बिलासपुर वैभव: नवाँ विकास जमींदारियाँ

उपरोड़ा Uparpoda
रकबा 448 वर्ग मील, मनुष्य संख्या 8671, जमींदार का पद दीवान, ग्राम संख्या 86। पैंडरा जमींदार Pendara Zamidar हिंदूसिंह Hindu Singh के पुत्र जसकरन Jaskaran के दो लड्के थे। एक पूरनमल Puran Mal, दूसरा चूरामनमल Churan Mal। चूरामनमल का एक लड्का था, जिसका नाम था हिम्मतराय Himmat Ray। उसने उपरौडा चौरासी धावा मार उसके ब्राह्मण अधिकारी का सिर काट, उस पर अपना अधिकार जमा लिया। इस अपराध पर उसे रतनपुर राज दरबार से कैद की सजा मिली। उसका एक नौकर मोहरिया गांडा था। वह बड्डा स्वामिभक्त था। वह अपने मालिक को छुड़ाने का अवसर ढूँढता रहा। एक दिन उसने रतनपुर नरेश King Of Ratanpur के महल के नीचे ऐसी चतुराई और मधुराई से शहनाई (मोहरी) बजाई कि राजा बड़ा ही प्रसन्न हो गया। उसने इसे मनमाना इनाम माँगने के लिए कहा। मोहरिया ने अपने मालिक को छोड़ देने के लिए प्रार्थना की। राजा ने अपने वचन का पालन किया और ऊपर से उपरौड़ा चौरासी भी उसे सौंप दी। यह घटना सं. 1641 की कही जाती है।
उपरोड़ा में जंगल और पहाड़ अधिक हैं। हाथी elephant भी यहाँ कभी-कभी मिलते हैं। जमींदारी अभी हाल ही में उसके जमींदार श्रीरुद्रशरण सिंह  Rudra Sharan Singh सौंपी गई है।

केंदा Kenda
रकबा 299 वर्गमील, मनुष्य संख्या 20163, जमींदार का पद ठाकुर, ग्राम संख्या 92 । कहते हैं- एक बार रात्रि के समय रतनपुर-नरेश की सेना रीवाँ राज्य Rinwa State के विरुद्ध कूच कर रही थी। रास्ते में मशालें बुझ गईं। घोर अंधकार, फिर घना जंगल और पहाड़। सिपाहियों को एक पग भी चलना कठिन हो गया। तब प्रसिद्ध बीर जस करन Jas Karan ने, जो पेंडरा-जमींदार हिंदू सिंह Hindu Singh का पुत्र था, अपने हाथों से तिली को मसलकर तेल निकाला, जिससे बडा काम चला। राजा के कानों में जब यह बात पहुँची, तब वह बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने उसे केंदा जमींदारी इनाम में दी ।
इस संबंध में एक दूसरी बात और प्रसिद्ध है। वह यह कि पेंडरा जमींदार हिंदू सिंह के घराने में तीसरी पुश्त में जो जमींदार हुआ, उसके दो पुत्र थे। उनमें से छोटे पुत्र संवत सिंह Samvat Singh को, रतनपुर नरेश तख्तसिंह Ratanpur King Takht Singh ने संवत् 1691 (सन् 1634) में केंदा जमींदारी दी। शायद यह पिछली बात ही ठीक हो। यह जमींदारी संवतसिंह के वंशजों के हाथ से कभी नहीं निकली। उन्होंने समय देखकर काम किया । राजपूतों के बाद मराठों की अधीनता और मराठों के बाद अंग्रेजों का प्रभुत्व वे चुपचाप स्वीकार करते गए।
