जवाहरलाल नेहरू : जीवन झांकी

जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर, 1989 को हुआ था। उनके कुल का उपनाम नेहरू कैसे पडा, इस विषय में उन्होंने अपनी आत्मकथा (Autobiography) में लिखा है : 'राज कौल ( Raj Kaul forefather उनके पूर्वज) को एक नहर (Canal) के किनारे पर स्थित एक हवेली जागीरी में दी गई थी और इस निवास स्थान से ही 'नेहरू' (नहर से From the canal) उनके नाम के साथ जुड़ गया। उनका पारिवारिक नाम (Family name) कौल था। यह बदलकर कौल नेहरू हो गया और परवर्ती वर्षों में मात्र नेहरू रह गया।' उनके पिता मोतीलाल नेहरू (Motilal Nehru) बहुत पहले कानपुर से इलाहाबाद चले गये थे जहां उन्होंने स्वयं के लिये अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। व्यवसाय से वे एक वकील थे और अपने अथक परिश्रम से उन्होंने स्वयं को एक नामी वकील के रूप में स्थापित कर लिया। वे एक प्रबुद्ध शिक्षित व्यक्ति थे और वे पश्चिमी जीवन शैली का अनुसरण करते थे।

जवाहरलाल की माता स्वरूप रानी (Swarup Rani) भारतीय नैतिकता और मूल्यों में शिक्षित थी। जवाहरलाल के ही शब्दों में ''उन्होंने उन्हें अत्याधिक स्नेह एवं प्यार दिया।" समृद्ध दम्पती के वैवाहिक जीवन के ग्यारह वर्षों बाद जन्मे पुत्र के रूप में जवाहर का लालन पालन अत्याधिक समृद्धि में हुआ।

फारसी और अरबी के ज्ञाता मोतीलाल चाहते थे कि उनका पुत्र स्वयं उन्हें प्राप्त हो चुकी पारम्परिक और सांस्कृतिक शिक्षा से अधिक शिक्षा प्राप्त करे। अत: स्वाभाविकत: उन्होंने अपने पुत्र को पश्चिमी शिक्षा ही देनी चाही। उन्हें तथा उनकी दो बहनों विजय लक्ष्मी पंडित (Vijay Laxmi Pandit) और कृष्णा (Krishna) को घर में ही शिक्षित करने के लिये निजी शिक्षक और गवर्नस नियुक्त कर दी गई। मोतीलाल नेहरू की पश्चिमी शिक्षा के प्रति ललक को देखकर श्री बी.आर. नन्दा (B.R.Nanda) ने जवाहरलाल नेहरू की जीवनी में लिखा है : "संभव है मोतीलाल ने यह निर्णय कुछ अपने अभिजात्य अहं, कुछ अंग्रेजी-मोह से प्रेरित पूर्वाग्रहों एवं कुछ यह सोच कर लिया हो कि वे अपने बच्चों को सर्वोत्तम और सर्वाधिक व्ययशील शिक्षा दिलाने में समर्थ है।'' (जवाहरत्नाल नेहरू, एन आटोबायोग्राफी - आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1982 पू.)  जिन निजी शिक्षकों ने जवाहर लाल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी, उनमें एक थे फर्डिनान्डे टी. ब्रुक्स, जो एक थियोसोफिस्ट थे। ब्रुक्स के माता-पिता फ्रांसीसी और आयरिश थे। मोतीलाल को इनके माम की संस्तुति एनी बेसन्ट ने की थी। वह एक कुशाग्र बुद्धि युवक था जिसने जवाहरलाल में अध्ययन के लिये अदम्य रुचि पैदा की । नेहरू ने स्कॉट डिकिन्स एवं थैकरे के उपन्यास, एच.जी. वेल्स की रूमानी कृतिया और मार्क ट्वेन और शरलाक होम्स की कहानियों का अध्ययन किया । ब्रुक्स ने इतिहास के अतिरिक्त उनमें प्रकृति विज्ञानों के प्रति रुचि भी पैदा की । आनन्द भवन के परिसर में ही वैज्ञानिक प्रयोगों के लिये एक प्रयोगशाला बनाई गई थी। इस प्रकार जवाहरलाल को ज्ञान लोक का सही समय पर सही परिचय प्राप्त हुआ ।

ब्रिटेन यात्रा
जब घर पर अध्यापकों द्वारा शिक्षण को अपर्याप्त समझा गया तो मोतीलाल नेहरू ने बालक नेहरू का इंग्लैंड के एक पब्लिक स्कूल में दाखिला करा दिया। अत: 1905 में वे अपने परिवार के साथ इंग्लैंड गये और उन्होंने पन्द्रह-वर्षीय जवाहरलाल को हैरो में प्रवेश करा दिया। जवाहरलाल ने हैरो में लैटिन का परिशीलन किया। जवाहरलाल की विश्व-कोशीय मेघा थी और इसलिये उनकी पठनगत रुचियां बहुत व्यापक थीं । उनका सामान्य ज्ञान बहुत ही अच्छा था। उन्होंने गहरी रुचि से आस पास घट रही राजनीतिक घटनाओं पर भी गौर किया। राजनीति के अतिरिक्त वे विमानन के प्रारंभिक विकास के प्रति आकर्षित थे क्योंकि उन दिनों राइट बन्धुओं की ही सर्वत्र चर्चा थी।

