हमर छत्तीसगढ़ भाग 5 : त्रिभुवन पाण्डेय समग्र

व्यंग्य का सामाजिक सरोकार - त्रिभुवन पाण्डेय 

"व्यंग्य' मनुष्य के भीतर पाई जाने वाली स्वाभाविक प्रवृत्ति है । वह जिस सहजभाव से प्रेम करता है, उसी सहज भाव से घृणा करता है । जिन लोगों तथा जीवन मूल्यों से वह प्रेम करता है उसकी अभिवृद्धि करता है तथा उसे संरक्षित रखने के लिये हर संभव प्रयास करता है । उसके विपरीत जिन लोगों तथा जीवन मूल्यों से घृणा करता है, उसे वह जीवन से हटाना चाहता है । सामाजिक तथा वैयक्तिक जीवन में हजारों प्रकार की असंगतियाँ उभरती रहती हे इसलिये उन पर नियंत्रण रखने वाली दृष्टि भी दो चार नहीं अशेष होनी चाहिए । जीवन को श्रेष्ठ तथा सुसंस्कृत स्वरूप देने की शक्ति किसी एक व्यक्ति में नही होती । इतिहास में यह चमत्कार कभी- कभी ही संभव होता है कि एक व्यक्ति सम्पूर्ण समाज की विकृतियों को हटाकर उसे श्रेष्ठ जीवनमूल्यों के आभूषित कर देता है वरना यह दायित्व सबको मिलकर बांटना पडता है ।

सामान्य व्यक्ति में निंदा और 'व्यंग्य' में फर्क करने का नही होता इसीलिये उसकी निंदा में वह शक्ति नही होती जो दूसरे को परिवर्तित कर दे । वह अपनी घृणा को उसके विशुष्द रूप में जाहिर कर देता है । वह नही जानता कि सत्य बोलना ही जरूरी नही है, प्रिय सत्य बोलना जरूरी है'। सामान्य व्यक्ति का व्यंग्य बोध' गहरे आलोचक का बोध होता है । आलोचना भी इतना कटु कि सुनने वाला तिलमिला उठे और बदले में मरने मारने पर उतारू हो जाय । व्यंग्य घृणा को अभिव्यक्त करने की कला है । यह मानवीय करूणा, सदाशयता तथा सहानुभूति से पूर्ण है । यहां नफरत अपराधी 'से नही, अपराध की प्रकृति से है । घृणा व्यक्ति से नही उन परिस्थितियों से है जो मनुष्य के श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को छीनकर उसे विकृत जीवन मूल्यों की ओर खींच ले जाती है । 'व्यंग्य' बेहद विवेकशील, न्यायबुध्दि तथा निरपेक्ष हदय की अभिव्यक्ति है । जिसमें थोडा भी पूर्वाग्रह है, वैयक्तिक राग-द्वेष है, निजी स्वार्थ है, संकीर्णता है वह और चाहे जो हो श्रेष्ट व्यंग्यकार नही हो सकता ।

जहाँ तक व्यंग्य के सामाजिक सरोकार का सवाल है, साहित्य की श्रेष्ठ विधाओं से उसकी स्थिति भिन्न है । व्यंग्य के सामने आत्म केन्दित या अमूर्त होने जैसा कोई संकट कभी उपस्थित नही हुआ । हिन्दी व्यंग्य की नींव ही इतनी पुखता पडी कि उस पर निर्मित होने वाला व्यंग्य साहित्य का भवन भी उतना ही मजबूत और भव्य दिखलाई पडता है । भारतेन्दु, हरिशचंद्र, बालकूष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र तथा बाबू गुलाबराय जैसे श्रेष्ठ रचनाकारों ने हिन्दी व्यंग्य की आधारशिला रखी । उन्हों ने व्यंग्य को वैयक्तिक अधिरंचना से निकालकर समाजिक यथार्थ की भूमि पर खडा कर दिया । व्यंग्य की जो दृष्टि व्यक्तिगत विकृतियों तथ्न चरित्रगत कमजोरियों तक ही सीमित थी वह कुछ और व्यापक हुई । ब्रिटीश सरकार से लेकर समकालीन समाज में मौजूद रूढियों , जर्जर _ परम्पराओं , राष्रीय आंदोलन के प्रति उपेक्षा बरतने वाली चेष्टाओं की जमकर खबर ली गयी । शिल्प और कथा दोनों ही भावी व्यंग्यकारों के लिये पथप्रदर्शक बन गये ।

