छत्तीसगढी लोकोक्तियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन

पी-एच. डी. उपाधि के लिए प्रस्तुत शोध प्रबन्ध
पं. रविशंकर विश्‍वविद्यालय, रायपुर
ईस्वी सन् 1990

शोधार्थी
श्रीमती अनसूया अग्रवाल

निर्देशिका 
डॉ. सत्यभामा आडिल 
प्राध्यापिका एवं अध्यक्षा, हिन्दी विभाग, शा.दू.ब.महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रायपुर

कला संकाय, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर (म. प्र.)

प्रथम अध्याय में लोकोक्ति के परिचय स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है।
द्वितीय अध्याय में डॉ. ग्रियर्सन के वर्गीकरण को ध्यान में रखते हुए छत्तीतगढ़ी बोली का सामान्य परिचय प्रस्‍तुत किया गया है।
तृतीय अध्याय में छत्तीसगढ की संस्कृति में जाति व्यवस्था के अंतर्गत विभिन्न जातियों के व्यवसाय, रीति-रिवाज, धर्म, पर्व, अनुष्‍ठान एवं लोको-क्तियों के आधार पर प्रकाश डाला गया है।
चतुर्य अध्याय लोकोक्तियों का वर्गीकरण है, जिसमें कृषि, प्रकृति, गृह, शरीर, नारी, विशवास-अँधविश्वास, मनोवृति एवं शिक्षा संबंधी, हास्य व्यंग्य संबंधी एव पशु-पक्षी संबंधी लोकोक्तियों को वर्गीकृत किया गया है।
पंचम् अध्याय में परिनिष्ठित छत्तीसगढ़ी लौकोक्तियों का समाज-शास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। पह अध्याय मेरे शीघ प्रबंध के कैंद्रीय अध्याय के रूप मैं प्रतिष्‍ठा प्राप्त कर सकता है।
षष्ठ अध्याय में छत्तीसगढ़ी बोली के विभिन्न रूपों में लोकोक्तियों का समाजशास्त्रीय विशलेषण के अंतर्गत सुरगुजिया, बस्तरिया, लरिया, एवंम छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवंम जातीय अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। अभी तक किये गये शोध में छत्तीसगढ़ी के विभिन्न रूपों की लोकोक्तियों को छोड़ दिया जाता रहा हैं किन्तु मैंने उन्हें भी लेने का प्रयास किया है।
सप्तम अध्याय में हिंदी की अन्य - अवधी, बघेली, बुंदेली, भोजपुरी ब्रज की लोकोक्तियों से छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों की तुलना की गई है।
अष्टम अध्याय मूल्यांकन एवं निष्‍कर्ष के रूप में समापन को प्रकट करता है, जबकि परिशिष्ट के अंतर्गत संदर्भ गंथों की सूची कें साथ संदर्भ ग्रंथों की सूची भी सलग्न है।

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