पंडवानी और तीजन बाई

पंडवानी और तीजन बाई

सरला शर्मा

सृजन-सम्मान, रायपुर के सहयोग से प्रकाशित 
सर्वाधिकार: नमन, नवीन शर्मा 
आवरण: गजेन्द्र 
प्रथम संस्करण: 19 जून 2007 
मूल्य: 150.00 रू. 
प्रकाशक 
वैभव प्रकाशन 
सागर प्रिंटर्स के पास, अमीनपारा चौका, 
पुरानी बस्ती, रायपुर (छत्तीसगढ़) 
दूरभाष: (0771) 2262338 मो. 094253-58748

समर्पण

अहिल्या, तारा, कुन्ती, द्रौपती, मंदोदरी तथा 
पंचकन्या स्मरेन्नित्यं, सुख सौभाग्य वर्धते।

अतीत, वर्तमान और भविष्या की 
प्रतिभाशालिनी धरापुरत्रियों 
को 
समर्पित है यह कृति 
‘‘पंडवानी और तीजन बाई....।’’

सरला शर्मा 
भिलाई (छ.ग.) 

जिनगी के रद्दा मं कतका कन खंचवा-डिपरा, खाई-खड्डा, नदिया-नरवा, बन-पहार नांहके बर परथे.... तब जाके कोनो एक ठौर म चिटिक सुरता लेहे के मौका मिलथे....। पच्चास बरिस सरपट दौड़त-भागत हंफर गयेंव त थोरकुन थिराये बर गुनत रहेंव के पाछू लहुट के निहारे के मन करिस। अइसे लागिस के ठौका मौका पायेंव......रे.....भाई।
येई मौका ल सकारथ करिस हावय सरला बहिनी हर..... काबर के ये किताब ल लिखिस हावय।
बुधियार पढ़इया मन! ये किताब मं मोरे मनसुभा-मन बगरे हावय, मोरे बिचार मन परगट होये, जौन देखेंव, सुनेंव, गुनेंव, सहेंव, तौने ल सरला बहिनी हर भाखा देहे हावय।
बुधियार पढ़इया मन ! ये किताब मं मोरे मनसुभा-मन बगरे हावय, मोरे बिचारमन परगट होये हावय, जौन देखेंव, सुनेंव, गुनेंव, सहेंव, तौने ल सरला बिहनी हर भाखा देहे हावय।
धीर धर के मोर गोठ-बात ल सुनिस फेर अपनो हर गुनिस..... त फेर लिखिस.... ओला असीसत हांवव के ओकर कलम हर बिन थके, बिन बिलमें जियत भर लिखत, चलय।
पंडवानी हर दिनों-दिन बगरय, हमर देस के सभ्यता, संस्कृति के चिन्हारी बनय भगवान् करा हांथ जोर येई बिनती करत हांवय अऊ जियत भर पंडवानी गाये सकंव ये बरदान मांगत हंव.....।
‘‘बोल दो बृन्दावन बिहारी लाल की जय।’’
दिनांक: 20.5.2007     
डॉ. तीजन बाई 
पद्मश्री, पद्मभूषण
महिला नौ-रत्न, कलाशिरोमणि
भिलाई (छत्तीसगढ़)
दूरभाश - 0788/2272423

सहज-सरल तीजन बाई

दानेश्वर शर्मा
तीजन बाई की इच्छा थी कि वह भी भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी करे। छत्तीसगढ़ी लोककला महोत्सव में कार्यक्रम के नौकरी देवा देते साहब, त बने निश्चिन्त होके पंडवानी गातेंव-रोजी रोटी के फिकर नई रहितिस....।’’
(मुझे भी नौकरी दिला देते साहब चपरासिन की सही तो निश्चिंत होके पण्डवानी गाती-रोजी रोटी की चिन्ता नहीं रहती)
मैं उससे कहता कि रोजगार दफ्तर में नाम रजिस्टर करा लो और जब साक्षात्कार के लिये बुलवा हो तब बता देना; इण्टरव्यू लेने वाले परिचित अधिकारियों को मैं अपनी ओर से सिफारिश कर दूंगा। प्रायः प्रतिवर्श उसका यही आग्रहा होता था और मेरा यही उत्तर।
मनुश्य के ग्रह नक्षत्र जब प्रबल होते हैं तब बहुत से कार्य स्वतः सिद्ध हो जाते हैं। संयोग से सन् 1984 में श्री के.आर. संगमेश्वरम् प्रबंध निदेशक के रूप में भिलाई आये। उन्हें जब छत्तीसगढ़ी लोककला महोत्सव की लोकप्रियता की जानकारी हुई तो उन्होंने मुझसे मिलना चाहा। संयोग से नगर सेवा विभाग के अधिकारियों से मिलने के लिये वे मुख्य नगर प्रशासक के कार्यालय में आये। सभी विभाग-प्रमुखों को बुलाया गया। परिचय के दौरान मेरा परिचय जानने के बाद उन्होंने पूछा कि ‘‘आप छत्तीसगढ़ी लोककला महोत्सव का आयोजन कब से कर रहे हैं ?’’
मैंने बताया सन् 1976 से..... उन्होंने फिर पूछा ‘‘कहां और कितने दिन....?’’ मैंने उत्तर दिया ‘‘सर भिलाई के पंत स्टेडियम में प्रतिवर्श 5 दिन......।’’ उन्होंने कहा कि राजहरा, नंदिनी और हिर्री भी हमारा टाउनशिप है वहां आप क्यों नहीं करते ?’’
मैंने कहा ‘‘सर प्रबंधन का आदेश से दो दिन का कार्यक्रम राजहरा और दो दिन का कार्यक्रम नंदनी तथा हिर्री में प्रतिवर्श होना तय हुआ। उन दिनों स्व.शंकर गुहा नियोगी के भय से कोई प्रबंध निदेशक राजहरा नहीं जाते थे लेकिन श्री संगमेश्वरन सप्रतीक वहां गये, लोककला महोत्सव देखा और प्रसन्न होकर बधाइयां भी दीं। इसके बाद उन्होंने कलाकारों से मिलना चाहा। ग्रीन रूम मंे सभी कलाकारों से भेंट किये, बधाई दिये। तीजन बाई को बधाई देते समय मुझे सूझ गया और मुंह से निकाल गया कि ‘‘सर तीजन बाई को भिलाई इस्पात संयंत्र की नौकरी में रख लेना चाहिये।’’
"Sir we wanted to appoint Teejan Bai in Bhilai Steel Plant.She will be an asset for us."
  संगमेश्वरम् साहब ने इन शब्दों को सुनकर मेरी ओर गौर से देखा....। मुझे लगा कि मेरी नौकरी तो गई क्योंकि प्रबंधक पद के अधिकारी का प्रबंध निदेशक से सीधे इस प्रकार प्रस्ताव करना नियम विरूद्ध था लेकिन श्री संगमेश्वरम अत्यन्त उदार हृदयी उन्होंने प्रत्युत्तर में कहा- "Then what is their... Employ her.."
मैं प्रसन्न हुआ और तीजन बाई को मैंने कहा कि नौकरी दफ्तर में नाम रजिस्टर करा लो तथा एक आवेदन पत्र प्रस्तुत करो। तदनुसार तीजन बाई को नौकरी मिल गई और उसे मेरे ही विभाग में भेज दिया गया।
तीजन बाई पढ़ी लिखीं तो थी नहीं इसलिये अपने मन से ही कार्यालय का कुछ काम कर देती जैसे फाइल लाना ले जाना, पानी पिलाना लेकिन ये सारे काम वो अपने मन से करती थी। इसके लिए उसे कोई निर्देश नहीं दिया जाता था।
तीजन बाई देश के अनेक भूभागों के अलावा विदेशों में भी आमंत्रित होने लगी फ्रांस से ही उसकी कला की चर्चा सर्वत्र होने लगी।
कुछ लोगों ने मुख्य नगर प्रशासक, महाप्रबंधक तथा प्रबंध निदेशक से यह शिकायत कर दी कि दानेश्वर शर्मा तीजन बाई से पानी पिलाने का, चाय लाने का और भी इसी प्रकार का कुछ काम लेते हैं जो कि किसी कलाकार से नहीं लेना चाहिये। मेरे बाॅस मुख्य नगर प्रशासक ने कहा कि प्रबंध निदेशक महोदय को इस प्रकार की शिकायत मिली है अतः तीजन बाई से पानी या चाय पिलाने का काम नहीं लेना चाहिये।
मैंने तीजन बाई से स्पश्ट रूप से कह दिया कि वह स्वेच्छा से भी यह काम मत करे फिर भी वह आदतन काम कर देती थी। मेरे आदेश की अवहेलना कर देती थी। एक दिन दूरदर्शन और आकाशवाणी के निदेशक मेरे कार्यालय में आये उन्हें घण्टे भर बाद प्रबंध निदेशक संगमेश्वरम से मिलना था। दोनों अधिकारियों को बैठाने के बाद मैंने घंटी बजाई..... तीजन बाई हाजिर हो गई। मैंने उससे चपरासी को भेजने को कहा, वह बोली ‘‘आज ओहर आये नइये.....।’’ (आज वो आया नहीं है।) मैं चुप रह गया। तत्काल बाद तीजन बाई..... तीन गिलास पानी लेकर आ गई जैसे ही उसने टेबल पर पानी रखा। आकाशवाणी के निदेशक ने मुझसे पूछा कि ‘‘ये तीजन बाई ही है न....?’’ मेरे हां कहने पर उन्होंने उसे बैठने को कहा लेकिन तीजन बाई नहीं बैठी खड़ी ही रही.....। दोनों निदेशकों से बातें करने लगी थोड़ी देर बाद जब वे लोग चले गये। मैंने तीजन बाई को बुलाया और उससे कहा ‘‘तुम्हें पानी लाने के लिये मैं मना कर चुका हूँ उसके बावजूद आज तुम पानी लाई। अभी ये दोनों केन्द्र निदेशक एम.डी. के पास जा रहे हैं।’’
श्री संगमेश्वरम् साहब की आदत है कि वे किसी भी आगन्तुक से दो बातें पूछते थे, पहला ‘‘आपने कारखाना देखा है या नहीं.... यदि नहीं तो जरूर देखिये..... दूसरा.... अमुक साहित्यकार, संगीतकार, कलाकार, खिलाड़ी जो हमारे संयंत्र में काम करते हैं जानते हैं कि नहीं....?’’ मैंने कहा इसमें तुम्हारा नाम भी आवेगा तीजन बाई और वे
अधिकारी उन्हें बतायेंगे कि....हाँ.....हम दानेश्वर शर्मा के कक्ष में गये थे वहां तीजन बाई ने हें पानी पिलाया। ऐसा लगता है तीजन बाई कि मेरी नौकरी तो गई क्योंकि प्रबंध निदेशक महोदय मुझे पहले ही निर्देश दे चुके हैं कि तीजन बाई से पानी मत पिलवाना। तुम कहने से मानती नहीं हो इसलिये इससे पहले कि मेरी नौकरी जाये मैं तुम्हारी नौकरी समाप्त करता हूँ। तुम तो दैनिक वेतन भोगी हो अतः मुझको अधिकार है, कल से तुम नौकरी में मत आना....।’’
मेरी बातों को सुनकर तीजन बाई ने उपेक्षात्मक रूप से सिर हिला दिया मैंने फिर कहा ‘‘मैं गंभीरता से बोल रहा है सिर मत हिलाओ.....।’’
इस पर तीजन बाई ने जवाब दिया- ‘‘एम.डी. साहब काहत हे त काहन दे.....हमर दुवारी मं कोनो आही त हम.... पियासे ल एक गिलास पानी नई देबो.....धिक्कार हे हमर नारी परानी के धरम ल..... अगर अतको नई करेन.....ओकर कहेच मं हो जही का ?’’ ( एम.डी साहब कहते हैं तो कहने दो हमारे द्वार पर कोई आये तो हम प्यासे को एक गिलास पानी नहीं देंगे..... धिक्कार है हमारा नारी जन्म और नारी धर्म..... यदि इतना भी नहीं कर सके.... उनके बोलने से ही हो जायेगा क्या?)
इतना कहकर वो मेरे कमरे से बाहर चली गई। मैंने तुरन्त इस घटना और तीजन बाई के शब्दों को अपने अधिकारी मुख्य नगर प्रशासक को बता दिया। इसके बाद मुझे तीजन बाई के पानी पिलाने संबंधी कोई हिदायत नहीं मिली....।
तीजन बाई अपने उच्च विचारों के कारण अपनी सरलता के कारण मेरी दृश्टि में और ऊंची उठ गई।
‘पंडवानी साधिका’ ‘तीजन बाई’ को पाठकों का स्नेह मिले एवं लेखिका सरला शर्मा को सरस्वती का आशीर्वाद।
एम. 383. पदनाभपुर दुर्ग

अविस्मरणीय पल-छिन 

डॉ.विमलकुमार पाठक 
जहां तक मुझे याद आ रहा है सन् 1974 की बात है तब लोगों के मुंह से तीजन बाई की पंडवानी की प्रशंसा सुनकर मैं अपने मित्रों सहित उसका कार्यक्रम देखने गया..... देखा, सुना, प्रभावित हुआ और उससे मिलकर भिलाई में कार्यक्रम देने के लिये कहा....।
अपनी ही संस्था ‘‘नवरंग कला केन्द्र भिलाई’’ की ओर से छावनी पुलिस मैदान में आयोजित राम नवमी उत्सव में प्रस्तुत किया जहां भारी जनसमूह के साथ तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. श्रीधर मिश्र, म.प्र. शासन, भिलाई इस्पात संयंत्र के तत्कालीन प्रबंध निदेशक श्री शिवराज जैन तथा कार्मिक प्रबंधक श्री एन.के. fसंह ने तीजन बाई को सराहा।
कुछ ही दिनों बाद संयंत्र के आयोजन ‘भिलाई मंड़ई’ में उसे कला प्रदर्शन का सुयोग मिला। सन् 1976 में उसने देश के सबसे बड़े लोकोत्सव ‘छत्तीसगढ़ लोक कला महोत्सव’ में भाग लिया....। तभी से उसका नाता भिलाई से जुड़ गया.... यद्यपि भिलाई इस्पात संयंत्र में उसकी पदस्थापना सात जुलाई उन्नीस सौ अठ्यासी को हुई।
तीजन बाई आंगिक प्रदर्शन, नृत्य, एवं हाथ-पांव संचालन के साथ ही नेत्र, भूभंगिमा और चेहरे के माध्यम से सभी प्रकार के भावों को व्यक्त करने में ऐसी समर्थ कलाकार है जिसके शरीर पर प्रसंगानुकूल महाभारत के सभी पात्र आते-जाते रहते हैं। अपनी विशिश्ट छाप दर्शकों पर छोड़ जाते हैं। वह कथागायन की कापालिक शैली की सिद्धहस्त कलाकार है, एकपात्रीय अभिनय के क्षेत्र में बेजोड़ कलाकार है आज उसकी टक्कर की कलाकार लोक-गाथा की कौन कहे समर्थ शास्त्रीय नृत्य शैलियों में भी नहीं है ऐसी मान्यता दिग्गज विद्वानों, कला-समभ्क्षकों, अनेक प्रसिद्ध कलाकारों एवम् बुद्धिजीवियों का है।
तीजन बाई की गायन शैली सर्वथा भिन्न है महाभारत के छत्तीसगढ़ी रूपान्तर में बनाये गीतों की धुनों व प्रस्तुतीकरण में यह भिन्नता दिखाई देती है। प्रदर्शन विशयक उसका रंग ढंग, गायन शैली, नृत्य करते-करते मंच पर घूमते हुये तमूरा बजाते हुये दर्शक समुदाय को अपनी जादुई कला से बांधे रखने, अपनी आखों के वशी करण से सभी को सम्मोहित कर एकटक अपनी ओर देखने के लिये बाध्य कर देने की जो क्षमता, जो गुण उसमें है वह अन्यों के पास है या नहीं ? है, तो कितना है मुझे मालूम नहीं.....।
कथा प्रसंग को थोड़ी अवधि में पूरा करना, बढ़ाना या घंटों उसी में डूबी रहना तीजन बाई की ऐसी खूबी है जिसे वह बड़ी चातुरी से प्रस्तुत करती है। मंच पर प्रदर्शन विशयक समयानुसार निर्देशन देने, भलीभांति प्रसंगों पर प्रकाश डालने व उसके व्यक्तित्व को चर्चित बनाने हेतु इन पंक्तियों के लेखक के निरंतर योगदान के प्रति वह सदैव आभार व्यक्त करती है, श्रद्धा पूर्वक स्मरण भी करती है।’
टेलीविजन तथा आकाशवाणी से तीजन बाई को देख सुनकर आम जनता की दृश्टि में लोक कला के प्रति अधिक रूचि जागृत हुई है। पंडवानी के साथ पंडवानी गायिका को भी आदर देने लगे हैं।
तीजन बाई के साथ वाद्य यंत्रों पर संगत करने वाले ग्रामीण कलाकारों का योगदान भी उल्लेखनीय है। चूंकि पंडवानी गायन में भावाभिनय है, स्वरों का उतार-चढ़ाव है हर्श, विशाद, विस्मय, शोक, घृणा आदि की अभिव्यक्ति है अतएव इस सबमें पाश्वसंगीत की तरह ही सतत संगीत ध्वनि चाहिये। पल-पल परिवर्तित प्रसंगानुसार हल्के व तेज स्वर में नाना प्रकार की ध्वनियां चाहिये ताकि घोर युद्ध, जबरदस्त सदमा भारी हर्ष, रूदन, नाराजगी आदि भावों की अभिव्यक्ति उभर कर सामने आये। इस दिशा में तीजन बाई के संगतकारों को कमाल हासिल है। कथा के अनुसार संगीत चलता है और संगीत सरिता में जन-समुदाय अवगाहन करता हुआ आनंदानुभूति में विह्वल हुआ सा दिखाई देता है।
प्रोग्राम देते समय मंच की वाचाल तीजन बाई महाभारत के ऐतिहासिक पात्रों की बारीकियों प्रस्तुत कर रौब दाब गालिब करने वाली बाई, हजारों, लाखों दर्शकों को अपनी प्रतिभा से मोहित करने वाली तीजन बाई जब मंच से नीचे दिखलाई देती है तब एक अतिसाधारण ग्रामीण महिला सी झेंपती हुये अपने ग्रामीण होने का अहसास कराती है अल्पभाशी और आकर्शण-विहीन सी लगती है। न आकर्शक पहिनावा न साज श्रृंगार, न मोहक रूप रंग न ही कोई नाज नखरा.....। पद्मश्री पद्यभूषण.....मानद डी.लिट्, नृत्य शिरोमणि, महिला नवरत्न आदि-आदि सम्मानों से सम्मानित तीजनबाई का यह सम्मान ही नहीं बल्कि छत्तीगसढ़ी लोक-जीवन, लोक संस्कृति का सम्मान है आम आदमी का सम्मान है, धरती से जुड़े हुये लोगों का सम्मान है। धन्य है वह
धरती और धन्य है वहां के लोग जिनके पास एक सरल, निश्छल निश्कपट हृदय वाली सरस लोकगाथा गायिकस है जो छत्तीसगढ़ी संस्कृति का, भाशा का झण्डा बड़ी शान से लहराती है..... हम छत्तीसगढ़ियों का नाम रोशन करती है।
‘‘पंडवानी की बन पहचान
बढ़ाओ छत्तीसगढ़ की शान।
सुखों से भरा हो जीवन
सौ साल जियो तुम तीजन।’’
पंडवानी और तीजन बाई’ गद्य विधा में लिखा गया अभिनव प्रयोग है आशा है साहित्यानुरागी इसे पसंद एतदर्थ सरला शर्मा प्रशंसा की हकदार है।

खुर्सीपार जोन -1, मार्केट
सेक्टर 11, भिलाई (छत्तीसगढ़)
मोबाइल-98028-31304

छत्तीसगढ़ की धिया

-डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा

पंडवानी पाराशरी परम्परा के महाकाव्य का पाठांतर है। पद्मश्री, पद्मभूषण तीजन बाई छत्तीसगढ़ की धिया प्रथित प्रवाचिका है।
भारत में दो भाइयों के बीच जो समर होता है वहीं महाभारत हो जाता है। सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय के बीच संघर्श, परिणाम सत्य की जीत किन्तु युद्ध में कौन हत या आहत होता है ? इस दारूण पीड़ा को कौन सहता है ?
छत्तीसगढ़ के रंगमंच में दाऊ रामचंद्र देशमुख की चदैंनी गोंदा और तीजन बाई की पंडवानी इस क्षेत्र में सफल प्रयोग है। एक में लोक कर्म, लोकरंग तथा लोकदशर्न है तो दूसरे में लोकधर्म, लोक संदर्शन है।
पंडवानी लोकमंच के लिये ग्राम्य गिरा छत्तीसगढ़ी में सर्वथा ग्राम्या है, आरण्यक भी है तो समरगाथा भी है। धर्मक्षेत्र में कुरूक्षेत्र पंडवानी का पद्यपराग है।
तीजनबाई छत्तीसगढ़ के गांव-गंवई की बेटी है जो लोकनाट्य में ऐसी नायिका है, गायिका है, जो एक साथ पल-पल परिवर्तित परिवेश में राजा यज्ञसेन की राजपुत्री याज्ञसेनी है, पांचाली है, द्रुपद दुहिता द्रौपती है, पार्थ की शौर्य स्वयंवरा है, श्वश्रु कुंती की वधू है तो परात्पर ब्रम्ह श्री कृश्ण की सखी कृश्णा भी है अज्ञात वासिनी सैरन्ध्री है, अभिमन्यु की खोई अश्रुमालिका है, पाण्डवों की मर्यादा-मुक्तकेशिनी की व्यथा है तो क्या तीजन बाई तिरिया जनम की व्यथा-कथा की जीवित प्रतिमा है?
संयत पदसंचालन एवं अपूर्व भावभंगिमा तंबूरे के साथ काकली से fनःसृत स्वर में मूच्छZना कलावती तीजन की विशेशता है। जब मंच पर अवतरित होती है तब वह तीजन बाई नहीं रहती वह लोकोत्तर होकर कवियत्री, कलावती बन जाती है। समूचा प्रेक्षागृह अभिभूत, आनंदित, आविश्ट, आल्हादित, आप्यायित हो जाता है। अभिनय कला में पारंगत तीजन बाई जब कजरारे नयनों से कटाक्ष करती है, लाल कुंदरू सदृश अधरों से विहंसती है तो दर्शक सम्मोहित हो जाते हैं इसका मृदुल मदिर अधर दंशन लोगों को आवेशित करता है मानों कोई जादूगरनी ने वशीकरण मंत्र पढ़ा है।
लगता ही नहीं कि वह एक अशिक्षित पारधी स्त्री है वह तो जैसे अप्सरा लोक से अवतरित किन्नरी है जिसके कंठ में वेदना विगलित पंडुकी की पीड़ा भरी पुकार है, पंक्ति से बिछुड़ी कुररी की क्रेंकार है; जैसे तिरिया जनम की मूर्तिमती विवशता है तो कभी लगता है विवसना होने के भय से द्रौपदी ही कराह रही है, क्रंदन कर रही है।
नर्तकी जब आराधना करती है तो उसका स्वरूप कीर्तन हो जाता है संत कबीर ने भी कहा है-
‘‘कबिरा धारा अगम की, सदगुरू दई लखाय
उलट ताहि पढ़िये सदा, स्वामी संग लगाय।’’
राधाकृश्ण के ध्यान के सागर संतरण का यही सूत्र है।
महाभारत का महासमर अनाथ अनिकेतन विधवाओं का करूण विलाप है, तो क्या पंडवानी शत मृत पुत्रों की माता गांधारी का श्रीकृश्ण को दिया गया शाप है ?
जब भी कोई विदेशिनी भारत में आती है तो ही महाभारत होता है क्या ?
प्राचीन दण्डकारण्य में पांडवों की समरगाथा प्रस्तुत करके तीजन बाई लोक कला के पक्ष में प्रतिपदा हैं। कापालिक शैली में गायिका तीजन बाई का सप्तम स्वर में पंचम स्वर है और ग्राप्य-गिरा में- ‘‘तीजन बाई के पंडवानी अमचुर साहीं अम्मठ है, गुड़ाम साहीं गुरतुर, धनमिरची साहीं चुप्पुर हे, नुनचरा साहीं नुनछुर हे अऊ करेला साहीं करू घलाय हावय।’’
मेरी शुभाशंसा है कि तीजन बाई वृन्दावन बिहारी लाल की वन्दना करते-करते शांति प्राप्त करे.... जो शांति मनुज मात्र का श्रेय भी है प्रेय भी।
                          इत्यलम्।

35, ए, विद्यानगर
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
दूरभाष 7752-223024

नारी अस्तित्व की पहचानः तीजनबाई 

उषा पाण्डेय 
लोक साहित्य और लोक संस्कृति मनुश्य की भावनाओं का सहज स्वाभाविक प्रकाश है, जरा सी कृत्रिमता भी यदि हो तो उसका रूप बिगड़ जाता है ठीक उसी तरह दूध में पड़ी जरा सी खटाई....।
आज जब हमारे चारों तरफ सब कुछ तेजी से बदल रहा है तो इस बात की जरूरत और भी ज्यादा हो गई है कि हम अपनी लोककला को सहेज कर रखें और उसके अकृत्रित स्वरूप को भावी पीढ़ी को सौंपे, हस्तान्तरित करें।
इस हस्तान्तरण को बेहिचक अपनाने वाले लोक कलाकारों में से एक है पद्मश्री, पद्मभूषण डॉ. तीजन बाई, उन्होंने पंडवानी गायन की कापालिक शैली को सारे संसार में पहचान दी है। संघर्शों की छांव में उनकी साधना दिनोंदिन आगे बढ़ती रही....।
आज वे स्वदेश भारत में ही नहीं विदेशों में भी अपना विशिश्ट स्थान बना चुकी हैं अतः किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं।
कलाकार भी तो समाज में ही रहता है तो जैसे-जैसे उसे प्रसिद्ध मिलती जाती है वह जनसामान्य का होते जाता है फिर सामान्य जन....एक आम आदमी भी उसके जीवन से, उसकी अनुभूमियों से, उसकी आपबीती से परिचित होना चाहता है...। उद्देश्य मात्र यही होता है कि कलाकार की संघर्श-कथा को सुनना चाहता है, उससे प्रेरणा लेना चाहता है। उसकी उपलब्धियों को भावी कलाकार अपना आदर्श बनाना चाहता है।
सरला शर्मा ने ‘‘पंडवानी और तीजन बाई’’ लिखकर जनसामान्य की इसी अच्छा को, सहज जिज्ञासा को शांत करने का सार्थक प्रयास किया है।
प्रस्तुत पुस्तक डा. तीजन बाई की ही कथा नहीं है, हमारे समाज में जब कोई महिला अपनी शर्तों पर जीना चाहती है, अपने अस्तित्व को पहचान देना चाहती है तब उसे घर-बाहर कितने विरोधों का सामना करना पड़ता है इसकी कथा है। लेखिका की चित्रोपम भाशा ने इस कथा को सजीव बना दिया है।
यह पुस्तक एक दस्तावेज है, छत्तीसगढ़ के सुदूर गांव की निर्धन, प्रायः अशिक्षित, साधन, विहीन बालिका तीजन बाई के कठिन परिश्रम से प्राप्त सफलता की। स्वाभाविक गति से चलती यह पुस्तक अपने आखिरी पन्ने तक पाठक के मन में जिज्ञासा को जगाये रखती है, तो अपनी वर्णन शैली से रोचक भी सिद्ध होती है।
तीजन बाई की उपलब्धियों के साक्षी चित्रों ने पुस्तक को और भी आकर्शक बना दिया है।
वरिश्ठ साहित्यकार डा. पालेश्वर प्रसाद शर्मा, श्री दानेश्वर शर्मा और डा. विमल कुमार पाठक के विचारों को शामिल करके लेखिका ने तीजनबाई से संबंधित जानकारी को बढ़ाया है, जिससे पाठक के लिये अपने प्रिय पंडवानी-गायिका को जानना और भी सहज हो गया है। इस प्रयास के लिये लेखिका सरला शर्मा साधुवाद की पात्रा हैं।
‘पंडवानी और तीजन बाई’ को पाठकों का स्नेह मिले, साहित्यजगत् में प्रतिश्ठा मिले इस शुभकामना के साथ विदा मांगती हूँ......।

