विष्णु की पाती राम के नाम






संपादक
जयप्रकाश मानस
यश पब्लिकेशन्स
दिल्ली
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान रायपुर (छत्तीसगढ ) के सहयोग से

यश पब्लिकेशन्स
20/909, चाँद मौहल्ला, गांधी नगर,
दिल्ली-110081

शब्दसंयोजक एवं मुद्रक
विकास कम्प्यूटर एण्ड प्रिण्टर्स
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

© प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान
प्रथम संस्करण : १010 ३
मूल्य : 275/-

शब्द शिल्पी स्व. विष्णु प्रभाकर जी के समस्त पाठकों के नाम

फ्लैप मेटर 
लघु कथाकार श्री राम पटवा को सम्बोधित, स्वनामधन्य रचनाकार श्री विष्णु प्रभाकर के हस्तलिखित पत्र हैं, सिर्फ इसलिए इनका महत्व नहीं बढ जाता। इन पत्रों का महत्व इस रूप में भी है कि ये पत्र हिन्दी के वरिष्ठतम् और समाप्त होती उस पीढी के हैं जो सर्वथा नैतिक, मूल्यनिष्ठ और उदात्तता के कारण भी सदैव स्मरणीय बने रहेंगे। स्मरणीय इसलिए कि उनके यहाँ नई पीढी के साथ एक गहरी आत्मीयता और स्वीकार्यता थी। बगैर विचारधारा, बगैर थोथी अहमन्यता के। विष्णुजी ऐसे ही रचनाकार थे जो अपने से कहीं कम उम्र के रचनाकारों की भी दिल से तारीफ करते थे। न केवल तारीफ करते थे, बल्कि उन्हें सदैव 'कोट' करते थे। राम पटवा ऐसे सौभाग्यशाली साहित्यकारों में से एक हैं, जिन्हें विष्णुजी सदैव और सर्वत्र अपने व्याख्यानों में याद करते थे। इन पत्रों को मैं उस रूप में देखता हूँ जिस रूप में शेक्सपीयर द्वारा युवा आलोचक एलेन स्टवर्ट को लगातार लिखे गए पत्र (शैक्सपीयर लैटर्स एडीटर-एलेन स्टूवर्ट) को देखा करता हूँ। इन पत्रों में एक योग्य और समर्थ रचनाकार का दिशाबोध भी है जो सिर्फ राम पटवा के लिए नहीं अपितु उन सारे लेखकों के लिए भी है जो गुरु-शिष्य परंपरा पर विश्वास करते हैं।
ऎसे दौर में जब दो-चार रचना लिख पढ लेने के बाद मिथ्या अहंकार से ग्रस्त रचनाकारों को उनकी बहुज्ञता के साथ देखा जा रहा हो यह किताब नयी पीढी के रचनाकारों के लिए आत्मविश्लेषण का मौका भी उपलब्ध कराती है। इन पत्रों में विष्णुजी के प्रभावशाली रचनात्मक व्यक्तित्व के साथ उनके निजी जीवन और मनोदशा को भी परखा जा सकता है। यहाँ आवारा महीसा से लेकर छोटी-से-छोटी लघुकथा के प्रति उनके पाठकों, समाज, साहित्यिक संस्थाओं की रायों के बार में भी विष्णु ने नि:संकोच लिखा है। इस मायने में यह हिन्दी के तथाकथित बडी संस्थाओं की चूकों की ओर भी गंभीर इशारा करने वाली किताब कही जा सकती है।
युवा संपादक जयप्रकाश मानस के इस प्रयास को मैं एक गंभीर साहित्यिक कर्म मानता हूँ कि उन्होनें विष्णु के पत्र राम के नाम को मूर्त रूप दिया है। शायद विद्वान पाठकों के लिए भी यह कृति इसी रूप में साबित होगी, खासकर इसलिए भी कि आधुनिक संचार साधनों से ग्रस्त खतरनाक समय में, पत्रों को और पत्र-लेखन की विधा को बचा पाने का अच्छा उद्यम है।
विश्वरंजन
अध्यक्ष, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर
संपादक की ओर से 
मुझे विष्णु और राम दोनों प्रिय हैं। मुझे ही क्यों, सबको। प्रिय इसलिए नहीं कि मैं जन्म से हिन्दू हूँ, प्रिय इसलिए भी नहीं कि दोनों ईश्वर हैं, प्रिय इसलिए भी नहीं कि वे देवताओं की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे, प्रिय इसलिए कि दोनों ने आतातायियों का दमन किया। युग को आंतकरहित किया और अमनचैन बनाया। विप्र, धेनु, सुर, संत हित लिन्ह मनुज अवतार, अर्थात जिन्होंने मनुष्य होकर भी गुणीज्ञानी, पशु-पक्षियों, सीधे-सादे सज्जनों के कल्याण के लिए पद-प्रतिष्ठा, विराट-वैभव का त्यागकर देश और वसे काल के संघर्ष को अपना संपूर्ण समर्थन दिया, वे क्योंकर प्रिय न हों ? ये दोनों शब्द भारतीय मनीषा में अधिक जगह घेरते हैं। शायद इसलिए भी और संयोगवश ऐसे नामवाले दो लेखक मुझे कहीं अधिक आकर्षित करते रहे हैं। पहले विष्णु हैं दूसरे राम। अमर लेखक विष्णु प्रभाकर को कौन नहीं जानता ! राम पटवा को पास-पड़ोस के अलावा 'कौन' जानता है ?
विष्णुजी और राम पटवा को मैं तब से जानता हूँ जब मैं पठन-पाठन की किशोर दुनिया से गुजर रहा था, लेखन की दुनिया जरा दूर थी। 
शुरुआती दौर में विष्णुजी को बाल लेखक के रूप में और फिर उनकी गंभीर रचनाओं के सहारे एक प्रतिष्ठित और प्रभावशाली लेखक के रूप में भी। राम पटवा को एंक लघुकथाकार के रूपं में मुझे उनकी लघुकथाएँ पत्र-पत्रिकाओं में पढने को मिल जाती थीं। राम पटवा मेरे ही जिले रायगढ के एक कस्बा से थे, मैं उनसे तो मिल सकता था पर विष्णुजी तो दिल्लीवासी थे। उनसे मिलना तो तब मेरे लिए कठिन ही था। न घरेलू हालत ठीक थी न ही मैं किसी चाकरी से इतना रुपया जुटा सकता था कि दिल्ली जा सकू। यह लघुकथा आंदोलन का दौर था। सातवें और आठवें दशक का समय। मैं भी स्वयं को लघुकथा में आजमा रहा था, शायद इसलिए भी मेरी इन दोनों कथाकारों पर गहरी दिलचस्पी बढती गई थी। वैसे राम पटवा जी से प्रत्यक्षत: मिलना तो बाद में हुआ, यही कोई 15-20 साल पहले। गाँव-देहात की सादगी से लवरेज कथोपकथन शैली, संपूर्ण सकारात्मक शब्दावली का प्रयोग और प्रसंग को जीवंत बनाने वाले उद्धरण सुनकर लगा कि राम पटवा जी मित्रता ही नहीं बल्कि आत्मीय संबंध गढनेवाले रचनाकार हैं। और तब से आज तक मेरा उनका संबंध दो भाइयों की तरह है। 
'सृजन-सम्मान' के वार्षिक आयोजन और राष्ट्रीय पुरस्कार वितरण समारोह (2005) में हम विष्णु प्रभाकर जी को बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बुलाना चाहते थे। हमारे पास समस्या थी कि उनसे कैसे बात की जाय? पटवाजी ने फट से विष्णु प्रभाकर जी का नंबर लगाकर मोबाइल मेरे हाथों में दे दी थी। मैं रह गया था कि विष्णुजी से रामजी के ऐसे संबंध हैं, कभी बताया नहीं। बताते कैसे वे ऐसे लेखक तो ठहरे नहीं जो बडे लेखक से संबंध जोडकर औरों के सामने जमाएँ। मैं देर तक बातें करता रहा, सारा विवरण देता रहा। वे तत्काल सहमत हो गए। बोले--मैं नागपुर होते हुए पहुँच जाऊँगा। वे स्वयं भी उम्र के अंतिम पडाव में एक बार छत्तीसगढ आने के लिए बेताब थे। फिर राम पटवा के बारे में कहने लगे--बहुत क्रायदे का लघुकथाकार ही है भई... एक दो कथाएँ ही काफी हैं जिसके कारण उसे साहित्य में याद किया जाता रहना चाहिए... मैं तो भई, मुरीद हूँ राम का। यह दीगर बात है कि आयोजन की तिथि भी बढ गई और स्वास्थ्यगत कारणों से वे फिर कभी रायपुर पधार नहीं सके थ्रे किन्तु तब से जाने कितनी बार पटवाजी के सोहबत से उनसे दूरभाष पर बातें होती रहती थीं। कभी समकालीन लघुकथा लेखन पर... कभी उनकी प्रकाशित रचनाओं पर... कभी पुरस्कारों पर तो कभी संस्कृति को लेकर राजकीय चरित्र-प्रदर्शन पर। वे मानवीय भावों को तिलांजलि देकर भी बडा रचनाकार कहलाने वाले मनुष्य नहीं थे जो दिल्ली से दूर के लेखकों को हीन दृष्टि से देखा करते हैं। बात करते वक्त ऐसे गुर्राएँ जैसे वे जंगली शेर हों और सामनेवाला निहायत कमजोर जीव खरगोश। जैसे साहित्य सिर्फ दिल्लीवालों की खेती हो शेष जगहों पर खरपतवार की पैदाइश होती हो... बहरहाल... इधर, अभी हाल में जब 'कुछ चिट्ठियाँ कैलाशपति के नाम' प्रकाशित हुईं, जिसमें हिन्दी के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कवि श्री केदारनाथ सिंह द्वारा अपने गाँव के सामान्य कार्यकर्ता श्री कैलाशपति के नाम लिखीं चिट्ठियाँ समादृत हैं (संपादक-सदानंद शाही) तो मुझे लगा क्यों ना विष्णु प्रभाकर और श्री राम पटवा के मध्य पिछले 20 सालों से होते रहे पत्र-व्यवहार को आम पाठकों के समक्ष रखा जाए। राम पटवा तो ऐसे मौन-साधक लघुकथाकार भी हैं, जिन्हें भले ही साहित्य-बिरादरी नहीं जानती हो किन्तु उन्हें हिन्दी के बहुख्यात लेखक विष्णु प्रभाकर जी असीम स्नेह करते थे। भले ही राम पटवा को किसी संघ-संगठन के आकाओं की ओर से शिविरबाजी के लिए ताक्रीद करता परिपत्र कभी न मिला हो, भले ही राम पटवा को किसी संपादक की ओर से रचना-आग्रही पत्र न मिला हो, भले ही राम पटवा के मित्र साहित्यकार कभी उनकी रचना के बारे में जिक्र करता हुआ पत्र न भेजते रहे हों। विष्णुजी जैसे सतत् सक्रिय और व्यस्ततम लेखक निर्मोही दिल्ली के निवासी होकर भी ताउम्र पत्र लिखते रहे हैं।