अरपा नदी में जितनी घाटियाँ हैं, इस जमींदारी के अंदर हैं। पुराने जमाने में छत्तीसगढ और उत्तर हिंदुस्तान के बीच जो भारी व्यापार होता था, उसका तथा जगन्नाथपुरी जाने का मार्ग Route to Jagannathpuri इस जमींदारी के बीच होकर गया था, इससे इसका महत्त्व अन्य जमींदारियों से अधिक था। रेल इस जमींदारी में थोडी दूर दौडती है। कोटा Kota और बेलगहना Belgahana इसके मुख्य स्टेशन Station हैं । केंदा गाँव बेलगहना स्टेशन से 8 मील कोमोघाट Komoghat के नीचे सुंदर स्थान पर बसा हुआ है। यहाँ एक प्राइमरी पाठशाला है । जमींदारिन कामकाज देखती हैं, जमींदार नहीं रहे।

कोरबा Korba
रकबा 856 वर्गमील, मनुष्य सं. 87567, जमींदार का पद दीवान, ग्राम संख्या 341 । यह जमींदारी जिले की सब जमींदारियों से बड़ी हैं। वर्तमान जमींदार- परिवार के पूर्वजों को यह कब प्राप्त हुई, इसका पता ठीक-ठीक नहीं चलता।
छुरी जमींदारी Chhuri Zamindari के संबंध में कथा प्रचलित है, वैसा ही कथा, एक गोंड डाकू 7 को हराकर इसे इनाम में पाने की, इसके संबंध में भी कही जाती है, पर मालूम नहीं, यह कहाँ तक सच है। एक बात निश्चय है। वह यह कि यह जमींदारी रतनपुर राज्य में बहुत पीछे मिलाई गई थी। इसका नाम छत्तीसगढ के 36 गढ़ों में नहीं मिलता। चीज में साहब ने इसके संबंध में लिखा है कि रतनपुर के राजा बहारसाय Raja Baharasay of Ratanpur ने इसे सन् 1528 के लगभग सिरगुजा नरेश Sarguja King से छीन लिया था (उसी समय, जिस समय उसने कोसगई-छुरा Kosgai-Chhura में पठानों को हराया था) रतनपुर से दूर रहने के कारण इसके जमींदार ज्यादा स्वतंत्र थे। मराठों को इन्होंने खूब तंग किया था। एक बार बिंबाजी Bimbaji ने टकौली न पटने के कारण जमींदारी जब्त कर ली थी, पर उसके कर्मचारी वहाँ से शीघ्र ही भगा दिए गए। अंत में 2000 रुपये पाने पर बिंबाजी मान गए और जमींदारी भरतसिंह Bharat Singh को वापस दे दी।
प्रबंध अच्छा होने पर इस जमींदारी की आमदनी बहुत ज्यादा हो सकती है। लोहा और कोयला की खदानों Iron and coal mines को छोड़कर साल के बहुत बड़े-बड़े जंगल यहाँ है। जमींदारी के जंगली भाग में कंवर Kanwar और कोरबा Korava जाति के लोगों की अधिक बस्ती है। कुदुरमाल Kudurmal में माघ पूनों को मेला लगता है । प्रबंध कोर्ट आफ वार्ड्स का है। कोरबा खास हसदो नदी के तट पर बसा हुआ है । वह चांपा स्टेशन से 23 मील उत्तर की ओर है। वहाँ एक प्राइमरी पाठशाला, पुलिस थाना और डाकघर है।

कंतेली Kanteli
रकबा 25 वर्गमील, मनुष्य संख्या 6196, जमींदार का पद ठाकुर, ग्राम संख्या 44 । यह जमींदारी मैदानी भाग में है। जंगल यहाँ बिल्कुल नहीं है। इसका पुराना इतिहास इसके स्वर्गवासी जमींदारी के शब्दों में ही सुनिए- मेरे पूर्वज पहले मुंगेली जमींदारी Mungeli Zamindari के जमींदार थे। यह जमींदारी 6 पुश्तों से उनके अधिकार में थी। सन् 1798 के लगभग नागपुर के राजा प्रथम रघुजी Raghuji के भाई नानाजी Nanaji जगन्नाथपुरी Jagannathpuri जाते हुए मुंगेली Mungeli आये। यहाँ उनके एक साथी ने जमींदार के भाई के घोड़े को जबरदस्ती पकड़कर लेना चाहा । इस पर झगड़ा हो गया।