कोरबा (छत्तीसगढ़)
दूरभाश 07759-744690

प्राक्कथन 

  सुधि पाठक!
‘पंडवानी और तीजन बाई’ आपको सौंपते हुये मुझे अतीत प्रसन्नता हो रही है।
पद्मश्री, पद्मभूषण, अप्रतिम पंडवानी गायिका डा. तीजन बाई के अनुभवों, विचारों, उपलब्धियों और मान्यताओं को उन्हीं के मार्गदर्शन में मैंने भाशा दी है, लिखा है।
पारंपरिक उपन्यासों में एक नायक, एक नायिका के साथ कथानक को आगे बढ़ाने हेतु सहनायक, सहनायिकाओं की अवधारणा की जाती है। पाश्ववर्ती घटनाओं, चरित्रों का चित्रण किया जाता है। यह कृति कुछ भिन्नता लिये हुये है।
इसमें सर्वतोभावेन अवलंबनहीन निर्धन बालिका तीजन की विजय-यात्रा वर्णित अतः इसे स्वयंसिद्धा तीजन गाथा कह सकते हैं। इस कृति एकच्छत्र नायिका स्वयं तीजन बाई ही है उनके सहयोग के बिना इसकी रचना संभव ही नहीं थी एतदर्थ मैं हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ।
साहित्य मनीशीत्रय डा. पालेश्वर प्रसाद शर्मा, श्री दानेश्वर शर्मा एवम् डा. विमल कुमार पाठक के प्रति विनयावनत् हूँ.... सदैव रहूंगी। अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर उशा पाण्डेय ने लिखा उनके प्रति भी कृतज्ञ हूँ।
डॉ. सुधीर शर्मा की चिरआकांक्षा थी तीजनबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पुस्तक प्रकाशन की, लेखन की.....। यथासाध्य उसे ही पूरा करने का प्रयास की हूँ.... उनका सहयोग भी नितान्त नगण्य नहीं है।

इत्यलम्
सरला शर्मा 
19 जून 2007

अनुक्रम 

1. प्रस्तुति पर्व
2. प्रयास पर्व
3. प्रपत्ति पर्व
4. चित्र पर्व
5. सरला शर्मा की कृतियां

