बिलासपुर वैभव: दूसरा विकास - इतिहास

प्राचीन कथा Ancient story
प्राचीन कथा के अनुसार रतनपुर छत्तीसगढ़ की चारों युगों की प्राचीन राजधानी है। सतयुग में इसका नाम मणिपुर था। त्रेता में माणिकपुर कहलाया। द्वापर में इसका नाम हीरापुर बदल गया और अब इस कलियुग में यह रत्नपुर नाम से प्रसिद्ध है।
कहा जाता है कि त्रेतायुग में श्रीकृष्ण जी इस नगर में पधारे थे। हमारे पाठकों को महाभारत की वह कथा स्मरण होगी, जिसमें युधिष्ठिर के उस अश्वमेध यज्ञ का वर्णन है, जब अर्जुन अश्व के रक्षक बन इस पृथ्वी-खंड को जीतने निकले थे। उस समय रत्नपुर में मयूरध्वज नामक राजा राज्य करता था। उसके ताम्रध्वज नामक एक पुत्र था। उसने अर्जुन के घोडे को पकड लिया। लड्डाई हुई। श्रीकृष्ण जी ने युद्ध रोक दोनों में मेल करा देने का प्रयत्न किया। उन्होंने अर्जुन से कहा कि जैसा तू मेरा भक्त है, वैसा ही मयूरध्वज भी । अतएव दोनों में मेल हो जाना अच्छा है पर अर्जुन ने इसे स्वीकार नहीं किया। उसने कहा- मुझ सरीखा आपका भक्त वह हो ही नहीं सकता। श्रीकृष्ण ने कहा- इसकी परीक्षा हो जाए। यह कह उन्होंने आप ब्राह्मण का वेश धारण किया और अर्जुन को अपना पुत्र बनाया। दोनों मयूरध्वज के निकट गए। मयूरध्वज ने उनकी पूजा की और इतना कष्ट उठाकर आने का कारण पूछा। श्रीकृष्ण जी ने बडी लंबी चौडी भूमिका बाँधकर अंत में कहा- यह मेरा प्राण प्यारा पुत्र है। इसे एक सिंह खाना चाहता है पर उसने इसे इस शर्त पर रिहाई दी है कि तेरा दाहिना अंग उसके बदले में मिले। अब तू क्या कहता है ? राजा राजी हो गया। उसने कहा- यदि मेरा शरीर पाने से सिंह आपके पुत्र को प्राण-दान देता है तो यह मेरे लिए भाग्य की बात है। इस पर श्रीकृष्ण जी ने मयूरध्वज Mayuradwaj की रानी कुमुददेवी Kumud Devi और उसके पुत्र ताम्रध्वज Tamradwaj को बुलाया और कहा कि राजा का शरीर आधा चीरकर मुझे सिंह को देने के लिए दो । पतिव्रता रानी और कर्त्तव्यशील पुत्र दोनों ने अपना अंग दे राजा के प्राण बचाने चाहे, पर ब्राह्मण देवता राजी न हुए। तब रानी और तामप्रध्वज आरासे राजा का शरीर सिर की ओर ओर से चीने लगे। जब नाक तक सिर चीर डाला गया, तब राजा की बाईं आँख से आँसू गिरने लगे । इस पर श्रीकृष्ण जी ने यह कहकर आधा अंग लेने से इनकार करना चाहा कि राजा दु:खित चित्त से दान दे रहा है। तब रानी कुमुददेवी ने उन्हें समझाया। उसने कहा -देव, बाईं आँख से आँसू इसलिए निकल रहा है कि उसे सोच है कि दाहिना अंग तो परोपकार में लग रहा है पर हाय बायाँ अंग किसी काम न आया। श्रीकृष्ण जी से इस उत्तर से बडे प्रसन्न हुए। उन्होंने तत्काल ही अपना सच्चा स्वरूप प्रकट कर राजा के चीरे हुए भागों को जोड दिया और उसको वरदान दिए तथा अर्जुन के साथ उसकी मिताई करा दी।
इस कथा पर विश्वास करना या न करना पाठकों के अधीन है, पर यह सत्य है कि रतनपुर में इस समय भी एक तालाब 'श्रीकृष्णार्जुनी' (अब कन्हारजनी) Krishnarjuni Talab के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह तालाब श्रीकृष्ण और अर्जुन की यादगारी में खुदाया गया था। इसी प्रकार एक तालाब घोड्बांधा नामक और है, जिसके निकट लोग समझते हैं कि ताम्रध्वज ने अर्जुन के यज्ञ के घोडे़ को लाकर बाँधा था।

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यह भी कहते हैं कि ऊपर लिखी घटना के बाद छत्तीसगढ़ में आरे का उपयोग बंद था। चीजम साहब Cheesem Sahab, जिन्होंने इस जिले का सबसे पहले बंदोबस्त Settlement किया था, लिखते हैं कि यह बात बिलकुल सच है। पुराने खंडहर में मैंने अपनी आँखों से देखा है कि जितने मयाल उनमें लगे हुए हैं, सब वसूले के द्वारा चौपहल किये गए हैं। आरे से बिलकुल काम नहीं लिया गया है। आरे का प्रचार मराठी राज्य से फिर आरंभ हुआ है।
लोगों का यह भी विश्वास है कि मोरध्वज के पश्चात जितने हैहयवंशी राजा हुए, उन सबके नाक से लेकर सिर के पिछले भाग तक ठीक वहाँ तक, जहाँ तक मोरध्वज का सिर चीरा गया था, आरा से चीरने के चिह्न थे। यद्यपि का यह अटल विश्वास है कि हैहयवंशी ही छत्तीसगढ़ के प्राचीन राजा थे, पर हाल की जाँच से यह भलीभाँति सिद्ध हो चुका है कि 10वीं सदी के पहले हैहयवंशियों का यहाँ पता तक नहीं था। हमें यहाँ के शासकों का पता चौथी सही से लगता है।

गुप्त-राज्य Gupt State
उस समय यह प्रांत कौशल Kaushal, महाकौशल Mahakaushal या दक्षिण-कौशल Dakshin Kaushal के नाम से प्रसिद्ध था। कौशल अवध प्रांत Awadh State को भी कहते थे। इसलिए यह प्रदेश महाकौशल या दक्षिण-कौशल कहलाया। चौथी सदी के मध्य में यहाँ दो राज्य थे। उत्तरी भाग का राजा महेंद्र King Mahendra था और दक्षिण भाग, जो महाकान्तार Mahakantar के नाम से प्रसिद्ध था, व्याघ्रराज Vyaghra Raj द्वारा शासित होता था। प्रयाग के किले में समुद्र गुप्त Samudra Gupt का एक स्तंभ (पत्थर का खंभा) है। उस पर जो लेख खुदा है, उससे मालूम होता है कि ऊपर लिखे दोनों राजा समुद्र-गुप्त द्वारा कैद कर लिये गए थे और बाद में छोड दिए गए । समुद्र-गुप्त, गुप्तवंश के आदि पुरुष प्रथम चंद्रगुप्त Chandra Gupt का पुत्र था। इसने गद्दी पर बैठते ही भारत-विजय की ठानी। पहले गंगा के आस-पास वाले राजाओं को जीतकर यह छुटिया नागपुर Chota Nagpur होते हुए दक्षिण कौशल में पहुँचा और महेंद्र तथा व्याघ्रराज को हराते हुए आगे बढ गया। वहाँ कांजीवरम Kanjiwaram के दक्षिणीय प्रांतों Southern provinces को जीतकर वह महाराष्ट्र Maharastra तथा खानदेश Khandesh होते हुए अपने घर लौट आया। उसने हरैल प्रदेश को करद-राज्य बनाने का का कोई प्रयत्न नहीं किया पर महाकौशल के राजाओं ने समुद्रगुप्त के समान बलवान महाराजा के अधीन रहने में ही अपना लाभ देखा, इसलिए वे गुप्तवंश के नाश होने के एक सदी बाद तक उसकी अधीनता मानते रहे। रायपुर जिले Raipur District के आरंग Arang नामक स्थान में एक शिलालेख (shilaalekh - Inscription) मिला है। उससे यह बात मालूम होती है कि छठी सदी में भीमसेन महाकौशल का राजा था, पर यह नहीं मालूम होता कि भीमसेन कौन था और इसके वंशवालों ने कब तक कहाँ राज्य किया।