बात बहुत बढ़ गई। फल यह हुआ कि जमींदार फतेसिंह Zamindar Fattesingh गिरफ्तार कर लिये गए और विचार के लिए रतनपुर भेज दिए गए। रतनपुर के सूबा केशो पंत Ratanpur Suba Kesho Pant ने उन्हें तोप से उड़वा  दिया और सारी जमींदारी जब्त कर दी, पर दूसरे वर्ष उनके परिवारवालों को मदनपुर तालुका Madanpur Talluka दिया गया और बाद में लोरमी-तालुका Lorami Talluka भी उन्हें प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् एक समय मेरे पिता संतोष सिंह Santosh Singh ने लोरमी से आकर मुंगेली को घेर लिया। उस समय अंग्रेजों का अधिकार हो चला था। मेरे पिता कैद कर लिये गए और कैदखाने ही में उनका स्वर्गवास हो गया। उस समय मैं आठ वर्ष का था। पीछे मुझे मदनपुर (कंतेली ) जमींदारी दी गई। यह जमींदारी रतनपुर के राजा कल्याणसिंह Kalyan Singh ने हमारे एक पूर्वज तरबरसिंह Tarabar Singh को दी थी।
जमींदार ठाकुर रणजीतसिंह Thakur Ranjeet Singh हैं। घराना इनका बडा पुराना है। कंतेली गाँव में एक प्राइमरी पाठशाला और डाकघर है।

चांपा Chanpa
क्षेत्रफल 105 वर्गमील, म.स. 32,637, जमींदार का पद दीवान, ग्राम संख्या 64। यह जमींदारी जिले के पूर्वी भाग में हसदो नदी के दोनों तटों पर फैली हुई है। कहते हैं यह जमींदारी वर्तमान जमींदार के अधिकार में 17 पीढी से है। इसका नाम पहले मदनपुर चौरासी Madanpur Chaurasi था और इसका सदर मुकाम मदनपुर के पुराने किले में था, जिसके खंडहर हसदो नदी के तट पर अब भी मौजूद हैं।
इस जमींदारी का विस्तार पहले अधिक था। इसमें कमी मराठों के समय में हुई। कैसे हुई, इसकी कथा यों है-रतनपुर के राजा बिंबाजी का मुहम्मद खां तारान Mohammad Khan Taran नामक एक खासगी सरदार था। यह 200 घुडसवार और 500 पैदल सिपाहियों का अफसर था। इसके काम से प्रसन्न हो राजा ने इसे अकलतरा Akaltara, लवन Lavan, किकरदा Kikarda, खरौद Kharaud और मदनपुर Madanpur, ये पाँच परगने Paragana इनाम में दिए। खाँ साहब इनाम पाये हुए परगनों पर अधिकार जमाने के लिए अपने. सिपाहियों सहित जांजगीर Janjgir में आ धमके । जांजगीर मदनपुर पगरना के अंदर था। मदनपुर के जमींदार छत्रसाल Chhatrasal को जब इसकी खबर लगी तो वे अपने दोनों लडकों सहित खाँ साहब के पास दौडे आये और पूछने लगे कि किन अपराधों के कारण मेरी जमींदारी छीनी गई है। महम्मद खाँ ने कहा कि मुझे ये सब बातें नहीं मालूम, आप राजा साहब से जाकर प्रार्थना कीजिए। बेचारे उनके पास गए। उत्तर मिला- परगने तो अब खाँ साहब को दे दिए गए हैं, सो वही इसका फैसला करेंगे। छत्रसाल खाँ साहब के पास फिर लौटे। तब उसने बडी दया करके सब अच्छे-अच्छे गाँव आप रख लिये और हसदो नदी के तट पर, जो 23 ठो रद्दी गाँव थे, छत्रसाल को दे दिए, उसी समय उसने मदनपुर चौरासी के उमरेली Umareli और कोठारी Kothari नामक दो वरहों कोरवा जमींदार को भी दिए। यह कोई सन् 1780 की बात है।
