Raipur Rashmi History of District Hindi Gazetteer The people रायपुर रश्मि तीसरी झलक लोग

जनसंख्या Population
सन् 1921 की गणना के अनुसार रायपुर जिले की जनसंख्या 14,06,676 है। इससे अधिक संख्या किसी जिले में नहीं पाई जाती । पुरुषों की संख्या 6,8 4,398 और स्व्रियों की 7,22,278 है। पहले पहल सन् 1872 ई. में गिनती की गई थी, उस समय केवल 7,00,319 जन थे। पचास साल में अब दूने हो गए हैं। तहसील वार संख्या इस प्रकार है.-रायपुर 2,52,615 महा समुन्द 5,54,089, बलौदा बाजार 3,67,732, धमतरी 2,31,240 । रायपुर तहसील में दो नगर (रायपुर, आरंग) और 485 गाँव हैं। महासमुन्द में 2173 गाँव हैं। बलौदा बाजार में 1040 गाँव और एक नगर भाटापारा है, धमतरी में 579 गाँव और एक नगर अर्थात् धमतरी खास है । इस प्रकार संपूर्ण जिले में 4247 ग्राम और चार नगर हैं । महासमुन्द्र तहसील में ग्राम संख्या बहुत अधिक है। इतने गाँव तो तीन जिलों (बिलासपुर, दुर्ग, चांदा) को छोड अन्य किसी समूचे जिले में भी नहीं पाये जाते। बात यह है कि गाँव जंगली और छोटे-छोटे हैं। सिवाय इसके 1891 गाँव जमींदारियों में शामिल हैं । यदि सब खालसा होते तो उनका प्रबंध करना तहसीलदार के लिए असंभव हो जाता। यद तहसील ही क्या वरन् संपूर्ण जिला, बल्कि छत्तीसगढ प्रांत की चाल है कि लोग छोटी-छोटी बस्तियों में निवास करते हैं। सामुदायिक या नागरिक संगठन का अभाव है। रायपुर जैसे विस्तीर्ण जिले में केवल चार कस्बे हैं, सो भी दो आरंभ और भाटापारा नाम मात्र के हैं, केवल रायपुर और धमतरी इस योग्य हैं। रायपुर की जनसंख्या 38,341 हैं। मध्यप्रदेश में इससे बडे केवल चार ही नगर हैं अर्थात् नागपुर, जबलपुर, अमरावती और सागर । धमतरी की जनसंख्या 12,721 है। इस प्रदेश के 120 पुरों में इसका नंबर 28वाँ पडता है। इस जिले में आवागमन बहुत कम है, इसीलिए अपने ही जिले की पैदाइश के लोगों की संख्या अन्य जिलों की अपेक्षा बहुत अधिक है। कम से कम सैकडा पीछे 82 लोग अपने जिले ही में पैदा हुए हैं । छत्तीसगढ के लोग बाहर निकलना पसंद नहीं करते थे, अब कहीं थोडे बहुत आने-जाने लगे हैं।

मुख्य धर्म Main religion
रायपुर जिले में दो ही धर्मों का विशेष प्रचार है- हिंदू और आश्विासी और ये दोनों ऐसे मिश्रित हो गए हैं कि इनके बीच में सीमा की लकीर खींचना असंभव सा जान पडता है। यहाँ के गोंड निस्सन्देह मूल निवासी हैं और अपने को रावणवंशी कहते हैं और जंगली देवता बूढा या बड़ादेव को मानते हैं। तब भी कोई सवा दो लाख में से 85 हजार अपने को हिंदू कहते हैं। यथार्थ में ब्राह्मणधिपत्य विरोधी पंथों का यहाँ विशेष प्रचार है। जांगलीय धर्मावलम्बियों से भी अधिक यहाँ पर कबीरपंथी और सतनामी हैं। कबीरपंथियों की संख्या प्राय: सवा लाख और सतनामियों की डेढ़ लाख से ऊपर है।