प्रस्तुति पर्व

आखिरी बारिश कब हुई थी..... ऊंह याद ही नहीं आ रहा है..... हाँ पौश मास में मकर संक्रांति के समय...अरे नहीं....होली के रंगों को धोने के लिए भी तो आकाश ने उदार होकर पानी बरसाया था.... पर वह भी तो दो महीने पहले की बात है....। उसके बाद ही तो हवा धीरे-धीरे गरम होने लगी। बड़े पेड़ों को छोड़कर पत्तों का रंग बदलने लगा पहले पीला रंग, फिर झुलसा- झुलसा सा, फिर झड़ने लगा।
बैसाख-जेठ को जाने किसने.... बनाया होगा? वैसे चैत बैसाख को मधु-माधव महीना भी तो कहा जाता है....क्यों भाई-कहने वालों को शायद गरमी नहीं लगती होगी....? चलिये....गरमी के दिन हैं....पर रात....पूछिये मत...बिना मुरगे की बांग सुने.... चार बजते न बजते बोरिया बिस्तर समेटकर भाग खड़ी होती है.... हाँ...लंबी टूरी की ट्रेन पकड़नी होती है न.....।
पांच बजते न बजते.... आकाश अपनी समूची नीलिमा के साथ दमकने लगता है.... दूर दूर तक काले, कपसीले अथवा धूसर रंग के बादल का कोई चीथड़ा भी नजर नहीं आता....। परेशानी इस बात की ज्यादा है कि रात गई सो गई.... जाते-जाते अपनी बहन उबासी को मेरे पास छोड़ गई है.....।
मन-मिजाज बिगड़ गया है....भी कोई सुबह है....? छः बजने में बारह मिनट बाकी है और नव-किरणें मेरे बिस्तर पर पसर गई.....खिड़की से झांकी पूर्व दिशा में समय के पाबंद हेडमास्टर की तरह ललमुंहा सूरज....मुझ जैसों को डरा धमका कर बिस्तर छुड़वाने आ पहुंचा है। अभी ब्रश कर ही रही थी कि काॅलबेल बजी....हाँ....सुबह यह आवाज मुझे अच्छी लगती है....कारण....यह सूचना है कि अखबार आ गया...बंद दरवाजे के बाहर.....सारे संसार का समाचार कुछ पन्नों में सिमटा मेरी प्रतीक्षा रहता है....मैं भी बड़ी व्यग्रता से दरवाजा खोलती हूँ....और अखबार गोद में रख बालकनी में.....।
मेरी इस आदत से मां-काकी दोनों चिढ़ती थी अक्सर सुनती थी  ‘‘लो-अब पढ़न्तीन नोनी की नींद भाग गई....घण्टे भर तक फुरसत.....।’’
सुबह की चाय के साथ अखबार....ऐसा राजसी सुख....भाग्यशाली लोगों को ही मिलता है यह मेरा ढृढ़ विश्वास है....। गोमती के हाथ से कप लेकर पहली ही घूंट भरी कि जीभ ने विद्रोह कर दिया....शक्कर की कमी, दूध तो जैसे चाय का रंग बदलने के लिये ही बूंदों के रूप में डाला गया था....हाँ.... पत्ती डालकर पानी को कुछ ज्यादा ही खौला दिया था.... कसैला तीता स्वाद । कभी कभी गोमती की कृपणता मेरे लिये दण्ड ही सिद्ध होती है। उसे बुलाकर डांटू....फटकारूं....इतना समय भी मेरे पास नहीं होता.... धीरज भी नहीं...यह भी ठीक है.... कि उसके पास भी इन दोनों की कमी हमेशा रहती है...। खुद उठकर चाय बनाऊँ.... तो अखबार की खबरें बासी हो जायेंगी...सो सारी नाराजगी थूककर अखबार खोली....। मैं भिलाई संस्करण ही पहले देखती हूँ.... अरे भाई! पहले अपना गांव-घर.... उसके बाद...सारा देश-फिर....संसार....। चाहे इसके लिये कोई मुझे संकीर्ण मनोवृत्ति की महिला होने का दोश ही क्यों न दे। रंगीन फोटो ने ध्यान खींचा.... पद्मश्री, पद्मभूषण तीजन बाई प्रशस्ति- पत्र ग्रहण कर रही है.... अच्छा लगा....आगे समाचार पढ़ने लगी...’’27 अप्रेल 2007 को नई दिल्ली में तीजन बाई को नृत्य शिरोमणि सम्मान प्रदान किया गया...।’’ गर्व हुआ छत्तीसगढ़ की इस दुलारी बेटी की विश्व-वंद्य प्रतिभा पर....। यह गर्व पहिली बार हुआ है- ऐसी बात नहीं है जब कभी तीजन बाई पुरस्कृत हुई है मेरा मन गर्व से भर उठता है। आज मन हुआ क्यों ने चलकर बधाई दे आऊँ ? वैसे मेरे लिए वह अपरिचिता ही है कभी आमने सामने जाकर कुशलक्षेम पूछने का साहस ही नहीं हुआ। विश्वविख्यात पंडवानी गायिका के सम्मान-संभ्रम से संकुचित होकर  ही मिलने का साहस नहीं जुटा पाती.... हर बार सोचकर ही रह जाती हूँ...।
बड़ा मन करता है कि उसे जानूं, समझूं उसकी विजय यात्रा की गाथा सुनूं.....पर वही....उसकी गुरूता और अपनी लघुता का बोध....दीवार बन जाता है।
अब और नहीं..... आज तो चल ही पड़ती हूँ.... अधिक से अधिक यही तो होगा न कि वो भद्रमहिला मुझसे मिलने से इंकार कर देगी.... कोई बात नहीं....कम से कम यह संतोश तो होगा कि मैंने मिलने को प्रयत्न तो किया....। मन दृढ़ हुआ.... सरसरी नजर से अखबार देखी.... नहाने चल पड़ी। कुछ ही देर में मेरी दुपहिया सड़क पर दौड़ने लगी.... पर मन...फिर उल्टी दिशा में भागने लगा....। बहुत भीरू स्वभाव की हूं मैं...। अचानक बिजली सी कौंधी कि कहीं वे दिल्ली से वापस नहीं आई हो तो ? मन ने कहा ‘‘लौट चलो मैडम...।’’
वर्शो से संचित साध ने उत्तर दिया....ऊंह....इतने दिन दिल्ली में रूकी थोड़ी रहेंगी, जब निकल पड़ी हो तो चलो सेक्टर 1 कौन दूर है.... न होगा तो वापस आ जाओगी....अरे...घर ही देख लेना....। यही तीन पांच सोचते....सेक्टर 1 चौक पहुंच गई वहाँ....आम बेचने वाले से तीजन बाई के घर का पता पूछी.... बड़ा अच्छा लगा..कि पूरे आदर के साथ उसने बताया कि सड़क 18 क्वार्टर नं. 6 है....अगले चौक से दाहिने मुड़ जाइएगा....शायद तीसरा क्वार्टर है....नेमप्लेट लगा हुआ है। चलो.... पहुंच गये.... पर गेट पर लिखा है ‘‘बिना अनुमति प्रवेश वर्जित है।’’ अब....क्या करूं....किससे अनुमति लूं? गाड़ी खड़ी करके इधर-उधर देख ही रही थी कि पन्द्रह सोलह सोल की दुबली गोरी सी लड़की ने पूछा ‘‘किसे खोज रही हैं मैडम ?’’ अंधा क्या चाहे दो आंखे तुरन्त बोली ‘‘बेटा! तीजन बाई जी घर पर हैं....?’’ बड़ा संतोशदायक उत्तर मिला ‘‘हां....हैं....आईये...बैठिये....वे....नहा रही हैं।’’
चलो....पहली सफलता तो मुझे मिल गई....थोड़ी प्रतीक्षा तो मैं कर ही सकती हूँ।
इधर-उधर देखने लगी साफ-सुथरा आंगन....नीम की छाया में.... रखे गुलाब के गमले....मोगरे की गंध ने तृप्त कर दिया...बाई ओर तुलसी मंच में....घनी काली तुलसी मंच में....घनी काली तुलसी मंच में....घनी काली तुलसी....मंच पर रखा मिट्टी का दिया.....बता रहा था कि तुलसी की नित्यप्रति पूजा अर्चना कर धूप-दीप सहित नीराजना की जाती है।
बरामदे में बैठने जा रही थी कि जलद गंभीर परिचित स्वर सुनाई दिया ‘‘गुड्डी मेहमान को बिठा मैं अभी आ रही हूँ, पानी-वानी के लिये भी पूछ....।’’ यह परिचित स्वर तीजन बाई का ही था। अच्छा लगा कि इस घर में भारतीय संस्कृति को मान्यता प्राप्त है..... आगन्तुक अभी भी अतिथि देवो भव की गरिमा पाता है।
छोटा सा बैठक कमरा....दीवान और सोफा सेट से सजा हुआ था....कीमत फर्नीचर नहीं था पर सुरूचिपूर्ण ढंग से कक्ष सुव्यवस्थित था....।
दीवारों को देखने लगी.... आंखें... खुली की खुली रह गई... हर दीवार....तीजन बाई के प्रशस्ति पत्रों से सुशोभित है। कोई सुनहरे फ्रेम वाला है कोई काले फ्रेमवाला तो कोई लकड़ी के रंग का भूरे फ्रेमवाला....पर है सब सम्मान पत्र ही है भिन्न भिन्न संस्थाओं द्वारा प्रदत्त....तो छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग द्वारा प्रदान बड़ा सा मानपत्र भी है। पद्मश्री, पद्मभूषण प्रशस्ति पत्र....देश के प्रथम नागरिक राश्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित....। गिनती करना ही कठिन हो रहा था तो दाता संस्थाओं के नाम कब पढूं....?
दरवाजे के सामने कोने वाली मेज पर कांच के शोकेस में सुनहरे रंग का छोटा सा तंबूरा है.... पास जाकर ध्यान से देखी तो अभिभूत हो गई, कितना भावपूर्ण, अर्थपूर्ण है यह छोटा सा तंबूरा....हाँ....सारा जीवन जिसने इस वाद्ययंत्र का प्रयोग किया है, जो तीजनबाई की पहचान है उसके अस्तित्व का एक अविच्छिन्न अंग। दिनांक 13 मार्च 2003 को जनजातीय कार्य मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रदत्त यह छोटा सा तंबूरा....मौन रहकर भी तीजन बाई की विजय-यात्रा की अनेक गाथायें सुनाता है।
वही लड़की गुड्डी आई....टेª में पानी, चाय और छोटी सी प्लेट में नमकीन बिस्किट थे अब तक खड़ी हूँ देखकर कौतुकपूर्ण ढंग से हंसी ‘‘बैठिये न मैडम....दीदी आ रही है।’’ कहते हुये सेन्ट्रल टेबल पर टेª रखकर वापस चली गई।
अतिथि सत्कार का सुख भोग ही रही थी कि परदा हटाकर जिसने प्रवेश किया उस महिला को देखती रह गई.... फोटो देखती रहती हूँ जिसमें वह पारंपरिक पंडवानी गायिका के साज-fसंगार में ही दिखाई देती है आज....अलग ही रूप दिखा। सद्यस्त्राता श्यामा....गीले बालों से अभी भी पानी की बूंदें चू रही थी....। हल्की आसमानी साड़ी के साथ उसी रंग का ब्लाउज....पांवों में चप्पल नहीं....बल्कि महावर रची एड़ियां....पायल बिछिया से सुशोभित पांव थे....। हाथ जोड़कर नमस्कार की....तब चेहरे की ओर ध्यान गया....स्निग्ध.....सतेज मुखमंडल....पतले पतले ओंठ....और उन ओठों से निकला स्वर...सधा हुआ....तभी तो इन्हें कोकिल कंठी कहते हैं। लगभग बाइस वर्शों बाद देख रही हूँ, ऋतु-तन तो पहले भी नहीं था पर अब तो शरीर भर गया है बल्कि कहूं कुछ पृथुल हो गया है....तो अब उम्र भी तो अब उम्र भी तो पचास पार कर गई....वह तो निरंतर कार्यक्रम देते रहने से..... शरीर अभी भी सधा हुआ है....वरना....। नहीं....प्रौढ़ता की अपनी शोभा होती है.... प्रभाव होता है....।
सुनाई दिया ‘‘आपको तो पहचान नहीं पा रही हूँ....खैर...कैसे आना हुआ....?’’ इस बार सम्वित फिरा....प्रति नमस्कार करके बोली ‘‘राजहरा के लोक कला महोत्सव में आपकी पंडवानी सुनी थी शायद 1984 या 85 मई माह था तारीख याद नहीं है। तभी से आपकी प्रशंसिका हो गई....पर कभी दर्शन का सौभाग्य नहीं मिला।’’ इस बार तीजन बाई की मुक्त हंसी से कमरा गूंज उठा ‘‘धन्यवाद....कहिए आपके लिए क्या कर सकती हूं, मेरे लायक कोई सेवा....।’’ वक्त कितनी व्यावहारिकता सिखा देता है पर सहजता-सरलता अभी भी ज्यों की त्यों है।
 मेरे मन का संशय, जड़ता अपरिचय की ग्लानि सब धुल पुंछ गई....अपनत्व की प्राप्ति ने सारा असंतोश संभ्रम दूर कर दिया। बोली ‘‘मैं सरला शर्मा हूँ, नृत्यशिरोमणि सम्मान के लिये आपको बधाई देती हूँ....बहुत दिनों से आपसे मिलने की इच्छा थी इसलिए बिना पूर्व अनुमति के चली आई हूँ....।’’
चौंक उठी मैं उनका जवाब सुनकर ‘‘हां....आपको जानती हूँ....नाम सुना था...कुछ लिखती भी तो हैं न....आपकी छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह ‘सुरता के बादर’ और उपन्यास ‘माटी के मितान’ के कुछ अंश सुनी हूं....।’’
मेरे मुंह से निकल गया ‘‘सुनी हैं....।’’ बाल सुलभ निश्छल हंसी से तीजन का मुखमंडल उद्भासित हो उठा’’ अरे! बहन...मैं तो निरक्षर हूँ....ले देकर हस्ताक्षर कर लेती हूँ.... थोड़ा बहुत पढ़ लेती हूँ....पर साहित्य का अध्ययन तो मेरे लिये कठिन ही है...। किसी से पढ़वाकर सुनती हूँ।’’
अवसाद मिश्रित क्षोभ की मलिन छाया ने उसके मुख मंडल को fकंचित धूमिल कर दिया उसका ध्यान बंटाने के लिए ही बोली ‘‘आपकी साड़ी बहुत सुन्दर है...।’’ छोटी सी प्रशंसा भी मलिन भावों को पल भर में दूर कर देती है....तीजन बाई भी विहंस उठी....सोफे पर बैठते हुए मुझे भी बैठने का संकेत की। प्रथम परिचय की जड़ता हम दोनों के बीच मौन बनकर खड़ी हो गई मुझे जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ जब तीजन बाई ने बातचीत की पहल की बोली ‘‘आप भाग्यशालिनी है जो अपने मन की बातें, अपने अनुभव लिख सकती हैं अन्यथा उत्तम से उत्तम विचार, अच्छे से अच्छे अनुभव भी मन की परतों में दबे-दबे दम तोड़ देते हैं।’’
तुरन्त मैंने कहा ‘‘आपके पास तो अनुभवों का भण्डार है, देश-विदेश में पंडवानी प्रस्तुत करती हैं लाखों प्रशंसकों से मिलती हैं बताइये...न कुछ....सुनकर मुझे अच्छा लगेगा।’’
क्षण भर मौन रहकर...मुझे देखती रही मानों समझने का प्रयास कर रही है कि मुझको अपने अनुभवों का हिस्सेदार बनाना उचित होगा या नहीं ? मैं अस्वस्ति बोध कर रही थी किन्तु जिसका पाला आये दिन लाखों प्रेक्षकों से पड़ता है वह....आदमी को परखने की कला में स्वतः ही पारंगत हो जाता है शायद उसकी मर्म भेदी दृश्टि ने मेरे मन की जिज्ञासा, श्रद्धा, गर्व को पढ़ लिया तभी तो बोली....।
‘‘अच्छा काम जिस किसी क्षेत्र में किया जावे प्रशंसा दिलाता ही है, लेकिन सफलता से आत्ममुग्ध नहीं होना चाहिये क्योंकि आत्ममुग्धता हमारे भावी प्रयासों में बाधक ही होती है, वरन् होना यह चाहिये कि खुद को कसौटी पर कसो, अपने ही कामों की आलोचना करो क्योंकि हर सम्मान, हर पुरस्कार लोगों के मन में आपके प्रति अपेक्षाओं में बढ़ोत्तरी करता है। अपने ही बनाये कीर्तिमानों को ध्वस्त कर नये कीर्तिमान स्थापित करने होते हैं, तभी आगे और आगे बढ़ते हुए ऊंचाइयों तक पहुंचा जा सकता है। अनवरत साधना का मूलमंत्र भी यही है।’’
इस बार मैं विस्मयविमुग्ध हो उसे देखती रह गई.... कौन कहता है ज्ञान प्राप्ति के लिये औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता होता है....। जीवन एक पाठशाला है जहां हर अनुभव मनुश्य को नई सीख देता चलता है।
लेखक बहुश्रुत होता है यह उसका गुण भी है आपद्धर्म भी है, तभी तो लिखने के लिये रसद जुगाड़ता है। रसद का लोभ नैसर्गिक है अतः उसी लोभ से प्रेरित होकर बोल उठी ‘‘इस बार दिल्ली प्रवास कैसा रहा, कैसा लगा नृत्य शिरोमणि सम्मान पाकर...?’’
वाक्पटु....चटुल किशोरी सी हंसकर तीजन बाई ने कहा ‘‘आपको मुझे सुनने की जितनी इच्छा है, मुझे भी अपनी सुनाने की उतनी ही प्रबल इच्छा है पर मेरी दो शर्ते हैं, स्वीकार करेंगी....तभी बात आगे बढ़ेगी।’’
हे भगवान्! जने कैसी शर्तें होंगी....मेरे साध्य के बाहर हुई तो....? कहीं रूपया-पैसा तो नहीं मांग बैठेगी ? अँह! कैंसी तुच्छ सोच है मेरी....अरे भिलाई इस्पात संयंत्र की कर्मचारी वर्ग की महिला है....फिर कार्यक्रमों का पैसा....पुरस्कारों की आमदनी....खेती-बारी....। क्या कमी है? मुझ जैसी सामान्य व्याख्याता की औकात उससे छिपी थोड़े ही है....। अपनी सोचों में खो गई थी कि भुवनमोहिनी हंसी हंसकर बोली तीजन बाई ‘‘अरे! डरने लायक कोई बात नहीं है पहले शर्ते तो सुन लीलिये....।’’ उसकी हंसी ने मुझे आश्वस्त किया....आंखों में प्रश्न भरकर उसे देखी, बोली कुछ नहीं....।
‘‘पहली शर्त कि मैं अपनी भाशा छत्तीसगढ़ी में बोलूँगी, दूसरी अनपढ़ होने के कारण तिथि तारीख बताने में भूल हो सकती है...हाँ घटनायें, अनुभव सब सोलह आने सच्ची होंगी.... इसे इतिहास मत समझें....घटनाक्रमों से सजी हुई गाथा ही समझें....।’’
...एक बिनती और है आप मुझे तुम कहें....मैं बहुत छोटी हूँ, उम्र में भी, ज्ञान में भी....। वक्तव्य समाप्त वह वह मेरी ओर देखने लगी....उसकी आंखों में विनय, सरलता, उत्तर पाने की आशा, स्वयं को उन्मोचित करने की अदम्य आकांक्षा एक साथ तैर रही थी....। सम्मोहित-सी मैं बोल उठी....मंजूर...मंजूर...मंजूर अब हुआ न....? पर मेरी भी शर्त है कि जब मेरी जिज्ञासा आपके नितान्त व्यक्तिगत क्षेत्र में पहुंचने का दुस्साहस करे तुरन्त मुझे टोक देना, रोक देना....मुझे बुरा नहीं लगेगा।
आंखें भर आई....संभवतः कुछ बूंदे आंखों से गिरकर आंचल में समा गई...गला रूंध गया बोली ‘‘आप पहली हैं जिन्होंने आदमी के कमजोर पक्ष को....नितान्त गोपनीय कक्ष के द्वार को न खोलने का आश्वासन दिया है...वरना लोग ऐसे-ऐसे प्रश्न कर बैठते हैं कि द्रौपदी की विवसना होने की लाज, भय, और तिरस्कार एक साथ मेरे मन पर छा जाते हैं।’’
मैं भावावेश में तीजन के दोनों हाथों को अपने हाथों में थपकते हुये बोली ‘‘तीजन ! हर आदमी के हृदय में एक परम गोपनीय कक्ष होता है जहां उसके कुछ अनमोल रत्न छिपे रहते हैं, कुछ कड़वी, कुछ मीठी यादें....सोई रहती हैं उस निभृत कक्ष में वो किसी को प्रवेश की अनुमति नही देता....। यह भी सच है कि एक उम्र हो जाने के बाद आदमी स्वयं भी उस अंधेरी कोठरी में जाने से यथासंभव बचने का ही प्रयास करता है। मैं तुम्हें वचन देती हूँ कि तुम्हारे उस गोपनीय कक्ष का द्वार पूर्ववत् बंद रहेगा मैं कभी किसी गवाक्ष से उसमें झांकने का भी प्रयत्न नहीं करूंगी....।’’
कभी-कभी बातचीत के दौरान ऐसा भी दौर आता है जब वक्ता और श्रोता दोनों मौन हो जाते हैं....भाशा छुट्टी पर चली जाती है...पर हृदय....वह तो मौन नहीं रहता....चुपके चुपके....संवेदनाओं का आदान-प्रदान चलते रहता है संभवतः यही सह अनुभूति है जो लोगों के संबंधों की प्रगाढ़ता का मूल आधार है।
चाय तो....कब की खत्म हो चुकी थी.... धूप की तेजी....डराने लगी थी....सो हाथ जोड़कर धन्यवाद सहित जाने की अनुमति मांगी....। अप्रत्याशित रूप से तीजन बाई खड़ी हो गई मेरे जुड़े हाथों को अपने हाथों में लेकर बोली....। ‘‘कल फिर आइये.... मैं बोलूंगी....आप सुनियेगा....यदि रूचे तो लिखियेगा...। लिखेंगी मेरी कहानी....? अस्थाई झोपड़ी जिसे डेरा भी कहते हैं की अत्यन्त साधारण लड़की तीजन बाई की कहानी....।’’
मोर खुशी के हत्वाक हो गई...गला रूंध गया...मेरे लेखक को इससे बड़ा पुरस्कार और मिलेगा ? भरी आंखों से सहमति सूचक सिर हिलाई....धीरे धीरे कमरे से बाहर आ गई।
जम्बू व्दीपे आर्यावर्ते भारतखण्डे मध्यभागे स्थित अविभाजित मध्यप्रदेश में महानदी, खारून, केलो नदियों से fसंचित, महाकान्तार दण्डकारण्य से समृद्ध, महाकौशल जो छत्तीसगढ़ नाम से अभिहित है, इसी पावन भूमि में दुर्ग जिले के पाटन क्षेत्र का गांव अटारी है.... कभी किसी ने सोचा नहीं था कि यह छोटा-सा गांव अपनी सारी विपन्नताओं के बावजूद किसी दिन विख्यात होगा...कभी उसका नाम इतिहास में स्थान पायेगा। मनुश्य की तरह स्थान का भी भाग्य होता है तभी तो आज पंडवानी गायिका तीजनबाई के जन्म स्थान के रूप में महिमामण्डित हो गया है.....अटारी गांव....।
पाटन की भूमि को वीरप्रसूता होने का सौभाग्य प्राप्त है। मातृभूमि पर न्यौछावर होने वाले सर्वाधिक छत्तीसगढ़िया वीर सपूतों ने इसी क्षेत्र में जन्म लिया है, दूसरी ओर राजनैतिक जागृति की दृश्टि से भी यह क्षेत्र सदैव महत्वपूर्ण रहा है।
भारत तो गांवों का देश ही है....यfत्कंचित असमानता होते हुये भी प्रायः सभी गांव एक जैसे ही हैं न सिर्फ भौगोलिक वरन् सामाजिक दृश्टि से भी....तो अटारी भी उन्हीं अनेक गांवों में से एक है...स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकास की राह देखता अटारी कब औद्योगीकरण के चलते अपने मूल रूप से अलग होकर शहरीकरण में ढलने लगा इसका अनुमान ही लगा सकते हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 9 साल बाद 8 अगस्त 1956 को अटारी गांव के पारधी परिवार परिवार में एक कन्या का जन्म हुआ। परिवार में कोई विशेश बसमता नहीं हुई....। गोल-मटोल स्वस्थ श्यामला बिटिया को गोद में लेकर मां की ममता ने किसी दुराभाव को अपने मन में स्थान नहीं दिया।
तीजन बाई ने आगे बताना शुरू किया। पिता का नाम स्व. झुनुकलाल पारधी
था माता का नाम स्व. सुखबती बाई था। तीन बहनों में अकेला भाई शेराfसंह बचपन से ही अपनी विशिश्टता से भली-भांति परिचित था। माता-पिता का अतिरिक्त स्न्नेह भी उसे मिलता था। बहनें भी अपने भाई के दुलार में कभी कोई कमी नहीं होने देती थीं। घर में जो कुछ सर्वोत्तम होता उस पर भाई का अतिरिक्त अधिकार होता। खेदा और छुटकी दो बहनें भी थी परिवार में जो तीजन बाई के साथ खेलती, कूदती, लड़ती, झगड़ती बड़ी होती रही-इन सारी प्रक्रियाओं के बीच तीनों बहनों में कब सख्य भाव पनप उठा पता ही नहीं चला....। पेड़ से टपका आम हो या घर में उपलब्ध रोटी..समान भागों में ही वितरित होता था...गरीबी ने बहनों के बीच अटूट रिश्ते को जन्म दिया जो बहन, सखी अभिभावक का मिला जुआ रूप था।
मैंने पूछा ‘‘तीजन ! पारधी जाति के बारे में बताओ....।’’
तीजन ने लंबी सांस खींचकर कहा ‘‘पारधी जाति ने सुख का मुंह कभी देखा ही नहीं बहन। असल में पारधी....यायावर होते हैं जिन्हें घुमन्तू या खानाबदोश भी कहते हैं। इनका घर तो होता नहीं था....घूमते घामते आजीविका की तलाश में जहां जिस शहर, गांव में पहुंचते वहीं बस्ती से कुछ दूर तालाब या नदी के किनारे डेरा डालते....। इस डेरे को तम्बूनुमा घर कह सकते हैं। आंधी, पानी, धूप, वर्शा, सब कुछ इन्हीं डेरों पर रहकर गुजारना पारधी की नियति रही। जंगलों पर आधारित था इनका जावन....। जंगली मधु, जड़ी बूटियां एकत्र कर बेचना ।....साथ ही पशु-पक्षी पकड़कर भी बेचा करते थे....जब तक वन्य संरक्षण कानून नहीं था इस व्यवसाय ये येन-केन प्रकारेण उनका परिवार, पेट पालता रहा.... फिर तो जैसे विपत्ति का पहाड़ ही टूट पड़ा.....सुरक्षा कर्मियों द्वारा पकड़े जाने पर....गाली-गलौज, मारपीट तो कभी-कभी जेल जाने की नौबत भी आ जाती। पारधी पशु पक्षियों का शिकार भी करते थे....बड़ा अचूक निशाना साधते थे.....फिर जाल फैलाकर पक्षियों को दाना डालकर पकड़ने में भी वे सिद्धहस्त होते थे.....इन्हीं पक्षियों को fपंजरे में कैद कर बाजार हाट में बेचा करते....। घर की fस्त्रयाँ....छीन पेड़ (ताड़ की तरह का एक पेड़) के पत्तों से चटाई बुनती, झाड़ू बनाती....दिन भर की मेहनत शाम को बाजार में बिकती....कभी वाजिब कीमत मिलती तो कभी लगता दिनभर का परिश्रम निरर्थक हो गया...।’’
तीजन की माता सुखबती छीन पत्तों से खिलौने बनाना भी जानती थी....उनकी निपुण उंगलियों से छीन के पत्ते कभी पान रखने की बसनी बनते.....तो कभी गेंद.... कभी हाथी कभी घोड़ा....। इन खिलौनों को महाऊर रंग से गुलाबी रंग भी देती थी......सामान्य पारधी fस्त्रयों से सुखबती की कृतियों की कलानिपुणता अपना अलग स्थान प्राप्त करती थी। ‘‘अच्छा तीजन अपने बचपन की कोई घटना बताओ....।’’ पूछते ही तीजन की हंसी अबाध निर्झर सी बह चली....इतना हंसी कि आखों में आंसू आ गये।
कहने लगी ‘‘बचपन अरे....जब मैं 6 दिन की थी....तब की बात सुनिये....। पारधी fस्त्रयां प्रसूति के छठवें दिन नहाधोकर छठी माता की पूजा करती हैं....स्वस्थ सन्तान के लिए धन्यवाद ज्ञापन करती हैं.....। तो मेरी मां भी नवजात कन्या को कपड़े में लपेटकर पड़ोसिन बच्ची राधाबाई को पहरे पर बिठाकर नहाने चली गई....। पिता जिन्हें हम बाबू कहते थे.....वे पास के डेरे में किसी काम से गये थे.....। राधा बाई भी तो बच्ची ही थी कितनी देर एक जगह बैठी रहती.....अन्य बच्चों के साथ सामने ही (थोड़ी दूर पर) कंची खेलने लगी....।’’
नहाकर डेरे पर लौटी मां ने नवजात शिशु का रोना नहीं सुना.... आशंकित होकर बिस्तर के पास आई....शिशु तो वहां है नहीं....। दहाड़ मार कर रोने लगी... कि बच्चा-चोर आकर बेटी को ले गया.... आसपास के डेरो से निकलकर सब इकट्ठे हो गये...यह कैसी अनहोनी है....लोग तरह-तरह की अटकले लगाने लगे....राधा बाई से पूछा गया तो घबराहट के मारे जोर-जोर से रोने लगी....।
पड़ोसी डेरा वाले का दसेक साल का लड़का रामू दौड़ता हुआ आया....उसने बताया कि कालू (पाला हुआ कुत्ता) मंुह में कपड़े की गठरी दबा कर....पिछवाड़े में दुबका हुआ है....। समझते देर नहीं लगी कि डेरे को सूना देखकर कालू ने बच्ची को उठा लिया है.... मारे डर के मां तो चीखकर बेहोश हो गई....। बड़े बूढ़ों ने समझाया हल्ला-गुल्ला करने से कालू बिफर कर बच्ची को नुकसान पहुंचा सकता है इसलिए झुनुकलाल हाथ में रोटी लेकर जाये और कालू को तूतकार कर बुलायेब पहली बात तो यह कि कालू मालिक की तूतकार समझ जावेगा, दूसरी कुत्ते को रोटी का लालच भी होगा....। बाकी लोग दूर में रहेंगे.... जैसे ही कालू.... कपड़े की गठरी को नीचे रखकर रोटी के टुकड़े के लिये लपकेगा.... कोई सयाना जाकर गठरी को सावधानी से उठा लेगा....।
पूर्वानिर्धारित योजना का सुपरिणाम शीघ्र ही सामने आया....कालू ने गठरी को छोड़ दिया.... और बहिन....उस कन्या का नया जनम हुआ।....थोड़ी देर चुप रहकर बोली ‘‘जानती हो बहन....कुत्ते ने भी मुझे छोड़ दिया....पारधी घर की लड़की थी न....।’’
ओह....। क्या कहूं....बोली ‘‘नहीं तीजन! कोई जाति छूत या अछूत नहीं होती....मनुश्य तो सभी एक समान है एक ही ईश्वर के द्वारा बनाये जाते, हैं रक्त, मांस, श्वास, प्रश्वास, जीना-मारना सब समान होता है, जाति भेद तो हमारा समाज करता है।
जानती हो तीजन....पारधी जाति के ही एक व्यक्ति ने द्वापर में श्रीकृश्ण के तलवे को हिरण की जीभ समझकर बाणबिद्ध किया था...रो रोकर उसने कृश्ण से अपने अपराध की क्षमा मांगी थी, परात्पर कृश्ण ने कहा था देह को तो नश्ट होना ही होता है....उसके नाश का निश्चत समय भी विधाता ने जन्म के समय ही तय कर दिया होता है देहत्याग का माध्यम कोई भी बने....।’’
चलो तुम्हरी व्याध जाति की एक और घटना सुनो। ऋशि वाल्मिकी अपनी कुटिया से तमसा नदी स्नान करने जा रहे थे कि क्रौंच पक्षी की वरूण क्रेंकार सुनाई पड़ने लगी.... ऋशि का हृदय नर पक्षी को शरविद्ध देख कर करूणा विगलित हो गया....तो मादा क्रौंच की करूण विलाप....असहय वेदना की सृश्टि करने लगा। वाल्मिकी के मुंह से दो पंक्तियां निकलीं-
‘‘मा निशाद प्रतिश्ठां त्वमगमः शाश्वती समा
यत् क्रौंच मिथुनादेक मवधी काम मोहितम्।’’
...रामायण महाकाव्य के रचनाकार द्वारा रचित प्रथम काव्य पंक्तियां....।
जानती हो तीजन ! उस दिन व्याध ने पक्षी को बाण न मारा होता तो करूणा विगलित ऋशि ने काव्य रचना ही नहीं की होती। प्रकारान्तर से व्याध ही ता श्लोक रचना का प्रमुख कारण हुआ न....?
दोनों दृश्टांतों को सुनकर तीजनबाई का मन खिन्नता से मुक्त हुआ.....एक विशेश बात लक्ष्य की हूँ कि उसके मन में भावान्तर शीघ्रता से होता है संभवतः एकाभिनय का प्रभाव है।
‘‘आज की तीजन बाई दूसरी बार भी मृत्यु मुख से वापस आई है बहन....सुनोगी....।’’
उसके उत्साह को बढ़ाने के लिये जोर से बोली ‘‘हां.....हां.....अवश्य सुनाओ...।’’
आंखें बंदकर मानों सुदूर अतीत का आवाह्न करने लगी....फिर बोलना शुरू की ‘‘ठीक से तो सन् संवत याद नहीं है पर मेरी उम्र उस समय दसेक साल की रही होगी। हम लोग पेट पालने के लिये दुर्ग आ गये थे.... स्टेशन के पीछे.... जहां आजकल नई बस्ती बस गई है.... हाँ रेल्वे लाइन के उस पार....वही डेरा वाले थे... तब तक मेरी छोटी बहन भी जनम चुकी थी....। बढ़ती मंहगाई और परिवार की बढ़ोत्तरी ने बाबू को बेजार कर दिया था.....क्या बताऊँ बहन! उस समय की गरीबी को याद करती हूँ तो अभी भी कलेजा कांप जाता है आज शायद ही कोई विश्वास करे कि तब मैं पांच कण्डील क्षेत्र में भीख मांगा करती थी.....। इसी तरह गरमी के दिन थे.... खाना तो नसीब मुश्किल से होता था पीने के पानी के लिए भी बड़ी किल्लस उठानी पड़ती थी....तब दुर्ग स्टेशन भी आज के समान बड़ा नहीं था कि जगह-जगह नल लगा हो। एक दिन भीख में मुझे भजिये मिले....याद आता है भटे के या आलू के बड़े-बड़े भजिये थे वह भी चार....। सोची खा लेती हूँ....भूख से पेट की अंतड़ियां कुलबुला रही थीं....भाई बहनों की याद आई तो मुंह तक गया भजिया.....वापस फ्राक में छिपा कर डेरे की तरफ दौड़ पड़ी....। चारों भाई बहन एक-एक खाकर पानी पी लेंगे....। तपती धरती पर नंगे पैर....तीखी धूप में पसीने से नहाकर डेरे पर पहुंची...तुरन्त भाई बहनों के हाथ में भजिया पकड़ाई....क्या कहूं....उनकी आंखों में जो बसमता दिखी वह इस जनम में और कभी दिखी ही नहीं....। भजिया खाकर पानी पी लिये।’’
रात को मुझे बुखार चढ़ गया थोड़ी देर में उल्टी-दस्त शुरू हो गया....। उस समय आसपास हैजे का प्रकोप था....महामारी और क्या? डाक्टर बाबू के पास जाकर दिखाने को पैसा तो था नहीं फिर भी घरू इलाज किये कोई फायदा नहीं हुआ.... हालत बिगड़ती गई....मुझमें इतनी ताकत भी नहीं बची थी कि डेरे से निकल कर तालाब तक जाती.... इसी बीच बाबू को पास वाले डेरे से पता चला....इनार हैजा तेजी से फैल रहा है डेरे वालों को डेरा छोड़कर जिला अस्पताल के पास जाना पड़ेगा वहीं सबको टीका लगेगा....। मुझे तो कोई होश था नहीं.....उस समय महामारी फैलाने पर संक्रमण के डर से कोई पास भी नहीं फटकता था...बूढ़े तिलक बाबा ने कहा ‘‘झुनुकलाल ये लड़की तो हाथ आने वाली नहीं हैं.... ये तो गई....अब बचे बच्चों के साथ हमारे साथ चलो कम से कम उनकी जान तो बचे....। मां रोने लगी ....उसका कलेजा फट रहा था....बाबू के पांव भी नहीं उठ रहे थे.... लोगों ने समझाया....हंसा उड़ गया...शरीर तो माटी है....माटी का मोह कैसा? कफन-दफन में समय बरबाद होगा....तालाब किनारे तो रह नहीं सकते....चलो....। मजबूरी में मां (दाई)  बाबू उनके साथ चले गये। कौन जाने कितनी देर तक पड़ी थी....आंख खुली तो सूरज सिर पर चढ़ आया था उठने की ताकत तो नहीं थी प्यास से छाती फटी जा रही थी....खलासी चम्पालाल की पत्नी उधर से जा रही थी...उसने मुझे देखा....पानी पिलाई.....मुझे पहचान गई थी.....दौड़कर चम्पालाल को बताई कि तीजन fजंदा है.....चम्पालाल उल्टे पांव कचहरी की ओर भागा.....वहां....बाबू सिर पर हाथ धरे बैठे थे मां के आंसू अभी तक रूके नहीं थे....चम्पालाल ने कहा’’झुनुक तोर तीजन जियत हे....चल...।’’बाबू ने कहा’’ काबर मसखरी करत हस....तीजन ल तो मैं हजा डारेंव।’’ अर्थात् तीजन को मृत्यु ने हमसे छीन लिया है। अंततः चम्पालाल के साथ बाबू और डेरे के चार लोग साथ आये....बाबू अपनी पीठ पर लादकर मुझे जिला अस्पताल लेकर आये....दवा दारू....मिली और मैं जी गई।
मैं सोच रही थी तीजन! तुम्हें मृत्यु ने दो-दो बार जीवनदान इसीलिए तो दिया है ताकि तुम कालजयी पंडवानी गायिका बन सको....।
तीजन बाई ने कहा ‘‘आज भी दुर्ग स्टेशन जाने पर मुझे अपने डेरे की याद आ ही जाती है। पांच कण्डील चौक में फटे-चीथड़े हो गये फ्राक में, नंगे पैर....तपती दोपहरी में भीख मांगती दुबली-पतली, सांवली लड़की दिखाई देती है।’’ यदि तीजन बाई से न सुनकर किसी और के मुंह से सुनती तो शायद कभी भी विश्वास नहीं कर पाती कि कहानी, उपन्यास में वर्णित कथानक की नायिका की तरह उसका जीवन था....इतनी गरीबी....इतना अभाव....जिसने देखा है उसे संपत्ति का अभिमान कभी हो ही नहीं सकता....तभी तो आज भी तीजन बाई....खुद को छोटा कह सकती है। गरीबों का दुख समझती है यथासंभव सहायता करती है....। अपने संगतकारों के साथ आत्मीयता का संबंध रखती है उनके सुख-दुख में साथ निभाती है....। किसी की अम्मा है, किसी की दीदी, किसी की भाभी....। ये सारे रिश्ते....नेह बंध नही तो हैं.....रक्त संबंध नहीं हैं।
आत्म मंथन में बाधा पड़ी....तोतली वाणी सुनी....ता-ता....नई....नई....आह ! आखें जुड़ा गई. गोरा गुलगोथना, गदबदा करीब 18 महीनों का बालक दादी के पैरों से लिपटा जा रहा था....आंखों में भरी शिकायत नाराजगी जताती हुई आवाज....घुंघराले बाल उड़कर गालों को चूम रहे थे.... छोटी सी नाक आवेश से फूल गई थी....। बड़े दुलार से तीजन बाई ने पूछा ‘‘क्या हुआ कनु....? मां ने मारा क्या ?’’ अत्यन्त कुशलता से झट गोदी में चढ़ बैठा....दुलारा पोता.... नन्हीं ऊंगली....मां की ओर उठ गई....।
हम दोनों हंस पड़े वही पुरानी शिकायत....दूध नहीं पीना है....माता की ज्यादतियों की दादी से शिकायत....। वात्सल्य का यह चिपरिचित दृश्य है, पर पात्र बदलते रहते हैं।
बहू के हाथ से दूध लेकर बोली ‘‘कनु बेटा दूध पियेगा तो राजा बेटा बनेगा, दादी के साथ घूमने जायेगा.....है न.....?’’ जाने उस कथन में क्या जादृ था सुबोध बालक की तरह कनु ने दूध पी लिया....उसके घुंघराले केशों पर ममता भरा हाथ फिराने लगी तीजन बाई....गुन-गुन करने लगीं.....।
‘‘चंदन के पलना झुलावै नंदरानी
पौढ़े हे नंद के लाल।
पैंया परत हे महादेव के
जुग-जुग जियै गोपल।’’
वात्सल्यरस पूर्ण लोरी....तीजन बाई के सधे सुर से मिलकर कानों में अमृत घोल रही थीं। कनु का माथा चूमकर बहू को इशारा की उसे सुला देने के लिये.....। मैं सोच रही थी पद्मश्री, पद्मभूषण तीजन का यह भारतीय परम्परा की गरिमामयी छवि....भी कितनी मोहक है। इतनी बड़ी गायिका....घर गृहस्थी के छोटे-छोटे कर्तव्य भी किस दक्षता से निभाती है....।
‘‘क्या सोचने लगी बहन....? पूछी तो मैं चौंक गई.....। अन्यमनस्कता से उबरी नहीं थी बोल पड़ी’’ कनु ही नहीं सभी बच्चे दूध न पीने की जिद करते हैं न...?’’
कुछ गंभीर होकर बोली तीजन ‘‘दूध मिलता है तभी तो इन्कार की गुंजाइश रहती है न बहन....हमारे देश में लाखों बच्चे....हैं, जिनकी मातायें अपने लाल को दूध नहीं दे सकती....लाखों माताये हैं जिन्हें पेट भरने की धुन में लोरी की धुन को विसर्जित करना पड़ता है। गरीबी हमारे देश से कब जायेगी ? जिस देश के नौनिहालों का बचपन बूंद भर दूध के लिये तरसते हुए बीतेगा....वहां प्रतिभासम्पन्न सबल नागरिक कहां से आवेंगे....?’’
पंडवानी-पारंगता तीजन का यह रूप.... देश-समाज की चिन्ता....जैसे-जैसे उसे जान रही हूँ....उसके व्यक्तित्व के अनचीन्हे अनछुये....पहलुओं से परिचित होती जा रही हूँ....उसके प्रति आदर भाव वैसे-वैसे बढ़ता जा रहा है।
तीजन बाई ने कहा ‘‘आपको एक घटना सुनाऊं बहन....मेरी भी सुनी हुई है.... बाबू जंगल से हिरनी पकड़कर लाये....सोचे थे शहर में बेचेंगे...अच्छी कीमत मिल जावेगी....। डेरे के ही एक कोने में खूंटे से बांध दिये....शाम को दुर्ग का बाजार लगेगा....।...बाजार के लिये निकलते समय जब हिरणी को खूंटे से खोलकर ले जाने आये तो चीख पड़े....’’तीजन के दाई....देख...देख तो।’’ मां आई....घुटनों के बल बैठी तीजन हिरणी का दूध  पी रही है....बड़ी- आखों में अपार स्नेह भरकर हिरणी बच्ची को निहार रही है, परम ममता से भरकर दूध पिला रही है।
मैंने हंसकर कहा’’हिरणी मां का दूध पिया है तुमने इसीलिये तुम्हारी आखंे हिरणी सी है, मंच पर हिरणी सी कुलांचे भरकर परिवर्तित संवाद बोलती हो....।’’
उंसास भरकर कहा तीजन ने ‘‘इतना तो नहीं जानती....पर...इस उम्र में आकर इतनी समझ आ गई है कि मां की कोई जाति, धर्म, वर्ग, योनि नहीं होती....वह सिर्फ मां होती है....मूर्तिमयी वात्सल्य...सृजन और पालन ही जिसकी पहचान है।’’
दोपहर हो गई है ऐसा लगा कि तीजन बाई थक गई है....हाँ स्मृति मंथन भी थका देता है....थकता शरीर नहीं मन है....। स्मृति मंथन एकान्त चाहता है...निभृत एंकात....किसी अन्य की उपस्थिति अब अप्रीतिकर ही होती है, विरक्ति पैदा करती है यही सोचकर मैंने कहा’’ आज मुझे छुट्टी दो, कल फिर आऊंगी तब फिर बातचीत करेंगे....।’’
यादों की गलियों में भटकती तीजन लौट आई वर्तमान में....क्षणभर के मौन के...बाद स्वीकृति सूचक....हूँ...बोल कर नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ खड़ी हो गई। प्रतिनमस्कार कर मैं घर आ गई।
रात के बारह बजे हैं....वह तो रोज का नियम है....इसमें कोई विशेश बात आपको नहीं दिखाई देगी....मैं बताती हूँ विशेशता क्या है? तो मैं क्षुब्ध हूँ....नाराज हूँ...झुंझलाहट से मन भर गया है...तो नींद कैसे आयेगी ? तो वह पात्र कौन है? अरे भाई अन्य कोई हो तब तो....वह तो मैं स्वयं हूँ....अपनी दुश्मन....आप ही हूँ....।
बात ये है कि हम आप सभी तो अपने-अपने जीवन को लेकर अत्यन्त व्यस्तता में डूबे रहते हैं। हमारे आस-पास अच्छी-बुरी घटनायें घटती रहती हैं....उन्हीं को आधार बनाकर जाने कितने उपन्यास, नाटक, कहानी, काव्यग्रंथ लिखे जा रहे हैं.... लेखकों की कमी तो है नहीं?....बल्कि यह कहूँ कवियों की संख्या भारत की जनसंख्या की तरह दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। कहानीकारांे का भी अभाव नहीं है तो मैं क्यों लिखने लगी हूँ? चलिये स्वान्तः सुखाय लिख भी लिया तो इस छपास रोग के चंगुल से छुटकारा कैसे पाऊँ? कोढ़ में खाज....अन्तर्राश्ट्रीय स्तर की पंडवानी गायिका तीजन बाई को ही अपने लेखन का केन्द्रबिन्दु क्यों बना बैठी हूँ? तीजन के जीवन का दुःख, अभाव, दरिद्रता, दो जून भरपेट खाकर जीने की उद्दाम लालसा ने ही मेरी नींद को दरवाजे के बाहर खदेड़ दिया है.....। असल बात यह है कि जिजीविशा कितनी प्रबल है? इतनी विपरीत परिस्थितियों में पलते-बढ़ते हुये भी कब वह गायन के मोह में पड़ी? पड़ भी गई तो अपने इस मोहक सपने को पूरा करने में उसे किन-किन स्थितियों का सामना करना पड़ा....दृढ़निश्चयी बालिका थकहार कर, लड़ाई बंद कर बैठ क्यों नहीं गई....? अपने अस्तित्व की लड़ाई अकेली कैसे लड़ पाई....यही सब मन को मथे डाल रहा है....।
‘‘जितने कश्ट कण्टकों में है
जिनका जीवन सुमन खिला,
गौरव गंध उन्हें उतना ही
यत्र-तत्र सर्वत्र मिला।’’
मैथिलीशरण गुप्त ने संभवतः ये पंक्तियां तीजन बाई जैसे जुझारू व्यक्तित्व के लिए ही लिखा होगा।
मेरी प्रार्थना को तो fनंदिया रानी सुनती नहीं संभवतः थकान की बिनती पर ध्यान दिया हो...पलकें बोझिल होने लगीं....। आंख खुली...घड़ी दुखी सुबह के 5.30 बजे थे....। नहाना, धोना, तैयार होना....इस सब में घण्टे भर से ज्यादा समय तो लगता नहीं....सो कल का लिखा हुआ पढ़ी....सोचा आज तीजन से पूछूंगी कि गायन के प्रति अभिरूचि कब जागी?
आज जब उसके घर पहुंची तो प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी....तीजन बाई नहा धोकर मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। हर आदमी आप बीती सुनाने को आतुर रहता है, सहानुभूतिशील श्रोता मिलना ही दुर्लभ है, अन्य कारण जो भी हों प्रमुख कारण है व्यस्तता....उदरभरण की समस्या सुलझाने में ही सारा समय निकल जाता है, रहा-सहा समय घर परिवार की भेंट चढ़ जाता है....हां....कुछ समय दूरदर्शन को भी अर्पण करना पड़ता है।
नमस्कारान्त प्रश्न की ‘‘तीजन बाई यह बताओ कि तुमने गाना कब और कैसे सीखा...?’’
मुस्करा कर तीजन ने बताया कि ‘‘बाबू जंगल से तोता पकड़ लाये थे....कंठ फूटा नहीं था इसलिये fपंजरे में बंद कर डेरे में रख दिये....। टें....टें करके-करके एक दिन उसने सीटी बजाई मुझे बड़ी खुशी हुई....फिर तो क्रम तोता और मैं सीटी बजाने लगे....बाबू बड़े खुश....कि चलो अब तोता राम-राम सीख जायेगा...मुझे प्रशिक्षक नियुक्त कर दिया गया....। आवाज के प्रति यही मेरा प्रथम आकर्शण था। इसके बाद की घटना है। बाबू बांसुरी बजा रहे थे कि जाने क्या हुआ मां गाने लगी....सुर और साज के संगम ने मुझे मन्त्रमुग्ध कर दिया....ध्यान से सुनी....आश्चर्य तो तब हुआ जब थोड़ी ही देर बाद मैंने बाबू को फिर से बांसुरी बजाने को कहा और मां का गाना ज्यों का त्यों सुना दिया....।’’
मैं सोच रही हूँ जन्मजात प्रतिभा इसी को कहते हैं। यह बात भी सिद्ध हो जाती है कि तीजन शुरू से ही मेधाविनी, कुशाग्रबुद्धि और प्रखर स्मरणशक्ति की मालकिल रही है भविश्य में गुणों ने उसे पूरी पंडवानी कंठाग्र करने में मदद किया....। स्थाई निवास स्थान तब तक नहीं था, डेरा बदलना पारधियों की नियति थी इसलिए तीजन को औपचारिक शिक्षा नहीं मिल पाई...। कैसे भी अटारी उसका जन्म स्थान अवश्य है किन्तु गनियारी में (जो उसकी मां का मायका था) वहाँ एक स्थाई घर की व्यवस्था किसी तरह हो पाई....। मिट्टी की दीवारें, घास फूस की छान्हीं (छत)....।
भिलाई तीन से कुछ दूरी पर गनियारी गांव है। किसानों का गांव....कुर्मी मालगुजार थे अधिकांश कुर्मी किसानी करते सम्पन्न थे....। ब्राह्यणों का मुहल्ला कुछ दूरी पर था....पुरोहिती के साथ-साथ वे लोग भी खेती किसानी करते थे। अन्य जातियों में और साहू-राऊत भी थे। गांव के प्रमुख कास्तकार की सलाह से पारधियों को बड़े तालाब (बांधा) के पास बसने की अनुमति दी गई थी....छः सात घर के पारधी थे। बृजलाल पारधी जिन्हें बिजेलाल भी कहते थे, वे तीजन की मां के चाचा जी थे अतः रिश्ते में तीजन के नाना हुये....। खेलते-खेलते तीजन उनके घर जाती तो देखती....नाना जी गुनगुनाते रहते....तीजन को अच्छा लगता....। आड़ में छुपकर सुनती.....बड़ी बड़ी मूछों वाले भीमकाय नाना जी से डर लगता था। घर के अन्य सदस्य रोजी रोटी की जुगाड़ करने चले जाते तो घर की रखवाली का जिम्मा बिजेलाल उठाते...वयस्क होने के कारण बाहर जाकर मेहनत-मजदूरी कर पाना उनके लिये कठिन था।
प्रतिदिन की भांति तीजन पहुंच गई नानाजी के घर....आड़ में छुप गई....। आज नानाजी किसी बात पर प्रसन्न थे तभी तो जरा जोर से गा रहे थे प्रसंग था द्रौपदी स्वयंवर का....तन्मय होकर सुनने लगी तीजन....। गाना बंद हो गया....नानाजी शायद पानी पीने उठ गये थे....। गायन के सम्मोहन में डूबी तीजन....स्थान, काल भूलकर स्वयं गाने लगी....गाती रही....जाने कितनी देर....किसी के खांसने की आवाज सुनकर सामने देखी....नानाजी खड़े थे....एकटक तीजन को निहार रहे थे....।
मारे डर के तीजन की घिग्घी बंध गई, नानाजी का रौब....हाथ पैर कांपने लगे....इतनी ताकत ही नहीं बची थी कि उठकर भाग सके....फिर भागे भी कैसे सामने तो नानाजी खड़े थे....। क्या करूँ, क्या कहूं, सोच में मरी जा रही थी कि नानाजी पास आ गये.... अपना हाथ तीजन के सिर पर रखकर बोले ‘‘मोरे घर मं रतन हावय जानत नई रहें बेटी’’ नानाजी की आखें भर आई थी....गला रूंध गया था खंखारकर गला साफ किये पूछे’’तीजन! कब से सीख रही हो और किससे सीख रही हो।’’ कांपते सुर में किसी तरह बोली तीजन’’ एक सप्ताह से रोज आती हूँ आप गाते रहते हैं सुनती हूँ....मुझे आपका गायन अच्छा लगता है....।’’
नानाजी पूछा ‘‘क्या-क्या सुनी हो....मुझे सुनाओ...डरो मत....चलो माची में बैठकर सुनाना....।’’ हाथ पकड़कर तीजन को माची (छोटी खटिया) में बिठाकर स्वयं जमीन में बैठ गये...। डरते डरते....तीजन ने शुरू किया....थोड़ी ही देर में सहज स्वाभाविक होकर ‘द्रौपदी स्वयंवर’ की पूरी कथा सुना डाली....। नानाजी का दबदबा कहां बिला गया....सीखने की बलवती लालसा तीजन की आंखों में झिलमिला रही थी। प्रवीण गायक ने भावी पंडवानी गायिका को पहचाना....प्रतिभा को परखने में उनसे कभी भूल नहीं होती थी....। गुरू ने शिश्या का स्वागत किया....। योग्य गुरू भी योग्य गुरू भी योग्य शिश्य की प्रतीक्षा करते रहते हैं जिसे अपने ज्ञान का उत्तराधिकारी बना सकें।
उसी दिन नानाजी ने कहा’’ तीजन! पंडवानी सीखोगी....रोज आना पडे़गा....घंटो अभ्यास करना पड़ेगा कर सकोगी ?’’
तीजन को तो कांरू का खजाना ही मिल गया....। मनोवांछित वर की प्राप्ति...ने, अनोखे आनंद ने उसके मन-प्राण को खुशी से भर दिया....। और शुरू हुआ नाना-नातिन दोनों की अभीश्ट सिद्धि का आयोजन....। पिता असहमत थे....लड़की की जात पंडवानी सीखकर क्या करेगी? आदि-आदि पर मां का समर्थन तीजन ने बड़ी सहजता से प्राप्त कर लिया। निश्चित हुआ कि प्रतिदिन नानाजी एक प्रसंग का गायन सिखायेंगे। शाम को जब सारे पारधी डेरे पर लौटेंगे तो खाना पीना हो जाने के बाद रात को नानाजी के घर सब लोग जुडेंगे और तीजन सीखे हुये अंश का गायन करेगी...। इसके दो लाभ थे पहला कि प्रतिदिन का पाठ....तीजन को याद हो जाता था दूसरा मंच का डर चला जाता।
अपने विशय-वस्तु का निश्णात विद्वान भी जब मंच पर वक्तव्य देने खड़ा होता है तो घबराहट होती है। श्रोता-गण के समक्ष पूरे आत्मविश्वास से अपनी बात कह सकना भी एक विशेश कला है। इसी कला को विकसित करने के लिए नानाजी ने पारिवारिक मंडली में तीजन का गायन निश्चत किया था। आगे चलकर पंडवानी प्रस्तुति में इस अभ्यास का भरपूर लाभ भी तीजन को मिला तभी तो भिन्न-भिन्न भाशा-भाशी देशों के मंचों पर भी पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुति दे पाती है।
इस प्रशिक्षण काल में बिजेलाल ने पूरी पंडवानी तीजन बाई को कंठस्थ करा दिया। एक और अनुपम उपहार दिया...वह है तंबूरा...तब से आज तक वह तंबूरा तीजन के साथ है, उसकी विजययात्रा का साक्षी।
कल तीजन बाई का कार्यक्रम पड़ोस के गांव में है इसलिए आज उसने छुट्टी मांगी....। हाँ....आगामी रविवार को फिर आने का आमंत्रण भी दी।
गाय, बैल, भैंस आदि चौपाये सामने मिल गये खली-भूसी दाना-चारा को ताबड़तोड़ उदरथ कर लेते हैं....पेट-पूजन....में विलम्ब नहीं करते....पीठ पर पड़ा डंडा भी तब तक बाधक नहीं होता जब तक लगातार चार पांच बार न पड़ जावे....।
पेट भरने का असल आनंद तब उठाते हैं जब अपने ठिकाने पर पहुंच कर आराम से बैठते हैं...पेट में पड़े भोजन को वापस मुंह तक लाते फिर जुगाली करते हैं...आखें मुंदने लगती है....प्रसन्नता का अतिरेक कभी सिर हिलाकर तो कभी पूंछ हिलाकर प्रदर्शित करते हैं....। लेखक भी ऐसे ही होते हैं....जो देखा....सुना उसे मन के खजाने में जमा कर लेते हैं....रात तो लेखकों के लिये ही बनी है....फिर क्या पूछना है? खजाने में जमा-जथा की छंटाई शुरू होती है....काम की बातों पर मनन-चिन्तन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है....। इसी बीच लेखक पात्र का सृजन करता है....। कभी-कभी पात्र पूर्व सृजित होते हैं तो पात्र के चरित्र में मनोनुकूल परिवर्तन करता है....और तब श्री गणेश होता है किसी रचना का....। सृजन के क्षण....पीड़ादायक होते हैं....। उस पीड़ा का अवसान ही कृति का जन्म है, और जन्म तो आनंददायक होता ही है हां....एक बात छूट गई.. पशु जुगाली करके आनंद पाते हैं लेखकों के भाग्य में आनंद के साथ....क्षोभ, दुःख, क्रोध, अस्वीकृति, अवहेलना, समालोचना आदि अवांछित भावों की प्राप्ति भी अवश्यंभावी है...।
यही देखिये न...कहां तो मैं तीजन बाई से भेंट-मुलाकात करने गई थी....और अब लिख रही हूँ...हां स्वीकार करती हूँ....हां स्वीकार करती हूँ कि पात्र का सृजन मैंने नहीं किया पर उसकी अनुभूतियों को, उसके दर्द को न सिर्फ समझ रही हूँ वरन् अनुभव भी कर रही हूँ....।
आज से पचास साल पूर्व....स्त्री स्वातंत्र्य की कल्पना ही दुरूह थी... वह भी छत्तीसगढ़ के छोटे से गांव में जहां शिक्षा का प्रकाश अत्यंत धूमिल था। दूसरी बात समाज में वर्ग और जातिभेद, वर्गभेद प्रचुर मात्रा में विद्यमान था। परिधियों को समकक्ष नहीं समझा जाता था....चोरी डकैती चाहे जिसने की हो संदेह की सुई इन्हीं पर जाकर अटक जाती थी। समय-असमय उच्चवर्ग के आदेश पर नाम मात्र को मिलने वाली मजदूरी पाकर भी जी- तोड़ मेहनत करनी पड़ती थी... मुंह खोलने का साहस ही नहीं था, कभी जब....दो शब्द बोलना ही पड़ा तो वह मजदूरी भी छिन जाती थी....परिवार के लिये एक और एकादशी....।
सन् 1947...भारत की स्वतंत्रता का पुण्य पर्व....। अमर शहीदों के बलिदान का वरदान....हर भारतीय के लिये गर्व से सिर उठाकर ‘वन्दे मातरम्’ कहने का दिन....पारधियों के लिये....सामान्य सा ही था....।
हां असामान्यता तो उसके बाद आई...। स्वतंत्रता ने उनके आजीविका की स्वतंत्रता छीन ली...। वन्य संरक्षण कानून बना...वन विभाग की स्थापना हुई....घने जंगलों के बीच डाक बंगले बने, वन कर्मचारी छोटे बड़े सभी...पारधियों पर कड़ी नजर रखने लगे...। वन्यजीवों का शिकार....अपराध है, पक्षियों को पकड़कर...बेचा नहीं जा सकता...बिना सरकारी आदेश (अनुमति) के जड़ी-बूटी....जंगली मधु संग्रहित नहीं किये जा सकते...। पशु-चर्म बेचते हुये पाये जाने पर जुर्माना देना अथवा जेल की सजा काटनी होगी।
पारधी fस्त्रयां जलावन की लकड़ी...जिन जंगलों से लाती थीं वहां उनका प्रवेश प्रायः वर्जित हो गया...।
इतनी वर्जनायें जिस जाति पर थोप दी जाये....वह क्या करे....कैसे जिये....कैसे परिवार पालें ? ऐसी विशम परिस्थिति में पलने वाली सामान्य-सी लड़की ने जब अपनी शर्तों पर जीने का निर्णय लिया तो घर-बाहर कितने लोगों के विरोधों का सामना उसे करना पड़ा होगा, आज की लब्धप्रतिश्ठ तीजन बाई के सम्मान में झुकने वाले सिरों को देखकर उस विरोध का अनुमान लगा पाना भी कठिन है।
अनगिनत बाधाओं को पार करने के बाद उस तीजन को यश, सम्मान, प्रतिश्ठा, पद वह सब मिला जिसकी आकांक्षा हर व्यक्ति को होती है परन्तु अजात शत्रु तो कोई नहीं होता....इतिहास साक्षी है अजातशत्रु शब्द शब्दकोश का ही श्रृंगार है वास्तविक जीवन में अजातशत्रु का संधान मृगमरीचिका ही है। तीजन बाई भी अजातशत्रु नहीं है...मंच पर नही ंतो यवनिका के पीछे नेपथ्य में क्षीण स्वर से ही सही...आलोचना तो होती है। आलोच्य विशय चिरपरिचित ही हैं, वही मनुश्योचित स्वाभाविक दुर्बलता।
मेरी मान्यता है कि जब मनुश्य अपने कर्मों के द्वारा, अपनी उपलब्धियों के द्वारा देश और समाज की परिधि से उपर उठ जाता है तब वह मानव समाज की सम्पत्ति बन जाता है...सामान्य जन से लोकजन बन जाता है। व्यश्टि का प्रसार ही तो समश्टि है ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत आचरण, व्यवहार की चर्चा न तो शोभनीय है न ही काम्य है।
पंडवानी के प्रति एकनिश्ठ समर्पण ने तीजन बाई को जीवित fकंवदन्ती बना दिया है। अप्रतिम पंडवानी गायिका बनना सहज तो था नहीं....। बिजेलाल की एकादशवर्शिया शिश्या की लगन, अध्यवसाय, अद्भूतश्रवणशक्ति सीखते की अदम्य लालसा ने ही उसे आज की तीजन बाई बनाया है।