इस कथा की सत्यता में बहुत कम संदेह है। कोरबा जमींदारी में उमरेली और कोठारी बरहों अब भी चौबीसा Chaubisa के नाम से प्रसिद्ध हैं और यह  भी स्वीकार किया जाता है कि ये हमें बहुत पीछे मिले थे। इसके सिवा चांपा जमींदारी Champa Zamindari के तीन गाँव इस मसय भी जांजगीर के निकट हैं, जिनसे इस कथा की पुष्टता होती है। सन् 1885 में चांपा के जमींदार विश्वनाथ सिंह Vishwa Nath Singh ने इसी कथा के आधार पर अर्जी दी थी कि उसे 37 गाँव खालसा Khalasa के और 24 गाँव कोरबा के दिए जाएँ, पर कहना न होगा, इसका कुछ परिणाम न हुआ। सो सन् 1780 में केवल 23 गाँवों को लेकर चांपा जमींदारी रह गई, पर धीरे-धीरे उसने अच्छी उन्नति कर ली। सन् 1867 में उसके 44 गाँव हो गए और अब इस समय 64 गाँव हैं। जमींदार श्रीरामशरण सिंह Ramsharan Singh हैं।

छुरी Churi
रकबा 336 वर्गमील, मं. सं. 26,020, जमींदार का पद प्रधान, ग्राम संख्या 143 । यह जमींदारी कंवरान ने के नाम भी प्रसिद्ध है, क्योंकि यहाँ कंवरों की संख्या बहुत अधिक है । छुरी खास से 5 मील दूर कोसगई नामक पहाडी है। वहाँ धामधुरुवा Dhamghuruva नामक एक डाकू रहता था। उसे रतनपुर राजा के एक पहरेदार ने मार डाला और यह जमींदारी इनाम में पाई। तबसे यह उसी के घराने के अधिकार में हैं। कोसगईं Kosgai पहाडी पर जो किला है, कहते हैं उसे रतनपुर नरेश बहारसाय Bahar Sai ने 16वीं सदी में बनवाया था, पर लोग अब कहते हैं कि बहारसाय से बहुत पहले का वह किला बना हुआ है। बहुत संभव है कि वह चेदि राज्य के समय का हो और यहाँ से उतरते हुए रतनपुर के राजे छत्तीसगढ में आ घुसे हों।
हसदो नदी जमींदारी के बीच से बहती है। इस जमींदारी में लाख का बड़ा व्यापार होता है। कोसा के फल यहाँ से अन्य स्थानों को भेजे जाते हैं। कोसा का कपड़ा भी यहाँ अच्छा बनता है। जमींदार की नाबालिगी में उनके काका श्री गजेन्द्रपाल सिंह Gajendra Pal Singh कारोबार चलाते हैं।

मातिन Matin
रकबा 544 वर्गमील, म.स. 17,141, जमींदार का पद दीवान, ग्राम संख्या 109। यह दूसरी जमींदारी है, जिसका संबंध पेंडरा जमींदार परिवार से है। इस जमींदार के पुराने अधिकारी जाति के राजगोंड़ Rajgond थे, जिनके वंश अब भी सिरी नामक गाँव Siri Village में हैं। यह गाँव मातिन जमींदारी की वायव्य सीमा पर है। सिरी के राज-गोंड परिवार का कहना है कि हम यहाँ 22 पीढियों से निवास कर रहे हैं। जब उनकी चौरासी छिन गई थी, तब भी उनके पास 12 गाँवों का एक बरहों था। संवत् 1699 में उपरोड़ा जमींदार हिम्मत राय Himmat Rai के छोटे पुत्र कल्याण सिंह Kalyan Singh ने मातिन जमींदारी पर जबरदस्ती अपना कब्जा कर लिया, पर सिरी के तारफाना गोंड्ने ने शीघ्र ही उसे मार कर बदला चुकाया, पर रतनपुर के राजा राजसिंह ने कल्याणसिंह को ही वहाँ का अधिकारी करार दिया और तब से यह उसी के वंश में हैं।
