बिलासपुर वैभव: पाँचवाँ विकास व्यवसाय

व्यवसाय
मूल व्यवसाय
इस जिले में कितनी जनसंख्या किन-किन उपायों से गुजर-बसर करती है, इसकी सूची नीचे दी जाती है-

कोसा टसर Kosa tussar
यों तो कोसा टसर के कपड़े कई अन्य जिलों में भी बनते हैं, पर इस जिले का कोसा अधिक प्रसिद्ध है। बिलासपुर, खोखरा, चांपा, छुरी, अकलतरा, बलौदा आदि स्थानों में ये कपड़े अधिकता के साथ बनाये जाते हैं। जीन, बोरा, मलमल, चेक, धोती, साडी, रूमाल आदि कई प्रकार के कपड़े कोसा से तैयार होते हैं। तज भी इनके अनेक हैं, जैसे डोरिया, चौखाना, लकीरदार, आधा सूत, आधा कोसा आदि। लाल, पीला, बैंगनी, बादामी, काला, आदि तरह-तरह के रंग के ये बनाये जाते हैं। भारत में इसकी माँग बढ रही है। इंग्लैंड तक यह जाने लगा है।

अन्य धंधे
इस जिले के कोष्ट से रुई के कपड़े तैयार करते हैं । ये प्राय: नागपुर या नांदगाँव मिल के सूत खरीदते हैं और उनसे कपड़े बनाते हैं। कोसा किनार की धोतियाँ और साडि़याँ भी तैयार करते हें । चरखे के सूत से कपड़ा बिलकुल नहीं बनाया जाता। इसका थोडा-बहुत प्रचार केवल चंद्रपुर पद्मपुर की ओर है। इससे केवल हाथ से कते हुए सूत के कपड़े पहननेवालों को अधिकतर अन्य प्रांतों पर भरोसा रखना पड्ता है। सोना-चांदी का काम रतनपुर और चांपा में अच्छा बनता है। रतनपुर के फूल-काँस के लोटा-गिलास प्रसिद्ध है पर बनाने वाले केवल एक या दो मनुष्य अब रह गए हैं। काँच की चूडियाँ रतनपुर के तुरकारी मुसलमान बनाते हैं, पर विलायती चूडियों के सामने उन्हें कौन पूछता है ? बिलासपुर शहर में बीडी के बहुत से कारखाने हैं।

दियासलाई का कारखाना
सन् 1902 से श्री अमृतलाल नामक एक गुजराती सज्जन ने कोटा में दियासलाई का एक कारखाना खोल रखा है। पहले तो यहाँ माल अच्छा तैयार नहीं हुआ, पर पीछे इसने अच्छी उन्नति की। अब कारखाने को श्री कुन्दनलाल ने, एकेस्ट्रा असिस्टैंट कमिश्नरी छोड़कर खरीद लिया है और भलीभाँति चला रहे हैं।यह कारखाना अनुमान 1,20,000 की लागत से खोला गया था।

माप-जोख
इस जिले में अनाज मापने के लिए नीचे लिखे अनुसार माप प्रचलित हैं-
1 चौथिया--181 छटांक
1 काठा.-4 चौथिया या 4 सेर 9 छटाँक
1 खण्डी--20 काठा (करीब 21 मन)
1 गाड़ा-20 खंडी
खास बिलासपुर शहर और स्टेशन के ठौरों पर अनाज तौल से बिकता है।
इस जिले करीब 185 बाजार भरते हैं। बिलासपुर, गनियारी, तखतपुर, मुंगेली, सेतगंगा, बम्हनीडीह, अकलतरा, शिवरीनारायण, बलौदा, चंद्रपुर आदि प्रसिद्ध बाजार हैं । जमींदारियों में पेंडरा का बाजार भारी है यहाँ अनाज, लाख, हर्रा और दूसरी जंगली चीजों का बड़ा रोजगार होता है। चांपा, कोटा और रतनपुर में लाख का व्यापार होता है। यों तो जिले में कहने को आठ वार्षिक मेले भरते हैं, पर उनमें से एक भी ऐसा नहीं जो रोजगार की दृष्टि से कुछ बडुप्पन रखता हो। इन सबका आरंभ धार्मिक कारणों से हुआ है । पीथमपुरा का मेला होली के अवसर पर भरता है और पाँच दिनों तक रहता है। यह सबसे बडा मेला है। कुदुरभाल में जो कोरबा जमींदारी में हसदो नदी के तट पर है, माघ पूनो को कबीरपंथियों का मेला भरता है और एक सप्ताह तक रहता है। माध पूनो को रतन-पुर में भी मेला भरता है। यहाँ सतनामी चमार अधिक इकट्ठे होते हैं। तखतपुर के निकट बेलपान नामक एक गाँव है। यहाँ भी माघ पूनो को मेला भरता है। छोटे-छोटे मेले शिव-नारायण, छुरी और खरौद में भरते हैं।

