बिलासपुर वैभव: चौथा विकास भूमि

भूमि Land
बिलासपुर जिले में जो भूमि पाई जाती है, उनकी सूची नीचे दी जाती है-

(कन्हार काली मिट्टी, मटासी सफेदी, पीलाहट, डोरसा, पटपर,  कछार, भाटा या कंकरीली)

फसल
मुंगेली तहसील में उन्हारी (रबी) अधिक पैदा होती है और बिलासपुर तथा जांजगीर तहसील में सियारी (खरीफ) कटघोरा तहसील में जंगल की अधिकता है। जिले का कुल क्षेत्रफल 48,67,232 एकड है। इसके 20 सैकडे पर जमींदारियों के जंगल हैं और 7 सैकडे पर सरकारी जंगल । बचे हुए एकडों के 93 सैकडा जोतने-बोने योग्य हैं। जिले की मुख्य फसल धान हैं। यह अनुमान 69 सैकडा बोया जाता है । कोदों 9 सैकडा और ज्वार 7 सकड़ा बोये जाते हैं। मुंगेली तहसील में गेहूँ की फसल 18 सैकड़ा पैदा की जाती है । शेष भूमि में उड़द, तिवरा, बटरा, मसूर, चना आदि की खेती होती है। इन पिछले अन्नों की खेती दो फसली होती है, यानी धान की फसल के बाद ये अन्न बोये जाते हैं।

आबपाशी
आबपाशी के भरोसे बहुत थोड़ी फसल बोई जा सकती है। यदि गाँव में दो-तीन तालाब न हुए तो आबपाशी के लिए तालाब फोड़ना कठिन हो जाता है, क्योंकि ऐसा करने से फिर गरमी के दिनों में पानी के लिए बड़ा कष्ट उठाना पड़ता है । पिछले तीन वर्षों से पानी समय पर नहीं बरसता। आवपाशी के इस कष्ट को देखकर सरकार ने कई नदियों में बाँध बाँधने का विचार किया है और रतनपुर के निकट खारून नदी की बँधाई का काम आरंभ भी कर दिया है । अरपा, मनियारी, आगर और हसदो नदी पर भी बाँध बाँधने का विचार किया गया है।

ढोर-बछरू
सरकार ने किसानों को खेती तथा ढोर का नमूना बताने के लिए बिलासपुर शहर Bilaspur City से आध मील दूर सरकंडा Sarkanda में एक फार्म खोल रखा है। छत्तीसगढ़ में बैल और भैंसा दोनों से हल चलाए जाते हैं। यहाँ के ढोर बहुत दुबले और कमजोर होते हैं, क्योंकि यहाँ चराई का प्रबंध ठीक नहीं है। प्राय: सब गाँवों में चराई के लिए गौचर भूमि छोडी जाती है, पर वह काफी नहीं है। जिन गाँवों के निकट जंगल नहीं है, वहाँ विशेष कष्ट है। गाँवों में जब चहुँ ओर फसल बो दी जाती है, वहाँ विशेष कष्ट है। गाँवों में जब चहुं ओर फसल बो दी जाती है, तब थोडी सी गौचर भूमि पर ही गाँव के समस्त ढोरों का सहारा रहता है। रात को किसान इन्हें थोडा सूखा पैरा (पयाल) खाने को देते हैं, पर यह बहुत पुष्टिकारक नहीं होता।
इस जिले में ढोरों के कई बाजार है। कुछ बाजारों के नाम ये हैं-खाम्ही (मुंगेली तह.) गनियारी Ganiyari ( बिलासपुर तह.) बम्हनीडीह Bamhanidih (जांजगीर तह.) । भैंसे यहाँ सागर जिला, रीवां रायव, गंजाम-मद्रास आदि स्थानों से बिकने आते हैं। आजकल बैल-भैंसों के दाम बहुत बढ गए हैं। 1 जोडी मामूली अच्छे बैल 80 रुपये और भैंसे 100 से कम में नहीं आएँगे।