मातिन जमींदारी उपरोड़ा जमींदारी से कई बातों में मिलती-जुलती है। यहाँ भी घने जंगल हैं और जलपवन खराब है। इस जिले के पटवारियों ने इस जमींदारी के संबंध में मशहूर कर रखा है-
जहर पिये न माहुर खाय।
मरे का होय तो मातिन जाय ॥
और यह है भी बहुत कुछ ठीक।
सन् 1795 में कप्तान ब्लंट Captain Blunt चुनारगढ से राजमहेंद्री Chunargarh to Rajahmundry की यात्रा करते समय इस जमींदारी के बीच होकर गए थे। उसने अपनी डायरी में इसके विषय में यों लिखा हैं, ''पश्चिमी बाजू पर कुछ ऊँची पहाि‍डि़यों की श्रेणियों को छोड़ते हुए आज हम पोंडी Pondi पहुँचे । यहाँ का कंवर अधिपति Kanvar Overlord मुझसे मिलने आया या यों कहिये एक गोरे मनुष्य को कौतूलहलवश देखने आया। संग में उसके पुत्र और पौत्र भी थे। ये दोनों बडे हट्टे कट्टे और डीलडौलवाले थे। फिर भी गोंडों के साथ इनकी समता नहीं हो सकती। हम दोनों एक दूसरे की ओर बहुत देर तक घूरते रहे। हम लोग आपस में बातचीत नहीं कर सकते थे, क्योंकि दोनों-दोनों की भाषा से अनजान थे। इतने में एक बैरागी फकीर Bairagi Fakir आया। वह जंगल-पहाडों में घूमा करता था। इसने दुभाषिये का काम किया। अधिपति के साथ वार्तालाप करके मुझे यह मालूम हुआ कि इन पहाड़ों छोटे-छोटे जिले हैं, जिन्हें चौरासी कहते हैं, पर ये नाम मात्र के चौरासी है। वास्तव में इनमें पंद्रह से अधिक गाँव नहीं हैं। ये सब मातिन परगना के भीतर हैं और मराठों को कर देते हैं। कर के रूप में बहुत ही ज्यादा अन्न वसूल किया जाता है। यदि कर बराबर नहीं दिया जाता तो मराठे बड़ी लूटपाट मचाते हैं। मैंने पूछा-क्या यहाँ पर कंवर या किसी जाति का स्वतंत्र राज्य कभी नहीं था? उत्तर मिला- यह भाग पहले बघेलखण्ड रीवाँ राजा  Baghelkhand Rinwa King के अधीन था, पर अनुमान 30 वर्ष हुए मराठों ने उसे भगा दिया। इस झगडे में यह देश गरीब और वीरान हो गए। वार्तालाप से कुछ अधिक लाभ मैं नहीं उठा सका, क्योंकि दुभाषिये को कंवर भाषा का बहुत ही कम ज्ञान था।
अंत में वृद्ध अधिपति ने जिसका ध्यान रामनगर-मोढ (स्टूल) की ओर बहुत था, उसकी बनावट के विषय में पूछताछ की और उत्तर पा लेने पर बिदा माँगी और चला गया। दोपहर से एक घंटा पहले हम लोग मातिन पहुँचे और ताती नदी Tati River  के तट पर डेरा लगाया। यहाँ से एक मील उत्तर एक बहुत ही मनोहर पहाडी थी, जिसे कंवर लोग मातिन देवी Matin Devi कहते थे। मैंने अपनी दुरबीन से देखा तो उसकी