रफ्ता मालूम हुआ कि पहाड़-वहाड़ आ गये-पेंट किये पर्दे तमाम। वो सब बहुत अच्छा लगता था, रंगीन रोशनी वगैरह रहती थी। जरूर ही इसका गहरा असर हुआ होगा मुझ पर तभी आज तक ये सब बाते याद है। बचपन का एक और किस्सा याद है- मै दूसरी अंग्रेजी मे था तब का। तब वहाँ कोई जलसा-वलसा होनेवाला था। उसके लिए हमारे फारसी के टीचर ने (जो बाद में मेरे बहनोई हुए) एक नाटक लिखा 'दुरे यतीम उर्फ पालिशवाला।” उस जमाने मे पारसी थियेटर मे यूं ही होता था फलां-फलां उर्फ फलां। उसमे मुझे पार्ट दिया पालिशवाले का, जिसकी एक अमीर आदमी बहुत मदद करता है, उसे तालीम दिलवाता है, बाहर भेजता है वगैरह वगैरह। उस वक्‍त मेरी उम्र रही होगी बारह-तेरह साल। मेरा यह पहला नाटक था जिसमे मैंने हीरो का काम किया। हमारे ड्रिल मास्टर थे मोहियुद्दीन साहब, बडा अच्छा जिस्म था उनका। उन्होने डाइरेक्शन दिया था। उसमे पहले एक बडी़ लंबी तकरीर थी, एक टुकडा मुझे अभी तक याद है- “दुनिया मक्‍कारों, अब्लफरेब दुनिया, गरीबो को सतानेवाली फलां चीज को ऐसा करनेवाली दुनिया। एक हाथ माथे पर दूसरा यों रखके एट्री लेनी थी। हर लफ्ज पर एक मुद्रा थी, एक अदा थी, वैसे ही करने को कहा गया हमसे। आज सोचकर हंसी आती है कि किस तरह का डाइरेक्शन था, हर स्वर पर जोर पर उस वक्त मै उससे बहुत प्रभावित था। बहुत अकीदत थी, बहुत श्रद्धा थी उस वक्‍त अपने टीचरो के प्रति। तो ये नाटक बहुत कामयाब रहा, स्कूल का ड्रामा था, लड़को ने देखा।
“उसी जमाने में शेक्सपीयर के किंग जान! का एक सीन हमने अंग्रेजी मे क्रिया था-- 'द यूबटे और प्रिस आर्थर'। मेरे बचपन के एक बडे़ अच्छे दोस्त थे अजीज हामिद मदवी। बड़े अच्छ शायर थे, अब पाकिस्तान में है। हम दोनो साथ-साथ शायरी किया करते थे। वे बने थे द यूबर्ट और मै प्रिस आर्थर। हमने वो सीन किया था जिसमे द यूबटे प्रिस आर्थर की आब फोडने आता है, कडी-कडी बाते कहता भी है लेकिन आखीर मे बदल जाता है और आंख नहीं फोडता। बस, इतना सा सीन किया था हमने पर याद है। यह अनुभव था स्कूल का। फिर आ गया कलिज मे। उस जमाने मे मारिस कालेज में मुझसे सीनियर हुआ करते थे किशोर साहू। नागपुर का मारिस कालेज अलग हे, लखनऊ वाले म्यूजिक के मारिस कालेज से। नागपुर के डिप्टी कमिश्नर थे मारिस साहब, उन्ही के नाम पर था। अब तो शायद नाम भी बदल गया होगा। तो किशोर साहू उन दिनो कालेज मे काफी ऐक्टिव थे, डे मेटिक्स मे भाग वगैरह लिया करते थे। मुझे भी जब मौका मिलता, करता और इस तरह करते-करते बी. ए. की तालीम पूरी हुई और मेरे थियेटर का पहला दौर भी।”