कभी-कभी व्यंग्य आत्मकेन्दित भी होता है लेकिन तब व्यंग्कार स्वत: को समाज के एक प्रतिनिधि चरित्र के रूप में तब्दील कर लेता है । वह अपनी क मजो रियों , लालसाओं औ र आवश्यकताओं पर दृष्टि के न्दित कर समाज की कमजो रियों लालसाओं और त्रुटियों को जानने की कोशिश करता है । वह अपने भीतर पैठकर समाज को देखता है । जो बुराई या कमजोरी उसे अपने भीतर मिलती है । उन पर व्यंग्य कसने से नही चूकता । वह जीवन नौका को नियति के समुद्र में डालकर यह नही कह सकता 'ले चल मुझे बुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-थीरे' वह नियति से ज्यादा मनुष्य के कर्म और उसे परिचलित करने वाली शक्तियों पर विश्वास करना है । उसकी इसी भूमिका को दृष्टि में रखकर 'मेरीडिथ' ने कहा-व्यंग्यकार एक समाजिक ठेकेदार होता है, बहुधा वह एक समाजिक सफाई करने वाला है जिसका काम गन्दगी के ढेर को साफ करना है ।

आज भारतीय समाज की जो स्थिति है उसे देखकर चेखव के रूस की याद आती है । चेखव ने उन्नीसवी शताब्दी के आखिरी दशक में जो रचनाएं लिखी वें श्रेष्ठतम व्यंग्य कहानियों कही जा सकती है । अकेले चेखव की रंचनाओं को पढकर समकालीन रूसी समाज को जाना जा सकता है । 'गिरगिट' का दरोगा आचुमेलोव आज भारत में पाया जाता है । 'ब्रुकिन' को काटने वाला कुत्ता आचुमेलोव को तब तक लावारिस पिल्ला जान पडता है जब तक उसे यह जानकारी नही मिल जाती कि 'ग्रे हाइंड' नस्ल का वह कुत्ता जनरल जिमालोव के भाई का है । जानकारी मिलते ही दारोगर आचुमेलोव की दृष्टि बदल जाती है । वह कुत्ते को उठाकर गोद में ले लेता है । उसे प्यार करता है और खुक्रिन को यह कहकर भगा देता है कि जनरल के घर का कुत्ता कभी ऐसे ओछी हरकत नही कर सकता । क्या भारतीय समाज में यह स्थिति दिखलाई नही पडुती । चेखव की ही एक दूसरी कहानी 'नकाब' । एक सामाजिक संस्था के सहायतार्थ नृत्य का आयोजन किया जाता है जिसमें उस नगर का करो डपति इज्जतदार नागरिक प्यातिगोरोव भी सम्मिलित होता है । नृत्य के दौरान वह एक युवती के साथ वाचनालय में चला जाता है जहाँ वह बुद्धिजीवियों से अभद्र व्यवहार करता है । बुद्धिजीवी जेस्त्याकोब पुलिस अधिकारी को बुला लेता है । पहले तो पुलिस अधिकारी मेवजात नाराज होता है लेकिन जब करो डपति प्यातिगोरोव नकाब उतार फें कता है तो वह क्षमा मांगने लगता है ।

बुद्धिजीवी भी उससे क्षमा मांगते है और नशे में लडखडाते हुए करो डपति प्यातिगोरोव को बाहर खडी घो ड्रागाड्री तक पहुं चाते है। रूस का जो समाज कल था वह भारत में आज है । व्यंग्य यदि पूरी सामाजिक चेतना के साथ लिखा जाय तो उसमें विश्वसमाज प्रतिबिंबित होने लगता है ।