जिन दिनों जवाहरलाल इंग्लैंड में थे, भारत में स्वतंत्रता संघर्ष तेज होता जा रहा था । बंगाल-विभाजन, स्वदेशी आन्दोलन और लाला लाजपत राय और सरदार अजीत सिंह के देश से निष्कासन के समाचारों ने उनके मस्तिष्क को काफी उद्वेलित कर दिया । वे भारत से आये अपने मित्रों और सम्बन्धियों से प्राय: देश की राजनीतिक घटनाओं पर चर्चा किया करते । उन्हें हैरो और उसकी बौद्धिक परिधि अपने राजनीतिक अथवा अन्य विचारों की अन्योन्यक्रिया और अभिव्यक्ति के लिये बहुत संकरी ल्काने लगी । इसलिये उन्होंने दो वर्षों बाद अपने पिता की अनुमति से हैरो छेड़ दिया और अक्तूबर, 1907 में सतरह वर्ष: की आयु में ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्बिज में प्रवेश लिया।

कैम्बिज में ही बौद्धिक अनुसंधान के लिये जाग्रत हो चुकी उनकी जिज्ञासा को बड़ा प्रोत्साहन मिला। यद्यपि उन्होंने रसायन विज्ञान, भू विज्ञान और वनस्पति विज्ञान जैसे विषय लिए थे, किन्तु उन्होंने अर्थशास्त्र, इतिहास और साहित्य का भी गहरा अध्ययन किया। जवाहरलाल को जिन पुस्तकों ने राजनीतिक दृष्टि से प्रभावित किया, उनमें मेरे - डिथ - टाउन - सेन्ड की '' एशिया एण्ड योरूप'! भी एक है । कैम्बरिज में उनका सारा समय अध्ययन, खेलों और मनोविनोद में व्यतीत होता था। किन्तु बालगंगाधर तिलक (Balgangadhar Tilakऔर अरविन्द घोष (Arvind Ghosh) के नेतृत्व में चल रही राजनीतिक उथल पुथल से उनका मानस आन्दोलित हो उठा। उन दिनों जवाहरलाल की सहानुभूति आतिवादियों के साथ अधिक थी। कैम्बिज में भारतीय विद्यार्थियों द्वारा गठित मजलिस भारत में चल रही राजनीतिक उथल पुथल पर चर्चा करने का एक अच्छा मंच सिद्ध हुआ। वे प्राय: मजलिस में भाग लेते थे किन्तु यदा कदा ही वहां बोलते थे। ऐसा विशेष रूप से इसलिये था कि वे स्वभाव से ही ''शर्मीले और अडियल'' थे।

जवाहरलाल के लिए भी किसी अन्य महत्वाकांक्षी शिक्षित और प्रबुद्ध युवक की तरह कैम्बिज स्पृहणीय सिविल सेवा ज्वाइन करने के लिए कमानी की तरह हो सकती थी परन्तु लगता है कि विदेशी शासन के अधीन सुखद, अरामदेह और सुरक्षित भविष्य की सम्भावनाएं उनको आकर्षित नहीं कर पाईं। अंततोगत्वा उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा में न बैठने का निर्णय किया और कानून में प्रवेश लिया। इस प्रकार अपनी अंतिम प्रावीण्य परीक्षा से पहले ही उन्होंने ''इनर टेम्पल'' ज्वाइन कर लिया था। कानून के पेपरों में अधिक समय नहीं लगा और जवाहरलाल कानून की एक के बाद दूसरी परीक्षा पास करते गये जैसाकि उन्होंने स्वयं लिखा है इसके दौरान न तो उनकी विशेष योग्यता प्रदर्शित हुई और न अपकीर्ति ही फैली।

जवाहरलाल भारत लौटने से पहले थोडे दिनों लन्दन स्कूल ऑफ इंकानामिक्स (London school of economics) में भी रहे। उनके भारत लौटने से पहले के इन दो वर्षों के दौरान वे थोडा बहुत फेबियन और समाजवादी विचारों की तरफ आकर्षित हुए थे। 1910 की गर्मियों में आयरलैंड की एक यात्रा के दौरान वह 'सिन फेन Sin fen'' आन्दोलन से भी प्रभावित हुए ''वास्तव में भारत में उस आन्दोलन की समानान्तरता स्पष्ट थी और प्रतीत होता है कि (जवाहरलाल की आयरलैंड की यात्रा और इनकी राजनीति की सूझ-बूझ ने उनकी अतिवादियों के प्रति सहानुभूति को बढावा दिया ।' जवाहर लाल राजनीतिक रूप से समाजवाद की ओर सम्मान और कुछ-कुछ अतिवादिता के पुट के साथ 1912 की गर्मियों में उस समय भारत आये जब स्वतंत्रता आन्दोलन नरम और गरम दलों के बीच बंटा हुआ था।

भारत वापसी
इंग्लैंड से 1912 में वापस आने पर जवाहरलाल ने अपने पिता के जूनियर के रूप में इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) में वकालत शुरू की | सात साल विदेश में रहने के बाद शुरू के महीनों में इन्होंने पुराने संबंधों को पुन:स्थापित करने में बिताया तथापि व्यवसाय की नीरस और उबाऊ मांगों से धीरे-धीरे वह खिन्न हो गये । भाग्यवश, घर का वातावरण पर्याप्त अनुकूल था। इस पृष्ठभूमि में उन्होंने कांग्रेस की गतिविधियों में भाग लेने के लिए कांग्रेस ज्वाइन करने का निर्णय किया। जब भारतीय मजदूरों के लिए फिजी अनुबंध "प्रणाली अथवा दक्षिण अफ्रिकी भारतीय प्रश्न जैसे विशेष अवसर आये तो वे उनमें डूब गये और उन्होंने लगन और निष्ठापूर्वक कार्य किया । इस प्रकार पूरी निष्ठा और उत्साह से अपने कार्यों में संलग्नता, विदेश नीति और अंतर्राष्टीय संबंधों के प्रति उनकी गहन रुचि का संकेतक थी जो बाद में कांग्रेस पार्टी के स्वतंत्रता संग्राम (Freedom Struggle) की खेवनहार बनी ।