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सिरपुर-वंश Sirpur-Dynasty
सातवीं सदी में यह प्रांत एक बौद्धधर्म माननेवाले क्षत्रिय राजा के हाथों में चला गया, जिसने जिला चांदा में भाण्डक को अपनी राजधानी बनायी। प्रसिद्ध चीनी यात्री हुएनसंग सन् 639 में इस नगर में आया था। उसने अपनी पुस्तक में इस नगर तथा प्रांत का जिक्र किया है।
भाण्डक वंश Bhandak Dynasty की एक शाखा ने रायपुर जिले में महानदी के तट पर सिरपुर नामक स्थान को अपना निवासस्थान बनाया था। संभव है, इस प्रांत के भाण्डक से दूर होने के कारण वहाँ से एक अधिकारी शासन के हेतु यहाँ भेजा गया हो। जो हो, पर यह सच है कि सिरपुर वंश भाण्डक से शीघ्र ही स्वतंत्र हो गया और चार पुश्तों के भीतर ही तमाम महाकौशल का अधिकारी बन बैठा। इस वंश ने अपनी राजधानी सिरपुर की बडी उन्नति की । उसे मंदिर, मठ और धर्मशालाओं से खूब सजाया । बाग-बगीचे भी खूब लगवाए- मतलब यह कि जैसा इसका नाम सिरपुर Sirpur या श्रीपुर Shripur उन्होंने रखा, वैसा उसे बना भी दिया। त्रिवरदेव के समय में यह उन्नति की चोटी पर पहुँच गया, पर इस राजा का कोई पुत्र न था। इससे इसका उत्तराधिकारी इसका भतीजा हुआ। यह महाशिवगुप्त Mahashiv Gupt या बलार्जुन Balarjun के नाम से प्रसिद्ध था। इसके पिता का नाम हर्षगुप्त Harsh Gupt था। इसने बहुत से मंदिर बनवाए। इसकी मां वासटा Vasata मगधराज सूर्य वर्मा Magadh King Surya Varma की कन्या थी। उसने भी लक्ष्मणजी Laxman Mandir का एक मनोहर मंदिर बनवाया जो आज भी अच्छी हालत में है और सिरपुर के प्राचीन गौरव की याद दिला रहा है। दूसरे मंदिरों की दशा अच्छी नहीं है।
जान पडता है, महाशिवगुप्त Mahashiv Gupt सिरपुर-राज्य का आखिरी राजा last emperor of Sirpur था। इसके पुत्र को किसी दूसरे राजा ने भगाकर आप उसकी राजधानी ले ली। महाशिव ने पुत्र ने भागकर विनिता पुत्र (विनीतपुर) की शरण ली, जो सोनपुर रियासत में है।

शरभपुर-वंश Sharabhpuriya-Dynasty
सिरपुर के अंतिम राजा को भगाकर जिस राजा ने वहाँ राज्य करना आरंभ किया, उसका ज्यादा हाल नहीं मिलता। उस वंश के केवल दो राजाओं के नाम मिले हैं। एक महासुदेव और दूसरा महाजय Mahasuveo & Mahajai। इन्होंने प्रांत के जुदा-जुदे भागों के भीतर जिन गाँवों का दान किया है, उससे यह मालूम होता है कि इनके राज्य का विस्तार उत्तर-दक्षिण, बिलासपुर से खरियार तक और पूर्व-पश्चिम रायपुर से सारंगढ तक था। इनकी राजधानी शरभपुर Sharabhpur को अभी तक नहीं चला है । शायद इन्होंने सरपुर को की शरभपुर का नाम देकर अपनी राजधानी बना ली हो। ऊपर लिखे दोनों वंशों से संबंध रखने वाले जो शिलालेख मिले हैं, उनकी लिपि से यह जाना जाता है कि वे वंश आठवीं और नवीं सदी में मौजूद थे। इसके बाद हैहयवंशियों Haihai Dynasty का शासन आरंभ हुआ।


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हैहयवंशी Haihai Dynasty
हैहयवंशी कार्तवीर्यार्जुन अर्थात् सहस्राबाहु को अपना आदि पुरुष मानते हैं। ये लोग कलचुरियों Kalchuri के नाम से भी प्रसिद्ध थे। ये पहले चेदि-देश का राज्य करते थे। चेदि राज्य का विस्तार पहले चंबल नदी से लगाकर करबी (चित्रकूट के नैर्तरत्य) तक था, पर धीरे-धीरे यह 10वीं सदी के आरंभ में अमर कण्टक से लगाकर हसदो नदी तक बढ गया । रतनपुर में सन् 1114 ई. का एक शिलालेख मिला है। उससे जान पडता है कि सन् 875 में चेदि देश का राजा कल्लोल King Kallol था। उसके 18 पुत्र थे। बडा पुत्र चेदि राज्य की राजधानी त्रिपुरी Tripuri का उत्तराधिकारी हुआ और शेष पुत्र उसकी अधीनता में माण्डलिक बना दिए गए और उन्हें एक-एक मण्डल शासन करने के लिए दे दिया गया। इन मण्डलों में कोमों, तुमान और कोसगईं, ये अत्यंत दक्षिणी मण्डल थे। तुमान कलिंगराज नामक मण्डलेश्वर द्वारा प्रापत किया गया था। अतएव छत्तीसगढ़ प्रांत में पहले आने का यश चेदिवंश के कलिंगराज Kalingraj को ही मिला। कलिंगराज और उसके पुत्र कमलराज ने उन स्थानीय अधिकारियों को, नहीं निकाल, जिन्होंने इस प्रांत को पहले ही बाँट रखा था, बल्कि उनसे अधीनता कबूल कराके स्वाधीनता भोगने दी।
किंतु कमलराज के पुत्र प्रथम रतनदेव को अपने पिता और दादा की नीति पसंद न आईं। उसने अपने राज्य में बडे-बडे तालाब और मंदिर बनवाए। बाग-बगीचे लगवाए और इस प्रकार उससे जितनी हो सकी, उतनी उन्नति की । फिर उसने सन् 1050 के लगभग रतनपुर नगर की नींव डालीं। उसने कोमो मण्डल के अधिकारी की कन्या से ब्याह किया। वह तुमान Tuman का तो मण्डलेश्वर Mandleshwar और रतनपुर का स्वतंत्र राजा बन बैठा। उसने अभी तक त्रिपुरी के राजाओं से अपना संबंध एकदम नहीं तोडा था। रतनदेव के पुत्र प्रथम पृथ्वीदेव (सन् 1090) के विषय में, सिवाय इसके कि उसने तुमान में शिवजी का एक मंदिर और रतनपुर में एक बडा तालाब बनवाया, कुछ अधिक हाल नहीं जाना जाता। रतनपुर के पास घुघसा नामक एक पहाडी है। कहते हैं घुघुस नामक पहाडी जाति का शायद गोंड राजा वहाँ रहा करता था। उसने रतनपुर-राज्य की नींव डालने में बडी बाधा पहुँचाई थी।
पृथ्वीदेव का पुत्र प्रथम जाजलदेव Jajalwdev  बडा पराक्रमी हुआ। इसने कन्नौज और बुंदेलखंड के राजाओं से मित्रता कर ली और केवल दक्षिण कोशल के मण्डलेश्वरों से ही नहीं, बल्कि बैरागढ लांजी, भंडारा, किमेदी आदि दूर के अधिकारियों से वार्षिक कर लेने लगा। इसने अपने त्रिपुरीवाले पुरखों से भी अपना संबंध जारी रखा। तुमान और रतनपुर के बीच पाली नामक गाँव में जो शिवजी का प्रसिद्ध मंदिर और तालाब है, जान पड्ता है, इसी का बनवाया है। जाजल्लदेव का पुत्र द्वितीय रतनदेव हुआ और द्वितीय रतनदेवका पुत्र द्वितीय पृथ्वीदेव। इन्हें एक वीर परिवार ने, जिसने इनकी सेवा तीन पीढी तक की और जिसमें जगपाल विशेष प्रसिद्ध है, राज्य बढाने में बडी सहायता दी । इनके वीरतापूर्ण कार्यों का वर्णन राजिम के सन् 1145 वाले शिलालेख में खुदा है। इन राजाओं का आसरा पाकर कोमों के मण्डलेश्वर ने त्रिपुरी राज्य से विरोध कर लिया और जगपाल ने रतनपुर राज्य का विस्तार दुरुग, सिहावा, कांकेर और कांदा डोंगर (बिन्दा नवागढ के दक्षिण) तक बढाया । सारांश 12वीं सदी में हैहयवंशियों का राज्य-विस्तर खूब बढा था और इनकी सत्ता अमरकण्ट से गोदावरा तक और बरार से उडीसा तक मानी जाती थी।