प्रयास-पर्व

बहुत देर हो गई सुबह हुये किन्तु अभी तक धूप निकली नहीं आकाश की ओर देखी....सूर्य देवता धूसर रंग के बादल की चादर ओढे़ हुये हैं...। कई दिनों की असह्य गरमी के बाद कल रात आंधी के साथ वर्शा हुई...। सनसनाती हवा ने सड़क किनारे लगे पेड़ों की डालियों को निर्ममतापूर्वक तोड़-मरोड़ दिया है। इसीलिये आज हवा में वर्शास्नात् वनस्पति की अजीब सी गंध घुली मिली हुई है....। काल बैशाखी ने अपनी उपस्थिति का प्रमाण दिया है। अमलतास के फूल धूल-मिट्टी से सने जमीन पर पड़े हैं...। अभी भी वर्शा की संभावना है झुलसा देने वाली गरमी को अंगूठा दिखाता बादलों भरा आकाश मुझे बढ़ा आकर्शक लगता है। मिट्टी से उठकर सोंधी गंध ने हवा से मित्रता कर ली है।
प्रकृति का यह परिवर्तित रूप मन-प्राण को उल्लास से भर देता है....फिर मेरे मन में तो पहले से ही तीजन-कथा सुनने का उल्लास था...बड़ी तत्परता से आवश्यक गृहकार्य निपटाई....चल पड़ी गन्तव्य की ओर...।
सेक्टर 1 पहुंची तो आज तीजनबाई को भी अतिरिक्त प्रसन्न देखी कारण पता चला कि कल का कार्यक्रम सफल रहा श्रोताओं का अभिनंदन, आदर दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है....यही तो तीजन का चिरआकांक्षित स्वप्न था।
उसने पूछा’’हां तो...आज क्या सुनना है बहनजी को....?’’ मुस्कान चंचल आंखों से झरकर पतले ओठों में पसर गई है।
आश्वस्त होकर पूछी ‘‘पारंपरिक रीति से नाना जी की शिश्या कब बनी और स्मरणीय समारोह के बारे में बताओ-ताकि समझ में आ सके कि पंडवानी के प्रति समपर्ण का भाव कब कैसे जागा ?’’ आखें बंद कर कुछ पल सोचती रही संभवतः बहुत पीछे छोड़ आई गलियों की परिक्रमा करने लगी थी। किसी और के समक्ष अतीत को अन्मोचित करने से पहले हर आदमी सोचता है कितना छुपाये कितना बताये क्योंकि विश्वस्त व्यक्ति के सामने भी आदमी निर्वसन तो नहीं हो सकता न ?
इसी बीच चाय आ गई....हम दोनों को संभलने का पर्याप्त समय मिल गया....। दीवान में पांव उठा करके बैठती हुई तीजन ने बताया। नाना जी से पूरी पंडवानी सीख चुकी थी....तब मेरी उम्र बारह तेरह साल की रही होगी कि एक दिन नानाजी ने कहा कि अब वे थक गये हैं बूढे़ शरीर का ठिकाना नहीं, नदी तट का पेड़ है इसलिये बड़ी दीवाली के दिन वे तीजन को पाठ-पीढ़ा सौंप देंगे....।
गुरू जब शिश्य को सार्वजनिक रूप से उत्तराधिकार सौंपता है उसी अनुश्ठान को पाठ-पीढ़ा सौंपना कहते हैं। गोबर से जमीन को लीपकर चौक पूरते हैं....गौरी गणपति की पूजा होती है चौक पर रखे लकड़ी के पीढ़े पर शिश्य को बिठाया जाता है गुरू उसके माथे पर तिलक करता है आरती उतारता है। शिश्य गुरू को नारियल और धोती देकर प्रणाम करता है। गुरू...शिश्य को सफलता का आशीर्वाद देते हुये घोशणा करता है कि आज से मेरा यह शिश्य पाठ-पीढ़ा का अधिकारी है।
गुरू बिजेलाल का आशीर्वाद मिला...पर चारों तरफ सुगबुगाहट शुरू हो गई...बूढे़ की मति भ्रश्ट हो गई है, सठिया गया है बुढ़ऊ...कहीं किसी लड़की को पाठपीढ़ा दिया जाता है? अरे पुरखों से चला आ रहा है, लड़के ही गुरू परम्परा को आगे बढ़ाते हैं....। पराये घर चली जाने वाली लड़की कब तक यहां रहेगी ? आदि इत्यादि....। बाबू भी अपनी नाराजगी छुपाने के प्रयत्न में असफल ही रहे....लोगों की कहासुनी से तंग आकर मां ने भी दबे स्वर में झुंझलाकर अपनी असहमति जताई....किन्तु तीजन...अरे। उसे तो राजपाट मिल गया...और क्या चाहिये ? मारे खुशी के रात को नींद ही नहीं आई।
इधर कुछ दिनों से नानाजी की खांसी बढ़ गई थी....सास भी बढ़ने लगी थी....रात को बुखार आ ही जाता था....। घरू इलाज चल रहा था....नानाजी स्वयं भी जड़ी-बूटियों के अच्छे जानकार थे....नाड़ी देखना भी जानते थे....।
गांव वालों से सुना कोटवार हांका (घोशणा) लगा रहा था कि आज रात को ग्राम पंचायत भवन के सामने वाले मैदान में पंडवानी होगी छोटे बड़े सबका बुलौवा है....। लोगों के मन में पंडवानी सुनने का जितना लोभ था उससे अधिक आकर्शण यह था कि एक लड़की मंच पर पंडवानी प्रस्तुत करेगी। उन दिनों लड़कियों को सार्वजनिक रूप से मंच पर कार्यक्रम देना वर्जित था कोई लिखित कानून नहीं...सामाजिक वर्जना...।
एक मात्र बल्ब की निस्तेज रोशनी...हर दस मिनट में किकियाने वाला माइक...शुरू हुआ तीजन का पंडवानी-गायन....। जो भीड़ जमा हुई उन्हीं का शोर इतना था कि तीजन क्या गा रही है यह सुन पाना ही कठिन था....। विज्ञ पंडवानी गायक बिजलाल ने परिस्थिति की गंभीरता को समझा....स्वयं संगतकारांे के साथ बैठे....और तीजन को आदेश दिया....कीचक वध प्रसंग सुनाने का....।
पूरे आत्मविश्वास के साथ....सतेज सधे गले से तीजन ने गाया...
‘‘हाय-हाय रे मउहा के पानी ऽ ऽ ऽ
तेला पीये ले सब झन झूमरथे
कोन अड़हा ऽ ऽ कोन गियानी...।
हाय...हाय...रे मउहा के पानी।
भीड़ का शोर कम होने लगा....तमाशाई भी चुप हो गये।
इस बार...तीजन ने गाया....।
‘‘मंद मं माते बिसुध कीचक ल
हचक के पलंग से उठाइस...
(रागी) फेर का होइस...रे भाई?...?
अद्धर मं उठा के पछारन लागिस भाई.ऽ ऽ..।’’
किशोरी बालिका के स्वर में कड़कती बिजली की तड़त थी....जोश था...तो वीर रस की प्रस्तुति के अनुकूल...आरोह-अवरोह...।
समां बंध गया...श्रोता मंत्र मुग्ध हो सुनते रहे। निश्चित अवधि में गायन समाप्त कर...गुरू को प्रणाम किया तीजन ने....गुरू की आखें बरस रही थी...थरथराते हाथ को उसके सिर पर रखकर आशीर्वाद लिये ‘‘सरस्वती की कृपा तुम पर सदैव बनी रहे, सफलता तुम्हारे कदम चूमे...।’’
तालियों की गड़गड़ाहट...गूंजती रही...। बालिका तीजन की विजय-यात्रा का श्री गणेश इस तरह हुआ....।
किन्तु यह आयोजन नितान्त घरेलू था इसे सार्वजनिक मंच नहीं कहा जा सकता। ककहरा याद करने वाला बच्चा जब कोई छोटी-सी कविता याद कर लेता है तो उसे प्रोत्साहित करने के लिए पूरे परिवार, मित्रगण, सगे-संबंधियों के सामने बालक को अपनी कविता के साथ प्रस्तुत करते हैं....उस आवृत्ति में बालक का जोश, गर्व अपने अस्तित्व की स्वीकृति की बसमता सब मिलीजुली रहती है।
तीजन ने नानाजी से पूछा भी कि गांव में कार्यक्रम क्यों रखवाये तो उन्होंने समझाया ‘‘बेटी! जहां रहते हैं वहां की मिट्टी, हवा, पानी सबका कर्ज हम पर रहता है उसे उतारा नहीं जा सकता...कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है यह....।’’
विश्वविख्यात तीजन बाई की पंडवानी साधना को जानने का लोभ तो था ही उसकी विजय-यात्रा के पड़ावों के बारे में भी मेरी जिज्ञासा कुछ कम नहीं थी इसीलिये पूछी’’ अब प्रथम सार्वजनिक कार्यक्रम के बारे में बताओ क्योंकि इसी कार्यक्रम ने तो हमें आज की तीजनबाई से परिचित करवाया।’’
हंस पड़ी तीजन बाई’’ कहा तो आपने ठीक ही है यदि उस दिन...पांव पीछे हटा लेती, यदि लोगों के कहने से डर जाती परिवार वालों के विरोध के सामने घुटने टेक दी होती तो आज यहां तक पहुंच ही नहीं पाती...।’’
पानी पीकर उसने आगे बताना शुरू किया। नानाजी की तबीयत बहुत अच्छी तो नहीं थी पर बुखार आना बंद हो गया था कमजोरी तो बुढ़ाबे का शरीर कहकर नानाजी टाल जाया करते थे...।
मां बाबू का विरोध इस रूप में सामने आया कि अब वे लोग पंडवानी के लिए मुझे समय देना नहीं चाहते थे....घरू कामों में उलझा देती थी मां...डांटकर कहती ‘‘लड़की की जात हो...गवन-पठौनी में ज्यादा दिन नहीं है, ससुराल जाकर खटना पड़ेगा अभी काम-काज नहीं सीखोगी तो हमारी ही नाक कटेगी...। वहां कोई तुम्हारा पंडवानी सुनने नहीं बैठा है। चूल्हे चौके की ओर ध्यान दो। सरकी, झाडू बनाना सीखो...नहीं तो सास झोंटा पकड़ कर घसीटेगी।’’
बाबू सब कुछ सुनते...मां से कुछ नहीं कहते...न ही मुझसे नानाजी के पास जाने को कहते...। छोटे भाई बहन की तरफ ध्यान दो...बड़ी हो गई हो...घर में रहा करो।’’ कहकर अपना विरोध प्रगट करते थे।
मेरा मन छटपटाते रहता...घर के काम-काज के बीच भी मैं पंडवानी गाती गुनगुनाती रही....भाई बहनों को भी अपने गायन से ही बहलाती, पुचकारती रहती....।
दिन तो कटते हैं....कट रहे थे कि एक दिन नानाजी घर आये उन्होंने बाबू और मां को बुलाकर कहा ‘‘गांवों से पंडवानी गायन का बुलावा आता है....तुम लोग तीजन को रोको मत, उसे जाने दो....रतन बेटी है तुम्हारी....सरसती दाई की कृपा है उस पर.... उसके भविश्य को खराब मत करो...देख ना एक दिन वो खूब नाम कमायेगी...मैं तो रहूंगा नहीं, देखूंगा नहीं...तुम्हीं लोग...एक दिन अपनी बेटी पर गर्व करोगे....।’’ बड़े बुजुर्ग की बात....मां बाबू चुप रहे....उनकी मर्यादा को ध्यान में रखकर मन मसोस कर बैठ जाना पड़ा...। इधर नानाजी तो अपने घर चले गये...।
बाबू ने मां से कहा’’ समधिन बहुत नाराज है खकर भेजी है कि उनको घर गिरस्थी चलाने के लिये बहू चाहिये....कार्यक्रम करने वाली पंडवानी गायिका कलाकार नहीं....यदि तीजन का गायन आप लोग बंद नहीं करवा देते....तो हम उसको गौना कराके घर नहीं लायेंगे...बिठाये रखियेगा...अपनी बेटी को और जितनी चाहे पंडवानी सुनियेगा...उससे हमारा संबंध खत्म...समझिएगा...।’’
बाबू चुप होकर मां की तरफ देखने लगे...। अचानक मां उठी..मेरी चोटी पकड़कर पीठ पर मुक्के जमाने लगी...दो तीन तमाचे गालों पर भी पड़े..। चीखने लगी मां’’ आज के दिन के लिये तुमको जनमाई थी..बिरादरी के लोगों के बीच हमारी नाक कट गई..बचपन का बिहाव..इस तरह टूटेगा..नहीं जानती थी..सब तुम्हारे पंडवानी गाने का फल है..अब भुगतो और हमें भी भुगताओ..। खबरदार जो घर के बाहर एक कदम भी निकाला...खाना-पीना बंद करके घर में धांध (बंद) दूंगी ..।’’
मां के अंदर का गुबार इस गर्जन के रूप में बाहर आया...तो बादल गरजने के बाद बारिश तो होती है...। मां की आखें भी बरसने लगी...बेटी के भविश्य की चिन्ता से व्याकुल मां का आक्रोश भी ममता का रूप ही तो था।
इस बीच खारून नदी में जाने कितनी बार बाढ़ आई, जाने कितना पानी बह गया उसी के साथ बहते रहे तीजन के दिन रात....। दिन तो अभावों से भरे थे पर रातें सपनों से सजी होती...एक ही सपना बार-बार आता...कोई वृद्धा स्त्री...स्वप्नादेश देती’’ तंबूरे की शरण ले भजन गा, बांके बिहारी की प्रार्थना के लिए पंडवानी सुना...लोगों को....पंडवानी....उसी वृन्दावन बिहारी के लौकिक कर्मों की अलौकिक कथा है।’’
धीरे-धीरे स्वप्नादेश ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया....कहां तो तीजन फिल्मी गाने....सुनाती थी....अब लोगों के बीच भजनहिन के नाम से प्रसिद्ध हो गई...। तंबूरे का अभ्यास भी नियमित करने लगी...कोख से जनमाये बेटे से ज्यादा ममता तंबूरे से हो गई....। गायन वादन के प्रति इस आसक्ति ने क्रमशः उपासना का स्वरूप् धारण कर लिया....एकनिश्ठ समर्पण...।
समर्पण की यह भावोपासना जैसे-जैसे बढ़ती गई....घर....परिवार...समाज का विरोध भी वैसे-वैसे उग्र होता गया....जाति बिरादरी ने हुक्का पानी बंद कर देने की कहावत को चरितार्थ कर दिया....। आर्थिक संकट अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया था। परिवार पालना कठिन हो गया था....। इसी संकट से उबरने दुर्ग के पास के गांव चंदखुरी में डेरा डाले....वहां भी छीन (छींद) पत्ता काटते, झाड़ू बनाते निरंतर गुनगुनाती रहती थी...।
गांव के सम्पन्न किसान दाऊ भूशणलाल देशमुख ने तीजन को सुना। प्रभावित हुये और दस रूपये का नोट पुरस्कार स्वरूप दिये...तीजन के लिये मूर्तिमान सौभाग्य बनकर उस दिन दाऊ आये थे...शुभ घड़ी में नोट रूप में लक्ष्मी आई थी....।
चंदखुरी में गायन का न्यौता मिला...प्रथम सार्वजनिक मंच...जिसने तीजन के अंदर के कलाकार को लोकमंच के सम्मुख प्रस्तुत कियाकृउसकी प्रतिभा को दाऊ भूशणलाल जी ने पहचाना, सहजात प्रतिभा थी किन्तु प्रशिक्षण का अभाव स्पश्ट था...। लोक कलाकार के लिये भी प्रशिक्षण का अभाव स्पश्ट था...। लोक कलाकार के लिये भी लिये भी प्रशिक्षण की आवश्यकता तो होती ही है यही सोचकर उन्होंने पंडवानी गायक श्री उमेद fसंह देशमुख को बुलवाता और तीजन को पंडवानी का औपचारिक प्रशिक्षण देने का अनुरोध किया।
कठिनाइयों का दौर पूरी तरह तो समाप्त हुआ नहीं था इसलिये उमेदfसंह जी ने इन्कार कर दिया...। दाऊ जी भी दृढ़निश्चयी व्यक्ति थे...कला के पारखी भी थे...फिर उमेद fसंह जी से इन्कार की वजह पूछे...। थोड़ी न नुकर के बाद उमेद fसंह जी ने बताया कि लोकश्रुति के अनुसार पारधी fस्त्रयां जादूटोना जानती है वशीकरण मंत्र सिद्ध किये होती हैं यदि उन्हें कुछ होग गया तो उनके परिवार को कौन देखेगा। जीवन की बाजी लगाकर वे प्रशिक्षण को कदापि तैयार नहीं हैं....।
अंततोगत्वा उमेद fसंह ने स्वीकृति दी पर...मंच पर साथ देने की स्वीकृति ही दाऊ जी प्राप्त कर पाये।
पंडवानी-गायन पूर्ववत् चलता रहा...तीजन की प्रतिभा से प्रभावित हुये उमेद fसंह जी....वे समझ गये कि तीजन एकलव्य परंपरा की शिश्या है उन्हें गुरू द्रोणाचार्य की भूमिका मात्र का निर्वहन करना होगा।
अठारह दिनों का पंडवानी-पर्व समाप्त हुआ। पैसा, अनाज, साग भाजी प्रचुर मात्रा में मिला...सबसे मूल्यवान जो चीज मिली वह थी उमेद fसंह जी की प्रशिक्षण की स्वीकृति।
तीजन बाई ने बड़े आदर से उन्हें कका संबोधन दिया सम्मान दिया। शुरू हुआ...प्रशिक्षण....पूरे दो माह के प्रशिक्षण के बाद तीजन पारंपरिक पंडवानी की प्रशिक्षित गायिका के रूप में और भी निखर गई। खदान से निकले हीरे को तराशता तो जौहरी ही है, तराशा हुआ हीरा अपनी चमक से लोगों की आखें चुंधिया देता है।
उमेंदfसंह जी ने रागी का पद संभाल लिया, अभिभावक तो वे स्वतः बन गये...। पूरी मंडली के संचालन का भार कार्यक्रमों की तिथि तारीख, आने-जाने की व्यवस्था सब कुछ धीरे-धीरे वह ही संभालने लगे...। इस तरह तीजन बाई के साथ एक सशक्त मण्डली सहयोग करने लगी।

(2)

