बिलासपुर वैभव: आठवाँ विकास प्रमुख ठौर

अकलतरा -
रकबा 4871 एकड, मनुष्य संख्या 3368 । बिलासपुर- कलकत्ता लाइन का यह दूसरा स्टेशन है। प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता राय बहादुर हीरालाल के मतानुसार रतनपुर के हैहयवंशी राजा पृथ्वीदेव के भाई अकलदेव के ऊपर इसका नाम रखा गया है। अकलदेव का नाम किसी शिलालेख में मिला था। अकलतरा में ईंट-चूने के बने कई मंदिर हैं, पर इनकी हालत अच्छी नहीं है। वहाँ दो महत्त्वपूर्ण शिलालेख, जो कदाचित् कोटगढ से ले आये गए थे, यहाँ मिले हैं। इनमें से एक तो शिवजी के मंदिर में, जिसे मालगुजार ने बनवाया है, लगवा दिया गया है। इसमें रतनपुर के कलचुरि राजाओं का जिक्र है तथा उसमें यह भी लिखा है कि उनके एक आधीन सरदार बल्लभराज ने कलचुरि सं. 893 या सन् 1141 में रेवान्त का एक मंदिर बनवाया और महल तथा घुडुसालों के निकट एक तालाब खुदवाया। जान पडता है कि ये सब बातें कोटगढ की हैं, जहाँ से यह शिलालेख लाया गया है । दूसरा शिलालेख रायपुर के अजायबघर में है। अकलतरा से अनुमान 8 मील दूर दलहा पहाड है, जो अपनी ऊँचाई के लिए जिले में प्रसिद्ध है। अकलतरा रोजगारी जगह है । शुक्रवार और सोमवार को यहाँ बाजार लगता है। यहाँ एक हिंदी मिडिल-पाठशाला, डाकघर और कांजीहाउस हैं । दो सहकारी सभाएँ भी कार्य कर रही हैं । बस्ती में सफाई के प्रबंध के लिए सेनीटेशन ऐक्ट जारी है। एक अच्छा सा पुस्तकालय भी यहाँ है।
अड़भार-
रकबा 2851 एकड, मनुष्य संख्या 2289, यह गाँव चंद्रपुर जमींदारी में है। यहाँ देवीजी का एक पुराना मंदिर हैं, जिसके केवल दो दरवाजे रह गए हैं। इनमें से एक दरवाजे पर जो खुदाव है, वह अजंता की कारीगरी से बहुत मिलता-जुलता है। दूसरा दरवाजा भी सुंदर है। यहाँ पं. लोचनप्रसाद जी पाण्डेय को अभी हाल में एक बडे से पत्थर के खंभे पर कुछ अक्षर खुदे हुए मिले। ये अक्षर अभी तक पढे नहीं जा सके हैं । चंद्रपुर के किरारी के तालाब के खंभे के अक्षर मिलते-जुलते हैं। अक्षर 1500 वर्ष के ऊपर के जान पडते हैं। इसका नाम अड्भार अष्टद्वार से तो न पडा हो ? प्राचीन मंदिर में अष्टद्वार के चिह्न दीख पडते हैं। मंदिर के पास झोंपडी है, जिसमें दशभुजी दुर्गा की मूर्ति है । वहाँ एक जैनमूर्ति है। गाँव में बहुतेरे पुराने तालाब हैं। किले के निशान भी मिलते हैं, जिनके चहुँ ओर खाई हैं। यहाँ एक हिंदी-मिडिल-पाठशाला है।
अरपा नदी
यह नदी पेंडरा के निकट एक खेत से निकलकर जंगल पहाडों में घूमती, बिलासपुर शहर को उत्तर दिशा से धक्का देती, मटियारी-बरतोरी के निकट शिवनाथ नदी में जा मिली है। कर्रा गाँव के निकट इस पर रेलवे पुल है। लोगों के सुभीते के लिए बिलासपुर शहर के पास इस पर एक पुल और बाँधा जा रही है । सरकार इस नदी से नहर काटने की तजवीज कर रही है।
आगर नदी
यह नदी पंडरिया की एक पहाडी से निकली है। कुकुसदा के पास यह मनियारी में जा मिली है। इसके तट पर मुंगेली बसा हुआ है। यहीं उस पर पुल भी है। इस नदी में भी बाँध बाँधने का कार्य विचाराधीन है।
कटघोरा तहसील
यह तहसील बिलासपुर जिले के उत्तर भाग में है। इसका संगठन हुए बहुत दिन नहीं हुए हैं। इसका क्षेत्रफल 2549 वर्गमील है। विस्तार की दृष्टि से यह सबसे बडी तहसील है पर जनसंख्या के लिहाज से इसका नंबर अंतिम है। इस तह. में मेकल पर्वत की श्रेणियाँ खूब फैली हुई हैं। इससे यहाँ जंगल भी बहुत है। इस तह. में पाँच जमींदारियाँ हैं। उपरोड्डा, मातिन, छुरी, लाफा और कोरबा । एक तरह से इसे जमींदारियों की ही तहसील कहना चाहिए। इस तहसील के गाँवों की संख्या 766 है। डाकखाने यहाँ पसान, कटघोरा, कोरबा और छुरी में है। हसदो और जटाशंकरी इस तह. की मुख्य नदियाँ हैं।
कटघोरा
(गाँव) यह बिलासपुर से उत्तर-पश्चिम 54 मील पर है। पक्की सड्क है ।यह कटघोरा तह. का सदर मुकाम है । यहाँ एक हिंदी-मिडिल पाठशाला, डाक, तार, पुलिस और कांजीहाउस है।
किरारी (चंद्रपुर)
यह गाँव खरसीया स्टेशन से 20 मील दक्षिण-पूर्व में तथा चंद्रपुर से 10 मील पश्चिम में हैं। यहाँ हीराबंध नामक एक तालाब में सन् 1921 के अप्रैल मास में एक लकडी का खंभा मिला था। खंभा चौकोर है। लंबाई 9 हाथ। खंभे पर 1500 वर्ष पहले के अक्षरों में एक लेख था, जो धूप लगने के कारण नष्ट सा हो गया। पं. रामदत्त जी उपाध्याय ने इस लेखकी एक नकल उतारी थी, जो पुरातत्व विभाग द्वारा अब तक नहीं पढी जा सकी है। खंभा नागपुर के अजायबघर में रखा गया है। इस खंभे के अक्षर अड्भार के पत्थर के खंभे पर खुदे अक्षरों से मिलते-जुलते हैं।
कुदुरमाल
यह छोटा सा गाँव कोरबा जमींदारी में है । चांपा स्टेशन से यह 17 मील दूर है। यहाँ कबीर साहब के सुप्रसिद्ध शिष्य धर्मदास के पुत्र वचन चूडामन साहब का समाधि चौतरा है। यहाँ प्रतिवर्ष माघ मास में कबीरपंथियों का मेला लगता है और चेले मूंडे जाते हैं।