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राजकीय-विभाग
राज्य-प्रबंध के सुभीत के लिए इस समय 84-84 गाँवों का एक समूह बनाया गया और प्रत्येक समूह पर शासन करने के लिए राजपरिवार का एक- एक मनुष्य मुकर्रर किया गया। जो प्रांत दूर थे, वे पुराने ही अधिकारियों के अधिकार में रखे गए। इस प्रकार 13वीं और 14वीं सदी में शिवनाथ नदी के उत्तर प्रांत में 1 समूह जिन्हें चौरासी कहते थे, बन गए। 18 चौरासी शिवनाथ के दक्षिण-प्रांत में भी बने, पर इनके निर्माण करने वाला रायपुर का राजा ' सिंम्हन था। सिंम्हन, रतनपुर राजवंशी ही था, पर स्वतंत्र हो गया था। खलारी में सन् 1414 में एक शिलालेख मिला है, उससे जान पडता है कि सिंम्हन ने 18 गढ जीते हैं।

रतनपुर के राजे
हां, तो अब रतनपुर की ओर फिर लौटिये। द्वितीय पृथ्वीदेव का पुत्र द्वितीय जाजल्लदेव हुआ, जिसके राज्य करते समय उसके एक नातेदार ने शिवरीनारायण का मंदिर निर्माण कराया था। इस मंदिर में चेदि संवत् 917 अर्थात् सन् 1165 का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। इसी समय (सन् 1167) एक ब्राह्मण ने मल्लार में शिवजी का एक मंदिर बनवाया था। यहाँ जो शिलालेख पाया गया है, उसमें द्वितीय जाजल्लदेव को तुमान का शासक बताया है। इससे यह नतीजा निकलता है कि यद्यपि तुमान में राजधानी न थी, फिर भी उसका मान, छत्तीसगढ़ के राजाओं का आदि स्थान होने के कारण बढा-चढा था। जाजल्लदेव का पुत्र तृतीय रतनदेव हुआ। इसके राज्यकाल (सन् 1181) में खरौद के मंदिर में एक शिलालेख लगाया गया था। इसका पुत्र तृतीय पृथ्वी देव हुआ। इसके समय में किसी देवनाग ने सबा में एक मंदिर (सन् 1190 में ) निर्माण कराया था। इसके बाद रतनपुर का राजा कौन हुआ, इसका पता शिलालेखों द्वारा नहीं चलता । बाबू रेवाराम के लिखे इतिहास केवल एक सूची पाई गई है, जो नीचे दी जाती है। उससे मालूम होगा कि भानुसिंह का नाम सबसे पहले है। भानुसिंह तृतीय पृथ्वीदेव का उत्तराधिकारी था, वह विश्वास तो नहीं होता, पर हाँ तृतीय पृथ्वीदेव और इसके बीच में शायद एक-दो राजा हुए हों।

नाम सन्
भानुसिंह 1200
नरसिंह देव 1221
भूसिंह देव ( भाव सिंह) 1251
प्रतापसिंह देव 1276
जयसिंह देव 1319
धर्मसिंह देव 1347
जगन्नाथ सिंह देव 1369
बीरसिंह देव 1407
कलमलदेव 1426
शंकरसाय 1436
मोहनसाय 1454
दादूसाय 1472
पुरुषोत्तम साय 1497
बहारसाय 1519
कल्याणसाय 1546
लक्ष्मणसाय 1583
शंकरसाय 1591
कुमुद या मुकुन्दसाय 1606
त्रिभुवन साय 1617
जगमोहन साय 1632
अदली साय 1645
रणजीत साय 1659
तख्तसिंह 1685
राजसिंह देव 1689
सर्दारसिंह 1720
रघुनाथसिंह 1732

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(Bhanusinha 1200 Narasimha Dev 1221 Bhusinh Dev (Bhav Singh) 1251 Pratap Singh Dev 1276 Jaisingh Dev 1319 Dharm Singh Dev 1347 Jagannath Singh Dev 1369 Birsingh Dev 1407 Kalmaldev 1426 Shankarasay 1436 Mohanasay 1454 Dadusai 1472 Purushottam Sai 1497 Baharasay 1519 Kalyanasay 1546 Laxmanasay 1583 Shankarasay 1591 Kumud or Mukundasay 1606 Tribhuvan Sai 1617 Jagmohan Sai 1632 Exchange 1645 Ranjit Sai 1659 Takht Singh 1685 Raj Singh Dev 1689 Sardarsingh 1720 Raghunath Singh 1732)
इस सूची के अनुसार प्रत्येक पीढी को 21 वर्ष का औसत पडता है।
बहारसाय (बाहरेन्द्र) के समय के दो शिलालेख मिले हैं। एक तो रतनपुर के महामाया के मंदिर में, दूसरा कोसगईं में। पिछले लेख से इस बात का पता चलता है कि बहारसायपर मुसलमानों ने चढाई की थी, पर उसने उन्हें मार भगाया था। ये मुलसमान कौन थे, मालूम नहीं होता। हाँ, यह अलबत्ता ठीक है कि बहारसाय का पुत्र कल्याणसाय सन् पूर्ण अधिकार और सम्मान पाकर लौट आया था। फिर भी यहाँ यह कहना कठिन है कि कल्याणसाय को मुसलमानों ने दिल्ली दरबार में हाजिर होने के लिए लाचार किया था या " वह स्वयं मुगलों के प्रबल-प्रताप से डरकर वहां चला गया था।