पहले बताया जा चुका है कि एम. ए. के लिए हबीब तनवीर अलीगढ़ गये लेकिन आगे की गाडी़ सीधी पटरी पर न चली। वालिद चाहते थे लड़का तालीम पूरी करके आई. सी. एस. बने। हबीब पढने मे अच्छे थे, फर्स्ट डिविजन मिलता था लेकिन इनकी नजर लगी बम्बई की ओर। कुछ फोटो वगैरह खिंचवाकर भेजी लेकिन बम्बई जाकर प्रोड्यूसरों-डायरेक्टरों के पीछे घूमने की, उनकी जी-हुजूरी करने की सामर्थ्‍य नहीं थी। साधारण मिडिल क्लास वाले वालिद-उन्हें न तो फिल्‍म मे जाने का इरादा रास आनेवाला था और न ही पास में लुटाने को पैसे थे। इधर हुआ यह कि पढाई से जी उचटने लगा। कुछ राजनीति की ओर झुकाव भी होने लगा चुनाचे सब कुछ अनिश्चित, डावांडोल। लेकिन कुछ किये बिना गुजारा होने वाला नहीं था। उन दिनों लडाई का जमाना था, बात सन्‌ 1945 की है सो नेवी के लिए अर्जी की। जिला के स्तर पर तो रायपुर और नागपुर मे निकल गये लेकिन तीसरा और आखिरी टेस्ट था लोनावला मे, वहाँ आई.क्यू. वगैरह मे पास हो गये लेकिन शारीरिक टेस्ट मे फेल। दस-बारह लोगो के साथ एक पुल पार करना था, निश्चित समय के अदर। और सब निकल गये, ये खडे़ सोचते ही रह गये। नतीजा फेल, नेवी मे भर्ती होने का सपना खत्म हुआ।

वैसे इस टेस्ट में नाकामयाब होने का कोई खास गम हबीब साहब को नहीं हुआ क्योकि एक नजर तो बम्बई की ओर थी ही। मन मे तै कर रखा था कि लोनावला मे न हुआ तो बम्बई चले जायेंगे। आने-जाने का दूसरे दर्जे का टिकट था। न जान न पहचान किसी से। दो-चार दिन फुटपाथ पर काटे फिर एक दिन मिल गये जुलफिकार अली बुखारी। अपने साथ रेडियो ले गये, वे उन दिनो रेडियो मे प्रोड्यूसर थे। वे अपने साथ ही ले गये सोवो हाउस जिसके मालिक थे ताहिर अली। उनकी एक गोला-बारूद की फैक्टरी थी, लडा़ई की कुछ चीजे बनती थी सो उन्होने वहां सुपरवाइजर की नौकरी दे दी हबीब को। गाडी़ चल पडी और चल ही नही पडी़ दौडने लगी क्योकि इन्हे अगली सफलता जो मिली बह ताज्जुब में डालनेवाली थी। एक दिन ये “पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे' देखने के बाद पास के एक रेस्त्रा में बेठे बातचीत कर रहे थे। बगल के टेबुल पर बैठे मद्रास के एक डाइरेक्टर सुर्यंम इनकी बाते सुन रहे थे। बातचीत से यह अंदाज लगने पर कि हबीब की फिल्म में काम करने मे रुचि हो सकती है, वे उठकर इनके टेबुल पर आये, बातचीत की। उन्हें अपनी नयी फिल्म “आप के लिए'' के हीरो की तलाश थी, उन्होने हबीब को बुक कर लिया। मतलब यह कि बम्बई पहुंचने के हफ्ते भर के भीतर हबीब साहब को नौकरी भी मिल गयी और फिल्‍म मे काम भी। वापसी टिकट था ही, फिल्मवालों ने कुछ एडवान्स दे दिया। घर आकर सामान वगैरह लेकर बम्बई दुबारा पंहुचे। फिल्‍म में काम भी किया और गोला-बारूद की फैक्टरी में सुपरवाइजर की नौकरी भी। इतना ही नहीं बुखारी साहब की कृपा से रेडियो के प्रोग्राम भी मिलते रहे खूब और फिल्मों का रिव्यू करना भी शुरू कर दिय। नये-नये थे, खून मे गर्मी थी, तीखी समालोचना करने लगे। एक दिन बाबूराव पटेल बुखारी से मिलने आये। उन्होने हबीब को समझाया कि ऐसी खरी