यह न केवल श्री राम पटवा के लिए धरोहर है, उनकी निजी पूँजी है, बल्कि यह हिन्दी की उस महान विभूति के उदात्त व्यक्तित्व को सिद्ध करनेवाले दस्तावेज हैं जिसके लिए हिन्दी और हिन्दीतर दुनिया समान आदर देती है। राम पटवा को भले ही हिन्दी और साहित्यवाले अज्ञात कुल शील वाले साहित्यकार के रूप में देखते हों, कोई मायने नहीं रखता, जब उन्हें विष्णु प्रभाकर जैसा हिन्दी का सर्वाधिक लोकप्रिय और कालजयी लेखक हिन्दी का बडा लघुकथाकार मानता है। यह उन लोगों को भली- भाँति याद है जो दिल्ली के काफी हाऊस की नियमित बैठकों में विष्णु जी के साथ बौद्धिक विमर्श करते रहे हैं। श्री हिमांशु जोशी, मस्तराम कपूर, पंकज बिष्ट, स्व. भीष्म साहनी, स्व. श्रीमती शीला साहनी आदि हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकार गवाह रहे हैं जिन्हें विष्णुजी राम पटवा की लघुकथा पढकर सुनाते थे।
कहाँ देश की राजधानी दिल्ली का कद्दावर लेखक और कहाँ गाँव का लघुकथाकार। दोनों के मध्य ऐसा सघन और नियमित संपर्क का प्रसंग, भले ही साहित्यिक दुनिया में अब तक दुर्लभ न रहा हो, भविष्यत् समाज के लिए ताज्जुब का विषय तो हो ही जाएगा, जब चिट्ठी लेखन जैसा आत्मीय और अनिवार्य कर्म से मनुष्य लगभग मुक्त होगा। तब क्या ये पत्र याद दिलाते नहीं रहेंगे कि एक बडे लेखक का होना कैसा होना होता है। एक लेखक के लिए दुनिया तब भी कितनी विस्तृत थी। उसके लिए कोई पराया नहीं होता था। यह इस बात का भी प्रमाण दिलाता रहेगा कि सिर्फ बडे आलोचकों, संगठनों, पत्र-पत्रिकाओं की अनुशंसा बटोर कर ही. कोई लेखक, लेखक नहीं हो जाता और लेख तो वही जो अपने समय के सबसे बडे रचनाकार को भी अपने छवि-वृत में घेर-घेर लेता रहा हो और जो उसे भी साध्य कर देता रहा हो। बाध्यता या ग्राह्यता इतनी कि उसे अपनी आत्मकथा रचते वक्र्त भी बिसर पाना दुष्कर हो। जी हाँ, राम पटवा प्रभाकर जी की आत्मकथा में भी जगह घेरनेवाले लघुकथाकार हैं। विष्णु प्रभाकर राम पटवा को कभी नहीं भूल सके। वे जीवन के अंतिम दौर में लिखे आत्मकथा लेख (जीवन बस रास्ता ही रास्ता है-नवनीत, मई, 2009) में लिखते हैं-...हक्सर कमेटी ने सुझाव दिया था कि और अकादमियों की तरह साहित्य अकादमी के अध्यक्ष की नियुक्ति भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए पर अकादमी की कार्यकारिणी ने इस सुझाव को सर्वसम्मति से अस्वीकार कर दिया। काश, दूसरी अकादमियों में भी ऐसा हो सकता। अगर साहित्य अकादमी पर निर्णय थोप दिया जाता तो उसकी वही अवस्था होती जो मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ) के जाने-माने लघुकथा लेखक राम पटवा की लघुकथा में दो कबूतरों की हुई थी। कथा का सार इतना ही है कि दो कबूतर, एक मंदिर के कलश पर दूसरा मस्जिद के गुबंद पर रहते थे। कभी झगडा भी हो जाता होगा पर वह प्रेम को और भी सघन करता था।.... 
प्रसंगवश यह बताना भी जरूरी होगा कि शब्दशिल्पी विष्णुजी की कालजयी कृति अवारा मसीहा को अंतत: ज्ञानपीठ के योग्य नहीं समझा गया। इसका दुख मैं और मेरे जैसे हजारों पाठकों को क्या नहीं होता होगा?
वे राम पटवा की इस दो कबूतर नामक लघुकथा को देश भर में जहाँ भी जाते थे उदाहरण, उद्धरण के रूप में सुनाते थे। उनके आग्रह पर इसे लोकसभा अध्यक्ष के पास भी पटवाजी ने भिजवाया था। शायद अब तक उस पर कोई टिप्पणी पटवाजी को नहीं मिली है। राम पटवा तो ऐसे युवा लेखकों में रहे हैं। हों भी क्यों नहीं।यह दो कबूतर वाली लघुकथा बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के कहीं पहले लिखी गयी थी और जैसा लघुकथा में लिखा गया था आखिर वही हुआ बाबरी मस्जिद को लेकर। कथा में जो भविष्य-दृष्टि है वह और उसके साथ ही उसके कथ्य से विष्णुजी काफी वास्ता रखते, राम पटवा जब कभी दिल्ली जाते तो दोनों घंटों साथ गुज्जारते। दुनिया भर की बातें होतीं। घर के एक-एक सदस्यों के बारे में विष्णुजी पूछते। विष्णुजी भी राम पटवा के यहाँ पधारते थे, वे पटवाजी के बच्चों के छट्ठी-बरही तक का खयाल रखते थे। हर महत्त्वपूर्ण अवसर पर कोई न कोई उपहार पटवाजी के परिवार के लिए भेजा करते थे। यह महत्त्वपूर्ण बात नहीं है कि संबंधों के निर्वहन में अक्सर बडे रचनाकर भी उदास हो जाते हैं पर विष्णुजी इसके अपवाद थे। पटवाजी बताते हैं-विष्णु जी मन, वचन कर्म से गाँधीवादी थे। किसी का दुख और कष्ट जानकर उनका हल केवल मौखिक या लिखित सहानुभूति के सहारे नहीं बल्कि स्वयं आर्थिक पहल करने की हद तक भी चले जाते थे। वे अपने पारिश्रमिक में से कुछ रुपए बचाकर नियमित रूप से दक्षिण भारत के एक स्वतंत्रता संग्राम की जरूरतमंद बेटी के नाम मनीआर्डर करते थे।
मैंने पटवाजी के समक्ष अपने मन की बात रखी तो वे सकुचाते-सकुचाते अंतत: सहमत हो गए। बडे जतन से रखे सारे पत्र उन्होंने तत्काल उपलब्ध करा दिये। विष्णुजी बीमार रहते थे जब भी पटवाजी के पत्रों का जवाब देते थे। दोनों के मध्य बीस सालों तक आत्मीय पत्राचार चलता रहा है। पिता पुत्र की तरह। मित्र-मित्र की तरह। साहित्यिक गुरु और शिष्य की तरह। इन पत्रों को इसलिए भी महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए क्योंकि दिल्ली में रहकर भी एक प्रख्यात गाँधीवादी रचनाकार शायद राम पटवा जैसे ग्रामीण लेखकों के माध्यम से गाँवों से जुडे रहना चाहते थे। गाँवों की तासीर के बारे में लगातार रू-ब-रू होना चाहते रहे थे। गाँधी की तरह वे भी भारत की तासीर जानने के लिए गाँव-घर के युवाओं से जुडे रहे। इन पत्रों की गरिमा यही है कि ये पत्र हिन्दी के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और  स्वनामधन्य रचनाकार की ओर से एक अल्पज्ञात (और आलोचकों की दृष्टि में लगभग हाशिए पर रहनेवाले ग्रामीण कथाकार) युवा लेखक को संबोधित हैं। भले ही ये पत्र बहुत छोटे-छोटे हैं किन्तु इन संबोधनों में सच्चे मायने में एक बडे रचनाकार के उदार और अत्यंत संवेदनशील व्यक्तित्व की गवाहियाँ भी हैं। ऐसे समय में जब पत्र लिखने की परंपरा नए तकनीक और संचार के साधनों के हाथों लगातार ध्वस्त हो रही है, इन पत्रों के बहाने हम पत्र लेखन के आस्वाद और अनुभव से फिर से जुड सकते हैं। हम तो ऐसा सोचते, जाने आप क्या सोचते हैं?. 