हैहयवंशी राजाओं का राज्य-प्रबंध
जमाबंदी की एक पुस्तक, जो कहा जाता है, कल्याण के समय की थी, बीजम साहब बंदोबस्त आफिसर को दिखलाई गई थी। इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ से संबंध रखने वाली अनेक काम की बातों का वर्णन था। उसमें लिखा था कि रतनपुर-रायपुर दोनों राज्यों में कुल मिलाकर 48 गढ या चौरासी थे, जिनसे 6 । लाख रुपए सालाना आदमी थी। समय को ध्यान में रखते हुए 6 ॥ लाख रुपये की आमदनी मामूली बात नहीं है। हैहय-वंशी राजाओं का राज्य विस्तार बहुत भारी था। उनके करद राज्यों के नाम ये हैं-  1. रामगढ, 2. प्रतापगढ, 3. लांजी, 4. अम्बागढ चौकी, 5. बस्तर, 6. खरियार, 7. फुलझर, 8. सारंगढ, 9. करोंद ( कालाहंडी) 10. संबलपुर, 11. पटना, 12. सिंहभूम, 13. चंद्रपुर, 14. सक्ती 15. रायगढ, 16. कौडिया, 17. सिरगुजा।
कल्याणसाय के पास जो सेना थी, उसका ब्यौरा इस प्रकार है-
खङ्गधारी 2000
कटारधारी 5000
बंदूकधारी 3600
धनुषधारी 2600
घुडसवार 1000
जोड 14200
इनके सिवा 116 हाथी भी थे। इतनी सेना राज्य के भीतरी प्रबंध को ठीक रखने के लिए बहुत काफी थी। आस पास के राजे इतनी सेना नहीं रख सकते थे।

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छत्तीसगढ़
उक्त जमाबंदी की पुस्तक तथा पुराने रिवाजों से यह भलीभाँति सिद्ध होता है कि छत्तीसगढ़ की शासन-पद्धति उत्तम थी। छत्तीसगढ़ खालसे के प्रबंध में और उसके सीमा-स्थित करदराज्यों के प्रबंध में जो फर्क था, उससे साफ मालूम हो जाता है कि खालसे में राजा को सबका शिरमौर बना, समस्त अधिकारों के केंद्रस्थल में उसे रख क्रम से पद ऐसे नीचे उतारे जाते थे कि उसकी समाप्ति प्रत्येक गाँव के में जाकर होती थी। राज्य के मुख्य शासक दीवान कहलाते थे, जो राजा से सीधा संबंध रख सकते थे। प्रत्येक दीवान के चार्ज में एक एक गढ रहता था। ये गढ विशेषकर चौरासी के नाम से प्रसिद्ध थे। कितने ही गढ तो 42 गाँवों को ही लेकर बने थे और बहुतेरे 24 ही।
जमाबंदी की पुस्तक में 48 गढो के नाम लिखे हैं । इस पुस्तक से संबंध रखने के कारण नीचे उन्हीं गढो की सूची दी जाती है, जो शिवनाथ नदी के उत्तरी भाग में रतनपुर राज्य के भीतर थे-
ग्राम संख्या
1. रतनपुर 360
2. मारो 354
3. विजयपुर
         1. विजयपुर 40
         2. लोरमी 84
         3. रामगढ 42
         4. रंजन महाउर 24
         5. मैलवार 12
         6. तखतपुर 124
4. पंडर भट्ठा
        1. नवागढ 42
        2. देवर वीजा 84
        3. पथरिया 24
        4. पंडरभठा 42
        5. मुंगेली 42
        6. पंडरभटा बंतारगढ 42
        7. मलदा 24
        8. देवराहट 84
5. खरौदगढ 145
6. कोटगढ 84
7. मदनपुर
        1. मदनपुर 67
        2. उमरेली 34
        3. नवागढ 52
8. कन्तुलागढ 84
9. कोसगागढ 220
10. उपरोडा गढ 84
11. लाफागढ 200
12. केंदागढ 84
13. मातिनगढ 84
14. सोंठीगढ 84
15. ओखरगढ 32
16. सेमरियागढ 84
17. कंडरी करकटी (2 गढ) 700
18. पेंडरा 84

राज-कर्मचारी
दीवान से नीचे दाऊ का पद था। ये बारहों के ऊपर थे। बारहों का अर्थ है, बारह गाँवों का एक समूह, पर यह जरूरी न था कि प्रत्येक बारहों में 12 गाँव ही रहें । किसी में ज्यादा भी थे, किसी में कम । शासन के सुभीते के लिए जैसे राज्य गढ में बांट दिए जाते थे, वैसे ही गढ बारहों में। मराठों के समय में दाऊपद प्राय: मोहताज ब्राह्मणों को दिए जाने लगे। इसी कारण अंग्रेजी अमलदारी में यह पद बिलकुल तोड दिया गया।
दाऊ से उतरकर का पद था। अर्थात् गाँव का मुखिया-
अधिकारी गाँव के किसान इसके आधीन थे। दीवान, दाऊ और गौटिया, राज्य के इन कर्मचारियों का मुख्य काम था- जमा की ठीक-ठीक वसूली और रवानगी । यानी प्रत्येक अपने अपने गाँव की वसूली कर अपने दाऊ के पास भेजता था और प्रत्येक दाऊ अपने बारहों की जमा इकट्ठी कर दीवान के निकट भेजने के लिए जिम्मेदार था। इसी प्रकार प्रत्येक दीवान अपने गढ की जमा वसूली के लिए राजा के निकट जिम्मेदार था। ये सब इस कार्य के लिए राजा से कमीशन पाते थे। सो ये कर्मचारी केवल जमा-वसूली के लिए थे। उनका उस भूमि पर, कुछ हक न था। जहाँ के ये अधिकारी थे, न ये उस पद पर ही अपना हक जता सकते थे, जो उन्हें जमा-वसूली के लिए दिया गया था, पर हमारे देश की प्रथा ही विचित्र है। अधिक समय हो जाने पर ये भूमि और पद दोनों के पुश्तैनी हकदार हो जाते थे, फिर चाहे वे उनके योग्य हों या न हों। कोरी, करगी आदि स्थानों के वर्तमान अधिकारियों के पुरखे, पुराने जमाने में, उन गाँवों के दाऊ थे, जिनका अब ये मजे से पुश्तैनी जायदाद होने के कारण उपभोग कर रहे हैं। प्राय: राजा अपने नातेदारों को दीवानी दिया करता था। इसी प्रकार दीवान अपने संबंधियों को दाऊ बनाते थे और दाऊ अपने रिश्तेदारों को

