छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य : सामान्‍य परिचय

-संजीव तिवारी
प्रत्‍येक भाषा के साहित्‍य में लेखन की परम्‍परा पद्यात्‍मक लेखन से आरंभ हुई है। छत्‍तीसगढ़ी में भी साहित्यिक लेखन की परम्‍परा पद्य से ही आरंभ हुई है। कबीर के पट्ट शिष्‍य धनी धर्मदास को डॉ.नरेन्‍द्र देव वर्मा छत्‍तीसगढ़ी का आदि कवि निरूपित करते है। इनके बाद के कवियों में सारंगढ़ के प्रहलाद दुबे की रचना 'जय चंद्रिका' में भी ब्रज, बैसवाड़ी और छत्‍तीसगढ़ी का पुट मिलता है। रचनाओं के प्रकाशन के आधार पर छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य के पुरोधा के संबंध में प्रदेश के विद्वानों में मतभेद है। छत्‍तीसगढ़ी काव्‍य के प्रथम प्रकाशित साहित्‍य के संबंध में डॉ.नरेन्‍द्र देव वर्मा पं.सुन्‍दर लाल शर्मा की कृति ‘दान लीला’ को तो नंदकिशोर तिवारी पं.लोचन प्रसाद पाण्‍डेय को उनके विभिन्‍न छत्‍तीसगढ़ी काव्‍य एवं ‘कलिकाल’ का उल्‍लेख करते हुए, पुरोधा निरूपित करते हैं। डॉ.विनय कुमार पाठक इन दोनों से भी पूर्व प्रकाशित रचनाकार नरसिंह दास वैष्‍णव का उल्‍लेख करते हैं जिनकी काव्‍य कृति 'शिवायन' में उडि़या के साथ ही छत्‍तीसगढ़ी में भी पद संकलित हैं। 'शिवायन' सन् 1904 में प्रकाशित हुई थी। 
छत्‍तीसगढ़ी में गद्य की अपेक्षा पद्य लेखन प्रचुर मात्रा में हुआ है। इसके बावजूद यहां के रचनाकारों नें गद्य लेखन की अनेक विधाओं में प्रचुर लेखन किया है। कहानी, निबंध, व्‍यंग्‍य, बाल साहित्‍य, जीवनी, यात्रा संस्‍मरण, अनुवाद आदि विधाओं में रचनाकार लगातार लिख रहे हैं।  छत्‍तीसगढ़ी गद्य में पं.लोचन प्रसाद पाण्‍डेय को छत्‍तीसगढ़ी गद्य का संस्‍थापक साहित्‍यकार माना जाता है। सन् 1905 में पाण्‍डेय जी की छत्तीसगढ़ी नाटक ‘कलिकाल’ का प्रकाशन हुआ था। आरंभिक छत्‍तीसगढ़ी नाटकों ‘केकरा धरैया’ और ‘खीरा चोट्टा’ जैसे बाल नाटक पं.शुकलाल प्रसाद पाण्‍डेय नें लिखे। इसके बाद के लेखकों  में पं.मुरलीधर पाण्‍डेय, उदय राम एवं डॉ.रामलाल कश्‍यप का नाम लिया जाता है। बाद के वर्षों में टिकेन्‍द्र टिकरिहा के नाटक ‘साहूकार से छुटकारा’, ‘सर्वनाश’, ‘फंदी’ आदि एवं डॉ. खूवचंद बघेल के नाटकों में ‘उंच अउ नीच’, ‘करमछड़हा’, ‘बेटवा बिहाव’, ‘किसान के करलई’ जैसे नाटकों नें  छत्‍तीसगढ़ी नाटक साहित्‍य को समृद्ध किया।   
शुरूवाती प्रकाशित छत्‍तीसगढ़ी कहानियों में हीरालाल काव्‍योपाध्‍याय के छत्‍तीसगढ़ी व्‍यकरण में संग्रहित ‘श्री राम कथा’, ‘ढोला की कहानी’,  ‘चंदैनी की कहानी’ आदि का उल्‍लेख किया जाता है। हालांकि यह मौलिक कहानियां नहीं है बल्कि यह लोक कहानियॉं थीं। मौलिक रूप से स्‍वतंत्र कहानी सीताराम मिश्र की कहानी ‘सुरही गाय के कहिनी’ को माना जाता है।  मुक्तिदूत के संपादन में प्रकाशित छत्‍तीसगढ़ी पत्रिका के प्रकाशन से छत्‍तीसगढ़ी गद्य का विकास तेजी से हुआ। इसमें कहानियॉं भी प्रकाशित होने लगी जिनमें ध्रुव राम वर्मा की हास्‍य व्‍यंग्‍य प्रधान कहानियों का भी प्रकाशन हुआ। जिसमें से कुछ के नाम ‘हात रे मोर मुसर, तैं नहीं मे दुसर’, ‘तीन साला तरिया’, ‘छेरी चरवाहा’, ‘हाय रे मोर धमना’ हैं।  प्रसिद्ध लेखक लियो तालस्‍टाय की कहानी ‘हाउ मच लैंड ए मैन रिक्‍वायर’ का अनुवाद इस पत्रिका में ‘मनसे ला कतेक भूंइया चाही’ नाम से प्रकाशित हुआ जिसके अनुवाद शंकर लाल शुक्‍ल जी थे। इस समय में आधुनिक भावबोध की कहानियों का लेखन आरंभ हुआ लेखकों नें विभिन्‍न विषयों में कहानियां लिखना आरंभ किया। छत्‍तीसगढ में हिन्‍दी कथाकारों के साथ ही छत्‍तीसगढी कथाकारों नें भी उत्‍कृष्‍ट कहानियों का सृजन किया है और सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक मूल्‍यों की स्‍थापना हेतु प्रतिबद्ध होते हुए धान के इस कटोरे में कहानियों का ‘बाढे सरा’ बार बार छलकाया है।