जयप्रकाश मानस
बसंत पंचमी,
5 फरवरी 2010
एफ-३, छत्तीसगढ माध्यमिक शिक्षा मंडल
आवासीय परिसर, पेंशनवाडा, रायपुर
छत्तीसगढ-492001



अंतरंगीय संस्मरण 
शब्द शिल्पी विष्णु प्रभाकर के संग राम पटवा
 ''दो तली हुई ब्रेड के साथ कॉफी ले आना हनुमान !

हनुमान कनॉट पलेस के मोहनसिंह पैलेस स्थित कॉफी हाऊस के उपरी मंजिल पर स्थित, एक चिर-परिचित बैरा, जो रोज शाम को 5 बजे, विष्णु जी के लिए नियमित दिनचर्या के अंतर्गत, ब्रेड और कॉफी लेकर हाजिर हो जाता था। 11 अप्रैल 09 को कॉफी हाऊस के कर्मचारीगण और वहाँ रोज आने-जाने वाले साहित्यकार, पत्रकार एवं गणमान्य नागरिकगण उनके देहावसान के शोक में डूब गये होंगे।
अजमेरी गेट के पास कुण्डेवालान के घर में जब तक विष्णु जी रहे, तब तक वे रोज शाम को पाँच बजे नियमित रूप से कॉफी हाऊस आते थे, और रात आठ बजे के पहले घर लौट जाया करते थे। जनवरी 1987 में मेरी पहली मुलाकात आंध्रप्रदेश के राजमहेन्द्री शहर में हुई, तब से लेकर मृत्यु के कुछ माह पूर्व तक उनसे पत्राचार एवं दूरभाष पर उनके स्वास्थ्य 'एवं पारिवारिक चर्चाएँ होती रहीं।
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय नई दिल्ली द्वारा आयोजित एक हिन्दी नवलेखक शिविर के राजमहेन्द्री में वे मुख्य अतिथि-थे। सात दिवसीय इस आयोजन में उनके साहित्यिक सत्संग का मुझे भरपूर लाभ मिला। मेरी साहित्यिक रुचियों को उनका स्नेह और शुभाशीष मिला। आज भी उनके 60-70 पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं जो मेरे लेखन कर्म एवं परिवार से सम्बंधित पत्र हैं। '
विष्णु जी के जीवन और साहित्य में शरत् के मूल तत्व प्रेम, गाँधी की अहिंसा और टैगोर की भौतिकता का मिला-जुला स्वरूप एक साथ देखने को मिलता है। विष्णु जी एक निर्विवाद लेखक रहे, आवारा मसीहा कृति को उनकी साहित्य साधना और धर्मपत्नी सुशीलाजी की तपस्या का वे परिणाम मानते थे। आवारा मसीहा पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार के सम्मान समारोह में महाकवि दिनकर ने कहा था कि पुरस्कार तो विष्णु जी को मिलना चाहिए लेकिन बधाईयाँ सुशीला को। सुशीला जी एक सफल गृहणी के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता प्रसन्न चित्त एवं हँसमुख महिला थीं।
विष्णु जी से भेंट होने का मुझे कई बार अवसर मिला जब-जब उनसे भेंट हुई, देश के राजनेताओं के आव्वरण एवं देश की वर्तमान दशा दुर्दशा पर ही वे दु:ख व्यक्त करते हुए पाये गये। देश की सामाजिक अस्थिरता का दोष, देश की स्वार्थपरक राजनीति को मानते थे। व्यवस्था के उस चौखट पर आम आदमी के फूटते हुए सिर की चिंता, उनके चिंतन का केन्द्र बिंदु होता था। उनका मानना था कि एक कोहरा है जो वाला है।'' वे यह भी कहा करते थे कि राम को सत्ता की कोई लालसा नहीं थी, लेकिन राम के नाम पर सत्ता हथियाना या चेष्टा करना उचित प्रतीत नहीं होता।''
मुझे अपने शब्दों से प्यार है, संवेदना मनुष्य को मनुष्य बनाती है, क्रांति साहित्यकार नहीं करता, वह तो बीज बोता है, साहित्य में गर शरण नहीं होती तो आत्महंता कहलाता। ऐसे वाक्यों को अपने विचारों एवं लेखनी में लय देने वाले महान शब्द शिल्पी आज हमारे बीच नहीं हैं।यह एक अपूर्णीय अति है, देश और समाज के लिए।
मेरी एक लघुकथा, रायपुर (छत्तीसगढ) से प्रकाशित, दैनिक समाचार पत्र समवेत शिखर द्वारा वर्ष 1992 में आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित हुई बाद में वह देश के अनेक पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुई और चर्चा का विषय भी बना। 17 फरवरी 1993 को साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह के मुख्य आतिथ्य में प्रभाकर जी ने मंच पर मेरी उस अतिथि कबूतर की प्रशंसा करते हुए सभागार में सुनाये, इसके बाद उन्होंने देश के 100 मंचों पर इस लघुकथा को सुनाया। मैं अपने आपको बहुत भाग्यवान मानता हूँ और मेरे सम्पूर्ण लेखन कर्म का श्रेय विष्णु जी को देता हूँ उनका आशीर्वचन मुझ जैसे सामान्य लेखक पर आज फलीभूत हुआ है। मार्च 1993 को मेरा दिल्ली जाना हुआ, शाम को मैं मोहनसिंह पैलेस कॉफी हाऊस पहुँचा, वहाँ विष्णुजी आ गए थे, चरण स्पर्श किया वहाँ मौजूद डॉ. मस्तराम कपूर, हिमांशु जोशी, भीष्म साहनी, शीला साहनी, पंकज विष्ट एवं दिल्ली के ख्याति नाम साहित्यकारों, पत्रकारों के बीच उन्होंने मेरा परिचय कराया, इन क्षणों को बिसार पाना मेरे वश की बात नहीं।