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राज-भाषा Official language
हैहयवंशियों के समय में राज-भाषा और लेखन-शैली कैसी थी, इसका पता नीचे लिखे पत्र से चलता है। यह पत्र कार्तिक सुदी 5 सं. 1754 (सन् 1688) को राजा राजसिंह देव के पिता राजा तख्त सिंह ने अपने भाई रायपुर के शासक राजा श्रीमेरसिंह देव को लिखा था-
श्री ।
श्रीजू कइ सही होइ।
श्रीकृष्णकारी कान्ह विजय सखा स्वस्ती श्रीमहाराजाधिराज श्री महाराजा श्री राजा श्रीश्री राजा तखतसिंह देव राजे रतनपुर योग्य स्वस्ती श्रीमहाराज कुमार राजा श्रीमेरसिंह देव भाई प्रति लिखित अस जो तुम्हारे कई राज, कई बटार दीन्हें मध्यस्थ पञ्च राजा श्रीनरसिंह देव आदि कई सो जगह बाट दीन्हें सेवा राजगा दी कई सलाह सरई कि परमपरा कह निवाहि देने जथा योग बिदा गजह
रायपुर ग्रा: 640
राजिम ग्रा: 84
दुरुग ग्रा: 84
पाटन ग्रा: 152
सलारी ग्रा: 84
सिरपुर ग्रा: 84
लवन ग्रा: 252
यह परिगन सात-सात भोग करि कई वर्त वूक करत जाउ।
सही कातिक सु: 5 सं. 1745 सही रामधर देवान कई तथा बाबू रामसाय देवान कइ।
मुंदरी (मुहर)
रायपुर जिले के आरंग नामक कस्बे में अंजोरी लोधी के पास रायपुर- दरबार का एक ताम्रपत्र है, जो संवत् 1798 में लिखा गया था, उसकी भाषा और महाराजा तख्तसिंह देव के पत्र की भाषा बहुत कुछ एकसी है। दोनों में दो-दो दीवान के नाम आये हैं। शायद हैहय राज-दरबार में दो दीवान रखने का नियम रहा हो। ऊपर जो पत्र दिया गया, उसमें छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता।
हैहयवंशियों के समय में विद्वानों का अच्छा आदर होता था। राजा राजसिंह देव के आश्रय में रहकर गोपाल कवि Gopal Kavi  ने खूब तमाशा Khub Tamasha नामक नीति संबंधी बहुत अच्छा ग्रंथ लिखा है।

हैहयवंश का पतन 
सब मुख्य स्थानों पर एक ही वंश के अधिकारी होने से कुछ बातें जरूर अच्छी रहीं, पर नतीजा बुरा हुआ। अधिक समय बीत जाने पर ये अधिकारीगण या इनके वंशवाले अपने को राजकर्मचारी नहीं, बल्कि पूरे हकदार समझने लगे। 17वीं और 18वीं सदी में जैसे-जैसे राजा के अधिकार निर्बल होते गए, वैसे-वैसे उसकी ये शाखाएँ प्रबल होती गयीं और एक दिन बहुतेरे दीवान ही नहीं वरन दाऊ भी एक-दूसरे से स्वतंत्र बन बैठे। अपनी राजधानियों को उन्होंने मजबूत कर लिया, कुछ सेना भी रखने लगे और अपने अधिकारियों को जमा देना बंद कर दिया। राजा कल्याणसिंह के पश्चात यह निर्बलता शुरू हुई थी।
सन् 1685 में राजा तखतसिंह हैहयवंश की गद्दी पर बैठे। इन्होंने तखतपुर में एक भद्दा सा महल बनवाया और साथ ही एक मंदिर का भी निर्माण कराया । वहाँ उन्होंने प्रति शुक्रवार को साप्ताहिक बाजार भी लगवाया, जो अब तक जारी है। उनके पुत्र राजसिंह देव हुए। ये सन् 1681 में रतनपुर की गद्दी पर बैठे। इन्होंने रतनपुर की पूर्वी सीमा पर एक नया महल तैयार कराया और उसके निकट एक तालाब भी खुदवाया। नगर के इस भाग का नामकरण भी इन्हीं के नाम पर हुआ। इनके कोई संतान न थी। इसलिए इन्होंने रायपुर राज-परिवार के मोहनसिंह को गोद लेना निश्चय किया, पर इस कार्य को करने के पहले आप एक दिन घोडे से गिर पडे। बडी सख्त चोट आयी । जीवन का भरोसा न रहा । मोहन सिंह को बुलाने तुरंत दूत भेजा गया। बडे काका सरदारसिंह और रघुनाथसिंह को भी उन्होंने समाचार दिया। मोहनसिंह तो न आ सका, शिकार खेलने चला गया था पर सरदारसिंह और रघुनाथ सिंह आ पहुँचे। राजा ने लाचार होकर काका सरदार सिंह के सिर पर राज पगडी रख दी। मोहनसिंह को जब यह समाचार मालूम हुआ, तब उसने रंज होकर कसम खाई कि मैं स्वर्गवासी राजा की इच्छा अवश्य पूरी करूँगा। उसका यह प्रण, जैसा कि आगे चलकर मालूम होगा, पूरा हुआ भी । सरदार सिंह ने 20 वर्ष तक शांतिपूर्वक राज्य किया। इसके भी पुत्र न था। अतएव इसके मरने पर इसका भाई रघुनाथ सिंह 60 वर्ष की अवस्था में गद्दी पर बैठा।

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इस समय रतनपुर राज्य बहुत निर्बल हो चला था। उसके गढ-दीवान उससे खुल्लम-खुल्ला विरोध करने लगे थे, यहाँ तक कि जिस भूमि पर स्वयं राजा का अधिकर था, उसे भी वे कहीं कहीं दबा बैठे थे। छुरी और पंडरिया के वर्तमान जमींदारों के पुरखों ने ऐसी बहुत सी भूमि दबा ली थी। गोंड, कंवर और बिंझवारों ने हैहय वंश के आरंभ से उनसे भूमि-खंड प्राप्त किये थे, पर परीक्षा के दिन आने पर उन्होंने केवल कोरा जवाब ही नहीं दिया, बल्कि विरोध करने के लिए खड्डे हो गए।