कोटा
बिलासपुर-कटनी लाइन पर यह करगीरोड स्टेशन के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ सन् 1902 से अमृत मैच फैक्टरी नामक एक दियासलाई कारखाना जारी है। यहाँ एक हिंदी-प्राइमरी-पाठशाला, डाकघर, तारघर, पुलिस थाना, कांजीहाउस और डाक बँगला है। प्रति सोमवार को यहाँ बाजार भरता है।
कोटगढ
अकलतरा के उत्तर में बलौदा की सड्क पर बारगाँव एक गाँव है। यहाँ एक मिट्टी का पुराना किला है । किले के भीतर कई मंदिरों के खँडहर हैं । यहाँ कई शिलालेख प्राप्त हुए थे।
कोटमी
रकबा 3510 एकड, मनुष्य संख्या 2348, यह गाँव जांजगीर तह. में लीलागर नदी पर बसा हुआ है। यहाँ मिट्टी का एक पुराना किला है, जिसके चहुँ ओर खाई है । खाई अब तालाब के रूप में बदल गई । है। सांटे की खेती यहाँ खूब होती है। यहाँ एक हिंदी-प्राइमरी-पाठशाला और एक सहकारी सभा है। मंगलवार को बाजार भरता है।
खरौद
यह बडा गाँव जांजगीर तह. में शिवरीनारायण से 2 मील अकलतरा सड्क पर है। यहाँ कई पुराने मंदिर हैं, जिनमें लखनेश्वर महादेव का मंदिर बड्डा और उल्लेख योग्य है। इस मंदिर में चेदि संवत् 933 (सन् 1181) का एक शिलालेख है। इस शिलालेख में उन राजाओं की सूची है, जो कलिंगराज से लगाकर द्वितीय रत्नदेव तक हुए हैं। उसमें यह भी लिखा है कि खरौद में शिवजी का एक मंदिर, साधुओं के लिए मठ, धर्मशालाएँ तथा दूसरे बहुत से मंदिर बनवाए गए थे, बाग-बगीचे लगवाये गए थे और तालाब खुदवाये गए थे। एक लेख यहाँ और है, जो कुटिल लिपि में लिखा गया है। अंगभंग हो जाने तथा चूना पुत जाने से अब यह पढा नहीं जाता। गाँव के दक्षिण में ईंटों का बना संवरी देवी का मंदिर है। इसकी बनावट सिरपुर के लक्ष्मणजी के मंदिर की तर्ज पर है। उत्तर की ओर कुछ टूटे-फूटे मंदिर और हैं, जिनके दरवाजे पर मनोहर मूर्तियाँ बनी हुई हैं। शिवरात्रि के अनुसार पुराने तालाब हैं। यहाँ एक हिंदी मिडिल-पाठशाला है। साप्ताहिक बाजार शनिवार को लगता है।
गतौरा
रकबी 4485 एकड, मनुष्यगणना 2292 । यह बड्डा गाँव बिलासपुर से 6 मील पूर्व में हैं। यहाँ काले पत्थर की बहुत सी मूर्तियाँ हैं। तालाब कई हैं । गाँव में एक हिंदी प्राइमरी-पाठशाला और कांजीहाउस है।
गनियारी
रकबा 1876 एकड, मनुष्य संख्या 2702, यह गाँव बिलासपुर से 12 मील उत्तर दिशा में है । यहाँ कोई 12 तालाब हैं । बुधवार को मनुष्यों का तथा गुरुवार और शुक्रवार को ढोरों का भारी बाजार लगता है। यहाँ एक हिंदी- मिडिल-पाठशाला, पुत्रीशाला, डाकघर, कांजीहाउस और सराय है।
घुटकू
रकबा 3712 एकड, मनुष्य सं. 2484 । गाँव बहुत बडा है। बिलासपुर कटनी लाइन का पहला स्टेशन है। किसी समय यहाँ रेशम के कपडे बनते थे। बाजार इतवार को भरता है। एक मिडिल-पाठशाला और कांजीहाउस है। तीन सहकारी सभाएँ भी हैं।
चांपा
रकबा 3998 एकड, मं. सं. 6344, यह चांपा जमींदारी का मुख्य स्थान है । रेलवे स्टेशन है । हसदो नदी के तट पर बसा हुआ है । व्यापारिक दृष्टि से बडा अच्छा स्थान है। अनाज, कोसाटसर और लाख का यहाँ बडा रोजगार है। सोमवार और गुरुवार को बाजार भरता है। अमेरिकन पादरियों का खोला हुआ यहाँ एक कुष्ठाश्रम है। इसके सिवा हिंदी मिडिल पाठशाला, पुत्रीशाला, डाकघर, काजीहाउस और सेनीटेशन कमेटी भी है। रोजगार के कारण बस्ती की बडी बढती हो रही है।
छुरी
मनुष्य संख्या 2092, छुरी जमींदारी का यह मुख्य स्थान है । बिलासपुर से यह करीब 50 मील दूर है। गाँव से छह मील पर 2000 फुट ऊँची एक टेकडी है, जिसे कोसगईं पहाडी कहते हैं। टेकरी के शिखर पर पत्थर का बना हुआ एक छोटा सा किला है। कहते हैं, यह प्रसिद्ध गोंड डाकू धाम- धुरुवा का निवास स्थान था। उसे रतनपुर किले के एक पहरेदार ने मार डाला और इनाम में छुरी जमींदारी पायी । छुरी के वर्तमान जमींदार उसी के वंशज हैं। 16वीं सदी में यहाँ रतनपुर के हैहयवंशी राजा और पठानों के बीच लड्डाई हुई थी, जिसमें जीत राजा की रही । राजा ने अपना विजय-वृत्तांत एक पत्थर पर खुदवा दिया था। यह पत्थर आजकल नागपुर के अजायबघर में है। किले में पाँचों पाण्डवों की बडी सुंदर मूर्तियाँ हैं। पहाडी पर कोसगईं देवी का एक छोटा सा मंदिर भी है। दशहरे के अवसर पर यहाँ एक छोटा सा मेला भरता है और जमींदार की ओर से बलि आदि दी जाती है। छुरी का कोसा-कपडा बहुत अच्छा होता है। यहाँ एक प्राइमरी स्कूल, डाकघर और कांजीहाउस है।
जांजगीर तहसील
यह तहसील जिले के पूर्वी भाग में है। इसका क्षेत्रफल 1405 वर्गमील है। विस्तार की दृष्टि से यह सबसे छोटी तहसील है, पर मनुष्य संख्या के लिहाज से इसका नंबर प्रथम आता है। इस तहसील के गाँवों की संख्या 850 है। हसदो, महानदी, कांजीवाला, बोरई, मांड,केलों इस तह. की नदियाँ हैं। चांपा जमींदारी की गणना इस तहसील के भीतर होती है। चांपा, जांजगीर, अकलतरा, खोखरा, चंद्रपु, शिवरीनारायण, बिर्रा, बाराद्वार और पामगढ में डाकघर है।