आलोचना मत किया करो, फिल्म इंडस्‍ट्री में गुंडे भरे हैं, नुकसान होने पर वे तुम्हे नहीं छोडे़गे। फिर हंसकर बोले- 'मेरे दफ्तर मे आ जाओ, मै गूंडो का गुंडा हूँ, वहां होने से कोई तुम्हारा बाल बांका नही कर सकेगा।' खैर, हबीब रुकनेवाले नहीं थे, बात टाल गये। फिल्म के रिव्यू का यह सिलसिला जो सन्‌ 1946 में शुरू हुआ, करीब दो दशकों तक कायम रहा और फिल्म तथा नाटक दोनों की खुली समीक्षा हबीब करते रहे।

“सन्‌ 1958 मे मै छ: छत्तीसगढी़ कलाकारों को ले गया था दिल्‍ली, पहली बार। योरोप से लौटने के बाद रायपुर गया मां-बहनो से मिलने तो वहाँ देखा 'नाचा'। नाचा कहते है वहाँ के सेक्युलर (स्थानीय लौकिक) थियेटर को। देखकर मै मुग्ध रह गया, रात भर देखता रहा। मदन लाल, ठाकुर राम, बाबू दास, भुलआ वगैरह बड़े-बडे ऐक्टर स्टेज पर थे। मैं उनसे बहुत प्रभावित हुआ। उनसे बात की, कि दिल्‍ली चलोगे? वे राजी हो गये और उनमे से छ: को लेकर मै दिल्ली पहुच गया "मिटटी की गाडी़” मे अभिनय करवाने के लिए। उन्हें देखकर बेगम जेदी बडी़ असतुष्ट- ”यह तुम किन्हे पकड़ लाये, काली-काली सूरतें, जंगली किस्म के लोग। नाटक में हीरो-हिरोइन के खूबसूरत चेहरे होने चाहिए सो तुम न जाने किन लंगडे़-लूलों को पकड़ लाये हो। जाकिर हुसैन साहब आ रहे है, क्या कहेंगे भला इन्हे देखकर।” खैर, मैने इन बातों को खास तवज्जो नहीं दिया और उन कलाकारों से ”मिट्टी की गाडी़” मे ऐक्टिंग करवाया। सन्‌ 1958 का प्रोडक्शन हिन्दी मे किया था, छत्तीसगढी़ भाषा की ओर तब तक मै नही गया था। लेकिन छत्तीसगढ़ के उन कलाकारों से हिन्दी में काम करवाकर मुझे लगा कि ये तो कमाल के आर्टिस्‍ट हैं। नाच भी लेते हे, गा भी लेते हैं अभिनय भी कर लेते है बिना किसी संकोच के (अनइनहिबिटेड) - मुझे इसी टोटेलिटी की तलाश थी, टोटल थियेटर की। मृझ पर जो इप्टा का असर था, इप्टा के कारण लोक शैलियों की ओर जो झुकाव था उन सबके चलते मुझे लगा कि आगे मेरा काम इन कलाकारों के साथ ही होना चाहिए। साथ ही यह भी समझ में आया कि हम अगर लोक कलाकारो को लेंगे तो वे अपनी लोक शैली साथ लायेगें, उनकी तमाम आवाज, कला सब वहाँ मौजूद रहेगी।”

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सन्‌ 1958 में मूलत: प्रस्तुत 'मिट्‌टी की गाडी़' का प्रदर्शन अभी तक हो रहा हैं। अवश्य ही सन्‌ 1977 में हबीब नें इसका पुर्नसंस्कार किया। नाटक का अनुवाद पूरी तरह छत्तीसगढी़ भाषा मे कर दिया, उसमे प्रचुर गानों का संयोजन किया और इस प्रकार संस्‍कृत का एक गौरवग्रन्थ पूरी तरह लोक स्तर पर प्रतिष्ठित किया गया। जैसा कि कहा जा चुका है स्‍वयं हबीब के अनुसार 'मिट्टी की गाड़ी' आम जनता का नाटक है, उसके पात्रों मे समाज के सामान्य और निम्न वर्ग के चोर, जुआरी, शराबी भी शामिल हैं, नाटक का कथ्य और शिल्‍प दोनों लोक जीवन के अधिक निकट है। हबीब की यह मान्यता बहुत दूर तक सही है पर शायद हम इस तथ्य को झट में स्वीकार नहीं कर पाते, संस्‍कृत नाटक़ शब्द कान में पड़ते हैं। हमारे सामने समाज का अभिजात वर्ग उभरकर आता है, हमारी अपेक्षा बनती है कि सामान्य व्यक्ति भी एकदम उजड्ड, गवांर और रूख न हो।