विष्णु जी को खासकर बंगाली मिठाइयाँ बहुत पसंद थीं, मैं उनसे कहता था कि बाबूजी, आवारा मसीहा के कारण पूरा बंगाल आपसे जुड गया, आप बंगाली भी बोल लेते हैं, इसलिए बंगाली मिठाइयाँ आपको बेहद पसंद हैं। शाम 7:30 बजे हम दोनों रिक्शे से बंगाली मार्केट गए, वहाँ मैंने मिठाइयाँ खरीदीं, उन्हें खिलाया और कुण्डेवालान छोडकर वापस आया। उनका मिजाज हर परिस्थिति में खुशमिजाज रहता था। अपने नित्य लेखन कर्म से अर्जित धन राशि से अपनी स्व. धर्मपत्नी सुशीला प्रभाकर के नाम से पीतमपुरा के महाराणा प्रताप इन्क्लेव में एक मकान बनवाया। पत्नी के निधन का उनके जीवन पर गहरा आघात लगा, जो अंतिम दिनों तक जीवित रहा। इन्हीं आघातों ने उनके लेखन कर्म को झंकृत कर दिया, और उस झंकार को वे सुनते रहे, सुनते रहे।
पीतमपुरा के नवनिर्मित मकान को उन्होंने किराये पर एक किरायेदार को दे दिया। किरायेदार ने वर्षों तक न किराया दिया न घर छोडा और विष्णु जी के साथ बदसलूकी करने पर उतारू हो गया। इस घटना से उन्हें काफी मानसिक कष्ट हुआ। नीचे स्तर पर उनकी शिकायतों परं जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तब इसकी शिकायत, राष्ट्रपति भवन, प्रधान मंत्री, कार्यालय तक हुई। इन शिकायतों पर कुछ नहीं हुआ, फिर पार्लियामेंट में इस मुद्दे को उठाया गया। एक लम्बा समय इस कार्य में बीत गया, जिससे उनका लेखन कार्य विशेष रूप से प्रभावित हुआ। अंत में शासन द्वारा घर खाली करवाया गया, विष्णु जी जब वहाँ रहने लगे तब कहीं उन्हें शांति सुकून मिला।
फरवरी 2002 में दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में मेरी उनसे भेंट हुई, उस समय उन्हें आँखों की परेशानी थी, घुटनों में दर्द था, फिर भी लेखन की निरंतरता बनी रही। मैंने उन्हें उसी समय कहा था कि एक बार दिल्ली से निकलकर कहीं विश्राम कर लें, अच्छा होता कि आप भोपाल आ जाते और मेरे यहाँ आकर रुकते। उन्होंने कहा ठीक है मार्च प्रथम सप्ताह में नागपुर से लौटते समय भोपाल में तुम्हारे यहाँ आ मैं प्रसन्नता से भर गया। वे 6 मार्च 2002 को रात्रि 8 बजे भोपाल स्टेशन पहुँचे, गाँधी ट्रस्ट भोपाल के, श्री भार्गव जी के साथ मैं स्टेशन पर उनका इन्तजार कर रहा था, मेरा मन प्रसन्नता, और उत्साह से भरा हुआ था। स्थानीय समाचार पत्रों में भी उनके भोपाल आगमन का समाचार प्रकाशित हो चुका था कि विष्णु प्रभाकर भोपाल आ रहे हैं। वे मेरे निवास में 12 मार्च तक रुके, मेरे बच्चों को उनका स्नेह, दुलार और शुभाशीष मिला। 10 मार्च को मेरी बेटी संगीता के जन्मदिन पर उपस्थित रहना, मेरे परिवार के लिए अविस्मरणीय घटना है। राजधानी में कई जगह उनके कार्यक्रम रखे गये, इसी बीच स्वराज भवन भोपाल में आयोजित, एक कार्यक्रम वे मुख्य आतिथ्य में बोलते हुए उन्होंने कहा था कि इस देश में अव्यवस्था का जिस तरह कोहरा छाया हुआ है, कोहरा चाहिए तभी इस देश का भला हो सकेगा।
12 मार्च 2002 को वे दिल्ली लौट गये इसके बाद अप्रैल 2002 में मैं रायपुर, छत्तीसगढ आ गया, यहाँ से भी उनसे निरंतर सम्पर्क बना रहा। उनकी बडी तीव्र इच्छा एक बार रायपुर आने की थी, बार-बार उन्होंने दूरभाष और पत्रों में जिक्र भी किया है। मेरे द्वारा उनकी इस इच्छा को पूरा न कर पाने का दु:ख मुझे जीवन भर सालता रहेगा। मार्च 2005 में बकशी सृजन पीठ के अध्यक्ष श्री बबन प्रसाद मिश्र द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में उनके रायपुर आने की स्वीकृति मिल चुकी थी, मिश्र जी के इस प्रयास को नमन करता हूँ, लेकिन ऐन वक्त पर घुटनों के दर्द के कारण वे रायपुर न आ सके इसका दु:ख मिश्रजी को आज भी बना हुआ है। उन्होंने प्लेन के टिकट की भी व्यवस्था करवा ली थी।
विष्णु जी स्मृतियों के शहंशाह थे। आवारा मसीहा के लेखन कार्य के 14 वर्षों के कठोर संघर्षों के दास्तान, तारीख और समय सहित, हमेशा सुनाते थे। उनकी स्मृति इतनी तेज थी कि जब डॉ. इन्दिरा मिश्र पांडिचेरी में पढ रही थीं, अपने मामा के यहाँ, तब विष्णु जी भी वहाँ ठहरे थे। उनके मामा उनके अच्छे दोस्त थे। उन्होंने डॉ. इंदिरा मिश्र जी पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव छत्तीसगढ शासन को मेरे मार्फत आवारा मसीहा का हस्ताक्षर युक्त पुस्तक भिजवाए थे। मेरे मित्रों में श्री संतोष रंजन शुक्ल, श्री जयप्रकाश मानंस, डॉ. सुधीर शर्मा आदि और भी मित्रों ने, विष्णु जी से दूरभाष पर बातचीत हुई थी।
बस आज उनकी स्मृतियाँ और उनकी कृतियाँ ही हमारे समक्ष हैं इस कालजयी शब्द शिल्पी लेखक की लेखनी से हिन्दी साहित्य का भंडार भरा हुआ है। 11 अप्रैल 09 को, अपनी कलम को सिसकते हुए छोड कर, हम सबसे, सदा के लिए अलविदा हो गये।

