बिलासपुर वैभव: छठा विकास विपत्तियाँ

विपत्तियाँ Calamity
बाढ़
महानदी में, जिसमें कि जिले की प्राय: सब नदियाँ अंत में जाकर मिलती हैं, अचानक बाढ़ आने का विशेष भय रहता है। 88 वर्ष पहले संवत् 1891 के कुंवार मास में इस नदी में बड़ी भयानक बाढ़ आयी थी। इसकी याद अब तक लोग 'बैहापूरा' के नाम से करते हैं। नदी तीन दिन तक चढ़ी रही । मीलों तक गाँव बह गए। धन-जन की बड़ी ही हानि हुई। कलेजे को पिघला डालनेवाला दृश्य था। परिवार के परिवार भाग्य पर भरोसा रख घर के छप्परों पर चढे-बहते दिखाई देते थे। आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि जब 'टैटानिक' जहाज डूबने लगा था, तब उस पर चढे़ हुए मनुष्य राष्ट्रीय और धार्मिक गीतों को गाते हुए प्राण देने को तैयार थे। यही हाल इन बहते हुए मनुष्यों का था। ये भी अपनी थालियाँ बजाते हुए गीत गाते प्राण देने को तैयार थे।
महानदी और पैरी नदी Parry River के संगम पर राजिम त्‍ंरपउ नामक एक स्थान है। वहाँ एक साधु थे। इन्होंने बाढ़ में कोटेश्वर मंदिर Koteshwar Mandir के आंगन में उगे हुए एक पेड़ की चोटी पर तीन दिनों तक चढे़ रहकर अपने प्राण रक्षा की थी। इन साधु महाशय ने इस बाढ़ का वर्णन कविता में रचकर मंदिर के एक खंभे में खुदवा दिया है।
दूसरी बाढ़, परंतु पहली बाढ़ से कम संवत् 1942 या सन् 1885 में आई थी, जिससे शिवनारायण का तहसील ऑफिस बह गया था। इस बाढ़ पर श्री ठाकुर जगन्मोहन सिंह Thakur Jagmohan Singh ने उस समय शिवनारायण में तहसीलदार Tahsildar थे 'प्रलय' नामक एक पुस्तिका कविता में रचकर छपवायी थी। सन् 1882 में अरपा Arapa नदी बहुत के बढ़ी थी, जिससे बिलासपुर शहर का बहुत सा भाग पानी में डूब गया था। सन् 1891-62 में शिवनाथ Shivnath नदी के बढ़ने से बहुत से गाँव बह गए थे। आगर Aagar नदी की सन् 1900 वाली बाढ़ लोगों को अभी तक नहीं भूली हैं।