जंगल
इस जिले के सरकारी जंगल का क्षेत्रफल 545 वर्ग मील है अर्थात् कुल क्षेत्रफल का 7 ये जंगल तीन भागों में बँटे हुए हैं। 1. पूर्वी लोरमी 247 वर्गमील, 2. पश्चिमी लोरमी 199 वर्गमील और 3. कुंवाजती पंतीरा 99 वर्गमील । इनमें कुछ जंगल तो समभूमि पर हैं और कुछ पहाड़ों पर। सम भूमि के जंगल जहाँ पानी कम बरसता है और जहाँ की भूमि कडी है, बहुधा ऊसर हैं। यहाँ घास और जलाऊ लकड़ी के झाड़ पैदा होते हैं। जो जंगल, पहाड़ों की तलहटी या घाटियों में हैं, ऊँचे दरजे के हैं। यहाँ साल, बीजा ,साजा आदि इमारती लकड़ी के झाड़ पाये जाते हैं तथा मोटे लंबे बाँस भी यहीं पैदा होते हैं।
इस जिले के जंगल में साल अर्थात् सरई की लकड़ी बहुत मिलती है। सागौन और बीजा भी हैं, पर अधिक नहीं । सिरिस के झाड़, जिसकी लकड़ी काले रंग की बहुत सुंदर होती है, कहीं-कहीं पाये जाते हैं। साजा को लोग बहुत पसंद नहीं करते । कर्राकी लकड़ी कांड बनाने के काम में अधिक आती है, क्योंकि इसमें घुन नहीं लगता । की लकड़ी से गाडी का अछान अच्छा बनता है। तेदूं और तिलसा की लकड़ी से गाडी की डांडी बढिया बनती है। सेन्हा किसानों के बडे काम की चीज है। इनके सिवा जंगल में बहुत से वृक्ष ऐसे हैं, जो जलाने के काम में आते हैं।

अन्य पैदावार
चीर और बिरईन घास से झाड़ अच्छे बनती हैं। बगई घास को बटकर चारपाई बुनने की रस्सी बनाते हैं। सुक्लाश्चि घास छप्पर छाने के काम में आती है। मुछेली घास ढोरों की खिलाते हैं। मधुरस, मोम, चारकी तीखुर, हर्रा, बहेरा, सांग, लाख आदि ये भी जंगल की पैदावारें हैं। जंगल के प्रबंध के लिए एक महकमा अलग खोल दिया गया है। रतनपुर और लोरमी के जंगलों को छोड़ शेष मालगुजारी जंगल यों ही झाड़-झरूखों से भरे हुए हैं।

जंगली जानवर Wild animals
हाथी उपरोड़ा और मातिन के जंगल में बहुत पाये जाते थे, पर अब ये कभी-कभी दिखाई देते हैं। बाघ, तेंदुआ, भेडिया, रीछ, बराह, लकड़बघा, सोनकुत्ता आदि जानवर यहाँ के जंगलों में बहुत पाये जाते हैं। सियार, खरगोश, चितारा, हिरण, साम्हर, बाहरसिंगा, गौर, चीतल, नीलगाय आदि की संख्या भी यहाँ कम नहीं है। ये पशु खेती को बडी हानि पहुँचाते हैं।
इस जिले में अनेक प्रकार के पक्षी पाये जाते हैं। यहाँ के तालाब और नदियों में कोतरा, पढिना, टेंगना, बाम, सिंघी, रोहू आदि बीसों किस्म की मछलियाँ मिलती हैं और उनके खानेवालों की भी कमी नहीं है। फिर क्या आश्चर्य, यदि यहाँ डॉक्टर हचिंसन के सिद्धांतों के अनुसार कोढियों की संख्या अधिक हो।

खान Mine
बिलासपुर जिले में शान विषयक खोज अधिक नहीं हुई है। कोरबा जमींदारी में कोयले की खानों Coal mines को जारी करने के लिये कई यूरोपियन कम्पनियों ने कई बार विचार किया पर सफलता मि. कन्सीडाइन Considine को मिलते दिखती है, जिन्होंने घुरदेवा Ghurdeva में कुछ कोयला खुदवा कर रखा है और अब वहाँ तक रेलवे लाइन ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। लाफा जमींदारी Lafa Zamindari में भी कोयले की खानों का पता चला है । उत्तरी जमींदारियों के पहाडों तथा पंडरिया जमींदारी में लोहा iron पाया जाता है। मेग्नीज नामक धातु केंद्र और लाफा जमींदारी की सीमा पर पाई गई है । मेग्नीज का पता रतनपुर और पंडरिया में चला है। हसदो और महानदी में कहीं-कहीं सोने की धूल मिलती है। पेंडरा के कोमोघाट Komoghat में अबरक पाया जाता है। रतनपुर और लोरमी में ताँबे का पता चलता है। बाबू बालारामजी अगरवाला, वकील, जो इस समय खानों का पता लगाने में खूब कोशिश कर रहे हैं, कहते हैं कि कोयला, ताँबा और अबरक की खानों का उन्हें पता चला है। लाल और सफेद छुई मिट्टी अनेक स्थानों में पाई जाती है। यही हाल चूने के पत्थर का है। अकलतरा का चूने का कारखाना बढती पर है। बलासपुर शहर के अस्पताल में फर्श में जो काले पत्थर लगे हैं, वे शिवनारायण के हैं । शिवनारायण और चांपा में हल्के दर्जे का स्लेट पत्थर भी पाया जाता है। इस कड़ी को क्लिक करके विलास वैभव Bilaspur District Gazeteer मुख्‍य पृष्‍ट पर वापस जायें ..

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