मराठों की चढाई
सन् 1740 के अंत में, जब रघुनाथ सिंह को राज्य करते आठ वर्ष बीत चुके थे, मराठा सेनापति भास्कर पंत Maratha general Bhaskar Pant ने छत्तीसगढ़ पर चढाई की । इस समय रघुनाथ सिंह अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु से बडा दु:खी था और करीब 1 वर्ष से राजकाज की ओर ध्यान देना छोड दिया था। 'दूबर को दो अषाढ' एक तो यों ही निर्बल मन का मनुष्य, उस पर बुढापा, फिर पुत्र शोक । उसने राज्य बचाने की कोई फिक्र न की। भास्कर पंत ने तोप द्वारा किले का एक हिस्सा उडा दिया। फिर भी चुप । आखिर रानी ने बुर्ज पर चढ सफेद झंडा चढा लड़ाई बंद करा दी। किले के फाटक खोल दिए गए। सेना भीतर घुस गई। राजधानी पर शत्रु का कब्जा हो गया। इस प्रकार प्रबल प्रतापशाली हैहयवंशी राज्य का लज्जा पूर्ण और खेदजनक अंत हो गया।
इसमें संदेह नहीं कि रक्षा का चाहे, कैसा ही उत्तम उपाय किया जाता, मराठों से पार पाना कठिन था, पर इतिहास को इस बात से संतोष नहीं । वह पाहता है कि हैहयवंश के सदृश वीर और प्राचीन घराने का वंशज स्वदेश की रक्षा के हेतु समर में या तो विजय प्राप्त करता या हाथ में तलवार लिये हुए प्राण देता और इस तरह अपनी स्वदेशभक्ति और शूरता की छाप भावी संतान के हृदय पर लगा जाता, पर हाय ! रघुनाथसिंह से कुछ नहीं बन पड़ा और प्यारा छत्तीसगढ़ मराठों के अधिकार में आ गया।
यदि इस समय सारे छत्तीसगढ़ का राजा एक होता, यदि इस समय रतनपुर राज्य के गढपति अपनी स्वामी-भक्ति न छोड स्वतंत्र न बन बैठते, यदि हैहयवंशी राजे आरंभ ही से अपने राज्य के टुकडे-टुकड्डे कर अपने भाई- बंधुओं को उसके पूर्ण अधिकारी बना देने की भूल न करते तो मराठों को भी मालूम होता कि छत्तीसगढ़ पर चढाई कर देना कुछ हँसी खेल नहीं था। मराठों ने इस प्रकार बिना विरोध के सारे छत्तीसगढ़ पर अपना अधिकार कर लिया और सब गढ-अधिकारियों से अपनी आधीनता स्वीकार कराके कर लेने लगे । भास्कर पंत ने रतनपुर को कब्जे में ला कटक की ओर कूच किया। कहते हैं रतनपुर नगर पर उसने एक लाख रुपया जुर्माना किया था और खजाने का सारा धन हडप लिया था। चलने के पहले उसने रतनपुर में एक गुंसाई को अपना प्रतिनिधि बना छोड दिया था, जिसे उसके रवाना होते ही रघुनाथ सिंह ने निकाल दिया और आप फिर राजा बन बैठे, परंतु यह राज-सुख वे बहुत दिन न भोग पाये।
राजा राजसिंह देव की इच्छानुसार मोहनसिंह रतनपुर का राजा नहीं हो सका था। इसका मोहनसिंह को बडा दु:ख था। उसने प्रण किया था कि रतनपुर राज्य लेकर ही ये सब बातें हमारे पाठकों को याद होंगी। | अपना प्रण पूरा करने के इरादे से पहले मोहनसिंह ने बलवा मचाने की कोशिश की, पर इसमें वह सफल नहीं हुआ। तब वह नागपुर चला गया और वहाँ के राजा प्रथम रधुजी की सेवा में रहने लगा। धीरे-धीरे रघुजी उसे खूब चाहने लगे । जब रघुजी ने बंगाल पर चढाई की, तब वह भी उनके साथ हो लिया। सन् 1754 में जब वे बंगाल से लौटे, तब उन्होंने रघुनाथसिंह के फिर से राजा होने की बात सुनी। उन्होंने रीवा होकर रतनपुर पर फिर चढाई की और रघुनाथ सिंह को दूसरी बार गद्दी से उतार मोहनसिंह को वहाँ का राजा बनाया। मोहनसिंह ने, जिनकी तुलना कन्नौज के राजा जयचंद से हो सकती है, सन् 1758 तक। इसी समय नागपुर-नरेश रघुजी मर गए और उनके छोटे पुत्र बिंबाजी छत्तीसगढ़ पर अधिकार करने को रवाना हुए। जब यह खबर मोहन सिंह को लगी, तब उसने बिंबाजी का सामना करने के लिए सेना इकट्ठी की पर वह एकाएक बीमार हो गया और रायपुर में मर गया जहाँ उसकी सेना जुडी थी। इस प्रकार बिंबाजी बिना हाथ-पैर डुलाए छत्तीसगढ़ के भाग्य-विधाता बन बैठे । मराठों का सौभाग्य!


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वर्तमान समय में हैहयवंशी
हैहयवंशियों की विजय समाप्त करने के पहले यह लिख देना अच्छा होगा कि इस वंश का एक परिवार रायपुर जिले के बड़गांव में अभी मौजूद है। यह गाँव महासमुन्द तहसील में है। यह परिवार रायपुरवाली शाखा के वंशजों में से है। इनके पुरखों को गुजर-बसर के लिए मराठों से पांच गाँव माफी में  मिले थे, जो अब तक इनके अधिकार में हैं। बलौदाबाजार तहसील में दुरम नामक गाँव है । वहाँ का मालगुजार अपने को रतनपुर वंश का वंशज बतलाता है, पर उसे बड़गांव वालों की तरह कोई पेंशन नहीं मिली है, जिससे उसका दावा संदेहजनक जान पड़ता है। बड़गांव वालों को तो अब भी उन राजाओं की राजधानी में जाने पर भेंट मिलती है, जो किसी समय उनके पुरखों की अधीनता में थे।

बिंबाजी भोंसले Bimbaji Bhonsle
बिंबाजी भोंसले ने रतनपुर राज्य का शासन सन् 1758 से 1787 (मृत्यु) तक किया। ये नागपुर के राजा रघुजी के पुत्र थे Son of king raghuji। यद्यपि ये नागपुर राज्य के अधीन समझे जाते थे, पर ये सब प्रकार-स्वतंत्र। अपने स्वजातियों को ला-ला कर इन्होंने छत्तीसगढ़ को भर दिया। आरंभ में ये बडे कठोर थे, पर जैसे-जैसे 2 लोगों में मिलते गए, नम्र होते गए। इन्होंने रतनपुर नगर के निकट एक पहाडी पर श्रीरामचंद्र जी का एक मंदिर नागपुर के रामटेक के नमूने पर बनवाया, जो अभी तक अच्छी हालत में है। इनकी मृत्यु के पश्चात् नागपुर-नरेश द्वितीय रघुजी का छोटा भाई व्यंकोजी उसका वारिस हुआ, पर उसने छत्तीसगढ़ में रहकर कभी राजकाज नहीं देखा। वह सदा नागपुर में रहा करता था और कभी-कभी यहाँ का दौरा कर लौट जाता था। अंतिम बार सन् 1881 में वह यहाँ से होते हुए बनारस गया और वहाँ जाकर मर गया। व्यंकोजी, जो नागपुर में ही रहकर यहाँ का राज्य एक सूबे के द्वारा चलाता था, यह बिम्बाजी की विधवा स्त्री आनंदी बाई को पसंद न आया। उसने इस प्रबंध का विरोंध किया। अंत में यह तय हुआ कि सूबा, व्यंकोजी का प्रतिनिधि (मुख्तयार) हो राज-काज करे, पर आनंदीबाई की सलाह से । यह बात केवल आनंदीबाई को खुश रखने के लिए की गई थी, सारे अधिकार तो सूबा के ही हाथ में थे और जब अप्पासाहब नागपुर की गद्दी से उतार दिए गए और सन् 1787 से 1818 तक नागपुर राज्य अंतिम रघुजी की नाबालिगी में अंग्रेजी-अधिकार में रहा, तब तो छत्तीसगढ़ के शासन की डोर पूर्णरूप से सूबों के हाथ में आ गई।

सूबा शासन
नीचे उन सूबों के नाम दिए जाते हैं, जिन्होंने अंग्रेजी अधिकार में रतनपुर का शासन किया था-
1. विट्रल दिनकर
2. कारु पंत
3. केशव पंत
4. भीका भाऊ
5. सखाराम बापू
6. यादवराव दिवाकर
ये सूबे जब तक नागपुर राज्य के अधीन रहे, इनके कामों की कैफियत लेनेवाला कोई न था। पर ये सदा इस संदेह में रहा करते थे कि न जाने कब उनकी जगह का चार्ज लेने दूसरा आदमी आ जाए है। इसलिए ये सदा चाहे । जिस तरह हो, धन जोडने की धुन में रहा करते थे। सखाराम बापू (सूबा नं. 5) की जान तो इसी कारण से गई । वह एक मनुष्य को सदा यह भुलावा दिया करता था कि मैं तुझे बडा भारी जमींदारी बना दूँगा। यह लोभ देकर उसने उससे बहुत सा धन ले लिया था। अंत में एक दिन उस मनुष्य को मालूम हो गया कि ये सब सूबा साहब की गोरी गप्पे हैं। उसने क्रोध में आकर बंदूक से उसे मार डाला।

