बस्ती-बस्ती पवर्त पवर्त गाता जाए बंजारा : रफी

जानी वाकर को स्वर देना हो, तो उनके कंठ से -ऎ दिल है मुश्किल जीना यहाँ' सुन कर लगता है कि मानों जानी वाकर अपना गीत खुद ही गा रहे हैं। 'मान मेरा एहसान' में साक्षात दिलीप कुमार उनकी आवाज में उतर आते हैं। शम्मीकपूर के लिए रफी 'चाहे कोई मुझे जंगली कहे' भी गा लेते थे और देव आनंद के लिए 'मैं जिदगी का साथ निभाता चला गया भी। रफी की यह जो खासियत थी, वह मन्नाडे में तो कुछ हृद तक है मगर मुकेश में नहीं मिलती।
संगीतकार नौशाद के अनुसार रफी की आवाज में गजब की रेंज थी। उन्होंने अपनी म्युजिकल हिट बैजूबावरा में रफी की आवाज का भरपूर इस्तेमाल किया। रफी का प्रवेश हालाँकि फिल्मों में 1944 से हो चुका था पर उनके डंके बजे बैजूबावरा (1952) से। बैजूबावरा से पहले नौशाद 'दीदार' (1951) में भी रफी की रेंज को परख चुके थे। इस फिल्म का गीत 'मेरी कहानी भूलने वाले, तेरा जहाँ आबाद रहे', में रफी के स्वर का आरोह-अवरोह सुनते ही बनता है।
आवाज की इस जादूगरी का ही कमाल है कि रफी ने अपने समकालीन लगभग सभी प्रमुख अभिनेताओं को आवाज दी। अशोक कुमार, दिलीप कुमार, देवआनंद, राजकपूर, राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार यहाँ तक कि गायक अभिनेता किशोर कुमार भी 'शरारत' और 'रागिनी' में रफी की आवाज पर 'शरारत' करते नजर आए। अगर रफी ने पिता राजकपूर के लिए बेटे ऋषि को भी नहीं बख्शा। सहगल के बाद फिल्म स्वर-संसार में जो सूनापन आया था; उसे रफी ने महसूस नहीं होने दिया। आज रफी की नकल उतारने वाले पचासों गायक खडे़ हो गए हैं लेकिन रफी जैसा गाने वाला एक भी नहीं जन्मा। लताजी ने कहा था रफी-'रफी' थे। उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। कोई नया गायक रफी से उन्नीस हो सकता है इक्कीस हो सकता है। मगर रफी जैसा बीस नहीं हो सकता।
मगर फर्ज कीजिए रफी अगर दस-बीस साल बाद वैसा ही कंठ लेकर पैदा होते तो क्या इतनी बुलंदी पर आज पहुँच पाते? दरअसल 1950 से 1970 तक के दो दशक हिन्दी फिल्म संगीत का स्वर्णकाल थे। इस दौरान गायक-गायिकाएँ अगर अच्छे थे, तो उनके लिए श्रेष्ठ बोलों के रचियता हसरत, साहिर, शकील, शैलेन्द्र, राजेंद्र कृष्ण और तनवीर नकवी जैसे गीतकार भी थे और इन्हें संगीत के सुरों में ढ़ालने वाले हुस्नलाल, भगतराम, नौशाद, गुलाम मोहम्मद, सी. रामचंद्र, मदन मोहन, एस. डी. बर्मन, शंकर-जयकिशन, सलिल चौधरी जैसे संगीतकार भी थे। तिपाई के तीन पायों की तरह किसी गीत की सफलता के लिए भी गायक, गीतकार और संगीतकार की श्रेष्ठ तिकड़ी जरूरी है। यही वजह है कि जो लता 1070 के पूर्व गाती थीं आज आवाज अच्छी होने पर भी उन दिनों जैसा सदाबहार गीत क्यों नहीं दे पातीं।
रफी का प्रवेश जिस समय हुआ था, कुंदनलाल सहगल (Kundanlal Sahagal)  उतार पर थे, मुकेश मैदान में थे, मगर वे एक ही लय में गाते थे। मन्नाडे वीर रस के गाने और शास्त्रीय संगीत पर आधारित 'लपक झपक तू गा रे" तो खूब गा लेते थे, मगर श्रृंगार रस का लोच अपने स्वर में उतनी अच्छी तरह नही उतार पाते थे। फिर सभी कलाकारों पर उनकी आवाज फिट नहीं होती थी। तलत महमूद की आवाज मीठी थी मगर उनकी अपनी एक अलग शैली थी।
वह गजल सम्राट हो सकते थे गीतों के बादशाह नहीं। इसीलिए रफी की बहुआयामी आवाज जो उस युग की जरूरत थी, खूब चली। आरंभ में रफी भी मुकेश की तरह सहगल से प्रभावित थे। शुरू के दिनों के उनके पुराने रिकॉर्ड अगर सुनें तो सहगल को सुनने का भ्रम हो सकता है। मगर बाद में उन्होंने अपनी शैली अलग विकसित की। वैस रफी को आगे बढाने का श्रेय कुंदनलाल सहगल को ही है। उन दिनों सहगल का सितारा बुलंदी पर था। रफी बचपन में सहगल के गीत गाया करते थे। एक बार सहगल ने उनका गाना सुना तो बडे प्रभावित हुए और उनका परिचय लाहौर रेडियो से करवा दिया।