कबीरपंथी Kabir Panthi
छत्तीसगढ में 3 लाख से अधिक कबीर को मानते हैं । इन में सवा लाख रायपुर जिले में पाये जाते हैं। इस पंथ का प्रचारक काशी का जुलाहा कबीर था, जिसने सन् 1488 और 1512 ई. के समय इसे विशेष रूप से फैलाया। इस पंथ का मुख्य उद्देश्य अहिंसा-मूर्तिपूजा निषेध और सार्वजनिक साम्य है। इनमें से दो बात ब्राह्मणी धर्म के प्रतिकूल होती हैं अर्थात् मूर्तिपूजा निषेध और ब्राह्मण-अब्राह्मण की समानता । कबीरपंथी ब्राह्मणें को महीसुर नहीं मानते और न उन्हें पुरोहित बनाते । कबीर ने स्वयं कहा प्रकट है एकै मुद्रा। काको कहिये ब्राह्मन शुद्रा। कबीर का नामी चेला धरमदास कसौंधा बनिया था। उसी के वंशज कबीर पंथियों के मुख्य गुरु होते हैं। इनकी गद्दी कवर्धा में थी। बारहवीं पीढी में झगडा होने से दो शाखाएँ हो गई। अब मुख्य गद्दी इसी जिले के दामाखेडे़ में है।

सतनामी Satnami
कबीर पंथों से भी अधिक कट्टर सतनामी पंथ है। इसको घासीदास ने चलाया। घासीदास बलौदा बाजार तहसील के गिरौद नामक गाँव में पैदा हुआ था और हरवाही का काम करता था। जान पड़ता है कि उसको कोई जगजीवनदास का चेला मिल गया, जिसने उसे सत्य नाम का उपदेश किया। घासीदास तब से सत्य नाम, सत्य नाम ही रटने लगा और जब उस की स्त्री ने उसकी अवहेलना की तो वह निकटस्थ सोनाखान के जंगल में चला गया और एक तेंदू के पेड़ के नीचे सत्य नाम का भजन करने लगा। अंत में लोगों ने उसको खोज की और घर लिवा लाये। एक बार किसी को साँप ने काट खाया तो वह घासीदास के पास गया और अपनी भक्ति की शक्ति से चंगा करने की विनती की । घासीदास ने सत्य नाम से प्रार्थना की, भाग्यवान वह आदमी अच्छा हो गया। बस उसी समय से घासीदास की महिमा बढ़ गई और उसके जातिवाले पहुँचा हुआ साधु मानने लगे। तब तो उसका आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर से लोग आने लगे।
घासीदास सब को यही शिक्षा देता था कि सत्य नाम को भजो, देवी- देवताओं के पूजने से कुछ लाभ नहीं, मनुष्य सब बराबर हैं, ऊँच-नीच कोई जाति नहीं, मूर्ति पूजने से कुछ नहीं मिलता, अहिंसा परम धर्म है, इसलिए मांस नहीं खाना चाहिए। घासीदास के उपदेशों को लोगों ने स्वीकार कर लिया और अपने सैकड़ों वर्ष के देव-देवियों का त्याग कर दिया। मांसाहारी जाति होने पर मांस ही नहीं वरन् उस वर्ण की अन्य वस्तओं, जैसे लाल भाजी आदि तक का खाना छोड़ दिया। लोगों ने उसे अपना गुरु मान लिया। तब से उसके वंशज गुरु की गद्दी पर बैठते हुए बराबर चले आते हैं। वे भंडार नामक ग्राम में रहते हैं। कबीर पंथियों की नाई वे रात को निकलते हैं और चढ़ोतरी में बहुत रुपया पाते हैं। सतनामी पंथ का प्रचार विशेष कर छत्तीसगढ़ ही में है। उसके अनुयायी की संख्या साढे तीन लाख से अधिक है । प्राय: आधे लोग रायपुर जिले के भीतर रहते हैं।