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मराठी सत्ता 
इस प्रकार छत्तीसगढ़ में मराठी राजसत्ता केवल 60 वर्ष (1758-18 18) में नष्ट हो गई। मराठों ने हिसाब-किताब रखने का जरा अच्छा ढंग निकाला, पर जमीन माप कर लगान बाँधने या किसान और मालगुजार Malguzars का आपस का संबंध सुधारने अथवा और किसी राज्य की उन्नति करने में उन्होंने कुछ भी ध्यान नहीं दिया। हैहयवंशी राज्य-शासन पद्धति को ही अपनी जरूरत के मुताबिक यहाँ-वहाँ सुधारकर वे अपना काम निकालते रहे, पर इनके और हैहयवंशी राजाओं के विचारों में बडा अंतर था। हैहयवंशी अपने को प्रजाप्रिय बनाना चाहते थे और इन्हें केवल धन से मतलब था। ये प्राचीन प्रथा का कुछ भी आदर नहीं करते थे, न इनमें वे गुण थे, जो मूक प्रजा के शासकों में स्वभावत: होने चाहिए। जंगली हिस्सों को छोडकर जहाँ का प्रबंध कठिन और जमा वसूली कम थी, बाकी स्थानों के बहुतेरे दीवानों और दाउओं को इन्होंने निकाल बाहर किया। गढ परगनों ने बदल दिए गए और कमायसदारों के जिम्मे लगाये गए थे । बरहों का नाम तालुका रखा गया और पटेल उसके अधिकारी बने । ज्यों के त्यों रहे, पर अधिकारियों . में उलटफेर होने के कारण इन्हें बडा कष्ट उठाना पड्मा। मराठों के समय में शिवनाथ नदी के उत्तर में जितने परगने थे, उनके नाम नीचे लिखे जाते हैं-


ऊपर की सूची से मालूम होता है कि 10 परगने तो हैहयवंशियों के पुराने चौरासी ही थे। जान पडता था कि कुछ थोडा इधर-उधर करके मराठों ने पुराने गढो को ही पगरनों का रूप दे दिया था। सन् 1818 तक तो ये बिना कुछ उलटफेर के ऊपर दी हुई सूची के अनुसार बने रहे, पर बाद में अंग्रेजी सुपरिटेंडेंट की आज्ञा से रतनपुर, खरौद और नवागढ के परगनों में शेष परगने जोड दिए गए और इस प्रकार परगनों की संख्या केवल 3 रह गई।
सन् 1758 से 1858 तक के समय को छत्तीसगढ़ के इतिहास के लिये अंधकार-युग समझिए। इस युग में प्राचीन हिंदू प्रथा का विनाश हो गया और उसके स्थान पर विदेशी रंग-ढंग जारी हुए। प्राचीन राजपूत राजाओं के समय में प्रजा के साथ सहानुभूति व्यवहार रखा जाता था और वे शांति तथा सुख के साथ जीवन बिताते थे, पर मराठी-राज्य में ये सब बातें उल्टी हो गयीं । लोग नाहक सताए जाने लगे और उन पर मनमाना अत्याचार होने लगा। उस समय मराठों की एक भारी सेना छत्तीसगढ़ में रखी गई। भला यहाँ तक भी कुशल था, पर नहीं, उनकी और भारी सेनाएँ प्रजा का अन्न खाते हुए और उन्हीं को लूटती-पाटती छत्तीसगढ़ के बीच से निकल जाती थीं। अब पिंडारियों का नंबर आया। इन्होंने भी लोगों को खूब सताया । श्रीमान् भोंसला सरकार इनकी लूट-खसोटों के समय आँखें मूंद लेती थी, मानो कुछ जानती ही नहीं । इसका कारण भी था। लूट का हिस्सा इन्हें या इनके कर्मचारियों को पिंडारियों Pindaris द्वारा बराबर मिला करता था। लूट में सबसे बड़ा  हिस्सा सूबों का होता था। इनके हाथ में सब प्रकार के अधिकार थे और ये प्रजामत की परवाह न कर उनके गले पर सदा छुरी लिये डटे ही रहते थे तथा अपना घर भरते थे। इनकी कथा कहाँ तक कही जाए ? परिणाम यह हुआ कि प्रजा शाप से ये शीघ्र नष्ट हो गए। प्रजा को असंतुष्ट रखकर भला कौन बचा है ?

अंग्रेजी निगरानी :
नागपुर के अप्पा साहब Appa Sahab के भाग निकलने पर छत्तीसगढ़ का राज्य-प्रबंध अंग्रेजों के हाथ आया। सन् 1818 में इसके प्रथम सुपरिटेंडेंट मि. एडमण्डसू मुकर्रर हुए। इनकी मृत्यु हो जाने पर कर्नल एगन्यू को इनका चार्ज दिया गया। कर्नल एगन्यू Colonel Agnew बडे प्रजाप्रिय थे। इन पर प्रजा बडी ही प्रसन्न थी । ये छत्तीसगढ़ की राजधानी रतनपुर से उठाकर, रायपुर ले गए, जो सब प्रकार सुविधाजनक स्थान था। उसी समय से रतनपुर का गौरव नष्ट हो चला। अब तो वह बडी ही बुरी हालत में है। हाँ, तो उन्होंने छत्तीसगढ़ खालसा को, जो 27 हिस्सों में था, 9 परगनों में बाँटा। मराठों के समय की बकाया जमा १,76,608 निकली। जाँच से मालूम हुआ कि इस रकम का बहुत सा भाग फर्जी है। इसलिए केवल 36,500 वसूल किये गए और बाकी रकम माफ कर दी गई। प्रजा के सुभीते को देखकर किस्तों में, जमा, वसूल करने का प्रबंध किया गया और को आज्ञा दी गई कि जो जमा वे वसूल करें, उसके लिए किसानों को बराबर रसीद दें।

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फिर देशी शासन
छत्तीसगढ़ का शासन सन् 1818 से 1830 तक अंग्रेजी निगरानी में होता रहा। बाद में 1830 से 1858 तक फिर देशी सत्ता रही । जमा वसूली का जो तरीका अंग्रेजों ने चलाया था, जारी रखा गया और अंग्रेज सुपरिटेंडेंट के स्थान पर मराठा-सूबा नियत हुए। इन्होंने भी रायपुर को ही अपनी राजधानी बनाई और प्रत्येक परगनों में कमायसदार (सब-क्लेक्टर) रखकर काम चलाने लगे। अब कठोरता और अत्याचार के दिन जाते रहे। यदि कोई कमायसदार या सूबेदार कुछ भी अन्याय करता और राजा शिकायत होने पर कुछ ध्यान न देते और अगर वह बात नागपुर के रेजीडेण्ट के कानों तक पहुँच जाती तो उसके लिखने से अत्याचारी को उचित फल मिल जाता था। इस समय के विषय में लोग जो चर्चा करते हैं, उससे जान पड्ता है कि प्रजा उस समय \ संतुष्ट और सुखी थी। यद्यपि जुल्मों के भी अनेक उदाहरण मिलेंगे, पर तो भी प्रजा उन्नतशील थी और फिर यों तो इस पूर्ण सभ्यता के जमाने में भी अत्याचारों की कमी नहीं है।