अतिथि कबूतरराम पटवा
रोज सुबह एक छत पर दो कबूतर मिला करते थे। दोनों में घनिष्ठ मित्रता हो गई थी। एक दिन दूर खेत में दोनों कबूतर दाना चुग रहे थे, उसी समय एक तीसरा कबूतर उनके पास आया और बोला, '' मैं अपने साथियों से बिछङडु गया हूँ। कृपया आप मेरी मदद करें।''
दोनों कबूतरों ने आपस में गुटर-गूं किया, '' भटका हुआ अतिथि है...अतिथि देवो भव:,'' लेकिन प्रश्न खडा हुआ कि यह अतिथि रुकेगा किसके यहाँ ? दोनों कबूतर अलग-अलग जगह रहते थे, एक मस्जिद की मीनार पर तो दूसरा मंदिर के कंगूरे पर।
अंतत: यह तय हुआ कि अतिथि कबूतर को दोनों कबूतरों के साथ एक-एक दिन रुकना पडेगा।
तीसरे दिन ' अतिथि' की भावभीनी विदाई -हुई। दोनों मित्र अतिथि कबूतर को दूर तक छोडने गए। शाम को जब वे लौटे तो देखा---मंदिर और मस्जिद के कबूतरों में 'अकल्पनीय' लडाई हो रही है। इस दृश्य से दोनों स्तब्ध रह गए। बाद में पता चला कि अतिथि कबूतर संसद की गुंबद से आया था।


818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 21-2-87
प्रिय भाई,
आपका पत्र मिला था। लेकिन अत्यन्त व्यस्त रहने के कारण उत्तर शीघ्र न दे सका। इधर साहित्य अकादमी के समारोह चल रहे हैं उनके पूरा होने पर मुझे गुरुकुल कांगडी, हरिद्वार जाना है और वहाँ से लौटकर अहमदाबाद। मार्च तक यही स्थिति रहेगी। आप लोगों से मिलना हुआ अच्छा लगा मेरी कामना है कि आप निरन्तर आगे बढते रहें।
और सब ठीक है।
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया,
रायगढ (मध्यप्रदेश) 496554


818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 6-12-87

प्रिय आत्मन्
सुना है
विदा की बेला में व्यथित
व्याकुल बोले थे दिवाकर
कौन करेगा आलोकित
भू को अब। ५
आगे बढ कर तब एक दीपक ने
आश्वस्त किया था उन्हें।
इन शब्दों में - मैं हूँ न प्रभु।
आइये आप निश्चित होकर।
तभी से इस अमा निशा में,
हाथ में लक्ष -लक्ष दीप लिये :
आती है दीपमालिका प्रतिवर्ष
करने को प्रणाम उस लघु दीप को
पर उसे तो बुझा दिया था
हमने स्वयं अपने हाथों से
सुकरात ईसा गाँधी कीं तरह
तलाश है आज भी
उसी नन्हें दीप की
चीर सके जो अन्तस
आज के तमस का और
जहर मीरा
बार बार आलोकित करने को
इसी धरा को "
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया, रायगढ मध्यप्रदेश

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 19-4-90
प्रिय आत्मन्
आपने मुझे बधाई दी, आभारी हूँ पर मै तो निमित हूँ सम्मान तो सृजन का है मुझे तो आपका प्यार चाहिये तो मिलता रहा है और मिलता रहेगा। यह मेरी उपलब्धि है।
शेष शुभ।
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया,
रायगढ म. प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 13-2-91
प्रिय भाई,
आपका 1 तारीख का पत्र मिला आपके विचारों के लिए आभार, पर सारिका तो नये रूप मे भी नहीं चल सकी, सुना है बन्द हो गयी है।
'शरीर से परे' बातों की पसन्द थी। अपनी अपनी रुचि है फिर मुझे ही पत्रिका फिर छापनी पडेगी यह सम्भव नहीं दिखता।
इधर मेरा स्वास्थ्य उच्च रक्तचाप के कारण काफी खराब रहता है। आँखों में मोतियाबिन्द है। इस मास के अन्त में ऑपरेशन करवाना ही है और सब पूर्ववत। सबको स्नेह स्मरण।
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया, रायगढ

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 17-03-91
प्रिय,
आपका पत्र मिल गया था आपने समाचार में सिर्फ एक दवा लेने का सुझाव दियां धन्यवाद। मेरा छोटा भाई अपूर्व नाम है। मैं उससे बातचीत करके निश्चय करूंगा।
दूसरा नाम पता लगाएँ तो बताइएगा।
सबसे मेरा स्नेह
स्नेह
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया, रायगढ म. प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 22-1-92
प्रिय भाई,
आपका पत्र मिला चौथा विश्व हिन्दी सम्मेलन अमरीका में होने वाला है यह सूचना मुझे कई वर्ष पहले मिली थी इसके बाद क्या हुआ
कुछ पता नहीं। दिल्ली में इस संबंध में कोई चर्चा नहीं है। इसलिए इस संबंध में मैं कुछ नहीं बता सकता हाँ, किसी दिन पता लगा तो निश्चित रूप से सूचना दूंगा।
शेष शुभ हार्दिक शुभकामनाओं सहित
आपका
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा,
सरिया, रायगढ (म.प्र. )

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 14-5-92
प्रिय भाई,
आपका पत्र पाकर बहुत खुशी हुई यह जानकर बहुत ही खुशी हुई कि आप एक माह तक पत्रकारिता पाठ्यक्रम में भाग लेने के लिए भोपाल में रहेंगे। यह बहुत अच्छा कार्यक्रम है। अभी तक हमारा ध्यान गाँव तक नहीं गया था मुझे आशा है कि आप इसका समुचित लाभ उठाएँगे।
गाँधी भवन न्यास का ट्रस्टी होने के कारण मैं भोपाल आता रहता हूँ लेकिन चार जून तक आने की कोई आशा नहीं है अगर आ सका तो आपसे अवश्य मिलूँगा। वहाँ मेरे कई मित्र हैं कोई बात हो तो लिखिएगा।
शेष शुभ
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
राष्टरीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय संस्थान
ई -8। 76 शाहपुरा भोपाल

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 26-6-92
प्रिय भाई,
आशा करता हूँ आप स्वस्थ और प्रसन्न हैं आपका पत्र यथासमय मिल गया था लेकिन इधर मैं बहुत व्यस्त रहा आँखों के कारण। मैं बहुत काम नहीं कर पाता। 21 जून को मेरे अस्सी वर्ष पूरे हो गये उसके बाद मैंने यह निश्चय किया है कि अब मैं सार्वजनिक जीवन में भाग नहीं लूँगा। आप जैसे अनेक मित्र अनेक बातें लिखते हैं उनका समाधान करना अब मेरे लिए संभव नहीं है। साइनस का दर्द होने के कारण बोलने पर भी पाबंदी लग गई है।
मैं चार से छ: जून तक भोपाल में रहूँगा कारणवश आप इधर हो तो गाँधी भवन में पता कर लीजिए।
समय देने का तो अब कोई प्रश्न नहीं बिना सूचना के ही बहुत लोग आ जाते हैं अब मैं इन सब बातों से मुक्ति चाहता हूँ।
आशा है आप मेरी स्थिति को समझ सकेंगे आपने ग्रामीण पत्रकारिता का कोर्स पूरा कर लिया उसके लिए मेरी स्नेही बधाई स्वीकार करें।
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