जहां राजनीति और वकालत ने उन्हें व्यस्त रखा उनके बीच भी उन्होंने पढने, घूमने और शिकार के लिए समय निकाला। 8 फरवरी, 1916 को बसंत पंचमी के दिन, जो  भारत में बसंत के आगमन का पूर्व सूचक है कश्मीरी मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार की एक सत्रह वर्षीया युवा लडकी कमला कौल (Kamala Kaul) के साथ विवाह हो गया । चूंकि मोती लाल नेहरू ने दुल्हन का चुनाव स्वयं किया था इसलिए यह विवाह मां-बाप की सहमति से हुआ था।

राजनीति में प्रवेश
लोकमान्य तिलक (Lokmanya Tilak) के जेल से छूटने पर भारत के राजनीतिक आन्दोलन में एक उग्र मोड आया। जवाहर लाल ने तिलक और श्रीमती ऐनी बेसेंट (Anne Besant) द्वारा शुरू की गयी ''होम रूल लीग Home rule league'' ज्वाइन कर ली। 1916 के क्रिसमस के दौरान लखनऊ कांग्रेस में उनका परिचय महात्मा गांधी से भी हुआ था। तथापि उन्होंने 1915 में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन (Bombay session of the Indian National Congress) में गांधी जी को देखा था । दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की घृणित प्रथा के विरुद्ध गांधी जी की लडाई से वे काफी प्रभावित थे। यद्यपि गांधी जी के राजनीतिक दर्शन से कुछ हद तक हैरान थे फिर भी जवाहरलाल उनके व्यक्तित्व और व्यावहारिक राजनीतिक समझबूझ से अभिभूत थे। वे विशेष रूप से जमींदारी आंदोलन (Zamindari movement) से प्रभावित थे जिसका नेतृत्व गांधी जी ने बिहार में 1917 में किया था। युवा नेहरू को उनकी जो बात सबसे अच्छी लगी वह थी गांधी जी की शक्ति, भारत की स्वतंत्रता के प्रति उनकी चट्टान सी सुदृढता और वह तरीका जिससे उन्होंने अपने चरित्र-व्यक्तित्व का निर्माण किया था ताकि भारत में राजनीतिक परिवर्तन के प्रभावी तंत्र की तरह स्वयं को ढाल सकें।

प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात भारत में स्वायत्त सरकार के संबंध में राजनीतिक आशाएं बढ गई थीं । किन्तु इन बढती हुई आशाओं पर उस समय तुषारापात हो गया जब ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी और क्रूरता भरा रालेट बिल पास किया। इसके विरोध में महात्मा गांधी के आह्वान पर सत्याग्रह (Satyagraha) के रूप में सारे भारतवर्ष में भारी विरोध और प्रदर्शन हुए। पंजाब में अमृतसर में जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh) में नरसंहार की भयावह घटना घटी । इन सब घटनाओं से जवाहरलाल इतने अधिक आन्दोलित हुए कि उन्होंने वकालत छोड़ दी और उनकी जीवन शैली का कायापलट हो गया। वे कांग्रेस के सक्रिय सदस्‍य बन गये। जीवन में आराम को छोड़कर वे गांधी जी के सिपहसालार बन गये।

इस उग्र स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उनका पत्रकारिता (Journalism) के प्रति भी लगाव था। इलाहाबाद के प्रमुख नरमपंथी अखबार 'दि लीडर The leader'' से असंतुष्ट मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद से 1919 के प्रारम्भ में एक दूसरा दैनिक पत्र 'दि इंडिपेंडेंट The independent'' शुरू किया। जवाहरलाल इसके निदेशकों में से एक थे। फरवरी, 1920 में जवाहरलाल नेहरू ने बहादुर गंज में इलाहाबाद जिला सम्मेलन में भाग लिया तथा जुलाई में वे इलाहाबाद जिला कांग्रेस समिति (Allahabad District Congress Committee) के उपाध्यक्ष चुने गए।

उन्होंने उत्तर प्रदेश के आंतरिक इलाकों का दौरा किया जिससे उन्हें भारत के गांवों की गरीबी के संबंध में जानकारी मिली। उन्होंने राजनीतिक संघर्ष के रोमांच तथा व्यथा का अनुभव किया था। इन वर्षों के दौरान वे कई बार जेल गए, जिसका उन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। उनकी जीवन शैली गंभीर तथा उनका दृष्टिकोण सुधारवादी हो गया।

पुन: यूरोप में
फरवरी, 1922 में चौरी-चौरा (Chauri chaura) की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil disobedience movement) को जारी न रखने का निर्णय लिया। कुछ वर्षों के लिए स्वतंत्रता आंदोलन की गति मंद पड गई। इस गतिरोध के दौरान: मार्च, 1926 में अपनी पत्नी कमला तथा 8 वर्षीय पुत्री इंदिरा (Indira) के साथ उन्होंने बंबई से 'स्विटजरलैंड के रास्ते वेनिस के लिए प्रस्थान किया। विदेश जाने का मूल प्रयोजन अपनी पत्नी का उपचार करवाना था, जिन्हें यक्ष्मा हो गया था । जेनेवा में रहते हुए उन्होंने बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत किया। वे तीन कमरों के अपार्टमेंट में रहते थे।