क्या हम मर्चेन्ट ऑफ वेनिस के शाइलॉक को भूल सकते है? सूद पर लेनदेन करने वाले लोगों की निर्ममता का जैसा सजीव चित्रण शेक्सपीयर ने किया है वह अद्वितीय है । टॉल्स्टाय की व्यंग्य रचना मनुष्य को ... कितनी जमीन चाहिये मनुष्य की असीमित आका क्षा.और उसकी करूण परिणति पर मार्मिक व्यंग्य है। बर्नार्ड शॉ का वह सैनिक युवक नही भूलता जो एण्ड द मेन' में लडने के लिये तैयार होते समय अपने पेंट की जेब में गोलियों की जगह ब्रेड और चाकलेट भर लेता है । मित्र उसका मजाक उडाते है। वह कोई जवाब नही देता । बाद में उनकी टुकड्डी चारों ओर से घिर जाती हे । खाने की सामग्री समाप्त हो जाती है । लोग भूखों मरने लगते है । वह युवक मजे में रहता है । लोग तब महसूस करते है ' भूख गोली से नही मिटती भोजन से मिटती है ।

हिन्दी व्यंग्य को जिस व्यक्ति ने विश्व व्यंग्य साहित्य के समानान्तर खड्डाकर दिया हास्य और विद्रू पता के दायरे से निकालकर उसे सामाजिक चेतना का प्रतिनिधि बनाया, समकालीन सामाजिक,, सांस्कृतिक, राजनैतिक तथा मानवीय असंगतियों की अभिव्यक्ति के लिये सक्षम बनाया, हिन्दी व्यंग्य साहित्य अपने उस निर्माता का सदैव ऋणी रहेगा । जिस तरह चेखव ने समकालीन रूस का यथा रूप चित्रण किया उसी तरह हरिशंकर परसाई ने भारतीय समाज का यथावत चित्रण किया । उनकी व्यंग्य रचनाओं में भारतीय समाज का हर एंगल से लिया गया चित्र मौजूद है । उन्हों ने व्यंग्य की रचना प्रक्रिया तथा उसके सामाजिक दायित्व को लेकर बडी गंभीरता के साथ विचार किया है । 'व्यंग्य' पर समसामयिकता का जो आरोप लगाया जाता है परसाई जो ने जवाबी हमला करते हुए लिखा - मै शाश्वत साहित्य रचने का संकल्प करके लिखने नही बैठता । जो अपने युग के प्रति ईमानदार नही होता वह अनंतकाल के प्रति कैसे हो लेता है मेरी समझ से परे है । उन्हों ने व्यंग्य की प्रहार क्षमता को निरन्तर बनाये रखने पर बल दिया है । वे मानते है कि चट्टान सी बुराई पर अगर कोई सुनार के हथौडे से प्रहार करे तो यह उसकी नासमझी ही कही जायेगी । चट्टान पर तो लुहार के धन का भरपूर हाथ ही पडना चाहिये ।

परसाई जी का व्यंग्य साहित्य विशाल है । उन्हों ने हर स्थिति और अवसर पर भी लिखा है । भोलाराम का जीव, लंका विजय के बाद, सुदामा के चाँवल, अकालोत्सव चूहा और मै जैसी सैकडो रचनाएं भारतीय समाज को उसकी सम्पूर्णता में जानने समझने का प्रयास करती है । उन्हों ने सत्य को प्रिय सत्य का रूप देने का यथासंभव प्रयास किया है लेकिन जब कभी स्थिति की माँग हुई उन्हों ने निर्मम और बेबाक सत्य लिखा वे इस मामले में कबीरपंथ की सत्य की जलती हुए लुकाठी सदैव साथ लेकर चलते है । परसाई के होते हुए किसी झूठ में यह हिम्मत नही' कि वह चैन से बैठ चुके । मुखौटों से उन्हें चिढ है । वे मनुष्य को उसके वास्तविक रूप में देखना तथा जानना चाहते है'। उनमें व्यंग्य की प्रकृति ओ ढी हुए नही है । उनके व्यंग्य उनके जीवन तथा व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है।