प्रति
श्री राम पटवा, ई
सरिया, रायगढ म.प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 20-11-92
प्रिय भाई,
आपका पत्र मिला।
आपकी लघु कथा पढकर बहुत आनन्द आया कॉफी हाऊस में मैंने अपने मित्रों को वह लघुकथा सुनाई सभी ने उसकी प्रशंसा की आशा है
आप भविष्य में भी ऐसी ही रचनाएँ देते रहेंगे और पुरस्कार पाते रहेंगे।
क्या आप इस लघुकथा की एक प्रतिलिपि लोकसभा के अध्यक्ष को नहीं भेज सकते।
और सब पूर्ववत्
सस्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया, रायगढ म. प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 21-12-92
प्रिय भाई,
आपका पत्र मिला था लेकिन इधर हम कर्पर्यु के कारण बहुत परेशान रहे एक बार तो मैं गिरफ्तार भी हो गया था लेकिन अब स्थिति
कुछ सामान्य हो रही है। आपकी लघुकथा यहाँ कफी पसन्द की गयी पता नहीं स्पीकर साहब क्या समझेंगे।
आप दिल्ली आए और भेंट नहीं हो सकी फोन करके आ सकते थे पर शायद आपके पास नम्बर नहीं होगा, अब नोट कर लीजिए 733506। इधर मेरी तबीयत ठीक नहीं है और आँखों में कष्ट बराबर बना हुआ है इसलिए मुझे काम करने में बडी कठिनाई होती है जनवरी में दूसरी आँख के ऑपरेशन के बारे में निर्णय होगा चश्मा भी बदलना पडेगा तब शायद हालत कुछ ठीक हो जाए।
शेष शुभ
सस्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
पो. आ. सरिया रायगढ जिला म.प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 7-1-93
प्रिय भाई,
आपके लेख की प्रतिलिपि मिली राम की कथा को हर व्यक्ति ने अपनी अपनी दृष्टि से देखा है। मैंने नवभारत टाइम्स में एक छोटा सा लेख लिखा था और उसमें कितने ही राम गिनाए थे। वास्तव में राम ऐतिहासिक नहीं, पौराणिक पुरुष है और उस युग के मूल्यों के प्रतीक हैं जब आर्य लोग पशु चराना छोडकर खेती करने लगे थे, और नदियों के किनारे बस्तियाँ बसाई थीं। ऐसे समय ही वर्ण व्यवस्था और आदर्श मूल्यों का निर्माण हुआ था उसी को किसी कवि ने कथा का रूप दिया। अगर यह भी मान लें कि राम कभी हुए थे तो भी वह कुछ मूल्यों के प्रतीक थे। सत्ता का व्योम, अन्याय की प्रतिकार, साधुजनों की रक्षा और जितने भी पिछडे वर्ग हैं उनको समान स्तर पर लाकर आज जो राम का नाम ले रहे हैं उनमें से कोई भी इन मूल्यों को नहीं मानता। बौद्घ दर्शन में तो यह आता है कि साकेत
कभी किसी राजा की नगरी रही ही नहीं वह तो व्यापार नगरी थी। दशरथ बनारस के राजा थे बौद्ध जातक में यह कथा दी हुई है। सीता किसी के गर्भ से पैदा नहीं हुई थी सीता का अर्थ है जुती हुई जमीन। वाल्मिकी स्वयं शुद्र जाति के थे। क्रौचचध के बाद उनके मन से स्वत: ही कविता फूट पडी वह बदल गए और उन्होंने एक आदर्श पुरुष की कल्पना करके रामकथा लिखी यह केवल अयोध्या काण्ड ही लिख पाए थे ऐसे ही अनेक कथानक हैं। लोकगीत में तो और भी विचित्र बातें बताई गई हैं। आज तो राजनीतिज्ञों ने मांगने का साधन बनाया हुआ है राम के मूल्यों से उन्हें कोई मतलब नहीं।
शेष शुभ सबको मेरा स्नेह स्मरण
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा,
सरिया, रायगढ म.प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 24-१-9353
प्रिय आत्मन्
धरम-धमाधम, धम-धमाधम, धम-धमाधम
लो आ गया एक और नया वर्ष
ढोल बजाता, रक्त बहता
हिंसक भेडियों के साथ द
ये वे ही भेडिये हैं
डर कर जिनसे
की थी गुहार आदिमानव ने
अपने प्रभु से
दूर रखो हमें हिंसक भेडियों से
हाँ ये वे ही भेडिए हैं
जो चबा रहे हैं इंसानियत इंसान की
और पहना रहे हैं पोशाकें उन्हें
सत्ता की, शैतान की, धर्म की, धर्मन्धिता की
और पहनकर उन्हें मर गया आदमी
सचमुच
जी उठी वर्दियाँ और कुर्सियाँ
जो खेलती है नाटक
सद्भावना का, समानता का
निकालकर रैलियाँ लाशों की
मुबारक हो, मुबारक हो
नयी रैलियों का यह नयां युग
तुमको, हमको और उन भेडियों को भी
सबको मुबारक हो
धम-धमाधम, धम-धमाधम, धम-धमाधम

विष्णु प्रभाकर

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
4.2.93
प्रिय भाई,
आपने अपनी कहानी का कटिंग भेजा है। किसी तरह पढ गया और मझे वह लघु-कहानी बहुत अच्छी लगी। मुझे विश्वास है कि आप निरंतर शांति के साथ लिख सकेंगे।
मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया, रायगढ
म.प्र.
818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 20-2-93
प्रिय भाई
आशा है आप स्वस्थ और प्रसन्न होंगे। 17 तारीख को साहित्य अकादमी का पुरस्कार वितरण समारोह हुआ था उसमें मैं विशिष्ट अतिथि
था। अपने भाषण मे मैंने आपकी वहे कबूतरों वाली लघुकथा किसी संदर्भ में सुनाई थी आपका नाम मैंने नहीं लिया था बल्कि यह कहा था कि मैं अपने युवा मित्र की एक कहानी सुनाता हूँ। उस कहानी पर काफी तालियाँ पीटी गईं, उसे नवभारत टाइम्स और जनसत्ता दोनों ने छापा। शहर में भी काफी चर्चा हुई लेकिन रेडियो ने अपनी रिपोर्ट में मेरा भाषण तो दिया लेकिन इस कथा की चर्चा नहीं की। शायद इसलिए कि इसमें संसद पर आक्षेप है इसीलिए मैंने भी आपका नाम नहीं लिया था आपने स्पीकर को यह कथा भेजी थी क्या वहाँ से आपको उत्तर मिला। और सब पूर्ववत् है मेरी वही स्थिति है इस बार आप दिल्ली आएँ तो अवश्य मिलें।
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
पो. सरिया मध्यप्रदेश

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 24-2-93
प्रिय भाई,
पत्र मिला अच्छा है पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ कर सको, रुचि और कार्य के प्रति निष्ठा हो तो सफलता मिल सकती है। मेरा पत्र मिला होगा तुम्हारी वह कविता मेरे भाषण के साथ हिन्दी अंग्रेजी सभी में छपी है नाम मैंने नहीं लिया था बस यही कहा था कि मध्यप्रेदश के युवा लेखक ने यह लघुकथा मुझे भेजी है। पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा था मित्रों में भी चर्चा हुआ उन्हें तो मैंने नाम बता दिया था। मेरी आँखें बहुत कष्ट दे रही हैं। परेशान हूँ आजकल सहयोगी भी नहीं है।
शेष शुभ
सस्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
शैलेन्द्र भवन
सरिया, रायगढ (म.प्र.)
496554

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 26-3-93
प्रिय भाई,
तुम्हारा पत्र मिला।
साथ ही लघुकथा भी।
यह लघुकथा भी बहुत अच्छी है मुझे विश्वास है कि आप इसी तरह लिखते रहेंगे और आपकी लघु-कथाएँ लोकप्रिय होंगी। आजकल इस
विधा के बहुत पंडे सामने आ रहे हैं जो संग्रह निकालने की बात करते रहते हैं। आप उनके चक्रव्यूह में न फंसिए। मैं नहीं जानता आपने कितनी लघुकथाएँ लिखी हैं। जब संग्रह लायक हो जाएँ, तब संग्रह निकालने की सोचिएगा। आपकी उस लघुकथा की चर्चा तो अब भी होती रहती है।
मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया, रायगढ
म.प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 8-4-93
प्रिय भाई,
तुम्हारा पत्र मिला। सुविधानुसार अपना काम करते रहो शीघ्रता करने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक मेरे दो शब्द लिखने का सम्बन्ध है, वह काम मैं अब नहीं कर सकता। क्योंकि स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया है और एक आँख की रौशनी समाप्त जैसी है इसलिए यह सब काम मुझे छोडने पडे। डॉक्टर ने विशेष रूप से अब मना कर दिया है क्योंकि प्रतिदिन एक बंधु तो यह प्रार्थना लेकर आ ही जाते हैं। फिर भी सचमुच दो शब्द ही मैं अवश्य लिख दूँगा।
शेष शुभ
सस्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया
रायगढ म.प्र.