जांजगीर (गाँव)
रकबा 3597 एकड जनसंख्या 3232, बिलासपुर-कलकत्ता लाइन के नैला स्टेशन से यह दो मील दूर है। इसी नाम की तहसील का यह सदर मुकाम है ! पहले तहसील का सदर मुकाम शिवरीनारायण में था, पर सन् 188 5 में जब महानदी की बाढ से उसकी इमारत बह गई और बहुत से कागजात खराब हो गए, तब सन् 1891 में यह सदर मुकाम बना दिया गया। यहाँ का मंदिर देखने ही लायक है। इसकी दीवालों पर दशावतार की मूर्तियाँ खचित हैं और कोनों में नाचनेवालियों और तपस्वियों के चित्र हैं। पश्चिमी दीवाल की पीठ पर सूर्य महाराज विराजमान हैं। मंदिर के दरवाजे के ऊपर ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मूर्तियाँ हैं । इनमें से विष्णुजी की मूर्ति नवग्रहों के चित्रों के बीच में बनी हुई है। मंदिर भिम्मा नामक एक भारी तालाब के किनारे अपूर्ण और मूर्तिविहीन दशा में भी शान के साथ खड्डा है । कहते हैं कि रतनपुर से 12 मील दूर पर जो पाली का मंदिर है, वह और यह मंदिर एक साथ बनवाए गए थे, पर पाली का मंदिर पहले पूरा हो गया, इसलिए यह अधूरा छोड दिया गया। जांजगीर नाम जाजल्ल नगरी का बिगडा हुआ नाम जान पडता है। जाजल्लदेव रतनपुर के हैहयवंशी राजाओं में से थे और पाली का मंदिर इन्हीं का बनवाया हुआ था। गाँव में एक हिंदी-मिडिल-पाठ-शाला, मिशन-पुत्रीशाला, डाकघर, अस्पताल, पुलिस थाना, कांजीहाउस और सराय हैं। बस्ती की सफाई के लिए सेनीटेशन एक्ट जारी है।
तख्तपुर
रकबा 1071 एकड, जनसंख्या 2520, यह गाँव बिलासपुर तह. में, बिलासपुर से 18 मील मनियारी नदी के तट पर बसा हुआ है । राजा तखतसिंह ने इसे बसाया था। उनका बनवाया शिवजी का मंदिर मौजूद है। अभी हाल का बना श्रीरामदास बाबा का मंदिर भी देखने योग्य है। यहाँ अनाज का अच्छा व्यापार होता है । यहाँ की बिही प्रसिद्ध है। इसका चालान कलकत्ते खूब होता है। प्रति शुक्रवार को बड्डा भारी बाजार भरता है। ढोरों का बाजार भी इसी दिन लगता है । यहाँ एक हिंदी मिडिल पाठशाला, डाकघर, सेनीटेशन कमेटी, कांजीहाउस और सराय है।
तुमान
रकबा 1580 एकड, जनसंख्या 43, यह गाँव लाफा जमींदारी में है। बिलासपुर से यह कोई 60 मील और रतनपुर से 45 मील दूर होगा। यहाँ हैहयवंशी राजाओं की प्राचीन राजधानी थी। प्रथम जाजल्लदेव का सन् 1114 वाला एक शिलालेख मिला है। उसमें लिखा है कि उसके पूर्वज कलिंगराज ने तुमान को पहले अपनी राजधानी बनाई । बाद में उसके पितामह रतनदेव ने राजधानी वहाँ से हटा दी और वर्तमान रतनपुर को राजधानी बनायी । तुमान चहुँ ओर पहाडियों से घिरा हुआ है । केवल पूर्व और पश्चिम की ओर निकास का मार्ग है । पहाडियों के बीच में करीब 16 गाँव जो बसे हुए हैं, तुमानखोल के नाम से प्रसिद्ध हैं। यहाँ तालाब और मंदिरों की संख्या बहुत है, पर वे अच्छी हालत में नहीं है। यहाँ की मूर्तियाँ पाली के मंदिर की मूर्तियों के ढंग की हैं । पास ही जटाशंकरी नदी बहती है। उसके किनारे पर तराशे हुए पत्थरों का एक खंडहर है, जो सतखंडा महल कहा जाता है।
धनपुर
रकबा 2034 एकड, मनुष्यसंख्या 421, यहाँ गाँव पेंडरा जमींदारी में पेंडरा से 5 मील उत्तर की ओर है । करीब 4 वर्गमील तक यहाँ पत्थरों के ढेर और इमारतों के खंडहर बहुत मिलते हैं, पर डेढ मील के भीतर तो उनकी संख्या और अधिक बढ गई है। कहते हैं कि धनपुर और रतनपुर दोनों को हैहयवंशी राजाओं ने अपनी राजधानी के योग्य बनाया। पीछे यह हुआ कि दीपक जहाँ पर आप ही आप जल उठे, वही राजधानी बनाई जाए। यह बात रतनपुर में हुई, इसलिए वहीं राजधानी स्थापित हुई। धनपुर में भवनतारा नामक एक बडा तालाब है । उसके निकट बहुत सी अंगहीन मूर्तियाँ पडी हैं । तालाब से आध मील उत्तर में कई इमारतों के खंडहर हैं। इसी प्रकार मंदिरों के भी अनेक खंडहर हैं। इनमें से चार मंदिर जैन धर्मी जान पडते हैं। कुछ मंदिर तो खालिस पत्थर के बने हुए हैं और कुछ ईंट पत्थर दोनों से बनाए गए हैं। इनमें जो ईंटे लगी हैं, वे वैसे ही बडी और प्राचीन ढंग की हैं, जैसे सिरपुर के मंदिरों में पाई जाती हैं। यहाँ जैनधर्म की एक बहुत बडी नग्न मूर्ति है, जो चट्टान तराश कर बनाई गई है । इसका नाम बेनीबाई या कपूपात है । लोगों का विश्वास है कि इस मूर्ति के नीचे बहुत सा द्रव्य गड्डा है। यहाँ तालाबों की संख्या अधिक है। एक तालाब बाम्हन मारा नामक है। इसके विषय में यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार कुछ ब्राह्मण व्यवसायी बाँस की नली में ढाके की मलमल छिपाकर इस प्रदेश से यात्रा कर रहे थे । जब जमींदार को यह खबर लगी तो उसने कुछ मनुष्य उन्हें पकडने के लिए भेजे। इस पर ब्राह्मणों से उसी तालाब में कूदकर अपने प्राण दे दिए। जान पड्ता है.-धनपुर में कोमों राजाओं की राजधानी थी।
पाली
