कुपोषण : जागरूकता जरूरी

कुपोषण का अर्थ समय पर संतुलित मात्रा में पौष्टिक आहार न मिल पाने से शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होना है। कुपोषण खान-पान के गलत तरीकों और पौष्टिकता में कमी जैसे कई कारणों से होता है। इससे शरीर में विटामिन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज तत्वों जैसे आयोडीन, आयरन, फास्फोरस, कैल्शियम की कमी हो जाती है। कुपोषण के कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है। इसकी वजह से कुपोषित गंभीर बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं और आसानी से कई तरह की बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। कुपोषण कई बार मातृ एवं शिशु मृत्यु का कारण बनता है। स्त्रियों में रक्ताल्पता या घेंघा रोग अथव बच्चों में सूखा रोग या रतौंधी और यहां तक कि अंधत्व भी कुपोषण का ही दुष्परिणाम है।

कुपोषण के लक्षण
कुपोषण से बच्चों के शरीर का संपूर्ण विकास अवरूद्ध हो जाता है। शरीर कमजोर और उम्र के अनुसार वजन कम होता है। कुपोषण से आंखे कमजोर होना, त्वचा का रूखा होना, पेट फूलना, नाखूनों का अपने आप टूटना, बालों का अधिक झड़ना, भूख न लगना, चिड़चिड़ापन, हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी, बच्चों का बिना वजह रोना, खून की कमी होना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। शरीर में आयरन की कमी हो जाने से एनीमिया रोग हो जाता है।

बच्चों में कुपोषण का मापन
कुपोषण को तीन तरह से मापा जा सकता है। वर्तमान में प्रचलित प्रक्रिया के अनुसार उम्र के अनुसार वजन लिया जाकर बच्चों में कुपोषण का स्तर ज्ञात किया जाता है। कुपोषण ज्ञात करने के लिए पांच वर्ष तक के बच्चे जिनका वजन उम्र के अनुसार कम है, पांच वर्ष तक के बच्चे जिनकी ऊंचाई उम्र के अनुसार कम है और पांच वर्ष तक के बच्चे जिनका वजन ऊंचाई के अनुसार कम है, के अनुसार कुपोषण का आंकलन किया जाता है।

कुपोषण के कारण
भोजन की कमी, लड़का-लड़की में भेदभाव, कम उम्र में मां बनना, स्तनपान का अभाव, स्वच्छ पर्यावरण का अभाव और उचित पोषण के प्रति जागरूकता की कमी कुपोषण के प्रमुख कारण हैं। बच्चों में अधिकांशतः कुपोषण गर्भावस्था में ही शुरू होता है। मां कुपोषित हो या गर्भावस्था के दौरान उसे संपूर्ण भोजन न मिले तब शिशु भी कुपोषित हो सकता है। जन्म के उपरांत देरी से या कम स्तनपान कराने से भी शिशु की बढ़त कम होती है। कम उम्र में शादी और गर्भावस्था तथा दो बच्चों के बीच पर्याप्त अंतराल न होना भी कुपोषण का कारण है। कई बार बुखार, दस्त, खांसी और आदि बीमारियों से शिशु क्षीण हो जाता है और भूख भी कम हो जाती है। इस समय पर्याप्त इलाज और पोषण न मिलने पर भी कुपोषण और बीामरियों का चक्र शुरू हो सकता है।

कुपोषण से बचाव और उपचार
पहले एक हजार दिनो मे तेजी से बच्चे का शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है। जिसमें गर्भावस्था की अवधि से लेकर बच्चे के जन्म से 2 साल की उम्र तक की अवधि शामिल है। इस दौरान उचित स्वास्थ्य, पर्याप्त पोषण, प्यार भरा व तनाव मुक्त माहौल तथा सही देखभाल बच्चे का पूरा विकास करने में मदद करते हैं। इस दौरान मां और बच्चे को सही पोषण और खास देखभाल की जरूरत होती है। गर्भवती महिला की पर्याप्त देखभाल, पौष्टिक आहर और स्वास्थ्य जांच की जानी चाहिए। महिला को कैल्शियम और आयरन की गोलियों का सेवन करना चाहिए। बच्चे को उसके जन्म के एक धंटे के भीतर मां का पहला पीला गाढ़ा दूध दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही कम उम्र में विवाह रोकने और स्वच्छत वातारवरण, पर्याप्त हवा और धूप रख कुपोषण से बचा जा सकता है