सृि‍ष्टि के आदिकाल से ही स्वस्ति और शांति मानव के लिये चिरकाम्य है। सृश्टिकर्ता ने इन दोनों के लिये स्थाई निवास की सृश्टि ही नहीं की है इसीलिए मानव जीवन में इनका आवागमन लगा रहता है हाँ यह तथ्य निर्विवाद है कि किसी के जीवन में इनकी उपस्थिति दीर्घ तो किसी के जीवन में अल्प होती है।
तीजन ने स्वस्ति का fनःश्वास लिया ही था, अभी जी भरकर शांति का आस्वादन नहीं कर पाई थी कि नानाजी का स्वर्गवास हो गया।
बड़ा क्षोभ हुआ, अभिमान से आखें भर आईं ‘‘नानाजी इतनी जल्दी क्या थी जाने की ? थोड़ा और रूक जाते...जिस तीजन को पंडवानी की शिक्षा दिये उसकी साधना के गुरू बने, उसकी सफलता देख लेते...सो नहीं...चल दिये....वह भी अप्रत्याशित रूप से... न कुछ कहना...सुनना...न कोई आदेश...निर्देश....अरे जाते समय भेंट ही कर लेते....। जा तो रहे थे हमेशा के लिये...तो अंतिम बार अपनी तीजन के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद ही दे जाते...बहुत बड़ा धोखा दिया आपने...जाने कितने उपालंभ...कितना कुछ कहना सुनना था जो हो नहीं सका, तीजन को व्यथित करने लगी...। यह बात...।
चंदखुरी कार्यक्रम सफलता पूर्वक कर जब गनियारी लौटी तो नानाजी का तिजनहान (मृत्यु का तीसरा दिन) था...। अब किसे सुनाये अपनी सफलता की गाथा ? चढ़ोत्री में मिले सामान में से जो अच्छा था, मूल्यवान था उसे ही तो नानाजी को देने की सोची थी....अब किसे दे ? सुख शांति के इन क्षणों में मृत्यु ने कैसा निश्ठुर आक्रमण किया ? अरे! ननाजी तो उसके गुरू ही नहीं थे...मित्र थे, उपकारी थे सर्वतोभावेन कल्याण कामना करने वाले थे उम्र का अंतराल उनके सख्य भाव में कभी बाधक नहीं हुआ...। प्रेरणा के अजस्त्र स्त्रोत्र थे नानाजी...विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी तीजन को साहन देते...निरंतर आगे बढ़ने का मंत्र देते...लाख दुखों की एक दवा थे नाना जी....। स्तब्ध तीजन के मन में विचारों का झंझावात चल रहा था पर आखें....खोज रही थीं उन्हीं को...।
वेदना की प्रथम लहर, चेतना को आच्छन्न कर देती है...चिन्तन की गति अवरूद्ध हो जाती है । अवसाद की सघनता जब विरल होने लगती है तब चिन्तन पुन: सक्रिय होता है। तीजन का आत्मचिन्तन जागा तो उसने स्वयं से कहा...। जरा-मरण तो अवश्यंभावी है फिर पंचतत्व का शरीर ही तो नश्ट होता है आत्मा तो अजर-अमर अविनश्वर है इसे तो नानाजी ने मुझे कई बार समझाया है तो फिर आज इतनी व्याकुलता क्यों ?
रात गहराने लगी तो....तीजन आंगन में आ गई...आकाश तारों से भरा हुआ था...टिमटिम करते...असंख्य तारे...। हवा का एक झोंका उसके वेदना-तप्त माथे को सहला गया....ऐसा लगा नाना जी के कांपते हाथों की छुअन को तो भुलाया नहीं जा सकता...अरे...अरे...यह क्या हुआ...आंसुओं ने बरसना शुरू कर दिया....वैसे उनको दोश भी तो नहीं दिया जा सकता....बड़ी देर से पलकों ने रोक रखा था...।
आंसुओं ने अवसाद के गाढ़े काले रंग को धोकर कुछ धुंधला दिया...तभी अवरूद्ध चिन्तन को राह मिली...सोचने लगी तीजन...।
असल में नानाजी का मृत्युपथगामी होना....आडंबरहीन यात्रा ही तो है...। विदा देने का अवसर नहीं मिला....संभवतः यही दोनों के लिये श्रेयस्कर था....कौन जाने आंसू ‘‘आंखों का कहा न मान बह निकलते...तीजन के आंसुओं की वैतरणी पार करके उस पार जाना नानाजी के लिये दुश्कर होता....उस अनंतपथ के यात्री का मन प्रिय शिश्या ललिता कलाविधौ से बिछुड़ने की पीड़ा न सह पाता....जाने की अनिवार्यता और इह लोक में नहीं ठरह सकने की विवशता’’न ययौ न तस्थौ’’ की विशम स्थिति की सृश्टि करती....सांसें और भी बोझिल हो जाती...। जड़ भरत का मृगशावक मोह पुनरावृत्त हो जाता। गहरी सांस लेकर तीजन वर्तमान में लौटी....विशादपूर्ण हंसी....हंसी....नहीं थी मौन रूदन की मलिन छाया थी....। आंसुओं से भीगे स्वर में बोली’’परम आत्मीय से बिछुड़ना कितना पीड़ादायक होता है उसी दिन समझ पाई...उस दिन जानी...महाभारत के स्त्री पात्रों के रूदन से ही पंडवानी को करूणाकलित रागिनी मिली है...।’’
तीजन अवसम सी बैठी थी कि किसी कवि की पंक्तियां याद आई...।
‘‘उठकर नई धरती, नया आकाश पैदा कर
मंगने से कभी कुछ मिलता नहीं ए दोस्त!
अपने लिये तू फिर नया विश्वास पैदा कर।’’
लगा...कि मेरे उपर कुछ गिरा है...हल्का सा स्पर्श माथे पर...हाथ उठाकर माथे को छूना चाही...हथेली में कनेर का फूल था...हवा का झोंका फिर एक बार सिर माथे को सहला गया...जाने क्यों फिर ऐसा लगा कि नानाजी आशीर्वाद मिला है।...कमर कसकर जूझने के लिये...आगे बढ़ने के लिये...।
उसी क्षण निर्णय ली कि दुःख को छुपाकर मन के कोने में रखूंगी...बाहर किसी को उसका आभास भी नहीं होने दूंगी...मंच पर पंडवानी गाकर मनोरंजन करूंगी....यही होगी गुरू को श्रद्धांजलि....। चुप हो गई तीजन...हम दोनों के बीच मौन पसर गया था।
मैं सोर रही थी नियति की क्रीड़ा कितनी अमायिक होती है कितनी निश्ठुर...किसी के सुख-दुख, आशा-निराशा, सफलता-असफलता, हार-जीत की ओर दृश्टिपात किये बिना वह अपनी क्रीड़ा में रत रहती है...तभी तो नियति को निश्ठुर-निर्मम कहते हैं...। तीजन एक बार फिर अवलंबनहीन हो गई...। विरोधियों के वाक्य-बाण और प्रखर और विशाक्त हो गये...। घायल मन पर ये बाण गहरे घाव करते...।
तीजन की जिजीविशा को लाखों प्रणाम करने का मन होता है। टूटकर बिखरती तीजन ने मण्डली को बिखरने नहीं दिया। उमेदfसंह जी ने भी इस दुख में उसका साथ दिया....।
अर्थाभाव अभी भी मिटा नहीं था...पैतृक व्यवसाय छूट चला था...पंडवानी के अभ्यास के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता थी....परिवार के भरण पोशण के लिये, अर्थसंग्रह के लिये समय...कैसे निकाले....?
उस समय एक कार्यक्रम के मात्र 100 रूपये मिलते थे उसी राशि में संगतकारों का अंश अम्मिलित था। प्रशंसा...मिलती पर तालियों की गड़गड़ाहट भूख तो नहीं मिटाती...।
शेशनाथ शर्मा ‘शील’ ने लिखा है...
‘‘घर जला तमाशबीन गीत मांगते रहे
गीत से न कुछ मिला अभाव नाचते रहे।’’
तीजन बाई के सधे पदक्षेपों से अधिक सधा हुआ था अभावों का पदक्षेप...।
आर्थिक परेशानियों ने सामाजिक विद्रूपों के साथ गठबंधन कर लिया था....। किसी महिला के लिए इन दोनों कश्टों से त्राण पाना कितना दुश्कर रहा होगा ? सोचकर ही मन व्याकुल हो जाता है।
भजनहीन तीजन अब पंडवानी गायिका तीजन बाई के रूप में प्रसिद्ध होने लगी थी...। दीवाली, दशहरा, गणेशपूजा के अवसरों पर कार्यक्रमों की संख्या बढ़ जाती....सामान्य दिनों में यदा-कदा ही बुलौवा मिलता...भरण पोशण की समस्या तो समारोहों की परवाह नहीं करती....भूख तो प्रतिदिन लगती है...इस समस्या का निवारण तो नियमित आय से ही संभव होता है...तीजन के पास नियमित आय प्राप्ति का कोई उपाय नहीं था...।
आंशिक सुधार अवश्य हुआ था...कार्यक्रम की निश्चित राशि के अतिरिक्त समापन समारोह में चढ़ोत्री जुड़ गई थी...जिससे....अनाज...कपड़े लत्ते...तो कुछ नगद का भी प्रबंध होने लगा था। चिखली गांव के कार्यक्रम के बाद से उमेदfसंह जी ने दक्षिणा राशि बढ़ाकर डेढ़ सौ रूपये कर दिये थे...आने-जाने का मार्गव्यय, भोजन-पानी का खर्च भी आयोजनकर्ताओं को देना होता था।
प्रत्येक कार्यक्रम के और अंत में तीजन बाई’’ बोल दो बृन्दावन बिहारी लाल की जय’’ कहकर महाभारत के महानायक, युगांतरकारी कृश्ण को प्रणाम निवेदन करती है आज भी यह परम्परा चली आ रही है...संभवतःसुदामा-सखा कृश्ण के कानों तक तीजन की पुकार पहुंची...। कृश्ण सहायक बनकर साक्षात् तो नहीं आसकते...किसी न किसी व्यक्ति को परित्राणकत्ताZ की भूमिका का निर्वाह करने भेजते हैं....इस बार तीजन के लिये उन्होंने डॉ. विमल कुमार पाठक को यह भूमिका सौंपी..।
तीजन बाई के पंडवानी-गायन की प्रसिद्धि सुनकर डॉ. पाठक समारोह स्थल पर पंडवानी सुनने गये...प्रभावित हुये...उन्हें लगा कि लोक गाथा का मुलाकात करके, बातचीत करने का निश्चय किया....। समारोह सम्पन्न होने पर तीजन बाई से मिले, उन्हें भिलाई आकर कार्यक्रम देने का अनुराध किया..अपनी विवशता भी बता दिये कि आने-जाने का खर्च तो देंगे पर दक्षिणा-राशि यत्सामान्य ही होगी...।
महत्वाकांक्षिणी, दूरदर्शिनी तीजन ने तुरन्त हामी भर दी, उमेदfसंह देशमुख जी की नाराजगी दूर करने को बोली ‘‘कका सहर मां पंडवानी गाबो...चार झन सुनही....त आगे चल के आऊ कार्यक्रम के मौका पाबो....।’’
(शहर में पंडवानी गायन दर्शकों के बीच होगा....लोग सुनेंगे तो भविश्य में और भी कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर मिलेगा)
सही वक्त पर लिया गया निर्णय मनुश्य के लिये सफलता के नये द्वार खोल देता है। कहते हैं न’’सौभाग्य बार-बार द्वार नहीं खटखटाता...।’’
भिलाई के पावर हाउस मैदान में नवरंग कला केन्द्र के सहयोग से आयोजित
‘‘रामनवमी उत्सव’’ में तीजन बाई ने पंडवानी-गायन किया।
उत्साह से भरी तीजन बाई के गायन ने प्रबुद्ध श्रोतावर्ग को अभिभूत कर दिया। बहु भाशा-भाशी भिलाई-वासियों के लिए छत्तीसगढ़ी में प्रस्तुत पंडवानी इतिपूर्व अनास्वादित ही था। अभूतपूर्व किन्तु अत्यन्त सफल आयोजन था...भिलाई वासियों ने तीजन बाई को प्रचुर सम्मान दिया...।
शीघ्र ही भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आयोजित ‘भिलाई मंडई’ में पंडवानी प्रस्तुति का आमंत्रण मिला। दूसरा भव्य मंच....था। दर्शकों-श्रोताओं के द्वारा भरपूर आदर-सम्मान मिला। तीजन बाई की प्रसिद्धि को नई दिशा मिली, सफलता को नये सोपान मिले। सरस्वती और लक्ष्मी सगी बहने हैं पर कभी एक साथ नहीं रहतीं....इस बार दोनों में सुलह के लक्षण दिखाई देने लगे...सरस्वती ने लक्ष्मी के आगमन के लिये तीजनबाई का दरवाजा खोल दिया...।
सन् 1976 से भिलाई इस्पात संयंत्र के इन्द्रधनुशी लोकरंगी कार्यक्रम ‘लोक कला महोत्सव’ में प्रमुख आकर्शण का केन्द्र बन गई तीजन बाई...। पंडवानी प्रस्तुति...महोत्सव का अनिवार्य अंग बन गयी...।
नवरंगकला केन्द्र के सहयोग से तीजन बाई अन्यत्र भी अपनी कला का प्रदर्शन करती रही..छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों में भी पंडवानी को यश मिला, प्रतिश्ठा मिलीकृ। छत्तीसगढ़ी भाशा में की गई प्रस्तुति सामान्य जन के लिये सहज-ग्राह्य सिद्ध हुई परिणाम स्वरूप लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी हुई।
तीजन बाई की गायन-शैली के साथ-साथ उसकी अभिनय दक्षता भी बढ़ती गई। हर समारोह उसकी कला को नये आयाम देता चला...रंगमंच कलाकार की प्रतिभा को निखारने में प्रमुख भूमिका निभाता है, आंचलिक भाशा/बोली...जो दर्शकों श्रोताओं को रसग्रहण में सहायक सिद्ध होती है तो दूसरी ओर कलाकार भी प्रशंसकों का सहज सामीप्य प्राप्त करता है जो उसकी लोकप्रियता वृद्धि का आधार होता है।
सन् 1980 के बाद छत्तीसगढ़ से बाहर के मंचों पर भी पंडवानी और पंडवानी-गायिका दोनों को स्थान मिलने लगा। संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली, आदिवासी लोककला परिशद भोपाल, दक्षिण मध्यक्षेत्र संस्कृति विभाग, गंगा प्राधिकरण इलाहाबाद की ओर से भोपाल, कलकत्ता, अहमदाबाद बेंगलोर, पटना, विशाखापट्टनम, उज्जैन, अंडमान निकोबार, हैदराबाद, चेन्नई, खड़गपुर, जमशेदपुर आदि महानगरों में कई बार कार्यक्रम प्रस्तुत करने का सुअवसर मिला...हर बार तीजन सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गई।
1986 में नई दिल्ली में आयोजित ‘‘अपना उत्सव’’ को अपना बनाने में तीजन बाई की पंडवानी ने विशश सहयोग दिया। उत्सव के आकर्शण का केन्द्र बिन्दु रही तीजन बाई..। छत्तीसगढ़ी लोक-कला एवं लोक संस्कृति के साथ-साथ लोकगाथा के प्रति भी सामान्य जनता में अभिरूचि उत्पन्न करने का श्रेय तीजन बाई को ही है...।
तीजन बाई के जीवन के महत्वपूर्ण, परिवर्तनकारी उपलब्धि दायक वर्शों में भी 1985-86 को रेखांकित वर्श माना जा सकता है...एक ऐसा समय जिसने आर्थिक सामाजिक दोनों ही पक्षों को ढृढ़ता प्रदान किया, तीजन बाई उस समय को याद करते हुये आज भी भावविभोर हो जाती है....।
भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा लोककला महोत्सव का आयोजन उस साल खनिज नगरी राजनगरी राजहरा में किया गया था...। निवासी बड़ी उत्सुकता से तीजन बाई की प्रतीक्षा कर रहे थे। निर्धारित समय पर...तीजन बाई मंच पर अवतरित हुई...विशाल मंच के दाहिनी ओर उमेदfसंह देशमुख संगतकारों के साथ बैठे थे। आज तीजन की साज-सज्जा विशेश थी....संगतकारों को भी सावधान रहने का, अपनी कला के श्रेश्ठ प्रदर्शन का निर्देश दिया गया था...। सामुदायिक विकास विभाग के अधिकारियों एवं श्री दानेश्वर शर्मा ने तीजन बाई को सतर्क कर दिया था....कि आज मुख्य अतिथि हैं श्री के.आर. संगमेश्वरम संयंत्र के प्रबंध निदेशक....यदि आज अपनी कला से उन्हें प्रभावित कर सकी तो आजीविका की कठिन समस्या का समाधान किया जा सकेगा। सैकड़ों की संख्या में उपस्थित दर्शकों श्रोताओं ने देखा....।
तन्वंगी, श्यामा तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वेशभूशा, केशविन्यास एवं आभूशणों से स्वयं को सुसज्जित किया है।
लाल रंग की साड़ी पादगुल्मों से थोड़ी उपर है, आड़े फेटें में बंधी साड़ी, दाहिने कंधे पर आंचल है नीली कुरती....। घने केशों की नागिन सी भुईं लोटी कवरी, मोंगरे के गजरे से वेश्टित....मानव मन के सत, रज और तम गुणों का गुंथा हुआ रूप ही हो जैसे।
तनिक संकुचित ललाट पर चंदा सी दपदप करती टिकली...आज्ञा चक्र को अनुशासित रखती है। थोड़ी चपटी सी नाक...बड़ी सी सोने की कील से सुशोभित...सबसे ज्यादा आकर्शक हैं उसकी आंखें.....जिन्हें वह काजल लगाकर दीर्घायित करती है, चंचल चपल हिरनी की आखों सी...ऐसे ही नयनों के लिये ही कहा गया है।
‘‘अमिय हलाहल मद भरे श्वेत श्याम रतनार
जियत, मरत, झुकि झुकिपरत, जेहि चितवत एक बार।’’

शंखाकार ग्रीवा कंठा से सुशोभित है तो भुजवल्लरी में नागमोरी कलुशित भावनाओं को डस देने की चुनौती देती-सी लगती है। कटि-प्रदेश नवलड़ी मेखला से परिवेश्ठित...कलाइयों में कंकनी बनुरिया के बीच-लाल-हरे कांच की चूड़ियां...खन...खनन...खन...बजती तीजन के गायन में अपना सुर मिलाती चलती है। हाथों की ऊंगलियां छपाही मुंदरी से अलंकृत...करतल खुशरंग हिना से सुरभित सुशोभित...।’’
चंचल पगों को असमय थिरक उठने से रोकने के लिये ही छोटे-छोटे घुंघरूओं वाला पाजेब पहन रखा है तीजन ने...। ऊंगलियां चुटकी, बिछुवें से दर्शनीय है। गुलाबी एड़ियों को गुलाबी महावर से रंजित किया है...कि मन भ्रमर पद तलों पर ही गुनगुन करते बेसुध पड़ा रहे...। बंगाल में श्यामा संगीत गायकों ने ऐसे ही अलक्तक रंजित श्यामा-पदतल में इह जीवन को न्यौछावर करने की बात कही है...इस चरण-युगल पर लुंठित मस्तक पर ही मां का वरद हस्त होता है...।
‘‘मां...गो ऽ ऽ ऽ मां श्यामा
जहा किछू पाइयाछि
शब किन्छू संपियाछि
तोमार पादपद्ये....
अंततः एकटि बार
ताकाओ आमार दिके
एई टुकु वासना मोर...।
मां...गो...मां श्यामा...’’
( जो कुछ पाया सब तुम्हारे चरण कमलों में सौंप दिया है अंततः एक बार मेरी ओर दया दृश्टि डालो...मां यही मेरी अभिलाशा है)
अकुतोभय मुद्रो में मंच के बीचोंबीच खड़ी होकर...तीजन ने दोनों हाथ जोड़कर सिर नवा दिया दर्शक दीर्घा को लक्ष्य करके। सांस रोके दर्शक-श्रोतावृंद...कुतुहल सीमाहीन ही हो जाती कि ध्वनित हुआ तुम्बरू ऋशि का संगीत जगत् को दिया गया वरदान है...। सुदूर आन्ध्रप्रदेश के लोक कलाकारों के साथ छत्तीसगढ़ में बस जाने वाला तंबूरा...। तंबूरे में मोरपंख लगे हैं...सिर हिलाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। यह मात्र मयूरपुच्छ गुच्छ नहीं है निश्काम कर्मयोग के साकार हिलाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। यह मात्र मयूरपुच्छ गुच्छ नहीं है निश्काम कर्मयोग साकार रूप कृश्ण का मोर मुकुट भी है....योगिराज की यौगिक शक्तियों का प्रतीक....।
सधे स्वर में तीजन बाई ने ‘‘बोल दो वृंदावन बिहारी लाल की जय’’ कहा तो समवेत सुरों ने उसका साथ दिया। मुझे ऐसा लगा दसों दिशायें गूंज उठी हैं, अनुगूंज के साथ एक निनाद पांन्जन्य भी है...क्या ?
सौभाग्य से इस ऐतिहासिक दृश्य की मैं चाक्षुस साक्षी हूँ। तबला पर ठेका दिया गया, ढोलक पर दक्ष हाथों की थाप...रागी उमेंदfसंह जी ने तीजन के आरोह-अवरोह को संभाला...।
‘‘पढ़े लिखे बर हम नइ जानन
नइ जानन सोला सतरा
भुरूवा भइंसा त्-त्-त्-त्
येई हमर पोथी पतरा....।’’
अत्यन्त विनीत स्वर में दाहिने हाथ से तंबूरे को fकंचित ऊंचाई पर ले जाकर तीजन ने कहा-(हम पढ़े लिखे नहीं है, सोलह सत्रह तक की गिनती भी नहीं जानती, भूरा भैंसा को ततकारी देकर हल जोतना...यही हमारी पुस्तक, यही हमारी विद्या है....।)
प्रशिक्षित पदक्षेप....सम पर आकर थम जाते....तब दीप्त कंठ से गायन होता...स्वर में जड़ता नाममात्र को नहीं fकंचित भी कम्पन नहीं...स्वरसाधकों के लिये जो अनिवार्य ठहराव होता है वह तीजन के कंठ में प्रकृति प्रदत्त है। भावों का आलोड़न संयत स्वरों से प्रस्फुटित होता है तो पहाड़ा झरने के कलकल निनाद को भी लजा देता है। कथनानुसार अभिनय...कभी वीर-धीर, कभी उपदेशाचार्य, कभी आदेश देता नायक-तो कभी अनुनय विनय की प्रतिमा नारी....जो अपनी समस्त कोमलता से युद्धरत पुरूश को बांधने का, रोकने असफल प्रयास करती दिखाई देती है। अपनी जन्मजात दुर्बलता से हारी नारी...आकुल निवेदन करती है, युद्ध उसको काम्य नहीं है....उसको शांति नीड़ चाहिये।
अनिर्वचनीय दृश्य था वस्तुतः गायन, नर्तन और अभिनय तीनों का संगम है तीजनबाई। कला के तीनों अंग एक साथ, समान दक्षता के साथ विद्यमान है उसमें विधता की अनुपम देन है यह।
भटकते मन को बलपूर्वक वश में करके मंच की ओर देखने लगी...।
‘‘महाभारत के लड़ाई ह चलत रहय
 एक ठन दिन अभिमन्यु के नांव
 अरजुन सुभद्रा के दुलरूवा बेटा
उठती उम्मर के पोट्ठ जवान....
कहत हें सबलfसंह चौहान
रागी-काय कहत हें भाई ऽऽ ऽऽ....।’’