यह गाँव लाफा जमींदारी में है। यह बिलासपुर से 38 मील कटघोरा- सड्क पर है। गाँव के नैर्जऱत्य कोण में एक अष्टकोण सुंदर तालाब है। उसके किनारे पर एक बड्डा ही मनोहर शिवजी का मंदिर है। उसे प्राचीन कारीगरी का एक नमूना समझिए। मध्यप्रदेश में उसकी जोड के बहुत कम मंदिर निकलेंगे ¦ फर्श से लेकर छत तक ऐसा खुदाव किया गया कि देखते ही बनता है। दीवालों पर पौराणिक कथाओं के चित्र खचित हैं। सभा मंडल में चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ हैं। मंदिर के भीतरी भाग की कारीगरी विशेष बढकर है । कहीं जोड कर निशान तक दिखाई नहीं देता। जो देखता है, मुग्ध हो जाता है । सरकार ने आवश्यकतानुसार मंदिर की मरम्मत कराई है, जिससे बहुत कुछ सुंदर अंश दब गया है। राजा जाजल्लदेव ने इसे निर्माण कराया था। इनका नाम मंदिर में तीन स्थानों पर खुदा हुआ है।
पीथमपुर
रकबा 1232 एकड, मनुष्य संख्या 674, यह गाँव चांपा जमींदारी में हसदो नदी के तट पर बसा हुआ है। प्रतिवर्ष फागुन पूनो को एक सप्ताह मेला भरता है। यह मेला कुछ प्राचीनकाल से नहीं भरता है। कहते हैं कि यहाँ के एक तेली को एक रात स्वप्न हुआ कि भूमि के भीतर शिवजी की मूर्ति गड्डी है, उसे तू उखाड और स्थापित कर। उसने वैसा किया। मूर्ति सचमुच मिली । उसने उसे नदी के तटपर स्थापित कर दिया। इससे उसके पेट का दर्द, जिससे वह बहुत दिनों से पीडित था, जाता रहा। खरियार के जमींदार को भी यही शिकायत थी । उसने पीथमपुर की यात्रा की और शिवजी की मानता मान पेट-दर्द से छुट्टी पायी। उसने शिवजी के लिए एक पक्का मंदिर बनवा दिया। तबसे इसका नाम बहुत बढ चला । बहुतेरे पेट दर्दवाले फागुन पूनों को आने लगे और इस प्रकार मेला भरना प्रारंभ हो गया। मेले में 50 हजार तक मनुष्य एकत्र हो जाते हैं।
पेंडरा
रकबा 4589 एकड, जनसंया 3898, बिलासपुर कटनी लाइन के पेंडरा रोड (गौरेला) स्टेशन से 5 मील दूर है। राह में आधी दूर पर मिस लांगडन का क्षय रोगाश्रम मिलता है। प्रति रविवार को यहाँ बाजार भरता है। अनाज, लाख, हर्रा और अन्य जंगली चीजों का यहाँ बडा व्यापार होता है। जमींदार न होने के कारण जमींदारी कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधीन है। जमींदार-परिवार का निवास प्राय: सधवानी नामक गाँव में होता है । जमींदार के उमदा-उमदा मकान वीरान पडे हुए हैं, जिन्हें देखकर खेद होता है। गाँव में एक हिंदी- मिडिल पाठशाला, पुत्रीशाला, थाना, डाक-तारघर, अस्पताल और कांजीहाउस है। सफाई का महकमा भी बस्ती में जारी है । पेंडरा शब्द पिंडारियों से निकला जान पडता है। पुराने जमाने में यह जमींदारी डाकुओं के दलों का अड्डा था। खास पेंडरा में परदेशियों की संख्या बहुत अधिक है।
पंडरिया (गाँव)
रकबा 2210 एकड, मं. सं. 3598, यह गाँव पंडरिया जमींदारी मुख्य स्थान है। बिलासपुर से यह 52 मील दूर है। यह चहुँ ओर से आम की घनी अमराई से घिरा हुआ है। सोमवार को बाजार भरा करता है। यहाँ एक हिंदी- मिडिल-पाठशाला, पुत्रीशाला, डाकघर, पुलिस थाना, अस्पताल और कांजी हौस है।
पांडातराई
रकबा 2205 एकड, मनुष्य संख्या 1922 यह गाँव पंडरिया जमींदारी में, पंडरिया और वर्धा रियासत की सीमा पर स्थित है। तराशे हुए पत्थर, मकानों के खँडहर यहाँ खोदने से बहुत मिलते हैं। कुछ मंदिरों में खुदाई का काम बहुत अच्छा किया गया है । जान पडता है कि प्राचीन समय में यह कोई गौरवशाली स्थान था। गाँव में एक प्राइमरी पाठशाला, डाकघर और कांजी हाउस है।
बम्हनीडीह
रकबा 2038 एकड, मं. सं. 2833, चांपा जमींदारी हसदो नदी के तट पर यह गाँव बसा हुआ है। यहाँ शुक्रवार और शनिवार को ढोरों का बडा भारी बाजार भरता है। इमारती लकडी, बाँस, लाख आदि चीजें यहाँ के बाजार में बिकने को आती हैं। गाँव में एक प्राइमरी-पाठशाला, डाकघर और कांजीहाउस हैं।
बलोदा
रकबा 3509 एकड, मं. सं. 3043, यह जांजगीर तह. के बडे गाँवों में से है। अकलतरा स्टेशन से यह 10 मील उत्तर है। सूती और कोसा के कपडे यहाँ अच्छे बनते हैं। तालाब कई हैं । गाँव में एक प्राइमरी पाठशाला, डाकघर और कांजीहाउस है । सेनीटेशन एक्ट भी यहाँ जारी है।
बिलासपुर तहसील
यह तह. जिले के मध्यभाग में है। क्षेत्रफल इसका 2135 वर्गमील है। क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों के लिहाज से जिले में इसका दूसरा नंबर है। इस तह. की ग्राम संख्या 936 है। पेंडरा और केंदा जमींदारी इसी तह. में लगती है। छोटी नर्मदा, घोंघा, अरपा और खारून इस तह. की मुख्य नदियाँ हैं। लीलागर इसकी पूर्वी सीमा पर और मनियारी इसकी पश्चिमी सीमा पर बहती है। डाकखाने यहाँ बिलासपुर, रतनपुर, तखतपुर, गनियारी, कोटा, बेलगहना, गौरेला, पेंडरा, मरवाही में हैं। सहकारी सभाएँ कोई 75 गाँवों में हैं।
बिलासपुर शहर