व्यापार
पुराने जमाने में जब रेल न थी, बंजारा या नायक बैलों पर नमक, तम्बाकू, बर्तन, शक्कर, हल्दी आदि वस्तुएँ लादकर यहाँ लाते थे। उस समय अनुमान 10,000 मन कपास सालाना यहां से बाहर जाता था। सन् 1864 से 1868 तक 15,000 मन लाख कीमती 2211 लाख रुपये देसावर भेजी गई थी। कहते हैं 40 वर्ष पहले जब यहाँ रेल न थी, अनाज कोठारों में पड़ा सड़ा करता था, परंतु आज रेल महारानी तथा कच्छी मारवाडियों की कृपा से अनाज खेतों से कटकर घर पर आने नहीं पाता और बिक जाता है। सन् 1891 में जब से कटनी लाइन खुली है, तबसे अनाज का बाहर जाना एकदम बढ गया है।
इन दिनों यहाँ से अनाज, चमडा, हड्डी, सींग, लाख, महुवा, लकड़ी, रतनपुर का पान, तखतपुर की बिही आदि चीजें बाहर जाती हैं और कपडा, शक्कर, मिट्टी का तेल, नमक, सोना-चांदी, लोहा, तमाखू, फल, खिलौने आदि वस्तुएँ बाहर से आती हैं। पेंडरा रोड, कोटा, बिलासपुर, अकलतरा, चांपा आदि स्टेशनों से माल बहुत लदता है। भाटापारा स्टेशन से, जो अब रायपुर जिले में, मुंगेली तहसील का प्राय: बारह आने माल चालान होता है। जिले भर में पक्की सड्कें छाईं हुई हैं, जिनसे स्टेशन पर माल लाने में बहुत सुभीता हो गया है । चांपा-बम्हनीडीह-भटगाँव सड्क, चांपा-कोरबा सड्क, अकलतरा-बलौदा सड्क, भाटापारा-मुंगेली सड्क, बिलासपुर-मुंगेली सड्क, कोटा-लोरमी सड्क बहुत चलती है। हाल में सरकार से यह सूचना मिली है कि शीघ्र ही एक सड्क ऐसी खोली जाएगी जो चांपा से घूमती हुई कोरबा, छुरी, कटघोरा और जटगाँव होते पोंडरा में कटनीवाली सड्क से मिल जाएगी। इस सड्क के खुलने से उत्तरी जमींदारियों का व्यापार खूब चल निकलने की आशा है।

बाजार-भाव
जिले की मुख्य उपज चावल है। उसके बाद गेहूँ का नवंबर है । नीचे जो सूची दी जाती है। उससे मालूम होगा कि अन्न जैसे-जैसे समय बीतता है, कितना मंहगा होता चला जा रहा है-
तादाद सेर रुपये में
वर्ष चावल गेहूँ
सन् 1849-58 151 --. 151॥
सन् 1851-61 106॥। ... 1106॥।
सन् 1862-67 60 ... 60
सन् 1868-71 21 ... 34
सन् 1872-76 37 ... 55
सन् 1877-81 29 ॥ ... 49॥
सन् 1882-86 27 ... 45॥
सन् 1887-90 19 .... 22॥
सन् 1891-95 18॥ ... 18
सन् 1896-1900 13 ॥ ... 12
सन् 1901-05 15 ... 151
सन् 1906-1910 10 0
सन् 1911-1917 12 ... 172
सन् 1918-1922 (वर्तमान) 6 ...
इस महँगाई का कुछ ठिकाना है !
जब से जर्मन युद्ध जारी हुआ, सभी चीजें महँगी हो गयीं । लड़ाई खत्म हो गई, पर चीजों के भाव में बहुत कम फर्क पडा है।

ऋण
इस जिले के साहूकारों ने ब्याज की दर बहुत कडी रखी है । फी रुपया ), - ) से लगाकर और तक मासिक ब्याज लेते हैं। धान का ऋण सवाई, डेवढी और दूनी बाढ़ी पर दिया जाता है । सरकार भी कुछ तकाबी बांटती है। सहकारी बैंक खुल जाने से बहुत कुछ सहायता उससे भी मिलने लगी है। मजूरी का रेट यहाँ ^।रोज तक है। इस कड़ी को क्लिक करके विलास वैभव Bilaspur District Gazeteer मुख्‍य पृष्‍ट पर वापस जायें ..

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