818, कुण्डेवाल्ब्लान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनोक 1 §1-5-93
प्रिय भाई,
आपका पत्र मिला।
आवारा मसीहा काम ते शुरू हेगया है पर अभी 3-4 मह लगेंगे।
मैं कल त्रिचनापल्ली जा रहा हूँ। जून तक। उसके बाद आप आने का प्रोग्राम बनाइये अचछा होगकि आप इस भयंकर गरम्न्नी के बाद आएँ।
हार्दिक शुभकामनाओं सहित।
सस्नेह
विष्णु प्रभाकर

श्रीराम पटवा,
सरिया, रायगढ
म.प्र.

818, कुण्डेवलालान, अजमेरी गेट
दिल्ली - 110006
8-6-93
प्रिय भाई,
आपका पत्र मिला।
मेरी कामना है कि के. के. बिडला फाउन्डेशनल स्कॉलरशिप अवश्य मिले।
दिल्ली में आएँगे तो मिलना होगा ही। आवारा मसीहा पर धारावाहिक श्री प्रेम कपूर बना रहे हैं वही इसकी सारी व्यवस्था कर रहे हैं आपकी उसमें रुचि होने पर भी उनसे मिलना न हो सकेगा क्योंकि अभी तो वह शूटिंग के लिए भागलपुर जा रहे हैं आप इधर आएँगे तो मिलवा दूँगा।
मैं इधर आँखों के कारण परेशान हूँ। आपका पत्र भी नहीं पढ पाया लेकिन यह सब तो चलता ही रहेगा।
जब निश्चय हो जाए तो मुझे अवश्य लिखें सबको स्नेह स्मरण।
सस्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
सरिया, रायगढ
म.प्र. 496554 ई

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 27-7-93
प्रिय बन्धु
आपका पत्र मिला।
आप यहाँ आए तो हम लोगों को भी अच्छा लगा वैसे दिल्ली रहने के लिए बहुत अच्छी जगह नहीं है फिर भी यदि आपको काम मिल जाए तो आपको लाभ ही होगा।
कपूर साहब दिल्ली लौट आए हैं और मैंने आपका पत्र उनको दिखा दिया है अब यह उन पर निर्भर करता है कि वह आपको कब जवाब देते हैं।
मेरा स्वास्थ्य पूर्ववत् है। काम चल ही रहा है।
हार्दिक शुभकामनाओं सहित
सस्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा,
लेखक/स्वतंत्र पत्रकार
सरिया, रायगढ म.प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - ७
दिनांक 25-10-985
प्रिय बन्धु
पत्र मिला मैंने राह तो देखी थी पर समझ गया था कि आप चले हैं नहीं तो कॉफी हाऊस अवश्य आते। जब सम्भव हो आवें।
सबको मेरा स्नेह पूर्ववत है। दशहरा दीवाली के कारण सभाओं दौर चलेगा।
हार्दिक शुभकामनाएँ लें।
सस्नेह
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा,
सरिया, रायगढ
म.प्र.

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 16-12-93

पद्म मिला। मैं नागपुर चला गया था केवल चार दिन के लिए। अन्ना शेवडे पुरस्कार वितरण समारोह था। मैं एक निर्णायक था। उसी
है था। अब 23 को कलकत्ता जा रहा हूँ। 26 को पुरस्कार मिलेगा। इसी विश्वविद्यालय ने मुझे डी. लिट्, की मानदू उपाधि देने की $" की है। मैंने प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया है। पर 20 ता. को जा हु गा। वे कलकत्ता आकर मिलेंगे। तभी उपाधि पत्र भी दे देंगे।
आपकी लघुकथा बहुत अच्छी है। पर छापे की इतनी भूलें हैं कि उठता है।
शेष शुभकामनाओं सहित
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

ही राम पटवा,
शैलेन्द्र सदन,
कया रायगढ

818, कुण्डेवलालान, अजमेरी गेट
दिल्ली - 110006
दिनांक 28-1-94
प्रिय भाई,
आपका पत्र मिल गया था। आप लखनऊ से दिल्ली नहीं आ पाएँ, यह आवश्यक भी नहीं कि आप हर बार आएँ। अपनी सुविधा से काम करना चाहिए। एक संग्रह के योग्य जब आपकी लघु कथा हो जाए तो कहीं से प्रकाशित करवाने का प्रयत्न कीजिए। आप कौ वो एक कथा बहुत चर्चित हो रही है मैंने शायद लिखा था। मैंने कलकत्ता में भी गुजराती साहित्य सम्मेलन में सुनाया था।
मेरा स्वास्थ्य पूर्ववत् है आँखें और सिर दर्द बहुत परेशान करते हैं जब तक पढना-लिखना है यह दोनों परेशान करेंगे बस अब भाषण देने नहीं जाता हूँ।
सबको मेरा स्नेह स्मरण
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
शैलेन्द्र सदन सरिया
रायगढ म.प्र.
शेखचिल्ली

नहीं दे सका जवाब मैं
आपकी शुभकामनाओं का,
भेजी थी जो आपने
नव-वर्ष के आगमन पर
होली के उल्लसित उन्माद पर
क्यों हुआ ऐसा
क्योंकि मैं डूबा रहा
अपने ही अहम् की तलैया में
और घिरा रहा अन्धकार की शक्तियों से
जो उगती आ रही थी कुकुरमुत्तों की तरह
सच यह भी है
कि चौंक उठा था मैं
रोशनी की आडी तिरछी लकीरों से
किसी की खिल्ली उडाती खिलखिलाहट से
पहचाना आपने
किसकी है यह खिलखिलाहट
हा, हा, हा पहचान लिया
यह तो शेखचिह्ली है
रहता है मेरे ही अन्तर में
उँगली थामें शैशव की
बगल में समेटे कैशोर्य को
खिलखिला रहा है विदूषक की तरह
सामने खड्डा पंजों और
लपलपाती जीभ वाला भेडिया
वह भी तो निवासी है
मेरे ही अन्तर लोक का
उसी की आँखों में आँखें डाले
वह शेखचिल्ली
खिलखिलाकर कह रहा है
मैं नहीं डरता तुमसे
मेरे साथ शैशव है,
कैशोर्य है
मैं नहीं छिपाता अपने को
मैं निखूट शेखचिल्ली हूँ
मैं नहीं आरोपित करता अपने को
किसी पर, तुम पर भी
तभी तो तुम्हारे ये पंजे
यह रक्त की प्यासी लपलपाती जीभ
मुझे छू भी नहीं सकती
दोस्तो
मैं चकित भी था और विस्मित भी
मैं हतप्रभ भी था और शर्मसार भी
क्योंकि
मैं नहीं कर रहा था वह सब
जो कर रहा था वह मेरा अपना
अन्तर ही तो है
शेखचिल्ली
मेरा अन्तर वासी ही तो है
इसीलिए नहीं दे सका जवाब,
आपकी मंगल कामनाओं का
क्षमा चाहता हूँ पर
एक प्रार्थना भी करता हूँ कि
एक बार आप मुलाकात कर लें
उस शेखचिल्ली से
जो कहीं और नहीं है
है तुम्हारे अपने अन्तर में
और
खिलखिला रहा है
सपनों के महल बना रहा है
आरोपित नहीं कर रहा है अपने को
किसी पर,
तुम पर,
मुझ पर,
इस पर,
उस पर।