रकबा 1828 एकड, मं. सं. 24295 । रायबहादुर हीरालाल साहब अपनी एक पुस्तक में इसके विषय में इस प्रकार लिखते हैं, '' इसे बिलासा नामक एक केंवटिन ने बसाया था। यह पतिव्रता एक अन्यायी राजा ने अपना सतीत्व बचाने के लिए यहीं पर जलकर कोयला हो गई और केंवट जाति को पवित्र कर गई । इसलिए-
केंवटिन चना ला सब कोई खाय।
आनके ला कोइ ना खाय ॥
केंवट लोग कहते हैं कि बिलासा के जलने से केंवट जाति का रंग काला हो गया।
यह शहर बंबई से रेल द्वरा 756 और कलकत्ते से 445 मील है । यहाँ से कटनी के लिए एक ब्रांच रेलवे गई है, जिसकी लंबाई 198 मील है । शहर अरपा नदी के तट पर बसा हुआ है।
अनुमान सन् 1770 में एक मराठा राजा कर्मचारी ने बिलासपुर को अपना निवासस्थान बनाया और नदी तट पर एक किला बनवाना आरंभ किया, पर वह पूरा न हो पाया। रतनपुर के आगे उस समय बिलासपुर की कोई गिनती न थी, पर सन् 1862 में जबसे यह जिले का सदर मुकाम बना दिया गया, तब से इसकी बडी उन्नति हो रही है।
म्यूनिसिपालिटी यहाँ सन् 1867 में स्थापित हुई थी। गोल बाजार इस शहर का मुख्य बाजार है। शनिवार और गुरुवार को यहाँ बाजार भरता है। स्टेशन पर सप्ताह में तीन बार बाजार लगता है। यहाँ रविवार को ढोरों को बाजार लगता है।
बिलासपुर रेलवे का जंक्शन है। स्टेशन बड्डा और देखने लायक है। यहाँ से माल उतना बाहर नहीं जाता, जितना बाहर से यहाँ आता है। माल बाहर भेजने में इसका नंबर अकलतरा और भाटापारानम से उतर कर है। यहाँ से कोसा टसर का कपडा बाहर बहुत जाता है। आसाम चायबागान की मध्यप्रदेशीय एजेंसी का हेड ऑफिस यहीं पर है। ठीक है, यहाँ कुली बहुत मिलते हैं न ? स्टेशन पर गोरों और अधगोरों की संख्या अधिक है । शहर में श्री जगन्नाथप्रसाद भानु कवि का एक छापाखाना ' जगन्नाथ प्रेस' नामक है। बिलासपुर में बारहों मास हरी भाजी तरकारी मिलती है।
यहाँ एक अंग्रेजी हाईस्कूल, एक अंग्रेजी मिडिल स्कूल 7 या 8 हिंदी शालाएँ हैं। एक नार्मल स्कूल भी है, जहाँ देहाती स्कूलों के लिए पाठक तैयार किये जाते हैं । पुत्रीशालाएँ भी यहाँ तीन या चार हैं । स्टेशन पर एक हिंदी और दो अंग्रेजी स्कूल हैं । शहर में एक उर्दू स्कूल भी है।
अस्पताल 4 हैं ।मिशन अस्पताल में स्त्रियों के इलाज का अच्छा सुभीता है । शहर में दो-तीन खानगी डॉक्टर भी हैं।
शहर में केवल 1 सराय है। पं. छितानी मितानी प्रसाद की एक छोटी सी धर्मशाला भी है। लोग पं. राजाराम के मंदिर वाली धर्मशाला में अधिक ठहरते हैं, क्योंकि वहाँ सुभीता अधिक है। यहाँ एक अच्छी सी धर्मशाला की बडी जरूरत है । डाक बँगला यहाँ का बहुत अच्छा है। बड्डे अफसरों के ठहरने के लिए सरकिट हाउस अलग बना हुआ है।
तालाब शहर के बाहर एक या दो हैं, पर सब रद्दी हैं। कुओं की अधिकता के कारण इन्हें कोई पूछता नहीं । पाँच, छह हाथ खोदने से ही पानी निकल आता है। पानी का यहाँ बडा सुख है। म्यूनिसिपाल्टी का एक बाग शहर के बीच में है। एक बाग श्री अयोध्याप्रसाद साब का जूना बिलासपुर में है। अच्छे बागों की यहाँ और जरूरत है।
दीवानी कचहरी, नई जिला कचहरी, टाउनहाल, हाईस्कूल, नार्मलस्कूल, अब्दुल चूडीवाले गोंड्पारावाला मकान देखने लायक इमारते हैं । पुस्तकालय ' यहाँ दो-तीन हैं, पर अच्छा पुस्तकालय एक भी नहीं।
बिसेसरा
रकबा 2058 एकड, म. सं. 412, यह गाँव पेंडरा जमींदार में है। विश्व+ईश्वर विश्वेश्वर के ऊपर से इसका नामकरण हुआ है। यहाँ शिवजी के बहुत से टूटे-फूटे मंदिर हैं। वे सब मंदिर और मूर्तियाँ मि. बेगलर के मतानुसार 9वीं सदी की बनी हुई हैं। गाँव धनपुर के समय का जान पडता है। पुरानी जगह को छोडकर यह अब नये स्थान पर बसा हुआ है। पुराने स्थान को छोडने का बस्तीवाले यह कारण बतलाते हैं कि यहाँ के मंदिर में जो महामाया हैं, बडी गुस्सैल हैं। निकट रहने से सबको चरपट कर जाती हैं।
बेलपान
रकबा 1465 एकड, म. सं. 418, यह गाँव बिलासपुर तहसील के बिलासपुर शहर से अनुमानित 22 मील दूर है । यहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा मेला भरता है। एक कुण्ड है, जहाँ से छोटी नर्मदा निकली है । पास ही महादेवीजी का मंदिर है।
मनियारी नदी
यह नदी लोरमी के पहाडों से निकलकर, विलासपुर और मुंगेली तहसील की सीमा पर बहुत दूर तक बहती हुई, तरेंगा-तालुका के दगौरी नामक गाँव से अनुमानित 3 मील पर शिवनाथ नदी में जा मिलती है। इसकी लम्बाई अंदाजन 70 मील है। सरकार इस नदी पर भी बाँध बनाने का विचार कर रही है।
मल्हार रकबा 3519 एकड्, म.सं. 2307, यह गाँव लीलागर नदी के निकट, बिलासपुर नैर्कत्य 16 मील है। प्राचीन समय में इस गाँव की बड्डी मर्यादा थी । यहाँ बहुत से पुराने खंडहर और जैनधर्मी नग्न मूर्तियाँ मौजूद हैं। यहाँ कई शिलालेख भी मिले हैं, जिनमें से एक रतनपुर के कलचुरि राजाओं के समय का है। उसमें संवत् 919 (सन् 1167) की मिति पडी हुई है।यह शिलालेख अब नागपुर के अजायबघर में है । यहाँ एक मिट्टी का किला भी है, जिसके चहुँ ओर खाई हैं। गाँव में छोटे-बडे मिलाकर कोई 62 तालाब हैं । यहाँ एक प्राइमरी पाठशाला है । साप्ताहिक बाजार बुधवार को भरता है।