कमला नेहरू की बहुत अच्छी चिकित्सा होने के बावजूद स्विटजरलैंड में उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। धन उनके लिए कोई बाधा नहीं थी क्योंकि मोतीलाल नेहरू अपनी बहू के उपचार के लिए जितने अधिक धन की आवश्यकता थी उसे खर्च करने के संबंध में काफी उदार थे। जवाहरलाल अपनी पत्नी के गिरते हुए स्वास्थ्य से काफी चिंतित थे तथा उन्होंने अत्याधिक अध्ययन में शांति तथा आराम पाया। अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीति के केन्द्र जेनेवा ने उन्हें बहुत आकर्षित किया। इससे उन्हें भारत में चल रही राजनीतिक गतिविधियों को आंकने का अवसर भी मिला। इस संबंध में अंतर्राष्‍ट्रीय तथा राष्‍ट्रीय राजनीति को साथ-साथ रखकर जवाहरलाल ने भारत के संबंध में अपना एक अलग दृष्टिकोण बनाया। ये वे वर्ष थे जब उनके विश्व संबंधी दृष्टिकोण तथा राजनीतिक चिंतन के बीज पडे़ जिनसे वे परवर्ती वर्षों में आंतरिक तथा बाहरी विश्व के संदर्भ में राष्ट्र की नियति के कर्णधार बने।

1926 के अंत में बर्लिन की एक लघु यात्रा में उन्हें फरवरी, 1927 में ब्रुसल्स में पददलित राष्टों की प्रस्तावित कांग्रेस के संबंध में पता चला । इस विचार ने उन्हें तत्काल आकर्षित किया। लैटिन अमरीका तथा यूरोप में के लिए सुधारवादी नेताओं की इस असाधारण बैठक के लिए जवाहरलाल, नेहरू को कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया । नेहरू पर ब्रुसत्स कांग्रेस के व्यापक प्रभाव के संबंध में, माईकल ब्रेखर ने रूप से लिखा:
'ब्रुसल्स कांग्रेस नेहरू के राजनीतिक चिंतन विशेषतया उनकी समाजवादी प्रतिबद्धता तथा अंतर्राष्टीय दृष्टिकोण के विस्तार के लिए एक मील का पत्थर सिद्ध हुई। यहां पहली बार वे एशिया तथा अफ्रीका के कट्टर साम्यवादियों, वामपंथी समाजवादियों तथा उदारवादी राष्ट्रवादियों के संपर्क में आए। यह वही स्थान था जहाँ पर राष्टीय स्वतंत्रता एवं सामाजिक सुधार के ध्येय किसी अज्ञात कारण से उनकी भावो राजनीतिक विचारधारा में समाविष्ट हो गए । यहीं पर अफ्रीकी-एशियाई में परस्पर सहयोग के विचार ने आकार ग्रहण किया । वस्तुत: 1955 का बडंग सम्मेलन ब्रुसल्स में लगभग 30 वर्ष पहले जन्मे एक विचार की परिणति के रूप में देखा जाना चाहिए।"
ब्रुसत्स सम्मेलन में जवाहरलाल पहली बार जार्ज लांसबरी, अलबर्ट आइंस्टीन, रोमां रोल्स तथा मदाम सन यत सेन जैसे अंतर्राष्टीय ख्याति प्राप्त व्यक्तियों के संपर्क में आए थे । कांग्रेस ने औपनिवेशक तथा आश्रित देशों की समस्याओं को समझाने में उनकी सहायता की। बाद में जब कमला नेहरू के स्वास्थ्य में सुधार हुआ तो जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पत्नी के साथ फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी तथा इटली की लघु यात्रा की। इन यात्राओं से उन्हें मदाम भीखाजी कामा, एम.एन. राय, वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, मौलवी ओबेदुल्ला राय, वीरिन्द्रनाथ जैसे अनेक भारतीय क्रांतिकारियों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ।

अपनी यूरोप यात्रा के अंतिम चरण में जवाहरलाल अपनी पत्नी, बहन कृष्णा तथा उस वर्ष ग्रीष ऋतु में . यूरोप आए अपने पिता के साथ नवम्बर, 1927 में मास्को पहुंचे । उनकी सोवियत संघ की चार दिवसीय यात्रा से उनके मानस पर एक अमिट छाप पडी ।

इससे वे रूसी लोगों की कार्यपद्धति, समाजवादी व्यवस्था तथा समाज से परिचित हुए। वे दिल्ली में अंग्रेज अधिकारियों के मोटे वेतन, भौतिक सुख तथा ठाट-बाट की तुलना में सोवियत अधिकारियों तथा कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की सादगी को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। स्टेट ओपरा हाउस की यात्रा पर वे दर्शकों, जिनमें अधिकतर साधारण कामगार थे की साधारण ड्रैस देखकर आश्चर्यचकित हो गए थे।