इतर धर्म
अन्य धर्मावलम्बियों में मुसलमानों की संख्या 18,000, क्रिस्तानों की 5 हजार और जैनों की डेढ हजार है। कई चमार मिशनों द्वारा क्रिस्तान हो गए हैं, इसलिए क्रिस्तानों की संख्या कुछ अधिक हो गई है। रायपुर की मुख्य जातियाँ गोंड़, तेली और रावत हैं। 000 गोंड़ और तेलियाँ की संख्या दो-दो मुख्य जातियाँ लाख से अधिक और रावत की प्राय: डेढ़ लाख है। सब से अधिक हैं, जो सैकडा पीछे 17 पड़ते हैं। ये बहुधा: सतनामी पंथ मानते हैं और हिंदुओं की ऊँची जातियों से अपने को किसी तरह से कम नहीं समझते। वे लोग चमडे़ का काम नहीं करते, मांसादि नहीं खाते, अन्य किसान जातियों के समान खेती या मजदूरी से निर्वाह करते हैं। कहीं-कहीं पर वे माल गुजार हैं। इस जिले में कई एक जातिये गाँव हैं, जहाँ सिवाय अन्य किसी जाति का पुरुष नहीं मिलता। गोंड़ सैकड़ा पाछे 15 पड़ते हैं। ये दक्षिणी भाग के जंगलों में बहुत मिलते हैं । बहुतेरे अपने को रावणवंशी कहते हैं। यदि ये रावण की सैन्य थे तो उस समय से लेकर अब तक उनकी दशा में बहुत कुछ हेर-फेर नहीं हुआ। रावत अर्थात् अहीर यहाँ पर उत्तरीय प्रांतों के ढीमर का काम करते हैं । वे पानी भरते और चौका- बर्तन करते हैं। यहाँ ढीमर भी हैं, परंतु वे लोग मछली मारते या मजदूरी करते हैं, उनसे कोई चौका-बर्तन नहीं कराता, न उनके हाथ का पानी पीता है।
तेलियों की भी संख्या प्राय: गोडों के बराबर है। ये लोग खेती का काम बहुत अच्छा करते हैं।इस काम में कदाचित् कुरमी तक उनकी बराबरी नहीं कर सकते । इनके हाथ में डेढ सौ से अधिक गाँव की मालगुजारी है। कुरमी इनके एक तिहाई निकलेंगे, परंतु उनके हाथ में प्राय: दो सौ गाँवों की मालगुजारी हैं। सब से अधिक गाँव बनियों के हाथ में हैं, जिनकी संख्या सात हजार से अधिक नहीं है, परंतु धन इकट्ठा करने में इनसे बढकर कोई जाति नहीं । कौडी-कौडी जोड के निधन होत धनवान को सार्थक करनेवाली यही जाति है। बनिये पाचेक सौ गाँव के मालगुजार हैं। इनके पीछे ब्राह्मण आते हैं, जिनके हाथ में कोई 400 गाँव हैं । जनसंख्या में से वे बनियों से तिगने हैं। तीन सौ गाँव मरहठों के अधिकार में हैं, यद्यपि इनकी जनसंख्या अढाई हजार ही है। इनको अधिक गाँव मिलने का कारण भोंसला साही राज था। बहुतेरे मरहठों का उस जमाने में राजवंश से किसी न किसी प्रकार का संबंध था। अनेक मरहठे चिमनाजी के साथ कटक की चढाई में गए थे, उनमें से बहुतेरे लौटने पर इसी जिले में बस गए।

इतर जातियाँ