महमदपूर
यह छोटा सा गाँव अकलतरा से दो मील उत्तर बलौदा की सड्क पर है। यहाँ एक बडा तालाब है, जिसमें पत्थर के घाट बँधे हुए हैं । टूटी-फूटी मूर्तियाँ, जिसमें से कुछ पर खुदाई का बढिया काम है, पाई गई हैं । यहाँ शिलालेख भी मिला है, जिसमें रतनपुर के कलचुरि राजा जाजल्लदेव, रतनदेव, पृथ्वीदेव और बल्लभराज के नाम खुदे हैं।
महानदी
इसकी लंबाई कोई 550 मील है। वह रायपुर के आग्नेय में सिहावा नामक जो गाँव है, वहाँ एक एक पोखर सोनकल, निकलते ही उत्तर की ओर घूम जाती है और बहती बहती बिलासपुर जिले की सीमा पर आ जाती है। आरंभ में काई 50, 60 मील तक इसका पाट 500, 600 गज से अधिक चौडा नहीं है। शिवरीनारायण से जरा ऊपर इसमें शिवनाथ नदी आ मिलती है। ५ यहाँ से इसका वेग पूर्व की ओर बढता है। बीच में जोंक और हसदो नदियाँ ३ इसमें आ मिलती हैं। फिर यह पदमपुर के दक्षिण से बहती हुई संबलपुर में जा घुसती है। अंत में इसका पतन बंगाल की खाडी में होता है।
मानिकपुर
रकबा 2090 एकड, मनुष्य सं. 244, यह गाँव केंदा जमींदार में है। गाँव के निकट एक पहाडी है, जिस पर मंदिर, तालाब और अन्य अनेक इमारतों ' के चिह्न पाए जाते हैं। मुंगेली तहसील यह तह. जिले के पश्चिमी भाग में हैं। इसका क्षेत्रफल 1503 वर्गमील है। क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों के लिहाज से इसका नम्बर तहसील में तीसरा आता है। इस तहसील की ग्राम संख्या 942 है । पण्डरिया और कंतेली इस तहसील की जमींदारियाँ हैं। मनियारी, आगर, रहन, हांफ और फोंक इसकी मुख्य नदियाँ हैं। ये प्राय: सबकी सब वायव्य से आग्नेय दिशा की ओर बहती है और अंत में सबका पानी जाकर शिवनाथ नदी में समा जाता है। गरमी के दिनों में इस तहसील में पानी का प्राय: बडा कष्ट रहता है । पिछले तीन साल से यहाँ लगातार अकाल पडु रहा है। मुंगेली, पंडरिया, पांडातराई, कुंडा, कन्तेली, लोरमी और पथरिया में डाकखाने हैं।
मुंगेली (शहर)
रकबा 2925 एकड, मनुष्य सं. 6536, यह बिलासपुर से पश्चिम में 31 मील दूर आगर नदी के तट पर बसा हुआ है। बिलासपुर से यहाँ तक पक्की सड्क है। मनियारी को छोड रास्ते की कुल नदियों पर पुल बँध गया है। मुंगेली में अनाज का भारी व्यापार होता है। माल अधिकतर भाटापारा स्टेशन से लदता है। फिर भी बिलासपुर स्टेशन पर थोड्डा-बहुत माल आता ही है। बस्ती में सफाई का कानून जारी है । यहाँ एक अंग्रेजी मिडिल स्कूल, प्राइमरी, हिंदी पाठशाला, पुत्रीशाला, डाक बंगाल, डाक-तारघर, अस्पताल, पुलिस थाना, कांजीहाउस, लोकल बोर्ड, मुनसिफ और तहसील की अदालतें हैं। यहाँ पादरियों की भी एक पाठशाला और अस्पताल है। बाजार प्रति शुक्रवार को लगता है। मालगुजार, महाराष्ट्रियन ब्राह्मण है । इनके पूर्वज भोंसला राज्य में माल-विभाग में नौकर थे। मुंगेली इन्हें माफी में मिला था।
मेकल पहाडी
पहाडियों की यह श्रेणी मध्यप्रदेश और मध्य हिंदु स्थान में विन्ध्या और सतपुड्डा पहाडों के बीच फैली हुई है। इसका आरंभ खैरागढ रियासत से होता है। वहाँ से यह बिलासपुर जिले की सीमापर बढती हुई ईशान कोण तक चली गई है। अमर कंटक, जो नर्मदा नदी का उद्गम स्थान है, इसी मेकल श्रेणी में है। इसीलिए नर्मदा मेकलसुता भी कहाती है । इन श्रेणियों की ऊँचाई 2000 फुट से कहीं अधिक नहीं है, केवल एक स्थान लाफा (पहाडी) 3600 फुट ऊँचा है। इन पहाडियों में साल के अच्छे जंगल है । पुराणों में लिखा है कि इस पहाडी पर मेकल ऋषि तपस्या करते हैं। छोटी महानदा, जोहिला और अन्य छोटी-छोटी नदियाँ पहाडियों से निकलती हैं । इन पहाडों से लोहा निकाला जाता है।
रतनपुर
रकबा 1066 एकड, मनुष्य सं. 4732, क्षेत्रफल की दृष्टि से इससे बड्डा गाँव जिले में दूसरा नहीं है। यह पहाडियों के बीच में बसा हुआ है। महाभारत में इसका नाम रत्नावती पुरी मिलता है। लोग कहते हैं--महाभारत की मोरध्वज-ताप्रध्वजवाली घटना यहीं हुई थी । पता चलता है कि यह 10वीं सदी में प्रथम रत्नदेव द्वारा बसाया गया था। कहते हैं कि जब यह उन्नति पर था, तब इसका विस्तार 12 मील पाली गाँव तक था। उस समय मध्य प्रांत में यह नगर बस एक ही रहा होगा। सुनते हैं यहाँ 1400 तालाब थे। अब भी के छोटे-बडे मिलाकर दो ढाई सौ से कम न होंगे। राम-टेकडी पर श्रीरामचंद्रजी का मंदिर, उसके नीचे श्रीवृद्धेश्वर महादेव का मंदिर, बस्ती के दक्षिण दरवाजे पर श्री भैरोजी का मंदिर और पश्चिम दिशा में श्रीमहामाया का मंदिर, आजकल के मुख्य मंदिर हैं। भैरोजी की मूर्ति बहुत ऊँची है। महामाया का मंदिर सबसे प्राचीन है। इसके विषय में जो कहानी प्रचलित है, वह इस तरह है---एक बार राजा रत्नदेव अपनी राजधानी तुमान छोड इधर शिकार खेलने आ निकले और रात हो जाने और संग छूट जाने पर एक बड के वृक्ष पर चढ रात बिताने लगे। उस बड वृक्ष के नीचे महामाया की सभा हुआ करती थी । सो रात्रि के समय राजा रत्नदेव को वह सभा देखने में आ गई । महामाया ने स्वप्न में राजा को वहाँ बस्ती बसाने की आज्ञा दी, जिसका उसने पालनकर वर्तमान रत्नपुर शहर बसाया और उसे अपनी राजधानी भी बनाया । उस वटवृक्ष के वंशज अब भी अपनी शाखा फैलाए हुए, देवी जी के मंदिर पर छाया कर रहे हैं। मंदिर के आस-पास सतीचौतरों की संख्या बहुत है। किले के निकट बीसदुअरिया नामक बीस द्वार का एब बडा मनोहर सती-मंदिर है । यहाँ 288 वर्ष पहले राजा लक्ष्मणसिंह की 20 रानियाँ सती हुई थीं ।यह अब अत्यंत टूटी-फूटी हालत में है।