चोटी पर पताका फहराते पायी । पूछने पर मालूम हुआ कि वहाँ हिंदू देवी भवानी का स्थान है। होली के दिन थे, सो पहाडी लोग गा और नाच कर बडे गूँवारू ढंग से त्यौहार मना रहे थे। बाजा जो वे बजा रहे थे, उसे एक किस्म का आप नगाडा समझिए। यह मिट्टी के बर्तन पर चमडा छाकर बनाया गया था। वे इस बात को नहीं जानते थे कि इस त्यौहार की उत्पत्ति कब से हुई और इसका मतलब क्या है। उनमें इस बात को बतानेवाला कोई ब्राह्मण भी न था। मेरी समझ से तो वे नीच जाति के हिंदू थे। मैं उनकी निरक्षरता और विचित्र बोली के कारण उनके इतिहास, रहन-सहन और धर्म के विषय में कुछ पता न लगा सका।
यहाँ के जंगल में पहले हाथी पाये जाते थे और खेदा भी होता था, पर अब जंगल कम हो जाने के कारण इनका पता नहीं । जमींदार दीवान लालमणि सिंह Divan Kaxman Singh हैं। पसान में जहाँ ये रहते हैं, स्कूल, कांजीहाउस और डाक है।

पेंडरा (पेंड्रा) Pendra
रकबा 774 वर्गमील, मं. सं. 74,094 जमीदार की पदवी लाल, ग्राम संख्या 225 । रतनपुर नरेश के आश्रय में हिंदू सिंह और हिंदू सिंह नामक दो भाई रहते थे। उन्होंने एक दिन सड़क के किनारे पर एक बोरा भर द्रव्य पडे़ पाया। उसे वे राजा को दे आये। इस पर राजा साहब ने प्रसन्न हो उन्हें पेंडरा जमींदारी इनाम दे दी। यह बात संवत् 1551 की है। यह जमींदारी इस घराने में 11 पुश्तों से चली आ रही है। यही इसका पुराना इतिहास है। यह कहाँ तक सच है, कुछ कहा नहीं जा सकता।
प्राचीन समय में हिंदू सिंह Hindu Singh से बहुत पहले इस जमींदारी में आर्यों का निवास था। इस बात की पुष्टि धनपुर के खंडहरों The ruins of Dhanpur से होती है। ये अब भी उसके प्राचीन गौरव का स्मरण दिला रहे हैं। हिंदू सिंह सैकडों वर्ष पीछे हुआ। पंडरीबन Pandari Ban अर्थात् पेंडरा से हिंदू सिंह के वंश की बडी बढती हुई और 100 वर्ष के भीतर ही उसके वंशज केंदा Kenda, उपरोड़ा Uparoda और मातिन के अधिकारी बन बैठे। मराठों के समय में भी ये अपनी-अपनी जमींदारियों का उपभोग करते रहे, पर सन् 1798 में पेंडरा जमींदार पृथ्वीसिंह Pandara Zamindar Prithvi Singh पर मराठों की नाराजगी हुई। रतनपुर के सूबाने उसे राजधानी में बुला भेजा, परंतु वह नवागढ Navagarh और मुंगेली Mungeli के जमींदारों की दुर्दशा का हाल सुन चुका था, इसलिए नहीं गया। इस पर केशव गोविंद Keshav Govind सूवा ने जमींदारी जब्त कर ली और पृथ्वीसिंह Priyhvi Singh को तीर्थ यात्रा के बहाने भाग जाना पडा। पहले जमींदारी एक गोंड को दी गई, परंतु सन् 1804 में सोहागपुर Sohag purके जमींदार ने पेंडरा पर चढाई कर दी और गाँव में आग लगा दी। तब भोंसला तोपखाने के जमादार धनसिंह Dhansingh ने बैरियों को बडी वीरता से लडकर मार भगाया और इनाम में जमींदारी पा ली । पीछे सन् 1818 में