इतर जातियाँ जिनकी इस जिले में बहुलता पाई जाती है, वे ये हैं- केवट, पनका, गांडा, सवरा, हलवा, कवर, कलार, लुहार, कुम्हार, धोबी, कोष्टी, नाई, राजपूत, महरा, घसिया, म्गली, बंजारा, बिंझवार, इत्यादि। इन जातियों की अलग-अलग संख्या 50 हजार और 5 हजार तक के बीच _ पडुती है। प्रत्येक की ठीक-ठीक संख्या बतलाई नहीं जा सकती, क्योंकि सन् 1921 की गणना के अंक विश्वास के योग्य नहीं है। इस जिले में कई जातियों में विचित्र व्यवहार पाये जाते हैं, जो अन्यत्र देखने में नहीं आते, जैसे भुजिया की झोंपडी को यदि ब्राह्मण भी छू दे तो वह अपवित्र हो जाती है। वे उसे आग लगाकर जला डालते हैं। भोजन के विषय में ये कान्यकुब्जों के कान काटते हैं। अपने लडकी, दामाद को भी घर के भीतर नहीं आने देते, न उनके हाथ का पकाया हुआ अन्न खाते। मैं तैं हंडिया' का वही अर्थ होता है, जो आठ कनौजिया नौ चूल्हे का लगाया जाता है। वास्तव में ३ एक जंगली जाति है, परंतु अपने नियम पर दृढ हैं।

चाल-ढाल
छत्तीसगढ में प्राथमिक अवस्था के दृश्य बहुत देखने में आते हैं । नग्न अवस्था से एक सिड्ढी ऊपर पत्तों की कोपीन मिलती है। जो जुअंग लोग अभी तक उपयोग में लाते हैं, परंतु वे रायपुर जिले के भीतर नहीं रहते, संलग्न उडिया प्रांत में पाये जाते हें । ऋषियों ने पत्तों के बदले वल्कल या मृग चर्म का उपयोग किया, कुम्भी पटिया अब भी वल्कल धारण करते हैं। अब मृग चर्म सहलता से मिल नहीं सकता, न अन्य ही चर्म इतनी कम कीमत में मिलता है, जितना कि खादी का टुकडा । छत्तीसगढ के लोगों ने खादी ही पसंद कर ली है, उसी की लंगोटी लगाते चहुँ ओर दीख पडते हैं। इसी कारण उत्तरीय जिलों के लोग उन्हें लगोटिहा कहते हैं। भोजन बड्डा सादा है। बासी का विशेष प्रचार है। भात को पसा कर मांड को रात भर रख छोडते है और दूसरे दिन नमक-मिरची डाल कर उसे पी लेते हैं। हुक्का-चिलम की आवश्यता नहीं, पत्ते की चुंगी बना कर तमाखू पी लेते हैं। जूतों की बडी आवश्यकता नहीं होती । कम्बल भी न हो तो कुछ परवाह नहीं, नीचे गुरसी, ऊपर पट का ठाट उसकी पूर्ति कर देता है । स्त्रियों को चोली की आवश्यकता नहीं होती । परदे का रिवाज नहीं । मकान बहुत सादे रहते हैं। सामान बहुत कम लगता है। धान की खेती व्यासी करके की जाती है। अर्थात् पौधे ऊगने पर फिर हल चला दिया जाता है जिससे वे विरल हो जाते हैं। जादू-टोने पर विश्वास बना चला आता है। ये सब प्राथमिक अवस्था के लक्षण हैं। कई सामाजिक रीतियाँ भी विचित्र पायी जाती हैं, जैसे कांस के बर्तन दूसरी जाति को देने में रोक-टोक नहीं होती, पीतल में होती है। उत्तरीया जिलों में इसके विपरीत व्यवहार होता है। विवाह मृत्यु आदि में बहुत सी विचित्रताएँ देखने में आती हैं, जिनका वर्णन स्थानाभाव से नहीं किया जा सकता।

मुख्य घराने