कहानी के साथ ही छत्‍तीसगढ़ी में उपन्‍यास लेखन भी हुआ है, छत्‍तीसगढ़ी के अब तक ज्ञात उपन्‍यासों की जानकारी इस प्रकार है - 1. हीरू के कहिनी 1926 पाण्डेय बंशीधर शर्मा, 2. दियना के अंजोर 1964 शिवशंकर शुक्ल, 3. मोंगरा 1964 शिवशंकर शुक्ल, 4. चंदा अमरित बरसाइस 1965 लखन लाल गुप्त, 5. फुटहा करम 1971 ठाकुर हृदय सिंह चौहान, 6. कुल के मरजाद 1980 केयूर भूषण, 7. छेरछेरा 1983 पं. कृष्ण कुमार शर्मा, 8. उढरिया 1999 डॉ. जे.आर. सोनी, 9. कहाँ बिलागे मोर धान के कटोरा 2000 केयूर भूषण, 10. दिन बहुरिस 2001 अशोक सिंह ठाकुर, 11. आवा 2002 डॉ. परदेशी राम वर्मा, 12. लोक लाज 2002 केयूर भूषण, 13. कका के घर 2003 रामनाथ साहू, 14. चन्द्रकला 2005 डॉ. जे.आर.सोनी, 15. भाग जबर करनी मा दिखाये 2005 संतोष कुमार चौबे, 16. माटी के मितान 2006 सरला शर्मा, 17. बनके चंदैनी 2007 सुधा वर्मा, 18. भुइयॉं 2009 रामनाथ साहू, 19. समे के बलिहारी 2009 से 2012 केयूर भूषण, 20. मोर गाँव 2010 जनार्दन पाण्डेय,  21. रजनीगंधा 2010 डॉ. बलदाऊ प्रसाद पाण्डेय पावन, 22. विक्रम कोट के तिलिस्म 2010 डॉ. बलदाऊ प्रसाद पाण्डेय पावन, 23. तुंहर जाए ले गियाँ 2012 कामेश्वर पाण्डेय, 24. जुराव 2014 कामेश्वर पाण्डेय, 25. करौंदा 2015 परमानंद वर्मा राम, 26. पुरखा के भुइयॉं 2014 डॉ.मणी महेश्‍वर 'ध्‍येय', 27. डिंगई 2015 लोक बाबू, 28. केरवंछ 2013 मुकुन्द कौशल, 29. पठौनी अप्रकाशित ठाकुर बलदेव सिंह चौहान, 30. हाथ भर चूरी अप्रकाशित ठाकुर बलदेव सिंह चौहान, 31. बीता भर पेट अप्रकाशित ठाकुर बलदेव सिंह चौहान, 32. सुहागी अप्रकाशित शिव शंकर शुक्ल, 33. परबतिया अप्रकाशित हेमनाथ यदु, 34. चंदा चंदैनी अप्रकाशित हेमनाथ यदु, 35. मानवता के कछेरी मा अप्रकाशित ठाकुर बलदेव सिंह चौहान, 36. केंवट-कुन्दरा अप्रकाशित दुर्गा प्रसाद पारकर, 37. कुल के अंजोर अप्रकाशित अशोक सेमसन, 38. इन्दरावती के बेटी अप्रकाशित सुधा वर्मा, 39. बनपांखी अप्रकाशित शकुन्तला तरार । यद्धपि छत्तीसगढ़ी की औपन्यासिक दुनिया बहुत छोटी है किन्तु इसमें छत्‍तीसगढ़ी लेखकों का एक सार्थक हस्तक्षेप है।
वर्तमान समय में छत्‍तीसगढ़ी भाषा के संबंध में जो तथ्य एवं प्रश्न वैश्विक क्षितिज पर ज्वलंत रूप से उभरे हैं उस पर ध्यान रखते हुए हमें अपनी भाषा पर संक्षिप्‍त विमर्श करना आवश्यक था। हमारी मीठी बोली छत्तीसगढ़ी बोलने वालों के कण्ठों में वस्तुत: लोक जीवन के प्रेम, सौहार्द्र, पारस्परिकता, निश्छलता और सामाजिकता की मिठास बसी हुई है। भाषा का सौंदर्य और उसकी सृजनात्मकता उसके वाचिक स्वरूप और विलक्षण मौखिक अभिव्यक्तियों में निहित है। इधर वह लिखित-मुद्रित अभिव्यक्तियों और औपचारिक साहित्‍य में भी क्रमश: रूपांतरित हो रही है, जो स्वागतेय है।
यह एक कड़ी मात्र है ऐसी कई कडि़यों से छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य का परिचय पूर्ण होगा। 

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