उनकी पत्नी का स्वास्थ्य यद्यपि पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ तथापि उसमें पर्याप्त सुधार हुआ था ! इसलिए यूरोप में उनका कोई काम शेष नहीं था । वे स्वयं भी लम्बी छुट्टी के बाद शारीरिक तथा मानसिक रूप से काफी स्वस्थ महसूस कर रहे थे। उनकी विदेश यात्राएं, विशेषतया ब्रुसेल्स कांग्रेस सम्मेलन में उनका भाग लेना तथा तत्पश्चात् उनकी मास्को यात्रा से उन्हें विश्वास हो गया कि भारत के लिए समाजवादी समाज की आवश्यकता है।

इस प्रकार के मनोभाव के साथ जवाहरलाल दिसम्बर, 1927 में अपने परिवार सहित भारत के लिए रवाना हुए । स्वतंत्रता संघर्ष की तीव्रता जो उनके यूरोप जाने के समय कम हो गई थी नवम्बर, 1927 में साइमन कमीशन के आगमन से पुन: उग्र हो गई । दिसम्बर, 1927 में जवाहरलाल मद्रास उस सुअवसर पर पहुंचे जब वहां कांग्रेस का अधिवेशन किया जा रहा था।

' भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता अथवा डोमीनियन दर्जा दिए जाने के विवाद को जवाहरलाल ने एक नई दिशा दी जब उन्होंने मद्रास में कांग्रेस की बैठक में 27 दिसम्बर, 1927 को उस प्रसिद्ध प्रस्ताव को प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया था कि 'कांग्रेस कर्ती है कि भारतीय जनता का ध्येय पूर्ण राष्टरीय स्वतंत्रता होगी।' प्रस्ताव वस्तुत. क्रांतिकारी था। उस समय जब अधिकांश कांग्रेसी नेता स्वतंत्रता संघर्ष के लिए शनै:वाद ही से सन्तुष्ट थे, पूर्ण राष्टरीय स्वतंत्रता के लिए यह आहवान एक चौंकाने वाली बात थी ।

जवाहरलाल ने इसे और बल देने के लिए युवकों, किसानों और मजदूरों का आहवान किया । 1928 की शरद ऋतु में वह अखिल भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष (President of All India Youth Congress) चुने गए । उनकी संगठनात्मक क्षमता को मान्यता देते हुए दिसम्बर, 1928 के उत्तरार्द्ध में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन (Congress session in Calcutta) में उन्हें कांग्रेस के महासचिव (Congress General Secretary) के रूप में पुन: नियुक्त किया गया । अगले वर्ष सितम्बर में वह सर्वसम्मति से कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए । जवाहरलाल के कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए चुने जाने पर महात्मा गांधी ने टिप्पणी करते हुए कहा: ''उनमें अदम्य साहस है। देश प्रेम उनके लिए सर्वोपरि है । यदि उनमें एक योद्धा का जोश और हठ है तो उनमें एक राजनेता की दूरदर्शिता भी है। अनुशासनप्रिय होने के कारण वे उसका कठोरता से पालन करते हैं वे स्फटिक के समान स्वच्छ और निस्संदेह एक सच्चे व्यक्ति हैं। निश्चित रूप से वे एक सच्चे योद्धा हैं । राष्ट्र उनक हाथों में सुरक्षित है।''

दिसम्बर, 1929 के अन्त में लाहौर में हुए कांग्रेस के ऐतिहासिक अधिवेशन में पुत्र ने पिता से पदभार लिया। जवाहरलाल का समाजवादी रूप कांग्रेस के इस अधिवेशन में सार्वजनिक रूप से मुखर हुआ । किन्तु व्यावहारिक और सौम्य जवाहरलाल अपने निजी विचारों के समक्ष झुके नहीं। वे जानते थे कि उस समय भारत में जो परिस्थितियां थीं व पूर्ण समाजवादी कार्यक्रम अपनाने के अनुरूप नहीं हैं। इसीलिए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्ण स्वतंत्रता के आह्वान को दोहराया। पूर्ण राष्‍ट्रीय स्वतंत्रता (Complete national independence) के प्रस्ताव को दोहराया गया और कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में 31 दिसम्बर, 1929 की आधी रात को इसे पारित किया गया। रावी (Ravi) के किनारे स्वतंत्रता का ध्वज (Flag of freedom) फहराया गया जिसने जवाहरलाल को राष्‍ट्रीय राजनीति में अग्रणी नेता बना दिया।

पूर्ण राष्‍ट्रीय स्वतंत्रता के आहवान ने संपूर्ण देश को झकझोर कर रख दिया। इसने विदेशी दासता से राष्टीय मुक्ति का नारा बुलंद कर दिया। इसी संबंध में गांधी जी ने नमक सत्याग्रह करने का निर्णय लिया जो सविनय अवज्ञा का एक अनोखा तरीका था। अत: उन्होंने 12 मार्च, 1930 को अपने अहमदाबाद के साबरमती आश्रम (Sabarmati Ashram) से दांडी (Dandi) के लिए जेबी पैदल-यात्रा शुरू की। इस लंबी पैदल यात्रा में पूरा राष्ट्र उमड पडा। इस दृश्य से जवाहरलाल इतने अधिक अभिभूत हुए कि वह और मोतीलाल दोनों महात्मा की पैदल यात्रा में शामिल हो गए। दांडी मार्च के महत्व के बारे में बोलते हुए जवाहरलाल ने कहा : 'आज यह यात्रा अपने लंबे सफर पर निकल पडी है। महान संकल्प की ज्वाला उनके दिल में है और अपने दुखी देशवासियों का अटूट प्रेम उनके हृदय में है। सच्चाई की ज्वाला और स्वतंत्रता की प्रेरणा उनके दिल में है। जो भी उनके संपर्क में आता है उनसे प्रभावित हो जाता है और साधारण मनुष्य उनसे प्रेरणा लेता है।''! मोतीलाल नेहरू ने अपना आलीशान घर आनंद भवन राष्ट्र को समर्पित कर कांग्रेस को दे दिया। इसका नाम रखा गया स्वराज भवन (Swaraj Bhawan) अर्थात् स्वतंत्रता भवन। यह त्याग की महान गाथा है। नेहरू की जय और पराजय स्वतंत्रता संग्राम के उतार-चढाव के इतिहास और राष्‍ट्रीय भाग्य में अनुस्यूत हो गई। जेल, जहां उन्होंने 1930 और 1935 के बीच चार वर्ष बिताए, जवाहरलाल का घर बन गया।