जब कर्नल एग्न्यू Colonel Agnew छत्तीसगढ में आये, तब उन्होंने उसके पुराने अधिकारी अजीतसिंह Ajit Singh को जमींदारी सौंप दी। उन्होंने कहा कि पृथ्वीसिंह, जो अब मर चुका था, बिना काफी सबब के जमींदारी से निकाल दिया गया था और सिवा इसके अजीतसिंह बलवे के समय सरकार का भक्त बना रहा। तब से फिर पेंडरा जमींदारी इस घराने के अधिकार में है। सन् 1857-58 के सोहागपुरी बलवे के समय पेंडरा जमींदार ने अपने पुराने बैरी को दबाने के लिए अंग्रेजों को अच्छी सहायता दी थी। बलवे के पश्चात् अकरकंट की पवित्र पहाडी जो पेंडरा जमींदारी के भीतर थी, अंग्रेज सरकार ने निकाल ली और उसे रीवां नरेश को उनकी राजभक्ति और सेवा के बदले में दे दी। पेंडरा जमींदारी को इससे जो हानि हुई, उसे पूरा करने के लिए उसकी वार्षिक टकौली में 700 रुपये घटा दिए गए।
पेंडरा जमींदारी की जलवायु शीतल है। इसे बिलासपुर जिले की पंचमढी समझिए। गौरेला और पेंडरा के बीच मिस लांगड का क्षय रोगाश्रम Miss Langd's Tuberculosis Between Gorella and Pandara देखने योग्य है। जमींदारी इस समय कोर्ट ऑफ वार्ड्स उसके अधीन है।

पंडरिया Pandariya
रकबा 487 वर्गमील, मनुष्य सं. 63,820, जमींदार का पद ठाकुर (अब राजा) ग्राम संख्या 359 । यह जमींदारी मुंगेली तहसील में है। पहले इसका सदर मुकाम कामठी नामक गाँव Kamathi Village में था, जो इस समय जंगल के बीच में है। वहाँ प्राचीन बस्ती के चिह्न अब भी दिखाई देते हैं। पंडरिया जमींदारी की पूर्वी सीमा पर सेतगंगा Setganga नामक गाँव है । यहाँ एक अच्छा सा मंदिर है । कहते हैं यह मंदिर कामठी के सुंदर पत्थरों से बना है। इस जिले में पंडरिया ही एक ऐसी जमींदारी है, जो हैहयवंशियों के चौरासी के रूप में कभी नहीं रही। 36 गढो में इसका नाम नहीं है। कहते हैं कि पहले एक लोधी जमींदार गढा-मण्डला के राजा की आधीनता में इसका उपभोग करता था, पर सन् 1546 में उसने अपने स्वामी के विरुद्ध बलवा मचा दिया। अंत में उसे शामचंद-वर्तमान पंडरिया जमींदार के पूर्वज के हाथ हार खानी पडी। शामचंद Shamchand लांजी के राजा King of Lanji की अनुमति से वहाँ का जमींदार हो गया। पंडरिया जमींदारी उस समय मुकुतपुर प्रतापगढ Mukutpur Pratapgarh के नाम से प्रसिद्ध थी। दलसाय के, जो शामसिंह की सातवीं पीढी में हुआ, दो लड्के थे। एक पृथ्वीसिंह दूसरा महाबली । महाबली को सन् 1760 ई. के लगभग कवर्धा का राज्य मिला। कहते हैं- पंडरिया जमींदारी वर्तमान जमींदारी की 14 पीढी से इनके अधिकार में है। ये अपना रक्त संबंध मकडाई नरेश Makadai King से बताते हैं। इनका वैवाहिक संबंध सारंगढ नरेश Sarangarh King और फूलझर तथा कंतेली के जमींदारों से है। सहसपुर जमींदारी Sahaspur Zamindari के अधिकारी भी पंडरिया परिवार के हैं।