मंच पर तीजन बाई एकाभिनय करती है जो चम्पू काव्य की प्रस्तुति है। चम्पू काव्य में गद्य-पद्य दोनों का यथोचित समावेश होता है। इसीलिए गायन के बाद कथा को आगे बढ़ाने का दायित्व रागी पर होता है तो तीजन बाई कथा का कुछ अंश गद्य में प्रस्तुत करती है। छत्तीगसढ़ी गद्य में अभिमन्यु का जन्म, युद्ध कौशल सुना रही थी तीजन बाई...।
‘‘भगवान् कृश्ण के कहे मं ब्रह्या हर चंद्रमा अऊ रोहणी के बेटा बुध ल धरती मं अवतारिस। दिखे मं सुग्घर, तेजस्वी, उठती उम्मर के अभिमन्यु सुभद्रा के गर्भ मं रहिस तभे ले चक्रव्यु हके कथा सुन डारे रहित...अजुन के मुंह ले...फेर...सुभद्रा पूरा कथा सुने बिना सुत भुलाइस....त बपुरा अभिमन्यु चक्रव्यूह ले निकरे के बात ल सुने नई पाइस...इही हर ओकर काल हो गइस...। सब विधाता के रचे विधान आय...।
(रोहिणी चंद्रमा का पुरा पराक्रमा सुदर्शन बुध ही कृश्ण की सलाह पर ब्रह्या द्वारा सुभद्रा अर्जुन का पुत्र होकर अवतरित हुआ था। गर्भस्थ अभिमन्यु अर्जुन द्वारा बताये चक्रव्यू हके बेधन का पूरा विवरण नहीं सुन पाया....माता सुभद्रा सो गई थी...अतः महाभारत में चक्रव्यूह से निकल नहीं सका....। जन्म यदि विधाता की देन है तो मृत्यु भी तो उसी के द्वारा रचे विधान का एक अंश यदि विधाता की देन है तो मृत्यु भी तो उसी के द्वारा रचे विधान का एक अंश है।)’’
अभिमन्यु के वीरगति को प्राप्त हो जाने पर पाण्डव शिविर शोक सागर में निमग्न हो जाता है।
सुभद्रा विलाप करती है...
‘‘प्राण के अधार बेटा मोर
आखों के तारा हीरा रे
छोंड़ि के चले परदेश...।’’
‘‘पानी के भींजे धाम के तिपे लाला
तोला भूख नई लागै रे बेटा !
तोल पियास नई लागय का रे ऽ ऽ ऽ...?’’
तीजन की करूणा विगलित स्वर लहरियां...दर्शकों श्रोताओं को अभिभूत करती हैं तो हजारों आखें बरसने को आतुर...वातावरण सिसकी..की..मृदुध्वनि से गुंजरित होता है। करूणा कलित रागिनी की मूच्छZना जनमानस में व्याप्त हो जाती है।
(प्राण का अधार बेटा अभिमन्यु तुम तो मेरी आंखों के तारे हो, मुझे छोड़ परदेश क्यों चले गये। तुम्हें भूख प्यास नहीं लगती ? बादल वर्शा, सूरज की धूप नहीं लगती।)
यहां आकर तीजन बाई की पंडवानी-दक्षता पूर्णताः दृश्टिगोचार होती है...। कौन कहता है तीजन बाई वीररस का उद्रेक ही सफलता पूर्वक कर सकती है...नहीं करूण रस को प्रधान रस मानने वाले भास....भी इस प्रस्तुति की सराहना किये बिना न...रह पाते ऐसा मेरा विश्वास है।
कविवर प्रसाद की पंक्तियां सजीव तीजन बन गई है-
‘‘इस करूणा-कलित हृदय में
है विकल रागिनी बजती,
क्यों हाहाकार स्वरों में
वेदना असीम गरजती....।’’
मंत्रमुग्ध, मोहाविश्ट जन समुदाय...तीजन बाई को देख रहे थे या सुन रहे थे कहना कठिन है।
मैं सोच रही थी...किसे करूणा का, वेदना का उपहार न मिला हो, जिसके हृदय में सघन अवसाद का निवास न हो वह कभी अभिनय में इतनी स्वाभाविकता नहीं ला सकता है। ...याद आई नानाजी की मृत्यु...अरे हां...उसी करूणा का, दुख का...वेदना का सार्वजनिक प्रदर्शन है यह...। लगा तीजन बाई के हृदय का हाहाकार ही शतधा प्रवाहित हुआ है।
‘‘बोल दो बृंदावन बिहारी लाल की जय’’ उद्घोश के साथ समारोह का समापन हुआ...। लोग उठने लगे...जाने की जल्दी सबको होती है। श्री दानेश्वर शर्मा के संकेत पर तीजन बाई... दर्शक दीर्घा में विराजमान श्री के.आर. संगमेश्वर के पास आ गई...करबद्ध अभिवादन कर सिर झुकाये खड़ी रही...। उच्छ्वसित कंठ से श्री संगमेश्वरम् ने बधाई दी...प्रशंसा के शब्द कहे सबसे महत्वपूर्ण बात कि उसी क्षण उन्होंने तीजन बाई को भिलाई इस्पात संयंत्र मंे नौकरी देने का आश्वासन दिया।
स्वप्नाविश्ट सी तीजन खड़ी थी...साथ खड़े सामुदायिक विकास विभाग के अधिकारियों ने कहा ‘‘तीजन बाई साहब को धन्यवाद दो....।’’
कृतज्ञताबोध से नतमुखी तीजन ने चिरआकांक्षा की पूर्ति से रोमांचित थरथराते हाथों से श्री संगमेश्वरम् का चरणस्पर्श किया...बोल नहीं सकी...प्रसन्नता का आवेग कंठावरोध उत्पन्न कर देता है। कृतज्ञता भरी आंखों से तीजन बाई ने दानेश्वर शर्मा को देखा।
7 जुलाई 1986 को आवश्यक औपचारिकतायें पूरी करके भिलाई इस्पात संयंत्र के सांस्कृतिक विभाग में तीजन बाई को पदस्थ किया गया ।
क्रिया की प्रतिक्रिया तो होती ही है किन्तु प्रतिक्रिया त्रासद हो, अशांतिकारी हो तो मन क्षुब्ध होता है, विपरीत हो तो शांति और आनंद प्राप्त होता है।
भिलाई इस्पात संयंत्र में कर्मचारी पद पर नियुक्ति ने स्वस्ति दी...भरण पोशण की प्राथमिक आवश्यकता को पूरा किया किन्तु इस घटना की प्रतिक्रिया...सुखद नहीं हुई संगतकारों के बीच असंतोश दिखाई देने लगा। उपालंभ के स्वर...क्षीण ही सही नेपथ्य से आ-आकर तीजन बाई को कश्ट देने लगे। आखिरकार उसने संगतकारों से आमने-सामने बैठकर बातें की....।
मुख्य शिकायत थी तीजन बाई अब नौकरी पा गई, हमें छोड़ देगी...हमारी जरूरत तो अब उसे है नहीं...तो हम कहां जायें क्या करें...आदि इत्यादि..।
उमेंदfसंह जी समझदार व्यक्ति थे अतः उन्हीं को संबोधित किया तीजन बाई ने समझाया कि नौकरी अपनी जगह है..पंडवानी गायन..अपनी जगह में भी जब जहां प्रस्तुति देने जावेगी...आप लोग भी मेरे साथ जायेंगे..हमारा साथ कभी नहीं छूटेगा..। इस प्रतिश्रुति ने जादू का सा असर दिखाया...संगतकारांे के मन में तीजन बाई के प्रति आदर-सम्मान और भी बढ़ गया।
   नई नौकरी, अपरिचित परिवेश 8 घण्टे का बंधा बंधाया समय..तीजन जैसे कलाकार के लिये रूचिकर भी नहीं था प्रीतिकर भी नहीं किन्तु तत्कालीन सहकर्मियों की सहायता, अधिकारियों का सौजन्यपूर्ण मार्गदर्शन इन सबने उसे परिस्थितियों से समझौता करने,परिवेश के अनुसार स्वयं को परिवर्तित करने में बहुत सहयोग दिया..।
नियमित आय ने घर में शांति स्थापित करने में सफलता पाई...। इस निश्चन्तता ने तीजन को पंडवानी और तंबूरे से नये सिरे से, नये उल्लास के साथ जोड़ दिया...। नियमित अभ्यास पुनः प्रारंभ हुआ।
तीजन बाई यह सब बता ही रही थी कि मैंने पूछा’’ अच्छा तीजन ! प्रथम विदेश-यात्रा के संस्मरण सुनाओ, कैसा लगा था उस समय ?’’
पलभर में भाव परिवर्तन भी तीजन को ईश्वरीय देन है। बताने लगी तीजन...।
सन् 1985 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में भारत महोत्सव का आयोजन किया गया था...। जून का महीना था। आफिस में लोगों ने मुझे बताया कि पंडवानी प्रस्तुत करने पेरिस जाना पड़ेगा...। पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ। विदेश... वह भी फैशन की नगरी पेरिस...मुझ जैसी अपढ़...गंवार...देहातिन को देखेगा कौन ? सुनेगा कौन...? बड़ा डर लगा...अपने देश-राज अपने लोगों के बीच...कार्यक्रम देने में अपने लोगों के साथ का बल भरोसा रहता है...। फिर सबसे बड़ी बात तो यह भी है कि वे वि देशी लोग तो हमारी भाशा ही नहीं समझते तो पंडवानी कैसे समझेंगे...जब कोई बात समझ में नहीं समझते तो पंडवानी कैसे समझेंगे...जब कोई बात समझ में नहीं आयेगी तो क्या मजा...कैसा आनंद...कैसी खुशी...? वहां रहना भी तो महीने भर तक होगा...वहां का खान-पान, धूप-बरसात सह पाऊँगी...पराये देस में तबीयत ऊँच नीच हो गई...संभालेगा कौन...? क्या बताऊँ...चिन्ताओं का अंत नहीं था...छोटी बड़ी आशंकायें...एक दूर होती...तो दूसरी मन-चित्त अशांत करने आ पहुंचती...।
इस बीच एक खुशी मिली कि आशंकित आक्रोशित जिन्हें बहुत समझा बुझाकर शांत की थी उन संगतकारों ने ही मुझे भरोसा दिया...डरने की क्या बात है हमस ब साथ ही तो रहेंगे न...एक दूसरे की देखभाल जैसा आज तक करते आये हैं वहां भी करेंगे...। सबसे बड़ा आसरा तो कका (उमेंदfसंह देशमुख) का रहता है। दुश्चिन्ता मिटी...जाने का दिन तय हुआ...दुर्ग स्टेशन से एक्सप्रेस गाड़ी पकड़नी थी...। आफिस के लोगों ने ही कागज-पत्र बनवाया...। संगतकारों के लिये पहचान-पत्र दिया...। सब के सब बड़े खुश...देश के बाहर घूमने फिरने को मिलेगा...अच्छी-अच्छी जगहें देखने को मिलेंगी....आदि।
पहले दिल्ली पहुंचना था...वैसे भी कार्यक्रम देने मैं इससे पहले भी दिल्ली आ चुकी थी....। वहां फ्रांस दूतावास के लोगों से मुलाकात हुई वे लोग प्रसन्न ही लगे....उनकी भाशा तो समझ नहीं पाती थी....।
इससे पहले तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से मिल चुकी थी उन्होंने बड़ी खुशी से हमारा स्वागत किया था। जितनी सुन्दर दिखने में थी उतना ही सुन्दर व्यवहार करती थीं।
उनके बेटे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से बेंगलोर में मिली थी बड़े हंसमुख व्यक्ति थे कहा था ‘‘क्या बात है तीजन बाई हम जहां जाते हैं आपसे मुलाकात हो ही जाती है।’’
मैंने भी हंसकर ही कहा था ‘‘आप जनता की सेवा करने जहां भी जाते हैं हम आपकी सेवा, आपका मनोरंजन करने वहीं पहुंच जाते हैं।’’
बहुत कम उम्र में चले गये बिचारे...। आज रहते तो देश की उन्नति के लिये जाने कितना कुछ करते....।
दिल्ली हवाई अड्डा...तब उसे पालमपुर नाम से जाना जाता था वहां से हमें हर्शवर्धन हवाई जहाज पकड़ना था। 700 सीटों वाला हवाई जहाज था...जब रन-वे पर खड़ा था...तो बहुत बड़ा पक्षी लग रहा था...ऐसा लगा जैसे अभी अपने विशाल डैन फैलाकर पक्षीराज आकाश में उड़ने लगेगा...।
पहली हवाई यात्रा थी...डर भी लग रहा था...। हमें बिदा देने आये लोगों को बाहर रोक दिया गया....सब लोगों ने शुभकामनायें दी...कुछ लोगों ने गुलदस्ते दिये...हार पहनाया...।
तेज हवा में बाल उड़े जा रहे थे...साड़ी भी उड़ रही थी....हवाई जहाज के पास पहुंचे तो...सुन्दर, गोरी, दुबली-पतली लड़की हाथ जोड़े खड़ी थी...अरे बाप रे ! कहीं इसने अंदर जाने से रोक दिया तो...? इधर-उधर देख ही रही थी कि किसी ने कहा यह इस विमान की एयर होस्टेस है...तब तो एयरहोस्टेस के बारे में कुछ जानती नहीं था...।
आखिर सब लोग बैठ गये....अंदर बड़ा साफ सुथरा था...हर एक के लिए अलग अलग सीट थी....मैं खिड़की के पास बैठी थी....इतने में वही लड़की आई....पिपरमेंट दी....नहीं लूंगी बोली तो इशारा की मुंह में डालो...अच्छा लगेगा...। सोची जहर महुरा तो दे नहीं सकते....पीपरमेंट ही तो है मीठा-मीठा लगेगा....मुंह में डाल ली...चबाने ही वाली थी कि बड़े प्यार से एयर होस्टेस ने कहा’’ मैडम इसे मुंह में रख कर चूसिये....इससे उल्टी नहीं लगेगी...।’’
अब पीपरमेंट का रहस्य समझ में आया। इसी तरह कान में ठूंसने को रूई थी....वह भी समझाया कि विमान जब ऊंचाई पर पहुंचेगा तो कान में सनसनाहट न हों इसलिये रूई को कान में खोंस लो...।
अभी थिराने ही लगी थी कि फिर हाजिर हो गई मुस्करा कर मुझे कुरसी से बांध दी...। सोचने लगी...ये कैसा व्यवहार है ? हम कोई...हवाई जहाज से भाग थोड़े ही जायेंगे जो बेल्ट से बांध-छांद दिया है।
जब हवाई जहाज ऊपर आसमान पर पहुंचा...तो खिड़की से नीचे देखी....जान ही निकल गई...हजारों फुट के ऊपर हम उड़ रहे थे...धरती नीचे छूट गई थी...फिर आगे देखी...अथाह समुद्र...बड़ी नीली चादर बिछी हुई सी दिखाई दी। धीरे-धीरे डर की जगह आनंद ने ले लिया...। जाने कितनी देर उड़ते रहे...इस बीच मुझे झपकी भी आ गई थी। हवाई जहाज पेरिस हवाई अड्डे के रन-वे पर उतरने की तैयारी कर रहा था...इस बार मुझे अपना माथा झिम-झिम करता हुआ सा लगा....।
बीच में चाय नाश्ता दिये थे...मुझे कुछ भी खाने का मन नहीं कर रहा था। पेरिस में हमारे लिये....ठहरने का मन नहीं कर रहा था। पेरिस में हमारे लिये...ठहरने का विशेश इंतजाम किया गया था...बड़े आदर से वे लोग हमें ले गये...। चारों तरफ गोरे...गोरे स्त्री-बच्चे....। मैं सोची इनके देश में कोई सांवला नहीं होता क्या ? काला तो दूर की बात है।
साफ सुथरी सड़कें...मन चाहे तो बिना चादर बिछाये...लेट जाओ धूल का एक कण भी कपड़े खराब करने को नहीं मिलेगा। बड़ी-बड़ी इमारतें....ऊंचे-ऊंचे गिरजाघर...घरों में कांच की खिड़कियां थीं...।
जहां हमें ठहराया गया उस जगह का नाम अभी याद नहीं आ रहा है...। हर कमरा फूलों से सजा हुआ था... बड़ा पलंग...कुरसी टेबल....डेªfसंग टेबल में खूब बड़ा आइना लगा था....। सबसे अच्छा लगा जब हम खाना खाने गये...दो अलग-अलग टेबिलों में खाना लगा हुआ था...देशी और विदेशी दोनों तरह के खाने का इंतजाम किया गया था। सलाद, रायता, फल सब कुछ था...अरे पापड़ तक को वे लोग भूले नहीं थे...हां एक बात अजीव लगी कि खाने के बाद...लोग काॅफी पी रहे थे....खैर मुझे तो जरूरत थी नहीं....।
इतनी देर सुनने के बाद मैंने फिर पूछा...’’कार्यक्रम के बारे में बताओ...।’’ तीजन ने पानी पीकर फिर आगे बताना शुरू किया...अतीत जब वर्तमान में साकार होता है फिर उतनी ही खुशी देता है फिर यह बात तीजन बाई के चेहरे पर साफ-साफ दिखाई दे रही थी।
कार्यक्रम स्थल में अलग-अलग देशों के लिये पंडाल बना था...हर पंडाल के सामने उस देश का झण्डा फहरा रहा था...।
कार्यक्रम शुरू होने के पहले सभी कलाकार लाइन से पूरे कार्यक्रम स्थल की परिक्रमा करने वाले थे...हम लोग इकट्ठा हो ही रहे थे कि एक फ्रांसीसी आफिसर ने हमारे पास आकर हमारे प्रतिनिधि से कुछ कहा...उसके हाथ में हमारे देश का तिरंगा झण्डा था...।
इस बार आश्चर्यचकित हो गई...कि वह मेरी तरफ इशारा कर कुछ समझा रहा था...। भारतीय सांस्कृतिक दल के प्रतिनिधि ने मेरे पास आकर कहा कि ‘‘तीजन बाई तिरंगा झण्डा लेकर तुम आगे-आरो चलोगी।’’
सच कहूं बहन...आखों में आंसू आ गये...निपट गंवार- देहातिन...मैं...विदेश की जमीन पर अपने देश का झण्डा उठाकर चलूंगी...सपने में भी नहीं सोची थी...नहीं जानती थी कि मेरे भाग्य में देश का गौरव भी लिखा है।
छाती फूल गई...जिन हाथों में तंबूरा उठाती हूँ उन्हीं हाथों में तिरंगे को संभाली....मैं भारत की छत्तीसगढ़ियाँ बेटी....अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रही थी...। इससे बड़ी खुशी और क्या होगी ?....आज तक के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन था वह...मेरे लिये...जिसे कभी भूल नहीं पाऊंगी...।
कार्यक्रम शुरू हुआ...’’बोल दो बृन्दावन बिहारी लाल की जय’’ बोलते ही लोग शांत हो गये...। करीब एक घण्टे तक बेसुध सी गाती रही...लोग झूम उठे...दोनों हाथ उठाकर नाचने लगे...।
भाशा चाहे समझ में आये न आये संगीत का, वाद्य का, अभिनय का जादू तो सर चढ़कर बोलता है।
मेरा कार्यक्रम इतना सफल होगा सोची नहीं थीं...। फिर तो दुगने उत्साह से भरकर कार्यक्रम देने लगी...।
आसपास के इलाके में घूम-घूम कर पंडवानी...गाई...हर जगह...सम्मान मिला..। महीने भर तक यूरोप घूमती रही...। कहीं कोई परेशानी नहीं हुई...कला का आदर करना विदेशी लोग जानते हैं यह बात समझ में आ गई...।


(5)
27 मई 1987 से 22 जून 1987 तक चले भारत महोत्सव में फिर पहुंची पंडवानी गायिका तीजन बाई...। इस यात्रा में वह कुछ आश्वस्त हो चली थी वैसे भी तीजन बाई का व्यक्तित्व बहिर्मुखी है अकारण संकोच, बोझिल झिझक उसमें सिरे से नहीं है।
सहजता उसके स्वभाव का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण है जो किसी भी परिवर्तन को स्वीकारने में उसकी मदद करती है। इस बार भी यश पताका फहराने में तनिक भी प्रमाद, किfचंत भी विलंब नहीं हुआ।
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तीजन बाई फ्रांस, स्वीटजरलैण्ड, जर्मनी, लंदन, मलाया, साइप्रस, टर्की, इटली, यमन, बांग्लादेश, मारीशस, रियुनियान आदि देशों में जाकर पंडवानी-गायन कर चुकी हैं।
विदेशों में ही नहीं मातृभूमि भारत के विभिन्न अंचलों में अपना जादू बिखेर चुकी तीजन बाई को अनेक बार विविध समारोहों में सम्मानित किया जा चुका है। पंडवानी को विश्वस्तरीय पहचान दिलाने का गुरूतर कार्य भी उसने किया है। लक्ष्मण मस्तूरिहा के शब्दों (यत्सामान्य परिवर्तन के साथ) में
‘‘भारत मां के रतन बेटी
बढ़िया अंव गा
मैं छत्तीसगढ़िया अंव जी
मैं छत्तीसगढ़िया अंव गा...।’’
(मैं भारत माता की कन्यारत्न हूँ, तो छत्तीसगढ़ की धिया, दुहिता सर्वोत्तमा हूँ मैं एक छत्तीसगढ़िया हूँ जी....।)
भारत सरकार ने सन् 1988 में तीजन बाई को पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया। तत्कालीन राश्ट्रपति वेंकटराम ने प्रशस्ति-पत्र प्रदान करते हुए तीजन बाई के उज्ज्वल भविश्य की कामना की।
सरल हृदया तीजनबाई ने विभाग के सहकर्मियों से कहा ‘‘मेरे नाम के साथ पद्मश्री लगाकर क्यों मेरा मजाक उड़ा रहे हो भाई...मुझे किसी उपनाम की आवश्यकता नहीं है।’’
विजय-रथ...चलता चला जा रहा है....रास्ते में प्रशस्ति मिलती है....माथे पर मंगल कुंकुम लगाती है...तीजन फिर आगे बढ़ जाती है।
फिर आया 3 अप्रेल 2003 का सुप्रभात...नई सौगात लाया...सफलता की किरणों ने फिर तीजन के माथे को चूमा...इस बार राश्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के हाथों पद्मभूषण से अलंकृत हुई छत्तीसकढ़िया धरापुत्री।
निरक्षरता..तीजन बाई की उपलब्धियों में कभी बाधक नहीं बनी..औपचारिक शालेय शिक्षा एवं प्रमाण पत्र के बिना ही उसे 27 फरवरी 2006 को रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के द्वादश दीक्षांत समारोह में डी.लिट. की मानद उपाधि मिली.. । 7 दिसंबर 2005 को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन fसंह द्वारा तीजनबाई को अभिनंदन-पत्र दिया गया।
अलंकरण गाथा में कुछ अध्याय और भी है...।
1994 में श्रेश्ठ कला आचार्य
1996 में संगीत नाटय अकादमी सम्मान
1996 में ही देवी अहिल्या सम्मान
1999 में ईसुरी सम्मान
इसके अतिरिक्त महिला नवरत्न सम्मान कला शिरोमणि सम्मान तथा आदित्य विक्रम बिड़ला पुरस्कार भी तीजन बाई को प्राप्त हो चुका है। इसी वर्श अप्रेल 2007 को दिल्ली में आयोजित समारोह में नृत्यशिरोमणि सम्मान से सम्मानित हुई है तीजन बाई।
भगवान् से प्रार्थना करती हूँ कि अप्रतिम पंडवानी गायिका तीजनबाई सदैव इसी तरह अलंकृत होती रहे...। वह तो छत्तीसगढ़िया लोगों की अस्मिता है। इतने सारे सम्मानों-पुरस्कारों की प्राप्ति पर उसकी प्रतिक्रिया कैसी होती है यह जानने की उत्सुकता रोक नहीं सकी तो पूछ ही लिया...।
मुक्त कंठ से हंसते हुये...बोली’’ अच्छा लगता है यही सुनना है या और कुछ...?’’
मैंने fनःसंकोच कहा...’’और कुछ भी सुनना है...जानना है...।’’ विगत तीस पैंतीस सालों से पंडवानी प्रस्तुत करते-करते भावानुरूप भाशा का प्रयोग करने में पटु हो गई है तीजन बाई वाक्पटु भी कह सकते हैं....। मुक्त हंसी को सामयिक अवकाश देकर fकंचित गंभीर हो गई तीजन बाई....कंठ-स्वर भी प्रभावित हुआ...बताने लगी...।
कम उम्र में ये पुरस्कार...सम्मान, लोगों का अभिनंदन...तालियों की गड़गड़ाहट....अच्छे लगते थे...बहुत खुशी होती थी...कई दिनों तक मुग्धता में, आत्मश्लाघा में डूबी रहती थी....। उम्र बढ़ने के साथ-साथ चिन्तन प्रारंभ हुआ....आत्मचिन्तन...पंडवानी तो महाभारत की ही कथा है जिसके नायक हैं योगिराज कृश्ण...वही जिन्होंने रासलीला की...बांसुरी से जड़-चेतन को सम्मोहित किया तो अत्याचारियों से जनसमुदाय को बचाया, अन्यास का विरोध किया, विरोध करना सिखाया...वे कर्म करते थे...फल के भोग पर उनकी आसक्ति नहीं थी...नहीं...वे मथुरा के राजा बने...न द्वारिका के fसंहासन पर बैठे...महाभारत की लड़ाई पाण्डवों ने उन्हीं की देशरेख में लड़ी...पर उन्हें क्या मिला ? या वे निज के लिये क्या चाहते थे...कुछ नहीं...। ऊपरी आमदनी यह हुई कि गांधारी का शाप मिला...। कहने का अर्थ यह है कि कर्म करो...फल...अच्छा हो या बुरा...उस पर आसक्त मत होओ...।
मैं सोचने लगी...कितनी सटीक व्याख्या है कर्म की...वस्तुतः कला की साधना...साधक को सांसारिक मोह से मुक्ति देती है, दूसरी ओर आत्मचिन्तन साधक को ‘‘ब्रह्य सत्यं जगन्मिथ्या’’ के मार्ग पर अग्रसित करती है।
मेरी भावसमाधि को चुटकी बजाकर भंग करते हुये तीजन ने कहा ‘‘हो गया कि अभी और सुनना है ?’’
कुछ सोचकर पूछी ‘‘तीजन...अभी तक मेरे सामने स्थिति स्पस्ट नहीं हुई है...यह बताओ कि इस स्थिति तक पहुंचने के पहले किस मनःस्थिति से गुजरना पड़ता है...?’’
अब जो सुनी उसने मुझे अवाक् कर दिया...वो इस तरह बताया है उसने...।
पुरस्कार या सम्मान तब मिलता है जब आप कोई अच्छा काम करते हैं...ठीक है...न,...तो उन अच्छे कामों का जो कीर्तिमान आपके द्वारा रचा गया है, अगली बार आपको ही उस कीर्तिमान को ध्वस्त करना होता है तभी तो अगला पुरस्कार मिलता है, कहने का अर्थ यह है कि अपनी छवि को गढ़ना फिर उसे तोड़ना...सहज नहीं है ...बड़ा श्रमसाध्य है...।
निर्माण ध्वंस की इस प्रक्रिया के नायक तो आप स्वयं हैं तो...निर्माण का आनंद...जीत की खुशी यदि मिलती है तो ध्वंस का शोक....हार का दर्द भी तो आपका ही हुआ न...? सार तो यही है न कि हार-जीत, सुख-दुख सब के कर्ता भी आप हैं भोक्ता भी आप हैं...। मन भी आपका, कर्म भी और फल भी।
इस सम्पूर्ण क्रीड़ा में थकते, लड़ते, जीयते-हारते जीवन में एक पल ऐसा भी आता है जब आप निरासक्त हो जाते हैं। यही तटस्थता यही निरासक्ति परिपक्त होकर स्थिरतप्रज्ञता में परिणत हो जाती है। आज की यह तीजन बाई भी इसी निश्कर्श पहुंची है तो बहन ! हार-जीत, लाभ-हानि, यश-अपयश सब उसी बृन्दावन बिहारी की लीला है तो अब तुम्हीं बताओ पुरस्कार-सम्मान की खुशी मनाऊँ या फिर लोकापवादों से, लांछनाओं से, कुत्सित fनंदा से दुखी होऊं ? इसलिये इस जीवन को ही मैंने कृश्णार्पमस्तु कह दिया है। दोनों हाथों को जोड़कर माथे से लगाई, बंद आखों से आंसू बहने लगे...अश्रुसिक्त कंठ से बोली...बोल दो बृन्दावन बिहारी लाल की जय...मुखरा तीजन मौन हो गई।
पंडवानी के पात्रों को मंच पर जीवन्त करती बाई...दक्ष अभिनेत्री है इसे तो शत्रु भी स्वीकार करेंगे...उसके सभी रूपों को लोगों की सराहना मिलती है...जो मैंने भी देखा है...पर...यह रूप...यह निर्लिप्तता, स्थितप्रज्ञता, यह रूप भी है तीजन का... नहीं जानती थी... इस तीजन बाई को तो आज तक किसी ने देखा ही नहीं है...। जाना भी नहीं है, समझने की तो बात ही नहीं है।
समस्त कर्मों को उसी के चरणों में समर्पित कर देना...निछक शरणागत भाव नहीं है और न ही दैन्यता है...क्षमामापन भी नहीं है...अगर कुछ है तो प्रच्छन्न मान है....कि तुम्हारी कृति हूँ जैसी भी हूँ अच्छी...या बुरी...तुम्हारी तो हूँ...। याद आ रहा है एक दोहा...
‘‘अवगुन मेरे बाप जी, बकस गरीब नेवाज
जो हौं पूत-कपूत हौं, तऊ पिता को लाज...।’’
तीजन बाई से मिलने कुछ लोग आ गये इसलिये मैं अनुमति मांगकर घर आ गई। तीजन-कथा सुनते-सुनते...यह कैसा तादात्मय उत्पन्न हो गया है ? सह अनुभूति निरंतर प्रगाढ़ होती जा रही है...। कहते हैं वैराग्य का मूल दुःख होता है तो विराग की जड़ राग...। प्रसिद्ध के शिखर पर आसीन होकर तीजन के अंतरतम में कौन सा दुःख है, कैसी पीड़ा है...उसके हृदय के निभृत एकान्त में किस अवसाद ने स्थाई निवास बना रखा है? सांसों के सरगम में विकल रागिनी क्यों निरंतर बजती रहती हैं?
संस्कृत साहित्य मनीशी भाश ने करूण रस को सभी रसों का आधार माना है...
‘‘एको रसः करूणमेव निमित्त भेदात्
भिन्नः पृथक पृथगिवाश्रये वितर्वान्।
आर्वत् बुद्बुद् तरंगयान विकाराः
नंभो यथा सलिलमेव हि तत् समग्रम।’’
करूणा महासागर है तो अन्यान्न रस उसमें उठने वाली लहरें हैं...ये लहरंे मानसतट को छूती तो हैं पर लौट जाती हैं उसी करूणालय में...। यही करूणा मनुश्य के अन्य भावों को उत्प्रेरित करती है तो अन्य रसों का रसास्वादन भी कराती है।
कोई कूल किनारा...नहीं मिला...थकी पलकें मुंद गई...। सुबह उठने पर भी वही करूणा सिर पर सवार थी यथावत्। सोच...ली...आज तीजन से पूछूंगी...याचक की तरह...उपहासक की तरह नहीं...याचक को भिक्षा मिलती है अन्य को तिरस्कार...।
आज कुछ जल्दी पहुंच गई थी...। अभी तीजन बाई तैयार होकर बाहर नहीं आई थी....बच्चे मुझे पहचानने लगे हैं इसलिए सीधे बैठक में जाकर बैठ गई...।
धूप, दीप, विविध पुश्पों की सुगंध से भरा हुआ था कमरा...शायद पूजा कर रही थी...।
भजन...सुनाई देने लगा...।
‘‘मेरे तो गिरिधर गोपाल
दूसरो न कोई...।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।
अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेलि फैलि गई आणंद फल होई...।
मेरे तो गिररिधर गोपाल....।’’
मुग्ध हो गई...स्वर में जड़ता नहीं, अद्भूत माधुर्य है, सम्मोहन है। मुखडे़ से अंतरे पर आते समय...जरा सा ठहराव...जिसे संगीत के ज्ञाता आवश्यक मानते हैं। बिना किसी तारवाद्य अथवा हारमोनियम का आश्रय लिये...गायन...फिर भी स्वर भंग किसी शब्द में किसी पद में नहीं होता। आरोह-अवरोह ही बता रहा था कि तीजन बाई दक्ष गायिका है...सुरीले कंठ को साधने के लिए किया गया परिश्रम व्यर्थ नहीं हो गया...। कोमल ‘स’ पर अद्भुत पकड़ है तीजनबाई की...। याद आया...लोग उसे भजनहिने के नाम से संबोधित करते थे...।
एकनिश्ठ आत्मसमर्पण..प्रतिश्रुति के लिए भी कोई प्रयास नहीं..मैं तुम्हारी हूँ या नहीं...तुम जानो..तुम मेरे हो..मेरे लिये इतना बहुत है...यही मेरा सुख है..आनंद हैकृ।
भक्ति से परिपूर्ण शांत रस को परिभाशित करता मीरा का यह भजन...सचमुच मीरा का है...या गायिका तीजन ही आज मीरा बन गई है कह पाना कठिन है।
मेरे मन का प्रश्न फिर जाग उठा...निश्चय कर ली आज तो व्यथा-कथा का दिन है तो वही कथानक ही सुनूंगी...। पूछूंगी तीजन के पास कि वह कौन सी रूदन्ती है, जो स्वर्णिम आभा से जगमग कर देती है ? उसके गायन को, अभिनय को, प्रस्तुति को...।
शब्दों को भावना के धागे में पिरोकर गीत रचना कला है तो गीतों में स्पन्दन पैदा करना उससे भी बड़ी कला है जो विधाता का अनुपम वरदान है तभी तो शील जी लिखते हैं-
‘‘अंतर के गीत बहुत उतरे उतरेंगे
पर उनमें जीवन-प्राण तुम्हीं देते हो
मरू में भी यह रसधार तुम्हीं देते हो...।’’
साड़ी की सरसराहट ने ध्यान खींचा..देखी तीजन बाई आकर आसन पर बैठ गई थी..
‘‘नागर नटी मीरा हर बहिनी के सुध-बुध भुलवार दिहिस अइसे लागत हावय...।’’ कहा उसने।
तीजन की स्निग्ध हंसी...भोर की पहली किरण की तरह कमरे में बिखर गई...।
प्रश्न पर ध्यान दी ‘‘नागरनटी मीरा ने बहन का सुध-बुध भुला दिया ऐसा लगता है?’’
थोड़ा संकोच हुआ...’’नहीं...मैं सोच रही हूं तीजन के कंठ में इतनी आकुलता...इतनी करूणा कहां से आई...।’’
अपने हृदय-स्थल पर हाथ रखकर बोली तीजन ‘‘इहां एक ठन दह हे जेमा आंसू भरे हे, झांक के देख...हिम्मत हे...त उतर के देख....बूड़ जाबे त मोला दोश झन देबे...।’’
(हृदय के अंदर एक गहरा कुंआ है जो आंसुओं से भरा है, झांक कर देखो...यदि हिम्मत हो...तो डुबकी लगाकर देखो...डूब गई तो...मुझे दोश मत देना..)
भगवान् कृश्ण को नहीं....नटवर नागर को प्रणाम की जिन्होंने यशोदा की, गोपियों की, राधा की पीड़ा को आजीवन वहन किया...। भूमिका तो बन ही गई थी...बहुत संभाल कर पूछी...सीधे-सीधे पूछने का साहस फिर भी नहीं हुआ...।
‘‘तीजन आज अपने घर-परिवार, बाल-बच्चों के बारे में बताओ...?’’
क्या बताऊं ? कहां से शुरू करूं...सोचती रही...।...कुछ देर की चुप्पी के बाद तीजन बाई ने बताना शुरू किया।
मेरे तीन बेटे हैं बड़ा सत्रुहन आजकल बेलोदी में रहकर खेतीबाड़ी देखता है...दिलहरण मंझला और कौसल छोटा बेटा है ये दोनों गनियारी में रहते...वहां का घर द्वार संभालते हैं। तीनों बहुयें...सुगृहिणी हैं...उनके आ जाने से मैं घर द्वार संभालने की झंझट से ऊबर गई हूँ। बहन की लड़की को गोद ली हूँ ताकि बेटी की कमी पूरी कर लूं...उसकी शादी भी मैंने कर दी है दामाद अच्छा लड़का है मुझे मां समान ही इज्जत देता है।
छः पोते और पांच पोतियां है जिनसे मेरा घर आंगन भर गया है अभी ही एक पोती की शादी अक्षयतृतीया के दिन हुई है इसी मई 2007 में।
डेरा में बचपन बीता था अपने बच्चों के लिये छोटा सा घर थोड़े से खेत की व्यवस्था कर सकी यह भी भिलाई की नौकरी के चलते हो सका....। मेरे विभाग में जो लोग पहले थे अभी रिटायर होकर चले गये हैं तथा जो आज भी मेरे साथ है सबका सहयोग मुझे मिलता रहा है। सभी प्रबंध निदेशकों ने मुझे प्रोत्साहन दिया सम्मान दिया है। संगमेश्वरम साहब तो मेरे लिये देवता समान हैं उन्हीं के प्रयास से तो भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी पा सकी...।
पद्मश्री मिलने के बाद अधिकारियों ने मुझे भी अधिकार संपन्न बना दिया...। क्या सोचकर बनाये मैं नहीं जानती...। मेरे पंडवानी...कार्यक्रमों में किसी ने कभी उजर आपत्ति नहीं की बल्कि सहयोग ही करते रहे हैं...।
    मेरे भीतर बैठा लेखक भी सन्तुश्ट न हो सका उसे तो अवसाद का पता ठिकाना जानना था अतः डरते डरते..येन-केन-प्रकारेण सोई व्यथा को जगाने का अपराध कर ही बैठी..। पूछी ‘‘तीजन बच्चों के पिता के बारे में कुछ क्यों नहीं बोली ?’’
उदास हो गई तीजन....विशश्ण मुख....कांपते ओठों से निकला-
‘‘एक ठन अऊ महाभारत ल सुन के काय करबे बहिनी...ले चल...सुनी ले....।’’
(एक और महाभारत की कथा ही तो है क्या करोगी सुनकर बहन...खैर-चलो सुन ही लो।)
गनियारी में बसने-कमाने खाने के लिए एक युवक आया नाम था तुकाराम वर्मा...। सामान्य कद काठी....स्वस्थ मेहनती शरीर का मालिक था। बातें बड़ी लच्छेदार करता था...कुछ दिन तो ठीक चला...तीजन के पंडवानी से प्रभावित हुआ। धीरे धीर बातचीत करने की कोशिश करने लगा...। तीजन ने बताया मैं जानती थी उसकी पत्नी है...छोटा सा परिवार है, धन सम्पत्ति नहीं है...मेहनत-मजदूरी करके पेट-परिवार दोनों पल रहे थे।
विधि का विधान कहूं या मनुश्य की कमजोरी कहूं...क्या नाम दूं उस संबंध को....आज भी नहीं समझ पाती...। तुकाराम ने मां बाबू से सीधे बात की...डरा नहीं...कुछ दिनों के ना नुकर के बाद मां बाबू मान गये और मेरा गौना कहिये या अन्तर्जातीय विवाह उनके साथ हो गया। उनकी पहली पत्नी ने असनारा गांव में जीवन साथी ढूंढ़कर नया घर बसा लिया।
शादी के बाद के कुछ दिन तो खुमारी में बीत गये...देखते-देखते...बड़ा बेटा गोद में आ गया। उनका व्यवहार बदलता हुआ-सा लगने लगा...पर मैं अपने बच्चे और पंडवानी में मगन रहती...यही बात उन्हें अपनी अवमानना लगती उन्हें लगता कि मैं उन पर ध्यान नहीं दे रही हूँ...खोंचा मारते.... कही अनकही बातें हमारे बीच जमा होते होते नौबत...लड़ाई झगड़े तक तक आ गई।
दूसरा बेटा तब तक आ चुका था...हालत यह हो गई उन्हें पंडवानी...शत्रु लगने लगी...कार्यक्रम में शामिल होने से कतराने लगे...यही नहीं मेरा...मंचीय कार्यक्रम में पंडवानी गायन उन्हें अनुचित लगने लगा। हजार बहानों से रोकने का प्रयास करते। मैं भी धुन की पक्की...मर जाने पर भी पंडवानी-गायन नहीं छोडूंगी की जिद...। वो अपने को उपेक्षित...हीन...समझने लगे। कभी-कभी स्वयं को ऊंची जाति का बताकर मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाते...। रोज-रोज की लड़ाई ने घर की सुख शांति को नश्ट कर दिया...। बात इतनी बढ़ गई कि पशुवत् आचरण करने लगे...मारने पीटने पर उतारू हो गये...।
मैंने विरोध किया तो पति होने का दावा पेश किये...घर की बातें-बाहर फैलने लगी...मुझे बहुत अपमानित होना पड़ता तो कका (उमेंदfसंह देशमुख) ने उन्हें समझाया बुझाया...थोड़े दिन तो सब कुछ ठीक-ठाक चला। कहते हैं शक की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी...उसी शक के शिकार वे भी हो गये।
इन्हीं सब झंझटों के बीच ही तीसरा बेटा कौशल मेरी गोद में आया...। तीन छोटे छोटे बच्चों को संभालना...कार्यक्रम देना...बड़े कश्ट भरे दिन थे...घर आकर...वही लड़ाई-झगड़ा मारपीट-फिर भी सहती रही...पर शरीर कमजोर हो गया...मैं भी तो आदमी हूँ चिड़चिड़ाने लगी थी....।
अब तो बात इतनी बढ़ गई थी कि जहां मैं पंडवानी गाती रहती वे वहीं पहुंच जाते...चीखना चिल्लाना...गाली गलौज करना शुरू कर देते...।
मैं शरम से गड़ जाती...पर कुछ कर तो सकती नहीं थी सिवाय हाथ-पांव जोड़ने के...वहां जवाब तलब करने बैठाती तो कार्यक्रम नश्ट हो जाता...लोग हमें पैसा देकर ही तो बुलाते थे...वे लोग पंडवानी सुनने आते थे लड़ाई झगड़ा देखने नहीं।
परबुधिया (पराई बुद्धि पर चलने वाला) थे...दुश्मनों की कमी तो थी नहीं...कुछ जलन-खोर भी थे जो मेरी पंडवानी से जलते थे, वही लोग उनके कान भरते थे। ऐसे लोगों की कमी तो होती नहीं है जिनका काम ही चारी-चुगली करना, घर फोड़ना, आग लगाना होता है वहां भी ऐसे ही लोगों से वे घिरे रहते...। हमारे बीच बातचीत बंद हो गई थी पर पति होने का कर्तव्य वे मारपीट कर पूरा करते थे...। आखिर एक दिन मैं तंग आकर बोली ‘‘घर में चाहे जितना झगड़ा करे, हाथ उठायें सब सहूंगी पर हाथ में तंबूरा पकड़ते ही मैं सहने सुनने से बाहर हो जाती हूँ उस समय-सिवा पंडवानी के मुझे कुछ और नहीं सूझता...आप मेरे कार्यक्रम में बाधा मत दिया करें...।’’
पौरूश का अहंकार उनमें प्रबल था...फिर पहुँच गये...इस बार तो मंच पर ही पहुंच गये....मैंने शांतिपूर्वक दाहिने हाथ में पकड़े तंबूरे को माथे से लगाकर कहा...आज फिर आपने उपद्रव शुरू कर दिया...ठीक है मैं इसी समय तिबाचा (प्रतिश्रुति) देती हूँ कि आज से हमारा संबंध खत्म हो गया...आप अपने रास्ते जाइये...मैं अपने बच्चों का पेट पाल लूंगी...।
वही हमारे विवाहित जीवन का आखिरी दिन था...मैं महाभारत कथा सुनाती हूँ पर घर में महाभारत करना मुझे पसंद कभी नहीं था...न आज है...।
छोटा लड़का पांच महीने का ही था...समस्या यह थी कि बच्चों को किसके सहारे छोड़कर कार्यक्रम देने जाऊँ...? मेरी चिन्ता को देखकर दूसरे गांव की मेरी सहेली साहून मेरे पास रहने लगी उसे मैं जबरदस्ती कुछ रूपये दे दिया करती थी।
  मेरे बच्चों को उसने बहुत प्यार से पाला। हारी-बीमारी में सगी मां जैसी देखभाल करती थी। मेरे दुख के दिनों की साथिन को मैं कभी भूल भी नहीं सकती...।
  दुख मुझे इस बात का होता है कि घर की अशांति के कारण, बा पके चले जाने के कारण मेरे बच्चों को इच्छानुसार पढ़ा लिखा नहीं पाई...बिल्कुल निरक्षर नहीं हैं...पर अच्छी नौकरी पाने लायक शिक्षा तीनों को नहीं दे सकी...।
ठंडी सांस खींचकर तीजन ने आगे का हाल सुनाया...। करेला और नीम चढ़ा वाली बात हो गई...अन्तर्जातीय विवाह के कारण लोगों का क्रोध तो था ही अब उनके चले जाने से लोगों को चार बाते सुनाने का मौका मिल गया...।
ब्हुत अपमानित, लांछित fजंदगी थी उस समय...। अकेली औरत जात तो थी लोगों ने जो मुंह में आया कहा...। आज उस सबको याद करती हूँ तो सारा शरीर जलने लगता है। अरे बहन...! पाण्डवों की सुरक्षा में थी द्रौपती तो भी कीचक और जय द्रथ की कुदृश्टि उस पर पड़ी...तो हम आप तो साधारण स्त्री हैं।
शुरू-शुरू में बहुत विचलित हो जाती थी कि कका ने ही समझाया...लोगों की बातों पर कान मत दो...उसी बृन्दावन बिहारी की शरण गहो...उसी कथा में डूबो...धीरे-धीरे शांति मिलेगी...। पिता समान आदमी का कहना मानकर शांत हो गई...। पर छाती के भीतर अभी भी जलन होती है। घाव तो सूख ही जाते हैं पर निशान तो रह ही जाते हैं न....? कभी-कभी थोड़ी सी खरोंच भी घांव की पपड़ी उघाड़ देती है, चिनचिनाता है....दर्द होता है।
यादों के बादल बरसने लगे....थोड़ी देर तीजन को रोने दी...सामने रखा पानी का गिलास उसे पकड़ाई...भरी-भरी अंाखों से मेरी ओर देखी...मैंने देखा पीड़ा का साम्राज्य ही समाया हुआ था पलकों के नीचे...।
अवसाद का संधान चाहती थी पर उससे तीजन को इतनी पीड़ा होगी इसका अनुमान नहीं था...क्षमा मांगना औपचारिकता होती अतः चुप बैठी रही।
तीजन बाई ने कहा-’’आवश्यक काम से मैं बाहर जा रही हूँ...मोबाइल नंबर तो आपके पास है आवश्यकतानुसार फोन करके...छूट गई बातें पूछ लेना...।’’
प्रेम में जय-पराजय नहीं होता...पर अनादर, उपेक्षा, सन्देह की भी जगह नहीं होती...। परस्पर विश्वास ही तो दाम्पत्य का आधार होता है जब वही विश्वास खो जाये तो घायल प्रेम क्या करे सिवाय तड़पने के...तो वही तड़प कलेजे में छिपाये फिरती है तीजन...। उस दर्द को उसने अपनी कला पर हावी होने नहीं दिया....यही तीजन की विशेशता है। टूटकर बिखर नहीं गई बल्कि बिखरते परिवार को समेट लिया। ठीक ही कहा है किसी ने
‘‘दर्द में भी कोई बात है
दर्द कभी श्वेत है, कभी श्याम है
कभी रास्ता तो कभी मुकाम है।’’
दर्द के उसी मुकाम पर खड़ी लोगों को खुशियां बांटती फिरती है अपराजिता तीजन बाई। दर्द का प्रारंभिक स्वरूप मनुश्य को अशक्त और fकंकर्तव्यविमूढ़ कर देता है तो मध्यावस्था सोये साहस को जगाकर कर्तव्यपथ पर अग्रसित करती है। दर्द की चरमावस्था वह होती है ज बवह मनुश्य को निरासक्त कर्म करने का मंत्र देती है, व्यक्तितव को चट्टान सी दृढ़ता प्रदान करती है, लक्ष्य प्राप्ति में बाधक नहीं साधक सिद्ध होती है। जीवन में दर्द की विचित्र किन्तु सत्य भूमिका यही है।