हमारे ऐसा मानने का कोई औचित्य नहीं तथापि ऐसी ही स्थिति बनती है। एक और बात है, इस तथ्य को हम मान भी लें तो उन पात्रों की ही ग्राम्यता संगत लगती है जो वास्तव में ग्रामीण या संस्कारहीन हैं। राजा, सामंत या नगरवधुओं में हम एक प्रकार के आभिजात्य और संस्कार की अपेक्षा करते हैं। इस दृष्टि से 'मिट्टी की गाडी़' और बाद में 'लाला शोहरत राय' मे लोक कलाकारों की अनेक भूमिकाएं अनुकूल नही हुई और वे दर्शकों के मन पर वह स्थायी प्रभाव नही छोड़ पाये जो चरनदास, बहादुर कलारिन या हिरमा में छोड़ते हैं। इस दृष्टि से मिट्टी की गाडी की आलोचना भी हुई है।

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इसी प्रसंग मे हबीब तनवीर ने उन कार्यशालाओं की चर्चा की जो उन्होने आठवें दशक मे की। पहली नाचा वर्कशाप थी जो उन्होंने सन्‌ 1973 मे की। नाचा छत्तीसगढ़ का एक लोकनाट्य रूप है। रायपुर से नाचा के करीब सौ कलाकारों के साथ एक महीने तक काम किया। इस वर्कशाप के दौरान लोक कलाकारों द्वारा किया जाने वाला मेकअप तथा सही प्रामाणिक वेशभूषा और गहनो को लेकर भी खोज-बीन चालू रही। आम तौर पर नाचा में इन सबको विशेष महत्व नहीं दिया जाता। वर्कशाप के बाद 'गाँव का नाम ससुराल मोर नाम दमांद' का मंचन हुआ जिसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। इसका प्रदर्शन छत्तीसगढ़ के गाँवों मे घम घूमकर किया गया, खूब लोकप्रिय हुआ। उस जमाने मे सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक-निर्माता श्याम बेनेगल भी इस ओर आकृष्ट हुए और हबीब ने एक और वर्कशाप कर डाली पंडवानी मे । पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक और शैली है जिसमे महाभारत प्रस्तुत करते हैं। उस समय सेटेलाइट का एक्सपेरिमेंट हो रहा था। हबीब तनवीर को यूनिसेफ के लिए छोटी-छोटी फिल्मे बनाने का काम मिला। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में प्रचलित कहावतों, कहानियों, निरर्थक कविताओं, बच्चो की कविताओं आदि को लेकर उन्होने आठ-आठ, दस-दस मिनिट की ढेरों फिल्‍मे बना डाली। इस सारे काम में श्याम बेनेगल साथ थे। उन्होने इन फिल्‍मों के साथ ही नया थियेटर के काम को लेकर एक डाक्यूमेटरी बनाना शुरू किया। ढेरो हिस्से फिल्माये और वे शायद उनके पास पडे़ भी हो पर दुर्भाग्य कि फिल्म नहीं बन पायी अन्यथा वह नया थियेटर के काम का बडा़ महत्वपूर्ण दस्तावेज होता।