साहित्य की ओर रुझान
कारावास के एकाकीपन से उन्हें चिंतन, आत्म-मंथन और विगत घटना चक्र पर मनन करने के अवसर के साथ-साथ स्वाध्याय के लिये भी काफी समय मिल जाता । उनकी सरल और प्रवाहमयी लेखनी और प्रखर एवं प्रबुद्ध मानस ने ''ग्लिम्पसिज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री Glimpses of world history' (1934), "लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू ए डाटर Letters from a father to a doctor" (1929) और ''आटोबायोग्राफी'' (1936) जैसी कुछ गौरव कृतियों का सृजन किया । इनके अतिरिक्त, उन्होंने अनेक लेख, निबंध और भाषण लिखे जो दो संग्रह -- ''रिसेन्ट एसेज एंड राइटिंग्स Recent Essays and Writings" (1934) और 'इंडिया एंड द वर्ल्ड India and the World'" (1936) में संकलित किये गये। इस समृद्ध साहित्यिक योगदान ने उन्हें अनायास ही श्रेष्ठतम दार्शनिक राजनीतिज्ञों की श्रेणी में ला खड़ा किया। इन प्रकाशनों से प्राप्त रायल्टी ने उन्हें वित्तीय संकट के दौरान सहारा दिया।

उनकी गौरव कृति:''ग्लिम्पसिज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री'' पर विचार व्यक्त करते हुए जवाहर लाल की जीवनी लेखक माइकेल ब्रेसर (Michael Bresser) लिखते हैं: ''इस कृति की मौलिकता एवं विलक्षणता इस बात में है कि इसकी रचना विश्व के अन्य स्तरीय इतिहासकारों से बिलकुल'हट कर विशेषतया एशिया को केन्द्र में रखकर की गई । इसमें संतुलन की कमी दूर की गई है ।' यूरोप और अमरीका को 'विश्व इतिहास' के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा गया है और पाठक को इस तथ्य से अवगत कराया गया है कि गैर-यूरोपीय लोगों का इतिहास यूरोप की सागरपारीय संस्कृति का विस्तार मात्र नहीं है।'' वे आगे लिखते हैं, "'ग्लिम्पसिज ऑफ वर्ल्ड हिस्टरी" उनके राजनीतिक निष्कर्षों के विकास में एक मील का पत्थर है, इसमें उनका अन्तर्राष्टीय आदर्शवाद विशुद्धतम रूप में मूर्तिमान हुआ है।''

6 फरवरी 1931 को पिताश्री मोतीलाल नेहरू के निधन ने उन्हें एकाकी कर दिया। युवक नेहरू के लिये यह एक बहुत बडी क्षति थी क्योंक मोतीलाल उनके पिता ही नहीं एक सतत साथी भी थे। उनकी मृत्यु से पैदा हुए शून्य को आगे चलकर महात्मा गांधी ने पूरा किया ।

कराची कांग्रेस Karachi Congress
मोतीलाल नेहरू की मृत्यु के करीब दो महीने बाद ही मार्च के अंतिम सप्ताह में कराची में कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया । कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन (Lahore session) पूर्ण राष्‍ट्रीय स्वाधीनता की उद्घोषणा के लिये उल्लेखनीय था, किन्तु मार्च 1931 में कराची में हुए कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल का समाजवादी चिंतन उनके मौलिक अधिकारों संबंधी संकल्प में साकार हुआ । वस्तुत: यह संकल्प स्वतंत्र भारत के संविधान में प्रतिष्ठापित आदर्शों और उद्देश्यों का पूर्वाभास था और यह एक धर्मनिरपेक्ष समाजवादी और लोकतांत्रिक राज्य की रूपरेखा का आधार बना। समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता आगे चलकर उस समय परिलक्षित हुई जब उन्होंने 1934 में स्थापित कांग्रेस समाजवादी दल को जेल में रहकर ही समर्थन और संरक्षण प्रदान किया । किन्तु वे कोरे सिद्धांतवादी नहीं थे। उनकी पूंजीवाद एवं समाजवाद के गुणों से युक्त मिश्रित अर्थव्यवस्था के सिद्धांत में अटूट आस्था थी और उन्होंने उसका स्पष्ट रूप से निरूपण किया । इसके पीछे सोच यह थी कि लाभ के प्रेरकत्व का शमन कर शासन तंत्र को आर्थिक क्रियाकलाप विनियमित करने के लिये प्रयुक्त किया जाये ।