पौष्टिक आहार-

  • सभी उम्र के लोगों के साथ-साथ बच्चे को 6 माह के होने पर पर्याप्त मात्रा मंे तरह-तरह का आहार अवश्य खिलाना चाहिए।
  • विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ खाएं जैसे कि रोटी, चावल और साथ ही पीले व काले रंग की दालें, हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मेथी, चौलाई और सरसों, पीले फल जैसे आम व पका पपीता भी लें।
  • यदि मांसहारी है तो अंडा, मांस और मछली खाना चाहिए। खाने मंे दूध से बने पदार्थ और अखरोट आदि शामिल करना चाहिए।
  • आंगनबाड़ी से मिलने वाला पोषाहार अवश्यक खाना चाहिए।
  • जब बच्चा 6 महीने का हो जाए तो मां के दूध के साथ घर का बना मसला और गाढ़ा ऊपरी आहार भी शुरू करें जैसे कद्दू, लौकी, गाजर, पालक तथा दाल और यदि मांसाहारी है तो अंडा, मांस व मछली भी देना चाहिए।
  • बच्चे के खाने में ऊपर से एक चम्मच घी, तेल या मक्खन मिलाएं। बच्चे के खाने में नमक, चीनी और मसाला कम डालें। एक खाद्य पदार्थ से शुरू करें, धीरे-धीरे खाने में विविधता लाएं। बच्चे का खाना रूचिकर बनाने के लिए अलग-अलग स्वाद व रंग शामिल करना चाहिए।
  • बच्चे को बाजार का बिस्कुट, चिप्स, मिठाई नमकीन और जूस जैसी चींजे न खिलाएं। इससे बच्चे को सही पोषक तत्व नहीं मिल पाते।
  • बच्चे को डायरिया होने पर तुरंत ओ.आर.एस. तथा अतिरिक्त तरल पदार्थ देना चाहिए और जब तक डायरिया पूरी तरह ठीक न हो जाए तब तक जारी रखना चाहिए। डायरिया से पीड़ित बच्चे को 14 दिन जिंक देना चाहिए, अगर दस्त रूक जाए तो भी यह देना बंद नहीं करना चाहिए। स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए।
  • एनीमिया से रोकथान के उपाय


एनीमिया से रोकथाम के लिए आयरन युक्त आहार जैसे कि दाले, हरी पत्तेदार सब्जियां, पालक, मेथी, सरसों, फल, दूध, दही, पनीर आदि खाएं। यदि मांसाहारी है तो अंडा, मांस व मछली का भी सेवन करना चाहिए। खाने में नीबू, आंवला, अमरूद जैसे खट्टे फल शामिल करें, जो आयरन के अवशोषण में मदद करते हैं। इसके अलावा अलग से आयरन युक्त पूरक विशेषज्ञों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की सलाह से लेना चाहिए। आयरन की कमी दूर करने के लिए 6 से 59 माह के बच्चों को हफ्ते मे 2 बार एक मिलीलीटर आईएफए (आयरन एण्ड फोलिक एसिड) सीरप, 5-9 वर्ष की उम्र मे आई.एफ.ए की एक पिंक गोली ,10-19 वर्ष तक की उम्र मे हफ्ते मे एक बार आई.एफ.ए की नीली गोली दी जाती है। गर्भवती महिला को गर्भावस्था के चौथे महीने से रोजाना 180 दि तक आई.एफ.ए की एक लाल गोली और धात्री महिला को 180 दिन तक आई.एफ.ए की एक लाल गोली का सेवन करना चाहिए। हमारे शरीर में परजीवी के रूप में रहने वाले कृमि भी पोषण पदार्थों को चूस लेते हैं इसके लिए कृमिनाशक दवा (एल्बेण्डाजोल) की निर्धारित खुराक दी जानी चाहिए। जन्म के तुरंत बाद बच्चे की गर्भनाल 3 मिनट बाद ही काटें काटने से नवजात बच्चे के खून मे आयरन की मात्रा बनी रहती है। सभी उम्र के लोगों की एनीमिया की जांच आवश्यक है ताकि व्यक्ति की हीमोग्लोबिन के स्तर के अनुसार उसका उपयुक्त इलाज किया जा सके।

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