प्रपत्ति-पर्व

लोक अर्थात् जन...चाहे वह ग्रामवासी हो या नगर वासी...। सामान्य जन-मानस अर्थात् लोक-मानस से उद्भूत कला ही लोककला है यहाँ लोक कला के अंतर्गत लोकसाहित्य, लोकगीत, लोकनृत्य एवं लोकगाथा के साथ लोकशिल्प भी समाहित है।
लोकसाहित्य के आदिपुरूश महर्शि वेदव्यास ने लिखा है ‘‘प्रत्यक्षदर्शी लोकान्त सर्वदर्शी भवेन्नरः।’’ जगत् का प्रत्यक्षदर्शी है वही लोक है। इसी प्रत्यक्षदर्शी लोक की कल्पना और अनुभूति का, आवेगों और संवेगों का प्रस्फुटन है लोकसाहित्य।
वेदव्यास रचित महाभारत से प्रेरित है सबलfसंह चौहान द्वारा महाभारत जो दोहा चौपाई शैली में लिखा गया है। छत्तीसगढ़ की पंडवानी इसी महाभारत पर आधारित लोकगाथा है।
स्मरणीय यह भी है कि पंडवानी लोकनृत्य, लोकगीत और लोकसंगीत तीनों का समन्वित प्रयास है। काव्य शास्त्र की दृश्टि से यह चम्पूकाव्य है।
दूसरी तरफ पंडवानी लोकमंच की एकल लोकनाट्य कला है जिसमें एक ही पात्र गायन-नर्तन के साथ टीका भी करता है इस एकाभिनय में रागी की भूमिका नितान्त नगण्य नहीं है कथा को आगे बढ़ाने में वह सहायक सिद्ध होता है। पंडवानी एकलवाचित, पाराशरी परंपरा की उत्कृश्ट अभिव्यक्ति है पर पाश्वZ संगीत की उपयोगिता, आवश्यकता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता फलतः संगतकारों के वादन की अनिवार्यता से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
पंडवानी गायन का अभिन्न अंग है भावाभिनय जिसके अंतर्गत श्रंगारादि रसों के साथ-साथ मानवीय भावनाओं का समावेश भी रहता है इसे श्रुतिमधुर बनाने के लिये भी पाश्वZसंगीत की अनिवार्यता स्वतः सिद्ध हो जाती है। परिवर्तित, प्रसंगानुकूल संगीत पंडवानी गायन की अन्यतम विशेशता है।
लोक चेतना और लोकसंस्कृति से संबद्ध पंडवानी पूर्णतः लोकसाहित्य है जो गायन, नर्तन और संगीत से समृद्ध होकर लोकव्यापी है।
पंडवानी गायन शैली में छत्तीसगढ़ी पारंपरिक सांगीतिक विविधता के साथ लोक स्वर की अनुगूंज उसे और भी श्रुतिमधुर और भी चित्ताकर्शक बना देता है।
तंबूरा, झांझ, हारमोनियम, तबला, बेंजो, मंजीरा और ढोलक की संगत से गायकी का जो लोकरूप उभरता है वह दर्शकों श्रोताओं को अनिर्वचनीय आनंद देता है इस आनंद प्राप्ति में भाशा महत्वहीन हो जाती है। आनंद को आत्मसात् करने के लिये के लिये देश, काल, पात्र, जाति, वर्ग, भाशा सब गौण है मुख्य है रसास्वादन। कला, कलाकार और दर्शक के बीच का यह तादात्म्य जितनी उच्च कोटि का होगा उतना ही तन्मय-श्रोता को भावलोक में स्थित कर अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति कराने में सक्षम होगा। यही विशेशता है पंडवानी गायन की भी और प्रस्तुतकर्ता कलाकार की भी।
पंडवानी गायन में रागी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पद की अंतिम कड़ी को दुहराकर वह कथा के संबंध में प्रश्न करता है जिससे कथा को आगे बढ़ाने में प्रस्तुतकर्ता को मदद मिलती है।
रागी गायन में सहयोग इस तरह भी देता है कि गायक को स्वर विचलित होने से बचाता है तो रागी के गायन के समय गायक को सांसों को संयत करने, सुर को साधने का समय मिल जाता है। गायक के सुर में रागी इस तरह सुर मिलाता है कि तन्मय श्रोता को स्वर परिवर्तन का आभास बहुधा नहीं हो पाता।

पंडवानी गायन की दो प्रमुख शाखायें हैं- 
प्रथम-वेदमती  शाखा कहलाती है इस शाखा के गायक शास्त्रसम्मत गायन करते हैं। ये लोग स्वयं को महाभारत गायक कहते हैं। इन गायकों ने लोकरूचि और सामयिक वाद्ययन्त्रों का प्रयोग गायन के साथ किया है। महाभारत कथा को छत्तीसगढ़ी धुनों में बड़ी सहजता पूर्वक बांधने का काम भी किया। गायन के साथ नृत्य भी सम्मिलित किया जाता है। इस तरह पंडवानी का आर्कशण बढ़ जाता है।
इसमें मुख्यतः तीन गायन शौलियां पाई जाती हैं प्रथम स्तर का नाट्य द्वितीय स्तर से उठता हुआ नाट्य और तृतीय स्तर पर विस्तार करता हुआ नाट्य। प्रथम में गायक घुटनों के बल बैठकर तंबूरे का आश्रय लेकर अभिनय करता है इसमें रागी भी एक पात्र होता है। द्वितीय में गायक खड़े होकर भावाभिनय करता है। इसमें पल-पल परिवर्तित मुद्रायें तथा एकाभिनय दर्शनीय होता है। रागी दो काम करता है, हुंकारी भरता है और गायक की कड़ी को दुहराता भी है। कथा को आगे बढ़ाता है।
तृतीय प्रकार के गायन में रागी तत्कालीन कथा को समकालीन बनाते हुये दोनों को जोड़ते चलता है। इसके लिए रागी समकालीन प्रश्न भी पूछता हैं। मुख्य गायक प्रश्नों का उत्तर देते हुये उसे तत्काल तत्कालीन कथारूप से जोड़ता है।

द्वितीय कापालिक शाखा-
पंडवानी की यह पारंपरिक शाखा है जिसमें गायन और वादन (तंबूरा) प्रधान गायक स्वयं करता है। इसमें कथा गायन को प्रमुखता दी जाती है। भाव और अभिनय के साथ-साथ टीका (व्याख्या) अधिक सक्षम रूप में दिखाई देती है।
संगीत की परिपाटी वेदमती शाखा की तरह ही है। संगीत की स्वर लहरियां पंडवानी के कथा मिथकों का घटाटोप खोलती हैं। रागी की भूमिका पूर्ववत ही होती है। कापालिक शाखा में कल्पनाशक्ति और आशुकविता का महत्वपूर्ण स्थान है...उदाहरण के लिये तीजन बाई की प्रस्तुति देखिये-
‘‘जस करनी तस करम गति
जस पूरबल के भाग
जम्बू ने ऐसा कहा
तू क्या कहे रे काग....।’’
रागी...तो-काग क्या कहे रे भाई ऽऽऽ...।
टीका - नाग के fभंभोरे में रत्न भरा कलश है, ए दीदी! तुम नाग को मार दो मैं उसे खाऊंगा मेरी भूख मिटेगी, तुम रत्न भरा कलश ले लेना....।
यह पारंपरिक महाभारत कथा का अंश नहीं है वरन् गायिका द्वारा तात्कालिक कथा प्रसंग की अवधारणा है।
तृतीय - इस शाखा की गायकी में संवाद प्रमुख होते हुये भी संगीत और कथा को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भावाभिनय कम होता है भावों में भी मूर्तन का लोप हो जाता है यह पंडवानी गायन का अंतिम पड़ाव है। इसमें सारंगिया देवार सारंगी, ठुंगरू देवार ठुंगरू के साथ गायन करते हैं। पठारी प्रधान गायक fकंकणी या बाना नामक वाद्य के साथ प्रस्तुति देता है। गोगिया परधान fकंfडंक वाद्ययंत्र का प्रयोग करता है। मुख्य विशेशता यह है कि इसमें हंसी-मजाक का, परिहास-विनोद का समावेश भी किया जाता है। सामाजिक विद्रूपों पर तीव्र कटाक्ष के साथ तीखा व्यंग्य भी इसमें शामिल होता है।
गायकी में रागी में जिस ध्रुव पंक्ति को दुहराता और लय को आगे बढ़ाता है धुन का वह आघूर्णन ही कथा को गति प्रदान करता है।
वेदमती शाखा के प्रमुख गायक है पंडवानी पुरोधा दुलारfसंह साव, स्व. झाडूराम देवांगन....पुरूश गायकों ने प्रायः इसी शैली का अवलंबन किया है।
महिलाओं में श्रीमती लक्ष्मी बाई वरिश्ठ साधिका रही पुरूशाश्रित पंडवानी में इनका साधिकार प्रवेश चौंकाने वाला था।
कापालिक शाखा को महिलाओं ने श्रेश्ठि समझा यह शैली महिलाओं के लिये उपयुक्त भी सिद्ध हुई। पद्मश्री, पद्मभूषण डॉ. तीजन बाई, शांति बाई चेलक, मीना साहू, श्रीमती उशा बारले, येमिनबाई निशाद, कापालिक शैली की प्रमुख कलाकार हैं।
पंडवानी गुरू झाडूराम जी ने कबीर, तुलसी, रहीम के दोहों का कथानुरूप समावेश अपने गायन में किया।
(संदर्भ ग्रंथ - छत्तीसगढ़ ज्ञान कोश, लेखक हीरालाल शुक्ल।)