कहते हैं बचपन में रफी का गाना सुन कर एक फकीर बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया था कि आगे चलकर यह बालक खूब नाम कमाएगा। इस बात से प्रेरणा पाकर उनके वालिद उन्हें गाने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। फिर बडे़ भाई हामिद ने उन्हें बकायदा किराना घराना के उस्ताद अब्दुल वहीदखान, उस्ताद खोटे गुलाम अली खाँ तथा पं. जीवन लाल मट्टू जैसे नामी संगीतकारों से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दिलाई। शायद यही वजह है कि रफी ने शास्त्रीय संगीत पर आधारित गाने भी बखूबी गाए। मधुबन में राधिका नाचे रे (कोहिनूर Madhuban me radhika nache re - Kohinoor), मन तड़पत हरि दर्शन को आज (बैजूबावरा Man tadafat hari darshan ko aaj) , नाचे मन मोरा मगन घिग ता (मेरी सूरत तेरी आँखें nache man mora dhig ta) दुनिया न भाए मोहे अब तो बुला ले (बसंत बहार Basant bahar) इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
लाहौर रेडियो पर नाम कमाने के बाद रफी संगीतकार श्यामसुंदर के संपर्क में आए। उन्होंने रफी को अपनी पंजाबी फिल्म 'गुलबलोच' (1944) में मौका दिया। रफी के पार्श्व गायन की यही पहली फिल्म है। इसके बाद रफी संगीतकार नौशाद के पिता का सिफारिशी पत्र लेकर नौशाद से मिले। उन दिनों संगीतकार नौशाद का अच्छा नाम था। जब 1946 में शाहजहाँ बन रही थी तो नौशाद ने रफी को सहगल के साथ एक कोरस में मौका दिया। इस गीत का मुखड़ा था 'मेरे सपनों की रानी रही रही रुही'। इसके बाद नौशाद ने 1946 में रफी की आवाज में अनमोल घड़ी का एक गीत रिकॉर्ड कराया 'तेरा खिलौना टूटा बालक तेरा खिलौना टूटा', इस फिल्म में सुरैया, सुरेन्द्र औरं नूरजहाँ तीनों ने अभिनय भी किया था तथा गाया भी था।
यह अपने समय की सफलतम संगीतमय प्रेम कहानी थी। रफी की आवाज वाला गीत फिल्म में नेपथ्य गान की शैली में फिल्माया गया था। शुरू-शुरू में नौशाद रफी की आवाज हीरो के लिए इस्तेमाल करने में कतराते रहे। अनमोल घड़ी से पूर्व रफी जीनत (1945) में नूरजहाँ के साथ एक युगल गीत गा चुके थे। यह गाना उतना लोकप्रिय तो नहीं हुआ पर रफी की प्रतिभा को नूरजहाँ पहचान चुकी थीं। जब 'जुगनू' बनी तो नूरजहाँ ने संगीतकार फिरोज निजामी से कह कर रफी को फिर मौका दिलाया। इस फिल्म का युगल गीत 'यहाँ बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है' खूब लोकप्रिय हुआ। फिर भी नौशाद रफी से हीरो के गाने गवाने का जोखिम उठाने से कतराते रहे। अनोखी अदा के सारे गीत उन्होंने मुकेश से गवाए, इसी तरह "मेला' में भी सिर्फ 'ये जिदगी के मेले' ye jindagi ke mele टाइटल सांग रफी को दिया गया। शेष गीत दिलीप के लिए मुकेश ने ही गाए। इस बीच रफी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल और भगतराम के संपर्क में आए।
