मृत्यु गीत

रमने लगा है मन
गहन वन में
अदृश्य जंजीरों से fबंधी देह
हाथों से फिसल रही है
फिसल रही है
स्मृतियों के अंक-पाश से
क्षण / हर क्षण

मिला थोड़ा सा साथ
शब्दों का
माना अनुशासन भावों ने
मर्यादित होने लगीं भावनायें
मिटने लगा सब कुछ
कुछ बनने में
घिरने लगा घेरता दुख
कुछ रचने में
अपार जल में डूबता-उतराता
झुलस रहा है सब कुछ
कण / हर कण

दिखती हैं
तिमिर के प्रकाश में
आँसुओं की मुस्कानें
सिहराती है बंधनों में बंद
निर्बन्ध थकान
दौड़ रहा जब से छुआ वातायन
विश्रान्ति है मृत्यु तो
एक अनिवार्य अर्ध-विराम
अनवरत गान का
बहते रहते हैं भवितव्य में
जन / हर जन

Post a Comment

1 Comments

  1. बहुत सुन्दर और गहन अभिव्यक्ति...दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें!

    ReplyDelete