इस जिले में उस जमींदार हैं, जिनकी जायदाद का बँटवारा नहीं होता। गद्दी ज्येष्ठ पुत्र को मिलती है। सब से बडी जमींदारी में 606 और सब से छोटी में 16 गाँव हैं। 6 जमींदार गोंड, 1 क्षत्रिय, 1 बिंझवार, 1 कवर और 1 बिंझिया हैं । खरियार के जमींदार चौहानवंशी पटना महाराज के कुलोत्पन्न हैं। इन्हीं के 606 गाँव हैं। वर्तमान जमींदार लाल अर्त्तत्राण्देव हैं। बिन्द्रानवा गढ जमींदारी में 446 गाँव हैं। वर्तमान जमींदार लालनमेलसाय हैं। ये राज गोंड हैं। फुलझर जमींदारी में 527 गाँव है, यहाँ के जमींदार भी राजगोंड हैं। इनका संबंध चांदा के राजघराने से था। वर्तमान जमींदार लालबहादुरसिंह हैं। इनके बीसवें पुरखा हरराजसाय ने अन्य जमींदारों से जीत कर इलाका ले लिया था। सुअरमार, कौड्या, बिलाईगढ, कटगी और फिंगेश्वर के जमींदार भी राजगोंड हैं। सुअरमार के जमींदार लाल गिरिराजसिंह हैं उनके 102 गाँव हैं। कौडिया की जमींदारिन विष्णुप्रियादेई हैं । उनके 155 गाँव हैं। बिलाईगढ कटगी के जमींदार दीवान रामप्रतापसिंह के पास 74 गाँव हैं और फिंगेश्वर के विश्वनाथसिंह के 86 गाँव हैं। भटगाँव के जमींदार बुधेश्वरसिंह बिंझिया जाति के हैं, उनके 60 गाँव हैं । देवरी के लालराजेंद्र साय बिंझवार हैं, उनके उनके 37 गाँव हैं। सबसे छोटी जमींदारी नर्रा की है, जिसमें केवल 16 गाँव हैं, जमींदार पीतांबर सिंह कंवर जाति के हैं।
अन्य प्रमुख वंशों में बडुगाँव के उदयसिंह हैहय राजाओं के वंशज हैं। यह गाँव महासमुन्द तहसील में हैं। बलौदा बाजार के सेंदुरस गाँव के माल गुजार अपनी उत्पत्ति उसी वंश से बतलाते हैं। मरहठों में राजिम का महाडिक वंश जाहिर है। नागपुर के हनुमन्तराव नामक सरदार अपने बहनोई बिम्बाजी भोंसले के साथ छत्तीसगढ की चढाई में आये थे। यहाँ पर उनको 'एक चौरासी (84 गाँव) दी गई और उन्होंने राजिम को सदर मुकाम बनाया। वर्तमान अधिकारी नारायण राव और गुलाब राव है। रायपुर का दानी वंश भी तभी का आया हुआ है। इनके पुरखा रामचंद्रराव रायपुर में बसे और वहीं भोंसलों की ओर से कमाईशदार नियुक्त हुए। इनके 44 गाँव के मूल......जनों में में बँट गए हैं। रायसाहब बाबूराव दानी को आधे मिले...इनके उत्तराधिकारी गपनत राव दानी है। धमतरी के ......... बाजीराव के अधिकार में 32 गाँव हैं। उनके पुरखों को सन् 1823 ई. में छह गाँव माफी में मिले थे। उनमें से चार अब मालगुजारी हो गए हैं। इसी वंश की दूसरी शाखा के नायक अखोरराव हैं, जिनके 18 गाँव हैं। तीसरी शाखा के प्रतिनिधि कप्तान राव हैं, इनके 14 गाँव हैं। धमतरी का जगपत वंश भी ..... है। उसके वर्तमान प्रतिनिधि नत्थूजी और गुजिया है। इनके आजा के भाई को नागपुर के भोंसला राजा ने कांकेर के राजा के यहाँ किसी भारी पद पर भेजा था, इनके 17 गाँव थे, जिनको दोनों भाइयों ने आधा-आधा बाँट लिया है।