फरवरी 1931 में कमला के स्विटजरलैंड में असामयिक निधन से जवाहरलाल के निजी जीवन में यह एक बहुत बडी त्रासदी घटी । कमला की अन्तेष्टि के पश्चात् स्वदेश लौटते समय जबाहरलाल ने लंदन के एक प्रकाशक को, जो उनकी आत्मकथा प्रकाशित कर रहा था, अनुरोध भेजा कि वह इस कृति को ''कमला, जो अब नहीं रही'' को समर्पित कर दे।

विदेशी मामलों में रुचि
जवाहर लाल नेहरू भारतीय राष्टरीय कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में वर्ष 1936 के लिये उसके अध्यक्ष निर्वाचित हुए। कांग्रेस दल के संचालन में वामपंथियों और दक्षिण पंथियों को राजी करने की चुनौती भरा दायित्व उनके कन्धों पर आ पडा । उन्होंने अत्यंत निपुणता से अपने कर्तव्य का निर्वहन किया ।

इस बीच में वे अंतर्राष्टीय मामलों में गहरी रुचि लेते रहे। उन्होंने कांग्रेस दल की विदेश नीति के ध्येय एवं उद्देश्य निर्धारित किये । 1936-37 में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष (President of Indian National Congress) के रूप में उन्होंने, जिन्हें भारतीय लक्ष्यों से सहानुभूति थी विदेशों में रहने वाले ऐसे व्यक्तियों और पार्टियों से सम्पर्क बनाये रखने के लिये अपने दल के सचिवालय में 'बिदेश विभाग'' का गठन किया। 1937 में उन्होंने बर्मा और मलाया की सद्भावना यात्रा की और 1939 के ग्रीष्म में प्रवासी भारतीयों और सिंहलियों के बीच वैमनस्य को कम करने की कोशिश में सीलोन (अब श्रीलंका) की यात्रा की।

1938 में यूरोप जाते हुए उनकी मिश्र की वफ्द पार्टी के नेता नहास/कमाल पाशा से भेंट हुई। स्पेनी गृह युद्ध ने उन्हें काफी उद्वेलित कर दिया। उन्होंने इसे लोकतंत्र और अधिनायकवाद (Democracy and totalitarianism) के बीच चल रहा युद्ध माना और लोकतंत्र के लिये संघर्षरत सहानुभूति दिखाई। अगस्त 1939 में उन्होंने राष्ट्रवादी चीन की यात्रा की किन्तु दूसरा विश्वयुद्ध छिड जाने के कारण उन्हें अपनी यात्रा बीच में ही छोडकर लौटना पडा ।

स्वाधीनता और परवर्ती काल
जहां तक भारत का संबंध है जवाहरलाल जानते थे कि युद्ध में शामिल होने के क्या अपरिहार्य परिणाम होंगे । यदि ब्रिटेन ने भारत के स्वतंत्रता के दावे को स्वीकार किया, तो भारत महायुद्ध में समर्थन देने को और विश्व स्तरीय मामलों में एक मित्र और सहयोगी होने के लिये तैयार था। किन्तु यदि ब्रिटेन ने शरासन जारी रखने का रास्ता अपनाया तो यह सोचना मूर्खता होगी कि भारतीय रांष्टवादी विदेश नीति में लंदन के नेतृत्व को समर्थन करेंगे।'

इस पृष्ठाधार में ब्रिटेन के युद्ध मंत्रिमंडल ने 1942 में क्रिप्स मिशन भारत भेजा। '"प्रारूप घोषणा'' में संविधान निर्माण हेतु संविधान सभा बुलाने के भारत के अधिकार को मान्यता दी गई । किन्तु इसमें निहित 'फूट डालो और राज करो' के बीज थे जिससे कांग्रेस और जवाहरलाल क्रुद्ध हो उठे । अन्तत: उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और इसी के कारण 8 अगस्त, 1942 को 'भारत छोडो Bharat Chhodo'' आंदोलन छेडा गया । ब्रिटिश सरकार ने जवाहरलाल जैसे अग्रणी नेताओं को जेल में डाल कर इस जन विद्रोह को कठोरतापूर्वक कुचलने की कोशिश की। यह जवाहरलाल के जीवन की दीर्घतम कारावास अवधि थी। उन्हें जून, 1945 में, ठीक उस वक्त रिहा कर दिया गया जब वाइसराय लार्ड वेवल (Lord Wavell) ने गतिरोध को दूर करने के लिये शिमला में एक सम्मेलन आयोजित किया।" इन वार्ताओं और बाद में 1947 में लार्ड माउंटबेटन से हुई वार्ताओं में नेहरू की महत्वपूर्ण भूमिका से उनका महान नेतृत्व परिलक्षित होता है । 14-15 अगस्त, 1947 में, भारत उपनिवेशी आधिपत्य से मुक्त हुआ, स्वतंत्रता संग्राम भारत की स्वाधीनता में परिणत हुआ।

महाद्वीपीय स्वरूप के इस नवोदित राष्ट्र का संचालन करने का दुष्कर कार्य जवाहर लाल नेहरू के कंधों पर आ पडा । उन्हें तत्काल जो कार्य करना था वह था देश के भीतर व्यवस्था कायम करना । संक्रमण के आघात ने अनेक समस्याएं खडी कर दीं जिनको उन्होंने बडी योग्यता से सुलझाया । एक दूरदर्शी राजनेता के रूप में उन्होंने इस राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक भवन की नींव रखी । उन्होंने गुट निरपेक्षता की नीति और पंचशील के सिद्धांतों के साथ विश्व समुदाय में भारत की भूमिका के संबंध में एक स्पष्ट दिशा भी प्रदान की | इन नीतियों के फलस्वरूप बाद के वर्षों में बहुत लाभ पहुंचा। जवाहरलाल नेहरू ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास में भी काफी रुचि ली।