अंग्रेजी राज्य का आरंभ
सन् 1854 में जब नागपुर प्रात अंग्रेजी-राज्य में मिला लिया गया, तब छत्तीसगढ़ के लिए एक अलग डिपुटी कमिश्नर मुकर्रर हुआ और राजधानी रायपुर में रखी गई । कुछ दिनों के पश्चात् एक ऑफिसर के लिए प्रदेश भारी जान पडने लगा। तब सन् 1861 में बिलासपुर जिले की स्थापना हुई। सन् 1857 के बलवे का असर इस प्रदेश पर रंचभर भी न पडा।
तब से फिर इस जिले के निवासी कुछ सुखी मालूम होते हैं। अभी तक ये समय से पिछडे हुए और अशिक्षित हैं। अब नये युग का आरंभ हुआ है, आशा है, इनपर इसका अच्छा असर पडेगा।
सन् 1868 में जिले का पहली बार बंदोबस्त किया गया था। इसमें मालगुजार और किसानों के हक जुदा कर दिए गए हैं। पुराने जमाने में गाँव का मुखिया अपने किसानों का प्रतिनिधि था। उस जमाने की सरकार यदि प्रजा पर कुछ भी ज्यादती करती तो वह उनकी रक्षा करता। गाँव के किसान गाँव के मुखिया के गोत्रज थे, या उससे शादी-ब्याह का संबंध रखते थे और नहीं तो जाति-भाई ही थे और इस तरह गाँव प्रजा सत्ता के राज्य का एक छोटा सा नमूना था। वे घर में चाहे भले ही परस्पर लडते रहे हो पर बाहरी शत्रु से मुकाबला करने के लिए सब एक हो जाते थे। गाँव की पंचायत से जो उनका न्याय होता, उससे वे बडे संतुष्ट रहते । ये सब बातें अंग्रेजी राज्य में धीरे-धीरे कम हो गयीं। अब किसानों पर का मर्यादित दबाव है। किसानों में निडरता के भाव फैल रहे हैं। परस्पर सहानुभूति नहीं है, जिससे झगडे बढ रहे हैं। पंचायत का निर्णय बहुत कम सुना जाता है और तहसील तथा जिले की अदालतें मुकदमों से भरी रहती हैं । हमारे पाठकों को इस जमाने का यह चित्र पसंद न आएगा पर उन्हें धीरज रखना चाहिए। समय पलटा खा रहा हैं। आशा है उन्हें शीघ्र ही ऐसा चित्र देखने को मिलेगा, जिससे उन्हें पूरा संतोष होगा।
अंग्रेजी राज्य के कारण इस जिले की जनता की पोशाक और रहन सहन में बडा फर्क पडा है। आराम के सामान नित्य नये-नये बढ रहे हैं तथा लोगों की भोग-लालसा भी बढ रही है। विद्या की ओर भी रुचि हो रही है। सारांश- अंग्रेजी राज्य का उन पर ऐसा प्रभाव पडा है, जो सहज में मिटने वाला नहीं, परंतु फिर भी, जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है, समय पल खा रहा है। लोग अपनी इस गिरी हुई हालत का कारण समझ चुके हैं और ऊपर उठने को भरसक जोर लगा रहे हैं।

प्राचीन कारीगरी
प्राचीन कारीगरी की दृष्टि से भी बिलासपुर जिले का बडा महत्त्व हैं। मध्यकाल के शिल्प-कौशल के मनोहर नमूने यहाँ मिलते हैं । पाली, जांजगीर और तुमान के मंदिर इसके उदाहरणस्वरूप हैं। खरौद, धनपुर और मल्लार के मंदिर भी अच्छे हैं, पर इनमें वह कारीगरी नहीं, जो शिवरीनारायण और अड्भार के मंदिरों में है। गतौरा, कोसगईं, मनीपुर, महमदपुर, बिसेसरा, कोठारी, पद्मपुर आदि स्थानों के खंडहरों के देखने से जान पडता है कि अनेक सुंदर इमारतें नष्ट हो गई। रतनपुर में भी कुछ सुंदर मंदिर हैं, पर उनमें से कई पिछले युग के बने हैं और उनकी बनावट में मुसलमानी तर्ज की छाप पडी हैं। यहाँ के बहुतेरे मंदिर और महल हैहयवंशी राजाओं के बनवाये हुए हैं। ये राजा शिवजी को माननेवाले थे अतएव यहाँ शिवजी के मंदिर अधिक हैं। विष्णु-मंदिरों में जांजगीर का अधूरा मंदिर प्रसिद्ध है। शिवरीनारायण मंदिर बहुत सुंदर है। मल्लार, धनपुर, रतनपुर तथा और कई स्थानों में जैन-धर्म संबंधी शिल्प-चिह्न पाये जाते हैं। (Gataura, Kosgain, Manipur, Mahmadpur, Bisesra, Kothari, Padmapur, Mallar, Dhanpur, Ratanpur)

किले Fort
इस जिले में ईंट-पत्थर से बने हुए दो किले हैं ।एक लाफागढ Lafagarh में, दूसरा कोसगईं Kosgai में । कोसगईं में किले में पहुँचना कठिन कार्य है । मिट्टी की किलेबंदी रामगढ Ramgarh, कोटमी Kotmi, कोटगढ Kotgarh, मल्लार Malhar, सरहर Sarhar, काशीगढ Kashigarh और कोनारगढ Kornargarh में पायी गई है । बिलासपुर और रतनपुर के किले पत्थर चूना से बने हैं । रतनपुर का किला हाथी-किला कहलाता है, क्योंकि उसका आकार बैठे हुए हाथी के समा हे ! कोरबार में दो छोटी-छोटी खोह चट्टान काटकर बनाई गयी हैं।

शिला लेख Rock Inscription
जिले में अनेक शिला लेख पाए गए हैं, जिनमें से प्राय: सबका संबंध रतनपुर के हैहयवंशी राजाओं से है। खरोद के मंदिर Kharaud Temple में शिलालेख लगे हैं। शिवरीनारायण के मंदिर Shivrinarayan Temple में भी दो लेख हैं। एक लेख पाली-मंदिर Pali Mandir तथा कोसगईं किले Kosgai Fort की दीवार पर है । कोटगढ के लेख का मतलब ही नहीं खुलता । रतनपुर की महामाया के मंदिर Mahamaya Mandir में दो शिलालेख हैं । एक में राजा की बडाई है, दूसरे में मूर्तिकार की। रतनपुर के कन्हारजुनी तालाब Kanharjuni Talab के मंदिर में दो शिलालेख है, पर ये हाल ही के हैं। इनके सिवा, अनेक महत्त्वपूर्ण शिलालेख रायपुर तथा नागपुर के अजायबघर में भेज दिए गए हैं। अभी हाल ही में एक बडा महत्त्वपूर्ण प्राचीन लेख किरारी के तालाब Kirari pond के एक खंभे पर पाया गया है। इसके अक्षर 1500 वर्ष के पुराने जान पडते हैं।यह अभी पढा नहीं जा सका। इसी ढंग के अक्षर अडभार Adbhar के एक पत्थर के खंभे पर भी खुदे हुए हैं। इस कड़ी को क्लिक करके विलास वैभव Bilaspur District Gazeteer मुख्‍य पृष्‍ट पर वापस जायें ..

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