उन्होंने अपनी फिल्में प्यार की जीत, बड़ी बहन (Badhi bahan), मीना बाजार (Meena bajar) में रफी की आवाज का भरपूर इस्तेमाल, किया। उस समय के प्रसिद्ध नायक श्याम पर रफी की आवाज भी  फिट बैठी। इसके बाद तो नौशाद को भी 'दिल्लगी' (Dillagi) में हीरो श्याम के लिए रफी की आवाज का ही इस्तेमाल करना पडा। रफी की आवाज में इसके दो गीत 'तेरे कूचे में अरमानों की दुनिया ले के आया हूँ' (Tere kuche me armano ki duniya le ke aaya hun) तथा 'इस दुनिया में ऐ दिल वालों दिल का लगाना खेल नही, (Is duniya me aiy dilwalon dil ka lagana khel nahi) लोकप्रियता से प्रभावित नौशाद ने "चाँदनी रात' (Chandani Rat men) में फिर रफी का इस्तेमाल किया। इस फिल्म में उभरती हुई गायिका लता ने उस समय के प्रसिद्ध जी.एम.दुर्रानी के साथ तथा श्याम कुमार ने अमीर बाई के साथ दो गाना गाया था। मगर रफी-शमशाद का गाया युगल गीत 'कैसे बजाए दिल का सितार' तथा एकल गीत 'दिल हो उन्हें मुबारक जो दिल को ढूँढते हैं' काफी लोकप्रिय रहे।
इसके बाद बनी 'बैजूबावरा' (Baiju Bawara) जिसने रफी को सफलता के शिखर पर बिठा दिया। इस फिल्म में कुल ग्यारह गीत थे जिनमें दो प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ साहब ने और एक डी.वी. पलुस्कर ने गाया था। शेष सब गीत या तो रफी के गाए थे या रफी-लता के युगल स्वरों में थे। जब फिल्म रिलीज हुई, तो निर्देशक विजय भट्ट को रफी की योग्यता पर उतना भरोसा नहीं था। इसलिए फिल्म के पोस्टरों में अमीर खाँ साहब और पलुस्कर के नाम प्रचारित किए गए। लेकिन दर्शक तो गली-गली 'तू गंगा की मौज' (Tu ganga ki mauj) और 'ओ दुनिया के रखवाले' (oh duniya ke rakhwale) ही गुनगुना रहे थे।
रफी ने फिल्मी गीतों के अलावा गैर फिल्मी गीत, गजलें, कव्वाली और नातें भी खूब गाई हैं। रफी के गाए ये गैर फिल्मी गीत भी उतने ही लोकप्रिय हुए हैं। खासकर मधुकर राजस्थानी (Madhukar Rajisthani) के लिखे और रफी के गाए गीत। रफी की एक खासियत यह भी थी कि सिगरेट या शराब को वे छूते भी नहीं थे। मगर शराब व शबाब के गीत उन्होंने इस खूबी से गाए कि उनकी कोई सानी नहीं मिलती। सावन के महीने में, मुझे ले चलो (शराबी ), हम बेखुदी में तुमको (काला बाजार), कोई सागर दिल को बहलाता नहीं (दिल दिया दर्द लिया Dil diya dard liya) इसके अच्छे उदाहरण हैं। भाव प्रधान गीत भी रफी के गले से ऐसे फूटते थे कि श्रोता सुन कर आँसू बहाए बगैर नहीं रहता। चल उड़ जा रे पंछी (भाभी Chal ud ja re panchi) और बाबुल की दुआएँ लेती जा (Babul ki duvayen leti ja), के अलावा भी ऐसे गीतों की लंबी फेहरिस्त है। अगर कोकिलकंठी लता ने 'ऐ मेरे वतन के लोगों (Aiy mere vatan ke longon)' गाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू को रुला दिया था तो रफी ने 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी' गाकर पंडितजी के नैन सजल किए थे। रफी ने अपने समय की लगभग सभी गायिकाओं के साथ युगल गीत गाए। लेकिन उनके सर्वाधिक और सबसे अच्छे युगल गीत लता के साथ ही मिलते हैं। बीच में लता से उनका मनमुटाव भी हुआ था और कुछ बरस तक लता ने रफी के साथ युगल गीत गाने से इंकार कर दिया था। बाद में यह विवाद सुलझ गया और इस हिट जोडी ने कई श्रेष्ठ गीत सुगम संगीत की इस दुनिया को दिए। रफी के गाए गीतों की सही-सही संख्या तो उपलब्ध नहीं है। मोटे तौर पर उन्होंने अपने 35-36 साल के सरगमी सफर में लगभग 20 हजार गीत गाए हैं। गीतों की संख्या का विवाद हो सकता है मगर उनकी श्रेष्ठता निर्विवाद है। हिन्दी के अलावा रफी ने पंजाबी, मराठी, कोंकणी तथा अँगरेजी भाषा में भी गीत गाये हैं। रफी ही एकमात्र ऐसे गायक हैं जो पृष्ठभूमि में जाने के बाद एक बार फिर उभर कर आए। सत्तर के पूर्वार्द्ध में जब 'आराधना (Aaradhana)' एवं 'कटी पतंग (Kati Patang)' जैसी फिल्में रिलीज हुई, तो किशोर के गाए गीत 'मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू (Meri sapano ki rani kab aayegi tu' और 'कोरा कागज था ये मन मेरा (Kora kagaz tha ye man mera)' आदि खूब लोकप्रिय हुए और रफी पृष्ठभूमि में चले गए। मगर 'हम किसी से कम नहीं (Ham kisi se kam nahi)' तथा 'लैला मजनू (Laila Majnu)' रिलीज होने पर रफी एक बार फिल चल पड़े। यद्यपि वापसी के बाद रफी अपने अवसान 31 जुलाई 1980 तक गाते रहे मगर पहले जैसे श्रेष्ठ गीत नहीं दे पाए।