अकाल Famine
सन् 1868 के पहले इस जिले में कब-कब अकाल पड़ा था, इसका ठीक-ठीक पता नहीं चलता । हाँ, खोज से यह मालूम होता है कि सन् 1828 में उन्हारी-सियारी दोनों फसलें मारी गई थीं, जिससे घोर अकाल पड़ गया था। अनाज का मामूली भाव उस समय फी रुपया 120 से 400 सेर के बीच रहता था, पर उस वर्ष गेहूँ और चना 12 सेर बिके थे। इसी से अनुमान कर लेना चाहिए कि कैसा भयंकर समय था। सन् 1834-1835 में छत्तीसगढ में फिर अकाल पड़ा। रुपये का 24 सेर चावल बिका । हजारों मनुष्य भूख से मर गए।
सन् 1855 में फिर फसल मारी गई। 1856 में प्रांत के उत्तरी भाग में दुष्काल पड़ा, जिससे यहाँ का अनाज वहाँ भेजा गया। नतीजा यह हुआ कि यहाँ भी अनाज का भाव महँगा हो गया। फिर इसके पश्चात् 1868-69, 1877-78, 1886-87-88-89 और 1894 में दुष्काल पड़ा।
अब सन् 1897 (सं. 1953) के अकाल की पारी आयी । अगस्त तक तो खूब वर्षा हुई, पर सितंबर के आरंभ में पानी एकदम बंद हो गया। धान की फसल 30 सैंकड़े से भी कम हुई और उन्हारी चौथाई से थोड़ी ज्यादा। मुंगेली तहसील में अधिक कष्ट रहा। सन् 1897 के जनवरी मास में सरकार ने कई काम खोले । कोटा-लोरमी Kota-Lormi,, भाटापारा-नांदघाट Bhatapara-Nandghat आदि कई सड़कें तैयार होने लगीं । तालाब भी खुदवाये गए । कोष्टों के लिए खास प्रबन्ध किया गया । उन्हें सूत दिया जाता था और कपड़ा तैयार होने पर सरकार उनसे पांच आने सेर में खरीद लेती थी। कई स्थानों पर किचिन-खाने खोले गए । कुल 1,49,000 मनुष्यों को सहायता दी गई। इन कार्यों में कोई 20 लाख रुपये खर्च हुए। 3 लाख मालकाली मुलतवी कर दी गई। 1 लाख से ऊपर तकाबी बाँटी गई।
3 लाख रुपये खैरात फंड से दिए गए। इस वर्ष मृत-संख्या का औसत 101 प्रति मील रहा। कुछ ठिकाना है ! सन् 1897-98 में फसल की हालत अच्छी रही । सन् 1898-99 में भी यही हाल रहा। फिर भी मुंगेली तहसील में कुछ मदद देनी ही पड़ी।
अब संवत् 1956 अर्थात् सन् 1899-1900 का प्रसिद्ध दुर्भिक्ष आया। जून से दिसंबर तक पानी ही नहीं बरसा । सियारी-उन्हारी कोई फसल नहीं हुई। थोड़ी-सी फसल, जो आबपोशी द्वारा जमा ली गई थी, फांफों के द्वारा चर ली गई। भयानक समय आ गया। चहुँ ओर हाहाकार मच गया। वृक्षों में पत्ते तक न रहे । माया-मोह छूट गया। मां बच्चे को मार कर पेट की आग बुझाने की बात सोचने लगी। किसी छत्तीसगढ़ी तुक्कड़ नें इस संबंध में एक गीत रचा था। वह गीत आगे चलकर इतना लोकप्रिय हो गया था कि कई भिखारी अकाल के बाद भी उसे उसे गा-गा कर पेट पालते थे। वह गीत इस प्रकार है-
छप्पन के समैया कछु कही नहीं जाई। टेक
गलिन गलिन में कंगला फिरें हाथ मां धरे तेलाई ॥
जूठामूठा भाता देवे, पेजा ला देहा दाई।
भाजी के मैं पैंया लागों जीबला दिहे बचाई ॥
बडे साहब छोटे साहब सब मिल किचन खोलाई ।
बडे-बडे ला सुख्वा सेर ओ कगला किवन में खाई ॥
हाजिरी के रजिस्टर खोल के सबके नाम लिखाई ॥
सबके मां टिकट बाँधे नंबर दिये चढाई ।।
धन धन हैं सरकार बहादुर धन धन काररवाई।
छप्पन साल के कष्ट निवास्यो जुग जुग चले बढाई ।।
भाग्य से इस समय सर इबटसन Sir Ibutson यहाँ के चीफ कमिश्नर Chief commissioner थे। आप बड़े ही चतुर पुरुष थे। आपने बहुत पहले ही से कई काम जारी करने का प्रबंध कराया, जिससे आगे चलकर कोई कष्ट न पाये। पंडरिया-कोटा सड़क का काम पूरा कराया जाने लगा। निपनिया-लोरमी सड़क नयी खोली गई।
बिलासपुर मुंगेली लाइन की मिट्टी डाली गई। तालाब खुदवाये गए, जिससे 87,000 मनुष्यों का पालन हुआ। कुल 662 तालाब खुदवाये या मरम्मत कराये गए थे। घास-कटाई अलग होती थी और वह लोगों में झोपड़ी बनाने को या ढोर खिलाने को बाँट दी जाती थी। कोष्टों को सहायता देने के लिए खास प्रबंध किया गया। 719 किचन खाने खोले गए, जहाँ 1,44,000 मनुष्य भोजन पाते थे। खैरात बाँटने का भी प्रबंध किया गया था। इस अकाल में सरकार के कुल 48 लाख रुपये खर्च हुए। 2,81,000 मनुष्यों को सहायता मिली। सिवा इसके 3 लाख रुपया खैरात फण्ड से खर्च हुआ। 5 लाख रुपए तकाबी बाँटी गई। मालकाली मुलतवी कर दी गई। चावल का भाव इस समय 11 ॥ सेर और गेहूँ 10 सेर था।
सन् 1900 के दुष्काल के बाद सन् 1902-03, 1905-06, 1907-08, 1911-12, 1918-19 में फिर कुछ कष्ट फैले । जर्मन-युद्ध भी छिडा ही था। सब चीजें महँगी हो गयीं। चावल का भाव एकदम तेज हो गया। कवर्धा, पंडरिया की ओर विशेष कष्ट रहा। अब भी सब चीजें महँगी ही हैं। चावल इस समय 8 सेर और गेहूँ 7 सेर बिकता है । कुछ रोज पहले 4 सेर का चावल और गेहूँ खा चुके हैं, सो अब खुशी मना रहे हैं कि अनाज सस्ता हो गया। बात यह है कि अब अकाल के भाव पर चीजें खरीदने की आदत पड़ गयी है। समय सबकुछ करा रहा है।