रतनपुर के तालाब में दुलहरा सबसे बडा है। यह 180 एकडों में फैला हुआ है। कई तालाबों से फसल सिंचाई का काम लिया जाता है। यहाँ एक तालाब 'बैराग' नामक है, जिसमें पक्के घाट बँधे हुए है। किनारे पर शिवजी का मंदिर है। इस तालाब के विषय में नीचे लिखा दोहा प्रसिद्ध है-
रनारी मञ्जन करें, उठें छत्तीसों शग।
ऐसे रश्क तालाब को, लोक कहें ' चैराग'॥
सांटे इस गाँव में खूब होते हैं। तरकारी भाजी की भी कमी नहीं रहती ।
माघ पूनों को यहाँ मेला भरता है । मेले में मिठाई और खिलौनों की दुकानें अधिक रहती हैं। दुलहरा तालाब पर सतनामी की भीड रहती है, जहाँ वे कथा कहाते हैं और मृत व्यक्तियों की अस्थि तालाब में फेंकते हैं । फूल-काँसे के बर्तन रतनपुर में अच्छे बनते हैं। यहाँ का गुड और पान प्रसिद्ध है। अमराई भी यहाँ बहुत है।
समय की बलिहारी है। जो रतनपुर एक समय समस्त छत्तीसगढ की राजधानी थी, जिस रतनपुर के सदृश बडा नगर किसी समय मध्यप्रदेश में कदाचित् ही कोई रहा हो, जिस रतनपुर को लोग केवल देखने की लालसा से दूर-दूर से यात्रा का कष्ट उठाकर आते थे जो रतनपुर एक दिन अतुल सम्पत्तिवान और विशेष गौरवमान था, जो विद्या और और सभ्यता का केंद्रस्थल था, वही रतनपुर आज, हाय ! लिखते कलेजा मुँह को आता है, अत्यंत गिरी हुई अवस्था में है। मनुष्य संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है, फूट और वैर-भाव बढता जा रहा है, मिथ्या अभिमान । ईष्या और द्वेषाग्नि की ज्वाला से लोगों का हृदय जला जा रहा है और मलेरिया ज्चर ने बस्ती में ऐसा डेरा जमाया है, जैसे कोई अपनी पुश्तैनी जायदाद पर जमाता हो । जिन स्थानों पर अभी थोडे दिन पहले कथावार्ता, पोथी-पुराण, आनंद उत्सव होते दिखलाई पडते थे, वहीं अब उल्लू और गीदडों के निवासस्थान बने हुए हैं। मुकदमेबाजी ऐसी बढ रही है, जैसे प्लेग की बीमारी । मतलब यह कि कल जो इसकी हालत थी, आज नहीं है और आज जो हालत है, कल रहेगी या नहीं, इसमें पूरा संदेह है। यहाँ एक हिंदी मिडिल पाठशाला, प्राइमरी पाठशाला (करहा पारा में), पुत्रीशाला, पुलिस थाना, कांजीहाउस, डाक बँगला, डाकघर और आनरेरी मजिस्ट्रेटों की कचहरी है । बस्ती में सफाई का कानून जारी है।
लाफागढू
यह बडी पहाडी चित्तौरगढ के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसकी ऊँचाई 3240 फुट है। इसकी चोटी पर एक पुराना किला है, जिसके 3 फाटक हैं। फाटक खंभों और मूर्तियों से खूब सजे हैं । सिंह दरवाजे के निकट महामाया का एक सादा मंदिर है । मंदिर के भीतर जो देवी जी की मूर्ति है, टूटी हुई है। लोग कहते हैं कि एक बार एक गोरा मंदिर के भीतर जबरदस्ती घुस गया। फल यह हुआ कि मूर्ति तुरंत टूट गई और गोरा भी मर गया। मेनुका दरवाजे के निकट एक खोह है, जिसमें शिवजी का लिंग स्थापित है। सावन मास में लाफा के जमींदार यहीं रहते हैं और खोहवासी महादेव की पूजा करते हैं। फिर कजली मानकर लौट जाते हैं। कर्नल ने जो सन् 1881 में इस जिले के डिपुटी कमिश्नर थे, इस पहाडी के ऊपर बँगला तैयार करा उसे अपना ग्रीष्म-निवास बनाया था, पर अब यह बँगला जल गया है। पहाडी के ऊपर 4 तालाब हैं, जिनमें से 2 तालाब में बारहों मास पानी रहता है। जटा शंकरी नदी यहीं से निकलती है। पहाडी की तलहटी में घना जंगल है।
लाफा गाँव
यह लाफा जमींदारी का मुख्य स्थान है। ऊपर वर्णित पहाडी के नीचे बसा हुआ है। जनसंख्या 808 है। गाँव में एक प्राइमरी पाठशाला है।
लीलागर नदी
यह नदी कोरबा जमींदारी से निकलती है और बिलासपुर तह. को जांजगीर तह. से अलग करती हुई शिवनाथ नदी में जा मिलती है। कोटमी गाँव के पास इस पर रेल का पुल बँधा है।
शिवनाथ नदी
रायबहादुर हीरालाल साहब लिखते हैं, ''इस नदी का पुल्लिंगी नाम कुछ विचित्र सा मालूम पडता है, क्योंकि नदियाँ बहुधा स्त्रीलिंग शब्दों से ही पुकारी जाती है। छत्तीसगढ में महानदी को महानद भी कहते हैं, कदाचित् शिवनाथ को पानी का बड्डा प्रवाह समझकर इसका भी पुल्लिंगी नाम रख दिया हो। जनरल कनिंघाम का अनुमान है कि पहले महानदी की धारा उसी राह से बहती थी, जिससे अब शिवनाथ बहती है। कदाचित् महानद का मूल भाग होने के कारण पृथक नदी समझी जाने पर मूल स्रोत्र के पुल्लिंगी नाम की देखा-देखी इसका भी वैसा ही नाम रखना उचित समझा गया हो। इसकी एक सहायक नदी तांदुला जिला दुर्ग में है, जिससे एक बडी भारी नहर निकाली गई है। इससे चावल की खेती को बडा लाभ पहुँचेगा और उस नदी के नाम ' को सार्थक करेगा।' शिवनाथ नदी की कुल लंबाई 160 मील है।