विष्णु प्रभाकर
2.4.94

818 कुण्डेवालान,
अजमेरी गेट, दिल्ली 1100066
दिसम्बर 1994
प्रिय आत्मन,
दीपावली एवं नव-वर्ष की शुभकामनाओं के प्रत्युत्तर में मेरी भी शुभकामनाएँ स्वीकार करें।
मरती है मृत्यु ही बार-बार
मृत्यु पथ पर जाते हुए
पूछ लिया मैंने स्वयं मृत्यु से,
तुम नहीं मरती क्या कभी ?
चौंकी नहीं वह, हंस आई
फिर आह भरकर बोली
भोले प्राणी, यह मैं ही तो हूँ जो
मरती हूँ बार-बार
मुक्त करने को तुम्हें,
मृत्यु लोक के छल-प्रपंचों से,
कथनी-करनी के अन्तर से,
जो नहीं हो, वही दिखने के जघन्य पाप से
जिसे मानते हो विधाता, उसी को बन्द कर देते हो
मंत्रों में, आयतों में
कांकर-पाथर के पूजा घरों में
और ठगने के गुनाह से बच जाते हो उसी को
जो तुम्हारा सबसे अपना है
तुम करते हो घोषणा बार-बार
दर्द भरे शब्दों में,
शराब, सिगरेट, जुआ, लौटरी
सब घातक हैं
तन के लिए, मन के लिए और धन के लिए
त्याग दो, त्याग दो उन्हें इसी क्षण
और
फिर खोलते हो मदिरालय
छपवाते हो सुनहरी इश्तिहार
जिनमें पिलाती हैं रमणियाँ,
सुगंधित सिगरेट प्रेमियों को
दे देते हो अनुमति
चलाने को नाना-रूप लाटरियाँ
बनाने को सबको निर्धन, निर्भर
अर्थ बदल दिए हैं तुमने
कर दिया है महिमा-मण्डित
गुण्डों, बदमाशों और विश्वास घातियों को
इन सब जघन्य पापों से बचाती हूँ
मैं ही तुम्हें बार-बार
और मरती रहती हूँ, निरन्तर स्वयं
तुम्हारे विश्वासघातों की
शिलाएँ धरकर
अपनी छाती पर


818, कुण्डेवलालान,
अजमेरी गेट दिल्ली - 110006
दिनांक 22-1-97
प्रिय भाई,

आपकी लघु कथा प्रश्नोत्तर मिली जो कुछ आपने लिखा है, सही है और इस बात को सब स्वीकार भी करते हैं, परन्तु राजनीति का स्तर जो दिन पर दिन गिरता जा रहा है। पैसे की भूख उस पर सन्तान की भूख दोनों का समीकरण नहीं हो पा रहा। इसी तरह से और कई प्रश्न है मूल बात मैं को त्यागने की इच्छाशक्ति में है। जब तक यह इच्छाशक्ति पैदा नहीं होती, तब तक समस्या का समाधान नहीं हो सकता। लेकिन एक दिन होगा अवश्य उसकी राह देखते हमें बैठे नहीं रहना है, बल्कि कुछ न कुछ करते चले जाना है।
मैं तो बहुत परेशान हूँ, लेकिन स्वास्थ्य और चारों ओर से उभरती समस्याएँ मुझे शान्त नहीं रहने देतीं। ऊपर से तो मैं शान्त हूँ पर अन्दर में तुमुलानाद बज रहा है जब तक वह शान्त नहीं होता, तब तक ऐसे ही चलेगा, क्योंकि अब मैं चुनौती देने की स्थिति में नहीं रह गया हूँ। खैर आशावादी हूँ, कुछ तो होगा ही कीचड में ही कमल खिलता है।
हार्दिक शुभकामनाओं सहित
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
शैलेन्द्र सदन
सरिया, रायगढ (म.प्र. )

818, कुण्डेवालान चौक
अजमेरी गेट, दिल्ली - 6
दिनांक 12-10-98
प्रिय भाई,
बहुत दिनों बाद तुम्हारा पत्र पाकर आश्चर्यजनक प्रसन्नता हुई। नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। हम सब की ओर से भी नव वर्ष की मंगल कामनाएँ स्वीकर करें। यह वर्ष हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला प्रमाणित हो यही हमारी कामना है। आप पंचायिका मासिक पत्रिका से जुड गये हैं यह बहुत अच्छा समाचार है, मुझे आशा है और विश्वास है कि आप शीघ्र स्थायी रूप से वहाँ काम करने लगेंगे। सबसे अधिक प्रसन्नता मुझे इस बात से हुई कि आपने मेरे लिए एक बेशकीमती उपहार भेजा, स्वीकार अस्वीकार करने का कोई प्रश्न ही नहीं है, और धन्यवाद देना भी एक औपचारिकता मात्र है। मन की बात तो मन ही जानता है मुझे आशा है तुम लघु कथाएँ अभी भी लिख रहे हो। मेरा स्वास्थ्य तो बैरोमीटर की तरह से उठता गिरता रहता है लेकिन काम तो करता ही हूँ, कॉफी हाऊस भी जाता हूँ, बाहर कभी-कभी जाता हूँ मगर अकेले नहीं।
पत्रिका तो नितान्त सरकारी है मगर सामग्री अच्छी है, और साज सज्जा भी। मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ तुम्हें और मित्र परिजनों सबको। कई माह पूर्व मैं भोपाल इंदौर गया था लगभग साल भर होने आया फिर नागपुर भी गया बीच में हिमाचल प्रदेश की यात्रा कर आया अब जरा सर्दी कम होने पर नागपुर जाऊँगा। 
हार्दिक मंगल कामनाओं सहित।
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
उप-सम्पादक मध्यप्रदेश पंचयिका
प्रशासनिक क्षेत्र, अरेरा हिल भोपाल

818, कुण्डेवलालान, अजमेरी गेट
दिल्ली - 110006
दिनाक 3-1-2000
प्रिय बंधु,
आशा करता हूँ कि आप स्वस्थ और प्रसन्न हैं, नववर्ष की शुभकानाओं के लिए बहुत बहुत आभार आपका। हम सब की ओर से आने वाले वर्ष के लिए हार्दिक मंगलकामनाएँ स्वीकार करें। हमें विश्वास है कि नये वर्ष का प्रकाश आपको आज के अंधकार के बीच निश्चय ही रास्ता दिखाएगा, हर अंधकार के बाद प्रकाश का आना निश्चित है, इसी विश्वास के सहारे हमें आगे बढते जाना है।
एक बार फिर मंगलकामनाओं के साथ
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
डी-14, माचना कॉलोनी, शिवाजी नगर,
भोपाल (म.प्र.)

बी-151 महाराणा प्रताप एन्क्लेव
पीतमपुरा, दिल्ली - 110034
दिनांक 3-१-2001
प्रिय आत्मन्
आशा करता हूँ आप स्वस्थ एवं प्रसन्न हैं। आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि लम्बे संघर्ष के बाद मैं अपने मकान में आ गया हूँ मेरा नया पता व फोन नं. ऊपर दिया हुआ है कृपया अब इस पते पर लिखिए।
अभी हम यहाँ पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं हुए हैं। फर्नीचर बन रहा है, हफ्ता भर और लग सकता है, काम समाप्त होने पर आपको वैसे आप अब भी आ सकते हैं। 
यहाँ वातावरण बडा खुला है धूप है, हवा है, पेड पौधे हैं, सामने ही पार्क है अच्छा लगता है जीवन के शेष क्षण इसी वातावरण में बीतेंगे यह और भी अच्छा है।
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
आपका
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
बी-11,
74, बंगला भोपाल (म.प्र.) ५

818, कुण्डेवलालान, अजमेरी गेट
दिल्ली - 110006
दिनांक 3-1-2000
प्रिय बंधु,
आशा करता हूँ कि आप स्वस्थ और प्रसन्न हैं, नववर्ष की शुभकानाओं के लिए बहुत बहुत आभार आपका। हम सब की ओर से आने वाले वर्ष के लिए हार्दिक मंगलकामनाएँ स्वीकार करें। हमें विश्वास है कि नये वर्ष का प्रकाश आपको आज के अंधकार के बीच निश्चय ही रास्ता दिखाएगा, हर अंधकार के बाद प्रकाश का आना निश्चित है, इसी विश्वास के सहारे हमें आगे बढते जाना है।
एक बार फिर मंगलकामनाओं के साथ
स्नेही
विष्णु प्रभाकर

श्री राम पटवा
डी-14, माचना कॉलोनी, शिवाजी नगर,
भोपाल (म.प्र. )

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