दिल्‍ली में दुष्‍यंत नें बिरसा मुंडा के स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन को पंडवानी में किया प्रस्‍तुत, दर्शकों को किया मुग्‍ध

नई दिल्‍ली, भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय की स्वायत्त संस्था संगीत नाटक अकादमी द्वारा 16, 17 एवं 18 अगस्त 2019 को 'रंग स्वाधीनता' नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें प्रदर्शनकारी कलाओं के माध्यम से भारतीय स्वाधीनता का पर्व मनाया गया। उक्त कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों यथा महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश ,राजस्थान, पंजाब , छत्तीसगढ़ सहित विभिन्न राज्यों के लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराने में जिन भी महापुरुषों का योगदान रहा, उनके उस योगदान को इन प्रदर्शन कलाओ के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत किया। जिसमे आल्हा गायन, ढाढ़ी गायन, सारंगी जोगी, ढिमरयाई, पोवाड़ा, सूफी गायन, कव्वाली सहित अनेक विधा में मोहक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए।

इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के युवा एवं यशश्‍वी पंडवानी गायक दुष्यंत द्विवेदी को भी आमंत्रित किया गया था। दुष्यंत ने 17 अगस्त की शाम दिल्ली स्थित मेघदूत थियेटर में बिरसा मुंडा के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में योगदान एवं उनके द्वारा आदिवासी समुदाय को ब्रिटिश सरकार के जुल्म, शोषण और अत्याचार के खिलाफ जागरूक करने के कार्य पर आधारित इतिहास को जीवंत गायन के रूप में पंडवानी गायन के माध्‍यम से मोहक और आकर्षक अंदाज में प्रस्तुत किया गया। जिसेे उपस्थित दर्शकों ने खूब सराहा।

आप सभी को ज्ञात ही होगा कि पंडवानी गायन का मूल आधार महाभारत की कथा होती है, किन्‍तु छत्‍तीसगढ़ के पंडवानी गायक दुष्यंत ऐसे लोक कलाकार हैं जो छत्‍तीसगढ़ की प्रसिद्ध प्रदर्शनकारी कला पंडवानी के माध्‍यम से स्वामी विवेकानंद एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जीवनी सहित स्वच्छता अभियान जैसे जनहितकारी विषयों पर पंडवानी गायन प्रस्‍तुत करते हुए इस विधा को एक नया आयाम दिया है। दुष्यंत द्विवेदी प्रदेश के एक मात्र युवा पुरूष पंडवानी गायक हैं जो कि स्व. झाड़ूराम देवांगन की वेदमती शैली (संपादक पंडवानी के किसी भी शैली से सहमत नहीं है, उसके अनुसार पंडवानी सिर्फ पंडवानी है) में पंडवानी गायन करतें हैं। पंडवानी गायन के लिये दुष्यंत द्विवेदी को सन 2016 के संगीत नाटक अकादमी के द्वारा उस्ताद बिस्मिल्लाह खा युवा पुरस्कार से पुरस्कृत भी किया है। इस पुरस्‍कार के संबंध में दुष्‍यंत उदारतापूर्वक स्‍वीकारते हैं कि स्व. पद्मश्री पुनाराम निषाद और पद्मविभूषण तीजन बाई नें इसके लिए अनुसंशा की थी।

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