Good News India: बेसहारा शवों का अंतिम संस्कार करना मोहम्मद शरीफ का मिशन

मृत्यु के बाद नश्वर अवशेषों का अंतिम संस्कार हर किसी के लिए एक समान नहीं होता। जहां कुछ लोगों को 21 तोपों की सलामी के साथ अंतिम विदाई दी जाती है, तो वहीं साधारण लोग अपने प्रियजनों की अश्रुपूरित विदाई के साथ चले जाते हैं। लेकिन ऐसे भी तमाम लोग हैं जिनका इस जीवन से साथ छूट जाता है और उनके शरीर लावारिस रह जाते हैं। ऐसे ही ग़रीब और बेसहारा लोगों के शवों के उचित अंतिम संस्कार को अपने जीवन का मिशन बना लिया है।

अयोध्या के रहने वाले मोहम्मद शरीफ ने, जो जाति, पंथ और धर्म से ऊपर उठकर सिर्फ मानव धर्म में यकीन रखते हैं। पुण्य की नगरी कही जाने वाली अयोध्या में मोहम्मद शरीफ चुपचाप मानवता एक नई व्याख्या लिख रहे हैं। पिछले सत्ताइस सालों से इस काम में जुटे शरीफ चाचा ने अब तक लगभग साढ़े पांच हज़ार शवों का अंतिम संस्कार किया है। सरकार ने उनके इस काम को सम्मान देते हुए उन्हें पद्म श्री प्रदान करने की घोषणा की है।

साधारण लोगों के विशेष काम को तवज्जो देकर उन्हें भी पुरस्कृत करने की सरकार की नीति से मोहम्मद शरीफ बेहद खुश हैं। अयोध्या ज़िले के फैज़ाबाद शहर के खिड़की अली बेग के रहने वाले मोहम्मद शरीफ की साइकिल ठीक करने की छोटी सी दुकान है जिससे वह अपनी रोज़ी रोटी कमाते हैं। शहर के लोग उन्हें शरीफ चाचा के नाम से पुकारते हैं। शवों का अंतिम संस्कार वो उसकी धार्मिक मान्यता के अनुसार ही करते हैं।

हिंदू हो तो सरयू घाट पर अंतिम संस्कार और मुस्लिम हो तो कब्रिस्तान में दफन करना उनका आये दिन का काम हो गया है। इस काम को करने के पीछे की कहानी में दर्द छिपा है। मोहम्मद शरीफ बताते है कि 27 वर्ष पूर्व मेडिकल क्षेत्र में काम करने वाले उनके बेटे की पडोसी ज़िले सुल्तानपुर में हत्या हो गई थी। पुलिस ने लावारिस समझकर सकी लाश को दफन कर दिया।

जब मोहम्मद शरीफ सुल्तानपुर पहुंचे और कपड़ों से उसकी पहचान की और वह फूट-फूट कर रोए और फिर वही पर कसम खा ली कि अब उनकी जानकारी में कोई भी लावारिस शव लावारिस नहीं होगा, वह हर लावारिस शव के वारिस बनेंगे। उसके बाद से मोहम्मद शरीफ ने हर एक लावारिस लाश का अंतिम संस्कार अपने बेटा को मानकर ही किया है।

पुलिस विभाग, स्थानीय नगर निकाय और कई गैर सरकारी संगठन शरीफ चाचा को इस नेक काम में मदद करते हैं। उनको पद्म पुरस्कार मिलने की घोषणा से हर कोई की बेहद खुश है। आज के समय में जब लोगों के पास दूसरों के लिए वक्त नहीं है और मानव मूल्य गिरते जा रहे हैं, मोहम्मद शरीफ की इस निस्वार्थ सेवा का मोल और भी बढ़ जाता है।



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