'गांव का नाम..' के बाद हबीब की दूसरी महत्वपूर्ण प्रस्तुति थी 'चरनदास चोर” लेकिन उसकी चर्चा के पहिले उन प्रस्तुतियों की चर्चा जो उन्होने सन्‌ 1959 से 1975 के बीच की। सबसे पहले मोलियर का फार्स 'दी बुर्जुआ जेंटलमैन'। भारतीय रूपान्तर 'मिर्जा शोहरत बेग', सन्‌ 1959 में जामिया मिलिया के लिए किया। रूपातर और निर्देशन हबीब तनवीर का था। इसे ही सन्‌ 1960 मे नया थियेटर के लिए किया। मुख्य भूमिका मे थे मंजीत, बाद में हबीब वह रोल करने लगे। सन्‌ 1981 मे इसे आई.आई.टी. के लड़को के साथ किया। अब इसका नाम 'लाला शोहरत राय' हो गया था। इसके अनेक शो बाद में नया थियेटर के लिए हुए। हेमा सहाय इसमे नयी-तयी आयी थी। बाद में छत्तीसगढी़ कलाकारों के साथ भी यह खेला गया, गोविन्दराम इसमे मुख्य भूमिका मे थे। 'लाला शोहरत राय' के एक प्रदर्शन के दौरान सन्‌ 1982 में कलकत्ता में एक बडी़ अप्रिय घटना हुई। सुबह का रिहर्सल खत्म करके ये लोग नीचे उतरे। सड़क पर एक भीख मागने वाला अपनी लड़की के साथ गाते हुए जा रहा था। इन लोगों को उनके कंठस्वर ने खीचा। उसे कला मन्दिर के गेट के भीतर बुलाकर हबीब वगैरह गाना सुनने लगे। दरबानों ने इस पर आपत्ति की। हबीब को आपत्ति वाली कोई बात ही नहीं समझ मे आयी। आम आदमी का और ऊपर से एक कलाकार का यह अपमान उन्हे बहुत नागवार गुजरा। कहा-सुनी हो गयी जबरदस्त। शाम को हबीब ने प्रदर्शन तो किया पर उसके पहले तकरीर की, अपना विरोध दर्ज किया और तय किया कि आगे से वे कभी कलामन्दिर के मंच पर नाटक नहीं करेंगे। कलकत्ता के दर्शकों से उन्हें बहुत प्रेम मिलता है लेकित इस अप्रिय घटना ने उनके मन मे कई आहट पैदा की जो आज तक बरकार है।

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अप्रैल 1988 मे भिलाई के इप्टा के लिए हबीब तनवीर ने शंकर शेष के नाटक 'एक और द्रोणाचार्य' का निर्देशन किया। स्वयं उनके शब्दों मे- “इसे ओपेन एयर में किया। मैने नाटक को री-स्ट्रक्चर किया। नाटक में बेकग्राउंड मे होने वाले कुछ दृश्यों को मैंने लिखा और उन्हे स्टेज पर दिखलाया। जैसे कहीं बगीचे मे हुआ रेप सीन या फिर आत्म-ह॒त्या वाला सीन। यह दुर्घटना एक पहाड़ की चोटी से हुई थी। हमनें यह दृश्य एक मकान की छत से किया। पीछे रोशनी देकर -फूलड लाइट। लोगों को बहुत दूर पर आकृतियां दिखी जाती हुई और फिर गिरती हुई। एक दृश्य चबूतरे पर दिखलाया, नीचे का दृश्य था। यहाँ-वहाँ हर जगह दृश्य दिखलाये गये थे। नाटक में जिन घटनाओ का वर्णन किया गया था, उन्हे मैंने दिखलाया इसलिए उन वर्णनों को काट दिया क्योकि फिर उनकी जरूरत नहीं रह गयी थी। यह नयापन 'एक और द्रोणाचार्य' मे लाया गया था।