(2)
पूर्व-निर्धारित तिथि से पांच दिन पूर्व ही मानसून अपने लाव-लश्कर के साथ केरल पहुंच गया है। पेड़ों की डालियां झुक कर अभिवादन करती हैं तो पत्ते तालियां बजा रहे होते हैं। चमकती बिजली ने बस्तर एक का रास्ता दिखा दिया है तो कुछ काले कुछ भूरे बादल हवा पर सवार होकर भिलाई तक मानसून आगमन का संदेश देने चले आये हैं। कल तक गरमी अपनी पूरी गरिमा के साथ यही थीं चार बजे सुबह की गाड़ी पकड़ चली गई।
मेरे लेखन कार्य की अन्यान्य बाधाओं में से गर्मी भी एक है...बड़ी शांति मिली, अब लिखूंगी...तीजन बाई से उसके अविस्मरणीय पंडवानी-गायन....तज्जन्य अनुभूतियां नोट कर लाई हूँ उसे ही लिखूंगी...।
तीजन बाई ने बताया था कि...छब्बीस जुलाई दो हजार तीन...दिन याद नहीं....। मध्यप्रदेश में स्थित उमरिया में कार्यक्रम था। बादल-पानी के दिन थे...प्रारंभिक व्यवस्था देखने के लिये मनहरण सार्वा को भेज कर कुछ निश्चिन्त हुई...। विशेश रूप से चेताई कि ठहरने की व्यवस्था कार्यक्रम स्थल से अधिक दूर न हो...आते-जाते बारिश में भींगना पड़ गया तो...सरदी जुकाम होना निश्चत है अभी और भी कार्यक्रम देने हैं बीमार पड़कर आयोजकों को परेशान नहीं करना चाहती...।
तीसरे दिन मनहरण सार्वा वापस आकर बताये कि कार्यक्रम स्थल तो शहर से 5 कि.मी. दूर जंगल में है...बहुत घना जंगल नहीं है जन्तु-जानवरों का डर भी नहीं है पर जरा भी मौसम बिगड़ा तो परेशानी होगी। चूंकि वहां के मंदिर-चत्वर में कार्यक्रम है इसलिये कुछ कहा भी नहीं जा सकता।
चलिये...जाना तो पड़ेगा ही...जिस भगवान् को पंडवानी सुनाने जा रही हूँ वही रक्षा करेंगे...। तीजन बाई ने अपना मत रखा।
उत्साह से भरकर मनहरण बोलने लगे’’अम्मा जानती है वो पाण्डवों द्वारा बनाया शिवमंदिर है, बहुत पुराना है....लोगों के द्वारा जीर्णोद्धार किया गया है, बड़ी मानता है...उस मंदिर में स्थित देवाधिदेव महादेव की....।’’
असल में तीजन बाई को अन्यमनस्क देखकर मनहरण....बात संभालने का प्रयत्न कर रहे थे...जानते हैं न कि अम्मा देवस्थानों देवी-देवताओं का प्रसंग आने पर दुर्बल हो जाती हैं।
आरक्षण तो हो ही चुका था तीजन बाई का दल....उमरिया पहुंचा....निर्धारित समय से तीन चार घंटे पहले पहुंच गये थे....पर आयोजकों की आवभगत ने मन मोह लिया...। चायनाश्ता....खाना-पीना ठहरना सब कुल सामान्य से अधिक अच्छा था....। शाम से ही बादल घिरने लगे थे....हवा ठण्डी हो गई थी...हां बारिश नहीं हो रही थी...। सब लोग भोले बाबा से विनती कर रहे थे कार्यक्रम सफल हो....पानी न गिरे भगवान....।
तीजन बाई सबसे पहले मंदिर में गई....विशाल शिवfलंग काले ग्रेनाइट पत्थर का....पुजारी ने बेल पत्तों और आंक-धतूरे के फूलों से श्रंृगार किया था....सप्तवर्तिका के धीमे आलोक में मंदिर...पवित्र-पवित्र लग रहा था....धूप की संुगध पवित्रता बढ़ा रही थी...। तीजन ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया...लटकते हुये घण्टे को बजाया...जिसकी प्रतिध्वनि बड़ी देर तक गूंजती रही....हाँ एक विशेश बात हुई कि उसका मन अपूर्व-अर्निवचनीय आनंद से भर गया...सामान्यतः कार्यक्रम की सफलता के बाद संतोश मिश्रित आनंद होता है आज पहले ही...क्यों ? तो क्या महादेव भी प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रहे हैं आखिर डमरू बजाने में प्रवीण है तो प्रलयंकर शंकर का ताण्डव उनके नर्तनविलास का प्रमाण ही तो है। संगीत, नृत्य, गायन-वादन के अधिश्ठाता तो वही है न ? किरातार्जुन प्रसंग याद आते ही तीजन बाई हंस पड़ी तो भोले बाबा आज पण्डवानी सुनेंगे....पुनः सिर नवाई बाबा आपकी जैसी आज्ञा...आपकी ही कृपा से तो यह कला मिली है बड़ी कृपा होगी कि आप सुनेंगे....कृतार्थ होगा मेरा गायन...धन्य होगी तीजन...।
यथा समय तीजन मंच पर उपस्थित हुई....अपार जनसमुदाय ने हर्शध्वनि के साथ तालियां बजाकर अभिनंदन किया। मंदिर चत्वर दर्शकों-श्रोताओं से भरा हुआ था प्रथम पंक्ति मंे अधिकारी वर्ग प्रमुख श्रोतागण और आयोजन समिति के सदस्य विराजमान थे...।
तीजन का संकेत पाकर संगतकारों ने वादन का श्रीगणेश किया....प्रथम नमस्कार मंदिर स्थित देवाधिदेव महादेव को किया हाथ जोड़कर जनसमुदाय का अभिवादन कर दाहिने हाथ का तंबूरा उठाकर तार को छेड़कर जयजयकार की ‘‘बोल दो श्री बृन्दावन बिहारी लाल की जय...।’’ समवेत स्वर में जय...।’’ समवेत स्वर में जय...ऽऽऽ गूंजने लगा...ऐसा सम्पूर्ण वनस्थली गूंज उठी है मानों पेड़-पौधों, लता-वल्लरियों ने भी अपनी मर्मर ध्वनि से संगत किया हो।
आज तीजन ने किरातार्जुन प्रसंग ही शुरू किया...। श्री कृश्ण के आदेश पर अजुर्न दिव्यास्त्र प्राप्ति हेतु भगवान् पिनाकपाणि की आराधना करने पहुंचे...तपस्या-काल में वे एकाकी थे...जंगली फल-मूल का आहार....ऊँ नमः शिवाय का जप यही दिनचर्या थी...।
सन्-सन्-सनन पूरे वेग से पवन देव पंडवानी सुनने पहुंच ही गये...वर्शा को रास्ता दिखाया सौदामिनी ने...वह भी पहुंच ही गई...। पहले तो कुछ बूँदा-बांदी ही हुई....धीरे धीरे प्रकृति भी अपना संगीत सुनाने लगी...। लोग...इधर उधर सिर छिपाने लगे...जो तैयारी से आये थे उन्होंने छाता खोल लिया...तीजन संगतकारों के साथ मंदिर के चबूतरे में चली गई...मनहरण ने कहा...’’अम्मा ! पानी का वेग देखकर नहीं लगता कि लोग रूकेंगे...हम अपना कार्यक्रम कैसे पूरा करेंगे...।’’
तीजन बाई हंसकर बोली ‘‘अतेक दिन ले मनसे मन ल पण्डवानी सुनावत आवत हन....आज भर पेड़-पौधा मन ल सुना देबो....नई बनही बेटा...।’’
(इतने दिन तक जनसमुदाय को पण्डवानी सुनाते आये हैं, आज पेड़-पौधों को सुना देंगे...क्यों....ठीक है न...?)
तीजन बाई ने मन में कहा जनसमुदाय तो बहाना है, कार्यक्रम माध्यम मात्र है आज तो भगवान् भूतनाथ को पण्डवानी सुनाऊंगी....उन्हीं के मंदिर में....जीवन में बार बार तो ऐसा स्वर्ण अवसर मिलता है नहीं जाने फिर यह पुण्यकाल आये न आये इसलिये प्रलय के बादल भी बरसे...तो भी गाऊंगी...यही तो पूजा है...सुरों से की गई उपासना...फिर भावलीन हो गई...।
वर्शा थमी...तो कार्यक्रम फिर शुरू हुआ....आश्चर्य यह कि श्रोतागण पुनः अपनी जगहों पर...। पन्द्रह बीस मिनट ही...बीते होंगे...कि दुगुने वेग बताया...तबला-उतर गया...गीला हो गया...ढोलक फूट गया (चढ़ा हुआ तबला, ढोलक बादलों के गरज से कभी-कभी फूट जाते हैं।) तीजन बाई के तंबूरे की घोड़ी छिटकर जाने किधर गुम हो गई...हारमोनियम की धमनी पानी के छीटों से फूल गई...स्वर निकलना ही गड़बड़ा गया...।...बेंजो...में करेंट आ गया...जिस अस्थाई प्लग से उसके तार जुड़े वहां की खराबी के कारण...साजिदे...करें तो क्या करें...रागी ने तीजन को रूकने का संकेत किया...पर वह तो बेसुध हो गई थी...हारकर साfजंदे...मंदिर के चबूतरे में आ गये...।
नहीं रूका मनहरण का मंजीरा...तीजन की बेसुधी का असर उस पर कुछ न कुछ मात्रा में हावी हो गया था। लगभग चालीस मिनट तक तीजन गाती रहीं...भावानुरूप अभिनय करती रही...एकाभिनय में दक्ष तीजन...कभी अर्जुन के संवाद बोलती तो दूसरे ही क्षण संयत स्वरों में...सधे पदक्षेप के साथ स्थान परिवर्तन कर नकली क्रोध से भरे महादेव की गर्जन-तर्जन सुनाती...। कथा-प्रसंग का समापन हुआ...महादेव ने किरात-वेश त्याग दिया तो अर्जुन संभ्रम में पड़ गये....पहचानते ही चरणों में गिर गये....प्रसन्न वदन महादेव ने अमोघ पाशुपत् अस्त्र देकर अर्जुन को विजय का आशीर्वाद दिया...गाण्डीवधारी अर्जुन को अपराजेय धनुर्धर होने का भी आशीर्वाद दिया...। सूत्रधार कृश्ण पेड़ की आड़ में छुपे सब देख रहे थे...मुस्कारा दिये...अंततोगत्वा अर्जुन के साथ वे भी तो सफल मनोरथ हुये...मौन प्रणाम निवेदन किया...प्रलयंकर शंकर को। गद्गद् तीजन बाई ने तंबूरे सहित हाथो को माथे से छुआकर प्रणाम किया...भावावेश में तो थी ही ‘‘बोल दो बृन्दावन बिहारी लाल की जय...।’’
तीजन के नाभिकुण्ड से निकला जयनाद उसकी दे हके स्नायुमण्डल में झंकृत होने लगा...शिरा-उपशिरा में आनंद की धारा प्रवाहित होने लगी...। हृदय का स्पंदन....लाल दे रहा था...प्राणों में रागिनी बज उठी...नाद-ब्रह्य की संगिनी...। ...तीजन सुर गंगा में निमग्न हो गई...कहना कठिन है। ब्रह्यानंद...परमानंद...इसे ही कहते हैं....। हां....परमानंद...माधवम्...रसोवैसः....। जाने कितने आप्त वाक्य है...पर वर्णन तब भी अधूरा है कारण...।
‘‘गिरा अनयन, नयन, बिनु वाणी...।’’ फिर व्याख्या कैसे की जा सकती है। क्रमशः प्रकृतिस्थ हुई तीजन बाई तो देखी...इस धारासार वर्शा में भी दर्शक-श्रोता पूर्ववत् उपस्थित हैं....।
साथी कलाकारों के द्वारा सारा विवरण सुनकर तीजन ने वाद्ययन्त्रों की हालत देखी...अविश्सनीय...अद्भुत थे वो बीते हुए....पल...छिन...। लोगों को बताया उसने कि पंडवानी-प्रस्तुत करते हुए उसे सारे वाद्ययंत्र पूर्ववत् सुनाई देते रहे थे...कहीं कोई स्वरभंग नहीं था...तबले का झपताल हो या ठेका, ढोलक की थाप, हारमोनियम के सातों सुर, सा रे गा मा पा धा नि सा...। बैंजों की झंकार...आरोह-अवरोह सम पर fकंचित यति....कहीं भी तो विसंगति नहीं थी, नहीं था कोई व्यवधान।
मनस्थिर कर सोचने लगी थी तीजन...वाद्य यंत्रों पर संगत कौन लोग कर रहे थे ? प्रबंधक गण...वापस लौटने की जल्दी मचा रहे थे... अतः साजो-सामान समेटकर लौट चले...विदाई मिली...और वापस भिलाई आ गये...।
प्रश्न...मन में, चेतना में गड़ गया था...चुभता था...उत्तर अप्राप्त...। मैंने तीजन बाई से पूछा इससे पहले भी इस तरह की कोई घटना घटी थी क्या?
थोड़ी देर सोचकर तीजनबाई ने बताया कि तिथि-वार तो याद नहीं किन्तु सन् 1984 में रानीखेत होते हुये कर्णप्रयाग कार्यक्रम देने गये थे....। वहां भी इसी तरह आंधी-पानी के बीच कार्यक्रम हुआ था। बीच-बीच में उसे लगता कि तबले की जगह डमरू की आवाज आ रही है, कानों का धोखा-समझ पुनः गायन में डूब जाती थी...कथा प्रसंग संभवतः लाक्षागृह में पाण्डवों को जला मारने की कौरवों की दुरधि संधि थी। वहां वाद्ययंत्रों को ही सबसे ज्यादा क्षति पहुंची थी भिलाई आकर सबको सुधरवाने में ही आयोजन से प्राप्त राशि खर्च हो गई थी.. उस समय उम्र कम थी..सांसारिक चिन्ताओं से मन विशण्ण रहता था इसलिये मतिभ्रम कहकर..टाल गई थी ।
उन्नीस सालों बाद...पुनरावृत्ति हुई...। ध्यान देने की बात यह है कि दोनों ही बार शिवमंदिर चत्वर ही मंच था...। वही आंधी तूफान...झमाझम बारिश...सनसनाती हवा...कड़कती बिजली...। दोनों ही मंदिर लोकश्रुति के अनुसार पाण्डवनिर्मित ही हैं...। तीजन ने कहा ‘‘मोर उम्मर भर ये दूनों कार्यक्रम ल भुलाये नई सकंव...येई हर मोर पंडवानी-साधना के फल आय...शंकर भगवान् के किरपा आय...।’’ (आजीवन इन दोनों कार्यक्रमों को नहीं भूल पाऊंगी, मेरी पंडवानी साधनी का सुफल है यह, और है, और है भगवान शंकर की अपार कृपा)
कला-साधना ईश्वर की उपासना है। विशेशकर प्रार्थना एवं भक्ति के लिये संगीत को सर्वोत्तम साधन के रूप में हजारों सालों से मान्यता प्राप्त है। मंत्र-बल का मूल आधार ‘नाद’ (ध्वनि) ही तो है तभी तो नादब्रम्ह कहा जाता है। भारतीय शास्त्रीय-संगीत में ध्रुपद को प्रार्थना का पुत्र और धर्म का साथी स्वीकार किया गया है। गिरजापति शंकर का स्तवन मालकौंस में कई संगीतज्ञों ने प्रस्तुत किया है। गायन-सिर्फ कंठगत नहीं होता वह तो इंद्रिय का भी है, हृदय का भी क्योंकि इसके द्वारा ही तन्मयता प्राप्त की जाती है। उपयुक्त रसपरिपाक सहृदय को अलौकिक आनंदानुभुति प्रदान करता है...। शब्द विन्यास की बानगी देखिये ‘नर्तकी’....इसे पलट कर पढ़िये...कीर्तन...। नृत्य कला भी ईश वन्दना है...। रस की धारा...जो मन को, प्राण को, बुद्धि को, चेतना को प्रबुद्ध कर परमानंद देती है उसे उलट कर पढिये न शब्द बना ‘राधा’...रसेश्वरी राधा....कृश्ण की, परात्पर ब्रह्य की प्राप्ति है। मेरे मन ने कहा...धन्य हो तीजन...धन्य तुम्हारी पंडवानी साधना...। यह स्वीकारने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि तीजन बाई सच्चे अर्थों में पंडवानी साधिका है....।

(3)

तीजन बाई को सम्मानित किया गया है देश-विदेश में अनेक बार किन्तु उससे यह जानकर अच्छा लगा कि उसके लिये सभी सम्मान एक समान प्रिय हैं, जनसमुदाय का अथाह प्रेम ही तो है...। जन स्वीकृति ही सच्ची प्रशस्ति है।
किन्तु 14 जनवरी 2004 को आजमगढ़ में जो सम्मान मिला वह अविस्मरणीय है, याद करने से अभी भी आखें भर आती हैं। दिसंबर 2003 में ही आजमगढ़ के भारतरक्षा दल द्वारा तीजन बाई से सम्पर्क किया गया था किन्तु व्यस्तता के कारण कोई तारीख तय नहीं हो पा रही थी कि संयोगवश 2004 का दिन आजमगढ़ के लिए निश्चित हुआ।
सबको साथ लेकर तीजन बाई आजमगढ़ पहुंची। यह देखकर अच्छा लगा कि स्वागतार्थियों में महिलाओं की संख्या नितान्त कम नहीं थी। शायर हादी आजमी के द्वारा अपूर्व स्नेह-समादर मिला। बुजुर्ग शायर की आत्मीयता ने नेह-बुभुक्ष को भर दिया। घर की महिलाओं द्वारा बनाई सेवई का स्वाद अभी तक जीभ में मौजूद है...।
यू ंतो नागपुर सेन्ट्रल जेल में कार्यक्रम दे चुकी है तीजन बाई...। वहां महिला और पुरूश वार्ड में कैदियों से मिली भी थी किन्तु आजमगढ़ जेल में कैदियों से मुलाकात अविस्मरणीय है। जेल अधीक्षक (नाम याद नहीं आ रहा है) ने उसका स्वागत करते हुये कैदियों से मिलवाया। तीजन ने उन्हीं के आग्रह पर पंडवानी के अभिमन्यु प्रसंग की प्रस्तुति दी...। तीजन बाई ने बताया कि महात्मा गांधी कहते थे न कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं। आजमगढ़ जेल के कैदियों से मिलने के बाद ही मुझे इस कथन का अभिप्राय समझ में आया...। अपराधी जन्मजात नहीं होते.... परिस्थितिवश, क्षणिक आवेश में असामाजिक व्यवहार, गलत आचरण कर बैठते हैं जिसकी सजा कानून देता है। वे अपने किये पर शर्मिंदा भी होते हैं ऐसे में उनसे प्रेम और सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने से हमें चूकना नहीं चाहिये...। स्वस्थ सामातिक जीवन जीने के लिए हमारी थोड़ी सी समवेदना और मैत्री उन कैदियों को मूलधारा से जोड़ देती है, अंगुलिमाल का दृश्टान्त हमेशा याद रखना चाहिये...। जिला कारागार आजमगढ़ में कैदियों से पाया सम्मान मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण है।
भारत रक्षा दल द्वारा आयोजित सामूहिक भोज तो भुलाने लायक है ही नहीं...14 जनवरी को मकर संक्रांति पर्व भारतीयों के द्वारा मनाया जाता है तो वहां भी पारम्परिक रीति से खिचड़ी बनाकर तिल के लड्डू के साथ वितरित हुआ। परिवेशन करते हुये आत्मिक संतोश मिला, तीजन बाई तृप्त हो गई।
सालों बाद....वहां सिनेमा हाल में बैठकर फिल्म देखी...।
हां...यथासमय पंडवानी गायन भी की...। बड़ी भीड़ थी...पर श्रोता सभ्य सुसंस्कृ थे...शांतिपूर्वक बैठकर कार्यक्रम का आनंद लिये...। यद्यपि ठण्ड बहुत थी...। कार्यक्रम तो सामूहिक था परन्तु परिवेश नितान्त घरेलु था...औपचारिकता...कहीं नहीं दिखी....अपनापन...मिला। ऐसा लगा कि मैं अपने ही परिवार वालों से मिल रहीं हूँ....।
विलम्ब न हो जाये इसलिए शीघ्रतार्पूक पूछी ‘‘तीजन! पंडवानी के प्रचार-प्रसार के लिये तुम्हारे पास कोई योजना है ?’’
तीजन बाई ने कहा ‘‘योजना तो बहुत बड़े बात आय...हं...मोर सकाऊ जतका जौन हावय...सुरू करे हांवव...।’’
(योजना तो बहुत बड़ी बात है, हाँ मुझसे जितना बन सकता है, उतना प्रयास शुरू कर दी है।)
छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग रायपुर द्वारा प्रतिवर्श 15 दिनों के लिये पंडवानी गायन प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जाता है। तीजन बाई ही प्रमुख प्रशिक्षक होती हैं। प्रशिक्षुओं को इस तरह प्रशिक्षण देती हैं कि...प्रशिक्षु कम से कम घंटे भर का कार्यक्रम दे सके।
उन्हीं प्रशिक्षुओं को साfजंदे वाद्ययन्त्रों की जानकारी भी देते हैं, अपनी-अपनी योग्यतानुसार, रूचि के अनुकूल प्रशिक्षु वाद्य यंत्रों का चयन करते हैं। उन्हीं के बीच से रागी का भी चयन किया जाता है इस तरह एक मण्डली तैयार होती है।
इसके अतिरिक्त दिल्ली स्थिति स्पीक मेके संस्था भी भारत एवं विदेशों के छात्र छात्राओं को भारतीय सांस्कृतिक धरोहर लोकगीत, लोकगाथा, लोकनृत्य के साथ शास्त्रीय संगीत के शिक्षण का गुरूतर कार्य भी करती है।
वहां भी पंडवानी-गायन की शिक्षा तीजन बाई ही देती हैं। कुछ छात्र-छात्राये ंतो छात्रवृत्ति पाकर भी संस्था में प्रवेश लेते हैं। वहां शिक्षा दी जाती है किन्तु मण्डली का संयोजन नहीं किया जाता। अर्थात् पंडवानी-गायन की शिक्षा व्यक्तिगत होती है। छात्र अपनी अभिरूचि के अनुसार वेदमती अथवा कापालिक शैली का चयन करते हैं।
इसके अतिरिक्त ‘‘मनमोहन डांस ग्रुप’’ नामक छोटी सी संस्था जामुन में स्थापित की गई है जिसकी वे मानद संरक्षिका हैं। नृत्य निदेशक तीजनबाई के सचिव एवं मंजीरा वादक श्री मनमोहन सार्वा हैं...। वर्तमान में यहां 22 कलाकार हैं जिनमें से आठ लड़कियां हैं।
छत्तीसगढ़ की पांपरिक नृत्य शैलियों जैसे सुवा, करमा, पंथी आदि का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। स्थानीय मंचों में इन प्रशिक्षुओं को कार्यक्रम दिलवाकर उन्हें सार्वजनिक मंच प्रदान करने की प्रारंभिक व्यवस्था भी की जाती है ताकि भावी कलाकार छत्तीसगढ़ी लोककला के धरोहरों को योग्य हाथों में हस्तान्तरिक किया जा सके।
छत्तीसगढ़ शासन की संस्कृति विभाग द्वारा संरक्षित बहुआयामी संस्था की सदस्या है तीजन बाई। कलाकारों के मनोनयन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
मैंने अगला प्रश्न किया ‘‘पंडवानी-गायन में जो स्थापित हो चुके हैं ऐसे छात्रों के विशय में कुछ जानकारी दो ताकि उन्हें भी स्मरण कर सकूं।’’
गर्व से भरकर प्रसन्नतापूर्वक तीजन बाई ने बताया कि संघर्श तो सभी को करना पड़ता है किसी को सफलता जल्दी मिलती है तो किसी को देर से।
असल में प्रशिक्षु के लगन, परिश्रम एवं निश्ठा का भी सफलता में बहुत बड़ा योगदान होता है।
प्रतिभाशाली छात्रों में पहला नाम सीमा घोश का है। सीमा घोश कलकत्ता निवासिनी है। उसने विधिवत प्रशिक्षण लिया अपनी प्रतिभा के बल पर कम समय में ही उसने पंडवानी-गायन में दक्षता प्राप्त कर लिया। अब वो विभन्न मंचों पर प्रस्तुति देती है। एक बार भिलाई में भी कार्यक्रम दे चुकी है। सबसे बड़ी बात कि उसने तीजन बाई की अभिनय दक्षता पर लेखन कार्य भी किया है।
तरूणा साहू रायपूर की है छात्रावस्था से ही वह छुट्टियांे में तीजन बाई से पंडवानी-गायन सीखती रही है। इस विधा की बारीकियों को हृदयंगम करने में उसे विशेश सफलता मिली। आजकल स्वतंत्र रूप से कार्यक्रम देती है।
मंजु रामटेके प्रतिभाशालिनी छात्रा रही है बड़ी लगन से उसने पंडवानी-गायन सीखा....अभिनय दक्षता की अपेक्षा गायन में वह निश्णात है। आजकल जगदलपुर आकाशवाणी से उसका पंडवानी-गायन यदा-कदा प्रसारित होता है।
इंदु ठाकुर भी रायपुर की ही है....शिक्षा से अवकाश मिलने पर पंडवानी-प्रशिक्षण में भाग लेती रही....। यत्र-तत्र कार्यक्रमों में पंडवानी-गायन प्रस्तुत करने लगी है। इसके गले में विशेश मिठास है जो श्रोताओं को मुग्ध करती है वर्तमान प्रशिक्षण सत्र 25 मई 2007 से 25 जून 2007 तक आयोजित है। तीजन बाई के निवास स्थान पर ही 6 प्रशिक्षु छात्रवृत्ति पाकर पंडवानी-गायन सीख रहे हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों से आये हुये छात्र हैं। इन छात्रों को तीजन बाई का कुशल मार्गदर्शन तो मिलता ही है, ममतापूर्ण संरक्षण भी मिलता है जो उनके उज्जवल भविश्य को सुदृढ़ आधार बनता है।

(5)
तीजन बाई अच्छी शिक्षिका भी है प्रत्येक छात्र पर ध्यान देती है तो उच्चारण त्रृटि, अभिनय पटुता, अंग संचालन, गति का प्रशिक्षण देते समय वह स्वयं गतिशील हो जाती है ताकि छात्रों को देखकर, सुनकर सीखने का पर्याप्त अवसर मिलता रहे। प्रशिक्षण अवधि में तीजन बाई प्रवीण प्रशिक्षक और सतर्क अभिभावक दोनों भूमिकाओं का निर्वहन बड़ी कुशलता से करती है।
तीजन बाई का मानना है कि साथी संगतकारों का सहयोग उसकी सफलता में अहम भूमिका निभाता रहा है। भारत का विशाल आंगन हो अथवा विदेशी प्रेक्षागृह सर्वत्र संगतकारों ने पूरी निश्ठा लगन और परिश्रम से अपने कर्तव्य का पालन किया है। एक दूजे पर किया गया विश्वास विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने में मददगार हुआ है। इसीलिये तीजन बाई उन्हें अपने परिवार के सदस्यों की तरह ही स्नेह और सम्मान देती है, वे लोग भी उसे सम्मान देते हैं, श्रद्धा करते हैं। वह किसी की अम्मा, किसी की बहन, किसी की दीदी बनकर अपनी ममता और संरक्षण प्रदान करती है। आजकल उनके साथ जो लोग विभिन्न वाद्ययंत्रों के साथ संगत करते हैं वे हैं।

परदेशी राम महिपाल - रागी (सहगायक)
सफीन दास मानिकपुरी - हारमोनियम
केवल प्रसाद देशमुख - तबला
नरोत्तम नेताम - ढोलक
तुलाराम ठाकुर - बेन्जो
मनहरण सार्वा - मंजीरा (सचिव)

मनहरण सार्वा जामुल निवासी हैं वे विगत 7 वर्शों से तीजन बाई के गायन-दल में शामिल हैं। मनहरण सार्वा मंजीरा वादक के अतिरिक्त तीजन बाई के सचिव भी हैं।
उसके कार्यक्रमों की तिथि निश्चित करना, अग्रिम राशि का हिसाब-किताब तथा अन्य कार्यों में भी सहयोग देते हैं। तीजन बाई को अम्मा कहते हैं। अपने शिश्ट व्यवहार और निश्छल स्नेह के कारण पुत्रवत् हो गये हें। घरेलू और कारोबारी मामलों में fनःस्वार्थ सलाह-मशविरा देते हैं इसलिये उन्हें तीजन बाई का विश्वास प्राप्त है वे सार्वा का कहा नहीं टालती। ‘‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते...।’’ ॅवता पे ूवतेीपच  ‘‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’’ आदि वाक्य जीवन में कर्म की महत्ता स्थापित कर भाग्य को दरकिनार करते हैं....सामान्य-जनइ न वाक्यों को बार-बार पढ़कर सुनकर भी....भविश्य कथन सुनने को आतुर रहता है। अपना भविश्य जानने कभी ज्योतिशी की शरण में जाता है तो कभी हस्तरेखा विशेशज्ञ का द्वारस्थ होता है।
इसी सहज-स्वाभाविक जिज्ञासा ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया है कि तीजन बाई की जन्मकुडली में किन बलवान ग्रहों की उपस्थिति ने उसे यश प्रतिश्ठा के उत्तुंग शिखर पर आसीन कराया होगा।
संभवतः तीजन बाई की जन्म कुंडली में ललित कलाओं का अधिश्ठाता ग्रह शुक्र मीन राशि का होगा तभी उसे पंडवानी-गायन में रूचि हुई अच्छे स्थान पर स्थित होगा या पूर्ण डाल रहा होगा तभी प्रतिश्ठा मिली है। ज्योर्तिविवेक रत्नाकर के अनुसार मेश राशि के रवि और मंगल यदि दशम स्थान में युग्म रूप से उपस्थित हो तो उचित दशा और दिशा मिलने पर जातक वक्त की रेत पर कदमों के निशान छोड़ने में समर्थ होता है।
कर्क राशि का गुरू यदि पंचम या नवम स्थान में बैठा हो अथवा इन स्थानों पर उसकी पूर्ण दृश्टि हो तो धर्म चर्चा जातक की भाग्यवृद्धि में सहायक होता है। पंडवानी....तो कृश्ण कथा ही है....अधर्म पर धर्म की विजय गाथा है जिसने तीजन बाई के भाग्य को स्पृहणीय बनाया होगा।
यह मेरा अनुमान है क्योंकि उसकी जन्म कुंडली मुझे प्राप्त नहीं हो सकी है। जो मेरी आंखिन देखी है वह है कि तीजन बाई की हथेली में बृहस्पति और सूर्य दोनों पर्वत उठे हुये हैं जो उसकी प्रतिश्ठा को अध्यात्म से संबंधित दर्शाते हैं। ललित कलाओं का क्षेत्र है शुक्र क्षेत्र तो वह भी पर्याप्त विकसित है। गायन-वादन के साथ अभिनय-दक्षता दर्शाता है।
सर्वाधिक आकर्शक है-मणिबंध से निकली उध्वZगामिनी भाग्य रेखा जो अप्रतिहत होकर गन्तव्य तक पहुंचती है। भाग्य लक्ष्मी की कृपा का प्रतीक...।
हस्तरेखा विज्ञान के जानकार कहते हैं ऐसे करतल का स्वामी अति सामान्य होकर भी जीवन में अतिविशिश्ट पद को प्राप्त करता है....अतिसामान्य बालिका तीजन को अतिविशिश्ट लोक कलाकार के रूप में प्रतिश्ठा मिलना भी इस तथ्य की पुश्टि करता है।
नियति का अलिखित अमोघ विधान है ‘‘चरैवेति, चरैवेति चरैवेति निरन्तरम्।’’ सतत प्रवहमान जीवन में कुछ ऐसे लोगों से भी आलाप-परिचय होता है जो हमारे चिन्तन का अभिन्न अंग बन जाते हैं। जिनकी स्मृति, जिनके सामीप्य के क्षण हमारे लिये आजन्म प्रेरणादायक और अमूल्य होते हैं। मनुश्य अपने श्रद्धास्पद को लोकप्रिय बनाना चाहता है, अपनी श्रद्धा को सामाजिक स्वीकृति मिले यह भी आकांक्षा होती है। इस आकंाक्षा की पूर्ति के लिए वह भरसक प्रयत्न करता है। अभिप्रेत सफलता आत्मसंतोश के साथ गौरव भी प्रदान करती है।
मेरे लिये स्वयंसिद्धा, अप्रतिम, लब्धप्रतिश्ठ तीजन बाई के सानिध्य में बिताये पल-छिन आजीवन अनमोल रत्न की तरह मेरी स्मृति-मंजूशा में सुशोभित संरक्षित रहेंगे।
इस अवधि में जिनता मैंने तीजन बाई को जाना, सुना, समझा वह पर्याप्त है यह दावा तो मैं नहीं करती...किन्तु इतना अवश्य कह सकती हूँ कि...विधाता की अपूर्व कृति है तीजन बाई, कला की देवी का अनुपम वरदान....छत्तीसगढ़ की पावन धरा की दुलारी, यशस्विनी धरापुत्री है।
गंधर्वलोक से उतरी कोई किन्नरी है तीजन बाई जो अपने हाव, भाव और हेला से प्रेक्षकों को मोहविश्ट कर देती है। एकाभिनय में उसकी तन्मयता अर्धनारीश्वर की परिकल्पना को प्रेक्षागृह में साकार कर देती है।
कला-साधना चाहे जिस रूप में की जावे लक्ष्य तो एक ही है...वह है परमानंदम् माधवम् की कृपा-कोर की उपलब्धि।
कृति का समापन करते हुये मैं प्रार्थना करती हूँ, शुभाशंसा व्यक्त करती हूँ कि बृन्दावन बिहारी लाल तीजन बाई को स्वस्ति दें...शांति दे....उसकी पंडवानी साधना अप्रतिहत हो....लोकमंगलकारी हो।
यह पुस्तक...यह लेखन...अपूर्वा तीजन बाई का कहा, सुना ही है...उसी की अनुभूतियां हैं, संवेदनायें हैं...।
महर्शि कृश्ण द्वैपायन वेदव्यास ने भी तो महाभारत लेखन का गुरूतर कार्य बहुश्रुत विनायक गणेश को सौंपा था।
अतः...।
‘‘तेरा तुझको सौंपती क्या लागे है मोर...।’

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