इसकी वजह यह भी हो सकती है कि नए संगीतकार रफी की प्रतिभा का वैसा इस्तेमाल नही कर सके जैसा नौशाद (Naushad) ने दीदार (Deedar), आन (Aan), दीवाना (Deewana), बैजू बावरा (Baiju Bawara), उडन खटोला (Udan Khatola)या शबाब (Sharab)में किया था या शंकर-जयकिशन (Shankar-Jaikishan) ने सीमा (Seema), चोरी-चोरी (Chori-Chori)या बसंत बहार (Basant Bahar) में किया था। संगीतकार एस. मोहिंदर ने भी रफी की आवाज का 'तेरा काम है जलना परवाने' (पापी १९५३), हजारों रंग बदलेगा जमाना (शीरी फरहाद १९५६) में । अच्छा इस्तेमाल किया। बाबर (Babar), बरसात की रात (Barsat ki rat), नई उसर की नई की फसल, चित्रलेखा (Chitralekha) और ताजमहल (Tazmahal) में रफी की आवाज और रोशन के सुरों का संगम भी भुलाया नहीं जा सकता। 1959 में एक फिल्म बनी थी 'दो गुंडे' संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने इस फिल्म में रफी से एक बहुत ही अच्छा गीत गवाया था 'अबं वो करम कर के सितम मैं नशे में हूँ।'
1950 से 70 के दो दशक रफी के जीवन का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। इस दौरान उन्होंने एक से एक अच्छे गीत दिए और बदले में उन्हें पुरस्कार व शोहरत भी खूब मिले। छ: बार फिल्म फेअर अवार्ड मिले। 1967 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। इसी दौरान उन्होंने 25 से अधिक बार विदेश यात्राएँ की और विदेशों में कार्यक्रम देकर वहाँ भी अपने झंडे गाडे़।

रफी के 10 श्रेष्ठ गीत
ओ दुनिया के रखवाले (बैजूबावरा/1952/नौशाद)
Oh duniya ke rakhwale
कहाँ जा रहा है तू ए जाने वाले (सीमा/1955/शंकर-ज़यकिशन)
Kahan ja raha hai tu jane wale
मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी (चंद्रकांता/1956/एन.दत्ता)
Maine chand aur sitaron ki tamnna ki thi
ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया (प्यासा/1957/सचिन दा)
Ye mahalo ye takhton ye tajon ki duniya
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा (आखरी दांव/1958/मदन मोहन)
Tujhe kya sunaun mai dilruba
टूटे हुए ख्वाबों ने (मधुमती/1958/सलिल चौधरी)
Tute huye khabon ne
खोया-खोया चाँद (काला बाजार/1961/सचिन दा)
Khoya khoya chand
मधुबन में राधिका नाचे रे (कोहिनूर/1960/ नौशाद)
Madhuban me radhika nache re
जिन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात (बरसात की रात/1960/रोशन)
Jindagi bhar nahin bhulegi vo barsat ki rat
लगता नहीं है दिल मेरा (लाल किला/1960/एस.एन. त्रिपाठी)
Lagata nahin hai dil mera

-सुरेश ताम्रकार 
(सरगम के रंग, नई दुनिया प्रकाशन)

रफी के छत्तीसगढ़ी गीत रफ़ी का कौन सा गीत पहला ? समय से आगे : हृदयनाथ बस्ती-बस्ती पवर्त पवर्त गाता जाए बंजारा : रफी तेरी गठरी में लागा चोर जैसे लोकप्रिय गीतों के गायक के.सी. डे जहॉं नहीं चैना, वहाँ नहीं रहना : किशोर कुमार

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