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“एक बात और ये पढे़-लिखे तो हैं नही इसलिए पढ़कर संवाद याद करना संभव नहीं। पर इनकी याददाश्त जबरदस्त होती है। एक बार सुना, संवाद याद हो गये, दो-चार बार दोहराया एकदम पक्के हो गये। और एक बार पक्‍के हो गये तो फिर सब दिन की छुट्टी। मैं उनका हिसाब लिखकर रखता था, उसमे घंटो समय लगाता था पर उन्हें सब जबानी याद रहता था। फिदाबाई थी, हिसाब करने बैठती तो दस उस दिन, पांच सौ उस दिन, डेढ़ सौ उस दिन, पचीस उस दिन, इतने रुपये इतने आने की चाय उस दिन, कुल इतने रुपये इतने आने। तुम्हारा हिसाब गलत है। और मैं फिर आधा घंटा समय लगाकर इस नतीजे पर पहुंचता कि ये ठीक कह रही है, मेरा हिसाब गलत था। एकदम अनपढ़ औरतें दीवाल पर लकीर खीचकर या गांठ बांधकर हिसाब रखने वाली पर याददाश्त जबरदस्त। इनसे नाटक तैयार करवाने का तरीका भी मैने अलग इख्तियार किया था। ऐक्टरों का चुनाव करने के पहले मै इम्प्रोवाइज करवाया करता था। कोई कहानी दे दी- एक हिरन भाग रहा है, शिकारी उसका पीछा कर रहे हैं, फिर तीर से उसे मारते है। या एक बार कहा कि मान लो एक घर है, साथ मे एक पेड़ है। पेड़ की डालें घर की दीवार पर फैल रही है, उससे घर को नुकसान हो सकता है। अब तुम कैसे घर को बचाओगे, करके दिखलाओ। ऐक्टरों ने सीन करके दिखलाया और मैने उनमे से नाटक की जिस भूमिका के लिए जो ऐक्टर ठीक लगा, उसे चुन लिया। फिर दो-चार दिन नाटक का सीन करवाकर पक्का कर दिया। दूसरी वाली कहानी में मेरा यह भी मकसद था कि देखेँ ये समस्या का हल क्या सोचते हैं। एक ने डाल मोड दी, एक ने जड़ के पास कुछ खोद-खाद कर उसकी जडो़ को थोडा मोड़ दिया। एक ने घर की दीवाल थोडी़ खिसकाकर समस्या का समाधान किया। मुझे बहुत अच्छा लगा कि किसी ने पेड़ को काटने की बात नहीं सोची, उसे केवल थोडा़ इधर-उधर करना चाहा। अंतिम ने तो वह भी नहीं किया, घर को ही सरका दिया। शायद यह प्रवृत्ति हमे शहरी कलाकारों मे नहीं मिलती। अपनी धरती, गांव, पेड़-पौधे, फसल, जानवर इनसे इन कलाकारो को जितना लगाव होता है उतना शहरी लोगों को नहीं। मुझे जब किसी नयी चीज़ से उनके गहरे प्रेम को दिखलाना होता है तो मै उनसे कहता हूँ तुम इसे वैसे ही प्यार करो जैसे अपनी फसल को करते हो, इसे देखकर वैसे ही खुश हो जैसे धान के लहलहाते खेत को देखकर होते हो, इसे ऐसे ही दुलराओ-सहलाओ जैसे अपनी गाय के बछड़े को सहलाते हो तो उन्हें बात तुरत समझ मे आ जाती है और वे किसी आधुनिक चीज के लिए एक
शहरी इंसान के भावों को भी उतनी ही गहरायी से दिखला पाते है।”

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साभार -
हबीब तनवीर : एक रंग-व्यक्तित्व
संम्पादक - प्रतिभा अग्रवाल
प्रकाशक - नाट्य शोध संस्थान, कलकत्ता
संस्थान की प्रकाशन योजना के अंतरगत प्रकाशित होनेवाली दूसरी पुस्तक, पहली पुस्तक थी “मास्टर फिदा हुसैन पारसी थियेटर मे पचास वर्ष”।

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