आजादी के बाद भारतीय समाज में आस्था के विपरीत तेजी से गिरावट आती गयी । स्वाधीनता आंदोलन के साथ पलने वाली समाज सुधार की चेष्टा कमजोर पडुती गयी । श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की के लिये जो उत्साह तथा वातावरण निर्मित हुआ वह धीरे -धीरे ठंडा पडता गया । जो चीजें अजादी पाने के रास्ते में व्यवधान मानकर हटा दी गयी थी वे वापस स्थापित होने लगी । भारतीय भाषा तथा मानवीय भूषा के प्रति जो लगाव पैदा हुआ था वह ओझल होने लगा । विदेशी भाषा, विदेशी भूषा, विदेशी आचार तथा विदेशी विचार के प्रति आकर्षण बढने लगा । के बदले अपने दलीय तथा वर्गहित उभर आये । समाजहित का स्थान व्यक्ति हित ने ले लिया । जिस देश के लोगों को बडी मुश्किल से राष्रीयता के ध्वज के नीचे एकत्र किया गया था वे फिर विभाजित होने लगे । भाषा, सम्प्रदाय, जाति, वर्ग राजनीति सबने इस विभाजन को उकसाने में मदद की । धार्मिक रूढियाँ , अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियाँ , मूल्यहीनता जैसी अनेक घातक प्रकृतियों ने भारतीय . समाज को अपने दायरे में समेटना प्रारंभ किया । आजादी के पहले जैसी मूल्य हीनता नहीं' थी वैसी मूल्यहीनता आज समाज में दिखलायी पडु रही है ।

आज व्यंग्यकारों पर अपेक्षाकृत अधिक बडा दायित्व है । सामाजिक जटिलताओं को समझने के लिये आज ज्यादा कुशाग्र बुद्धि की जरूरत है। आज शोषण का रूप भी विश्वव्यापी हो चुका है । विकृतियों की एक अंतहीन श्रृंखला निर्मित होती चली गई है । जिसका आखिरी छोर किन अदृश्य हाथों में है यह समझना तथा उसे अन्वेषित करना काफी प्रयत्न साध्य कार्य है' आज सामाजिक विकृतियों ज्यादा बेजाक रूप में मौजूद है । जो भ्रष्ट है उन्हें इस बात का कोई ठुख भी नही है । कि वे देश को किस कदर खोखला कर रहे है । चरित्रहीन व्यक्तियों की समाज में प्रतिष्ठा है । दहेज के लिये बहुओं को आग में झों का जा रहा है । समाज में जो गलत हो रहा है उसके विरोध का किसी में साहस नही है । पेडों और दीवारों पर अश्लील चित्र ऐसे टंगे है मानो हमारे पास दिखाने के लिये इससे श्रेष्ठ कुछ भी नही बचा है । सब अपने अपने घरों में बैठकर आश्वस्त . है कि आग अभी उनके 'घर तक पहुंची नही है जबकि वह आग ¦ दावाग्नि की तरह जीवन को निगलती तेजी के साथ हमारी ओर बढी चली आ रही है । मानवीय संबंधों को आर्थिक अभाव का दैत्य ' जर्जर बना रहा है । अट्टालिकाएं ऊंची होती जा रही है लेकिन उसमें रहने वाले लोग बौने होते जा रहे है। मैथिली भाषा के प्रसिध्द व्यंग्यकार हरिमोहन झा ने वर्तमान समाज के इस विद्रुप होते हुए रूप को कितने सहज रूप से अभिव्यत किया है अजी, संस्कृत को अंग्रेजी खा गयी, संवत को ईस्वी खा गयी, मंदिर को क्लब खा गया, धर्मशाला को होटल खा गया, रामलीला को सिनेमा खा गया, सेर को किलो खा गया, मन को क्विंटल खा गया, गुरूकुल को कान्वेंट खा गयां, पिता को पापा खा गया, माता को मम्मी खा गयी, भोज को पार्टी खा गई प्रणाम को टाटा खा गया।

समकालीन व्यंग्यकार इस बढती हुए मूल्यहीनता की स्थिति का सामना किस प्रकार करेंगे यह तो भविष्य बतायेगा लेकिन आज उनकी रचनाओं को पढते हुए आश्वस्त हुआ जा सकता है कि उन्हें अपने दायित्व की जानकारी है । वे समकालीन समाज के संकट से पूरी तरह भले ही वाकिफ न हो लेकिन 'यथासंभव' उसे जानने के प्रयास में संलग्न है । व्यंग्य लेखन एक ऐसा सामाजिक दायित्व है जिसे समांज ने अपने हितों के संरक्षण के लिये व्यंग्यकारों को सौंपा है । जिस तरह रोगीं अपने चिकित्सक को आपरेशन की अनुमति सहर्ष दे देता है क्यों कि वह जानता है कि शल्यचिकित्सा से उसे नया जीवन प्राप्त होगा, व्यंग्यकारों की भी ठीक यही स्थिति है । रही छद्म व्यंग्य लेखकों की बात तो नीम हकीम' आखिर कहाँ नही घाये जाते ?

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