ब्राह्मणों में अग्रगण्य कसडोल के मिश्र Mishra of Kasdol हैं। उनके 32 गाँव हैं। इनके पुरखा को दहेज में 5 गाँव मिले थे। क्रमश: जायदाद बढती गई। वर्तमान प्रतिनिधि शिवदत्त और हेमराय हैं। इन्होंने अब बँटवारा कर लिया है।
वैश्यों में तरेंगा के ताहुतदार प्रख्यात हैं। इनके डेढक सौ गाँव हैं। इनके पुरखा जगदेव साव आगरा से आए थे और पहले मंडला में बसे थे, फिर वे रायपुर आये और लेन-देन करने लगे। प्राय: डेढ सौ वर्ष पूर्व उस जमाने के मरहठा हाकिम ने उन्हें 145 गाँव बख्श दिए, उनमें तब केवल 13 आबाद थे। वर्तमान ताहुतदार कल्यानसिंह हैं। आरंग के गंगाराम साव के 14 गाँव और अर्जुन साव के 20 गाँव हैं। रायपुर के रामरतन अगरवाल के 50 गाँव हैं। वे सिरपुर के ताहुतदार कहलाते हैं। रामसरन लाल के 13 गाँव हैं। इनके पूर्वजों ने रायपुर के दूधधारी मंदिर को बनवाया था। रायपुर के दीनानाथ साव के भी आठ-दस दस गाँव हैं।
धमतरी में धरमपुरी गोंसाई और रायपुर में महन्त बजरंग दस वैरागी अग्रण्य समझे जाते हैं। गोसाईं के प्रथम गुरु 500 नागा लेकर आये थे और जो जमींदार टकौली समय पर नहीं देते थे उसकी वसूली ये बलपूर्वक करा देते थे। देन-लेन से इनके पास धन बहुत बढ गया। अब इनके 42 गाँव हो गए हैं। बजरंग दास के तीकेक गाँव हैं, जो दूधाधारी मंदिर में लगे हैं। कहते हैं कभी-कभी इनके भंडार में एक लाख खण्डी अनाज रहता था।

भाषाएँ Languages
जिले की प्रचलित भाषा छत्तीसगढी हिंदी है। कोई 12 लाख आदमी हिंदी बोलते हैं, इनमें से कम से कम 11 लाख छत्तीसगढी हिंदी अवश्य बोलते होंगे, यद्यपि सन् 1921 की की रिपोर्ट में इनकी संख्या केवल पौने पाँच लाख बतलायी गई है, जो कि स्पष्टत: गलत है । डेढ हजार उर्दू, दो हजार मारवाडी और 5 हजार बंजारी बोलते हैं, जो हिंदी ही के विकृत रूप हैं। 9 हजार मराठी बोलते हैं, इनमें ढाई जार हल्बी बोलनेवाले शामिल हैं। यद्यपि उडिया मध्यप्रदेश से अब उड गई है तथापि उसकी पूंछ फुलझर और खरियार में उलझ कर रह गई है। इस जिले में इस भाषा के उपयोग करने वाले प्राय: दो लाख जन बतलाये गए हैं। सन् 1921 की जनसंख्या की रिपोर्ट में गोंडी बोलनेवाले केवल 2700 बतलाये गए हैं, यह बहुत ही अशुद्ध है। जिसको स्थानीय अनुभव है कि वह चट बता सकेगा कि इससे दस गुने से अधिक गोंड गोंडी बोलते हैं । गोंड बहुधा द्विभाषिये होते हैं। आपस में वे अपनी भाषा बोलते हैं और हिंदुओं से हिंदी और उडियों से उडिया । उडाने की ओर गोंड विशेष जंगली दशा में पाए जाते हैं। जान पडता है कि वहाँ के गोंडों की भाषा उड्या लिख दी गई है, जिससे उड्या बोलनेवालों की भाषा प्राय: द्विगुणित हो गई है । वस्तुत: उडिया बोलनेवाले एक लाख निकलेंगे और यथोचित शोध करने से इतने ही गोंडी बोलनेवाले निकल आएँगे । स्मरण रहे कि गोंडों की संख्या इस समय दो लाख से ऊपर हैं।

