नीतीश कुमार ने भाजपा अध्यक्ष संजय जायसवाल को दिखाया आईना

बिहार में जदयू और भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं है. दावा भले एकजुटता का किया जाता रहा हो लेकिन कलह दोनों दलों में है और यह दिखाई भी दे रहा है. उपचुनाव के नतीजों ने इस कलह को और बढ़ाया है. बिहार में अपराध की बढ़ती घटनाओं पर भाजपा की जिस तरह की प्रतिक्रिया आई है उससे भी कई तरह के सवाल खड़े होते हैं. नेताओं में तो तनातनी है ही कार्यकर्ताओं में भी अंदरखाने काफी खींचतान चल रही है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने दिवाली की पूर्व संध्या पर मन की बात की और जदयू को कई सलाह दी लेकिन जदयू ने संजय जायसवाल को आईना दिखाने में देर नहीं किया. संजय जायसवाल ने दो दिन पहले जदयू के जिस नेता पर सवाल उठाए थे, जदयू ने अगले ही दिन उन्हें अपना प्रदेश महासचिव बना कर इनाम दे दिया.

जदयू ने गोपालगंज के कई ब्लॉक पर सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ धरना देने वाले पूर्व विधायक मंजीत सिंह को पार्टी का प्रदेश महासचिव बनाया है. संजय जायसवाल ने दो दिन पहले ही फेसबुक पर पोस्ट लिख कर कहा था कि सूबे में सरकार की हालत यह है कि जदयू के एक पूर्व विधायक अपनी ही सरकार के भ्रष्टचार के खिलाफ धरना दे रहे हैं. अगर यही काम भाजपा के किसी नेता ने किया होता तो उन पर यह दबाव बनाया जाता कि उस नेता को पार्टी से निकाला जाए. संजय जायसवाल के सवाल के अगले ही दिन जदयू ने अपनी प्रदेश कमिटी का एलान किया. मंजीत सिंह को जदयू ने अपना प्रदेश महासचिव बनाय़ा है. सियासी हलके में चर्चा है कि नीतीश ने भाजपा को बताया है कि वे अपनी सहयोगी पार्टी का कितना नोटिस लेते हैं.

बैकुंठपुर से जदयू के पूर्व विधायक मंजीत सिंह ने कुछ दिन पहले बैकुंठपुर, बरौली जैसे प्रखंड मुख्यालयों में धरना देकर सरकारी योजनाओं में बड़े पैमाने पर लूट खसोट का आरोप लगाया था. जदयू के नेता का आरोप था कि जिले में सरकारी अफसरों ने खुलेआम लूट खसोट मचा रखी है. बिना पैसे का एक भी दाखिल खारिज नहीं हो रहा है. शौचालयों के लिए लोगों को मिलने वाले पैसे में नाजायज वसूली की जा रही है. बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए राज्य सरकार से जो पैसे आया उसका साठ फीसद वापस चला गया. पिछले दो साल कई स्कूलों में पोशाक और साइकिल की राशि का वितरण नहीं हुआ है. इसी साल ओला वृष्टि व तूफान से प्रभावित पंचायतों में फसल क्षतिपूर्ति व आवास अनुदान की रकम अबतक नहीं दी गई. जदयू के पूर्व विधायक के मुताबिक उन्होंने जिलाधिकारी से इन तमाम मामलों की शिकायत की. वहां से कार्रवाई का भरोसा मिला लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई.

मंजीत सिंह ने धरना देकर जिन मामलों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया उन तमाम मामलों में नीतीश कुमार अपनी पीठ खुद थपथपाते रहे हैं. नीतीश कुमार बार-बार यह कहते रहे हैं कि ऑनलाइन आवेदन और लोक शिकायत निवारण कानून की व्यवस्था कर उन्होंने भ्रष्टाचार रोक दिया है. लेकिन उनकी ही पार्टी के नेता प्रखंड मुख्यालयों पर धरना देकर भारी लूट खसोट का आरोप लगा रहे हैं. नीतीश बाढ़ राहत के काम की मॉनिटरिंग खुद करने का एलान करते रहे हैं लेकिन उनके ही नेता धरना देकर बता रहे हैं कि उस पैसे में लूट हो रही है. जाहिर है मंजीत सिंह ने सरकार की ही पोल खोली. लेकिन जदयू ने उन्हें प्रदेश महासचिव बनाकर इनाम दिया. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भाजपा को जबाव देने के लिए जदयू ने मंजीत सिंह को पुरस्कृत किया.

दिवाली की पूर्व संध्या पर संजय जायसवाल ने ब्लॉग लिखकर उपचुनाव परिणामों पर आत्ममंथन की नसीहत दी है. उनका मानना है कि उपचुनाव हमें अपनी कार्यशैली के बारे में पुन: आकलन करने की जरूरत बताता है. राजग के साथ सबकुछ ठीक नहीं होने का संकेत देते हुए जायसवाल ने कई पुरानी बातें इस अंदाज में याद दिलाईं कि वैसा होता तो हम जरूर जीतते. संजय जायसवाल ने पुराने दिनों को याद करते हुए ब्लॉग में लिखा है कि 2010 के विधानसभा चुनावों में हम तीन चौथाई से ज्यादा बहुमत पाने में सफल हुए थे. इसका सबसे महत्त्वपूर्ण कारण था बिहार की कानून-व्यवस्था में हुआ अभूतपूर्व सुधार और भाजपा-जदयू के कार्यकर्ताओं के बीच का अद्भुत समन्वय. उस समय बिहार की कानून-व्यवस्था पूरे भारत में सर्वश्रेष्ठ मानी जा रही थी. दूसरा भाजपा-जदयू कार्यकर्ताओं के परस्पर सहयोग से प्रखंड तक में लोगों के काम आसानी से हो जाते थे. आज हमें इन दोनों मसलों पर आत्म विवेचना की जरूरत है. 

जायसवाल ने लिखा है कि इस उपचुनाव की चर्चा दरौंदा की जिक्र किए बगैर अधूरी है. यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि दरौंदा में विद्रोह भाजपा कार्यकर्ताओं का नहीं था, बल्कि भाजपा और जदयू कार्यकर्ताओं का सम्मिलित विद्रोह था. अगर हम बेलहर में समझाने में सफल नहीं होते तो वहां भी कुछ ऐसे ही होता. आज भी गोपालगंज में जदयू के पूर्व विधायक सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ धरने पर बैठते हैं. लेकिन अगर यही कार्य भाजपा के किसी पूर्व विधायक ने किया होता तो मुझ पर उसके निष्कासन का दबाव होता. उन्होंने लिखा भाजपा की खासियत है हम अपनी हार से सीखते हैं. इतिहास गवाह है हर हार के बाद हम और मजबूत होकर उभरे हैं. भले ही यह मुख्य चुनाव नहीं थे और इनका सरकार की सेहत पर कोई फर्क भी नही पडऩे वाला, फिर भी इस परिणाम को ठंडे बस्ते में डालने की नहीं बल्कि क्या कमी रह गई उसकी समग्र समीक्षा करने की जरूरत है.  (राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर सटीक विश्लेशण के लिए पढ़ें और फॉलो करें).



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