जैसाकि उन्होंने स्वयं स्पष्ट किय है : 'राजनीति मुझे अर्थशास्त्र की ओर ले गई और उसने मुझे अपरिहार्य रूप से विज्ञान और अपनी सभी समस्याओं तथा.जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की ओर उन्मुख किया। एकमात्र विज्ञान ही भूख और गरीबी की समस्याओं का समाधान कर सकेगा। दो प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, होमी भाभा और शान्ति स्वरूप भटनागर, जिनमें पर्याप्त शक्ति, उत्साह और संगठनात्मक क्षमता थी, ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के तत्वावधान में प्रयोगशालाओं की कडी निर्मित कर वैज्ञानिक आधार ढांचा बनाने में उनकी सहायता की । 1958 में उन्होंने संसद में ''विज्ञान नीति संकल्प" पारित करा के देश में हर कीमत पर विज्ञान और वैज्ञानिक अनुसंधान का पोषण करने, उसे बढावा देने और अक्षुण रखने का संकल्प किया ।

जवाहरलाल नियोजित आर्थिक विकास में विश्वास करते थे। उन्होंने 1950 में योजना आयोग की स्थापना की जिसने उनकी आर्थिक नीति को ठोस रूप प्रदान किया । संगठन सीमित होने से, जवाहरलाल का मुख्य जोर एकतरफा विकास से बचते हुए इससे अधिकतम लाभ प्राप्त करना था । उन्होंने योजना आयोग और राष्टरीय विकास परिषद की अध्यक्षता की | विकास में लगे रहने पर उन्होंने जनजातियों और पिछडे वर्ग की कभी भी अनदेखी नहीं की | जहां उन्होंने उन लोगों को राष्टीय मुख्यधारा में लाने के सभी प्रयास किये, वहीं उन्होंने उनकी पहचान और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने और उसे उभारने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए। उन्होंने कला, संस्कृति और साहित्य-को भरपूर संरक्षण प्रदान किया।

राष्टीय और अंतर्राष्टीय मामलों में व्यस्त रहने के बावजूद जवाहरलाल नेहरू बच्चों के प्रति बेहद स्नेह रखते थे और बच्चे उन्हें स्नेहपूर्क ''चाचा नेहरू'' कहते थे। उन्हें भलीभांति ज्ञात था कि आज के बच्चे ही कल के नागरिक हैं। इसलिए, उन्होंने बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में बेहद रुचि ली । नेहर का चालीस वर्ष से अधिक का घटनापूर्ण सार्वजनिक जीवन 27 मई, 1964 को समाप्त हो गया । उनकी मृत्यु से एक अभाव और शून्य पैदा हो गया। तथापि, वह हमारे लिए एक समृद्ध विरासत छोड गए जो आज भी हमारे लिए सहायक है । यद्यपि उन्होंने अपने देशवासियों और कुल मिलाकर विश्व के लिए काफी कुछ किया, फिर भी उन्हें संतुष्टि नहीं थी। अपने अधूरे कार्य को ध्यान में रखने के लिए वह रॉबर्ट फ्रास्ट (Robert frost) की कविता की निम्नलिखित चार पंक्तियों का छन्द 'अपने पास रखते थे :-

'जंगल सुन्दर सघन और विस्तृत है
किन्तु मुझे उनके वायदे पूरे करने हैं,
और सोने से पहले मीलों तय करना है,
और सोने से पहले भीलों तय करना है।''

यद्यपि स्वभाव और प्रवृत्ति से नेहरू विश्व बन्धुत्व में विश्वास रखते थे, फिर भी अपने देश की मिट्टी और लोगों से वह बेहद प्यार करते थे। वह उनके सुख-दु:ख के साथी थे तथा राष्ट्र की मुख्यधारा में सचमुच आत्मसात हो गए थे । उनकी इच्छा थी कि उनकी मृत्यु के बाद उनके नश्वर अवशेष उनकी प्यारी मातृभूमि की मिट्टी और पानी में मिला दिये जायें । उनका इच्छापत्र और वसीयत भारत के प्रति उनकी पूर्ण प्रतिबद्धता देशवासियों के प्रति उनके सतत प्यार और स्नेह को बडे भावपूर्ण ढंग से दर्शाता है जिनसे वे अपने देशवासियों के बडे प्रिय बन गए थे :-

''मुझे भारत के लोगों से. इतना अधिक प्यार व स्नेह मिला है कि मैं कुछ भी करूं वह उसके छोटे से अंश की भी बराबरी नहीं कर सकता और वास्तव में स्नेह जैसी अमूल्य वस्तु के ऋण से उऋण हुआ भी नहीं जा सकता । अनेकों की प्रशंसा की गई है, कुछ के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया गया है, परन्तु भारत के सभी वर्गों के लोगों का जो असीम प्यार मुझे मिला है, उससे मैं आत्मविभोर हो गया हूं । मैं केवल यह इच्छा कर सकता हूं कि जीवन के शेष वर्षों में मैं अपने लोगों और उनके स्नेह के अयोग्य न होऊं।''

उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उनके निधन के बाद उनकी राख को हिमालय सहित देश भर में आकाश से बिखेर दिया गया और थोडी सी राख उनकी प्रिय नदी गंगा में प्रवाहित कर दी गयी ।
लोकसभा प्रकाशन के किताब से साभार

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