झलमला : पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी


लेखक
'सरस्वती' के भूतपूर्व सम्पादक पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी, बी० ए०
प्रकाशक
हिन्दी-ग्रंथ-रत्नाकर, कार्यालय, बम्बई

हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकरका ८२ वाँ ग्रन्थ

प्रकाशक-
नाथूराम प्रेमी
हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कायोलय
द्दीराबाग, गिरगाँव, बम्बई .

तीसरा आवृत्ति
जुलाई, 1939
मूल्य चौदह-आने २/

मुद्रक-.
रघुनाथ दिपाजी देसाई ,
न्यू भारत प्रिंटिंग प्रेस,
६ केलेवाडी, गिरगाँव, बम्बई नं. ४







समर्पण
श्रीमान पण्डित बलदेवप्रसाद मिश्र
एम.ए., एलएल. बी.
के कर-कमलों में
-पदुमलाल बख्शी

एक दिन
लाल रणजीत सिंह न रहे। जीवन और मृत्युकी इस लीला-भूमि में किसी की मृत्यु का समाचार सुनकर कोई क्षुब्ध नहीं होता। काल के गभे में अनन्त जीवन-घाराएँ लुप्त होती रहती हैं। तब एक जल-बिन्दु के निपात से किसका गात्र कम्पित हो सकता है? परन्तु आज मुझे ऎसा जान पडता है कि मानो मुझे वृद्धावस्था नें आकर घेर लिया है। मेरे देखते ही देखते एक-एक कर कितने ही लोग चले गये। न जाने कहाँ, किस लोक में, एकत्र होकर वे सब मेरी राह देख रहे हैं। क्या कभी उनसे फिर भेट: होगी ?
लाल रणजीत सिंह इलाहाबाद आये थे। उन दिनो में मैं जैन-बोर्डिंग के सामने एक छोटे से मकान में रहता था। वहीं लाल साहब आकर ठहर गये। उन्ही दिनो मे मेरे दो मित्र भी आये हुए थे। एक थे जगदीश और दूसरे थे महेश। एक साहित्य के आचार्य थे और दूसरे दर्शन-शास्त्र के। प्रतिदिन दोनो में विवाद हुआ करता था। लाल साहत्र उपन्यासों के प्रेमी थे। उन्हे भी साहित्य-चचो पसन्द थी। वे भी एक दिन उसी विवाद में सम्मिलित हो गये। आज यहाँ मैं उसी की बात लिख रहा हूँ।
सन्ध्या हो गई थी। मैं 'इण्डियन प्रेस' से काम करके घर लौटा। महेश और जगदीश दोनों बैठे बातें कर रहे थे। मेरे आने पर लाल साहब भी वहीं आकर बैठ गये और महेश से कहने लगे -मैं आज एक उपन्यास पढ़ रहा था। वह है तो एक विख्यात लेखक की कृति, पर उसे पढ़कर मुझे विशेष प्रसन्नता नहीं हुई। मुझे ऐसा जान पडता है कि आधुनिक कथा-साहित्य रस से हीन होता जा रहा है। आजकल उपन्यासों में चरित्रों की सृष्टि के लिए उतनी चिन्ता नहीं की जाती जितनी चरित्रगत विशेषता का विश्लेषण करने के लिए की जाती है।
महेश ने कहा -पर सत्य के अनुसन्घान में ही आनन्द की उपलब्धि होती है और चरित्र-वैचित्र्य का विश्लेषण करने से ही हम सत्य को जान सकते हैं।
जगदीश ने कहा -यहीं तुम भूल कर रहे हो। मनुष्य-जीवन कोई रासायनिक पदार्थ नहीं है जिसका विष्‍लेषण कर आप तत्व निकाल सकें। मनुष्य को खण्ड-खण्ड कर देखने से हम कभी उसके जीवन का रहस्य नहीं जान सकते। वह जैसा है हमें ठीक वैसा ही, समग्र भाव से ही, उस पर विचार करना चाहिए। जहँ जीवन की सम्पूर्णता है वहीं दृष्टिपात करने से हम जीवन का यथाथ तत्‍व जान सकेंगे। इसलिए, प्राचीन काल में महत् चरित्रों की सृष्टि की जाती थी। पर आजकल उपन्यासों में व्यक्तिगत वैचित्र्य को ही स्पष्ट करने के लिए यत्न किया जाता है।
लाल साहब नें कहा -संसार में छोटे-बडे सभी तरहके मनुष्य रहते हैं। वे सदैव महत्त्वपूर्ण कार्यो में निरत नहीं रहते। अधिकांश का जीवन-काल ऐसे ही कार्यो में व्यतीत होता है जो तुच्छ कहें जाते हैं। मनुष्य अपने जीवनमें सुख-दु:ख का अनुभव करता है। कभी वह किसी से प्रेम करता है तो कभी किसी से घृणा करता है। काम-क्रोध, लोभ-माह के चक्र मे वह पडा़ रहता है। मनुष्यों का यह दैनिक जीवन क्या उपेक्षणीय है ?
जगदीश ने उत्तर दिया -तुच्छ कार्यो मे निरत रहने पर भी मनुष्य इतना अवश्य अनुभव करता है कि उसका जीवन इतना ही नहीं है। उसके हृदय में यह विश्वास छिपा रहता है कि वह कुछ और भी है। उस कुछ और को प्राप्त करने की वह चेष्टा भी करता है। इसीलिए, वह जब किसी में किसी प्रकार की महत्ता देखता है तब वह उसकी ओर आकृष्ट होता है। वह शक्ति की महत्ता कों समझता है, इसीलिए शक्तिका अनुभव करना चाहता है। तभी मनुष्यो में शक्ति के जो जो प्रतिनिधि होते हैं वे सभी उसकी कल्पना के विषय हो जाते हैं। यह सच है वे सभी समय में मनुष्य किसी एक में ही शक्ति की परकाष्ठा या महत्ता का आदर्श नहीं देखता। उसका यह बदलता रहता है। परन्तु, इसमें सन्देह नहीं कि महत् भाव की ओर मनुष्यों को अग्रसर कराने के लिए ही साहित्य की सृष्टि होती है। यदि साहित्य में केवल चरित्रगत विशेषताओं का ही विश्‍लेषण किया गया तो उससे हम लोगो में कोई महत् भाव नहीं आ सकता। महेश ने कहा -कथाओं के प्रति मनुष्य-मात्र का जो अनुराग है, उसका कारण यह है कि एक मनुष्य स्वभावत: दूसरे को जानना चाहता है। पहले उसे कुतूहल होता है, फिर सहानुभूति।

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