छत्तीसगढी बोली
छत्तीसगढी बोली गंवारू समझी जाती है, परंतु वह अवधी के वर्ग की है, जिसमें हिंदी की सबसे उत्तम पुस्तक तुलसीकृत रामायण लिखी गई है। जब छत्तीसगढ में कोई तुलसी पैदा होगा, तब उसकी कल्पित ग्रामीणता बिलकुल निकल जाएगी । कुछ दिन पूर्व लोग शिष्ट समाज में उसका उपयोग करने से डरते थे। अब कई लोग इस बोली में पुस्तकें लिखने लगे हैं। धमतरी से काव्योपाध्याय हीरालाल ने पैंतीसक वर्ष पूर्व उसका एक व्याकरण लिख डाला था, जिसका अंग्रेजी अनुवाद सर जार्ज ग्रियर्सन ने उसी जमाने में कर दिया था। पुन: उन्हीं के अनुरोध से हाल ही में प्रान्तिक सरकार ने उसका संशोधन करवा के छपवा दिया है। इस भाषा में कविता करने का लग्गा राजिम के पंडित सुंदरलाल ने बीसक वर्ष पूर्व से लगाया था। तबसे अन्य छत्तीसगढियों का साहस बढा। अब छोटी-मोटी कई पुस्तकें बन गई हैं। उनमें से एक भूल भुलैया नामक शेक्यपियर के एक नाटक का अनुवाद है। छत्तीसगढी के वर्तमान लेखक ये हैं.--पंडित सुंदरलाल, पं. लोचनप्रसाद, पं. रामदयालु तिवारी, पं. वनमाली प्रसाद शुक्ल, पं. शुकलाल प्रसाद पाण्डेय, रामदास वैष्णव, बिसाहूराम इत्यादि। हाल ही में रायगढ रियासत का एक मासिक पत्र निकलने लगा है, उसमें कभी-कभी छत्तीसगढ के लेख रहते हैं । उदाहरणार्थ पंडित लोचनप्रसाद छंद यहाँ पर उद्धृत किया जाता है।
निचट सुनहा कहनी कथनी मारू ढोला करमा नैकायन के गीत चदैनी आज मरम गीता के सुन लो छत्तिसगढिया भाई।
गीता मुकुत पदारथ दैथे, कृष्ण कन्हाई ॥
इस भाषा के प्राय: सौ वर्ष के पूर्व का नमूना अंतिम हैहयवंशी राजा के दिए हुए ताम्र शासन में पाया जाता है । यह ताम्रपट आरंग के अंजोरी लोधी के पास मौजूद है। उसकी नकल नीचे दी जाती है।
॥ श्रीराम ॥
सही ।
स्वस्ति श्री महाराजाधिराज श्री महाराजा श्री राजा अमर सिंघदेव एतौ ठाकुर नंदू तथा घासीराय कह कबूल पाट लिषाइ दीन्हें अस जो छोटा बूंदा गयारि मई मुआरि ई सब एकौन देइ ॥ एक विद्यमान देवान कोका प्रसाद राई तथा देवान (मल्ल) साहि लिए बाबू कासीराम कबूल पाट सही रायपुर बैठे लिये कार्तिक सुदी 7 कह सं. 1792 डोकर पटइल तथा मथुराई पटइल तथा तषत सरफ लिखाइ ले गए जव्व नंदू धमतरी उठि गये रहे, तब एही कबूल मह आये।
( दूसरी ओर पीठ पर )
इ कबलू के विद्यमान माहंत श्री मानदास तथा श्री महाराज कुमार ठाकुर श्री उदैसिंघ तथा श्रीमहाराज कुमार लाला श्री कृपालसिंह तथा नायक प्रताप और साक्षी बाबूगुमान सिंघ तथा ठाकुर कोदूराई तथा परिहार प्यारेलाल दुबे 'परमाइज लेवाई आने सही देबान कोका प्रसाद राइ के सही दवान मल्ल साहिके

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