बिलासपुर वैभव: परिशिष्ट

बिलासपुर के प्रशस्तिकार कवि
बिलासपुर जिले मैं जितने शिलालेख Inscription तथा ताम्र-शासन Copper rule मिले हैं, उनका विवर्रण यथास्थान मिलेगा। यहाँ प्रशस्तिकार कवियों का उल्लेख संक्षेप में किया जाता है।
1. संवत् 1247 में देवांग Dewang नामक कवि ने एक शिलालेख की रचना की थी। यह लेख सम्बा Samba नामक के गाँव में शिवमंदिर Shiv Mandir के लिये लिखा गया था। शिवमंदिर को कवि देवांग ने ही बनवाया था। चेदिराज रत्नदेव Chediraj Ratn Dev के पुत्र तृतीय पृथ्वीदेव Prithi Dev के राजत्वकाल में यह कवि वर्तमान था।
2. कोटगढ Kotgadh से उठाकर अकलतरा Akaltara लाये हुए दो शिलालेखों के कवि हैं, देवपाणि Devpani। लेखों में रतनपुर के कलचुरी Kalchuri राजाओं के वर्णन के साथ-साथ वैश्य- वंशीय वल्लभराज Vallabh Raj का यशोगान है। बल्लभराज ने लहड्डा और गौड देशों में विजय प्राप्त कर रेवन्त का मंदिर Revant Tample, महिषाश्व गोशाला तथा बल्लभसागर Vallab Sagar नामक सरोवर बनवाया था। ये लेख सं. 1168 (कलचुरी सं. 893) के आसपास लिखे गए थे।

संपूर्ण दुर्ग गजेटियर 1921 दुर्ग दर्पण पढ़ें इस लिंक से
3. सहस्लार्जुनवंशी Sahatrarjun कुमारपाल Kumar Pal नामक कवि ने चेदि सं. 917 (विक्रम सं. 1222) में शबरीनारायण Shivrinarayan में महानदी के तट पर चंद्र चूडेश्वर महादेव Chandra Cgudeshwar Mahadev का एक मंदिर बनवाया और उस मंदिर के खर्च आदि के लिए चिंचोली ग्राम Chincholi Village को दे दिया। लेख में रतनपुर के राजाओं की वंशावली दी गई है और पृथ्वीदेव के भाई सर्वदेव Sarv Dev तथा उनके पुत्र राजदेव Raj Dev पौत्र गोपालदेव Gopal Dev , प्रपौत्र अमानदेव Aman Dev के पुण्य कार्यों का उल्लेख किया गया है।
कवि कुमारपाल राजवंशीय ज्ञात होते हैं और उन पर लक्ष्मी की भी पूर्ण कृपा का होना प्रकट होता है, क्योंकि उन्होंने मंदिर बनवाया था और उस पर गाँव भी लगा दिए थे।
4. रतनपुर के बादल महल Badal Mahal वाले शिलालेख के कवि त्रिभुवनपाल Tribhuvan Pal संस्कृत के एक अच्छे विद्वान् ज्ञात होते हैं। उनकी प्रशस्ति की भाषा बडी उच्च कोटि की तथा आलंकारिक है। कवि के ही शब्दों में उसकी प्रशंसा यों हैं-
घनरस भयीं गभीरां शुभ्रतरां विचार रमणीयाम्।
सरसीमिव प्रशस्तिं त्रिभुवनपालो व्यघात् विभुध: ॥
तलहारिमण्डल के नरेशों का इस प्रशस्ति में वर्णन किया गया है। तलहारिमण्डल परम रम्य प्रदेश था। यथा-
उत्फुल्लाम्बुज सौरभाति जंब्लिरेफावलि।
राम्रादे: पवनोल्लसत्कदलिका रोविद्यु
उद्यानै: कलकण्ठ कजूत भर व्याक्षब्ध पुष्पायुधै: ।
अस्ति श्रीतलहारि मण्डलमिदं विश्वम्भराभूषणम्॥
इस प्रशस्ति में 45 श्लोक हैं। अंतिम श्लोक यो हैं-
यावन्मण्डल मम्बरे मरगणे चण्डीश चूडामणि: ।
चन्द्रसान्द्र कला कलाप रुचिरे यावन मृडानीपति: ॥
गङ्गसूर्य सुतादि पद्गसदन: कौमोदकी लक्षण।
स्तावत्कीर्तिरियंचकास्तु विशदा विश्वम्भरामण्डले ॥
इसका रचना-काल चेदि संवत् 915 (विक्रम संवत् 1020) है।
5. अलखदास Alakh Das  का एक छोटा सा लेख विक्रम सं. 1552 का, रतनपुर के महामाया के मंदिर Mahamaya Mandir में है।

संपूर्ण दुर्ग गजेटियर 1921 दुर्ग दर्पण पढ़ें इस लिंक से
6. बाहरेन्द्र (वहरसाय) Vahrendra राजा की प्रशंसा में जो लेख महामाया मंदिर में है, उसके कवि का नाम दिया नहीं गया है। प्रथम श्लोक यों हैं-
श्रीमद्रत्नपुरं पुरन्दरपुरं देवं नरं दुर्लभं।
तत्रास्ति क्षितिपालनैक नृपति श्रीवाहरेन्द्रस्वयम्॥
गतैश्चैवब गजेन्द्र षष्टि गुणितं मेकं सहस्रं हयान्।
संग्रामे रिपुमर्दनेव विषमं वन्हेश्च तेजाधिकम्॥1॥

कवि रेवाराम Kavi Revaram का उल्लेख अन्यत्र मिलेगा।
नोट - पुस्तक छापना समाप्त होते-होते समाचार मिला है कि अड़भार Adbhar और किरारी Kirari के लेखों को 00000  पं. एच. कृष्ण शास्त्रीजी Pt H. Krishna Shastriji ने पढ लिया है और उनका पूर्ण विवरण शीघ्र ही एपिग्राफिया इंडिया Epigraphia india में वे प्रकाशित करेंगे। इस कड़ी को क्लिक करके विलास वैभव Bilaspur District Gazeteer मुख्‍य पृष्‍ट पर वापस जायें ..

Post a Comment

0 Comments