हैहयवंशियों की पुरानी जमाबंदी Zamabandi Kitab की किताब से मालूम हाता है कि प्रतापगढ (पंडरिया) उनका करद-राज्य था, पर सच पूछिये तो इस जमींदारी का संबंध गढ-मंडला Gadh Mandala से ही अधिक था। कप्तान ब्लन्ट सन् 1795 में लिखते हैं कि प्रतापगढ के गोंड और रतनपुर के मराठों से सदा लडाई हुआ करती है। सन् 1818 में जब नागपुर के अप्पा साहब भाग निकले और चहुँ ओर उपद्रव होने लगे, तब पंडरिया जमींदारी के भी बिगड खडे होने के ढंग दीख पडते थे। बलवे के समय भी इस पर सोहागपुर के बलवाइयों के साथ संबंध रखने का संदेह किया गया था। यही कारण है कि जब करदराज्यों के हकों का फैसला हुआ, तब यह रियासत न मानकर जमींदारी मान ली गई।
पंडरिया एक अच्छी जमींदारी है। कुर्मी और क्षत्रिय यहाँ अधिक पाये जाते हैं। जमींदार श्री रघुराजसिंह Raghuraj Singh को गत वर्ष राजा की पदवी मिली है।

लाफा Lafa
रकबा 359 वर्गमील, म. संख्या 16,357, जमींदार का पद दीवान, ग्राम संख्या 86। यह जमींदारी रतनपुर के उत्तर दिशा में फैली हुई है। लाफा का गढ, पाली का मंदिर Pali Tample और तुमान के खंडहर Ruins of tuman ये इसके प्राचीन वैभव हैं। इसका प्राचीन इतिहास नहीं मिलता। जमींदार परिवार का कथन है कि हम असल क्षत्रिय हैं और हमारा आगमन 1000 वर्ष से भी अधिक हुए दिल्ली से हुआ था। सबूत के लिए ये एक ताम्रपत्र पेश करते हैं। इस ताम्रपत्र में लिखा है कि राजा पृथ्वीदेव को 120 गाँव प्रदान करते हैं। ताम्र पत्र में संवत् 806 की मिती पडी है। इसके अनुसार लाफा जमींदारी इस घराने के अधिकार में 1173 वर्ष से है। रायबहादुर हीरालाल साहब इस ताम्रपत्र को सच्चा नहीं मानते । मृत जमींदार का कथन था कि यह जमींदारी उसके वंश में 21 पुश्तों से चली आ रही है, जबकि उसका पिता केवल 16 पुश्तों का दावा करता था पर ये दोनों आँकडे गलत हैं और यदि ये सच भी मान लिया जाए तो 1173 वर्ष की लंबी अवधि को 21 या 16 पुश्तों में बाँट कर अपनी बातों पर लोगों का विश्वास नहीं जमा सकते ।
लाफा जमींदारी में जंगल-पहाड अधिक है । निवासी अधिकतर मांझी Manjhi, महतो Mahato, बिंझवार Binjhwar और धनुहार Dhanuhar जाति के हैं।
लाफा जमींदार Lafa Zamindar से होती हुई एक सड्क रतनपुर चली गई है । इसी रास्ते से प्राचीन समय में मिरजापुर Mirjapur तक व्यापार होता था। इस जमींदार में लोहा बहुत मिलता है, जिससे बहुत से अघरियों Agariyas की गुजर-बसर हो जाती है। यहाँ की मुख्य पहाडियाँ चित्तौडुगढ (जिस पर लफाका किला है) पलमा Palama और घितोरी Ghitori हैं। कामकाज दावानिन गनेश कुंवारि Naresh Kunvari देखती हैं। इस कड़ी को क्लिक करके विलास वैभव Bilaspur District Gazeteer मुख्‍य पृष्‍ट पर वापस जायें ..

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