शिवरीनारायण
मनुष्य संख्या 2250, यह गाँव जांजगीर तह. में है। बिलासपुर से संबंधपुर के लिए जो पुरानी सड्क गई है, वह यहीं से होकर जाती है। महानदी और जोंक नदी के संगम पर यह गाँव बसा हुआ है। यहाँ से अनुमानित मीलभर ऊपर महानदी और शिवनाथ नदी का मेल हुआ है। शिवनरीनारायण के नाम कारण के विषय में कथा प्रचलित है कि प्राचीन समय में एक शबर* था। जिस स्थान पर शिवनरीनारायण बसा हुआ है, वहाँ उस समय जंगल था। वहाँ जगन्नाथजी की मूर्ति थी। वह शबर उस मूर्ति की नित्य नेम से पूजा करता था। एक दिन एक ब्राह्मण ने उस मूर्ति को देख लिया। वह उसे वहाँ से ले गया और जगन्नाथपुरी में इसकी स्थापना कर दी। जगन्नाथजी ने उस शबर की भक्त से प्रसन्न हो वर दिया कि जिस जंगल में मैं रहता था, वह मेरे और तेरे संयुक्त नाम से प्रसिद्ध होगा। इसीलिए उसका नाम शिवरीनारायण पडा।
सन् 1891 तक शिवरीनारायण वर्तमान जांजगीर तह. का सदर मुकाम था, पर महानदी की बाढ द्वारा तहसील की इमारत को हानि पहुँचने तथा गाँव के रेलवे स्टेशन से दूर होने के कारण तहसील यहाँ से हटा दी गई। गाँव दो महालों में बँटा हुआ है। 1. भोगहापारा, 2. महंतपारा। गाँव के निकट सुंदर अमराई है। नारायण के मंदिर में लगे हुए शिलालेख से मालूम होता है कि वह मंदिर कलचुरिसंवत् 898 में बनवाया गया था। मंदिर पर एक बार बिजली गिरी थी, जिससे उसकी दीवाल फट गई थी। अब वह चूने से जोड दी गई है । नदी के निकट ही एक जलाशय है, जिसे रोहिणी कुण्ड कहते हैं । रतनपुर के हैहयवंशी राजाओं के समय शिवरीनारायण का अच्छा आदर था। रानियाँ और राजपरिवार के अन्य लोग महानदी में स्नान करने प्राय: आया करते थे। माघ पूनो को यहाँ मेला भरता है। यहाँ एक प्राइमरी पाठशाला और डाकघर है । बाजार बुधवार को भरता है।
* शबर = सबरा जाति। धंधा-मछली मारना।

सरकंडा
रकबा 1346 एकड मनुष्य सं. 598, यह छोटा सा गाँव बिलासपुर शहर के निकट अर अरपा नदी के उस पार है। सरकार ने यहाँ कृषि-फार्म खोल रखा है। गाँव मे एक सरकारी सभा है।
स्रोक्खी
अमर कंटक पहाड से, जहाँ से नर्मदाजी निकलती हैं, यह नदी भी निकलती है। इसका उद्गम स्थान एक पहाड की तली में है। निकलते ही वह दो ढाई-सौ फुट नीचे गिरती है। यह खड्डा इतना भयानक है कि देखते डर लगता है। पेंडरा जमींदारी में यह केवल 36 मील बह कर रीवाँ रियासत में घुस जाती है।
सोनसरी
यह गाँव जांजगीर तह. में है। यहाँ अभी हाल में 600 सोने के सिक्के, जिनका ब्यौरा नीचे दिया जाता है, मिले हैं-
संवत् सन् पृथ्वीदेव 405 बड्डे 54 छोरे १197-1217 (1140-60) ३ जाजल्लदेव 29 बडे 7 छोटे 1217-1232 (1160-75) हं रत्नदेव 68 बड्डे 28 छोटे 1232-1247 (1$75-90) गोविंदचंद्र 2 बडे पंच निशानी ? बड्डे जो मालूम नहीं हो सके जोड डक ४9
ऐसे सिक्के इतनी ज्यादा तादाद में आज तक कहीं नहीं मिले थे। इन सिक्कों से 180 बडे और 21 छोटे सिक्के बिलासपुर नगर के प्रतिष्ठित धनी-मानी श्रीदीनाथ जी अग्रवाल ने, जो श्रीबालाराम अगरवाले बी.ए. एल.एल. बी. वकील के बडे भाई हैं, खरीद कर रखे हैं। आप इन्हें उन पुरातत्व प्रेमियों को, जो इन सिक्कों का महत्त्व जानते हैं, उचित मूल्य पर सहर्ष देने को तैयार है।
हसदो नदी
यह नदी सिरगुजा रियासत से निकलकर प्राकृतिक छटा दिखाती, पत्थर चट्टानों से ठोकर खाती, मातिन और जमींदारियों में धूम मचाती, कोरबा और चांपा जमींदारियों में रोब जमाती, शिवरीनारायण से 8 मील पूर्व महानदी में जा समाती है। कोरबा और चांपा गाँव इसके तट पर बसे हुए हैं। _ चांपा के पास इस पर रेलवे का पुल है । हसदो बडी बेढब नदी है। इसका वेग | बहुत अधिक है और इसमें चोरबालू की अधिकता है। सो इसे रास्ते पर से ही पार करना चाहिए। मनमानी जगह से पार करने पर रेत खिसकती जाती है और मनुष्य भीतर जाता है और अंत में प्राणों पर आ बनती है । सरकार इस नदी पर भी बाँध बाँधने का विचार कर रही है।
हांफ नदी
यह नदी पंडरिया की पहाडी से निकलकर कुछ दूर तक कवर्धा और पंडरिया जमींदारी की सीमा पर बहती हुई खास पंडरिया आ पहुँचती है। फिर वहाँ से पंडरिया जमींदारी को मुंगेली तहसील से अलग करती हुई दुर्ग जिले में घुस जाती है। अंत में यह शिवनाथ नदी में जा मिलती है। इसकी लंबाई अनुमानित 80 मील है। सकरी इसकी सहायक नदी है। इस कड़ी को क्लिक करके विलास वैभव Bilaspur District Gazeteer मुख्‍य पृष्‍ट पर वापस जायें ..

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