हैजा Cholera
सन् 1870 से लगाकर इस समय तक कोई 21 बार हैजा फैला होगा। किसी-किसी वर्ष इसने बडा ही जोर दिखाया। सन् 1896 में इसने 900 मनुष्यों की बलि ली थी। किसी भी जोरदार हैजा के साल में 6000 मनुष्य से कम नहीं मरे। सन् 1919 में 9794 मनुष्यों की प्राण पूजा पाकर यह शांत हुआ। खास बिलासपुर शहर में यह अकसर आषाढ़, सावन या भादों मास में फैलता है।

माता Chicken pox
माता-महारानी यों तो जब चाहें, तब आ जाती हैं, पर इनमें यह बात अच्छी है कि ये हैजा के सदृश प्राण-पूजा नहीं चाहतीं, पर जब बिगड़ती हैं, तब क्रोध का ठिकाना नहीं रहता। सन् 1889 में जब 4000 मनुष्यों का भक्षण कर लिया, तब इन्हें कुछ शांति हुई । सन् 1891 में भी इन्होंने कुछ जोर दिखाया था। सन् 1919 में 1973 मनुष्यों को चरपट कर डाला। जब शीत ऋतु की बिदाई का अवसर आता है, ये प्राय: उसी समय दन से आ टपकती हैं।

प्लेग plague
प्लेग-पण्डित पहली बार सन् 1904 में आये और बिलासपुर, मुंगेली, गौरेला आदि स्थानों के कोई 400 मनुष्यों के कानों में मृत्यु-मंत्र पढकर हँसी-खुशी लौट गए। इसके ठीक 12 (बारह) वर्ष बाद सन् 1916 में फिर आपका आगमन हुआ। पहली बार के अनुसार आप बिलासपुर स्टेशन पर नागपुर-मेल से उतर गए। लोगों को कुछ पता तो था ही नहीं। पीछे जब _ मालूम हुआ, तब म्यूनिसिपालिटी और लोगों ने मिलकर आपके स्वागत का प्रबंध किया और थोडी-बहुत दान-दक्षिणा दे अपनी दीनता दिखायी, पर आप राजी न हुए और मनमाना करने लगे । लोगों ने बहुत से चूहे मारकर आपके लिए फिर डाली भेजी और 'कृष्ण-मुख' करने के लिए विनती की। इस अशिष्ट व्यवहार से आप इतने बिगडे कि दो दिनों के भीतर लोगों को शहर खाली कर देना पडा। बडी भगदड़ मची। शहर से स्टेशन का किराया छह आने बँधा हुआ था, पर टाँगेवालोंने छ: छक्के छत्तीस आने लेना शुरू किया। देते ही बना, पर प्लेग-पण्डित बडे़ गुरु निकले । जो जहाँ जाता, वहीं उसका पीछा करते और चेला इस प्रकार आप बिलासपुर, मुंगेली, रतनपुर तथा कई देहातों में प्लेग-पुराण बाँच 826 मनुष्यों को मृत्यु-मंत्र की दीक्षा दे, विजय का डंका बजाते हुए लौट गए। यों तो इस जिले में मलेरिया का बडा जोर रहता है तिसपर सन् 1918 में युद्ध ज्वर (इनफ्लुएंजा) नामक एक नए ज्वर का आगन हो गया और दोनों एक और एक मिलकर ग्यारह हो गए। सब प्रकार के ज्वरों से मरनेवालों की संख्या सन् 1916 में 25,16 और सन् 1917 में 25018 थी । सन् 1918 में युद्ध ज्वर की सहायता से यह संख्या बढ 58095 हो गई। सन् 1919 में 30528 मनुष्यों की मृत्यु हुई। सन् 1918 का साल बड़ा दु:खमय रहा। युद्ध, महँगाई, अकाल, इनफ्लुएंजा Influenza और हैजा सबने कस कसकर वार किया। इस कड़ी को क्लिक करके विलास वैभव Bilaspur District Gazeteer मुख्‍य पृष्‍ट पर वापस जायें ..

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